Friday, 15 July 2022

शहर का नाम रोशन...

भले ही मैं टीवी न देखूं पर; आज भी अखबार देख लिया करता हूँ। क्योंकि मुझे देश की नहीं अपने शहर की खबरें जाननी होती हैं। देख लेता हूँ,खबरों के जरिये अखबार का चेहरा और उस चेहरे में अपने शहर का अक्स।


आज जो पहली खबर पर नजर गई,वह यह निकली; यूपीएससी में हुआ चयन, शहर का नाम किया रोशन...

मैं हीन भावना से भर उठा। सोचने लगा कि क्या कभी ऐसा मौका आया है, जो मैंने शहर का नाम रोशन किया हो! क्या मैं कलंक हूँ! या शहर पर कोई बदनुमा दाग! क्या मैं भी परीक्षा दूं! पर यहां तो जिंदगी ही रोज परीक्षा लिए जा रही है! अब तो मैं ओवर ऐज भी हो चला हूँ! इससे पहले मैं हीनता के रसातल से पाताल में जाता,मैंने फट से पन्ना पलट दिया।

एक खबर पर मेरी नजर टिक गई।

अर्ध रात्रि को सड़क पर पड़े एक घायल व्यक्ति को राहगीर ने पहुँचाया अस्पताल...
खबर में यह भी बताया गया है कि आपातकाल में उस राहगीर ने घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए अपना रक्त भी दान किया।
मगर मैं खबर में एक लाइन और ढूंढ रहा था,जो बहुत ढूंढने पर भी मुझे नहीं मिली। मैं सोच रहा था कि अखबार ऐसा जरूर लिखेगा कि ऐसा करने से राहगीर ने शहर का नाम किया रोशन। 

मैं निराश होकर फिर दूसरी खबर को पढ़ता हूँ। खबर यह है कि एक रिक्शेवाले ने माल-लत्ते से भरा बैग पुलिस चौकी में जमा करा दिया। बैग में जेवर और कुछ जरूरी कागजात निकले। कुछ देर बाद वह कीमती बैग उसके असली मालिक को खोजकर उसे सुपुर्द कर दिया गया। बैग मालिक ने रिक्शे वाले को इनाम देना चाहा, लेकिन रिक्शा वाले ने मना कर दिया। फिर दरोगा जी के काफी कहने पर उसने एक तुच्छ धनराशि बहुत हिचक के साथ स्वीकार कर ली। मैं सोच रहा हूँ कि अखबार वाले ने यह क्यों नहीं लिखा कि रिक्शे वाले ने बैग वापस करके किया शहर का नाम रोशन...
उसने सिर्फ यह लिखा है कि रिक्शा वाले ने बैग लौटा कर दिखाई ईमानदारी की मिसाल... मैं यह सोच रहा हूँ कि रिक्शेवाले ईमानदार नहीं होते! या गरीब से यह अखबार या कोई भी ईमानदारी की आशा नहीं करता!

मैं कुछ और खबरें देखता हूँ। पन्ने पलटता हूँ। खबरें खोज रहा हूँ, पर विज्ञापन स्वतः दीख पड़ते हैं। वाकई देश बदल रहा हैं। यहाँ खबरें खोजनी पड़ती हैं और विज्ञापन दौड़े-दौड़े खुद आपके पास चले आते हैं। खोजते-खोजते एक खबर पर मेरी नजर रूकती है।

एक औरत कूड़े के ढेर से एक बच्ची को... नवजात बच्ची.. को अपने घर ले आई है। किसी ने उसे कूड़े के ढेर में फेंक दिया था। अखबार लिखता है कि उस औरत ने जो पहले से ही एक बच्चे की मां है,ऐसा करके इंसानियत की दी मिसाल। लेकिन मिसाल देकर भी इस औरत ने शहर का नाम रोशन नहीं किया।
मैं कई बार सोचता हूँ, यह शहर चाहता क्या है या शहर वाले शहर से चाहते क्या हैं ! बस अवसर ! या इसके अलावा भी कुछ!

मैं फिर कुछ अन्य खबरों को देखता हूँ।

एक खबर पर निगाह रुकती है। एक युवक एक युवती को बचाने के लिए चार गुंडों से अकेले ही भिड़ गया। अखबार लिखता है कि कानून व्यवस्था चौपट; सरेआम छेड़ी जाती हैं लड़कियां;युवक ने बीच में आकर बचाई इज्जत...
और इधर मैं सोचता हूँ कि क्या इस युवक ने शहर का नाम रोशन नहीं किया! क्या हैडिंग यह नहीं होनी चाहिए थी कि गुंडों से युवती को बचाकर एक युवक ने किया शहर का नाम रोशन...

मैं अक्सर देखता हूँ; छोटे लोग...आम लोग जिनकी खबरें एक कॉलम, दो कॉलम से ज्यादा नहीं होतीं; वह शहर का नाम भले ही रोशन न करें,लेकिन वह शहर को शहर बनाते हैं। शहर को रहने लायक शहर बनाते हैं। गण्यमान्य लोग तो शोभा बढ़ाते हैं, मगर ये नगण्य लोग ही शहर को जीवंत बनाते हैं। 

शहर का नाम रोशन करने के लिए अब ये यूपीएससी या पीसीएस की परीक्षा नहीं दे सकते। प्रशासनिक 'सेवा' में अपना करियर नहीं बना सकते। बना सकते,तो ये भी करते! मैं जानता हूँ,शहर का नाम रोशन करना इतना आसान नहीं है, जितना आसान किसी की जिंदगी बचा लेना या किसी की जिंदगी में तब्दीली ला देना हैं। सो, ये आसान काम ये आम लोग रोज कर रहे हैं।

मेरे प्यारे शहर! बस इतनी इल्तिजा है तुझसे! मुझे चाहे न क्षमा करना तुम्हारा नाम रोशन न कर पाने के लिए,मगर इन्हें कर देना! प्लीज!


