Saturday, 28 August 2021

काल तुझसे होड़ है मेरी

'पहल' का 125 वां अंक उसका समापन अंक है । इस अंक में शीर्षस्थ प्रगतिशील कवि शमशेर बहादुर सिंह से हमारी बातचीत प्रकाशित है। यह बातचीत अप्रैल 1983 में उनके लखनऊ प्रवास के दौरान की गई थी। उसका एक टुकड़ा, जो प्रगतिशील आंदोलन और संगठन को लेकर है, उसे पहल ने प्रकाशित किया है। 

बात 1983 की है। कवि व गद्यकार शमशेर बहादुर सिंह का अकसरहाँ लखनऊ आना होता था। वे आते और यहाँ महीनों रुकते। अजय सिंह का भीकमपुर कालोनी का निवास उनका घर हुआ करता था। हमारे लिए उनसे मिलने, बतियाने, साहित्य पर चर्चा करने का अच्छा अवसर था। लखनऊ से निकलने वाले अखबार अमृत प्रभातका दफ्तर हमारे मिलने.जुलने का उन दिनों केन्द्र था। यहीं तय हुआ कि शमशेर जी से बातचीत की जाय और वह अलग अलग, टुकड़ों में या फुटकर बातचीत की जगह व्यवस्थित तरीके से हो। फिर इसे लेकर प्रोग्राम बना, टेपरिकार्डर खरीदा गया, अपने दफ्तरों से हमने छुट्टियाँ लीं और सवालों की एक लम्बी चैड़ी सूची तैयार की गई। वैसे शमशेर जी को सवालों में बाँधना संभव भी नहीं था। फिर भी हमारी कोशिश थी कि शमशेर जी से जो वार्ता हो, वह व्यवस्थित हो और वे विषय हमारे सामने रहें जिन पर हमें वार्ता करनी है। और यह बातचीत 6 7 अप्रैल 1983 को हुई।

हमारी बातचीत के कई विषय थे। पहला, 40 के दशक के प्रगतिशील आन्दोलन, उसका प्रभाव, लेखक और संगठन के रिश्ते आदि। दूसरा, कविता का वर्तमान और वर्तमान की कविता। तीसरा, भाषा विवाद खासतौर से हिन्दी.उर्दू विवाद। उन दिनों उत्तर प्रदेश में वीरबहादुर सिंह की सरकार थी और उसने प्रदेश में उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाये जाने की घोषणा की थी। सरकार द्वारा यह मात्र घोषणा थी लेकिन इससे प्रदेश में उर्दू विरोधी माहौल बन गया था। इस विवाद को साम्प्रदायिक हवा दी जा रही थी। लाॅकडाउन के दौरान की यह उपलब्धि है कि पुरानी फाइल में वार्ता के दो खण्ड लिखित रूप में प्राप्त हुए। उस वक्त शमशेर जी ने जो विचार रखे, वह आज तकरीबन तीन दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी मौजू है। मंगलेश डबराल, मोहन थपलियाल, अनिल सिन्हा, अजय सिंह और कौशल किशोर इस वार्ता में शामिल रहे। वार्ता के संयोजक थे - कौशल किशोर। गौरतलब है कि इस वार्ता में शामिल मोहन थपलियाल, अनिल सिन्हा और मंगलेश डबराल अब इस दुनिया में नहीं हैं। वार्ता को जीवन्त बनाने में इनकी भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। मंगलेश डबराल तो अपने सवालों को लिखित रूप में ले आये थे। यहाँ प्रस्तुत है शमशेर जी से की गयी वार्ता।


लेखक, संगठन और प्रगतिशील आन्दोलन


प्रगतिशील आंदोलन की हिंदी में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शायद ही किसी आंदोलन ने हिंदी को इतना प्रभावित किया हो। भारत की कई भाषाओं पर इसका प्रभाव रहा है, सिर्फ हिंदी पर ही नहीं। उसका मल्टीकल्चरल प्रभाव दिखता है। आप अपने लेखन के आरंभिक दिनों में इस आंदोलन से जुड़े। वे क्या परिस्थितियां थीं जिसकी वजह से आप माक्र्सवाद, कम्युनिस्ट पार्टी और जो प्रगतिशील आंदोलन था, उसकी ओर आकृष्ट हुएआपकी कविता, चिंतन, दृष्टिकोण इत्यादि पर इसका क्या प्रभाव हुआ? आप तो बम्बई कम्युन में भी रहे शायद।

शमशेर: शायद नहीं, मैं बम्बई कम्यून में पूरी तरह रहा। कम्युनिस्ट पार्टी का, मेरे ख्याल में, वह सुनहरा दौर था। हिंदी व उर्दू के ही नहीं अन्य भाषाओं जैसे गुजराती, मराठी आदि के नए और उदीयमान लेखक, कवि आदि उन दिनों बम्बई में इकट्ठा थे। उनमें अधिकांश प्रगतिशील आंदोलन से भी जुड़े हुए थे। नई पत्र-पत्रिकाएं वजूद में आ रही थीं। हिंदी, उर्दू, गुजराती, मराठी, बंगाली में भी इसका अच्छा असर था। इस सब का केंद्र कम्युनिस्ट पार्टी या कह लीजिए उसके तत्वावधान में या प्रभाव में, पूरी तरह से नहीं कह सकते कि उसी के द्वारा संचालित बल्कि उससे बहुत गहरा असर लेते हुए यह प्रगतिशील आंदोलन था। इस आंदोलन में ऐसे बहुत से लेखक शामिल रहे, जो समझते थे कि यह कम्युनिस्ट पार्टी की ही विरासत नहीं है। यह आंदोलन सभी प्रगतिचेता लेखकों, कवियों का आंदोलन था जिसके पीछे प्रेमचंद और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे लेखक थे। इससे इस बात की और भी गारंटी हो जाती है कि यह किसी खास पार्टी के झोले में पड़ी हुई चीज नहीं है। जब-जब यह किसी खास पार्टी की जेब में गई, इसका तेजी से ह्रास हुआ। इसकी साख गिरी। इसमें फिराक, जोश मलीहाबादी, मजाज आदि शामिल रहे। मुझे नहीं मालूम कि मजाज कभी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे या नहीं लेकिन इन्हें पार्टी का बहुत बड़ा हमदर्द कहेंगे। उस समय सन 42 में पार्टी पर से प्रतिबंध हटा था। दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ। रूस उसमें शामिल हुआ और यह युद्ध एलाइज का जंग बन गया। कम्युनिस्ट पार्टी ने इस लड़ाई का समर्थन करने का आह्वान किया था क्योंकि उस समय फासिज्म और गैर फासिज्म के बीच की लड़ाई को मुख्य माना गया। इस युद्ध में फासिज्म की हार के साथ जनवादी मोर्चे की जीत और बहुत से संघर्षशील देश, जो अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे, उनका भविष्य जुड़ा था। रूस की जीत से यह चीज जुड़ी हुई थी और उसकी हार से उनका भविष्य दूसरा हो जाता। कम्युनिस्ट पार्टी का अध्ययन था और तथ्यों से यह साबित हुआ कि फासिज्म की योजना यह थी कि जर्मनी से हिटलर और जापान के तोजो, एक पश्चिम से दूसरा पूरब से अपनी सेनाएं बढ़ाते हुए दिल्ली में हाथ मिलाएंगे। स्टालिनग्राड के बाद इन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। सारी दुनिया जानती है कि स्टालिनग्राड शहर के घर, गली और प्रत्येक मकान से रूसी सैनिकों ने लड़ा और उनके मंसूबों को शिकस्त दी।


इन तमाम परिस्थितियों का आपकी कविता तथा चिंतन पर क्या असर पड़ा?

