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Monday, 19 September 2016

मेरी किन्नौर और स्पीती यात्रा : कमलेश पाण्डेय

प्रकृति से मनुष्य का आत्मीय साक्षात्कार 


किन्नौर और स्पीती की यात्रा निश्चित तौर पर प्रकृति से एक बेहद आत्मीय साक्षात्कार है. यों सभी यात्राएं ऎसी ही ही होती हैं पर अपनी धरती का ये अनोखा रूप आप में ठहर जाता है, आपको उफ़ कहने को मज़बूर न कर एक शांत-चित्त सी अनुभूति या कहें तृप्ति देता है. रास्ते की दुरुहता से चाहें तो जीवन दर्शन के सबक लें, पर ये तय है कि सकारात्मक वृत्ति और एडवेंचर की ललक के बिना ये यात्रा नहीं की जा सकती, बल्कि थोड़ी सनक भी इसमें शामिल हो तो क्या कहने. इस यात्रा में आप धरती की अंदरूनी करवटों से चरमराते पहाड़ों के उठान-ढलानों पर रेंगती सड़कों को पहाड़ों से ही एकाकार देख खुद को पहाड़ों की गोद में खेलता महसूस करेंगे,  या फिर नीले झक्क आकाश में उजले बादलों के साथ खेलते सूरज को हैरत से देखेंगे कि ये आपके शहर में आपको रोमांचित क्यों नहीं करते या फिर अपनी दीवार पर टंगी महँगी लैंडस्केप पेंटिंग के लाखों संस्करण मुफ्त आंखों के आगे बिछे देख आप कुदरत के गतिमान रंगों के पैटर्न को सुकून से निहारते –क्लिक करते वक़्त बिताते सोचेंगे कि वही आप अपनी रूटीन ज़िन्दगी में कैसे बौखलाए-से वक्त को पकड़ने की जिद में खुद भी भागते रहते हैं. क्या इस ज़िन्दगी को भी प्रकृति की दुरूह लगती मगर खूबसूरत उठानों-ढलानों की तरह समन्वित कर नहीं जिया जा सकता? इस सकारात्मक मनोवृति के बिना किन्नौर के रास्तों पर नहीं चला जा सकता जहां कुछ-कुछ दूरी पर बोर्ड घोषणा करते रहते हैं कि सावधान आगे सडक बेहद ख़राब है और ऊपर से पत्थर गिरते हैं (अब देख लो जी, आगे जाना है या..). और वाकई गिरते हैं. कई बार पूरी की पूरी सडक ऊपर से नीचे पसर आये पहाड़ की ज़द में आ जाती है और नदियों की तरह सडक को भी रास्ता बदलना पड़ता है. हम तीन चार बार ऊपर से आये पत्थरों के कारण रुके रास्ते पर फंसे पर बी आर ओ को सलाम जिनकी मशीने तुरंत रास्ता साफ़ करने के काम में जुट जातीं.

यहाँ ‘हम’ मेरा छोटा सा परिवार है – मैं श्रीमतीजी और हमारा बेटा- जिसने हमें किन्नौर और लाहौल स्पीती की यात्रा करने को उकसाया है. हम एक गाड़ी जिसे एसयूवी कहने का चलन है, पर सवार हैं जिसको अशोक नाम का पूरी तरह  सकारात्मक वृत्ति वाला हंसमुख आदमी चला रहा है. हम कुछ उत्तेजित से हैं कि रामपुर बुशहर पीछे छोड़ते ही बदले हुए दृश्य से हिमालय की सबसे ऊंची वादियों में तीन पर्वत-श्रृंखलाओं से घिरी खूबसूरत घाटियों में बसे किन्नौर की गंध आने लगी है, जो इंटरनेट पर देखी तस्वीरों से आगे सपनों में बसने वाले किसी गाँव जैसा होगा ऎसी आशा जगा रहा है. इस उम्मीद में किन्नर-कैलाश की चोटी पर विराजे साठ मीटर ऊंची खडी चट्टान की शिवलिंग में अपनी छवि दर्शाते महादेव शिव के दर्शन भी शामिल हैं.

जैसे जैसे आगे बढ़ रहे हैं, ढलान से जैसे कदम दर कदम उतरती हरियाली, चमकीले छप्परों से आभासित होते नन्हें-नन्हें गाँव, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ सेबों के बागीचे और सीढीनुमा खेत दिखने लगे हैं. ऊपर झक्क नीले आकाश से कभी भालू, कभी खरगोश बन कर बादल बर्फीली चोटियों के कन्धों पर कूद पड़ते हैं या अक्सर यूं ही बादल अलसाए से उनपर लदे हैं. जून के महीने में एक ठंढा मीठा अहसास. स्वर्ग के कई रूप हैं हमारी धरती पर, पर वहां तक पहुँचने के रास्ते भी उतने ही कठिन. एक दम शास्त्रों में बताये गए जैसे. सतलुज, बसपा और स्पीती नदियों की ये घाटियाँ अपनी बनावट में अनोखी हैं. बर्फीले रेगिस्तान का हिस्सा होते हुए भी इनमें हरियाली और नरमी का आभास होता है. तीनों नदियाँ पहाड़ों की चट्टानों और भुरभुरी मिट्टी को चीरती मटमैली होती हुई सांप की चाल से नीचे उतरती हैं. आदमी ने जहां तहां इन्हें बाँध कर इनके बल निकालने की कोशिश की है. पर रुकती कहाँ है नदी. सलीके से पहाड़ों को तराशती है, आदमी से उलट जो अपना रास्ता बनाने के लिए बारूद से उड़ाता है थोडा-थोड़ा और बारूदों की ये धमक बस जाती है पहाड़ की छातियों में उसे रह-रह कर स्खलित करती.

अब यात्रा वृत्तांत अपने परम्परागत अंदाज़ में-

किन्नौर की ऊँची चोटियों को गर्दन उचका कर देखने का आन्नद और आतंक मन में लिए हम खुद को दुनिया की सबसे धोखेबाज़ (treacherous) सडक बताने वाले रास्ते से होते १० घंटों में शिमला से सांगला पहुंचे तो शाम ढल रही थी. किन्नौर की इस ख़ूबसूरत घाटी को घेरे खड़े पहाड़ों पर रौशनी और छाया का परम्परागत खेल चल रहा था. ये रोमांच किन्नौर की धरती पर होने भर से इस नाम से जुड़े तिलिस्म का भी था. इस जादुई सौन्दर्य वाली धरती के निवासी महाभारत कालीन किन्नौर में पांडवों को अज्ञातवास के सबसे रोमांटिक दौर में शरण देने वालों के वंशज हैं इस पौराणिक तथ्य के अलावा ये भौगोलिक तथ्य भी रोमांचित करता कि भारत से तिब्बत जाने वाले इस ऐतिहासिक मार्ग पर हाल तक सैलानियों के लिए परमिट लेना अनिवार्य था. रामपुर बुशहर से आगे चलते ही नज़ारे बदल गए थे. वांगतू पुल से किन्नौर जिले की सीमा शुरू होती है तो वहीँ करछम में बसपा का सतलुज में विलय होता है. आगे बसपा के साथ-साथ सांगला की चढ़ाई. ढाई हज़ार मीटर की औसत ऊंचाई और इतनी हरियाली. स्वच्छ चमकते नीले आकाश से नज़रें हिमशिखरों पर टिकतीं और घाटी में बहती नदी से मिलने को इठलाती हुई उतरती पतली-पतली धाराओं के साथ खुद भी उतर जातीं. इस प्राकृतिक सौन्दर्य का कहाँ तक बखान हो. बस समझ लें आँखें निर्मल हो जाती हैं. किन्नौरी स्त्रियों का सौन्दर्य भी मशहूर है, पारंपरिक परिधान में एक ख़ास तरह की टोपी और तीखे नाक-नखश से अलग ही पहचानी जाती हैं. सांगला से 14 किमी दूर रक्छम में रुकना था सो इस खूबसूरत शहर को नज़र भर देख कर हम आगे बढ़ गए. इस धूल-धूसरित सड़क से गुजरते हुए घाटी भी साथ-साथ ही चलती रही. पर टूटी सड़कों से उलझते चलने में वक़्त इतना लगा कि अँधेरा हो गया. उसपर बूंदा-बांदी भी शुरू. टिमटिमाती रौशनी में घाटी के विस्तार का अंदाजा लगाते बसपा नदी ही हहराती धारा की गूँज में लोरी सा सुनते बेहद थके हुए हम सो गए.

सुबह आँख खुली तो बाहर दिख रहे नज़ारे ने कल की हाड-तोड़ यात्रा का मकसद एकदम समझा दिया. बेशक किन्नौर एक सुन्दर पर्यटन स्थल है पर यहाँ तक आने को एक सुखद पर्यटन अनुभव-भर मान लेना सही नहीं होगा. ये तो एक एडवेंचर है. पहाड़ों को तराश कर बनाई गई डरावनी सुरंगनुमा सड़कों पर से गुजरते हुए गाडी की ह्चक के साथ आपकी चूलें भी हिलती चलती हैं पर सडक से नज़र हटा कर  नजारों पर ले जाओ तो आँखें वहीँ थमी  रह जाती हैं. बस्पा नदी ने दोनों ओर आसमान छूती चोटियों को भरसक हरे दुशाले उढा रखे थे. बर्फीली चोटियों से ऊंचे देवदार के पेड़ों की ढलान पर फिसलती हरियाली नन्हीं-नन्ही धाराओं में बंट कर पत्थरों पर शरारती बच्चे सी उछलती नदी प्रकृति की एक नायाब कलाकृति थी. दृश्यों के बारे में लिखते हुए दोहराव ज़ुरूर महसूस हो सकता है पर वहां उन्हीं पहाड़, झरने, नदियों और एक शीतल तृप्तिकारी अनुभूति में प्रतिपल एक नयापन था.