- अनूप मणि त्रिपाठी

Sunday, 10 July 2022

स्वर की शहनाई से निकले पद्मश्री शरद जोशी के जीवन-स्वर


द्मश्री शरद जोशी व्यंग्यकार से पहले एक सहज-सरल, स्नेह-संवलित, आत्मीय व्यक्तित्व की पराकाष्ठा थे। अस्सी के दशक में उन्हे पहली बार मुंबई; तब के बम्बई के पेडर रोड स्थित सोफिया महाविद्यालय के सभागार के काव्य-मंच पर देखा और सुना। मंच कवियों का था- भवानीप्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती जैसे दिग्गज कवियों के मंच पर एक मात्र गद्यकार थे - शरद जोशी। शरद जी के गद्य श्रवण का यह पहला मौका था जहॉं मैने साक्षात देखा, सुना और महसूस किया कि कवियों के मंच पर गद्यकार छा गया था। हंसते-हॅंसते लोगो के गाल दुखने लगे और तालियॉ पीटते पीटते हाथ। इसी से शरद जी के संदर्भ मे एक कहावत ये भी बनी कि ‘मंच कवियों का बाजी-गद्यकार की।‘

            शरद जी से संपर्क करने का दूसरा मौका इसी महाविद्यालय में सन् 1985 में तब मिला जब साहित्यिक आयोजन की चर्चा के दौरान एक छात्रा ने शरद जोशी को बुलाने के आग्रह किया। उन दिनों दूरदर्शन पर शरद जी के ये जो है जिन्दगी, वाह जनाब जैसे धारावाहिक आ रहे थे। विभागाध्यक्ष जी का मानना था कि महाविद्यालयीन विभागों की सीमित धनराशि के लिये शरद जी अपना समय नहीं देंगं। छात्राओं के अनुरोध ने मन को सम्बल दिया था, प्राध्यापकीय जिम्मेदारी महसूस करते हुए मैने प्रयत्न करने की अनुमति मांगी। प्राध्यपकीय पहल करते हुए शरद जी को फोन पर अपना परिचय दिया, सशंकित मन से छात्राओं का अनुरोध सुनाया। मन इन्कार सुनने को तैयार था , किन्तु यह क्या ? शरद जोशी ने तो यह कहते हुए संभावित तारीख दे दी कि मैं दो दिन पहले उन्हे याद दिला दूं। ये थे विश्व पटल के विख्यात रचनाकार, फिल्मकार, धारावाहिकों के लेखक- शरद जोशी।

            शरद जोशी निर्धारित तिथि को निर्धारित समय पर महाविद्यालय पहुचे। नियमतः मुझे शरद जी का सम्मान करने हेतु महाविद्यालय के द्वार पर होना चाहिए था किन्तु विभागाध्यक्ष जी ने मुझे सभागार के अनुशाषन की जिम्मेदारी सौंपी थी। समय के पाबन्द शरद जी ने स्वयं महाविद्यालय की रिसेप्शनिष्ट से हिन्दी कार्यक्रम के स्थल की जानकारी प्राप्त की और कक्ष तक आ पहुंचे। इतना सरल इतना सहज इतना नेक इतना महान था शरद जी का व्यक्तित्व ! उनका व्यक्ति-पक्ष। पारखी-नजर इतनी तेज कि कार्यक्रम के उपरान्त अल्पाहार के समय तीन प्राध्यापिकाओं मे उन्होने सहज ही मुझे पहचानते हुए पूछा- फोन पर आप ही ने मुझे धमकाया था ना ! यह थे शारदीय व्यक्तित्व के धनी शरद जोशी। वापसी में उन्हे वर्ली के किसी दफ्तर जाना था। हमारी एक वरिष्ठ सहयोगिनी श्रीमती अरुणा दुआ जी के पास वाहन की सुविधा थी, सो हम साथ हो लिये। संयोग से मेरा घर शरद जी के गन्तव्य स्थल के समीप ही था सो हम साथ ही उतरे। वहॉं खड़े-खड़े शरद जोशी जी ने जो जानकारी दी, उसे हम पेशेवर गुरुओं की बेशर्मी ही कह सकते है। हुआ यह था कि जिस दिन शरद जी ने मेरे फोन के आग्रह को स्वीकार किया था, उसी शाम विभागाध्यक्ष महोदय ने उन्हे यह कहते हुए रोकने की कोशिश की कि मामूली से पत्रं पुष्पं के लिए वे मुम्बई के गोरेगॉव से पेडर रोड तक; लगभग 40 किमी की दूरी तय कर आने का कष्ट क्यों उठा रहें है। शरद जी का जवाब था- यह तो मेरा मामला है, आप दुखी क्यों हो रहे हैं।

            शरद जी अपने घर से हमारे महाविद्यालय तक स्वयं आये। न कोई राह-खर्च न किसी पत्रं पुष्पं की अपेक्षा। यह था एक व्यंग्यकार का शारदीय व्यक्तित्व !

