Friday, 26 April 2013

अपने अंतर में ढालो ...

मेरे अंतर को

अपने अंतर में ढालो
 
हे इतिवृत्तहीन अकल्मष !

मेरे अंतस के दोषों में 

श्रम प्रसूति स्पर्धा दो 

बनूँ में पूर्ण इकाई जीवन की 

गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण 

विश्वनुराक्त,

तम दूर करो इस मन का 

अंतर्पथ कंटकशून्य करो 

हरो विषाद दो आह्लाद 

मैं बलाक्रांत,भ्रांत,जड़मति 

विमुक्ति,नव्यता, ओज मिले
 
परिणीत करो मेरा तन मन 

मैं नितनत पदप्रणत

निःस्व तुम्हारी शरणागत ! 


(अनौपचारिका में प्रकाशित )



-राहुल देव 



अच्छी रचना दोषरहित हो यह आवश्यक नहीं - श्रीलाल शुक्ल

{ श्रीलाल शुक्ल जी से प्रख्यात कथाकार एवं साहित्यिक पत्रिका तद्भव के संपादक अखिलेश से हुई बातचीत। यह बातचीत ‘ तद्भव ’ के प्रवेशांक के मौक...