थोड़ी देर बाद रक्छम से और ऊपर छितकुल जाते हुए पूरी राह हम नजारों पर नज़रें टिकाये रहे तो वहां पहुँच कर मानों रोमांच की चरम अवस्था में पहुँच गए. ये एक घाटी का ‘पिक्चर-परफेक्ट’ था- प्राकृतिक सौन्दर्य के सभी उपकरणों को इतनी दक्षता और परिपूर्णता से संयोजित किया गया था कि वास्तविक होने पर संदेह हो जाए. इसे सैलानी अपने ढंग से भारत का स्वीटज़रलैंड भी कह लेते हैं, पर मैं ऎसी तुलनाओं से बचता हूँ. आकाश छूते पहाड़ों की गोद में तिब्बत सीमा पर हमारे देश का नन्हा सा आखिरी गाँव. नदी, पर्वत और आकाश के अनंत विस्तारों के बीच आदमी की जीवट भरी उपस्थिति का प्रतीक. अगले कुछ घंटे हमने इस उहापोह में बिताया कि इस जगह पर किस-किस कोण से फोटोग्राफी की जाय. जिधर कैमरा घुमाते, लेंस उसी फ्रेम को चूम लेता. आखिर हमने उसे खुली छूट दे दी.

अब तक कुछ थकी और ज़रा उदासीन सी श्रीमतीजी भी मोबाईल से अपनी फोटोग्राफी के पैतरे आजमाने लगीं. सेल्फियों के तो ढेर लग गए. पत्थरों पर बस्पा की छलछलाती धारा के साथ, पीछे घाटी के लम्बे विस्तार को रख कर, छितकुल के स्कूल और इमारतों को पहाड़ों की पृष्ठभूमि सहित और नीले कनवास पर दूधिया बादलों के बेतरतीब पैटर्न. छितकुल मन के अलबम में कई पन्ने घेर कर बैठ गया. लौटते हुए आईटीपीबी के एक जवान ने लिफ्ट ली तो ये जान कर सुखद अहसास हुआ कि उन्हें और उनकी यूनिट में तकरीबन सभी को यहाँ की पोस्टिंग बेहद पसंद है.

करछम तक दुबारा उसी रास्ते लौटते हुए दोहराव का कोई अहसास नहीं था, सिवा इस तथ्य के कि रास्ता बेहद ख़राब था. हमारी गाड़ी भी घाटी में नदी की चाल सी उछलती कूदती चली. कुछ बीसेक किलोमीटर चलने के बाद सड़क एकदम चिकनी हो गई तो हमने जाना कि किन्नौर का मुख्य शहर रिकांग-पियो आ गया है. मुख्य चौराहे पर हमारी आँखों और फिर कैमरे को एक अद्भुत दृश्य-फ्रेम दिखा. विशाल लहराते तिरंगे को अपनी गर्वीली पृष्ठभूमि दे रही थी किन्नर कैलाश की भव्य पर्वत श्रेणी. गुनगुनी सी धूप, ठंढी बयार, विश्व की सबसे उन्नत प्रजाति के सेबों के पेड़ों की हरियाली और ऊपर-ऊपर को चढ़ता जाता शहर . हम कुछ पल रुक कर इस शहर को महसूस करने को बाज़ार में घुसे. एक रेस्तोरां में स्थानीय लोगों के साथ नूडल्स, थुक्पा और मोमोज़ खाए. किन्नौर के लोगों के साथ चलने बैठने भर में भी एक ताज़गी और नयापन था.

फिर पन्द्रह किलोमीटर ऊपर चढ़ते चले गए. जहां पहुंचे, वहां किन्नर कैलाश के नाटकीय ढंग से एक दम रू-ब-रू आ खड़े होने का अहसास था. कल्पा सचमुच कल्पनातीत-सा है. इतनी ऊंचाई पर सेब के बगीचों के बीच एक विशाल पर्वत श्रृखला पर बादलों की लुकाछिपी देख पाने का मौक़ा बस यहीं मिल सकता है. कल्पा की शाम धीरे धीरे धुंधलाते किन्नर कैलाश की चोटियों के साथ, बूंदा-बांदी के बीच, पतली सी नहर के साथ टहलते या कंपकंपाती हवा में गम पकौड़े खाते बीती. हाँ, यहाँ एक शांत सा बौद्ध विहार भी था, जहाँ किन्नर  कैलाश से होकर आती ठंढी  हवाएं सरगोशी कर रही थीं. कल्पा में झीनी-झीनी फुहारें गाहे-बगाहे आकर आपको भिगो देती हैं. मालूम हुआ कि साल के छः महीने बर्फ भी यहाँ इसी अंदाज़ में गिरती है. अपनी कल्पना को कि ये घाटी सफ़ेद चादर ओढ़ कर कैसी दिखती होगी, हम होटल की दीवारों पर लगी तस्वीरों में ही देख पाये. शाम ढले अपने होटल में हमें कुछ परिचित आवाजें सुनाई दीं. ये बंगला भाषी पर्यटक थे जो मुझे किन्नौर में भी उसी तरह मिले जैसे घूमने योग्य किसी भी जगह पर अनिवार्य रूप से मिलते रहे हैं. मालूम हुआ कि किन्नौर में आने वाले पर्यटकों में सबसे बड़ी संख्या इन्हीं की है. किन्नौर में हमारे साथ घूम रहे बहुत थोड़े से पर्यटकों में भी इनकी तादाद इतनी थी कि मुझे एक बार कल्पा को कोल्पाता कहने का जी हो आया.

अब  आगे क्या? किन्नौर से स्पीती घाटी की ओर – और क्या? रुडयार्ड किपलिंग ने कुछ ऐसा कहा था कि यहाँ निश्चित ही देवताओं का वास है, आदमी का नहीं. साधे बारह हज़ार फीट की औसत ऊंचाई पर पहाड़ों के ऊंचे नीचे कनवास पर पिघलती बर्फ की धाराओं और नदियों द्वारा उकेरी गई कल्पनातीत आकृतियों से बनी घाटी- जहां दूर-दूर तक नज़र जिधर पड़े एक अनोखी दुनिया से साक्षात्कार करती है. अविश्वसनीय ऊंचाईयों पर बसे गाँव जिनमें गिनती के सफ़ेद गेरुआ रंग के मिट्टी के घर बादलों से बातें करते लगें. दुनिया की सबसे दुर्दांत सर्दियां झेलने वाला ये आबाद इलाका हमें ज़रा सी ही मुहलत देता है कि इसके उलझे पुलझे रास्तों से होते हुए आखिर स्पीती नदी की ऊँगली पकड़ साथ-साथ चलते काजा पहुँच जाएँ, वरना छह माह  तो सब कुछ सफ़ेद बर्फ से ढका होता है. और ये नदी भी कैसी गंभीर चित्रकार है जो धरती पर दोनों और अपनी चोटियों पर सफेदी सी पोते खड़े पहाड़ों से बह कर आती धाराओं को जज़्ब करती खुद भी कई धाराओं में बंटती घाटियों में अनोखे पैटर्न उकेरती चली है. दूसरी नदियों के मुकाबले कुछ शांत, अपने आसपास हरियाली के धब्बे छोडती.

किन्नौर की आखिरी ऊँचाई से उतरने से पहले हमने फिर जन्नत-सा एक जहां देखा. घंटों सतलुज के साथ पहाड़ों को तराश कर बनाई गई छतरी नुमा सड़कों के सहारे बढ़ते हुए एक विन्दु से जैसे एकदम ऊपर चढ़ते चले गए और अब तक गर्दन उचका कर देखे जाते रहे पहाड़ों के बराबर पहुँच गए. ये सड़कें साफ़-चिकनी पहाड़ों पर काले सांप सी लिपटी नज़र आती थीं. इस मौसम में बर्फ तो चोटियों पर ही दिखती थी मगर नीचे तलहटी तक पिघलती बर्फ के निशाँ पहाड़ों को बड़ी ही नाटकीय आकृति दे रहे थे. नाको की 3662 फीट की ऊंचाई इस ऊंचे नीचे विस्तार को दम साध के देखने का मौक़ा देती है. एक खूबसूरत-सी झील और सूना-सा पर बेहद सुन्दर बौद्ध मठ भी धरती पर इस सबसे अधिक ऊंचाई पर बसे सबसे बड़े गाँव नाको में हैं. गर्म गर्म ठुक्पा खाते हुए एकदम जी किया आज यहीं रुक जाएँ. पर कहाँ रुक पाते हैं हम इस दौडती भागती ज़िन्दगी में अपने मनचाहे पडावों पर. जब चले तो बादल खुली धूप में वादियों के कंधों पर सवार खेल रहे थे. झील में पहाड़ हरियाली और बादलों का प्रतिबिम्ब फोटोग्राफरों का सबसे प्रिय फ्रेमों में से एक होता है. यात्रा की कुछ सबसे सुन्दर तस्वीरें एकदम खड़ी दोपहर होने के बावजूद हमें यहीं मिलीं. यहाँ से ढलान शुरू हुई तो स्पीती के रास्ते में कुख्यात ‘मेलिंग नाले’ से भेंट हुई जो फिलहाल कमज़ोर-सा था पर आसपास छितराए पत्थर गवाह थे कि उस जगह को पार करना कभी-कभी कितना मुश्किल होता होगा.