            संभवत: उनके लेखन और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही मैने अपने शोध का विषय – स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी व्यंग्य निबंध चुना। प्रमुख व्यंग्यकारों में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रविन्द्रनाथ त्यागी तथा नरेन्द्र कोहली जी रहे। शरद जोशी जी मुम्बई महानगर में उपलब्ध व्यंग्यकार थे |

परिचय भी हो ही गया था सो एक दिन समय लेकर उनके आवास पहुँच गयी। शरद जोशी जी स्नान, भोजन की चिन्ता किये बिना लगभग तीन घंटे तक व्यंग्य पर चर्चा करते रहे। मुझे छोड़ने मुख्य द्वार तक आये ही नही बल्कि सामने से बोले- कभी अपने घर भी बुलाइये।

            विश्वास नहीं कर पा रही थी कि इतना बड़ा व्यंग्यकार, इतने गहरे, इतने निर्मल व्यक्तित्व का धनी है। खैर उनकी सुविधा-अनुसार मेरे घर आने की तारीख तय हुई। उस दिन शरद जी को वर्ली के दफ्तर में शाम के 4 बजे आना था सो उन्होंने मुझे 6 बजे का समय दिया। वहॉं पहुँचकर देखती हूँ कि शरद जी पत्रिकाओं को पलटते हुए मेरी प्रतीक्षा में समय बिता रहें है। अधिकारी के साथ तय उनकी मुलाकात टल गयी थी वे चाहते तो किसी कर्मचारी को सूचना देकर निकल जा सकते थे। किन्तु शाम के 4 बजे से 2 घंटे वहीं रुके रहे। यह थे अपने नाम को सार्थक करने वाले, व्यंग्य की विसंगतियों को महसूस करने वाले शरद जोशी। मुझ जैसी अदना शोधार्थी के लिये दो घंटे दफ्तर में इन्तजार करने के बाद मेरे घर आये और रात के लगभग 11 बजे तक अनेकानेक सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक मुद्दों पर बातें करते रहे। रात के 11 बजे गाड़ी उन्हे छोड़ने जा रही थी तो यह सोचकर मै भी साथ हो ली कि शरद जी का कुछ और सानिध्य- आनन्द ले लूं। पूरे रास्ते वे इस शोधार्थी को जानकारी देते रहे और लगभग एक घण्टे बाद जब उनके निवास पर पहुंचे तो मकान के नीचे खड़े-खड़े विषय पूरा किया। उनका एक वाक्य आज भी जेहन मे धॅसा हुआ है- आपके सामने समुद्र है! तय आपको करना है कि आप मात्र एक लोटा भरना चाहती है या उससे कहीं अधिक।

            शरद जी के शारदीय बड़प्पन से मन इतना अभिभूत रहता कि अक्सर अपनी मित्र-मण्डली, अपने अन्य सहयोगी-प्राध्यापकों से मै अपनी अनुभूतियॉं बॉंटती। सोफिया कॉलेज की नौकरी जा चुकी थी और अब मैं माटुंगा के महाविद्यालय में कार्यरत थी। यहॉं के विभागाध्यक्ष जी से अक्सर अपने विषय की चर्चा करते हुए शरद जी का प्रसंग आ ही जाता। एक बार विभागाध्यक्ष जी ने इच्छा जाहिर की कि मैं शरद जी से मुलाकात का समय मॉगू ताकि वे भी उनसे बात कर सकें। मैने सहज ही शरद जी को फोन पर अध्यक्ष जी की इच्छा बतायी ! मेरे भावुक मन के भोलेपन को पितृव्रत समझाते हुए शरद जी ने जानकारी दी कि मेंरे अध्यक्ष महोदय उनसे भलीभॉंति परिचित हैं, उन्हे स्वयं मुझसे बात करनी चाहिए।ष् शरद जी ने मुझे समझाया कि मै ऐसे अध्यक्षों के फेर में न पड़ू। यह थे शरद जोशी एक अनुभवी साहित्यकार, जिन्होने मेरी भावनाओं को चिन्तन का आधार दिया, सूझ-बूझ और लोगों को परखने की दृष्टि दी। याद आ रहा है रमेश दवे जी का वाक्य- श्शरद जी की उपस्थिति समाज के नैतिक साहस और लेखक के लोकदायित्व की उपस्थिति थी।श् कुछ मुलाकातों के बाद शरद जी मुझे अपनी जीवनी लिखवाने लगे और मेरे संकोच को दूर करते हुए उन्होने कहा था मै उन्हे फोन कर लिया करु, वे जब जितना बता पायेंगे मै लिखती जाऊॅं। मैने उत्साह भरे स्वर में कहा आप प्रतिदिन लिखते है मैं प्रतिदिन फोन कर लिया करुंगी। काश यह संकोची मन प्रतिदिन फोन कर लेता तो पद्म श्री शरद जोशी के जीवन के अनेकानेक बातों के धनी हो पाते हम ! करीब तीन-चार बार ही उनसे बात हो पायी और 5 सितम्बर 1991 को वे अकस्मात हम सब को छोड़कर चले गये। शरद जोशी जी की अंतरंग मुलाकातों को शब्द देना इसलिए जरूरी लगा कि हिन्दी जगत के एक धीर-गम्भीर व्यंग्यकार, चिन्तक के सहज-सरल मानवीय पक्ष से भी हम सब परिचित हो सकें।

