Sunday, 13 December 2020

व्यंग्य परिक्रमा 2020


लेखा-जोखा

 राहुल देव

 

आमतौर पर व्यंग्य को अगम्भीर किस्म का गंभीर साहित्य माना जाता रहा है। अपने मूल में व्यंग्य साहित्य विसंगतियों का चरित्र चित्रण है। व्यंग्य जीवन और समाज की आलोचना का सशक्त भाषिक अस्त्र है। यह एक सरोकारसम्पन्न गंभीर उपविधा है। व्यंग्यकार खुद व्यवस्था का सबसे बड़ा आलोचक है। इसलिए इसकी लोकप्रियता गुणवत्ता में ह्रास के बावजूद आज भी कम नही हुई है | कोरोना संकट के बावजूद अपनी तमाम कमियों और गुणों के साथ हर साल की तरह इस वर्ष भी व्यंग्य की तमाम किताबें आई हैं जिनका संक्षिप्त उल्लेख इस आलेख में किया गया है |

 

'व्यंग्य का ब्लैकहोल' शीर्षक से व्यंग्यकार आभा संजीव सिंह का रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से संग्रह इसी साल आया। चर्चित व्यंग्यकार पीयूष पाण्डेय का व्यंग्य संग्रह 'कबीरा बैठा डिबेट में' प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से साल के शुरुआती दिनों में आया था। परसाई नगरी जबलपुर के व्यंग्यलेखक जयप्रकाश पाण्डेय का रवीना प्रकाशन से 'डांस इंडिया डांस' नामक संग्रह आया। शिवना पेपरबैक्स, सीहोर ने भी व्यंग्य की कुछ अच्छी पुस्तकें प्रकाशित कीं जिनमे प्रेम जनमेजय और लालित्य ललित की 'मेरी दस रचनाएं' सिरिज की किताबें रहीं। वहीं दिव्यांश पब्लिकेशन्स से प्रकाशित सुधीर मिश्र की किताब 'हाइब्रिड नेता चुनिंदा लखनवी तंज' थोड़ा अलग मिज़ाज़ की पुस्तक रही। यह किताब पिछले वर्ष प्रकाशित हुई थी | इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इस वर्ष इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है | अलग मिजाज़ की बात करें तो एक किताब ने और मेरा ध्यान खींचा जिसका शीर्षक है ‘साहित्यिक पंडानामा’ और इसके लेखक हैं सीतापुर निवासी भूपेंद्र दीक्षित इसे लोकमित्र प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है |

 


युवा व्यंग्यकारों में इंदौर के व्यंग्यकार सौरभ जैन का पहला व्यंग्य संग्रह 'डेमोक्रेसी स्वाहा' भावना प्रकाशन, नयी दिल्ली से छपा। इसी प्रकाशन हाउस से नोएडा (उ.प्र.) के युवा व्यंग्यकार अभिषेक अवस्थी का प्रथम व्यंग्य संग्रह 'मृगया' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस विधा में अन्य युवाओं की प्रमुख किताबों की बात करें तो उनमें लखनऊ के प्रसिद्ध कवि और व्यंग्य लेखक पंकज प्रसून की 'हँसी का पासवर्ड' व मांडवी प्रकाशन, गाज़ियाबाद से प्रकाशित मुकेश राठौर की किताब 'मुआवजे का मौसम' का नाम लिया जा सकता है।

 

इस वर्ष प्रकाशित अपेक्षाकृत वरिष्ठ रचनाकारों की प्रमुख पुस्तकों का जिक्र करूँ तो उनमें किताबवाले, नई दिल्ली से गिरीश पंकज का 'जादुई चिराग', नीरज बुक सेंटर से प्रकाशित हुई विनोद साव की किताब 'धराशायी होने का सिलसिला', अश्विनी कुमार दुबे का संग्रह 'महान बनने की कला', अमन प्रकाशन कानपुर से प्रेम जनमेजय का संग्रह 'हँसो हँसो यार हँसो', वनिका प्रकाशन बिजनौर से आलोक पुराणिक का व्यंग्य संग्रह 'व्हात्सप्प के पढ़े-लिखे' काफी समय बाद देखने को मिला। इसी क्रम में उज्जैन के सशक्त व्यंग्यकार शांतिलाल जैन का चौथा व्यंग्य संग्रह 'वे रचनाकुमारी को नही जानते', राजस्थान से बुलाकी शर्मा का व्यंग्य संग्रह 'पांचवां कबीर', अमन प्रकाशन कानपुर से चतुर्थ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्राप्त राजस्थानी व्यंग्यकार अतुल चतुर्वेदी का संग्रह 'बेशर्म समय में', कलमकार प्रकाशन से सेवाराम त्रिपाठी का संग्रह ‘हाँ, हम राजनीति नही कर रहे’, मुम्बई के डॉ प्रमोद पाण्डेय के संपादन में 'बता दूं क्या' शीर्षक से निकला 15 व्यंग्यकारों का संयुक्त संकलन और वर्षांत में सरोकार प्रकाशन भोपाल से कुमार सुरेश का व्यंग्य संग्रह 'व्यंग्य-राग' का नाम लिया जा सकता है।

 


महिला व्यंग्यकारों की बात करें तो उनमें नीरज बुक सेंटर से प्रकाशित स्नेहलता पाठक का संग्रह 'एक दीवार सौ अफ़साने', अर्चना चतुर्वेदी के संग्रह 'घूरो मगर प्यार से' 'लालित्य ललित के श्रेष्ठ व्यंग्य' संपादक- सुनीता शानू प्रमुख रहे।

 

