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Thursday, 26 May 2016

व्यंग्य सप्ताह : अंतिम दिन

2 व्यंग्य / शरद जोशी


शर्म तुमको मगर आती है

उनके चमचे ने मुझे धीरे-से बताया कि वे इस समय शर्मिंदा हैं, अगर कोई जरूरी काम हो तो ही आप मिलें ॰  बात यह है कि जब वे शर्मिंदा रहते हैं तब डिस्टर्ब होना पसंद नहीं करते ॰
            "किस बात पर शर्मिंदा हैं ?" मैंने पूछा ॰
            "पता नहीं आज किस बात पर हैं॰ कल तो छात्रों की अनुशासनहीनता पर थे ॰"
            "मैं मिलना चाहूँगा॰ मैं लेखक हूँ और मुझसे ऐसे वक्त चर्चा करना शायद वे पसंद करें ॰"
            "जरूर मिलिये ॰ जब वे शर्मिंदा होते हैं, अक्सर कवियों को याद करते हैं ॰ तीन -चार दिन हुए एक कवि आया था॰ जब तक रहा लज्जा से गड़ा रहा ॰"
            मैं मंत्री महोदय के कक्ष में घुस गया॰ वे सामने खादी के सोफ़े पर खादी के कपड़े पहने पैर समेटे बैठे थे॰ उनकी गर्दन और हाथ लटके हुए थे ॰ मुझे वे समूचे ही लटके हुए लगे ॰ मैंने उन्हे नमस्कार किया॰ कोई उत्तर नहीं मिला॰ उन्होने मुझे बैठने को नहीं कहा, मगर मैं बैठ गया ॰
            एक लंबी सरकारी किस्म की चुप्पी के बाद उन्होने नजरें उठायीं और मुझे घूरने लगे॰ वे मेरे तरफ ऐसे देख रहे थे, जैसे मैं उनके समीप पड़ा एक शव हूँ॰ काफी देर तक मृत बैठा उनकी घूरती नजरों को झेलना जब असंभव हो गया, तो मैंने करुण रस में सनी कमरे की चुप्पी तोड़ी और बोला, "सुना, आप शर्मिंदा हैं ?"
            "हूँ॰ वे बोले ॰
            "शर्मिंदा हों आपके दुश्मन, आप क्यों शर्मिंदा हों॰" मैंने कहा ॰
            "नहीं, मैं शर्मिंदा हूँ ॰"
            "आप किस बात पर शर्मिंदा हैं?" मैंने पूछा ॰
            वे चोंके॰ वे कुछ देर याद करते रहे कि वे किस बात पर शर्मिंदा हैं, मगर याद नहीं कर पाये॰ वे शायद पिछले एक-दो घंटों में लगातार शर्म से इतने गहरे डूब गए थे कि अपने शर्मिंदा होने की वजह ही भूल गए थे॰ मगर मंत्री हैं, इस तरह भूल जायेँ तो देश का काम कैसे चले॰ उन्होने डायरी निकाली और उसके पन्ने पलटने लगे॰
            "आज कौन-सी तारीख है? उन्होने पूछा ?"
            "नौ॰"
            "अक्तूबर चल रहा है ना॰ हाँ, अक्तूबर ही तो ! अभी तो गांधी जी का सब कुछ हुआ॰ "और डायरी देखकर बोले, "आज मैं औरंगाबाद पर शर्मिंदा हूँ॰ "फिर हैरानी से कहा, "आजकल याददास्त बहुत कमजोर हो रही है॰"
            "काम भी तो बहुत रहता है ॰"
            "हाँ, बहुत काम रहता है, मगर फिर भी वक्त निकालकर घंटा-दो घंटा शर्मिंदा रह ही लेता हूँ॰"
            "आप अहमदाबाद पर शर्मिंदा हुए या नहीं ?"
            "अरे , अहमदाबाद पर तो दो-तीन दिन रहा॰ पिछले दिनों तो कुछ ऐसा हुआ कि जब शर्मिंदा होने को कुछ नहीं मिला, तो अहमदाबाद पर हो लिया॰ मगर सवाल यह है कि एक ही विषय पर कब तक शर्मिंदा रहें॰ बोर हो जाता हूँ ॰"
            "सही बात है ॰"
            "क्या किया जा सकता है॰ हमारा देश इतना विशाल है, समस्याएँ इतनी अधिक हैं और हालत ऐसी हो गई है॰ कई बार तो दिन में दो-तीन मामले ऐसे हो जाते हैं कि नेताओं का काम बढ़ जाता है और उन्हें लंबे वक्त तक शर्म से झुके रहना पड़ता है॰"
            "मगर मैं कहता हूँ कि आप अपने विभाग की शर्म झेलिए । आप दूसरे मंत्री के विभागों की बातों पर क्यों शर्मिंदा होते हैं । केबिनेट में सबको अलग-अलग विभाग बंटे हुए हैं ।"
            "ठीक कह रहे हो ।"
            "जैसे रबान्त सम्मेलन में हमें भाग नहीं लेने दिया गया । यह शर्म की बात हुई । मगर साहब उसके लिए विदेश विभाग के मंत्री लज्जित हों, आप काहे अपना कीमती वक्त खराब करेंगे ?"
            "कह तुम ठीक रहे हो, मगर भाई हम आल इंडिया लीडर हैं - हमसे कुछ अपेक्षाएँ की जाती हैं, हमारे कुछ फर्ज हैं । सिर्फ अपने विभाग तक हम सीमित तो नहीं रह सकते ।"
            "इस तरह तो आप अपना स्वास्थ्य खराब कर लेंगे ।"
            "देश के लिए जीवन दे दिया है, तुम स्वास्थ्य की बात कर रहे हो!"
            "मैं आपसे सहमत नहीं। आपके पास दो-तीन विभाग हैं। आप वरिष्ठ नेता हैं। आपकी शर्मिंदगी की एक सीमा है, एक स्तर है । आप हर किसी मामले में शर्मिंदा नहीं हो सकते । जैसे आपके पास कृषि विभाग है और देश में पैदावार कम हो रही है। विदेशों से अनाज मांगना पड़ रहा है । आपको सिर्फ इस बात पर शर्मिंदा होना चाहिए।"
            "पहले तो तुम यह सुधार कर लो कि मेरे पास कृषि विभाग नहीं है । जब था तब भी मैं इस बात पर शर्मिंदा नहीं था कि हमें बाहर से अनाज मांगना पड़ता है । यह नीति का प्रश्न है, इसमें शर्म कैसी ।" वे गरजकर बोले । 
            उन्हे क्रोधित देख मैं नरम पड़ा। मगर मैंने सूत्र नहीं तोड़ा। मैंने कहा "श्रीमान, जहां तक मुझे ख्याल आता है, मैंने अनेक बड़े नेताओं को भाषाओं में यह वक्तव्य देते सुना है कि यह हमारे लिए शर्म की बात है कि देश को बाहर से अनाज मांगना पड़ रहा है ।"
            वे ज़ोर से खिलखिलाकर हँस पड़े । "देखो भाई, ऐसा है कि शर्म-शर्म में भी फर्क होता है। कुछ बातों को लेकर नेता लोग जनता को शर्मिंदा करने की कोशिश करते हैं, जैसे अनाज ज्यादा पैदा न करने की बात, अधिक पैदा करने की बात। कुछ जनता की बातों पर हम नेता लोग शर्म से सिर झुकाते हैं और कई बातें ऐसी होती हैं जिस पर जनता और नेता सभी शर्मिंदा रहते हैं।"
            "जैसे ?" मैंने पूछा।         
            "जैसे पूज्य बापू के बताए मार्ग पर देश का काम न चल पाया। इसे लेकर जनता हमें कहती है कि शर्म आनी चाहिए। हम जनता को कहते हैं कि तुम्हें शर्म आनी चाहिए। गरज यह है कि दोनों शर्मिंदा हैं। इस प्रकार सारा देश ही शर्मिंदा है। आखिर देश है क्या - जनता और नेता से मिलकर ही तो देश बना है।"
            "क्या बात है। आप बहुत बड़ी बात कह गए । वाह ! देश है क्या, नेता और जनता से मिलकर ही तो देश बना है। वाह।"
            "और जनता भी क्या।" वे बोले, "असल में तो नेता ही देश है । जब नेता शर्मिंदा होता है तो अपने आप सारे देश का माथा शर्म से झुक जाता है।"
            "मगर एक निवेदन है।"
            "कहिए ।"
            "प्रतिदिन के बजाय आप सप्ताह में एक दिन शर्म का निश्चित कर लीजिये। उस दिन आप पूरे समय राष्ट्रीय, प्रांतीय, स्थानीय और पार्टी के आपसी मामलों को लेकर जितना शर्मिंदा होना हो, हो लिया कीजिये। क्या ख्याल है ! यह रोज-रोज का सिर-दर्द।"
            "पहले मैं यही करता था। सिर्फ रविवार को शर्मिंदा होता था। उस दिन मिलने जुलने वाले काफी आते हैं। मैं बातें भी करता रहता था और बात-बात पर अफसोस भी जाहिर करता रहता था। लोग प्रभावित होते थे। वे कहते थे कि आप सचमुच अखिल भारतीय स्तर के लीडर हैं, क्योंकि आप सारे देश के सभी मामलों और घटनाओं पर अफसोस करते हैं, सारा दिन शर्म से झुके रहते हैं।"
            "इसमें क्या शक है !"
            "दूसरे नेता टुच्चे हैं, बेशर्म हैं।" वे क्रोध में बोले - "मैं जितना हर बात पर शर्मिंदा होता हूँ, उसके वे एक चौथाई भी नहीं होते ।"
            "उनकी आपसे क्या बराबरी। आप तो शर्म में डूब मरते हैं, जब कि वे चिंता भी नहीं करते। निहायत शर्म की बात है।"
            "तुम मानते हो!"
            "मानता हूँ ।" मैंने ज़ोर देकर कहा।
            "तुम्हारा कोई काम हो तो बताना, हम कर देंगे।" वे बोले.
            "फिलहाल कोई काम नहीं। मगर आप यह बताइये कि आपने सप्ताह में एक दिन शर्माना बंद क्यों कर दिया। "
            वे गंभीर हो गए। उन्होने छत की ओर देखा, गर्दन सहलायी और धीरे से कहा - "देखो, हमारा देश प्रगति कर रहा है। प्रगति करने के साथ समस्याएँ बढ़ रही हैं। अब वह समय नहीं रहा जब नेता मजे से सिर्फ सप्ताह में एक बार शर्म खाता था और बाकी दिन आराम से पड़ा रहता था। अब स्थितियां बदल रही हैं। जनता हमसे उम्मीद करती है कि हम ज्यादा-से-ज्यादा शर्म करें और हमें करनी पड़ रही है।
            "मगर कब तक, आखिर कब तक ? कब तक आप देश की हालत पर शर्मिंदा होते रहेंगे ? कुछ कीजिये, कदम उठाइए साहब। मुझे तो आपके स्वास्थ्य की चिंता हो रही है । कहीं आपको दिल का दौरा न पड़ जाए ।"
            "इस शरीर ने जीवन-भर दौरा किया है। सारा देश-विदेश घूमा है। एक दौरा दिल का भी सही।" वे बोले और सिर लटकाकर बैठ गए। "नहीं-नहीं, मैं यह नहीं होने दूँगा। आप कुछ कीजिये। पार्टी को एक कीजिये, समस्याओं के हल निकालिए, कड़े कदम उठाइए, कुछ कीजिये।"
            "मैं शर्मिंदा हूँ।"
            "सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा, कुछ कीजिये।"
            "मैं शर्मिंदा हूँ, और क्या करूँ।" वे झल्लाकर बोले-"मैं शर्मिंदा हूँ, देश में एकता नहीं, समस्याएँ हल नहीं हो रहीं, हम कड़े कदम नहीं उठा रहे, काम कर नहीं रहे, इसलिए मैं शर्मिंदा हूँ, और क्या को चिल्लाकर बोले थे। उनकी आवाज सुन उनका वही चमचा, जो मुझे दरवाजे पर मिला था, दौड़कर अंदर आया और मुझे सोफ़े से खींचने लगा -"उठिए आप, निकलिए यहाँ से। आप एक नेता को डिस्टर्ब कर रहे हैं। यह उनके शर्मिंदा होने का वक्त है। उन्हे शांति से शर्मिंदा होने दीजिये।"
            "आप कौन हैं ?"
            "मैं मंत्रीजी का चमचा हूँ।"
            "मैं डिस्टर्ब नहीं कर रहा।" मैं नेता की तरफ घूमा-"आय एम सौरी । मैं डिस्टर्ब नहीं करना चाहता। मैं शर्मिंदा हूँ।"
            "यह मुझे डिस्टर्ब नहीं कर रहे हैं, इन्हे बैठा रहने दो।" - उन्होने चमचे से कहा। चमचा मेरी ओर क्रोध से घूरता चला गया। कुछ देर चुप्पी रही। फिर वे बोले - "तुमको भी कभी शर्म आती है ?"
            "आती है। कई मामलों में मेरा सिर शर्म से झुक जाता है। जैसे हमारे निष्क्रिय नेताओं को देखकर, जिन्हें हमने चुना है।"
            "तुम ठीक करते हो। यह हमारा राष्ट्रीय गुण है, धर्म है। हर भारतवासी को शर्मिंदा होना चाहिए। अच्छी बात है।"
            उन्होने गर्दन लटका ली, सिमटे पैरों को और समेटा और धीरे-धीरे एक अच्छे नेता की तरह शर्म से सोफ़े में डूब गए।
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1968-69 के वे दिन 