            बात शरद जी के व्यंग्य और व्यंग्यकार की। एक ऐसे व्यंग्य, गद्य-व्यंग्यकार की जिसने अपनी भाषा का शिल्प स्वयं रचा। आपसी संवाद और बोलचाल का शिल्प। संवाद की कहन शैली में वैचारिक चिंतन और मंथन का शिल्प ! वाचन और श्रवण का लोकरंजक शिल्प। संवेदन-सिक्त समालोचन का सहभागी शिल्प। यह था समय का यथासंभव व्यंग्य। प्रतिदिन व्यंग्य, व्यंग्य ही व्यंग्य। निरन्तर अपनी जॉंच करते रहने की लेखकीय मजबूरी का व्यंग्य-ष्हर लिखना श्रेष्ठ लिखने का प्रयत्न सिर्फ इसलिए कि रचना का मकसद पूरा हो। अपनी बात समझाते हुए शरद जोशी लिखते हैं- ष्समस्या है लेखन की इस दौड़ -धूप में संगत-असंगत, न्याय-अन्याय, सही-गलत को लगातार हर लम्हा समझना और लिखते वक्त अपनी निजी विशिष्ट धारणा  को कटु यथार्थ भोगने वाले सामान्य जन की भावना की ऊॅंचाई तक पहुॅंचाने की कोशिश।ष् आगे शरद जोशी जी कहते हैं -ष्जिस देश के लोग हजारों वर्षों से आक्रमण, अत्याचार, अन्याय, भूख, गरीबी, बिमारी,निराशा सहन करते हुए अपने कतिपय मूल्यों, विश्वासों और आस्थाओं से जुड़े रहें हैं। उनमें जिन्दा रहने के लिए कोर्इ्र श्सेंस ऑफ ह्यूमरश्, कोई मस्ती जरूर रही होगी। हैं।............. उसंके बिना इन बर्षों तक जिंदगी का यह संघर्ष संभव हीं नहीं था.......... व्यंग पहचान है कि साहित्य कष्ट सहती जिंदगी के करीब है या जुड़ा हुआ है।.......... हिंदी जब सामान्य जन के भाषाई रंग और मस्ती में रहेगी व्यंग अधिक लिखा जायेगा। ष्

            शरद जी ने सामान्य जन के इस भाषाई रंग और मस्ती को इस गहरार्इ्र से पकड़ा कि वे व्यंग्य के पद्मश्री आसन पर प्रतिष्ठत हुए। ष्बाढ़ की चिन्ताष् शरद जी की लेखनी तक आते आते ष्चिन्ता की बाढ़ष् बन जाती है। ष्चाराष् शब्द मात्र पशुओं के आहार तक सीमित न रह भाईचारा तक पहुच जाता हैं। जनता दल से उनकी लेखनी पूंछती है- आखिर इसमें जनता कितनी है और दल कितना ? वह क्या श्जनताश् और क्या श्दलताश् है? हाल यह है कि स्वार्थ को समर्पित जनता उनकी लेखनी तक आते आते ष्अजनताष् बन जाती है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अंतुले से शरद जोशी प्रश्न करते है- तुले तुम अनतुले ही आए और अनतुले ही चले गये। तुम अंततः  तुलोगे, पर कब ? शरद जोशी का समग्र लेखन जन-पीड़ा के इसी रसात्मक संप्रेषण का लेखन है। लोक-जीवन के आंतरिक सौन्दर्य और उसके कल्पनाशील माया लोक का सम्प्रेषण है। वर्तमान जीवन शैली- हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे का साहित्यांकन है। खेल-खेल में चिन्तन और चिन्तन में खेल की अद्भुत जिंदादिली है। मनुष्य सरल, सहज, खराखरा होने के साथ ही जटिल, गम्भीर, दुरूह और त्रासद भी है। मनुष्य को उसके मूल रूप में पकड़ते हुए शरद जोशी का व्यंग्य मानव-पीड़ा का सहयात्री है। एक ऐसा सहयात्री जो कहीं कोंचते हुए छीलता है तो कहीं छीलते हुए कोंचता है। कहीं वह विशुद्ध खेलम-खेल है तो कहीं मखौल का अनावरण। इसमें लाखों निजी स्वर हैं। शर्मनाक जीवन-स्थितियाँ, शानदार राजनीतिक उपलब्धियाँ, अनमोल जीवन का अनमेलस्वरूप, भ्रष्ट अफसर, सत्ताधारी राजनीतिज्ञ, शर्मनाक जीवन - स्थितियाँ सभी कुछ की जिंदादिल परिक्रमा, जीवन के जितने भी पहलू हैं, हो सकते हैं, सभी का सम्पूर्ण आकलन, श्वेत-श्याम स्वरूप की प्रस्तुति है शरद जोशी के व्यंग्य। जहाँ-जहाँ डोलत सोई परिक्रमाका पक्षधर। जो जो करत सो सेवा“, “पुनि पुनि चन्दन पुनि पुनि पानी का वह जीवन जो समाज में यत्र-तत्र सर्वत्र

शरद जोशी जी के व्यंग्य पर व्यंग्यकार एवं व्यंग्य-समीक्षक- प्रेमजनमेजय जी कहते हैं कि शरद जोशी होने के अनेक अर्थ हैं पर सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है - जीवन भर अनर्थ के विरूद्ध लड़ते रहना

मैनें अक्सर ही श्रेष्ठ व्यंग लिखा हैंकहते हुए शरद जी स्वीकार करते हैं कि हर रचना पहली रचना लिखनी की कोशिश, उत्साह और भय के साथ लिखना पड़ती है ..... हर लिखना श्रेष्ठ लिखने का प्रयत्न सिर्फ इसलिए कि रचना का मकसद पूरा हो।आगे वे लिखते हैं - व्यंग पहचान है कि साहित्य कष्ट सहती सामान्य जिन्दगी के करीब है या जुड़ा हुआ है। शरद जी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक हर प्रकार की समस्याओं की गहरी समझ के साथ हल्के ढंग से व्यंग्य करते हैं - भूतपूर्व प्रेमिकाओं को पत्र लिखते हुए शरद जोशी लिखते हैं - उन दिनों हिंदी साहित्य छायावाद छोड़ चुका था और मायावाद में फंस चुका था। ... जिन होंठों के अचुम्बित रहने का रिकार्ड बंदे ने पहली बार तोड़ा था, उन पर तुम्हारें पातिव्रत्य की आज ऐसी लिपस्टिक लगी है, जैसे मेरी कविता की कॉपी पर धुल की तहें।