शमशेर: कम्युनिस्ट पार्टी का यह जो स्टैण्ड था, वह मेरे मन पर गहरा प्रभाव अंकित कर रहा था। पार्टी से गहरा जुड़ाव हो चुका था। पार्टी-सदस्यता के उम्मीदवारी काल ;प्रोबेशन पीरियडद्ध को पूरा करने के बाद 45-46 के आसपास मुझे पार्टी कार्ड मिला। उस समय बम्बई में जो कम्युनिस्ट पार्टी थी, वह संगठनात्मक अर्थ में राष्ट्रीय कांग्रेस का ही अंग थी। कांग्रेस की वर्किंग समिति में पीसी जोशी आदि सदस्य थे। ये लोग सन 42 के आंदोलन तथा सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ थे क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी उनके खिलाफ थी। उन दिनों सोशलिस्ट पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी की जानी दुश्मन बनी हुई थी और सही अर्थ में सन 42 का आंदोलन सोशलिस्टों के कंधों पर ही चल रहा था। तमाम श्रेय वे ही लिए जा रहे थे। कांग्रेस पार्टी के अधिकांश नेता जेल में थे और पॉलिसी के तौर पर वे भी तोड़फोड़ और 42 के आंदोलन के पक्ष में नहीं थे। बाद में जब वे जेल से रिहा होकर आए और उन्होंने देखा कि 42 के आंदोलन को सारा देश पूज रहा है और ये नेता ही अग्रणी हंै, ऐसे में पंडित नेहरू ने इस आंदोलन के दायित्व को अपने कंधों पर लेने की घोषणा की। इसके बाद उन्होंने कम्युनिस्ट नेताओं को कांग्रेस से निकाला। इस संबंध में गांधी और जोशी पत्र व्यवहार चला। जोशी आदि कम्युनिस्ट नेताओं का कहना था कि आप लोग गलत कर रहे हैं। हमें आप मत निकालिए। हम इस लड़ाई के अंग हैं। इस लड़ाई के बारे में हमारी अपनी रीडिंग है। राष्ट्रीय आंदोलन में हमारी भी महत्वपूर्ण भूमिका है।


लेकिन सवाल वही है कि इन सब का आपकी कविता पर क्या असर पड़ा?

शमशेर: इसका डायरेक्ट असर आप देखते हैं - नाविक विद्रोह। कम्युनिस्ट पार्टी के पत्रों के माध्यम से, और बम्बई में पार्टी की सभाओं और रैलियों में जाकर मैं उन दिनों की हलचल को देख चुका था। हालांकि वर्किंग क्लास या टेªडयूनियन कार्यकर्ता की तरह काम करने का मुझे मौका नहीं मिला। फिर भी अन्य लेखकों के साथ उन स्थलों, पार्टी कार्यक्रमों तथा कार्यकर्ताओं के उत्साह व स्प्रिट को देखने का मौका मिला था। बम्बई में कम्युनिस्ट पार्टी की सभा में साठ हजार लोग डांगे को सुन रहे हैं। यह ऐसा माहौल था कि मराठी पवाडे़, उर्दू नज्म आदि का मुझ पर असर हो रहा था तथा शैलेंद्र, कैफी आजमी, सरदार जाफरी, साहिर आदि आगे-आगे थे। इन्हीं दिनों जोश ने अपनी प्रसिद्ध कविता वक्त की आवाजलिखी थी। यह माहौल मुझे प्रभावित कर रहा था। यही दौर था जब मैंने वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादीऔर बात बोलेगी, हम नहींजैसी कविताएं लिखी। पार्टी के विचार तथा विश्लेषण जो पत्रों के सम्पादकीय के माध्यम से आ रहा था, मेरी समझ को ढ़ाल रहा था।

 

नाविक विद्रोह और वरली के किसानों पर भी तो आपने लिखा है।

शमशेर: हां, इन सब पर। साथ ही माई’ (श्रीमती कल्याणीबाई सैयद, प्रसिद्ध कांग्रेस कार्यकर्ता जो अन्दर से समर्पित कम्युनिस्ट, दिसम्बर 1945 में दिवंगत) पर। इसके साथ ग्वालियर के मजूरपर भी लिखा।


शमशेर जी, मुंबई में उन दिनों जो राजनीतिक आंदोलन था, वह कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में था, जनवादी चेतना द्वारा संचालित हो रहा था। उस राजनीतिक आंदोलन का साहित्यिक-सांस्कृतिक स्वरूप क्या था? उन दिनों के राजनीतिक आंदोलन और साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन के बीच क्या अंतरसंबंध था?

शमशेर: इस संबंध को व्यक्त करने वाली उन दिनों एक संस्था थी इप्टा। यह एक सांस्कृतिक मंच था। पीसी जोशी स्वयं इसकी गतिविधियों में हिस्सा लेते थे, सुझाव देते थे तथा नाटकों के रिहर्सल आदि में भाग लेते थे। इनमें जो पात्र थे, वे अधिकांश मजदूर होते थे। इनको मंच पर लाकर सांस्कृतिककर्मी बनाया गया था। इसके साथ इसमें नेमीचंद जैन, उनकी पत्नी रेखा जैन तथा कुछ लोग गुजरात तथा बंगाल के भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे। बलराज साहनी इप्टामें तो हिस्सा नहीं लेते थे लेकिन पार्टी के बहुत बड़े हमदर्द थे। शायद सदस्य भी रहे हों। इलाहाबाद में जब इप्टा का जादू की कुर्सीड्रामा खेला गया, उन्होंने लीडिंग रोल किया था और वह भी 102 डिग्री के बुखार में।

 

हां, इप्टा का तो यहां तक प्रभाव था कि देवानन्द भी इससे जुड़े रहे, यह बताया जाता है।

शमशेर: इसकी ज्यादा जानकारी नहीं। हां, सन 44 में पहली बार मैं अपने श्वसुर के इलाज के लिए बम्बई गया था। वहां नरेंद्र शर्मा, रमेश सिन्हा आदि ने इप्टा का शो देखने के लिए मुझे आमंत्रित किया था। वह इप्टा का पहला प्रदर्शन था। उन्होंने रामायण के एक दृश्य ताड़का वधऔर काल आॅफ द ड्रमदिखाया था। इस प्रदर्शन को देखने के लिए बम्बई के लीडिंग कलाकारों को बुलाया गया था। नाटक और अभिनय के स्तर को देख वे आश्चर्यचकित थे। इस प्रदर्शन में कोई नामी-गिरामी नाम नहीं था। मामूली दर्जे के एक्टर थे। उन्हीं दिनों नरेंद्र शर्मा और रमेश सिन्हा ने कहा था कि नया साहित्यमें आ जाइए।


नया साहित्यक्या कोई आंदोलन था?

शमशेर: नहीं, यह पत्रिका थी। उन दिनों तक इसका पहला अंक प्रकाशित हो चुका था। उसमें स्थानीय रूप से नरेंद्र शर्मा, अमृतलाल नागर तथा रमेश सिन्हा थे तथा बाहर से अर्थात इलाहाबाद से प्रकाश चंद्र गुप्त, आगरा से रामविलास शर्मा, दिल्ली से शिवदान सिंह चैहान थे। मैं वहां कार्यालय संपादक हो गया। कविता का संपादन नरेंद्र शर्मा के जिम्मे था। कहानी अमृतलाल नागर तथा राजनीतिक मामलों को रमेश सिन्हा देखते थे। लेख आदि का संपादन और बाकी सहयोग अन्य संपादकगण करते थे। इसमें पहाड़ी ;रामप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ीद्ध भी थे। इसी के समानांतर उर्दू में नया अदबनिकला था तथा गुजराती में भी इसी तरह की पत्रिका। सोचा यह गया कि इसका रजिस्ट्रेशन करा लिया जाय। उन दिनों मोरारजी देसाई बम्बई के होम मिनिस्टर थे। रजिस्ट्रेशन के सिलसिले में उनसे मिलने वालों में नरेंद्र शर्मा और अमृतलाल नागर के साथ मैं भी गया था।


उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी काफी मत विरोध था क्या यह साहित्य संस्कृति के क्षेत्र में भी अभिव्यक्त हो रहा था?