(यह लेख सौ वर्ष बाद छपने के लिए है)

आज से सौ वर्ष पहले अर्थात 1969 के वर्ष में सामान्‍य व्‍यक्ति का जीवन इतना कठिन नहीं था जितना आज है। न ऐसी महँगाई थी और न रुपयों की इतनी किल्‍लत। सौ वर्ष पूर्व यानी लगभग 1968 से 1969 के काल की आर्थिक स्थिति संबंधी जो सामग्री आज उपलब्‍ध है उसके आधार पर जिन तथ्‍यों का पता चलता है वे सचमुच रोचक हैं। यह सच है कि आम आदमी का वेतन कम था और आय के साधन सीमित थे पर वह संतोष का जीवन बिताता था और कम रुपयों में उसकी जरूरतें पूरी हो जाती थीं।

जैसे एक रुपये में एक किलो गेहूँ या गेहूँ का आटा आ जाता था और पूरे क्विण्‍टल गेहूँ का दाम सौ रुपये से कुछ ही ज्‍यादा था। एक सौ बीस रुपये में अच्‍छा क्‍वालिटी गेहूँ बाज़ार में मिल जाता है। शरबती, कठिया, पिस्‍सी के अलावा भी कई तरह का गेहूँ बाज़ार में नज़र आता था। दालें रुपये में किलो भर मिल जाती थीं। घी दस-बारह से पंद्रह तक में किलो भर आ जाता था और तेल इससे भी सस्‍ता पड़ता था। आम आदमी डालडा खाकर संतोष करता था जिसके तैयार पैकबंद डिब्‍बे अधिक महँगे नहीं पड़ते थे। सिर्फ़ अनाज और तेल ही नहीं, हरी सब्जि़यों की भी बहुतायत थी। पाँच रुपया हाथ में लेकर गया व्‍यक्ति अपने परिवार के लिए दो टाइम की सब्‍ज़ी लेकर आ जाता था। आने-जाने के लिए तब सायकिल नामक वाहन का चलन था जो दो सौ-तीन सौ रुपयों में नयी मिल जाती थी। छह ह‍ज़ार में स्‍कूटर और सोलह से पच्‍चीस-तीस हज़ार में कारें मिल जाती थीं। पर ज्‍़यादातर लोग बसों से जाते-आते थे, जिस पर बीस-तीस पैसा से अधिक ख़र्च नहीं बैठता था। निश्चित ही आज की तुलना में तब का भारत सचमुच स्‍वर्ग था।