शरद जोशी की व्यंग्य रचनाओं से गुजरना केवल विसंगतियों और घोर स्खलनों की गलियों से भटकना भर नहीं, अपितु भाषा और शिल्प की एक चमत्कारी प्रदर्शनी की यात्रा भी है।  उनके व्यंग्य में कहीं परिवेश के अंतर्विरोध नजर आते हैं, कहीं कहावतें भरी लोकभाषा । परिक्रमा, किसी बहाने, जीप पर सवार इल्लियाँ,

रहा किनारे बैठ, तिलस्म, दूसरी सतह, पिछले दिनों, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें, यथा - सम्भव, हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, मुद्रिका रहस्य, यथासमय, नदीं में खड़ा आदमी, घाव करें गम्भीर आदि रचनाओं में शरद जी की व्यंग्य-सम्पदा एकत्र हैं। इन सब में न जाने कितने विषयों पर कितनी भंगिमाओं में शरद जोशी का व्यंग्य संकलित हैं। कम- से - कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ की प्रस्तुति ही उनके व्यंग्य का केन्द्रीय वैशिष्ट्य है। विसंगितियों के शिकार बने शरद जोशी ने अपने अनुभवों की प्रमाणिकता के माध्यम से विसंगितियों के मूल की तलाश की और उन पर प्रहार किये। डॉ0 भगीरथ बड़ोले निर्मलजी के शब्दों में उनका प्रखर लेखन मानव जीवन को कुरूप बनाने वालों के विरूद्ध किसी स्वाभिमानी मनुष्य का ऐसा लेखन है, जिसके अपने सपने तथा तमाम संघर्ष जीवन के सौन्दर्य से सम्पन्न करने की साधना से सम्बद्ध है।

रमेश दवे जी के शब्दों में शरद जोशी व्यंग्य में अपनी आत्मा के अक्षर उकेरते थे। वे व्यंग्य में मनुष्य के प्रति आस्था जीते थे, एक संवेदनशील मनुष्य - चरित्र जीते थे और वह नैतिकता जीते थे।

व्यंग्य - अध्येताओं की जानकारी के लिए साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित रमेश दवे जी की पुस्तक- शरद जोशीष् का परिचय प्रस्तुत करते हुए अपनी बात को विराम देती हँू - शरद जोशी हिन्दी के एक ऐसे व्यंग्यकार हैं, जिनके सृजन ने हिन्दी साहित्य में अपना ही व्यंग्य-समय रचा और व्यंग्य को एक स्वायत्त, स्वतंत्र और लोकप्रिय विधा के रूम में स्थापित किया। शरद जोशी का व्यंग्य मनुष्य के जीवनगत अनुभवों का व्यंग्य है, धरती का व्यंग्य है, मनुष्य के दुःख-सुख की धड़कनों का व्यंग्य है। उनके व्यंग्य आहत करने के बजाय राहत देते हैं, शब्द-हिंसा की अपेक्षा शब्द -करुणा और शब्द- रंजना देते हैं। वे आंतरिक क्षोभ की अभिव्यक्ति भी हैं और बाह्य जगत के छद्मों के विरूद्ध अनासक्ति भी। शरद जोशी के व्यंग्यों में कविता का-सा रस, कहानी का सा कसाव और निबंधो की-सी बौद्धिकता का सहज समन्वय है। उनका व्यंग्य चेतना का व्यंग्य है, अंतश्चेतना का भी और बाह्य चेतना का भी। उनका व्यंग्य राज का भी व्यंग्य है, समाज का भी व्यंग्य है। वन और जीवन, गति और दुर्गति, नीति और अनीति, क्षोभ और क्षेम, विरह और प्रेम, व्यवस्था और अवस्था और समय एवं अवकाश सब कुछ उनमें व्यंग्य बनकर प्रकट होते हैं।

- डॉ0 शशि मिश्रा

Tuesday, 5 July 2022

साहित्यकार बनने के नुस्खे

आप साहित्यकार बनना चाहते हैं मगर कोई सम्पादक या प्रकाशक आपको घास डालने को तैयार नहीं। आप एकदम मायूस न हों, मैं आपको कुछ ऐसे पेटेन्ट नुसखे बता रहा हूं जिन्हें आज़माने से आपकी साहित्यकार बनने की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। अगर आप समझते हैं कि साहित्यकार बनने के लिये आपको साहित्य पढ़ना पड़ेगा तो यह आपकी नासमझी है। इसी नासमझी की वजह से पचास फ़ीसदी लोगों की साहित्यकार बनने की मुरादें असमय ही दम तोड़ देती हैं। अगर आप पढ़ने के चक्कर में पड़कर साहित्य के अथाह सागर में एक बार डूबे तो ज़िन्दगी भर गोते लगाते रह जायेंगे और कोई आपको जान तक नहीं पाएगा। अरे भाई! कबीर कहां पढ़े लिखे थे? सूरदास के ज़माने में तो ब्रेल लिपि की ईजाद ही नहीं हुई थी। आपको भी इन्हीं के पदचिन्हों पर चलना चाहिये। में। आप तो स्वयंभू साहित्य हैं, क्या ज़रूरत है निराला, मुक्तिबोध, प्रेमचंद आदि को पढ़ने की। बस आप लिखना शुरु कर दीजिये और आगे बताये गये नुस्खों पर अमल कीजिये। 