शमशेर: मेरा पॉलिटिकल कॉन्शसनेस उतना शार्प नहीं था, जितना मेरे अन्य साथियों का था। मेरी मुख्य दिलचस्पी रचना और उसके विभिन्न रूपों में थी, खासतौर से कविता में। सन 48 तक इसके अंदर जो अंतर्विरोध थे, उसका मुझे आभास नहीं था। मेरा ना तो पार्टी डॉक्यूमेंट आदि का अध्ययन था जिसे अन्य साथी दिन रात करते रहते थे। कुछ तो मैं इससे भावनात्मक रूप से जुड़ा था और साथ ही तमाम साथी तथा महत्वपूर्ण लेखक प्रगतिशील आंदोलन में आ गए थे। जब मैं 47 में इलाहाबाद आ गया, तब यह लाइन बदली है। कुछ लोगों को मालूम होगा कि पीसी जोशी, बी टी रणदिवे तथा गंगाधर अधिकारी के फोटो उन दिनों एक साथ निकलते थे ऐसे जैसे माक्र्स, लेनिन और माओ के। इसलिए हम यह समझते थे कि एकजुट पार्टी है और इसमें कोई अंतर्विरोध नहीं है। लेकिन बाद में जब रणदिवे की लाइन आई, जिसमें कहा गया कि आजादी घोषित हो गई है तो यह मौका है कि हम मजदूरों का  आंदोलन छेड़ दें। यह रिवॉल्यूशन का वक्त आ गया है। उन्होंने यह आवाहन किया और काफी संघर्ष हुआ, गोलियां चली इधर-उधर। वह फेल हो गया क्योंकि जनता इसके लिए तैयार नहीं थी। वह क्रांति के लिए तैयार नहीं थी। मैं भी उससे असहमत था क्योंकि जो नई लाइन आई थी, वह ऊपर से थोपी गई थी। पहले ऐसा नहीं होता था। पहले नीचे से ऊपर तक बहस-मुबाहिसे आदि होने के बाद कोई लाइन आती थी। इसके बाद मैं पार्टी से अलग हो गया।


शमशेर जी, आजादी के बाद यह प्रगतिशील आंदोलन मंद पड़ गया। शार्प नहीं रहा और फिर धीरे-धीरे यह बिखर गया......

शमशेर: धीरे-धीरे नहीं बल्कि तेजी से यहां आंदोलन बिखरा.....


इसकी आप क्या वजह मानते हैं? कम्युनिस्ट आंदोलन की जो सांस्कृतिक धारा थी, उसके आप एक प्रमुख हिस्से रहे हैं तो क्या वजह रही हैं तथा कहां क्या गड़बड़ी हो गई जिससे ना तो वह धारा ही आगे बढ़ पाई और न देश में क्रांति की हुई?

शमशेर: क्रांति क्यों नहीं हो पाई, इसे तो राजनीति के जो पंडित हैं, वही सुलझा सकते हैं या बता सकते हैं क्योंकि उस पक्ष में राजनीतिक विश्लेषण की बात है। अलग-अलग नेताओं के अलग-अलग विश्लेषण हैं। हमारी तरफ से, प्रगतिशील आंदोलन की तरफ से विश्लेषण करने वालों में रामविलास शर्मा, प्रकाश चंद्र गुप्त, शिवदान सिंह चैहान, अमृत राय आदि पुरोधा थे। इनकी आपस में ही काफी तू तू मैं मैंचलती थी। इसलिए मैंने कान पर हाथ रख लिया कि जब इनके आपस में ही एकमत नहीं हो रहा है तो जो इतर जन हैं, जो कविता रचते हैं या कहानी लिखते हैं तो वे अपनी क्या टांग अड़ा सकते हैं।


लेकिन साहित्य की वह धारा क्यों बिखरने लगी?

शमशेर: देखिए, कार्यकर्ता चाहे सांस्कृतिक हो या राजनीतिक, अगर उसे आत्मसम्मान नहीं देते तो वह कभी निष्ठा से अपना काम नहीं करेगा। सन 48 के बाद जितने साहित्यकार, कलाकार आदि थे इनकी अवमानना या इनका मूल्य कहिए, एकदम गिर गया। ये व्यंग्य के शिकार बनाये जाते। राजनीतिक नेता तथा कार्यकर्ता इन्हें देखकर दूर से ही कहने लगते थे कलाकार लोग आ गए। इस तरह से लेखकों में हीन- भावना या हम क्या हैं, हमारा क्या वैल्यू है आदि भाव उभरने लगा। इसमें जो चतुर लोग थे, जो पार्टी लाइन आई, उसी को छन्दबद्ध किया या उसी के आधार पर कहानी लिख दी। इस तरह के कई लोग थे। पहाड़ी भी थे। पहाड़ी से मैंने कहा कि हर लाइन पहले सेल में आती थी, डिस्कस होती थी। सेल की रिपोर्ट सेन्टर में जाती थी और अंतिम विश्लेषण-बहस के बाद ही कोई लाइन तय की जाती थी। लेकिन इस मर्तबा ऊपर से आई है। पहाड़ी ने कहा यह तो ऊपर से आदेश है, मानना तो पड़ेगा ही। लेकिन इस तरह के आदेशों से मैं सहमत नहीं था। कहा भी कि ऐसी लाइन मैं स्वीकार करूंगा जिसे मेरी बुद्धि  स्वीकारे तथा जिसके डिस्कशन का एक अंग मैं होऊँ। तभी मैं मानूंगा। यहां से मैं अलग होता हूं। मेरा लेखन 24-25 से शुरू हो जाता है। पार्टी में तो बाद में आया। उसी समय से मैं कांशस था कि मुझे कवि बनना है। बहुत-बहुत कांशस था। मैं बहुत से लेखकांे-कवियों को शिल्प और लेखन की दृष्टि से पढ़ता था। मेरे शुरू के संस्कार पहले गांधीवादी, फिर नेहरूवादी, उसके बाद जोशीवादी थे। इन तमाम स्थितियों से गुजरने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंच गया था कि ये पार्टियां लेखक की समस्या को नहीं समझ सकती। इनका पहला उद्देश्य होगा कि अपनी पार्टी लाइन, जो हमेशा बदलती रहती है, पर लेखकों से काम लें। कला और संस्कृति की समस्याएं क्या हैं? उनकी जरूरतें क्या हैं? कैसे वे रची जाती हैं? कैसे उनका उद्भव होता है? क्या उनमें तत्व है, जो उन्हें प्रेरित करते हैं? क्या है जो उन में विघटन लाते है? इत्यादि चीजों के बारे में पार्टी की कोई समझ नहीं है। मैं दृढ़ता से इस नतीजे पर पहुंच गया था।

 

तो इसकी वजह क्या कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक नीति में रही है?