स्पीती घाटी अपने नाम की नदी के साथ साथ चली. पहला गाँव आया ‘ताबो’ जहां बदल चुके नजारों का संज्ञान लेते हम जैसे ठिठक कर रुके. नदी के दोनों और खेतों और पौधों की हरियाली, कुछ बने-अधबने मकान इस बर्फीले रेगिस्तान की लम्बी कठिन सर्दियों की दास्ताँ कह रहे थे. ताबो और रास्ते में पड़ने वाले धनकड़ को लौटते हुए देखने की तय कर हम शाम ढले काजा पहुँचने की रेस में लग गए. हलकी बूंदा बांदी और ठंढी तेज़ हवाओं के बीच हमने अपने कमरे की खिडकी खोली तो कुछ दूर ही बर्फीली चोटियों पर बैठे बादलों के पीछे से सूरज अपनी सुनहरी किरणों का अद्भुत नज़ारा रचे हुए था. इन ईश्वरीय किरणों (गॉड रेज़) को अपनी शादी की पच्चीसवीं वर्षगाँठ पर प्रकृति का तोहफा मानकर हमने उसी खुली खिडकी के पास केक, पकौड़ों और वाइन के साथ जश्न मनाया. थोड़ी ही देर में आकाश जगमगाते तारों से भर गया. हम इस सजीव स्वप्नलोक से फिसलकर नींद की आगोश में चले.

बारह हज़ार फीट की औसत ऊंचाई पर बहती स्पीती नदी के सुन्दर से किनारे पर बसा काजा स्पीती का मुख्य शहर है जहां एक और तिब्बती बौद्ध धर्म व् संस्कृति की झलक है तो दूसरी और हिमाचल सरकार के प्रशासनिक अंगों से नियंत्रित छोटा-सा नगरीय परिवेश. ढेरों होटल व् रेस्तोरां, पतली सी टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के दोनों ओर एक नन्हा सा बाज़ार भी. पर शहर से नज़र ऊपर ले जाते ही ये अहसास कि आप प्राकृतिक सौन्दर्य की एक अनोखी दुनिया में हैं, हदम बना रहता है.

अगली सुबह के लक्ष्य स्पीती के दो ख़ास विन्दु- ‘की’ और ‘किब्बर’थे. नदी फिर साथ हो ली. इस बार वो अनगिनत धाराओं में बंटी खूब चौड़ी थी. चोटियाँ सफ़ेद पर पहाड़ों के कंधे और बाजू धूप-छाँव के साथ ग़ज़ब के रंग बदल रहे थे. किब्बर के लिए फिर एक चढ़ाई शुरू हुई. हैरत में डालने वाली साढ़े चार हज़ार फीट की ऊंचाई पर एक गाँव जहां सौ के लगभग घर हैं. प्रतीति ऎसी मानों पूरा गाँव छत से जा लगा हो. सफेद गेरुआ तिब्बती शैली में  रंगे मिटटी के घर, जिनकी छत पर एक और छत आसमान का. बादल ऊपर बैठे. किब्बर वासियों को नमस्कार करते, जवाब लेते हम आगे बढे. आसपास हर संभव आकृति के टीले, दो पहाड़ों के बीच दर्रेनुमा रास्ते थे. कहीं हरियाली, कहीं मटमैला-पीला सपाट विस्तार. ऎसी अनोखी भूमि हमने तो नहीं देखी थी कहीं. ये लद्दाख के रेतीले रेगिस्तानों से अलग था. किब्बर से हम कुछ और आगे तक गए और लगा जैसे धरती यहाँ ख़त्म हो गई. आगे तिब्बत की सीमा थी. एक ऊँचे टीले से हमने पूरे इलाके का जायजा लिया. तस्वीरें लीं और पीछे लौटे. कुछ ही दूर रास्ते में पड़ने वाले ‘की’ बौद्ध मठ की ओर.

साढ़े तेरह हज़ार फीट की ऊंचाई पर एक शंखनुमा चट्टान पर कोई आठ सौ साल पुराना ये मठ अपनी आकृति और अवस्थिति में अनूठा है. नदी के साथ चलते रस्ते से ऊपर चढ़ते हुए ये तब तक नहीं दिखाई पड़ता जब तक इसका पूरा आकार सामने न आ जाए. महायान बौद्ध के जेलूपा संप्रदाय से संबंधित ये मठ काष्ठ और मिट्टी से बनी एक बहुमंजिला इमारत है, जहां पर्यटक चाहें तो ठहर भी सकते हैं. इसके परकोटों से स्पीती घाटी का बहुत ही सुन्दर विस्तार दिखाई पड़ता है. ऊपरी मंजिल पर बौद्ध भिक्षु हमें एक अँधेरे से कमरे में ले गए और स्वादिष्ट चाय से स्वागत किया. हम कुछ घंटे इस अद्भुत स्थल पर इधर-उधर घूमते रहे और इसके इतिहास को याद कर अलग अलग कालों और मौसमों में इसके स्वरूप की कल्पना करते रहे. हज़ारों साल पुराने हस्तलिखित दस्तावेजों और कुछ हथियारों का संग्रह देखा तो संकरी सीढियों से उतरते-चढ़ते कुछ ठोकरें भी खाईं. दरवाज़े मेरे सवा छः फुट लम्बे बेटे के सीने तक ही आते. एक न भुलाने वाला अनुभव लेकर हम नीचे उतरे और काजा की ओर लौटे. रास्ते में कुछ जाबांज सैलानियों के झुण्ड मिले, कुछ हमारी तरह गाड़ियों पर, अधिकतर मोटर-साईकिलों पर तो कुछेक पैदल भी. ये दस किलोमीटर वाकई पैदल चला जा सके तो स्पीती के सबसे सुन्दर रास्ते का पूरा लुल्फ़ लिया जा सकता है. काजा से ज़रा पहले जहां से ‘कुंजुम दर्रे’ का रास्ता स्पीती पर बने पुल से होकर अलग हो जाता है, नदी अपने पूरे शबाब पर नज़र आती है. पहाड़ बादलों की छांह में रंग बदलते, नदी की धाराएं किसी विराट कैनवास पर ब्रश से कई रंगों के स्ट्रोक्स जैसी दिखती है. आज भी हमें अपनी यात्रा के कुछ बेहद सुन्दर तस्वीरें मिलीं.

देर शाम तक काजा की गलियों में घूमते बिताईं. शाम को हम काजा के विशाल बौद्ध मठ में रुके. डूबते सूरज की पीली किरणों में चटकीले रंगों से रंगे खम्भों और दरवाजों के पैटर्न कैमरों में कैद किये. कितना अलग है काजा लेह से. लेह से जियादा ऊंचाई पर स्थित है पर जैसे सबकुछ अपनी पहुँच में लगता है. स्पीती नदी हर जगह से दिखती है, सिन्धु की तरह सिर्फ ऊंचाईयों से नहीं. आबादी भी बहुत कम. मौसम कुछ और ठंढा. लोगों ने बताया कि यहाँ रोज़ दोपहर यहाँ तेज़ हवाएं चलती हैं, बादल चोटियों पर बर्फ बरसाते हैं और शहर पर भी छिडकाव-सा करते हैं. अन्धेरा होते-होते सभी चोटियाँ कुछ अधिक सफ़ेद हो जाती हैं. फिर बर्फ पिघलती है और बादल दुबारा आकाश पर सफेद आकृतियाँ रच कर पूरे दृश्य को सम्पूर्ण कर देते हैं. इसे हमने स्वर्ग का दैनिक मौसम चक्र माना और रात होने का इंतज़ार करने लगे. आज छत से अपने कैमरे में तारों का नज़ारा कैद करना था. रात गहराते ही पूरा आकाश जैसे किसी प्लेनेटोरियम जैसा हो गया. तारों का हर समूह साफ़ दिख रहा था. आसपास की रोशनियों से बचते हुए हमने भरसक इन तारों को कैमरे में समेटा. दिल्ली में तो ये नज़र ही नहीं आते.
अगली सुबह वापसी की यात्रा शुरू की. अभी स्पीती में हमारी एक रात और बाक़ी थी. स्पीती घाटी में एक ख़ास पर्यटन स्थल  ‘ताबो’, जहां बौद्ध धर्म के प्राचीनतम मठों में से एक है. पर पहले धनकड़.

स्पीती में महीनों बर्फ से ढंके रहने वाले पहाड़ों की बाहरी संरचना एक अलग ही परिदृश्य रच देते हैं, पर धनकड़ पहुँचते ही ऐसा लगता है मानों यहाँ विशालकाय दीमकों ने अपने बड़े-बड़े भीत बना रखे हों. भुरभुरी पीली मिटटी की ये आकृतियाँ बर्फीले रेगिस्तानों में खूब मिलती हैं. यहाँ स्पीती और पीन नदी के संगम पर कोई हज़ार फुट की ऊंचाई पर ऎसी ही भीतों के समूह पर एक कोने में लकड़ी और मिटटी से बना एक बेहद पुराना बौद्ध मठ है. संकरे रास्तों से होकर इसमें प्रवेश करते हुए डर सा लगता है कि कहीं ये समूची की समूची संरचना ढह न जाय. पर ये तो सदियों से यूं ही खडा है, छीज जरुर रहा है. बेहद संकरी सीढियों से ऊपर गुफओं जैसे कमरों में घुस कर कर हमने इसका इतिहास जाना. ऊपर एक कोने से डरते-डरते हमने बाहर झांका तो कुछ कल्पनातीत दृश्य दिखे. घाटी यहाँ अपनी सम्पूर्णता में नज़र आती है – एक ही दृश्य संयोजन में बर्फीली चोटियों वाले पहाड़ की तलहटी में पसरती सी नदियाँ, मिट्टी के भीतों से घिरे सीढीनुमा हरियाले खेत और रौशनी और छाँव से चिन्हांकित उठान और ढलान – जैसे किसी चित्रकार की अंतिम कल्पना हो. हमने यहाँ भी जिस किसी कोण से क्लिक किया विस्मयकारी परिणाम आये. ये अफ़सोस लिए कि काश हम सुबह की कोमल रौशनी में यहाँ आ पाते,  हम वहां से विदा हुए.