साहित्य सृजन के लिये बस आपको तुक मिलाना आना चाहिये। शिल्प अथवा कथ्य की परवाह करने की कोई ज़ुरूरत नहीं। किन्हीं चार-छः कवियों की कवितायें पढ़ीं, शब्दों में थोड़ा हेर-फेर किया, कुछ पक्तियां इधर-उधर कीं, तैयार हो गयीं कुछ ताज़ा रचनायें मुक्तता का युग है, आप मुक्त हैं कुछ भी लिखने के लिये। आपका लिखा किसी के पल्ले पड़े या न पड़े और उसका कोई अर्थ निकले या न निकले, आप इसके बारे में तनिक भी परेशान न हों। आपका लिखा आसानी से समझ में आ जाये तो आप (साहित्यकार) और पाठक में फ़र्क ही क्या रह जायेगा। जो चित्र समझ में न आये वही माडर्न आर्ट और जो साहित्य पल्ले न पड़े उसे ही आधुनिक साहित्य समझा जाता है। स्तरीय साहित्य वही है जिसे लेखक ख़ुद लिखे, खुद पढ़े और स्वयं ही समझे। नमने के तौर पर (आपकी सुविधा के लिये) कुछ पक्तियां अर्ज कर रहा हूं-

डण्डे की नोक पर टिका है अण्डा, अण्डा सफेद झक, अण्डा अण्डाकार जिसके भीतर है समूचा ब्रह्माण्ड अण्डा उछल रहा है, एक बूढ़ा बालक फुदक रहा है अण्डा...

पाठकों को शब्दाडम्बरों में उलझाना भला कौन सा मुश्किल काम है। छायावाद चला गया तो क्या हुआ आप छायावाद के भूत और रहस्यवाद के फ़ार्मूले का इस्तेमाल करने के लिये स्वतंत्र हैं। यह दीगर बात है कि न तो आप छायावाद के बारे में कुछ जानते हैं और न ही रहस्यवाद के विषय में |

यदि आपकी इच्छा लोकप्रिय मंचीय कवि बनने की है तो सबसे पहले आप चुटकुलों की कुछ किताबें खरीदिये जिनमें नानवेज चुटकुले भी हों। अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल कर आप चुटकुलों का काव्य रूपान्तरण कर डालिये। अब आप धौंस जमा सकेंगे मंचों पर शर्त यह कि मंच पर काव्य पाठ करते समय आपको कुछ लटकों-झटकों तथा कुछ विशेष मुद्राओं का प्रयोग ज़ुरूर करना पड़ेगा, कुछ ही दिनों में जिसके आप अभ्यस्त हो जायेंगे आपकी जो हास्य कविता हिट हो जाये उसे ही हर मंच पर सुनाकर आप साल दर साल दर्शकों की वाह वाही लूट सकते हैं और पत्र-पुष्प भी अर्जित कर सकते हैं बग़ैर कुछ नया लिखे।

साहित्यकार बनने के लिये सिर्फ लिखने से काम नहीं चलने वाला आपको प्रचार तंत्र के महत्व को समझना पड़ेगा और विज्ञापन के बहुप्रचलित हथियार के प्रयोग में सिद्धहस्त होना पड़ेगा। समीक्षकों और सम्पादकों का दामन थामना साहित्य की इण्डस्ट्री में पांव जमाने के लिये अनिवार्य है। आलोचक और समीक्षक जब जिसे चाहें ज़मीन से उठाकर आसमान पर बैठा दें और चांद से लाकर धरती पर पटक दें। सम्पादक अगर आप से मुंह फेर लें तो भी आपका लिखा सब गोबर इसलिये हे भावी स्वनामधन्य साहित्यकार ! सम्पादकों और समीक्षकों से रिश्ता जोड़ो। उनसे अपनी घनिष्ठता बढ़ाओ और उन्हें ही अपना माई-बाप सबकुछ समझो |

प्रकाशकों सम्पादकों तक आपकी एप्रोच हो, इसके लिये जुरूरी है कि या तो आप खुद उच्च अधिकारी हों अथवा ऊंचे अफ़सरों से आपका अच्छा सम्पर्क हो आज की तारीख में तक़रीबन हर बड़े सौ अफ़सरों में से पचास साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। आये दिन किसी न किसी अफ़सर के उपन्यास या कविता संग्रह का विमोचन होता ही रहता है। इसलिये आप किसी न किसी बड़े अफ़सर की चाटुकारिता करिये और उससे दोस्ती गांठिये। वह आपके लिये साहित्यकार बनने की सीढ़ियां बनाएगा |

कवि अथवा कथाकार के रूप में लगातार चर्चा में बने रहने के लिये समय समय पर पुरस्कृत होना व प्रशस्ति पाना आवश्यक है। इनकी व्यवस्था आपको खुद करनी पड़ेगी और खर्च भी आप ही को वहन करना पड़ेगा। नुस्खा थोड़ा खर्चीला जुरूर है पर है बड़ा कारगर आप किसी संस्था द्वारा अपना सम्मान समारोह अथवा अपनी नयी किताब का विमोचन समारोह स्वयं आयोजित करवाइये। विमोचन अगर किसी स्थानीय नेता या किसी पत्रिका के सम्पादक द्वारा हो तो बेहतर है।

- चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव

लफ़्ज़ 30

26 जनवरी से 25 अप्रैल 2006

 


 