मकानों की बहुतायत नहीं थी पर कोशिश करने पर मध्‍यमवर्गीय व्‍यक्ति को मकान मिल जाता था। तब के मकान भी आज की तुलना में बड़े होते थे, यानी उनमें दो-तीन कमरों के अलावा कुछ खुली जमीन मिल जाती थी। छोटे शहरों में दस-पंद्रह रुपयों में चप्‍पल और पच्‍चीस-चालीस में चमड़े का जूता मिल जाता था जो कुछ बरसों तक चला जाता था। डेढ़ सौ से लेकर तीन-चार सौ तक एक पहनने लायक सूट बन जाता था-टेरीकॉट के सिले-सिलाये। कमीज़ सिर्फ़ पचास-खुद कपड़ा खरीदकर सिलवाने में बीस-पच्‍चीस में बन जाती थी। एक सामान्‍य-व्‍यक्ति अपने पास तीन-चार कमीज़ या बुश्‍शर्ट रखता था। लोगों को पतलून के अंदर लँगोट पहनने का शौक था, जो डेढ़-दो रुपये में मिल जाती थी।

औरतों का भी ख़र्च ज्‍यादा नहीं था। एक साड़ी तीस-पैंतीस से सौ-सवा सौ में पड़ जाती थी। हर औरत के पास ट्रंक भर साडि़याँ आम तौर पर रहती थीं जो वे बदल-बदलकर पहन लेती थीं। स्‍नो की डिबिया दो रुपये में, लि‍पस्टिक ढाई-तीन रुपये में और चूडि़याँ रुपये की छह आ जाती थीं। इसी कारण शादी करके स्‍त्री घर लाना महँगा नहीं माना जाता था। अक्‍सर लोग अपने विवाह तीस साल की उम्र में कर डालते थे। स्त्रियों का बहुत कम प्रतिशत नौकरी करता था। अधिकांश स्त्रियों का मुख्‍य धन्‍धा पत्‍नी बनना ही था। कुछ स्त्रियों के कुँवारी रहकर जीवन बिताने के भी प्रमाण मिलते हैं। पर विवाह का फैशन ही सर्वत्र प्रचलित था। यह कार्य अक्‍़सर माता-पिता करवाते थे, जो बच्‍चों को घरों में रखकर पालते थे।

1969 का भारत सच्‍चे अर्थों में सुखी भारत था। लोग दस-साढ़े दस बजे दफ़्तर जाकर पाँच बजे वापस लौटते थे, पर दफ़्तरों में एक कर्मचारी के पास दो घण्‍टे से अधिक का काम नहीं था। कैंटीन में चाय का कप बीस-तीस पैसों में मिल जाता था। एक ब्‍लेड बारह-पंद्रह पैसों में कम-से-कम मिल जाती थी। और अख़बार बीस पैसे में आ जाता था। जिन्‍हें शराब पीने की आदत नहीं थी वे दो रुपया जेब में रख सारा दिन मज़े से गुज़ार देते थे। सिगरेट की डिबिया में दस सिगरेटें होती हैं और पूरी डिबिया पचास-साठ पैसों में मिल जाती थी। पहले की सिगरेट भी आज की सिगरेटों की तुलना में काफ़ी लंबी होती थी। हाथ की बनी बीड़ियाँ आज की तरह नियामत नहीं थीं। दल-पंद्रह पैसे के बंडल में बीस बीड़ियाँ निकलती थीं। माचिस आठ-दस पैसे में आ जाती थी। जिनमें साठ-साठ तक तीलियाँ होती थीं। हालाँकि लायटर का रिवाज़ भी शुरू हो गया था था।

1968-69 की स्थिति का अध्‍ययन करने पर पता लगता है कि रेडियो सुनने और सिनेमा देख लेने के अलावा कला-संस्‍कृति पर लोग अधिक खर्च नहीं करते थे। हालाँकि अख़बार निकलते थे, पत्रिकाएँ छपती थीं पर उनकी बिक्री कम थी। माँगकर पढ़ने और सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों और नाटकों के फ्री पास प्राप्‍त करने का प्रयत्‍न चलता रहता था। उसमें सफलता भी मिलती थी। विद्वानों के भाषण फोकट में सुनने को मिल जाते थे। मुफ्त निमंत्रण बाँट निवेदन किये बग़ैर भीड़ जुटना कठिन होता था। लेखक सस्‍ते पड़ते थे। आठ-दस रोज़ मेहनत कर लिखी रचना पर तीस-पैंतीस से सौ-डेढ़ सौ तक मिल जाता था पर कविताएँ पच्‍चीस से ज्‍़यादा में उठ नहीं पाती थीं। बहुत-सी पत्रिकाएँ बिना लेखकों-कवियों को कुछ दिये ही काम चला लेती थीं। एक पत्रिका आठ-दस रुपये साल में एक बार देने पर बराबर आ जाती थी। अधिकांश पत्रिकाएँ लेखकों-कवियों को मुफ़्त प्रति दे रचनाएँ प्राप्‍त कर लेती थीं। सस्‍ते दिन थे। चार रुपये रीम काग़ज़ मिलता था और साठ पैसों में स्‍याही की बोतल मिल जाती थी। वक्‍़त काफ़ी था, लेखक लोग रचना माँगने पर दे देते थे।


निश्चित ही 2068-69 की तुलना में सौ वर्ष पूर्व के वे दिन बहुत अच्‍छे थे। देश में इफ़रात थी और चीज़ें सस्‍ती थीं। आज उस तुलना में भाव आसमान पर पहुँच गये हैं कि जीना मुश्किल है। कमाई में पूरा नहीं पड़ता बल्कि बहुत से लोगों के लिए दोनों टाइम का भोजन जुटाना भी कठिन है। मकान और फर्नीचर सभी महँगा है कि लोग कठिनाई से ख़रीद पाते हैं। उन दिनों में एक सोफ़ासेट ढाई सौ से सात सौ रुपयों में आ जाता था और साधारण निवाड़ का पलँग (तब निवाड़ के पलँग प्रचलित थे) तीस-चालीस से ज्‍़यादा नहीं पड़ता था। तीस रुपये में रज़ाई और साठ-सत्तर में बढ़िया कम्‍बल मिल जाते थे। कोई आश्‍चर्य नहीं अगर आज 2069 की तुलना में 1969 का आदमी काफ़ी सोता था और घण्‍टों रज़ाई में घुसे रहना सबसे बड़ी ऐयाशी थी। आज वे दिन नहीं रहे, न वैसे लोग। हमारे उन पुरखों ने जैसा शुद्ध वनस्‍पति घी खाया है, वैसा हमें देखने को भी नहीं मिलता। तब की बात ही और थी। एक रुपये में आठ जलेबियाँ चढ़ती थीं, लोग छककर खाते थे। केला रुपये दर्जन तक आ जाता था। फिर क्‍यों नहीं बनेगा अच्‍छा स्‍वास्‍थ्‍य? पुराने लोगों को देखो-साठ-सत्तर से कम में कोई कूच नहीं करता था। लंबी उमर जीते थे और ठाठ से जीते थे। आज की तरह श्मशान में अर्थियों का क्‍यू नहीं लगता था। पाँच रुपये में पूरा शरीर ढँकने का कफ़न आ जाता था। सुख और समृद्धि के वे दिन आज कहानी लगते हैं जिन पर सहसा विश्‍वास नहीं आता। पर यह सच है कि आज से सिर्फ़ सौ वर्ष पूर्व हमारे देश के लोग सुख की जिंदगी बिता रहे थे। तब का भारत आज की तुलना में निश्चित ही स्‍वर्ग था। 

Wednesday, 25 May 2016

व्यंग्य सप्ताह : DAY 6


मेरी चिट्ठी पप्पा के नाम
नेहा शरद


प्यारे पप्पा,
जब भी ऊपर नीला आसमान मुस्कुराता हुआ दिखता हैमुझे लगता है आपने ख़ुदा को अपना लिखा हुआ कोई नया लेख पढ़ कर सुना दिया है ! आपके जाने के कुछ समय पहले आपके खास दोस्त, सम्पादक राजेंद्र माथुर भी चल बसे। सबने कहा ऊपरवाला कोई नया अख़बार शुरू कर रहा है और उसे आपकी ज़रुरत है !