इसी साल प्रकाशित देश के कुछ अन्य व्यंग्यकारों के संग्रहों की बात की जाय तो उनमें इंडिया नेटबुक्स, नॉएडा से हरीश कुमार सिंह का व्यंग्य संग्रह 'आप कैमरे की नज़र में हैं', रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से दीपक गिरकर का व्यंग्य संग्रह 'बंटी, बबली और बाबूजी का बटुआ', वैभव प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित सुनील जैन राहीका संग्रह 'झम्मन बारात के रिश्तेदार', रवीना प्रकाशन से विवेक रंजन श्रीवास्तव का संग्रह 'खटर-पटर', राजशेखर चौबे का व्यंग्य संग्रह 'स्ट्राइक 2.0', इंडिया नेटबुक्स से प्रकाशित अरुण अर्णव खरे का संग्रह 'उफ ये ऐप के झमेले' तथा विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य संग्रह 'समस्या का पंजीकरण व अन्य व्यंग्य' उल्लेखनीय रहे।

 


व्यंग्य विधा पर आलोचनात्मक दृष्टि से बात करती सुरेश कान्त की पुस्तक 'व्यंग्य एक नई दृष्टि' अमन प्रकाशन, कानपुर ने इसी साल प्रकाशित की जो अपने आप मे उपयोगी पुस्तक रही। यह वर्ष व्यंग्य उपन्यास की दृष्टि से उतना उर्वर नही रहा। राजीव तनेजा के व्यंग्य उपन्यास 'काग-भुसन्ड' को छोड़ दें तो कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यंग्य औपन्यासिक कृति मेरी नज़र में नही आई। हाँ बहुपठित उपन्यासकार-व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी का छठा उपन्यास 'स्वांग' इस साल राजकमल से आना संभावित था लेकिन नही आ सका शायद अब वह 2021 के पुस्तक मेले में आयेगा।

 

पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो कई पत्रिकाओं जैसे 'इण्डिया टुडे' के व्यंग्य वार्षिकांक ने काफी अच्छी सामग्री प्रस्तुत की। व्यंग्य की सदाबहार पत्रिका 'व्यंग्य यात्रा' तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने व्यंग्यप्रेमी संपादक प्रेम जनमेजय की वजह से संयुक्तांक निकालते हुए इस वर्ष को हँसते-हँसते विदा दी।

 

व्यंग्य साहित्य की दृष्टि से यह वर्ष काफी भरा-पूरा रहा। गुणवत्ता व परिमाण दोनों दृष्टियों से पिछले वर्ष की अपेक्षा व्यंग्यलेखकों ने आश्वस्त किया। ख़ासतौर से युवा रचनाकारों की वैचारिक जमीन, ऊर्जा और तैयारी देखकर खुशी हुई। अब इसका कारण लॉकडाउन के कारण इफ़रात में मिला काफी खाली समय रहा या कुछ और यह निश्चित रूप से नही कह सकता। लेकिन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक मुद्दों पर इस साल सबने जी भर कलम चलाई और क्या खूब चलाई। ऐसा नही है कि जितनी किताबें आईं सभी बेहतरीन रहीं लेकिन इस लेखे में वे ही किताबें शामिल की गयीं हैं जिनमे कुछ सार्थक लेखन देखने को मिला और जिन्हें पाठकों ने भी अपना भरपूर प्यार दिया | कुछेक संग्रहों ने मुझे काफी निराश भी किया | उनके नाम न लेते हुए बस यही सलाह कि किताब केवल अपने संग्रहों की संख्या बढ़ाने भर के लिए न निकालें बल्कि किताब ऐसी हो जो अपनी समृद्ध व्यंग्य परम्परा में कुछ न कुछ जोड़ती चले तभी आपका लिखना सार्थक साबित होगा | कुल मिलाकर कोविडग्रस्त निराशाजनक माहौल में 2020 व्यंग्य की दृष्टि से राहत भरा रहा। अब यह उम्मीदें कहाँ तक अपना असर छोड़ पाएंगीं यह तो आने वाला समय बताएगा। मुक्तिबोध की पंक्तियाँ हमेशा स्मरण रहे 'जो है उससे बेहतर चाहिए'। बेहतरी की यह तलाश अनवरत जारी रहे | आमीन |

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9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) सीतापुर 261203 (उ.प्र.)

Thursday, 3 December 2020

व्यंग्य में कैलाश मण्डलेकर - विनोद साव



‘बाबाओं के देश में’ यह व्यंग्यकार कैलाश मण्डलेकर के नए व्यंग्य संग्रह का नाम है। इसे बोधि प्रकाशन, जयपुर ने छापा है। कैलाश जी मध्यप्रदेश में खंडवा के निवासी हैं। वहॉ बी.एस.एन.एल. की संचार सेवा में अधिकारी रहे हैं लेकिन उससे भी बढ़कर वे हिंदी व्यंग्य के अधिकारी हैं और यहॉ भी वे पूरी तन्मयता और जिम्मेदारी के साथ खड़े हैं। वैसे भी अविभाजित मध्यप्रदेश को व्यंग्य की खूब उर्जावान धरती माना गया है जहां परसाई, शरद जोशी से लेकर आज तक साहित्य की कुछ बंजर धरती पर अपने पैने हल चलाने में जुटे हुए हैं। इनमें कैलाश मण्डलेकर हैं जिनकी व्यंग्य-विनोद से भरी रचनाओं की फसल ऐसे समय में लहलहा रही है जब व्यंग्य साहित्य जगत को सूखे से बचाने के लिए किसी हरेली सहेली योजना की जरुरत हो.