Saturday, 2 July 2022

2 जुलाई - जन्मदिवस स्व. सुशील सिद्धार्थ

आखेट [व्यंग्य संग्रह] – सुशील सिद्धार्थ        


समाज की बिखरी पड़ी विसंगतियों का बखूबी ‘आखेट‘

              ख्यात व्यंग्यकार, आलोचक,संपादक , चर्चित स्तम्भकार सुशील सिद्धार्थ का जन्म 2 जुलाई 1958 को हुआ और 17 मार्च 2018 को अचानक वो हम सबको अलविदा कह गए।
                 देश के व्यंग्यकारों को एक मंच पर लाने और आपस में विचार विमर्श के लिए एक व्हाट्सएप समूह का गठन लखनऊ के साथी व्यंग्यकारों के साथ वर्ष 2015 में  सुशील जी ने किया - व्यंग्य लेखक समिति ( वलेस ) । व्यंग्य लेखक समिति के जरिए सुशील जी ने समालोचक राहुल देव , भुवनेश्वर उपाध्याय , व्यंग्यकार डॉ सुधांशु नीरज ,लमही पत्रिका के श्री विजय राय के साथ मिलकर व्यंग्य से जुड़ी कई परियोजनाओं को सार्थक और पुस्तकों का प्रकाशन किया। उनके असामयिक निधन से व्यंग्य की कई योजनाएं अधूरी ही रह गईं।
        सुशील जी के छह व्यंग्य संग्रह , दो अवधि कविता संग्रह प्रकाशित हैं।  सुशील जी के जाने के बाद उनका सातवां व्यंग्य संग्रह  ' आखेट ' किताबघर प्रकाशन ,नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। 232 पृष्ठ के इस संग्रह में सुशील जी के 41 व्यंग्य हैं। सुशील जी व्यंग्य संग्रह ' आखेट ' के जरिये समकालीन व्यंग्यकारों में अपने अलग तेवर ,अंदाज और कहन के लिए सबसे अलहदा ,अव्वल और अग्रणी नजर आते हैं। सुशील जी ने ' आखेट  ' व्यंग्य संग्रह के  विषयों के साथ नए प्रयोग किये वहीं प्रचलित विषयों यथा शोकसभा , साहित्यिक गुटवाद , पुरस्कार ,सम्मान ,  साहित्य में मठाधीशों की महिमा जैसे सदाबहार विषयों पर उनके व्यंग्य आज भी ताजगी का अहसास कराते हैं। सुशील जी के व्यंग्य , उस परंपरा के हैं जहाँ व्यंग्य की शब्द सीमा ,निबंध के बराबर मानी गई है और ' आखेट' के  व्यंग्य बराबर विस्तार लिए हुए हैं। सुशील जी ने हर शैली में व्यंग्य रचे फिर वह संवादात्मक हों , कथात्मक हों या नाटकीय शैली में हों। सुशील जी के पास समृद्ध भाषा है जिसका उपयोग उन्होंने अपने व्यंग्य में किया है। ' आखेट' में सुशील जी के व्यंग्य के शीर्षक भी नयापन लिए  हैं ,और व्यंग्य पढ़ने की लालसा जगाते हैं। संग्रह को पढ़ते हुए सुशील जी के व्यंग्य कहने का  अंदाज इतना दिलकश होता है कि आप व्यंग्य से जुड़ जाते हैं। व्यंग्य में उपमाओं की भरमार होती है और इससे व्यंग्य रोचक हो जाता है। सुशील जी अवधि भाषा में निष्णात थे अतः उनके व्यंग्य में भी अवधि  यत्र ,तत्र दिखाई देती है। रामचरित मानस की चौपाइयों ,कबीर के दोहों का व्यंग्य की आवश्यकता के हिसाब से सुशील जी उपयोग करने से नहीं चूकते।
                  संस्थाओं के सेमिनार और कैसे वे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय हो जाते हैं सुशील जी ने बहुत तबियत से लिखा है। माँ - बाप की मृत्यु पर  भी कुछ लोग अपनी व्यस्तताओं और भविष्य के फायदे के कारण घर नहीं आ पाते उनके लिए  व्यंग्य ' अपार दुख के पार ' में सुशील जी ने लिखा है  -    ' इतना मत रोओ। इतना चाहती हो तुम अम्मा को अगर यह बात अम्मा जान जातीं तो दो - चार साल और जी जातीं। '
इस संग्रह के व्यंग्य ' एक अचंभा देखा रे भाई ' में सुशील जी की मुलाकात ,कबीर से हो जाती है और तब कबीर देखते हैं कि वो जो लिख गए हैं ,धरती पर उससे उल्टा और अजीब ही हो रहा है।
व्यंग्य ' गोद लिए जाने का सुख ' में गोद लेने के महत्व को दार्शनिक अंदाज में व्यक्त किया गया है । बानगी देखिए-   ' समाज रचना और स्त्री के साथ एक जैसा आचरण करता है। दोनों को अपने अच्छे होने का प्रमाण रसिकों से लेना होता है। '
' इतिहास गवाह है कि किन्नरों के लिए नवाबों में , नर्तकियों के लिए राजाओं में और शिष्यों के लिए गुरुओं में भांति - भांति के संघर्ष हुए हैं।'
' बूड़ा बंस कबीर का ' व्यंग्य में वर्तमान राजनीति को नँगा किया गया है - ' सपने वे होते हैं जिनको पूरा करने के लिए आप पूरे मुल्क को चैन से सोने नहीं देते । बस एक बार सपना आ जाए कि सबको पछाड़कर आगे निकलना है।'
' सबसे पहले लँगड़ी मारकर कुछ लोगों को लँगड़ा बनाना । फिर उनको मंडल या कमंडल थमा देना। खुद अपार शब्दों के भंडार की चाबी थाम लेना क्योंकि बातें हैं बातों का क्या। हमारे लोग बातपसन्द हैं और बातें अच्छी करने वाले लोग जेब काट ले जातें हैं।'
' तो खेल शुरू । जाति ,धरम ,मजहब ,इलाका जबको बेचना शुरू। सबसे बिकाऊ माल है धरम... इंसानियत।'
व्यंग्य ' सोच व्यापक रहिए ' में सदाबहार बेरोजगारी पर सुशील जी का प्रहार देखिए- ' दिनकर की पुस्तक है - संस्कृति के चार अध्याय । तुम उससे बड़ा ग्रंथ लिखो - बेरोजगारी के पांच अध्याय ' । प्रेमचंद की कहानी है - बड़े घर की बेटी । तुम लिखो - छोटे घर का बेरोजगार बड़ा बेटा।'