स्पीती घाटी का अगला पड़ाव ताबो भी अपनी प्राकृतिक संरचना में अनोखा था. एक बड़े कटोरे-सा भूखंड इक्कीस हज़ार फुट की ऊंचाई पर, एक छोटी सी झील विशाल समतल हरियाली के तुकडे के बीच. सडक की दूसरी और पहाड़ों की गोद में प्राकृतिक गुफाएं, जिनतक पहुंचकर हमने ताबो को स्पीती के एक ‘पिक्चर-परफेक्ट’ गाँव के रूप में देखा. यहाँ का सबसे विशिष्ट आकर्षण ताबो  का बौद्ध मठ है. बौध धमावालाम्बियों के लिए तिब्बत जैसी महत्ता रखने वाला ये मठ 996 ई. से यहाँ अपनी पूरी प्राचीन मौलिकता के साथ खडा है. मिटटी से लिपे मिट्टी के ही स्तूप, और प्राचीन ग्रंथों का एक संग्रहालय. एक नया रंगबिरंगा मठ भी जिसकी पृष्ठभूमि में जैसे सोने का एक हार पहने एक पहाड़. ढलती धूप में इस पहाड़ के गले पर टिके पीली मिटटी के वलय को चमकता देख यही उपमा सूझी थी. यहाँ की रहस्मय शान्ति में कुछ देर बैठे और ताबो के विशिष्ट सुन्दरता को जी भर निहारा. फिर गाँव की गलियों में घूमते हुए एक रेस्तोरां में रुके. इस गाँव में लोग जगह जगह कैरम बोर्ड जमाये बैठे थे. आर्डर करने पर गरमागरम तिब्बती खाना हाज़िर हो जाता था. चाय भी ख़ास. फिर जैसे कोई टोटका हो, कुछ-कुछ मिनटों के लिए बादल घिर कर कुछ बूँदें यहाँ भी गिराते रहे. एक खुशनुमा शाम बिता कर हम अपने गेस्ट हाउस में लौट आये.

सुबह स्पीती घाटी से विदा लेने का वक़्त आ गया. लौटते नजारों को जी भर देखते हम एक विन्दु से फिर ऊंचाई पर चढ़ने लगे. ‘मेलिंग नाला’ दोबारा मिला तो वापसी का अहसास गहराने लगा. नाको के पास पहुँच कर चाय के बहाने हमने फिर वहां के विस्मित कर देने वाले लैंडस्केप को निहारा, क्लिक किया. आगे एक तेज़ रफ़्तार वापसी की. किन्नौर की कुख्यात सड़कों पर हिचकोले खाते आखिर हम सफर के आखिरी पड़ाव सराहन की ओर ऊंचाई पर मुडती सडक पर आ पहुंचे तो जाना कि ज्यूरी नाम की ये जगह शिमला और किन्नौर का सन्धिस्थल है. 

सराहन भीमाकाली माता का आसन है जो देश के 51 शक्तिपीठों में शामिल है. हरी-भरी पहाड़ी पर एक भव्य प्राचीन मंदिर जो बौद्ध और हिन्दू स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है. इसका इतिहास कहीं से भी जाना जा सकता है. मैं अपने अनुभव से ये बताऊंगा कि इतना व्यवस्थित प्रबंधन हिन्दू मंदिरों में कम ही देखा जाता है. लकड़ी के नक्काशीदार दीवारों और गुम्बदों से बने मंदिर के भीतर ऊपरी मंजिल पर माता की सुन्दर प्रतिमा के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए बड़ा ही भक्तिमय अनुभव है. मंदिर प्रांगन की शान्ति भी मन में बस जाती है. सराहन के खुशनुमा मौसम में हमने एक शाम बिताई और पहाड़ों के पीछे सूरज ढलने और अगली सुबह शिखरों पर पहली किरण का सोना फैलते देखने का सुख उठाया.

अगले रोज़ सराहन से सात घंटे तक रास्ते में नारकंडा जैसे ठौरों पर आडू, खुबानी आदि खरीदते मज़े-मज़े में चलते हुए शिमला लौटे तो महसूस किया कि अचानक कितनी भीड़ में आ गए हैं हम. पर्यटन का सीजन पूरे शबाब पर था. पहाड़ों पर आये लोग, शिमला तक आकर रुक जाते हैं. यहाँ सारी सुविधाएं हैं, होटल, मॉल और खूबसूरत  मौसम भी. पर किन्नौर और स्पीती से लौट कर ये सपनों की जगह हमें बेतरह अघाई, फंसी हुई और ऊबती सी लगी. सड़कों पर गाड़ियों के लम्बे जामों का क्या कहें, अपर लोअर सभी माल रोड पर जहाँ वाहनों की आवाजाही मना है, इंसानों का जाम लगा था. कंधे से कंधा रगड़े बिना चलना मुहाल.

देर शाम हम बस से दिल्ली रवाना हुए तो शिमला छोड़ते ही एक लम्बे ट्रैफिक जाम में फंसे. फिर बड़ी याद आयी स्पीती की उन सड़कों की जो पीछे मुड़ कर भी देखी जा सकती थीं और अक्सर मीलों उनपर हमारे सिवा कोई नहीं होता था..

Tuesday, 16 February 2016

माउंटेन मैन दशरथ मांझी पर परम शिवम् का यात्रासंस्मरण

परम शिवम् मूलरूप से तमिलनाडु के निवासी हैं | वे सम्प्रति केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल में कमांडेंट के पद पर कार्यरत हैं | पिछले दिनों चुनाव के सिलसिले में उनकी प्रतिनियुक्ति बिहार के  औरंगाबाद में हुई थी | वहां से वे माउंटेन मैंन दशरथ मांझी के गाँव गहलौर गये थे | इतना मर्मस्पर्शी और संवेदनापूर्ण यात्रावृतांत हिंदी में कभी कभी ही लिखा गया है |यह एक चिरस्मरणीय यात्राकथा है |  - शंकर



ओ बबा ! दस्सू बाबा ! काहे गो एतना बड़ा पहाड़ काट दिए जी ?’

आसमान में तीक्ष्ण सी रजत-रेखा के खिचते-खिचते होटल छोड़ दिया था. गया शहर को जी टी रोड से जोड़ने वाले राजमार्ग पर बोधगया टी-जंक्शन के समीप स्थित होटल डेल्टामें रात का ठौर रहा और अब अलसुबह गहलौर का रुख.

कोई सात-आठ बरस पहले कश्मीर में अपनी तैनाती के दिनों में दशरथ बाबा के बारे में सुना-पढ़ा था कि बिहार की किसी नामालूम सी जगह में अफसाना हकीकत हो गया है और तभी से उनका अदम्य जीवट, चेतना और सोच पे हावी रहा . यहीं कहीं से अंतस के गह्वर में एक मनोरथ भी अंखुआयी– ‘... बाबा के थान की जियारत .बाबा का वृत्तान्त हमारे समकालीन महानतम वृत्तांतो में से एक रहा है . चेतन-अवचेतन को अहर्निश उद्देल्वित करता . कई अवसरों पर अपने उद्बोधनो में कहा भी – “ हमे बड़े-बड़े आदर्शों की आवश्यकता नहीं, हमे राष्ट्र्पालों और देश-रत्नों की जरूरत नहीं, हमे तो छोटे आदर्श चाहिए , हमे तो दशरथ मांझी जैसे आदर्श चाहिए .याद पड़ता है बिहार में अपनी तैनाती पर बटालियन का कार्य-भार ग्रहण करते हुए जवानों को प्रथम-उद्बोधन का अनुष्ठान भी बाबा के ज़िक्र की आहुति से ही सम्पन्न हुआ था .

बोधगया से तकरीबन चालीसेक किमी की दूरी पर , गहलौर गाँव अतरी ब्लाक का हिस्सा है . गहलौर पहाड़ी-मेखला के साथ ही लगती आबादी , मेखला आगे राजगीर तक चली जाती है . आस-पास के इलाके का एकमात्र बड़ा केंद्र- वजीरगंज . गहलौर के एक तरफ से सत्तर किमी और बाबा के बाद दूजीतरफ से पन्द्रह किमी पड़ता है . खामोश, बे-आवाज़ खुलते, सुबह के चमकीले थान में बोधगया पीछे छूट गया है . रास्ते के संग-संग छितराई और कहीं सघन बसाहट उचक-उचक के आँखों में भरती-झरती है . गाड़ी के पार्श्व में धूसर और बेहद आम से सुबह के अलसते भू-दृश्य पीछे लगी किसी अदृश्य चरखी में लिपटने लगे हैं . अपनी ही पृष्ठभूमि की एकरसता में एकमेक होती लोक-गतिविधियों- हॉर्न सुनते ही सायकिल-सवार दूधवाले का सड़क छोड़कर नीचे उतरना, झुण्ड में से किसी बकरी का निकलकर भागना , ऑटो में एक पैर चढ़ाकर सवारी का हुज्जत करना, में सुबह की रौनकें रफ्ता-रफ्ता खिल रही . रजत-रेखा अब उजाले की उफनती नदी हो गई है .
कोई आठ-दस किमी बाद नरेश सक्सेना के लिए एक अदद छींक जुटाते फल्गु को पार किया गया - पुल पार करने से/ नदी पार नहीं होती/ लोहा लंगड़ पार होता है ’ . पुल से फल्गु का रेतीला संस्करण ही दीख पड़ता है . बस कहीं-कहीं, छोटे-छोटे चहबच्चों में जी-तोड़ चेष्टा कर पानी ने खुद को सहेज रखा है किसी अकुलशील, अज्ञात प्यास के लिए .