वहां भी आम आदमी और देश को लेके आपकी चिंताएं कम नहीं हुई होंगी । आपके ४५०० लेखों को हमने बहुत सम्भाल कर रखा है । प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा आज से ३५ साल पहले लिखा हुआ लेख भी ऐसा लगता है जैसे हाल ही में लिखा हुआ लेख है । आजकल एक जी का जंजाल व्हाट्स अप है ,जहाँ आपके इस लेख ने धूम मचा दी  है । समस्याएं, चाहे आपके लिखे राजनेता पर हों  या राजनीति, दलदल बढ़ता ही जा रहा है ।  बदलाव आएं है,पर सिर्फ समीकरण बदले हैं और कुछ भी नहीं !

व्यंग्यकारों की एक नयी पौध आ गयी है, जो आश्वस्त तो करती है, पर वो प्रतिबद्धता नहीं है जो आपकी लेखनी में थी । सरोकार की भी कमी है । क्या व्यंग्य विधा है, ये बहस अभी भी जारी है जो प्रश्न आपसे किया जाता था ।  बहरहाल एक डॉक्टर ने आपको इंजेक्शन लगाए थे उससे उनका साहस बहुत बढ़ गया और वे व्यंगकार भी आले दर्जे के बन गए हैं, आज हम आपके नाम से उन्हें पुरुस्कृत कर रहे हैं ।
मुंबई में भी व्यंग्य समृद्ध हो यही कामना है ।
आज भी वहां आपको रोज़ २०-२५ लोग/आत्माएं घेर कर बैठती होंगी, नए-नए विषयों पर बात करने के लिए, क्या मम्मी उन्हें भी दिन भर चाय पिलाती हैं ?
माँ की महिमा का बखान तो सभी करते हैं पर पिता का जाना एक दरख़्त के गिरने जैसा होता है जिसमें आवाज़ नहीं होती पर उसका जाना भी जीवन भर सालता रहता है । आपके समकालीन आपकी तुलना कबीर और मार्क ट्वेन से करते थे, अब धीरे -धीरे उसका अर्थ समझ में आ रहा है । कुछ लोगों ने मुझ से कहा कि तुम बहुत बढ़िया काम काम कर रही हो अपने पिता के लिए, मैं मुस्कुरा दी क्योंकि मैं जानती हूँ, आपसे जुड़े रहने से हमारी अपनी ग्रोथ होती है, सोल सर्चिंग वाला मसला है । जो भी आपके कार्यक्रम में आते हैं अवश्य कुछ पाकर ही जाएंगे।
आपके जाने के बाद लगातार १७ साल तक हमने 'शरद संध्या' में और देश, विदेश में आपकी रचनाओं का पाठ किया है । प्रभाष जोशी, ज्योति महेश्वरी, शशि और सुभाष मिश्रा, सुरेन्द्र जी, विश्वनाथ जी, सुभाष जी, वि पी सिंह  जैसे कई नाम आपकी लेखनी की वजह से जुड़े हैं । राजन नटराजन, सुदर्शन जी, प्रमिला जी जैसे कई जाने अनजाने चहरे पिछले १७ वर्षों से हमसे जुड़े हुए हैं ।
कई बार लगता है आप हमें किसी वेटिंग रूम में छोड़ कर चले गए है, ऐसे समय में तुरंत आपकी पुस्तक उठा कर पढ़ने लगती हूँ ।
पिछले 7-8 वर्षों में देश में, राजनीति में कई नए नाम उभरे हैं, सोचती हूँ आप होते तो उनपर क्या लिखते ।
व्यंग्यकारों और व्यंग्यप्रेमियों को यूँ ही अपना प्रेम देते रहें,
आपकी
लाड़ली

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*शरद जी की सुपुत्री नेहा जी फिल्म लेखिका हैं | मुंबई में रहती हैं |


व्यंग्यकार शरद जोशी : एक स्मरण

शरद जोशी ने लिखा था, ‘‘लिखना मेरे लिए जीने की तरकीब है इतना लिख लेने के बाद अपने लिखे को देख मैं सिर्फ यही कह पाता हूँ कि चलो, इतने बरस जी लिया यह न होता तो इसका क्‍या विकल्‍प होता, अब सोचना कठिन है लिखना मेरा निजी उदे्‌श्‍य है'

21 मई 1931 को जन्‍मे शरद जोशी ने 25 साल तक कविता के मंच से गद्य पाठ किया वह देश के पहले व्‍यंग्‍यकार थे जिन्‍होंने पहली बार मुंबई में चकल्‍लस' के मंच पर 1968 में गद्य पढ़ा और किसी कवि से अधिक लोकप्रिय हुए बिहारी के दोहे की तरह शरद जोशी अपने व्‍यंग्‍य का विस्‍तार पाठक पर छोड़ देते है

आज के दौर में लोग व्‍यंग्‍य से दूर हो रहे है क्‍योंकि सामाजिक परिस्‍थितियाँ इतनी खराब होती जा रही है कि लोग व्‍यंग्‍य के शब्‍दों में छिपी बेदना को अभिव्‍यक्‍त करने वाले को स्‍वीकार करने में हिचकने लगे है, इस अमानवीय समय में मनुष्‍यता और रिश्‍तों को बचाना जरूरी है जब पूरी दुनिया एक बाजार में तब्‍दील हो चुकी है, जहाँ सब कुछ विकाउ हो जाने की संभावनाएँ मौजूद है, ऐसे मे शरद जोशी का व्‍यंग्‍य की प्रासंगिकता बढ़ जाती है शरदजोशी आजकल के व्‍यंग्‍यकारों की तरह बाजार को देखकर नहीं लिखते थे उनके व्‍यंग्‍य परिस्‍थितिजन्‍य होने के साथ उनमें सामाजिक सरोकार होते थे जबकि आजकल के व्‍यंग्‍यकारों में सपाटबयानी अधिक होती है वरिष्‍ठ कवि चंद्रकांत देवताले ने ठीक कहा है कि ‘‘वैश्‍वीकरण और भ्रष्‍टाचार जैसी चुनौतियों के बीच कोई ऐसा व्‍यंग्‍यकार नही है जो हमें विनोद की बजाय चुटकी लेकर जगाए''

व्‍यंग्‍यकार शरद जोशी अपने समय के अनूठे व्‍यंग्‍यकार थेजहां एक तरफ पारसाई के व्‍यंग्‍य में कडवाहट अधिक है वहीं शरद जोशी के व्‍यंग्‍य में कडवाहट के साथ हास्‍य, मनोविनोद और चुटीलापन दिखाई देता है जो उन्‍हें जनप्रिय रचनाकार बनाता हैअपने वक्‍त की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्‍कृतिक विसंगतियों को उन्‍होंने अत्‍यंत पैनी निगाह से देखा और बड़ी साफगोई के साथ उसे सटीक शब्‍दों में व्‍यक्‍त किया उन्‍होंने लिखा कि ‘‘हिन्‍दी में पाठक की तलाश एक मरीचिका है और शुद्ध लेखक आदर्श जीवन की कल्‍पना है हिन्‍दी साहित्‍य दोनों की अनुपस्‍थिति में फूल-फल रहा है, यह अपने आप में चमत्‍कार है''

शरद जोशी की दूरदर्शिता की एक बानगी देखिए जब वे लिखते है कि ‘‘साहित्‍यकारों ने पिछले वर्षों में बड़े एण्‍टी आंदोलन चलाये, अकहानी, अकविता, अनाटक मगर आगे पाठक अपुस्‍तक का आंदोलन चलाएगा किताबों से इंकार का आंदोलन और वह साहित्‍यकारों को बड़ा भारी पड़ेगा'' आज संजाल के जाल में हम किताबों से इंकार का आंदोलन ही तो चला रहे है पाठकों ने पुस्‍तक के बजाए ई-पुस्‍तक पढ़ना शुरू कर दिया है