शमशेर: पार्टी मे कोई नहीं था सिवाय पीसी जोशी के। वे चित्रकार को भी, कहानीकार को भी, कवि को भी, हिंदी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती, मराठी, पंजाबी सभी भाषाओं के लेखकों को प्रभावित कर रहे थे। सबसे काम लिया। मुझ तक से, जिससे दूसरा कोई काम ले नहीं सकता था। उनके साथ मैं मुश्किल काम को भी करने के लिए तत्पर हो जाता था जबकि अन्य किसी के आदेश से मैं तत्पर हो नहीं सकता था। रणदिवे की लाइन के बाद पीसी जोशी तक को भूमिगत रहना पड़ा। यह लाइन ही ऐसी थी कि लोग जोशी के जान के ग्राहक बन गये। इस हालत में पूरी पार्टी बिखर गई। जितने रंगकर्मी थे, उनमें कुछ ग्वालियर चले गए। कुछ कोलकाता और नागपुर चले गए। यह 48 से 52 तक की बात है और इन दिनों मैं पार्टी से तटस्थ-सा हो गया था। फिर भी मेरा माक्र्सवाद के प्रति लगाव रहा। पार्टी के लिए भी मन में कोई दुर्भावना नहीं थी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि ये माक्र्सवादी पार्टियां ही आगे कुछ कर दिखाएंगी। इसके बाद 56 में जब स्टालिन का पतन हुआ, तो उसके बाद विश्वव्यापी बिखराव आया। नेरुदा से लेकर बहुत से लेखक तटस्थ हुए। हमारे यहां भैरव प्रसाद गुप्त, चंद्रबली सिंह आदि रणदिवे वाली लाइन पर रहे लेकिन मैं एक क्रिएटिव राइटर के रूप में समझ गया था कि ये पार्टियां अपना राजनीतिक काम करें तो करें, यह तो नतीजों से मालूम होगा। उन्हीं दिनों इंग्लैंड से रजनीपाम दत्त आए थे। उन्होंने कहा कि आपलोग बाल से खाल निकालते हैं। एक डॉक्यूमेंट के जवाब में दूसरा डॉक्यूमेंट। कोई दिल्ली से आ रहा है। कोई केरल से आ रहा है। आप मिल कर के जो प्रैक्टिकल काम है, उनकी तरफ ध्यान क्यों नहीं देते। आपलोग पॉलिमिक्स में खो गए हैं। उनकी बातें मुझे जबरदस्त तथा दो टूक लगी। आज भी मैं समझता हूं कि पार्टियां बुनियादी काम ना करके पॉलमिकल कामों में लगी हैं तथा आम आदमी का जो सच्चा हित है वह देखने में नहीं आ रहा है कि कैसे पूरा होगा।

 

शमशेर जी, तो इसका अर्थ यह कि आजादी के बाद प्रगतिशील आंदोलन के बिखराव के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की नीति ही मुख्य तौर पर जिम्मेदार रही है?

शमशेर: मैं इसको इन शब्दों में नहीं रखूंगा कि कम्युनिस्ट पार्टी की नीति बिखराव के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। कुल मिलाकर इस तरह की बात आती है जरूर।

 

हमारे कहने का मतलब है कि पहले जैसे पीसी जोशी ने तमाम लेखकों-कलाकारों को एकजुट करके रखा था, जैसा कि आपने पहले बताया, लेकिन बाद में रणदिवे की लाइन के आने के बाद वाद-विवाद काफी तेज हो गया। लोग एक दूसरे के विरुद्ध खड़े दिखाई दिए।ं इस तरह हमारा साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन जो था, वह बिखरने लगा। तो क्या इसके लिए कम्युनिस्ट पार्टी की नीति ही मुख्य रूप से जिम्मेदार नहीं रही है? क्या आप नहीं मानते कि सबसे खतरनाक रोल पीसी जोशी ने अदा किया?

शमशेर: पार्टी के बहुत से थिंकर्स हैं, वे यही एंगल रखते हैं। जैसा आप लोग कह रहे हैं कि सबसे खतरनाक लाइन पीसी जोशी की थी।  वे पीसी जोशी के बारे में कहते हैं कि उनकी लाइन सुधारवादी, संशोधनवादी, समझौतावादी आदि रही है। माक्र्सवाद के कुछ अपने क्लासिक्स हैं, उसके टेक्स्ट हैं। सभी उनका अध्ययन करते हैं तथा उदाहरण देते हैं। हमारे यहां ही नहीं, यह तू तू मैं मैंरूस और चीन के बीच भी है। यूरोप की पार्टियों के बीच होती है। वहां भी पार्टियां समझौतापरस्त हैं। कभी सोशलिस्ट पार्टी से समझौता करते है।ं फ्रांस में देखिए। हमारे यहां भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। बुर्जुआ पार्टी विशेष तौर से कांग्रेस से कभी मिल कर चलते है,ं कभी हट कर चलते है।ं लेकिन जो आम कार्यकर्ता हैं जिनके पास  पैसा नही कि वह क्लासिक खरीदे। उनके पास समय भी नहीं कि वह अध्ययन करे। वह ऐसी स्थितियों में कंफ्यूज होता है और आज जितना यह गहरा हो गया है या होता चला जा रहा है, मैं नहीं समझता कि पहले कभी था।

 

47-48 तक प्रगतिशील आंदोलन हिंदी साहित्य की मुख्य धारा रही है। उसके बाद हम देखते हैं कि यह धारा मद्धिम पड़ जाती है। लेकिन 67 के बाद न सिर्फ देश के भीतर जनता के संघर्ष में तेजी आई बल्कि साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी जनवादी सहित्य, जन संस्कृति, नवजनवादी साहित्य-संस्कृति के नाम से  नई प्रगतिशील धारा दिखाई देती है। हम जानना चाहेंगे कि प्रगतिशीलता की यह नई धारा किन अर्थों में पुरानी धारा से भिन्न है तथा इसकी संभावना क्या है?

शमशेर: यह तो हम आपसे जानना चाहेंगे। आजकल के साहित्य को आंखों की वजह से कम पढ़़ने लगा हूं।

 

आज के साहित्य को आप पढ़ते तो रहे ही हैं। आपकी रुचि भी रही है और आप ने लगातार संवाद की कोशिश भी की है। इस साहित्य में विशेष तौर से इधर लिखी जा रही कविताओं में आपको क्या खामियां नजर आती हैं अर्थात इनके क्या सकारात्मक पहलू हैं तथा इनकी कमजोरियां क्या हैं?

शमशेर: आप लोगों के संस्कारों से मेरे संस्कार बिल्कुल भिन्न है। अपने संस्कारों की वजह से मैं ज्यादा सहानुभूति नहीं उभार पाता या कहिए मेरी दृष्टि इन कविताओं के प्रति कुछ कठोर ज्यादा है। विषय-वस्तु के हिसाब से तो ठीक है। आप मानेंगे कि अधिकांश लेखक मध्यवर्ग-निम्न मध्य वर्ग के हैं। सर्वहारा वर्ग के लेखक तो सीधे तौर पर हैं नहीं। शायद इक्का-दुक्का हों। इधर के कुछ कवियों की रचनाएं बेहतर तो हुई हैं। उनमें एक स्पष्ट स्तर आया है, हम कह सकते है।ं लेकिन हम पिछले 20 साल को देखें या अकविता के बाद से देखें तो मुख्य तौर से कविता में धूमिल और गजल में दुष्यंत कुमार आते हैं और कोई चमकता हुआ बड़ा नाम नहीं आता है। एक साथ कई नाम आते है।ं गोरख पांडे की रचनाएं अलग कोटि में आती हैं। विशेष तौर से लोकगीतों के अंदाज में लिखे उनके 5-7 भोजपुरी गीतों को हम ले सकते हैं। इसी तरह के कुछ गीत रमेश रंजक के हैं। रमेश रंजक के गीतों के साथ यह है कि गीतों को वही सुनाएं। सुनने से जो प्रभाव होता है, वह पुस्तक में पढ़ने से नहीं होता।

 