गया, बिहार का दक्षिणवर्ती अंचल है . ऐतिहासिक रूप से समृद्ध किन्तु वर्तमानिक रूप से पिछड़ा, संसाधन-हींन और नक्सलवाद से ग्रस्त. एक तरफ नक्सलवादियो का गढ़ कही जाने वाली चक्रबंधा की पहाड़ियां और जंगल तो दूसरी तरफ बाबा की छैनी की छनन-छनन से गूंजती गहलौर की पहाड़ी-मेखला . खुलती सुबह की धीमी आंच में दोनों गाड़ियों ने रफ़्तार पकड़ ली है . एक में, मैं, सीमा और ओफी तथा दूजे में जवान . बीच में ओफी पे किलिच भी पड़ता हूँ जब देखो जस्टिन बीबर, सेलिना गोमेज़, टिम्बरलेक ! अरे सुबह-सवेरे जे धापड़-लीला कान छोडो भीतर को कुरेदने लगती है .  विश्व-संगीत के प्रति अपनी सारी विनम्रता के बावजूद किसी भी माहौल में कुछ भी सुन लेने के लिए खुद को अप्रस्तुत ही पाता हूँ चुनांचे अब आभास कुमार गांगुली उर्फ़ किशोर कुमार खंडवा वाले अपने बेरीटोनके साथ आ गए हैं और भागती गाडी में रंग जमाने लगे हैं . गाड़ी की थरथराहट, इंजन की घनघनाहट और किशोर के टिडली-टिडली-ओयू और ओडले-ओडले-ओ के बीच एक पुकार भी कौंध रही – ‘ ओ बबा ! दस्सू बाबा ! काहे गो एतना बड़ा पहाड़ काट दिए जी ? ’आत्म-प्रश्न नहीं ! एकाध बार आत्मोदगार मुखारबिन्दु से भी फूट पडे और फूटते ही सीमा और ओफी छूट एक दूसरे की तरफ ताकने लग पड़ीं हैं तथा अपने अल्प-तके में ही दोनों ने त्वरित-गति से मूक-निष्कर्ष भी निकाल लिया है – ‘ हर्षित मन ....पुलकित-मन....अभीष्ट की ओर दौड़ता मन.... अभी तो और बर्रायेगा !

बीच में मानपुर के पास गाडी रोकी गयी, यहीं हमारे पथ-प्रदर्शक जवान का मिलना तय था उसे बोला गया था कि हो सके तो बाबा के पहाड़ पे ही कहीं रुकने का इंतजाम देखे बाबा के थान से रात का आसमान देख लेंगे ‘ ...पर पथ-प्रदर्शक ने बताया कि वहाँ दूर-दूर तक  कहीं रुकने का इंतजाम नहीं है . जो वहां ‘रुके’ हुए हैं उनका जिगरा है, मैंने अपना निष्कर्ष निकाल लिया .

अब कारवां बाहरी सड़क पर आ गया हैं . रास्ते के दोनों ओर ज़िन्दगी के अलामात के साथ फैली जमीन . ओ बबा ! दस्सू बाबा ! काहे गो एतना बड़ा पहाड़ काट दिए जी ? ’ इस बार प्रलाप-प्रभाव से बचने के लिए ओफी ने हैडफ़ोन चढ़ा लिया है अलबत्ता सीमा का निरीह-श्रव्य अब भी साथ है . पहियों के नीचे लगातार पीछे छूटती काली सड़क, उत्कंठा को बलवती किए दे रही आगे, पीछे, सामने, बाएँ जाने कौन से भू-दृश्य में बाबा का चिन्ह हो ; कैसा होगा प्रथम दृष्टिपात ! तीर्थ-भाव ! हज ! भीतर लगातार एक भाषा घट रही है... मै ही सुनता हूँ अपना ही अनकहा .
अचानक एक मोड़ काटते, सामने थोड़ी दूरी पर एक कटी-छंटी चट्टान उभर आयी है ; दो तीन और चट्टानें वैसी ही कटी-छंटीजे तो नहीं काट दिए बब्बा ने भीतर सुगबुगाहट हुई . न जे नहींपर रास्ते के दोनों तरफ फैली एकरसता को इन छंटे हुओं ने अवश्य भंग कर दिया है . मैंने भी प्रायोजित अचरज से उनकी तरफ देखा ताकि रास्ते की एकरसता को भंग करने के लिए सीमा और ओफी के लिए कुछ आश्चर्य जुगाड़ सकू.... उन्हें आश्वस्त कर सकू कि मेरी अभीष्ट-यात्रा इतनी भी गयी-गुजरी नहीं . थोडा आगे चलकर एक ग्रामीण से गहलौर के बारे में पूछा गया जिसने आगे से मुड़ने का इशारा किया . सीधा रास्ता वजीरगंज और आगे नवादा की तरफ निकलता है .
     
अब कारवां गया-नवादा मार्ग छोड़ गहलौर जानिब सफ़र-शुदा है . इस तरफ कुदरत का मिज़ाज बदला बदला है रास्ते के एक तरफ गहलौर की पहाड़ी-श्रृंखला और दूजी तरफ वसुधा का प्रशस्त विस्तार, बसे हुओं के झुरमुट, ताड़ के पेड़ों की सामूहिकता और इन सबके बीच डीज़ल के काले धुंए को आसमान में उलीचती, भागती रेलगाड़ी . सुबह की ताजगी अब जा के हिस्से में आई . में स्टीयरिंग को ढीला छोड़ता हूँ और खीचकर अपने फेफड़ों में सुबह की ताज़ा हवा भरता हूँ . ओफी एक दो फोटो क्लिक करती है पर आगाज़ से पहले ही रोमानियत अपने अंजाम तक पहुच गयी- चार-पांच किमी के स्वस्थ-समतल के बाद अब सड़क ने अपने प्रख्यात भारतीय प्रारब्ध को पा लिया है गाडी दचको से दहल उठी है...सवारियां लगातार डोलने लग पड़ी हैं . मै नई स्थितियों के सन्दर्भ में दोलनशील सवारियों के मन को पढने की कोशिश करता हूँ – ‘... कष्ट में तो हमाए लिए भी जे यात्रा किसी तीर्थ से कम नही . अन्धेर-अँधेरे का जगना , रास्ते भर दुनिया-जहान की फालतू बातें और अब जे दचकों की लीला .मैं गुनगुनाने में व्यस्त हूँ . कब आएगा भाई ! लगभग डेढ़ घंटे होने को आये . फिर एक सद्य-जागृत और उनींदित ग्रामीण से पूछा जाता है जो आगे की तरफ इशारा करता है .

दशरथ नगर . बोर्ड दीख पड़ता है सड़क किनारे . पर जुस्तजू तो गहलौर की थी वो कहाँ खप गया ? अब तक के सारे मंसूबे तो गहलौर से वाबस्ता रहे हैं काबा तस्लीम कर लिया है . पर गया कहाँ गहलौर ? ‘ उहापोह में गाड़ियां दशरथ नगर से आगे निकल गई हैं . में रुकवाता हूँ और पता करने के लिए जवानों को पीछे गाँव में भेजता हूँ . प्रतीक्षावधि में कुछेक क्लिक कर लेता हूँ .

ये क्या, ये किसको पकड़ के ला रहे सामने देखते हुए बुदबुदाता हूँ .
ऊपर कषाय गंजी और नीचे चीकट धोती में लंगड़ता कमतर कद का बदन . जीवन की आंच से तपा चेहरा, क्रीम पाउडर का कोई लांछन नहीं , दुर्निवार कष्टों को अनवरत, अनथक भोगता चेहरा . साथ में मझौले कद में दुबला-सिमटा एक युवक- पुरानी पेंट, कुचैली कमीज़, गले में गमछा और चेहरे पे संकोच .

- “ ये कौन है में आश्चर्य से पूछता हूँ .

- “ ये उनका लेडका है सर, बगीरद ! हवलदार लिंटो अपनी मातृभाषा मलयालम के कारण लड़का(पुत्र) को लेडकाकर राष्ट्र-भाषा को निभा ले जाता है. मै नाम समझ लेता हूँ भागीरथ .

- “ अरे तो इनको पकड़ के क्यों ले आए भाई ! चलो बाबा, घर चलो ! हम रास्ते से लगती ढलान पे उतर पड़ते हैं . मुझे जवानों की एकोन्मुखता पे हंसी और तरस दोनों आ रहा. उनके लिए किसी भी आदेश या बात का एक ही अर्थ है किसको पकड़ के लाना है’ . फरमाँ-बरदारी उन्हें एक-दिशाई बना देती है, मै सोचता हूँ और ये भी कि साथ आया युवक दशरथ बाबा का पोता और साथ चल रहे बुजुर्ग का बेटा होना चाहिए .


मकानों का एक झुंड बैठा हैचार-पांच फूस से ढंके मकान , अपना दुखड़ा रोते हुए से बैठे . गहलौर की कुल आबादी लगभग दो हजार है मुसहर और भुइयां . नस्ल-दर-नस्ल हाशिये को ढोती जिंदगी के लिए यहाँ भी हाशिया ही मुक़र्रर निकलादलित टोला . घरो के बीच आवाजाही वाली जगह को पारकर अब झोपड़-श्रृंखला टाइप के आँगन में पहुच गए हैं . एक तरफ एक खाट लगी है जिसपे कथरी गुदड़ी सिमटे पड़े हैं . युवक एक कोठरी के अंदर भागता है और भीतर से प्लास्टिक कुर्सियां निकाल लाता है . गाँव में सुबह पूरी खुली नहीं है, भागीरथ के दातों में अब भी दातौन फंसा है मैं लक्ष्य करता हूँ .