22 जनू 1975 को शरद जोशी ने पचास साल बाद-शायद' में लिखा कि ‘‘हिन्‍दी में दृढ़ विश्‍वास को व्‍यक्‍त करने के लिए सबसे सशक्‍त शब्‍द शायद' ही है इसलिए मैं शायद' लगा रहा हूँ उनके व्‍यंग्‍य लेखों का संग्रह पिछले दिनों' में शरद जोशी ने जहां सामाजिक स्‍थितियों को नई दृष्‍टि देते हुए सही दिशा की ओर इंगित करते है वहीं दूसरी ओर उनकी तीक्ष्‍णता और पैनेपन से पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकतायत्र तत्र सर्वत्र' उनकी 101 व्‍यंग्‍य रचनाओं का संग्रह है जिसे पढ़ने पर यह स्‍पष्‍ट होता है कि शरद जोशी अपने चिंतन और लेखन के स्‍तर पर व्‍यापक मानवीय सरोकारों के साथ कितनी संवेदनशीलता और बौद्धिक सघनता से जुड़े हुए थे समकालीन जीवन और समाज की तमाम समस्‍याओं और विसंगतियों में एक सिद्धहस्‍त व्‍यंग्‍यकार की बहुत कुछ तोड़ने और बनाने की भीतरी छटपटाहट भी उनके व्‍यंग्‍यात्‍मक निबंध संग्रह यथासमय', जीप पर सवार झल्‍लियां', रहा किनारे बैट' में देखा और पढ़ा जा सकता है उनके सम्‍पूर्ण साहित्‍य में से सौ बेहतरीन रचनाएं स्‍वयं शरद जोशी द्वारा चुनी हुई यथासंभव' में संकलित है अपनी चिर-परिचित शालीन भाषा में वे कहते है कि ‘‘मैंने हिन्‍दी में व्‍यंग्‍य साहित्‍य का अभाव दूर करने की दिशा में यथासंभव' प्रयास किया है'' यह कहना अतिशओक्‍ति नहीं होगी कि शरद जोशी ने हिन्‍दी के गंभीर व्‍यंग्‍य को करोड़ों लोगों तक पहुंचाया उनके व्‍यंग्‍य संग्रहों से गुजरते हुए प्रेम, सौंदर्य, राजनीति, साहित्‍य, भाषा, पत्रकारिता, नैतिकता आदि तमाम विषयों पर पाठक उनके बेलौस और बेधक प्रतिक्रियाएं देख-पढ़ सकते हैं

शरद जोशी ने टेलीबिजन के लिए ये जो है जिंदगी', बिक्रम वैताल, सिहांसन बत्‍तीसी', बाह जनबा, देवीजी, प्‍याले में तूफान, दाने अनार के और ये दुनिया गजब की, धारावाहिक लिखें इन दिनों सब' चैनेल पर उनकी कहानियां और व्‍यंग्‍य आधारित सिटकॉम, लापतागंज प्रसारित किया जा रहा है जो काफी सराहा भी गया है उन्‍होंने छोटी सी बात, सांच को आंच नहीं, गोधूलि, क्षितिज और उत्‍सव जैसे सफल फिल्‍मों की पटकथा भी लिखा शरद जोशी की मृत्‍यु 23 वर्ष पूर्व 5 सितंबर 1991 को मुंबई में हुई थी लेकिन उनकी लोकप्रियता आज भी वैसे ही बरकरार है जैसे उनके जीवनकाल में थी उनके कटाक्ष आज भी उतने ही प्रासंगिक है

-राजीव आनंद

Tuesday, 24 May 2016

व्यंग्य सप्ताह : DAY 5


लेखकों की दुनिया - शरद जोशी / सूरज प्रकाश




रचनारत युवा शरद

शरद जी अपनी धर्मपत्नी इरफाना जी के साथ



Monday, 23 May 2016

व्यंग्य सप्ताह : DAY 4

संस्मरण

पद्मश्री के बाद शरदजी के साथ चन्द बोफोर्स क्षण
ब्रजेश कानूनगो

यह मेरा सौभाग्य रहा कि व्यंग्यकार माफ कीजिए पत्रकार श्री शरद जोशी को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने की घोषणा के तुरंत बाद उनके साथ कुछ घंटे बिताने का अवसर मिला। कहते हैं सुख और खुशी के क्षण हमें ईश्वर से वरदान स्वरूप ही मिलते हैं। और उन्ही क्षणों में से वे क्षण जो हिन्दी के समर्थ व्यंग्य लेखक के साथ बिताए गए हों और भी अविस्मरणीय हो जाते हैं।

अवसर था मक्सी और शाजापुर (म.प्र.) में लॉयंस क्लब द्वारा आयोजित कार्यक्रमों का,जिसके केन्द्र में शरद जोशी थे। अट्ठाइस जनवरी सन उनीस सौ नब्वे के दिन दोपहर से लेकर रात दो बजे तक हम हँसते रहे,ठहाके लगाते रहे। पद्मश्री जैसे सम्मान के घोषणा के बाद भी शरदजी अपनी चिरपरिचित चश्में से झांकती शरारती आँखों के साथ सहजता से चुटकियाँ लेते रहे।


पद्मश्री की घोषणा के बाद उनके सम्मान में बैंड बजाने का पहला मौका और स्थान मालवा के एक छोटे-से कस्बे मक्सी को प्राप्त हुआ। लॉयंस क्लब के क्षेत्रीय अधिवेशन में अपना उद्बोधन करते हुए उन्होने कहा- क्लब की मजबूरी रही है कि मुझे अधिवेशन का मुख्य अतिथि बनाया गया,अगर किसी सांसद को अतिथि बनाते तो राज्य सरकार के साथ अन्याय होता,अगर किसी राज्य स्तरीय नेता को बुलाते तो केन्द्र के साथ अन्याय हो जाता, इसलिए इस सन्धिकाल में साहित्यकार को,व्यंग्यकार को पकड लिया गया। ऐसे ही सन्धिकालों में मैं अतिथि बनता रहा हूँ और बनता रहूँगा।बाद में शरद जी कोई डेढ घंटे तक चोट करते रहे, हँसाते रहे।

वन विभाग का एक अधिकारी उनसे मिला और अपना परिचय दिया तो वे तपाक से बोले-अच्छा तो आप हैं ऑफिसर विदाउट फॉरेस्ट।जब लॉयंस क्लबों द्वारा किए गए कार्यों को पढा गया तो अपने उद्बोधन में शरद जी कहते हैं- कर्तव्य के बखान की यही रफ्तार रही तो थोडे ही दिनों में कोई क्लब कहेगा कि उसने पाँच लोगों को ठंडा पानी पिलाया।लेकिन इन क्लबों के माध्यम से लोग एक दूसरे से मिलते हैं,यही क्या कम है। उन्होने बल दिया कि अच्छे लोगों को राजनीति में भी आना चाहिए,,अच्छे लोग मात्र पेड लगाते रहेंगे,रोटियाँ वितरित करते रहेंगे तो देश की बागडोर माफिया ग्रुप के हाथों में कचली जाएगी। उन्होने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत का नागरिक समझदार हुआ है वह अपने तरीके से पहचान लेता है कि कौन सही है,ईमानदार है,और कौन केवल सच का मुखौटा लगाए है। यही कारण है कि टिकैत और किसान नेता शरद जोशी कई कमियों-कमजोरियों के बावजूद लाखों किसानों के नेता बने हैं।

शाम को शाजापुर में शरदजी का स्वागत और अभिनन्दन किया गया। लगभग तीस वर्षों बाद शाजापुर जो कि उनकी ससुराल भी भी थी, कई भूली बिसरी यादों को ताजा कर गया। एक जगह वे रुककर कहते हैं; यहाँ एक पुल था, वहाँ एक स्कूल हुआ करता था, यहाँ हमने कार रोकी थी, वगैरह-वगैरह।