आज की कविताओं की कमजोरियों क्या हैं? इस पर भी कुछ अपनी बात रखें।

शमशेर: एक चीज है कविता का प्रभाव, उसकी प्रभावकारिता, उसका जोर और दम। जैसा कि धूमिल की कविताओं में है। मुक्तिबोध की कविताओं में है, जटिल होते हुए भी। जो बात कविता कहना चाहती है, उसका जोर आप महसूस करते हैं। कविता में अगर प्रभाव और जोर महसूस नहीं करते, तो उसमें और कहानी में कोई अंतर नहीं है। हमारे जीवन का संघर्ष कहानियों में भी कम प्रभावकारी ढंग से नहीं आता है। ऐसा ही प्रभाव आप मुक्त छंद की कविता में रख देते हैं - एक या डेढ़ पेज की कविता में। अपनी प्रभावकारिता में इसे होड़ लेनी पड़ती है कहानी या उसके टुकड़ों से। बहुत सी ऐसी कहानी आई है जो कवित्वमयता या काव्य की जो प्रभावकारिता है, उसका लाभ लेकर चलती है। मेरी राय में कविता मात्र वही नहीं है कि आपने कहीं का प्रभाव लिया है और उसे व्यक्त कर दिया है। मेरे ख्याल में आप कविता न लिखकर हो सकता है कहानी लिखते। कहानी लिखने के लिए समय या अवकाश अधिक चाहिए। कहानी में  दूसरे तरह से जुटना पड़ेगा जबकि कविता में थोड़े में अपनी बात रख देते हैं। कविता मैं उसे मानूंगा जो पढ़ने के बाद आप की स्मृति में, मन में उसके शब्द या दृश्य उमड़े-घुमड़े, गूंजे। ऐसी कोशिश करना कि यह बात कविता में पैदा हो जाए, पिछले 20-25 वर्षों में करीब बंद सा हो गया है। पहले कवि ऐसी कोशिश करते थे कि उनकी रचना सुनी जाए तो श्रोताओं के दिलों में वह घूमड़े। उसकी अनुगूंज लेकर वह जाए। एक उदाहरण मैं दू। एक बार मालवीय जी चंदा लेने लखनऊ गए थे। सन 20 की बात होगी। वहां लखनऊ के कवि चकबस्त ने उनका स्वागत किया। चंदा की विषय-वस्तु को लेकर चकबस्त ने एक नज्म पढ़ी जिसमें यह कहा गया था फकीर कौम के आये हैं, झोलियां भर दो।यह मिसरा इक्का -टांगे वालों तक में फैल गया। कविता में जिस विषय वस्तु को लेकर चलते हैं, हम चाहते हैं कि वह जनता में फैले, हृदयंगम हो।

 

वह क्या चीज होती है, जो रचना को रचना बनाती है?

शमशेर: इसका उत्तर अलग-अलग कवि अलग-अलग ढंग से देंगे। मेरा जो अनुभव या अनुभूति है, उसी हिसाब से मैं इसका जवाब दे सकता हूं। मैं कहूंगा निराला और मुक्तिबोध के बाद वह चीज छूट गई। मुक्तिबोध उस चीज को लाए, बड़े कष्ट से, संघर्ष से, उद्यम से......एक हद वे तक ले आये। लेकिन वे कम उम्र में चले गए जबकि वे ठीक अपनी रौ में आए थे। उन्होंने काफी संघर्ष किया और उसी संघर्ष में उनकी शक्तियां क्षीण हो गईं। आगे जी पाना उनके लिए संभव नहीं था। मुक्तिबोध ने काम के लिए अपनी शक्तियों को संयोजित करने, उसे जुटाने की कोशिश नहीं की। बीड़ी और चाय चल रही है तो हफ्तों यही चलती रही। अंदर के शरीर को जर्जर करने के लिए यह काफी था। गरीब से गरीब आदमी भी बीड़ी व चाय ना पीकर चीनी सैनिकों की तरह से सिर्फ सूखे चने और पानी ही खाए पिए तो शरीर अंदर से इतना जर्जर नहीं होगा। मेरे कहने का मतलब यह है कि एक सजग कवि जो अपनी सब शक्तियों से काम लेना चाहता है, वह शक्तियों को तैयार करता है कि वह उसके काम में योग दे।



 

 

 

Wednesday, 25 August 2021

कविता में राजनीति


कविता को ले कर इधर जो सबसे बड़ी धारणा बना दी गई है कि वह राजनैतिक नहीं होनी चाहिये और यदि उसमें राजनीति हो तो भी इतनी सूक्ष्म होनी चाहिये कि उस पर राजनैतिक होने का लेबल न लग सके किन्तु यह धारणा मूलत: ही कविता के स्वभाव के प्रतिकूल है क्योंकि कविता कोई परस्पर खुसर-फुसर का वार्तालाप नहीं है बल्कि जन साधारण से सीधे-सीधे जुड़ते हुये वर्ग चेतना का औज़ार पहले है और यदि मध्दम सुर में प्रेम या करुणा गीत ही गाने हैं तो मैं बिल्कुल ग़लत हूँ लेकिन ऐसे कवि हर तरह की सत्ता हितैषी राजनीति में स्वयं को साधने के लिये ही स्पष्ट प्रतिरोध के ऊँचे सुर में बोलने से कतराते हैं और उनका मुख्य उद्देश्य अपने ही जैसे आलोचकों की कृपादृष्टि प्राप्त कर स्वयं को मुख्यधारा में बनाये रखना होता है जबकि स्पष्ट प्रतिरोध की लाउड कविता सदैव यह जोखिम उठाने के लिये तैयार होती है और इसीलिये मैं कहना चाहता हूँ कि अब कविता द्वारा अपने पुराने औज़ारों को परे हटा कर सीधे-सीधे मनुष्यविरोधी ताक़तों को चुनौती देने की लाउडनैस अपने भीतर पैदा करनी होगी अन्यथा कविता के सम्प्रेषण की समस्या सदैव बनी रहेगी और यदि इस संक्रमण काल में कविगण नहीं चेते तो इसके उपरांत पछतावे के अलावा कुछ भी शेष नहीं बचेगा |

         यह तो सामान्य-सी समझ की बात है कि अच्छे और सुन्दर दृश्य हमें आकर्षित करते हैं लेकिन यदि उस अच्छाई और सुन्दरता को नष्ट करने वाली बुरी ताक़तों की अनदेखी करते हुये हम निरपेक्ष बने रहें तो यह हमारी मनुष्यता पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिये पर्याप्त है जबकि हम मनुष्यता के नाम पर स्वयं को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ और बुध्दिमान मानते हैं तो एक बुध्दिजीवी मनुष्य होने के नाते बुरी ताक़तों का प्रतिरोध करने की जिम्मेदारी हमें अनिवार्य रूप से निभानी चाहिये लेकिन भय,स्वार्थ और लोभ लिप्सा में सने हुये हम पता नहीं कैसे भूल जाते हैं कि आदिकवि वाल्मीकि ने उस प्रेम-मग्न क्रौंच मिथुन का वध करने वाले आखेटक को शापित करते हुये ही रामायण की शुरूआत की थी कि "अरे निष्ठुर वधिक तुमने इस प्रेमरत युगल को अपने तीर का शिकार बना कर हत्या करने का जघन्य पाप किया है, तुझे समाज में कदापि प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी" तो क्रूर हत्यारों को कोसने योग्य राजनीति कवि के लिये अत्यावश्यक हो जाती है और ऐसे समय में तो लगभग अनिवार्य ही हो जाती है जब सत्ता के शीर्ष पर विराजमान आखेटक सौमनस्यता पूर्वक रहते समाज में अपनी कुटिलतापूर्ण चालाकियों द्वारा विभाजन फैलाने में लगे हों और देश-समाज को मृत्यु के मुख में डाल देने पर आमादा हों तो कविता को आज की भाषा में चीख कर जन-सामान्य की तरफ़ से बोलना चाहिये कि "अरे कुटिल-क्रूर सत्ताधारियों तुम्हें भविष्य के लोक-जगत में तनिक भी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं होगी क्योंकि तुमने समूचे देश-समाज के पारस्परिक सौहार्द्र को विषाक्त बना कर विभाजित करने का कालिमायुक्त पापकर्म किया है |"