' एक दूसरे पर थूकना ही आत्मीयता और पड़ोसी होने का लक्षण है'
' साहित्य में भी ज्यादातर कौन चर्चित है ,वही जो वैचारिक गुंडे हैं , शब्दों के आइटम सांग हैं और काट डालने योग्य हैं। ' 
आखेट में ' दुर्दशा पर चिंतन '  सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यों में से एक है। इस व्यंग्य में राजनेताओं के चरित्र चित्रण के साथ देश की दुर्दशा राजनेता कैसे करते हैं , कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के संवादों द्वारा बताया गया है। एक संवाद देखिए -  'शुगर और ब्लडप्रेशर की तरह अब मानवता ,दया , ममता ,प्यार ,करुणा आदि को नापना आदान हो जाएगा। नापो। वाणी में नम्रता रहे तो हत्या भी अनुष्ठान बन जाती है।'
' प्राणियों में सद्भाव हो ... इसके लिए जरूरी है कि प्राणियों के प्राण हर समय संकट में रहें। जिस समाज मे भय जितना अधिक होता है ,उस समाज में धर्म ,सियासत और बाजार उतना ही अधिक मजबूत होते हैं '
' किसी भी मजहब की पूजा इबादत में आंखे मूंदने का बड़ा महत्व है। मजहब कहता ही है कि आंखे गिरवी रखकर ही सत्य को पाया जा सकता है '
' नेता की बरकत मूढ़ जनता से , वकील की झगड़ों से , डॉक्टर की बीमारों से , अखबारों की दे-दना - दन टाइप खबरों से आती है। '
कार्यालयीन भृष्ट व्यवस्था पर उनका एक व्यंग्य इस तरह कटाक्ष करता है -  ' पैसे का लेन - देन हो जाए तो व्यवस्था से बड़ा कोई दोस्त कोई दूसरा नहीं। पैसा ही लोकतंत्र है। वरना सब षड्यंत्र है '
साहित्यकारों की गुटबाजियों , पुरस्कार, सम्मान के खेलों पर संग्रह में कई व्यंग्य हैं।
' वे जानते थे कि सत्ता पुरस्कार देकर दरबार में कुत्ता पाल लेती है। ये कुत्ते दरबार को चाटते हैं और बाकियों पर भोंकते हैं। उन्होंने कुछ बब्बरशेरों को जबरकुत्तों में बदलते देखा है '
               सुशील जी ने अपने पहले के व्यंग्य संग्रह और आखेट में भी नवीन मुहावरों का सृजन किया है । जैसे -
सहानुभूति की क्रीड़ा, तारीफ के सिक्के, करुणा के कुकुर, परंपरा के चमगादड़, मतलब की खेती, व्याख्या की मोमबत्तियां, बहस की अंत्याक्षरी, इंसानियत का बोझ, तर्कों की तलवार ,संवेदनाओं के टूरिस्ट आदि।
सुशील जी अपने व्यंग्यों में शेरो शायरी की पैरोडी का भी खूब प्रयोग करते हैं -
  ' ए मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हों हमारे करम
मूंग हरदम दलें
साथ अपने चलें
चाकू ,कट्टा ,तमंचा औ बम ।'
सुशील जी के व्यंग्य में पंक्तियां ,सूक्तियां बन गईं लगती हैं-
' भीड़ ,भ्रष्टाचार और भय का सात जन्मों का साथ है।'
' सत्ता बदलती है तो सत्य भी बदल जाता है।'
                व्यंग्य संग्रह आखेट  की भूमिका प्रख्यात व्यंग्यकार पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी जी ने लिखी है। सुशील जी ,ज्ञान जी को अपना व्यंग्य गुरु मानते थे और पचमढ़ी की व्यंग्य कार्यशाला के बाद दोनों में फोन पर लंबे संवाद और बातचीत होती रहती थी।  ज्ञान जी की इस भूमिका को पढ़ने के बाद आखेट में क्या कुछ है और सुशील जी का समकालीन व्यंग्य परंपरा में क्या स्थान है ,जाना जा सकता है। ज्ञान जी की भूमिका के बाद ,इस संग्रह पर किसी के लिए भी कुछ नया कहना बचता नहीं है इसलिए मैंने , ' आखेट' की भूमिका का उल्लेख अंत में किया है। ज्ञान जी ने 'आखेट ' की भूमिका में सुशील जी और उनके व्यंग्य के बारे में कहा है कि समकालीन व्यंग्य के भेड़ियाधसान में आखेट एक ताजा हवा का झोंका जैसा लगेगा और  आखेट व्यंग्य की ताजा बयार है।ज्ञान जी लिखते हैं समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में बल्कि भारतीय भाषाओं की समृद्ध व्यंग्य परंपरा में सुशील जी का व्यंग्य अद्वितीय और कई मायनों में इतना अनोखा है कि उसका आदरपूवर्क उल्लेख किये बिना भारतीय व्यंग्य की ईमानदार बात करना कभी भी सम्भव नहीं होगा।
                 अंत में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में युवा व्यंग्यकारों को यदि व्यंग्य के सौंदर्य शास्त्र को पढ़ना , समझना है तो  'आखेट ' को, सुशील जी के अन्य व्यंग्य संग्रहों को जरूर पढ़ें। सुशील जी के  संग्रह 'आखेट' के व्यंग्य कबीरी विचारधारा और परंपरा के बेहतरीन व्यंग्य हैं और देश ,समाज की बिखरी पड़ी विसंगतियों का बखूबी आखेट करने में सक्षम हैं।


- डा हरीशकुमार सिंह

रमाकान्त दायमा की पाँच कविताएँ

रमाकान्त दायमा एक मँजे हुए अभिनेता हैं  |  मुंबई शहर की भीड़-भाड़ में तमाम व्यस्तताओं के बीच समय निकालकर वे कविताएँ भी लिखते रहे हैं  |  इन कव...