यह लेखक का चौथा संग्रह है। उनका पहला संग्रह ‘सर्किट हाउस में लटका चॉद’ ही उनकी संभावित विकास यात्रा की उम्मीदें जगा गया था। बहुत पहले मैंने व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी को नए लेखकों के बारे में पूछा था तब उन्होंने धीरे से कैलाश मण्डलेकर का नाम लिया था.. और यह धारणा कैलाश जी को मिले प्रथम ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान से और भी पुख्ता हो जाती है. यह सही है आज कैलाश मण्डलेकर की रचनाएँ साहित्य की सभी प्रतिष्ठित बड़ी पत्रिकाओं में छप रही हैं और बिना किसी समीकरणों के अपनी रचनात्मक प्रतिभा के बल पर छप रही हैं।

व्यंग्य लेखन में कैलाश की मुद्रा एक विनम्र प्रहारक की मुद्रा है। स्थितियों पर वे बड़ी विनम्रता से व्यंग्य करते हैं। हौले हौले प्यार से सहलाते हुए वे कब आक्रमण कर दें कहा नहीं जा सकता। उनकी अपनी एक भाषा है कहने की जिसमें वे पूरी तरह मौलिक और अलहदा हैं। शब्दों की सघनता है। विद्रूपताओं के आसपास अपने सघन और कलात्मक भाषायी संसार से वे अपना व्यूह रच लेने में समर्थ हैं और वह भी अपने सरस लेखन के जरिये जिसका आज के अधिकांश लेखकों में अभाव दिखता है। उनकी भाषा में आध्यात्मिकता का आस्वाद है. उन्हें मिथों का भी अच्छा ज्ञान है जिनका समुचित प्रयोग वे वर्तमान सन्दर्भ में कर लेते हैं. जिस तरह मुक्तिबोध की कविता में अनहदनाद गूंजता है कुछ ऐसा अनहदनाद अपनी भाषा साधना से कैलाश जी अपने व्यंग्यों में जन्मा लेते हैं और वह भी विनोदप्रियता के साथ. ऐसे विलक्षण प्रयोग उनकी रचनाओं में पसरे पड़े हैं.

संग्रह की शीर्षक रचना ‘बाबाओं के देश में’ उनका यह अध्यात्मिक स्वर व्यंग्य में और विशेषकर हास्य में देखें “हम जैसे निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों का बचपन तो इस शाश्वत धमकी को बालघुट्टी में पीते हुए ही गुजरा है कि ज्यादा शैतानी की तो बाबा पकड़ ले जाएंगे. इस देश की नौजवान पीढ़ी अपनी पैदाइश से ही बाबाओं से डरी हुई है. अतीत के बालमनोविज्ञान में बाबा की उपस्थिति या तो भयभीत करने वाली रही है या बंधी हुई मुट्ठी से रूपया गायब करने वाली. आज भी बाबा का नाम सुनकर स्मृति में एक ऐसी आकृति उभरती है जो भय और भीख के बीच झोली फैलाए, आंखें तरेरती हुई खड़ी है... कहते हैं पौराणिक काल में ऐसी रक्ताभ आंखें अपने तप के बल पर सैकड़ों मासूमों को भून चुकी हैं.”

प्राचीन कवि केशवदास तो बाबा संबोधन से चिढने लगे थे. उनके बाल क्या सफ़ेद हुए सुघड़ नायिकाएँ उनको बाबा कहने लगीं. ‘चन्द्र बदन मृग लोचनी बाबा कही कही जाय.’ जबकि देखा जाए तो कवि के सौन्दर्य बोध को वार्धक्य ने छुआ तक नहीं था. क्या पता दैहिक तौर पर भी तब पर्याप्त समर्थ रहे हों. कवि लोग वैसे भी कहाँ बूढ़े होते हैं. बाज दफे, बालों की सफेदी आदमी को व्यर्थ बाबा बना देती है.

भंगिमाओं और मुद्राओं के जरिये अपनी धौंस जमाने वाले साहित्य में उपस्थित प्रदर्शन कलाओं पर उनका व्यंग्य है “साहित्य में जब आटे और नमक के सन्दर्भ आने लगें तब घाघ किस्म के लेखक डिनर के बारे में सोचने लगते हैं तथा साहित्य की तरफ पीठ कर के चेलों की ओर मुखातिब हो जाते हैं, ताकि पता चल सके कि डिनर में क्या है. ऐसी नाजुक घड़ी में सबके साथ डिनर नहीं लेना है, क्योंकि आपकी व्यवस्था कमरा नंबर पांच में है. फिर पक्का गुरु एकादशी का बहाना कर के चुपचाप बताए गए कमरे में घुस जाता है. गुरु और शिष्यों के ऐसे अटूट गठबंधन ही समारोहों की जान होते हैं बाकी लोग सिर्फ विद्वान श्रोता की तरह कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हैं.’ (साहित्य में बाजार एक दिलचस्प खुलासा).

इन सबके साथ लेखक की कलम में कहानी कला है। कहन की कला उनमें उनके समकालीन रचनाकारों से भिन्न इसलिए भी है कि वे रंगमंचों में अभिनय भी कर चुके है। उनके वृत्तांतों में कथा रस है क्योंकि वे एक कथाकार भी हैं. वे अपने व्यंग्यों को भाषा के स्तर पर भले ही अलगा लेते हैं पर घटना वृत्तांत में कथारस की परंपरा को बनाए रखते हैं. इस वृत्तांत कथा में उनकी व्यंग्य की भाषा कुछ और भी चमक पैदा कर लेती है. ‘अगस्त में मरने वाले बच्चों के नाम’ रचना में वे हादसे की रामकथा सुनाते हैं “यूपी में भगवान से भी ज्यादा ताकतवर वह गैस वाला है जो अस्पतालों को ऑक्सीजन सप्लाई करता है. वह जिस दिन चाहे सप्लाई रोक कर किसी की भी जान ले सकता है. यह नया दौर है अब जीवन मरण की फिलोसोफी भी बदलनी चाहिए. यूपी में अब भगवान के हाथ कुछ नहीं रहा सब कुछ ठेकेदार और बिचौलियों के हाथ चला गया है. वहां आम आदमी के सांसों की गारंटी कुछ लोगों के कमिशन पर निर्भर है. सरकार कह रही है कि वह इन्सेफेलाटिस से वर्षों से लड़ रही है. ठीक है, लेकिन दिक्कत यह है कि इस लड़ाई में न सरकार हार रही है न इन्सेफेलाइटिस; हार रहा है गाँधी का वह अंतिम आदमी जो फ़िलहाल अस्पताल के गलियारे में अपने बच्चों के शवों के साथ निहत्था बैठा है.”