           कविता के बारे में बात करते हुये हमें यह तनिक भी नहीं भूलना चाहिये कि अपने व्यापक प्रयोजन के रूप में कविता शोषित जन की पक्षधर होनी चाहिये तथा शोषण पर आधारित सत्ता-व्यवस्था का प्रतिरोध करने का साहस उसमें सदैव बना रहना चाहिये लेकिन यदि कविगण फूल- तितली,चाँद-तारे और प्रेम-मुहब्बत की बातों में ही उलझे रहेंगे तो निश्चित तौर पर ऐसी कविता जन-सामान्य की कविता तो नहीं मानी जा सकती और यदि ऐसी कविता को आलोचकीय मान्यता भी मिलने लगे तो हमें समझना चाहिये कि कहीं न कहीं हमारे समय की कविता जनता से कटती जा रही है और वह मूलत: जन-अपेक्षाओं को विस्मृति के गर्त में डाल कर अपने मूल प्रयोजन से  भटकने लगी है और किसी न किसी रूप में ऐसी कविता उस जन-विरोधी शोषण पर आधारित सत्ता-व्यवस्था के साथ मिल कर लाभान्वित होती-सी भी प्रतीत होती है जबकि शोषित जन की आवाज़ बन कर प्रतिरोध की राजनीति करना हरेक समय की कविता का प्राथमिक उत्तरदायित्व होना चाहिये और केवल भौतिक सौन्दर्य और मोहक प्रेम तक ही सीमित न रह कर कविता को स्पष्ट रूप से सत्ता के शाश्वत विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करना चाहिये क्योंकि अपने राजनैतिक स्वरूप में कविता का मूल स्वभाव ही सत्ता के विषमतापूर्ण और अन्यायी चरित्र का प्रतिरोध करना होता है अन्यथा वह अपने समय की कसौटी पर तनिक भी खरी नहीं उतर सकती है |

           कविता की रचना-प्रक्रिया में जो कवि अपने समय से निरपेक्ष बने रह कर लिखने की कोशिश करता है उसकी संवेदनशीलता असंदिग्ध नहीं मानी जा सकती क्योंकि अपने समय और समाज की सच्चाई का प्रतिबिम्बन कवि को पूरे यथार्थ रूप में स्पष्टता के साथ उजागर करना चाहिये और विशेषकर ऐसे समय में जबकि शासकों द्वारा जानबूझ कर श्रमजीवी वर्ग के साथ विषमता और अन्याय का व्यवहार किया जा रहा हो तो कवि द्वारा अपने बुध्दिजीवी होने का कर्त्तव्य यथेष्ठ रूप में निर्वहन करने के लिये श्रम के महत्त्व को स्थापित करने के प्रयत्न में शोषक वर्ग के षड़यंत्रों की पहचान करते हुये अपनी रचनात्मकता में शामिल करना बहुत जरूरी हो जाता है अन्यथा वह अपने कर्म के प्रति विश्वासघात के रूप में जाना जायेगा और अपने कर्म के प्रति यह विश्वासघात किसी भी कवि के लिये कलंक के समान है यदि वह शोषित-वंचित वर्ग के साथ न्याय प्राप्ति के संघर्ष में शामिल नहीं होता और शोषक सत्ता के विरुद्ध अपनी कविताओं के माध्यम से शोषित वर्ग को जाग्रत करने की स्पष्ट राजनीति नहीं करता और अपने समय और समाज का यथार्थ रूप जन सामान्य के समक्ष प्रकट नहीं करता तो ऐसी तटस्थता क़तई श्रेयस्कर नहीं है |

           मेरे लिये यह समझ सकना बहुत कठिन है कि कोई भी कवि अपनी कविताओं में उम्र भर केवल घर-परिवार,नदी-समुद्र,फूल-तितली या प्रेम-मुहब्बत ही लिख कर कैसे स्वयं के कवि-कर्म को सार्थक कह सकता है जबकि उसके चारों तरफ़ विषमता और अन्याय का विषाक्त वातावरण बना हुआ हो और सक्रिय श्रमरत सामान्य जन निष्क्रिय,सुविधाजीवीऔर आलसी किन्तु व्यापारिक बुध्दियुक्त छल-छद्म में पारंगत अथवा शारीरिक ताक़त में बलिष्ठ या कि राजनैतिक रूप से सत्ता प्राप्त लोगों द्वारा पग-पग पर प्रतिक्षण सताये जा रहे हों और सम्पत्ति के साधनों पर अपना कब्ज़ा जमाये हुये वास्तविक हक़दारों को अपने हक़ से बेदख़ल करते जा रहे हों तथा उन विवेकशील लोगों की लगातार उपेक्षा करते जा रहे हों जिनके पास सच कहने का थोड़ा-सा साहस सुरक्षित है तो ऐसे संक्रमण-काल में जिस कवि की कविता तनिक भी ऐसे ख़तरनाक हालात के प्रतिरोध में आने की बज़ाय अभिजातीय सौन्दर्य प्रतिमानों में स्वयं के सुविधाजीवी सुख के लिये ही प्रयत्नशील बनी रहें ऐसी कविताओं को चाहे कितना भी मान-पुरस्कार मिलते रहें लेकिन यदि वे जन-पक्षधरता के अपने मूलभूत दायित्व और कर्तव्य से बचते हुये लिखी जाती हैं तो उनकी रचनात्मकता सदैव संदिग्ध बनी रहती है |

          राजनैतिक रूप से सजग बने रहते हुये कवि द्वारा अपनी कविता में यदि अँधास्था,रूढ़िवाद,नस्लवाद,सत्ता के केन्द्रीयकरण और साम्प्रदायिकता आदि मनुष्यता विरोधी शक्तियों का खुल कर विरोध नहीं किया जाये तो वास्तव में वह अपने कवि-कर्म के साथ न्याय नहीं कर रहा होता है क्योंकि ये मनुष्यता विरोधी शक्तियाँ मूल रूप से जन सामान्य और श्रमिक वर्ग की प्रछन्न शोषक होती हैं तथा सत्ता और श्रेष्ठि वर्ग के साथ मिल कर पुरस्कार और सम्मान की कुटिल योजनाओं द्वारा कवि को भी अपने पक्ष में बनाने का छल रचती रहती हैं और प्राय: कवि गण भी पुरस्कार-सम्मान की लालसा और सत्ता एवं श्रेष्ठि वर्ग से सामीप्य बनाने की लिप्सा में प्रकारान्तर से मूलभूत वर्ग-संघर्ष का मार्ग छोड़ कर वर्ण-संघर्षदेवतावादजातिगत आस्था और नस्लवाद के नाम पर उभरते छद्म राष्ट्रवाद की कवितायें रचते हुये स्वयं को धन्य समझते हैं और  दरबारी कवि बन जाते हैं जबकि प्राय: उन्हें संभवतया पता ही नहीं रहता कि अध्यात्म के नाम पर वे धर्मांधता कोराष्ट्रवाद के नाम पर नस्लवाद कोकई बार परम्परा के नाम पर रूढ़िवाद को और देवतावाद के नाम पर अँधास्था को ही शक्तिशाली बनाते रहते हैं और कविता रचना के रूप में मनुष्यता के विरोधी बनते हुये यह भूलते जाते हैं कि कविता के द्वारा मनुष्यता को जड़ बंधनों से मुक्त करना उनका प्राथमिक दायित्व है जिसके सुमार्ग से वे भटकते जा रहे हैं |

                                                                 -          कैलाश मनहर

Saturday, 21 August 2021

अशोक सिंह की कविताएँ



इस एक देश में कितने देश हैं भाई!