अपने सम्मान के लिए धन्यवाद देते हुए अपने चुटकी भरे अन्दाज में वे कहते हैं- तीस वर्ष पहले मैं शाजापुर से लडकी तो ले गया था परंतु कुछ रस्में होना रह गईं थी, वे अब पूरी हो रहीं हैं..नारियल, कपडे, माला और कुछ नगदी अब मुझे प्रदान किया जा रहा है। हाँ, पद्मश्री तो अब मिल रही है, लेकिन पद्मश्रीमती तो पहले ही मैं शाजापुर से हाँसिल कर चुका हूँ।

इस पर एक उत्साही नागरिक ने बडे जोश से माइक पर आकर कहा- श्री शरद जी ने आज से तीस बरस पहले एक मुसलमान लडकी से विवाह करके राष्ट्रीय एकता की मिसाल कायम की थी। इतना कहकर उन्होने शरद जी को माला पहनाई। तब शरद जी ने बहुत ही सहजता से विवाह और राष्ट्रीय एकता वाली बात का खंडन करते हुए कहा-उन्होने उस समय किसी राष्ट्रीय एकता को मद्देनजर रखकर कोई निर्णय नही लिया था,उन्होने वही किया जो एक सामान्य युवा उस अवस्था में करता है। उनकी प्रेमिका उस वक्त चाहे सिन्धी होती,क्रिश्चियन होती या उनकी अपनी जाति की ही क्यों न होती तो भी वे वही करते जो उन्होने किया।

एक अपरिचित युवक मुझे एक गोपनीय पत्रबन्द लिफाफे में उनके नाम दे गया तो उसे लेते हुए उन्होने टिप्पणी की-अच्छा अभी तक शाजापुर में मेरे नाम गोपनीय पत्र लिखने की परम्परा कायम है।कार्यक्रम की समाप्ति के बाद हम लौट रहे थे तो मैने उन्हे शिकायत के लहजे में कहा-आपके प्रतिदिनलिखने से हमारी चौखट’(नवभारत टॉइम्स में दैनिक व्यंग्य कॉलम) बन्द हो गई है,अब हम क्या करें?’ तब उन्होने बडी गम्भीरता से सलाह दी- आप लोग लिखें रज्जू बाबू को(श्री राजेन्द्र माथुर, नभाटा के तत्कालीन सम्पादक) कि वे हर पृष्ठ पर एक व्यंग्य लेख छापने की परम्परा शुरू करें।

देवास का जिक्र आने पर उन्हे अपने स्कूल के हेड मास्टर खडके साहब की याद आ गई, कैसे खडके साहब का अर्थ ही डंडा हुआ करता था और किस तरह उनके आतंक के बावजूद शरदजी ने स्कूल में पहली बार हडताल करवाई थी। उन्हे सब कुछ याद आ रहा था। उन्ही के शब्दों में कहा जाए तो वे बोफोर्स (यादों) में खो गए थे। हालाँकि मैं उनका सदा से बोफोर्स (प्रशंसक) रहा हूँ, उनके साथ बिताए चन्द बोफोर्स (बेमिसाल) क्षण हमेशा बोफोर्स (गुदगुदाते) करते रहेंगे।

-ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड,
इन्दौर- 452018
मो.न.09893944294

Sunday, 22 May 2016

व्यंग्य सप्ताह : DAY 3



जीवंत है शरद जोशी का ‘यथासमय’ व्यंग्य संग्रह

हिंदी के प्रमुख व्यंग्यकार शरद जोशी जी के साहित्यिक अवदान से भला कौन परिचित नहीं है। व्यवस्था-तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा आम आदमी को बोनसाई बनानेवाली सत्ता संस्कृति के विरूद्ध वे लगभग जेहादी स्तर पर आजीवन संघर्षरत रहे। वे अपने सहज और बोलचाल के गद्य में ऐसी व्यंजना भरते हैं जो पाठक के मन- मस्तिष्क को केवल झकझोरती नहीं, एक नयी सोच भी पैदा करती है। वाकई उनके व्यंग्य नावक के तीर होते हैं। उनकी लेखनी में समाज में यत्र तत्र सवर्त्र फैले भ्रष्टाचार, शोषण, विकृति और अन्याय पर जमकर प्रहार करती है और सोचने के लिए बाध्य करती है। यथासमय शरद जोशी के महत्वूपर्ण व्यंग्यों का संग्रह है, जिसे बड़े ही जतन से संजोया गया है। हिंदी के प्रमुख व्यंग्यकार शरद जोशी का जन्म 21 मई 1931 को मध्यप्रदेश के उज्जैन में हुआ। शरद जी ने पत्रकारिता, आकाशवाणी, और सरकारी नौकरी के बाद उन्होंने लेखन को ही अपना जीवन बना लिया। नई दुनिया से उन्होंने लेखन की शुरूआत की। 1990 में हिंदी एक्सप्रेस के सम्पादन का दायित्व संभाला। बाद में नवभारत टाइम्स में दैनिक  व्यंग्य लिखकर देशभर में चर्चित हुए। 1990 में जोशी जी को पद्श्री से सम्मानित किया गया। जोशी जी के कई लेखकों को टीवी नाटकों के रूप में फिल्माया गया, जिसमें सब टीवी पर प्रसारित होने वाला लापतागंज, ये जो है जिंदगी, विक्रम और  बेताल आदि हैं। इसके अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों जैसे उत्सव, दिल है कि मानता नहीं जैसी फिल्मों केलिए डॉयलॉग भी लिखे। शरद जोशी जी का निधन 5 सितंबर 1991 को मुंबई में हुआ था। शरद जोशी जी की 271 पृष्ठों की पुस्तक यथासमय उनके व्यंग्यों का संग्रह है, जिसे भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित किया गया है जिसका मूल्य 140 रुपए है।

क्षणभंगुर है मानव ये जीवन
इसे व्यतीत कर नित नए अवसर पाने में

अगर आप शरद जोशी जी के व्यंग्य संग्रह को पढ़ रहे हैं और अचानक ठहाके लगाकर हंसने लगे तो आपको ये सोचने का मौका नहीं मिलेगा की मेरे सामने वाला क्या सोच रहा है। पुस्तकालय, संस्कृति, हिंदी भाषा, साहित्यकार, खेल, राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, अपराध, समाज, शहर, नेता, चुनाव, पुलिस, अपराधी, युवाओं से संबंधित सभी मामलों का इतना बेहतरीन शाब्दिक चित्रण किया है जो बेहद लाजवाब है। जोशी जी ने अपने इस व्यंग्य संग्रह में पुस्तकालय को सरकारी गोदाम बताया है जो अफसरों के बच्चों के लिए मुफ्त में पुस्तकों की आपूर्तिकर्ता होती है। भारतीय संस्कृति की दया का विवेचन इस तरह किया गया है कि कैसे लोग इसकों याद भर करने केलिए भरी सभा में इस भव्य और अपार भारतीय संस्कृति का ेभरे मंच पर  दो शब्दों में बयां करने की चुनौती दे देते हैं। जोशी जी ने हिंदी की हालत पर भी बड़ा दुख जताया है और बड़े ही गुस्से में भारत के अंग्रेजपरस्त अधिकारियों को कोसा है, इसके अलावा हिन्दुस्तान के राजनीतिज्ञों की भी जमकर क्लास लगाई है जिनको कहा गया है कि ये वही लोग हैं जो ब्रिटेन जाकर बनार्ड शॉ से मिलने के लिए लाइन में खड़े रहते हैं, लेकिन इलाहाबाद में निराला से मिलने के लिए वक्त नहीं था। भारत में साहित्यकारों और लेखकों की दयनीय हालत का भी बड़ी संजीदगी से व्यक्त किया गया है, जोशी जी ने साहित्यकारों की उस पीड़ा को इस तरह से लिखा है कि उसे पढ़कर हमे ज्ञात हो जाएगा शब्दों और कलम के ये सिपाही किस हालात से गुजरते हैं। जोशी जी ने लेखकों की एक प्रमुख बीमारी का खुलासा किया है जिसे मूल्यांकन का मर्ज कहा है और इसका प्रमुख लक्षण बताया है कि वो बस यही ढ़ंढंते हैं कि कोई उनका मूल्यांकन कर दे, लेकिन आखिरी साहित्यकारों का आखिरी मूल्यांकन कबाड़ी वाला ही करता है जो उनके बहुमूल्य लेखकों को किलों के भाव में मूल्यांकन करता है। खेल पर जोशी जी ने खूब कसीदे कसे हैं हॉकी, क्रिकेट और रिकॉर्ड का ऐसा मिश्रण पेश किया है की उनकी हालत ही पतली हो गई है। हॉकी की पतली हालत का भी पता चल जाएगा जो विभागों और सरकारी नीतियों के आगे दम तोड़ रही है जो अब केवल राष्ट्रीय खेल के नाम पर विभागीय खेल बन कर रह गई है।