संस्कृति को लेकर अनावश्यक गौरव गान से हम अभिभूत हैं बजाय यह देखने के कि दूसरों की संस्कृति को जड़ बताकर आरोप लगाना आसान है और अपने जड़ संस्कारों से मुक्त होना कितना कठिन है। अपनी रचनाओं में लेखक आम आदमी के दैनिक जीवन के क्रम में उठे अनेक विरोधाभासों का निरंतर खुलासा करते हुए अपने नागरिक बोध का निरंतर परिचय देते चलते हैं. संस्कृति को लेकर हल्ला करने वाली सरकारें इन नागरिकों के प्रति दायित्व से कैसे मुकर कर किस तरह के ढकोसले करती हैं इन शब्दों में देखें “उनके मन में एक पापी विचार आया ‘सीनियर सिटीजन्स का प्रेम’ – यह वाक्य उन्हें उस वक्त भी सूझा था जब वे बजट भाषण सुन रहे थे, जबकि बजट में सीनियर सिटीजन्स के प्रेम की कोई चर्चा नहीं थी. क्या कोई सरकार इस दिशा में सोचेगी. सरकारें किस कदर शुष्क और प्रेम विरोधी हैं बगैर प्रेम के ही स्मार्ट सिटी बनाने की कल्पना कर लेती हैं. जबकि प्रेम के बिना तो पूरी बस्ती ही रुखी होगी. क्या रुखा होना ही स्मार्ट होना है.” (सीनियर सिटीजन्स का प्रेम).

संग्रह में ४६ रचनाएँ हैं जो अपनी सीमाबद्धता में एक ही आकार की हैं. क्योंकि यह अखबारी व्यंग्य लेखन है अपनी कैफ़ियत में लेखक ने यह खुलासा भी किया है इनकी संख्या अब तक १५० हो चुकी है और लेखन जारी है. इन व्यंग्य लेखों की प्रासंगिकता पर स्वयं लेखक को तो संदेह है ही नहीं बल्कि आलोचक व्यंग्यकार गौतम सान्याल ने भी इनकी दीर्घकालिकता पर इन शब्दों में मुहर भी लगा दी है कि “सार्थक स्तम्भ लेखन क्षण को चिरंतन में बदल देता है, दैनिक को दिनों में, अवसर को अवधि में, अब को पूर्वापर में, क्षणभंगुरता को टिकाऊ में तथा तत्पुरुष को कालपुरुष में. कॉलम लेखन को काल की कालबद्धता से मुक्ति दिलाते हुए कालातीत के उन्मुख परिसर में ले जाना होता है. एक सार्थक स्तम्भ लेखन में रोज की तारीख को तवारिक्ष (इतिहास) में ढालना होता है और स्तम्भ लेखक नियमित प्रतिदिन ऐसा करता है.”

जिन्हें अखबारी लेखन कहकर उड़ाया टरकाया जाता रहा है उन्हीं अखबारी व्यंग्यों ने हिन्दी व्यंग्य के दो दिग्गजों परसाई और शरद जोशी को साहित्य जगत में स्थापित कर दिया... और इनकी देखा देखी में अखबारों में स्तम्भ लिखने की होड़ मच गई. रचना केवल रचना के स्तर पर ही देखी जाए तो उनके निज वैशिष्ट्य के और भी रास्ते खुलते हैं. कैलाश मण्डलेकर ने अपने स्तम्भ लेखन के जरिए कुछ ऐसे ही प्रमाण इन रचनाओं में पुख्ता तौर पर दिए हैं.

यद्यपि अधिकांश व्यंग्यकारों की तरह वे भी समकालीन संदर्भां से अपनी रचनाओं का प्लाट तैयार करते हैं पर उन्हें घोर सामयिक होने से बचाकर रचना को दीर्घकालिक बनाने का कौशल वे दिखला जाते हैं। उनकी लेखन क्षमता में रवीन्द्रनाथ त्यागी, के.पी.सक्सेना और लतीफ़ घोंघी की तरह ‘विट भरपूर है.

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मुक्तनगर, दुर्ग 491001, मो. 9009884014

Saturday, 7 November 2020

सरोज सिंह के कविता संग्रह पर कुसुमलता पाण्डेय की समीक्षा

शब्दों की क्यारी में/अनायास ही छींट दे/कोई उदास मन/भावनाओं के बीज/तो बिखर जाती हैं/कविता की नर्म महक।ऐसा मेरा मानना है और कदाचित कवियत्री सरोज सिंह भी मेरी इन पंक्तियों से पूर्णतया इत्तेफाक रखती है क्योंकि उनके नवीनतम कविता संग्रह "तुम तो आकाश हो" मे इन पंक्तियों की परछाई स्पष्ट परिलक्षित हुई हैं। युवा कवियित्री के इस संग्रह की कविताएं घोषणा करती हो मानों कि मेरा जन्म अन्तर्द्वन्द्व की कोख से हुआ है। बदलाव की गंध लिए संग्रह इस तथ्य का स्वमेव प्रमाण बन पडा हैं कि कवि अमूर्त कल्पनाओं की विथियों मे उपजे मनोसुख का शिकार नहीं है।यह परिस्थितियों से संघर्ष या यथार्थ के सरोकारों की टकराहट से व्युत्पन्न हुई हैं और ये जीवन मे फैले पडे अथाह धूसर सन्नाटे की ओर झांकने का मौका दे जाती हैं। कविताओं में नए बिम्ब गढने मे कवियित्री ने काबिलेतारीफ श्रम किया है। "मैं बांट जोहू सूर्य का" कविता से दृष्टव्य हैं-: निराशा के मसान मे/चिंता चिताओं सी जल रही/जिजीविषा हाथ मल रही/अंधियारा जो छंटता नही/मैं बाट जोहू सूर्य का/आशा के नव विहान मे।"