 

गाँव से शहर आये पिता

पाँव में टूटी चप्पल

कांधे पर गमछा

काँख तर छाता दबाये,

 

आये एक राज्य से चलकर दूसरे राज्य

चने के सत्तू के साथ बाँधकर अपना दुख

कुर्ते की जेब में डालकर कुछ सपने

 

सारा जीवन यहीं बिताया 

यहीं बहाया पसीना

बसाया यहीं अपना घर-परिवार

 

यहाँ रहते सबके साथ

हमेशा बँटाया मिलकर हाथ

 

पर्व-त्योहार हो

या शादी-ब्याह

या फिर मरनी-हरनी

यहीं मिल-बैठ सबके साथ

बाँटा अपना सुख-दुख

 

जो लिया यहीं से लिया

और यहीं दे दिया अपना सबकुछ जाते-जाते

 

अपने कांधे के गमछे

और काँख तर दबाये छाता पर

बार-बार उठे सवालों से आहत

मन की पीड़ा को लेकर

नहीं की कभी किसी से कोई शिकायत

 

अब मैं भी किस-किस को बताता फिरूँ यहाँ

कि मैं भी जन्मा यहीं, इसी मिट्टी में

यहीं की आबोहवा में खेला-कूदा, पला-बढ़ा

 

बोला यहीं की बोली-वाणी

यहीं की भाषा में गाया

प्रेम और विद्रोह के गीत

 

यहीं के जंगल-पहाड़ों से रहा लगाव

यहीं की नदियों में धोया कई बार

अपना दुखी और उदास चेहरा

 

यहीं की कंटीली झाड़ियों में उगे

जंगली-फूलों से किया प्रेम जीवन भर

दिल पर लगी खरोंच

बिना किसी को दिखाये

 

यहीं के मुद्दे पर

यहीं के लोगों के साथ मिलकर

 

लड़ा-भिड़ा अक्सर

सत्ता और व्यवस्था से

 

बावजूद हर जगह

दुत्कारा गया, फटकारा गया

धकियाया गया बार-बार

बाहरी-भीतरी के नाम पर

 

कभी नाम तो कभी सरनेम को लेकर

उठाया गया सवाल मुझपर

टेड़ी नजरों से देखा गया मुझे हिकारत से

 

अपने ही घर में रहने के लिए

माँगा गया बार-बार पहचान-पत्र

 

इस एक देश में कितने देश हैं भाई!

 

कौन सा देश है मेरा अपना

जहाँ चला जाऊँ अपना चेहरा उठाये ?

 

कहाँ भाग जाऊँ यहाँ से

गमछा में अपना सबकुछ समेटकर ?

 

कहाँ किस जेब में छुपा लूँ!

अपना असली चेहरा!

बदल लूँ कौन सा भेष

किधर जाऊँ, किधर है मेरा देश

 

ऐसे देश

ऐसे लोक में रहने से तो अच्छा है

परलोक चला जाऊँ!!

 

 

सब कुछ देख सुनकर

 

चुप रहा

   तो बेवकूफ समझा गया

 

झूठ बोलता रहा

   तो सच समझकर सुनते रहे लोग

 

हिम्मत से सच कहा

    तो विद्रोहियों की लिस्ट में दर्ज हो गया नाम

 

सुबह-सुबह अखबार में पढ़ा

      अब मेरे ऊपर देशद्रोह का मुकदमा चलेगा।

 

 

यह जो मेरे तुम्हारे बीच फासला है

 

मैं अक्सर दौड़ा-दौड़ा जाता हूँ

तुम्हारे पास

तुम भी दौड़े-दौड़े आती हो पास मेरे

 

हम दोनों होते हैं बहुत करीब

एक दूसरे के 

पर मिल नहीं पाते कभी

 

सिर्फ हमारे दुख मिलते हैं आपस में गले लिपटकर

 

एक फासला रह ही जाता है

हर बार मेरे तुम्हारे बीच

 

आ ही जाते हैं

लेकिन किन्तु-परन्तु जैसे शब्द बीच में

और फिर उसके बाद एक गहरी चुप्पी......!

 

हम लौट आते हैं वापस

थके कदमों से भारी मन लिये

अपनी-अपनी दुनिया में

 

तुम्हारे भीतर की एक स्त्री

अक्सर तुमसे निकलकर

सबसे नजरें बचा

रात के अंधेरे में भटकती गाती है

विरह का कोई आदिम राग....

 

मेरे भीतर बैठा एक पुरूष भी

मुझसे निकलकर भटकता है अक्सर

शहर की सुनसान सड़कों गलियों में

ढूंढ़ता है कई-कई चेहरों के बीच तुम्हारा चेहरा

 

सबसे छुप-छुपाकर

रात-रात भर करवट बदलती तुम

बिस्तर की सिलवटों में ढू़ंढ़ती हो मुझे

और मैं तुमको

 

इतनी बड़ी दुनिया में

भला कौन समझेगा मेरा तुम्हारा यह दुख!

 

यह जो लेकिन किन्तु परन्तु जैसे शब्द हैं

और उन शब्दों के बीच की छुटी जगहों में

जो फैली पसरी गहरी चुप्पियाँ हैं मेरे तुम्हारे बीच

उसी में कहीं गिरकर

कुछ खो-सा गया है मेरा तुम्हारा

जिसे ढूंढने बार-बार जाता है मन

और लौट आता है हर बार खाली हाथ !

 

 

इस मोड़ पर तुम्हारा मिलना

 

कितना अजीब है

कि जीवन के एक ऐसे मोड़ पर मिली तुम

जब रंगों और फूलों में दिलचस्पी खत्म हो चुकी है

जीवन से जा चुका है वसंत 

 

बहुत दूर निकल आया हूँ सफर में...

 

वह भी बिल्कुल खाली हाथ

जहाँ जेब में सिक्के नहीं, सिर्फ शब्द हैं

 

बंदिशें इतनी

कि तुम्हारा हाथ पकड़कर चलना भी चाहूँ

तो चल नहीं सकता मैं दो कदम भी साथ तुम्हारे

 

कितना अजीब है

जबकि परम्पराएँ पड़ चुकी हैं पीली कब की

और नैतिकता भी खो चुकी है अपनी नैतिकता

नैतिकता की बातें करने वाले लोग

दे रहे हैं सलाहें

मोह माया से दूर रहने की

 

और मोह इतना है जीवन से

कि अभी-अभी तुम्हें पास खड़ा देख

एक पेड़ की घनी छाँव में बैठा

महसूस कर रहा हूँ मैं खुद को

जहाँ बहुत पास से एक नदी

बह रही है कल-कल करती

कुछ कहती हुई.....

 

अफसोस!

कुछ और पहले मिली होती तुम

तो शायद कुछ और जी लेता मैं

गा लेता जिन्दगी का कुछ अगाया गीत

 

कितना अजीब है

कि मुट्ठी भर एकांत

और बित्ता भर भी खाली नहीं कहीं

पास बैठकर इत्मीनान से बोलने बतियाने को

जबकि बहुत सी खाली जगहें पड़ी हैं

इस पृथ्वी पर हत्यारों के लिए!

 

 

दुख में तुम्हारी हँसी

 

जब-जब मेरी फटेहाली

फटे जूते में ढुकी कील-सी

पाँव में चुभती है

 

तब-तब

मोतियों से चमकते

तुम्हारे दाँतों की दुधिया-हँसी

मुझे अंधेरे में

आगे का रास्ता दिखाती है।

 

 

पिता

 

गाँव की उन पगडंडियों की तरह होते हैं

जो हमें

शहर की ओर जाने वाली

मुख्य सड़क तक पहुँचाकर

गुम हो जाते हैं वापस खेत-पथार में

 

सड़क किनारे

खेतों की मेढ़ पर खड़े

हाथ हिलाते

उस पेड़ की तरह होते हैं पिता

जो शहर की ओर जाने वाली हर गाड़ी में

देखते हैं मेरा जाना

और आने वाली हरेक गाड़ी से

करते हैं प्रतीक्षा

मेरे लौटने की !

 

 

भारत बनाम इडिया

 

एक ऐसे समय में

जब देश की आबादी के

लगभग एक चौथाई लोग

विकास के नाम पर देश को

भारत को इंडिया बनाने पर तुले हैं

 

कैसे बताऊँ 

मैं रात-रात भर करवट बदलता

बिस्तर की सिलवटों से बने

इंडिया के मानचित्र में

भारत को ढूँढता हूँ

 

भारत और इंडिया के बीच

चल रही बहस में शामिल

इंडिया की वकालत करते लोगों

 

मै इक्कीसवीं सदी के इस दौर में भी

इंडिया नहीं

भारत का नागरिक बना रहना चाहता हूँ

 

तुम्हें तुम्हारा इंडिया मुबारक हो

मुझे अपने भारत में बने रहने दो !

 

 

बाज़ार से बचकर कहाँ भागूँगा !

 

बाज़ार कितना बड़ा है

पर कितना कम है मेरे लिए

 

कितनी कम हैं मेरी हैसियत की चीजें वहाँ

जबकि बाज़ार के विज्ञापनों से पटी हैं

मेरे घर की बाहरी-भीतरी दीवारें।

 

कितनी कम हैं....