राजनेजाओं की भी जोशी जी ने खूब कसाई की है और उनके कर्मो पर लिखा है कि ये सफेद लिबाज में बिल्ले हैं जो किसी साफ जगह गंदगी करता है तो उसे फौरन मिट्टी से ढ़क देता है, जिससे संदेश मिलता है कि बुराइयों को एक नेक काम से ढ़क देना चाहिए और अगले चुनाव में जीत की उम्मीद को प्रबल रखना चाहिए। अपराध देश में बढ़ता जा रहा है और बलात्कार को लेकर जोशी जी ने लिखा है कि पहले के अपराधी ऐसे मामलों में थानों में दुबक कर बैठते थे, लेकिन आज केसमय में इसके उलट हो रहा है और सभी अपराधी सीना तान कर चौकी इंचार्ज की कुर्सी पर बैठता है। जोशी जी लिखते हैं कि आज का अपराधी बम फेंक कर हत्या भी कर दे तो वो चाहता है कि उसे उसका निजी मामला समझा जाए और खुद को पूरे देश के सामने ऐसे देखता है कि पूरा समाज अपराधी है जो उसने ये क्यों नहीं किया। जोशी जी ने युवा दिलों को भी खूब टटोला है और इतना टटोला है कि इसकों पढ़ते वक्त मुझे ये लगने लगा कि अरे जोशी जी ने मेरे बारे में क्यों लिख दिया है, तब मैने अंदाजा लगा लिया कि ये समस्या मेरी नहीं है बल्कि हर युवा दिल की है जो बस स्टाप पर अपने अकेलेपन को तोड़ने के लिए एक हसीन लड़की की तलाश में अपने नयनों को चारों दिशाओं में घुमाता रहता है, लेकिन आखिर में वो बस में चला जाता है क्योंकि उसे उस लड़की के सामने शराफत का चोला भी तो पहनना है। जोशी जी ने लड़कों के बारे में एक और खुलासा किया है कि बस स्टाप पर शराफत भी एक पैंतरा है, खामोश खड़े रहना और लड़कियों पर ध्यान नहीं देना भी लड़कियों में डूबे रहने का तरीका है, आपके साथ तो ऐसा नहीं है पर मेरे साथ तो ऐसा ही है, लेकिन मैं लड़कियों के मामले में शरीफ भी हूं।

यथासमय के कुछ व्यग्यों का सार :-

1: दर्शन ने दर्शन को को मारा
भारत में दर्शन शब्द बहुत प्रचलित हैं यहां देवी दर्शन, नेता देर्शन से लेकर के अंतिम दर्शन तक के लिए होड़ लगी रहती है। हालांकि भारत से दर्शन इसलिए गायब हो गया है क्योंकि बुद्ध की सुंदर मूर्तियां बनी और बुद्ध दर्शन गायब हो गया, कुछ ऐसा ही हाल मायावती द्वारा लखनऊ में बनाए गए बौद्ध विहार का है, गांधी की मूर्तियां लग गयीं तो गांधी दर्शन गायग हो गया जिसका मतलब ये है कि दर्शन ने ही दर्शन को मार दिया है।

2: सड़क और गड्ढे
भारत में सड़कों की हालत खराब है और वहीं उनकी पहचान है लेकिन जोशी जी ने राजा दशरथ पर आश्चर्य जताया है कि आखिर वो कहां से रथ घुमाकर ले आते थे। बेचारे राम को तो वनवास में सपाट मार्ग मिला नहीं और उसी के बाद उन्होंने ने निर्णय लिया कि वो पुष्पक विमान से ही अयोध्या कूच करेंगे कहने का अर्थ ये है कि अगर सड़के होती तो विमान कहां से आते खैर वो त्रेता युग केराम थे लेकिन आप कलयुग के मानव हैं जो सड़क मंत्रालय और नगर निगम को कोसते हुए अपनी यात्रा पूरी करते रहें।

3: बल्ले से कलम तक
पहले क्रिकेट में अनिवार्यता थी कि कप्तान ऐसे चुने जाते थे जो मधुर अंग्रेजी बोलने में निपुण हो ताकि मैच में मिली हार के बाद फर्राटेदार अंग्रेजी से उसके जख्म को कम कर दे। लिखने का तो सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि हॉकी और फुटबॉल के खिलाड़ी उस समाज से आते हैं जिनको प्रार्थना पत्र लिखवाने के लिए किसी की खुशामद करनी पड़ती है। पर जिनके दामन में दाग होता है वे शायरी से कतराते हैं, शायरों से कतराते हैं, कुल मिलाकर शब्द मात्र से कतराते हैं, फिर चाहे वो पत्राकारिता ही क्यों न हो।

4: टीम मैनेजर की प्रार्थना
सौभाग्य और दुर्भाग्य के बीच निरंतर झूलती इस भारतीय हॉकी टीम का मैं मैनेजर हूं मैं , कृपालु मुझ पर विशेष ध्यान रखना क्योंकि टीम केहार जाने के बाद उसकी हार के कारणों का विश्लेषण मुझे ही करना पड़ेगा। हे दयालु, तू अपनी कृपादृष्टि हम पर रख और जैसे भी काम करके इस बार विजयी बना दे।

5: वह चश्मा कहां है
गांधी जी का चश्मा खो गया है, इसकी खबर लगते ही शरद जी चौक गए और सबसे ज्यादा धक्का उनके मित्र शर्मा जी को लगा, जिन्होंने चश्में को ढ़ूंढ़ने केलिए खूब कोशिश की और अंत में उन्होंने उस चश्में को गांधी फिल्म में गांधी का अभिनय करने वाले बेन किंग्सले को पहने देखा, लेकिन अभी उनको शक है कि अगर किंग्सले नहीं चुराएगा तो ये चश्मा इसी देश में किसी के पास पड़ा होगा।

6: बड़ा देश बड़ा झूठ
कई बार बड़े देशों पर मुझे दया आती है, सोचकर भला लगता है कि चलो हमारा देश छोटा है और हमें इतना झूठ नहीं बोलना पड़ता। अमेरिका को कसते हुए जोशी जी लिखते हैं कि आखिर कौन सा ऐसा क्षण होता होगा जब वो सच बोलते होंगे। खैर बड़ राष्ट्र का अर्थ ही है बड़ा झूठ और जिस तरह निरंतर झूठ बोलने वाला व्यक्ति हमें बजाए अपराधी के एक मरीज लगने लगता है उसे उसी तरह निरंतर झूठ बोलने वाला राष्ट्र भी एक मरीज लगता है।

7: हाथ मिलाने से हाथ हिलाने तक
विश्व में हाथ मिलाने और मुस्कुराने का बहुत प्रचलन है और इसी संदर्भ में उसने कहा कि वे आए, वे मुस्कुराए, उन्होंने हाथ मिलाया यह बहुत बड़ी बात  है। वे हवाई जहाज पर चढ़ गए, उन्होंने हाथ हिलाया और हाथ हिलाने से हाथ मिलाने तक ये दिन समाप्त हुआ।