            संग्रह की एक लम्बी कविता "गृहस्थी की कांवर मे" कवियित्री की चाह समय की जायज मांग है। हमनें अब तक पुरूष के पुरुषत्व से स्त्रीत्व मिलते देखा है। कविता का गणित देखे-: तुम अपने भीतर के छिपे स्त्रीत्व क़ो/मेरे भीतर के छिपे पुरूषत्व से मिला दो/क्योंकि,, शिवालय मे बैठे उस अद्धनारीश्वर को/यह जलाभिषेक, तभी पूर्ण एवं सफल होगा। "प्रतिध्वनित स्वर" कविता में लिखा गया है "मैं अब भी अबोध सी/खडी हूँ उसी शिला पर/कि कभी तो/प्रतिध्वनित स्वर/मेरे मौन को/मुखरित करने/पुनः आवेगे।"चिरप्रतीक्षा को बिषय वस्तु बनाकर आधुनिक खांचे मे नाप के अनुरूप फिट बैठते मनोरम बिम्ब का प्रयोग हुआ है। "इक ख्वाब संजोया हैं मैंने" मे कवियित्री अपने प्रणय साथी को सुख और बेहतर देने को संकल्पित हैं:- "हालात से मिले दो सिक्कों से दो ही रुत मुझे मोल मिले/इक पतझड़ मै रख लूगी,दूजा बसंत वो तुम चुन लेना। "इसी भाव को दोहराती"कह देते मुझसे एक बार"कविता संग्रह मे संकलित हैं।सम्बन्धों को सहेज लेने की परवाह दृष्टव्य और प्रशंसनीय है।"सम्बन्धों को सहेज लेने की परवाह दृष्टव्य और प्रशंसनीय हैं।"सम्बन्धों के मंथन मे/सदा अमृत ही चाहा तुम्हारे लिए/किंतु अमृत पान कहाँ सरल है गरल के बिना/कह देते मुझसे एक बार, मै उपलब्ध थी आचमन के लिए।

            "इंतजार"कविता में शब्दों की तूलिका के स्पर्श ने दिलकश चित्रात्मकता उडेली है।"अक्सर इंतज़ार की दहलीज पर/अपनों के लौट आने का/होने लगता है एतबार/जैसे कि जाती हुई नदी/आती हूँ कहकर/पर्वत, घाटियों से होती हुई/फिर लौट आती हैं सावन मे।प्रकृति के यथार्थ परक बिम्ब कविताई सलीके से कविता "बूदें"मे देखने को मिला है।:-किन्तु हमारा मौन/मेरे सम्मुख रच देता है/इस नेह को निहारता सूरज/समेट लेता है/अपनी तीक्ष्ण किरणें।प्रकृति से सम्बद्ध कोमल बिम्बों की प्रचुरता से रसासिक्त कविता"तसब्बुर तेरा"मुग्ध कर जाती हैं:-मगर जेहन के /किसी तंग सी गर्त से/रूह की सतह पर/टप..टप..टप/रिसता रहता हैं/अब भी/तसव्वुर तेरह।"हे शव्द शिल्पी"कविता में देखे तो कवियित्री की चिंता जायज कही जाएगी कि कही संवेदनशील कवि मन नायिका के भाव के प्रति अगम्भीरता वश न्याय नहीं कर सके।सच ही तो हैं प्रेम मन का वह कोमल भाव है जिसकी अभिव्यक्ति भी उतनी ही संवेदनशील  ता मांगती है।

             "तलाश" व "रामस्पर्श"मे जीवन जितना दिखाई दे रहा है उससे कहीं ज्यादा अव्यक्त है।स्त्री जीवन से सम्वद्ध बारीक व सुकोमल तन्तुओं की नब्ज कोकविता"मेरी मुक्ति का दिवस"सधे शव्दों मे छू जाती हैं।:-इस जीवनधारा मे/एक क्षण ऐसा आएगा/जब,तुम्हें मेरा स्मरण होगा/तब तुम, मेरे संजोए/किसी एक स्वप्न को/याद कर लेना!"प्रिय"एक लम्बी कविता है जो स्त्री जीवन की तल्ख और भयावह विडंबना उजागर करती हैं।:-"उन रंगों ने उसे, लड़की से/ज्यामिति बना दिया/जिसे केवल/जांचा,नापा,परखा जा सकता है/उसे अब लडकी बनने नहीं देता/उस भयावह घटना को/वो वक्त की खिडक़ी से/परे ढकेल देना चाहती है/पर समाज और हालात।ब्लात्कार औरत के जीवन की वह पीड़ा है जिसे सिर्फ उसे इसलिए भोगना पड़ता हैं कि वह औरत है।जिसके बाद प्रतिकूलता से लड़ने का साहस चुकता जाता हैं औरबंदरंग,उदास, निराश जीवन उसे पल-पल मुंह चिढाता हो जैसे।न्याय व्यवस्था की मंथर गति को कविता की बुनावट मे अपने बिषय की गम्भीरता से चिंतित करती कविता है।