जबकि टीवी पर समाचार सुनने के ठीक पहले

एक साबुन और टुथपेस्ट ख़रीदने का अनुरोध किया जाता है

 

भीतर से कितना डरा होता हूँ

जब धरता हूँ पैर किसी चकमक दुकान पर

 

षायद प्रतिष्ठा बचाने की मजबूरी में ही

यात्राओं में बोतल बंद पानी खरीद कर पीता हूँ

और दोस्तों के आग्रह पर भारी मन से

रेस्टोरेंट में बैठ गपियाते हुए

पाँच रूपये की चाय पचीस रूपये में पीता हूँ

 

और तो और

गहरी अनिच्छा के बावजूद

दोस्तों के सामने बैरे की तश्तरी में रख देता हूँ

दस बीस रूपए का टिप

 

अपने संस्कार के विरूद्ध जाकर

करना ही पड़ता है यह सब

मजबूरी में बँधे बाज़ार के नियम से बचकर

कहाँ भागूँगा।

 

 

आओ, हाथ में हाथ लें !

 

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं मेरे दोस्त !

जहाँ जीने की विवशता के अलावा

कोई चारा नहीं हैं हमारे पास

 

इन्हीं व्यवस्थाओं के बीच रहकर

हमें सुलझानी है अपनी तमाम उलझनें

 

हम लगातार छलते रहे हैं

पेट और दिल की अनसुलझी

गुत्थी सुलझाने में

 

हम जानते हैं कि कुछ भी बदल पाना तुरन्त

हमारे बूते का नहीं

फिर भी हम सक्रीय रहेंगे

लडेंगे अपने हिस्से की लड़ाई

और तमाम व्यर्थताओं के बीच

सिद्ध करेंगे अपने होने का अर्थ

 

हमारे भीतर लड़ने की जितनी ऊर्जा है

उससे कम, बहुत कम हैं हमारी समस्याएँ

 

आओ, हाथ में हाथ लें !

मिलकर लें संकल्प

कि आने वाली सदी

न झेले किसी महायुद्ध पीड़ा

 

सड़कों पर चलें हम बेखौफ

बाजार की भाषा में न बोलें

बचायें अपनी दिनचर्या में जीवन की गर्माहट

 

खुद को लायें माटी के थोड़ा और करीब

हम आयें आपके थोड़ा और पास

 

लड़ें अपने आपसे कम से कम इतना जरूर

कि लगे, कि हाँ हमने लड़ा है

 

हार न मानें कभी

कि उम्मीद हमारा आखिरी हथियार है !

 

  

मुझे ईश्वर नहीं, तुम्हारा कंधा चाहिए

 

पता नहीं ऐसा क्यों होता है अक्सर

जब-जब मैं दुखी और उदास होता हूँ

ईश्वर से ज्यादा तुम याद आती हो

 

मैं ईश्वर को मानता तो हूँ

पर उसे जानता नहीं

और न ही चाहता हूँ जानना भी

 

मुझे सिर झुकाने के लिए

ईश्वर नहीं

सिर टिकाने के लिए

कंधा चाहिए

और वो ईश्वर नहीं

तुम दे सकती हो !

 

 

मैं तुमसे इसलिए प्रेम नहीं करता

 

मैं तुमसे इसलिए

प्रेम नहीं करता कि

मैं तुम्हारे प्रेम में पड़कर

अंधा हो जाऊँगा

बल्कि इसलिए करता हूँ प्रेम

कि मैं तुम्हारी आँखों से

दुनिया देख सकूं !

 

मैं तुमसे इसलिए

प्रेम नहीं करता कि

तुम्हारे पीछे दौड़ते-भागते

बेकार निकम्मा अपाहिज हो जाऊँ

बल्कि इसलिए करता हूँ प्रेम

कि तुम्हारे कदमों से चलकर

अपनी मंजिल तक पहुँच सकूं

 

मैं तुमसे इसलिए

नहीं करता प्रेम

कि अपना सब कुछ लुटाकर

तुम्हारा सब कुछ हासिल कर सकूं

बल्कि इसलिए करता हूँ प्रेम

कि तुमने ही यह कहकर

पढ़ाया प्रेम का सच्चा पाठ

कि ‘‘प्राप्ति प्रेम की समाप्ति है‘‘

और सच कहूँ तो

मैं तुम्हें पाकर

तुम्हें खोना नहीं चाहता !

 


प्रेम

 

थककर चूर

शिथिल पड़ी काया के सिरहाने

तकिया बढ़ाते हाथ हैं प्रेम           

 

एक कंधा है

दुख के क्षणों में

लरजते हुए सिर टिकाने को

 

मेहनत और थकान से

माथे पर उभरी

पसीने की स्वेत बूंदों पर

शीतल अंगुलियों की छुअन है

 

स्याही-सोखता की तरह

पीड़ा और थकान सोखती

आँखें हैं प्रेम

 

प्रेम

रात के अंधेरे में

सूनसान सड़क पर खड़ा लेम्पपोस्ट है

 

एक छायादार पेड़ है प्रेम

दोपहर की चिलचिलाती धूप में

 

जाड़े की सर्द रातों की गर्म लिहाफ

सुबह की गुनगुनी धूप है प्रेम

 

और तो और

जिन्दगी की रूखी सुखी रोटी पर

चुटकी भर नमक है प्रेम।

 ________________

 

अशोक सिंह

जन्मतिथि: 8 फरवरी 1971 (दुमका, झारखण्ड)

शिक्षा: स्नातक (हिन्दी)

अभिरूचि: साहित्य, रंगमंच, शोध-अध्ययन, पत्रकारिता और सामाजिक कार्य।

प्रकाशन: देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से रचनाएँ प्रकाषित एवं आकाशवाणी व दूरदर्षन से प्रसारित। साथ ही दैनिक, साप्ताहिक, मासिक समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रिपोर्ट, फीचर एवं शोध आलेख प्रकाषित। विषेषकर आदिवासी मुद्दों और उसके जीवन एवं संस्कृति पर शोध कार्य। कविता संग्रह- कई-कई बार होता है प्रेमऔर असहमति में उठे हाथदो कविता संग्रह। साथ ही संताली कविताओं के अनुवाद की दो अनुदित पुस्तकें भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली से प्रकाषित ‘नगाड़े की तरह बजते हैं शब्दʼ एवं रमणिका फाउण्डेशन दिल्ली से प्रकाशित ‘अपने घर की तलाश मेंʼ   

  आदिवासी साहित्य एवं कला संस्कृति पर शोध कार्य - संताल आदिवासी जीवन एव संस्कृतिं से जुड़े विभिन्न क्रिया कलापों पर शोध कार्य इसके अलावे संताली एवं पहाड़िया लोक कथाओं का संकलन। आदिवासी लोक नृत्य, संताल परगना में लगने वाले मेले का सामाजिक सांस्कृतिक स्वरूप तथा विलुप्त आदिवासी कठपुतली लोक कला पर शोध कार्य। आदिवासी लोक नृत्य पर झारखण्ड सरकार के कला संस्कृति विभाग से ‘जंगल गाँव, थिरकते पाँवʼ नामक पुस्तिका का प्रकाषन।

पुरस्कार एवं सम्मान : साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों एवं सामाजिक कार्यों में उत्कृष्ट योगदान के लिए कई संस्थानों द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित। 

सम्प्रति: स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के तहत जिला साक्षरता समिति दुमका (झारखण्ड) में जिला कार्यक्रम प्रबंधक के पद पर कार्यरत एवं एक स्वयंसेवी संस्था का संचालन। साथ-साथ स्वतंत्र पत्रकारिता।

सम्पर्क: जनमत शोध संस्थान पुराना दुमका, केवटपाड़ा दुमका-814101 (झारखण्ड)

ईमेल: ashok.dumka@gmail.com

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