एक लेंटर वाला कमरा बाकी दो तरफ से फूस की छाई झोपड़ियों की कतार और उनके बीच में खुली जगह. खुली जगह में ही सब क्रमश: व्यवस्थित हो लिए हैं . आस-पडोसी भी निकल आए . पर टोले में गतिविधियाँ कम ही नज़र आ रहीं . न अखबारवाला , न दूधवाले की पुकार, न मन्दिर की घंटियाँ न भजन के स्वर . वो सुबहें किसी और लोक में होती होंगी यहाँ अभाव सवेरे को पूरा खुलने नहीं दे रहे . बंधी-बंधी, ढंकी-ढंकी सी सुबह है . यहाँ काल-बद्ध कलाप नहीं हैं हर काल की यहाँ एक ही पहचान ठहरी संघर्ष ! अविराम संघर्ष !


मैंने  ही व्यवस्थित होकर बातें शुरू की . भागीरथ मगही और टूटी हिंदी में जैसे तैसे जवाब देते हैं जिसे दिवार से टिके युवक और बगाहे सामने रसोई में चूल्हा-रत युवती द्वारा बाहर आकर स्पष्ट किया जाता है . साथ आया युवक नाम से मिथुन और रिश्ते में भागीरथ का दामाद और उनकी एकमात्र चूल्हा-रत पुत्री-सन्तान लछमनिया का पति निकला . किसी के आने पर क्या हमेशा वो ऐसे ही चूल्हे के सामने बैठ जाती होगी, सोचता हूँ . मिथुन-लछमनिया के युगल सहयोग से एक उबड-खाबड़ संवाद सम्भव हो गया है . भागीरथ ने ही बाबा के बारे में बताया कि उस तरफ बब्बा नहर-खुदाई का काम करते थे जब अम्मा खाना-पानी लेकर जा रही थी तभी गिरी और वजीरगंज ले जाते तक सिधार गई बस  तभी बाबा ने कसम उठाई थी पहाड़ काटने की  . ये भी बताया कि जूनून ऐसा था कि शिशु भागीरथ को अकेला ही छोड़ निकल जाते थे पहाड़ काटने. और जे यहाँ से वहां लुढ़कते फिरे कोठरी में . ऐसे ही एक दिन लुढ़के तो पाँव चूल्हे में . जब तक आर्त्त-पुकार पास-पड़ोसियों को जुटाती एक पैर का पंजा भुंज गया और दारिद्रय के साथ अपाहिजता भी शैशव ही नही जीवन की भी चिर-संगिनी बन गई . जले के निशान के बीच एक पैर का पंजा ठूंठ सा दिखाई पड़ता है . बाबा के जुनून से सिर्फ पाँव ही ठूंठ नहीं हुआ परिवार की संभावनाएं भी ठूंठिया गयी, वो बोले नहीं, हम सुने नहीं पर तैरता सा लगा .

मिथुन स्नातक है पर नौकरी के लिए फिरता हुआ. प्रारंभ में शुरूआती भ्रम की स्थिति में उसे पुत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया था किन्तु आहिस्ता-आहिस्ता उसकी वास्तविक स्थिति साफ हुई . गया में दो-चार महीने पहले आयोजित सेना की भर्ती-परीक्षा में भी सम्मिलित हुआ पर नाकामयाब, अब भागीरथ का ही हाथ बंटाता है . भागीरथ, उसकी पत्नी बसंती देवी, बेटी लछमनिया और दामाद सब मिलकर साथ लगे प्राइमरी स्कूल में मध्यान्ह भोजन के कार्य में संलग्न है जिससे तीन हजार रुपए प्रतिमाह की आय निकलती हे और यही आमदनी का एकमात्र जरिया है . भागीरथ, बसंती देवी, लछमनिया, मिथुन और उनके दो चेटे-पोटे कुल मिलाकर आधा दर्जन जीवन और कमाई तीन हजार महीना एक के हिस्से में पांच सौ रु महीना उसी में खाना, पहनना, हांड़ी, बीमारी, उत्सव, शोक, दान-दहेज़, पुण्य सब कुछ .

ओ बबा ! दस्सु बाबा ! काहे गो एतना बड़ा पहाड़ काट दिए जी ? ‘
दुनिया केसर डाल के झकास मलाई फेंट रही पीढ़ियों के लिए ....नगर-निगम के चपरासी तक के वंशज कामोत्तेजक दवाइयां खाकर रंगरेलियों में हिनहिनाते घूम रहे... अपने वंश को नौवे नम्बर पे सुरक्षित करने  एक भगौड़े-अपराधी के लिए मुल्क की वजीर-ए-खारजा की इंसानियत उफन पड़ी है .... सुने अंटीलियानाम से एक मकान बना है इसी पुण्य-धरती पर, बम चकाचक ...जादू है जादू, भावी नस्लों के लिए अक्षत -वैभव जुगाड़ रखा है उसके भीतर और एक आप ! घर में हांड़ी-बीमारी बो गए ? फाके की झालर टांग गए ? घरवाले मोहताज तक रहे , कि एक दिन व्यवस्था के करुणा-मूर्तियों की करुणा गहलौर के मंगरू मांझी के खानदान पे भी बरसेगी .

सामने खाट पर बैठी बुढ़िया (बंसंती देवी ) को खांसी का दौरा पड़ गया है......गरगराती खांसी फेफड़ों को ठेलकर गगार के साथ बाहर आ, पूरे माहौल को सहमाती है . अजीब सी ध्वनि है- फेफड़ों की दीवार पे बजबजाते बैक्टीरिया से उकसती खांसी . यह सिर्फ बीमारी नहीं लगती . अपने सारे भोगे - सिस्टम की असंवेदनशीलता, हस्तियों की बेवफाईयां, अतीत के अत्याचार और अपनी निरुपायता को लगता है बुढ़िया ने खांसी में बदल लिया है . खांसी के तीखेपन में . लगता खांसी नहीं बसंती की कोस है . खांसी की निरन्तरता और सुदीर्घ तथा भरे-भरे खों-खों में बुढ़िया शाप देती सी लगती है . बीमारी का पर्याप्त इलाज न करा पाने की लाचारी से उपजती गरीब की हाय खांसी में बदल गई है . मै विचलित होता हूँ – “ कब से है इनको ? “
सब एक दूसरे का मुह देखते हैं, और लछमनिया जवाब देती है –“ पांच-छै महीने हो गए

- “ तो कहीं दिखाया नहीं क्या ? ”

- “ गाँव के डॉक्टर से दवाई ली थी पर तबीयत ठीक नहीं लगती

खांसी उसकी तीव्रता और फेफड़ों की धौंक, मुझे किसी गंभीर बीमारी के सिमटम्स लगते हैं . उन्हें दिलासा देता हूँ – “ ठीक है, हम लौटकर अपने यूनिट के डॉक्टर को भेजेंगे वो जाँच करके दवाई भी दिलवा देंगे .

अब तक लछमनिया चाय बना के ले आई है . अधिक देर की संगत के फिराक में मिथुन के हाथ में पैसे पकडाते हुए चाय की मांग मैंने  ही की थी – “ काली चाय ’’

- “ आमिर खान भी तो आए थे न ? “ मेने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा .

भागीरथ ने ढंके-मुंदे ही बताया कि सब घर पे खाना बना के इंतज़ार में थे कि आमिर शूटिंग-वुटिंग पूरी करके आएँगे पर नहीं आए . खाना अनखाया रहा, पतीले का दाना महकता रह गया .

- “ भीड़-वीड ज्यादा थी क्या ? ’’ , मैंने  अखबार में कहीं पढ़े हुए के आधार पे सवाल किया .

- भागीरथ – “ हूँ....हाँ....थी ...लगा स्वर में कोई सहमति नहीं है सिर्फ कसक है- इत्ती भी भीड़ नहीं थी, आते तो अच्छा लगता ’ अबोला ही छा गया .

इस बीच मैंने बाबा का सामान दिखाने का निवेदन किया और मिथुन लेंटर वाली कोठरी में घुस गया है . यह लेंटर-सम्मानबाबा को इंदिरा-आवास-योजना की एक यूनिट के रूप में मिला था .
मिथुन, बाबा का हथौड़ा, छैनी, सब्बल उठा लाया है .

आह ! यही वो संगी हैं जिनसे पहाड़ चीरा गया , वुजू करके छू छूने वाले ! अजाब आएगा ! दुनिया की कौन सी ऐसी पवित्रता है जो इनमे निहित नहीं... बाबा ने अपनी बकरी बेचकर पहाड़ काटने के लिए इन्हें ख़रीदा था . अश्रु-स्वेद-रक्तसे सना लोहा एक मनुज के संघर्ष से ठोस हो आया है, इसके घनत्व में एक इंसान का उरूज लहलहाता है, इसके वजन में इंसानी हौसला फरफराता है ....अभिभूत बैठा हूँ . हाथो की त्वचा टकराई है ठोस लोहे और लकड़ी के हत्थे से . कुछ पल ऐसे ही भावोद्रेक में बीते होंगे फिर शनै: शनै: प्रकृतिस्थ हुआ और आस-पास से तादात्म्य बिठा पाया . ओफी को भी छुलवाया कि लोहे का अभिप्रायमेरा विस्तार भी जाने और समझे कि इस्पाती-ठोस किसी काम का नहीं यदि वो मनुष्य के ठोस से मिलकर पहाड़ और नियति के ठोस को न हरा दे, जाने कि इसके ठोसत्व  में सिर्फ लौह-तत्व नहीं मनुष्यता का चरम भी निहित होता है .

पर अब दुनियादारी  भीतर उठने लगी है, एक लालच सिर उठा रहा– ‘ इनमे से कोई औजार खरीद क्यों नहीं लेते ? अकेले-पकेले में ‘गाढे’ का जुगाड़ रहेगा ’ थोड़ी बात-चीत के बाद मौका देखकर बातो-बातों में इस अभिलाषा का प्रस्ताव भी कर देता हूँ .