             मां अब घरों में चौखट नहीं होती/इसलिए अब वे मजे से लांघ जाती हैं एवरेस्ट भी।"चौखट कविता में कवियित्री मां की चिंता(बेटी को ठोकर लगने की)चौखट न होने का हवाला देते हुए निराधार ठहरा देती हैं।"अल्कॉहलिक"कविता शराब की गिरफ्त में जकड़न का हाल सुनाती हैं।"मन के फागुन से लाइव 1":-खांटी गंवई फागुन कवियित्री के मन में जीवित प्रकृति चित्रों के माध्यम से कविता में जीवन्त कर दिया।वहीं"मन के फागुन से लाइव-2":-इससे अछूता हैं।यह बसंत और फागुन को गांवों तक सीमित रख छोड़ती है क्योंकि शहर की आबोहवा ऊंची इमारतों के कारण फगुनाहट की मदिर छुअन से अस्पर्शित रह जाती है और हम औपचारिक फागुन के होकर रह जाते है।कविता में कवियित्री की संवेदना फागुन के साथ हो ली।-:वो उठकर/हमारी जानिब भी आती हैं/देने संदेशा फाग का/मगर शहर की/ऊंची मीनारों से टकराकर/मायूस लौट जाती हैं।"ऐ ताज,तुझे कुछ इस नजर से देखा है मैंने":-मे कवियित्री ने ताज को वाकई अलहदा और काविलेतारीफ निगाहों से देखा।"अब जो देखा तो/उसकी मरमरी दीवारों को सहलाकर/उनके रुखसारो मे उभरी/खराशो का एहसास किया है मैंने।"कविता में वर्णित रुखसार दरअसल उन महबूबाओं के हैं, जिनके प्रेमियों(संगसाज)के हाथ ताज को बनाने में खुरदुरे हो गए।अपने खुरदुरे हाथों से प्रेमिका के गालों को छुआ तो वो खुरदुरे हो गए।ताज के रूप मे अपनी प्रियतमा को अनमोल भेंट देने की चाह ने कितनों की प्रिया के गालों मे खुरदुराहट भर दी।

            सरहद(बाडमेर)मे कवियित्री ने सुनहरी जमीं की लाली की वजह टटोली हैं चूंकि कवियित्री के अनुभव में निजी कारणों से सैन्य जीवन सम्मलित हैं अत:कुछ एक कविताएं देश की बात करती हैं।इसमें "सरहद की बाड़"।"करवां चौथ"व "केयर टेकर"को प्रमुखताके साथ सम्मलित किया गया है।"इज्ज़त का पैमाना'संग्रह में स्त्री जीवन की घिनौनी और तल्ख सच्चाई को बयां करती हैं।वही" दूब हूं मैं"में दूब जैसी छोटी चीज को बिम्ब के रूप में रखते हुए औरत की उपेक्षा की कहानी कहती हैं।"समानांतर फैलना भाता है सभी को"/किन्तु ऊपर उठना नहीं सुहाता किसी को।"फलसफा जिन्दगी का"जीवन से स्वतंत्रता व स्पेस मांगती है।"जिन्दगी वो गुल है जो गुलदस्ते मे नहीं खिलता मन बावरा वो पंक्षी हैं जो पिंजरे में नहीं मिलता।"कुचलों या कुचले जाओगे"-:मैं बेशुमार इन्सानी भीड़ के मध्य निष्ठुर प्रतियोगिता का निर्मम व दारूण दृश्य अभिव्यक्त हुआ हैं।"जरा देखो तो/किसको कुचल रहे हो/नजरें ज्यों ही झुकाई/तो देखा,हम जिस्मों पर चल रहे है/सर-ए-राह को मकतूल कर रहे है।आलिम इन्सानों के बनाए इस फलसफे पर तीक्ष्ण व्यंग्य हुआ है।"भीड़ तो चीटियों की भी होती हैं/पर वो कतार बांध चलती है/कुचलो या कुचले जाओगे/ये फलसफा आलिम इन्सानों ने बनाए है।

              जो किसान अपने खेतों में पसीना बहाते रहे अलाभकारी हो चुकी खेती अतिक्रमण की भेंट चढ़ गई तो अपने ही खेतों में मजदूर बन गए खेतिहर के पक्ष में खड़ी कविता"उनके माथे का अरक कहती है।"उनके हाथों में/ बीज और खाद नहीं/रेता बजरी के तसले होते है/नहीं कुछ बदला तो ये कि/अब भी उनके माथे का अरक/ढलता हैं टकसालों मे।" "चीख कविता में कवियित्री की दिलीख्वाहिश है कि वह गरीब उपेक्षित, लाचार, दबे कुचले, शोषित लोगों की पीड़ा नज्म से बनी मिट्टी की गुल्लक मे भरकर बस्ती के चौबारे पर फोड़े ताकि "यकीनन इन बेसुध जिस्मों में/कुछ हरकत तो होगी/कुछ हरारत तो होगी।"हादसे की रिपोर्ट"प्रकृति के कोमल बिम्ब मे गुंथी कविता इन्सान के सुख-दुख में आत्मकेन्द्रिता व स्वार्थ प्रियता को रेखांकित करती हैं।अपनों से दूर हटकर जैसे उसके सारे सरोकार दम तोड़ चुके है।"मैं झट सहमकर/खिडक़ी को परदे से ढक देती हूँ/और जेहन से यही आवाज आती हैं/"थैंक गॉड"उनमे मैं नहीं।मेरा अपना कोई नहीं था।"बिवाइयां"व महाभारत को अच्छी कविता की फेहरिस्त में शामिल करेंगे।"केयर टेकर"में उस घिनौने यथार्थ को चिन्हित किया गया है कि जिन हाथों में देश की बागडोर हैं वो स्थिति की प्रतिकूलता का फायदा, किस प्रकार से खुद की जडों को मजबूत करने के लिए कर रहे हैं।उन्हें देश की खोखली हो रही जड़ों से कोई सरोकार नहीं है।अलवत्ता केयर टेकर इस मौके को भुनाना बाखूबी आता है।