8: सारे जहां का दर्द
देश के प्रधानमंत्री को अपने देश की चिंता नहीं है लेकिन वो विश्व केसभी देशों से परस्पर शांति और सद्भाव की अपील करते हैं और सभी मामलों को आपसी बातचीत से निपटाने की सलाह देते हैं। लेकिन जोशी जी को इस दर्द से बहुत पीड़ा थी और इसी कारण उन्होंने प्रधानमंत्री ना बनने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि स्कूल में भूगोल का शिक्षक मुझे संसार के नक्शे के पास खड़ा कर बेढ़ब सवाल पूछता था कि बताओं ब्लाडीबास्टक, होनोलूलू कहां है और मैं बेमन इन शहरों को सारी दुनिया में तलाशता रहता था, तो क्यों बनता मैं प्रधानमंत्री। कुछ इसी तरह के हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं जो देश को अस्थिरता के माहौल में सारे जहां का दर्द कम करने केलिए विदेश चले जाते हैं।

9: गालियां खाने का वर्ष
चुनाव के बीच के पांच वर्षो के तीन वर्ष पत्रकारिता का स्वर्णिम युग होता है और उसके बाद दो वर्ष गालियां खाने का वर्ष होता है और आजकल वही चल रहा है और इन दिनों नेताओं के मुंह से जो सुनने को मिले वही कम है। पत्रकारों और नेताओं का चोलीदामन का साथ है लेकिन कई पल ऐसे भी आते हैं जब दोनों एक दूसरे को जमकर गालियां देते हैं, लेकिन इसमें बाजी हमारे नेता ही मारते हैं। गलती पत्रकारों की भी है। पिछले दिनों बलात्कार की इतनी घटनाएं प्रकाश में आईं और प्रशासन ने नोटिस जारी कर दिया कि प्रेस उनके प्राइवेट मामले में दखल दे रहा है। नेताओं की शिकायत है कि अगर बलात्कार की घटनाएं ही प्रकाशित की जाएंगी तो शिलान्यास और निर्माणकार्यो की खबरे कहां छपेंगी। इस मामले में पत्रकारों का कहना है किमालिक हमें जैसी नीतियां बताते हैं, वैसे हमें चलना पड़ता है और नेता कहते हैं कि मालकिन हमें जैसी नीतियां बताती हैं, वैसे हमें चलना पड़ता है हम भी मजबूर  हैं।

10: भोपाल में वक्त गुजारने का समय
भोपाल में वक्त गुजारने का सबसे अच्छा तरीका है कि आपकी सरकारी नौकरी हो जाए। या तो फिर आप धीरे से ये कह दीजिए बड़ी धांधली है बस अब क्या पूरी मंडली बैठ जाएगी जो मध्यप्रदेश विधानसभा से कम नहीं लगेगी। या जिस विभाग में आप नौकरी कर रहें हैं वहां ये पता करिए की किसका तबादला होने वाला है और क्यों, इसी को लेकर इतना धोइए कि दो चार दिन निकल जाए। फिर चार दिन बाद पता करिए कि उसका तबादला हुआ की नहीं हुआ तो उसके पीछे कौन था और नहीं हुआ तो इसका कारण क्या रहा। बस इन सवालों का जवाब ढूंढ़ते रहिए समय बड़ी ही आसानी से कट जाएगा।

11: जोशी जी राष्ट्रपति के लिए क्यों खड़े नहीं हुए
जोशी जी को बड़ा दुख होता है कि वो राष्ट्रपति चुनाव में क्यों नहीं खड़े हुए। आखिर उनको अपने उपर भरोसा है कि वो भी सेलूट ले सकते हैं, हाथ मिला सकते हैं, स्माइल दे सकते हैं, गेस्ट के साथ चाय पी सकता हूं दस्तखत कर सकता हूं। तो फिर मैं बन सकता था तो क्यों नहीं बना और खड़ा हो सकता था तो क्यों नहीं हुआ। खैर छोड़िए राष्ट्रपति चुनाव में बड़ा खेल है जगजीवन राम को राष्ट्रपति पद केलिए चुना गया तो वो कहने लगे कि मुझे योग्य व्यक्ति समझकर राष्ट्रपति बनाया जाए तो मैं बनने केलिए तैयार हूं लेकिन हरिजन होने के नाते राष्ट्रपति नहीं बनूंगा और वो नाराज हो गए। वहीं जाकिर हुसैन साहब राष्ट्रपति बन गए और लोगों ने कहा कि कितने भी उंचे पद पर गए हों हैं तो मुसलमान ही।

12: टूटता अकेलापन
शराफत भी एक पैंतरा है, खामोश खड़े रहना और लड़कियों पर ध्यान नहीं देना भी लड़कियों में डूबे रहने का एक तरीका है। सड़क गली मोहल्ले से गुजरने वाली हर लड़की को अपनी मासूका समझ लेते हैं और अपने उस अकेलेपन को तोड़ने की कोशिश करते हैं जो सालों से टूटने के लिए बेचैन हो उठी है।

13: आपका बन्दा, हॉकी कोच की मुद्रा में
नियुक्त करने से पूर्व अफसरों ने मुझे नीति स्पष्ट कर दी थी कि हमारे देश की हॉकी टीम भारतीय जनता का नहीं बल्कि  भारत के सरकारी विभागों का प्रतिनिधित्व करती है। अफसरों ने बताया कि आपके प्रिय चमचे कौन हैं जिनकों ओलंपिक भेजना है और खेलने का मौका अवश्य देना है। राष्ट्र में तीन तरह के खिलाड़ी होते हैं एक वो जो ओलंपिक जाते हैं और उन्हें वहां खेलने का मौका मिलता है, दूसरे वे जो जाते तो हैं पर इस बात का सख्ती से ध्यान दिया जाता है कि वो खेलने ना पाएं और तीसरे वे जो योग्य खिलाड़ी हैं, मगर ओलंपिक के काबिल नहीं समझे गए।

14: मूल्यांकन का मर्ज
मूल्यांकन एक ऐसा मर्ज है जो हर साहित्यकार को कभी न कभी लग जाता है। कुछ को कम उम्र में और कुछ को बुढ़ापे में यह बीमारी लग जाती है। वे अंदर से परेशान हो जाते हैं। वे अपने लेख साहित्य को बटोरकर मोहित दृष्टि से देखने लगते हैं और मूल्यांकन के लिए उतावले हो जाते हैं और इसी अनंत अथाह कचर पेटी में अपनी स्थिति को भांपने का आग्रह यदि पूरा हो जाए तो निश्चित ही आप सौभाग्यशाली होते हैं।

15: मैं प्रतीक्षा में हूं
अपने देश को समझने का दावा तो सब करते हैं लेकिन ये निष्ठुर हिंदी को नहीं समझ पाए। देश और देश की भाषा के लिए इससे बड़ा क्या अपमान है जिसने हम मिट्टी के मानुष को पहचान दी हमने उसे ही भुला दिया है। लोग हिंदी को हीन भावना से देखते हैं वहीं अंग्रेजी को ऐसे देखते हैं जैसे मर्लिन मनरों की गोरी टांग हो गई हो। हमने दिनकर, महादेवी, और माखनलाल जी  को भाषण देते हुए सुना होगा लेकिन हमारा मन यह नहीं हुआ कि हम ऐसी हिंदी बोलें, पर जब कोई अंग्रेजी में स्वरलहरी बहाता है तो रीढ़ में मधुर कंपन होने लगता है। ये वही मधुर  कंपन है जो अंग्रेजी सरोजनी नायडू की अंग्रेजी सुनकर जवाहरलाल नेहरू की पीठ में होता था। ये वहीं नेहरू थे जो लंदन जाने पर बनार्ड शॉ से मिलने के लिए आतुर रहते थे लेकिन इलाहाबाद जाने पर निराला जी से मिलने का समय नहीं निकाल पाते थे। भवानी भाई ने कहा था कि हिंदी बड़ी है शायद इसीलिए सबके चरणों में पड़ी है।

-मनीष कुमार सिंह 

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...