स्मृति का गौरव-गान और उसपे निछावर होता मानस भरे-पेट के चोंचले हैं मियाँ वरना तो घोर आर्थिक तंगी से जूझता और कौर-कौर के लिए खटता जीवन येन-केन अपने त्रास से मुक्ति ही चाहे है . भागीरथ की तरफ से कोई तीखा प्रतिकार नहीं आया है वो प्रस्ताव को लेकर गोल-मोल है . दरअसल इस समय तक परिवार को ये आस भी हो चली थी कि भविष्य की भर्तियों में मेरे द्वारा मिथुन की सम्भव मदद की जाएगी . इसी के चलते एकाध अंक-सूची की फोटोकॉपी भी मुझको पकड़ाई जा चुकी थी . भविष्य की किसी सम्भावित-सहायता की प्रत्याशा में अभी से उपकृत मनस ने स्वयं को निर्विकल्प कर लिया था .
ओ बबा ! दस्सू बाबा ! काहे गो एतना बडा पहाड़ काट दिए जी ? ‘
यहाँ चहुँ-ओर डिजीटल तरीके से अच्छे-दिनआ गए हैं- ...मेक इन इंडिया...स्टार्ट-अप इंडिया....लल्लन-टॉप इंडिया....और भी जाने का का हो रहा ....हाँ इस बजबजाते  चकाचक में भी मिथुन को नौकरी नही मिली है हर आने जाने वाले की तरफ मुह बा के तकता है और हर आने जाने वाला परिवार को आस का झुनझुना पकड़ा जाता है . सुबह से शाम तक ख़ट रहा है एक-एक जन तब गिन-गिन के दाने आ रहे हिस्से में . किसी दिन भी भुखमरी लपलपा के छा रहेगी वंशजों पर . वंश के नौनिहाल धूल में लिथरे गुड को जीभ की नोक से चाट कर स्वाद-अनुभव को लम्बा कर रहे, कलेजा नहीं जुट पा रहा कि गड़प जाएं एक बार में . आपके नाम पे दुनिया चिकनी हो रही ...त्वचा को संवार रही. ओ बबा !

न ! नहीं खरीदूंगा ! मैं बिक भी जाऊं तो ये छैनी-हथौड़े की कीमत नहीं चुक सकती.... ये दुनिया बिक जाए तो भी नहीं... ये कई-कई बार बिक जाए तो भी नहीं ....ये मनुष्यता का वैभव है, ये मनुष्यता की विरासत हैं, इनसे एक नई दुनिया बनाई जा सकती है, इनसे एक नई दुनिया गढ़ी जा सकती है , नहीं खरीदूंगा...नहीं खरीद पाउँगा, जो भी देना है निगाह नीची रख ऐसे ही हाथ पे रख जाऊंगा , ’ अन्दर ही अन्दर खदबदाने लगता है .

लछमनिया से एक चाय और मांगता हूँ . गोल उत्सव-हीन चेहरा जीवन के आधे-अधूरे को बरतता , दिन-ब-दिन दरकते अपने गाढ़े को सहेजता . बदन कुचैली साड़ी में लिपटा फिर भी अभी पानी उतरा नहीं है . परिवार में सबसे ज्यादा स्फूर्ति जगाती और संतोष-प्रद यही उपस्थिति है. बाबा की जिजीविषा इसी बची खुची स्फूर्ति में दिख रही बाकी सब अपने-अपने कगारों पर बुझे-बुझे से रेंग रहे . स्फूर्तिमेरी मांग सुनते ही चूल्हे पे बैठ जाती है , चाय लाती है मिथुन की नौकरी के लिए सकुचे और अस्फुट स्वरों में बोलती है . अपने मन में कितना कर पाउँगा ’ की शंका लिए मैं हर एक को आश्वस्त करने की कोशिश करता हूँ .

- “ अरे टोपी कहाँ है बाबा की ? ’’ अचानक ही याद पड़ता है तो भागीरथ से पूछता हूँ, सुनकर मिथुन अन्दर से बाबा की टोपी ले आता है .

गहलौर घाट तोड़ने वाला 
दशरथ दास 
अतरी (गया)
लम्बाई-360 फुट चौड़ाई-30 फुट ऊंचाई-25 फुट 
समय – 22 वर्ष
छूता हूँ , निरखता हूँ , माथे लगाता हूँ . मोटे घने सूत में थरथराहट है......निश्छल संघर्ष से स्पन्दना जाग गई है .

- “ लगा लीजिये भागीरथ मेरी तरफ देखते हुए मगही में बोलते हैं , थोड़ा सकुचाता हूँ पर ललक कसमसा गई है ...घीरे धीरे सिर पे रखता हूँ ‘......और नेपोलियन ने पोप के थाल से राजमुकुट उठाकर अपने सिर पे रख लिया .’

ओ बबा ! दस्सू बाबा ! काहे गो एतना बड़ा पहाड़ काट दिए जी ?

कोयला-खदान हो रहा , टू-जी हो रहा, व्यापम हो रहा... महापंगत बैठी है इस देश के छोर से अछोर तक, नेता-अभिनेता, अलेक्टर-फलेक्टर, आफिया-माफिया सब संग-साथ जीम रहे ...गलबहियां फुदक रही ...हर निवाले में दिगंत गुंजाती डकारों के साथ भारत-माता का जय घोष है.....आप तोड़ो पथरा...! रजत शर्मा पदमश्री हो गए .....सचिन भारत-रत्न हो गए आप ठेंगा-शिरोमणिही रहे, और तोड़ो पथरा ! ....रजत शर्मा देश के लिए लिखे-बोले...सचिन जी देश के लिए खेले ...एक आप अपने लिए पहाड़ काट गए ...ओ बबा !

मै जवानों को चलने का इशारा करता हूँ अब अगला पडाव बाबा की कर्मस्थली है - अपने जौम में डूबा गुस्ताख पहाड़ जिसे उसकी रचना के बाद से दलित-टोले में निर्वासित एक मुसहर की अनगढ़ जिद ने हराया .

गाँव से डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ी उचान है जहां बाबा ने रास्ता काटा था इसके मुहाने पर बाबा का एक स्मृति-स्थल बनाया गया है . भागीरथ बताते हैं स्थल तो बन गया पर कोई फोटो-वोटो नहीं लग पाई और परिवारजन भी साधन के अभाव में नहीं लगवा पाए . मै आश्वस्त करता हूँ कि एक बैनर बनवा के भिजवा दिया जाएगा .

ये तीर्थ-पथ का आरम्भ है . जवानों को पीछे  रोक दिया है भागीरथ और मिथुन जवानों के साथ पीछे रुक गए  हैं . सीमा और ओफी के साथ, मै आगे बढ़ता हूँ ...पहाड़ी उंचाई वाला रास्ता, बाबा के हाथ का तराशा हुआ . पहाड़िया कटी-छंटी, कुछ समय पहले सरकार ने कंक्रीट सड़क बनवा दी है लिहाजा गाडियों की आवाजाही भी मुमकिन हो गई है . रफ्ता-रफ्ता उंचाई आ रही . सीमा और ओफी आगे निकल गए हैं, मै सिर झुकाए, पैर जमाता पीछे चल रहा हूँ . जूतों की हलकी खरखराहट ही बाहर है पर भीतर असंख्य अध्वनियाँ कुलबुलाने लगी  हैं - यही पहाड़ है जिसके लिए बब्बा ने सर्वस्व होम कर दिया . इसी के विस्तार को पार करते हुए फगुनी ने प्रथमत: सम्बोधित किया था- ‘ रे औघडिया ’, इसी उजाड़ थान में कभी आदिम-ऊष्मा  गमकी थी, यहीं दो जीवन बिला गये पर अनगिन जीवन-सूत्र निकल आए  . मैं  बचा-बचा के कदम रखता हूँ- भागीरथ द्वारा बताए गए विवरण अब नीचे धरती पर दृश्य-रूप में उभरने लगे हैं –