           इन्सान ने प्रकृति को अपने रवैये से खुद के ही प्रतिकूल खड़ा कर लिया है।कुल मिलाकर कहेगें हम मूर्ख कालीदास बन गए है,जो जिस डाल पर खड़ा है उसी को काट रहा है।"आदम की आमद से पहले"कविता कहती हैं।"जमीं धूप मांगती है/तो वो,बारिश देता है/आंसमां सब्जा मांगता है/तो जमीं सहरा दिखाती है।"खिलौने"में कवि मन बुजुर्ग के उस मासूम बचपन की ओंर अनायास ही बढ़ चला है जहां पर उसे वर्तमान दौर के खिलौने से बढती हिंसात्मक वृत्ति की वनास्पति ज्यादा मासूमियत और निश्छलता देखने को मिली।"मांजी के सहेजे खिलौनों को/वक्त, अपनी दुकान पर/मरम्मत कर/रंग रोगन कर/वर्क लगाकर/चाहे जितना दिलकश बनाकर पेश करें/आज इलेक्ट्रॉनिक्स के बाजार में/उसकी कोई कीमत नहीं लगती।"कविता में मांजी के माध्यम से वृद्दों की उपेक्षा के अर्थ की नई पर्त भी खुलती है।"औरत देह और जोर-जबरदस्ती"कविता में शहरीकरण के बढ़ते प्रभाववश छोटे घरों में दादी नानी की कहानियों से वंचित रहकर, वह संस्कार और सम्बन्धों से अनभिज्ञ रहे।परन्तु एक प्रकार के जबरिया अंतरंग पलों को देखते हुए समय से पहले बडें हुए बच्चे"स्त्री उपभोग की वस्तु है"जैसी कुत्सित धारणा बना बैठते हैं कविता नपे तुले शब्दों में कहती है:-"उनका बचपना जवान नहीं हो पाता।पर बचपन में वो जवान हो जाते है/अब वो कुछ बातें/गलत तरीके से बहुत सही समझते है/औरत देह और जोर-जबरदस्ती।" "पतंग हूँ मैं"उस स्त्री को केन्द्र में रखकर बुनी कविता हैं जिसके जीवन मे सतही खुशी तो शुमार है पर आन्तरिक तहों मे अवसाद के सैकड़ों रेशे व्याप्त है।इस कविता में स्त्री अंतर्यात्रा पर निकल पड़ी हो मानो।पांव नंगे चप्पल हैं सिर पर मे उम्र भर जिस औरत ने नंगे पांव बोझ ढोते काट दी हो।कमाऊ बेटे की लाई चप्पल भी उन पांवों मे बोझ बन जाती हैं।जिसे वह बेटे का दिल रखने के लिए पांवो मे डाल तो लेती है।किन्तु:-रोज घर से निकलती हैं चप्पल पहनकर/कुछ दूर चलकर चप्पलों को धर लेती है सिर पर।

          कवियित्री की संवेदना मे इन्सान के साथ साथ बेजुबान पशु को भी उसी शिद्दत से स्थान मिला है।"विसुखी गइयां"में गायों की दुर्दशा का मार्मिक चित्र देखने को मिला है।जिस देश मे गायों को मां का दर्जा मिला है, वर्तमान में उन्हें किस रुप मे उपयोग किया जाता हैं।कवियित्री कहती हैं:-वर्तमान उसे/देह व्यापार के लिए?कत्लगाह का रास्ता दिखाता है।" "हे सीते"कविता में कवियित्री जायज प्रश्न उठाती हैं:-"फिर दोनो की संप्रभुता में/इतना अंतर क्यों हुआ?प्रभु ने स्पर्श किया/तो "अहिल्या त्राण"हुआ।फिर तुम छू गई तो/क्यों अग्नि स्नान हुआ।"सम्बन्धों का विश्लेषण"ईमानदार आत्मस्वीकृति से पगी सम्बन्धों पर केन्द्रित अच्छी कविता है।कविता प्रश्न करती हैं कि अपने अपने विशेषण से चिपके रहकर उपयुक्त संज्ञा की तलाश कैसे हो सकेगी।"रिपोर्टर"कविता कहती हैं कि जिस तत्परता के साथ परिस्थितियों की भयावहता को नजरअंदाज करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करता है।:-"उसने रिपोर्टर होने का फर्ज निभाया/बाकियों को/आदमी होने का फर्ज निभाना था।"

         " बड़ा आदमी", "मन के आंगन में", "सूरज", "तर्जुबा नीम का"संग्रह में संकलित इन कविताओं में जेहन में बर्षों तक ठहरने का आकर्षण और क्षमता दोनो हैं।एक और लम्बी कविता"न्याय की देवी"न्याय व्यवस्था में व्याप्त घनघोर भष्टाचार व मंथर गति का बड़े ही सशक्त अंदाज में प्रभावकारी चित्र खींचती है।"करवाचौथ"कर्तव्य को सर्वोपरि ठहराती हैं।जो देश के प्रति उसकी रक्षा मे खड़ा फौजी है। "रिश्ते व प्रेम" में एकरसता भरे माहौल से निकलकर रिश्ते घुटन से मुक्ति पा सकेंगे और तभी घुट-घुटकर जीते प्रेम में रवानगी आनी हैं। "एक चाक के माटी हम सब" चाक की माटी के बहाने कवियित्री ने लड़की की नियति को कविता में स्थान दिया है।:- एक चाक की माटी हम सब /कुछ गढी कुछ टूट गई।" "वही मेरा गांव"कविता के माध्यम से कवियित्री पाठक के मानस तक अपने प्रिय गांव को पहुचाने मे कामयाब रही है।