‘एक घुटन है, जो बिलख पड़ना चाहती है, भीतर ‘धरती-हिलने’ जैसा का थरथरा रहा ...रुलाई-फुलाई की कभी मजाल  न हुई  औघडिया के सामने पर आज गहलौर का पहाड़ छाती को भसका  रहा , उसका उचान आज छाती चीरकर उग रहा- वजीरगंज के ब्लाक चिकित्सालय के पीछे सूने  में स्थित शव-गृह में फगुनी की निस्पंद देह रखी है; पहाड़ी पे बाबा को दाना-पानी पहुचाने के  नियम  में  आज व्यतिक्रम हो गया पैर  जम न  पाए  और खाने की पुटरिया के साथ  फगुनी तीस फुट नीचे कटीले-नुकीले  पत्थरों पर  – माथा धचक गया और संवलाई देह अपने ही खून में नहा गई ...चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया ...ए फगुनी ! फगुनिया रे ! बेर-कुबेर, घाम-वृष्टि, सोक-रोग   घिटती रही संग-साथ, हम औघड़ की दलिद्दरी में दुनिया रचती, रे जीवन-संगिनी ! तेरी सांवल-काया  में ही  इस  औघडिए का ठिया सजा रहा  अब कहाँ धर दें इस अधूरे को ? ....इत्ती  निश्चेष्ट ? भीतर का बिलबिला पसलियों में भरता जा रहा है, फेफड़े फूलने लगे हैं- निचाट अकेले में एक हल्का सा बुक्का  बाहर  आता है और हरहराकर बाँध टूट गया है – भाषातीत  ध्वनि में निमंज्जित  एक तरल हाहाकार भी मिचमिची आँखों से उफन चला है, निर्बाध ! – बब्बा रो रहे हैं ..फल्गु ने दिशा बदल ली  है- दूर-दराज की बहने वाली आज मिचियाए सूने-नेत्र कोटरों से बह रही . शव-गृह की चूने से पुती उघडी दीवार की सीलन में  बब्बा का रुदन भी जम रहा . . दिवार के संग टिके-टिके हल्का घूमे थे कि  खीच-खांचकर  चिथडयाती  कथरी से जैसे-तैसे  ढंकी फगुनी के पैर में अटकी  बिछिया की   चौंध   ही  बहाना हो गयी  और भल्ल-भल्ल करके सात समुन्दर उफन पड़े ;    ओ रे फगुनिया, सुन ! इसी कातर रुलाई की साखी  में संकल्प लेते हैं काट देंगे उस मगरूर को जो तुम्हे भसका  दिए.’
में गिरते-गिरते बचता हूँ, ठोकर ने दृश्य-श्रृंखला को तोड़ दिया है. जवान अब पीछे दीख नहीं पड़ रहे . सड़क-किनारे हलकी छाँव बिखरी है यहीं बैठ गया हूँ. धूल उठाई है- मुट्ठी भर धूल.... अश्रु-स्वेद-रक्तसे सनी धूरी......छैनी- हथौड़े की छन्न-छन्न से अनुगुंजित धूल-कण, एक हाड-मॉस के अभाव, संघर्ष और यातना की शाहिद मुश्त-ए-गुबार. यहीं कहीं बाबा की मढिया भी बनी थी. मैं आस-पास घूरता हूँ और भीतर  भागीरथ के बताये विवरण का   ‘बॉयोस्कोप’ देखता हूँ  - हलकोरे मारते हवा-पानी के झोंको ने मढिया उलट दी थी और अब धारा-धार  बारिश में भुर-भुरे आकाश के नीचे घिर आए थे बब्बा  . मौसमी बुखार में तपते बदन को आज ब्लाक ऑफिस बुलाया गया था जहां बताया गया कि सड़क-निर्माण के लिए आया चार हजार रुपया तो मालिकान कब के ले गए और मालिकान कह दिए –‘ नीच जात के हो थोड़ी दूरी से बतियाओ देहरी पे चढ़ने की  कौन सी नइ रीत सीख लिए दसुआ !सरकार भी चाहे कि पहाड़ जस का तस रहे तभी पिछले हफ्ते  हवालात भी हो आए सरंक्षित पहाड़ को काटे के आरोप में. बस जीवन ही सरंखित नहीं . सरकार से लेकर कपाल-लिखेतक सब उलटे हो रखे हैं, सारे पहाड़-बचैयाऔर सब के विरुद्ध एक अकेला मूसलाधार बारिश में नंगे आसमान के नीचे भींजता बुखार से तपता बदन.  बोर (बब्बा का बोरिया चोगा) के खोंचे में सम्हाली  दवा की पुडिया तो कब  के   सिरा ले गए  इन्दरराज  . अब निरुपाय ! निर्विकल्प ! पर 104 डिग्री सेंटीग्रेड में प्रलयंकारी बरसात में तपते बदन में छुपे उष्ण ने अपना इलाज खोज निकाला है- कांपते हाथो ने छैनी-हथौड़ी उठा ली है- ‘ पाट  देंगे उन सारे उभारों को जो किसी के गिरे का कारन बने तो, गिरते जल-बिन्दुओं  की ध्वनि के साथ  फिर छन्न-छन्न गूंजने लग पड़ी है, हर जल-कण इसी छन्न छन्न में प्रति-ध्वनित हो रहा....   

मुझे लगता है, पहाड़ के शिखर-बिंदु पर पहुंचकर ओफी मुड़कर मुझे देख रही है. मैं अपने आकार से छोटा उसे दिख रहा होऊंगा, सोचता हूँ. उठने-उठने को करता हूँ मगर देह में तपन लगती है – कहीं बुखार तो नहीं ! 104 डिग्री ! कदम उठाते ही उंचाई तीखी हो आई है पीछे से एक जीप आ रही है मै रास्ता देने के लिए साइड में खड़ा हो जाता हूँ . ये अच्छी जगह है यहाँ से  गहलौर गाँव साफ़ दीख  पड़ता है और ‘मालिकान’ का पीला-पुता, ऊँचा, पक्का  मकान भी- गाँव की गतिविधियों के साथ  हथकंडों, पैंतरे-बाजियों,   दुत्कार और खाल-नुचाई का  केंद्र.    इसी की परछाईं  में बगाहे  सवर्ण-तिरस्कार भी झेला था ‘माउंटेन-मैन’ ने. आज दृश्यता माध्यमातीत हो रखी है, विगत अपने में ही घटी-रची होनियों को आज मेरे मनस पे उकेर रहा -

खाल नोचवाकर सिक्का ढालने  वाले ‘मालिकान’ की ड्योढ़ी के आगे छितराई धूप  में कंधे पे चावल लादे खड़े हैं बब्बा. रामजन, सनेही, कुंजल. बीरन, सबने मना कर दिया, सबका लब्बो-लुबाब  –‘पईसा होता तो एसई न दे  देते, चावल का बदला काहे लेते, घर में धेला नहीं है ’..अब बस ‘मालिकान’ का सहारा है वो चावल खरीद लें  तो बचे  भगीरथ ....पैर जला के गया जिला चिकित्सालय के आयसीयू में अठारह घंटे से बेहोश पड़ा है डॉक्टर कह दिए ऑपरेशन होगा, पैसा लाओ वरना  बचना मुश्किल . बस तभी से पैसे  के इंतजाम में बब्बा द्वार-द्वार, देहरी-देहरी हो रहे . लांछन , अपमान और जीवट  के सिवा कभी कुछ जुड़ा नहीं, जोड़े भी नहीं, चुल्लू में पिए , पतरे  में खाए और बोर  पहिन लिए – पर हाय री निरुपायता ! कुकुर-समान दुरदुराने वाले ‘मालिकान’ से आज आस हो आई है . चिलमिली धूप से मिचमिच आँखों के तरल-पटल पर भागीरथ की छवि उभरती है फगुनिया कहती थी बड़े स्कूल में पढ़ाएंगे, तू तो औघड़ रहे, इसको  ‘बाबू ’ बनाएंगे, . पर दुनिया कहे है जे सब पहाड़-बाबा के काटे का फल है, पंडा भी बोले-‘काहे छेडी ले रहे हो दसुआ, भोगना पड़ जाई ‘ . डराते हैं सब . लांछित करते हैं सब. दुरदुराते हैं सब. पग्गल-पग्गल  चिल्लाते हैं सब . ‘ हे विधना  ! कितनी अग्नि-परीक्षा जोड़ रखे हो एक निरे हत्यारे  पहाड़ को बचाने, अब तो जोर-जुलुम तक पे उतर आए ! ठीक है ! तो किरिया लेता हूँ, मालिकान यदि पइसा दे दिए तो साबुत छोड़ दूंगा पहाड़ को नही तो मटियामेट समझो ’ और पहाड़ तो तभी चकनाचूर हो गया था जब बब्बा ने कसम में भी कठिन को चुन लिया था ; मालिकान कुर्ता पहन बाहर को कदम बढ़ाए ही थे कि घरवाली ने खीचा पीछे से और खुद अन्दर से भभकती हुई बाहर आई – ‘ का रे, जब देखो तब मुंह उठाए चला आता है,  तोर हाथ का धान तो हमार  डंगर भी न खाए’  .  ‘मालिकान’ के पईसा बिना भागीरथ को छब्बीस घंटे बाद पाँव के नीचे ठूंठ के साथ होश आया,  संकल्प को तो अब विधना भी  न डिगा सकते थे .इस्पात का स्थायी –भाव ‘संकल्प’ होता है क्या ? कुछ देहों के पञ्च-तत्व में संकल्प भी निहित होता है क्या ?
.....माथे पे पसीना चुह-चुहा रहा है, मै रास्ते के उपरी-बिंदु पर पहुच गया हूँ सीमा और ओफी यहीं खडे हैं उनके बाजू से खड़ा हो जाता हूँ . धूसर पहाड़ से लेकार नीलाहटो  के  विस्तार तक सब ठिठके लगते हैं पर ठिठक के बावजूद एक श्रृंखला जारी है – काल में बे-हिसाब पीछे छूटे कोलाजों का तो आज पर्व हो आया है, दनदनाते चले आ रहे, पर ये कोई चित्र नहीं , कोई दिव्यता नहीं, जीवन का ठोस है – घनीभूत ! सामने वजीरगंज जाने वाली सड़क फरफरा रही है....किसी के पहाड़ काटे से अब जीवन सरल हो आया  है ....अपार, अछोर, अबाध बहने लगा है....पृथ्वी की अक्खड़ भू-संरचनाएं नत हो आई हैं.... ‘ ए फगुनी के औघडिया तेरी जिद पे जान रखते हैं ......

(पांच दिन बाद 07/04/14 को हुए एक हादसे में वाहिनी के एक अधिकारी और दो जवान वीरगति को प्राप्त हुए फिर आम-चुनाव-2014 की व्यस्तताएं और उसके बाद स्थानांतरण .... आश्वासन के अनुसार वाहिनी के चिकित्सक को नहीं भिजवा पाया . बाद में ज्ञात हुआ कि उपचार के अभाव में 12 अप्रैल को खांसी वाली बुढिया उर्फ़ बसंती देवी उर्फ़ दशरथ मांझी की पुत्रवधू का अवसान हो गया)
 (परिकथा के जनवरी-फरवरी अंक २०१६ में प्रकाशित )


परम शिवम
कमाण्डेंट
केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल
अमेठी, उत्तरप्रदेश
मो- 8969205566

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...