           कुल मिलाकर देखे तो "तुम तो आकाश हो" संग्रह में संकलित कविताओं से गुजरना सचमुच एक सुखद अनुभव की तरह है। जो विभिन्न भावभूमि को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं परन्तु इनमें प्रतिबिंबित हुआ मूलस्वर एक ही है। बड़े वितान को उठाती कविताएं कुछ सपने जो राख होने से बचे रह गए, अपनी धूप छांही से हमें निराशाबोध से बचा लेती है। सहज अंदाज में गहरे व सधे हुए तथ्य इन कविताओं में दर्ज हुए हैं । इसलिए यदि कहे कि साहित्य की इमारत के भीतर नये सूरज की रोशनी बनकर इस संग्रह का आगाज़ हुआ है तो शायद यह अतिशयोक्ति न होगी।

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कविता संग्रह- तुम तो आकाश हो

कवयित्री - सरोज सिंह

प्रकाशक - हिन्द युग्म, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष - 2015

Wednesday, 28 October 2020

सुधांशु पन्त की कविताएँ

 

'अभिप्राय' के इस अंक में प्रस्तुत हैं युवा कवि सुधांशु पन्त की कुछ नयी कविताएँ -


कागज पर हिमालय

 

आप पद के योग्य हो,

या फिर अयोग्य।

काम आता हो,

या न आता हो।

 

निष्ठा, नैतिकता, संवेदनशीलता,

शब्द आपके शब्दकोश में न हो।

कुछ फर्क नहीं पड़ता,

बात सच मानिये।।

 

ज़नाब चलेगा,

चलेगा क्या दौड़ेगा।

अगर खड़ा कर लेते हो,

कागज पर हिमालय।।

 

 

रोटियां

 

आप से बड़ा,

कोई खुशनसीब नहीं।

अगर आप सिर्फ,

कागज़ पे ग़रीब हो।।

 

आप से बड़ा,

कोई बदनसीब नहीं

अगर आप सच में,

कोई गरीब हो।।

 

अगर ऐसा है तो,

हमेशा तैयार रहो।

तुम्हारी अर्थी की आग में,

सिकेंगी सियासी रोटियां।।

 

 

वृद्धाश्रम

 

जिन माता -पिता ने गुजारी,

अपनी सारी उम्र।

अपनी औलादों की,

अच्छी परवरिश में।।

 

गाड़ी दी,बंगला दिया,

अच्छा बैंक बैलेंस दिया।

और भी बहुत कुछ दिया,

सिवाय संस्कार के।।

 

ऐसे ही माता -पिता से,

भरे हुए हैं।

सारे के सारे ,

शहर के वृद्धाश्रम।।

 

 

बेरोज़गार

 

जो योग्यता में,

और अनुभव में।

हर तरह से ,

तुमसे है अट्ठारह।।

 

वो भी देते हैं,

एक से बढ़कर एक।

हजारों नायाब नुस्ख़े,

जीवन यापन के।।

 

जब तलक तुम्हारी,

जेब रहती है हल्की।

और तुम होते हो,

महज एक बेरोजगार।।

 

 

संक्रमण

 

अबकी गाँधी जयंती पर,

गाँधी के बंदरों ने।

खा लिया गलती से,

नेताओं का जूठा अल्पाहार।।

 

नेताजी का जूठा,

जाहिर है।

संक्रमण तो होना था,

और हुआ भी।।

 

मुनाफा न हो तो अब,

पहले वाला देखता नहीं।

दूसरा वाला सुनता नहीं,

तीसरा वाला बोलता नहीं।।

 

 

संज्ञा

 

जन्म लिया तो,

रामदुलारे की मुनिया बन गयी।

कुछ बड़ी हुई तो,

पप्पू की बहनिया बन गयी।।

 

ब्याह हो गया तो,

संजय की बहुरिया बन गयी।

संतान को जन्म दिया तो,

छोटू की अम्मा बन गयी।।

 

अपना तेरा नाम तो,

कभी आया ही नहीं।

जीवन से मृत्यु तक,

तू केवल संज्ञा बन गई।।

 

 

मीडिया

 

बेसिर-पैर की ख़बर को

प्रमुखता से दिखाती

जो दिखाना चाहिए

उसको कुशलता से छिपाती

 

चौथाई समय विज्ञापन

चौथाई समय फ़िल्मी नंगापन

चौथाई समय ज्योतिष चर्चा

बाकी चौथाई मसखरे बुलाती

 

टीआरपी के मकड़जाल में

फँसकर अपनी नैतिकता खोती

ऊँची बिल्डिंग के एक कोने में

मीडिया की आत्मा है रोती |

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सुधांशु पन्त S/o श्री ललित चन्द्र पन्त

जन्मतिथि- 07/05/1980

शिक्षा- परास्नातक- मानव विज्ञान, पत्रकारिता एवं जनसंचार, इतिहास, शिक्षाशास्त्र (नेट)

रुचियां- भ्रमण, साहित्य अध्य्यन, लेखन

सम्प्रति- सहायक अध्यापक, बेसिक शिक्षा परिषद, उत्तरप्रदेश

संपर्क सूत्र- 9506082992, pant.sudhanshu80@gmail.com

पटना में अरुण कमल

संस्मरण   मखनियां कुंआ रोड़ … पटना में इतवार की एक सुबह इस रोड़ को मैं ऐसे तलाश रहा था जैसे कोई बच्चा दूसरे के बस्ते में अपने लिए कलम खोज रह...