Wednesday, 30 June 2021

‘बलचनमा’ का पुनःपाठ जरूरी है - वीरेंद्र यादव

बाबा  नागार्जुन  का  उपन्यास  'बलचनमा', 'गोदान' और 'मैला आंचल' के साथ हिंदी का अत्यंत महत्वपूर्ण  उपन्यास है. पिछले दिनों  इस  पर प्रसिद्द आलोचक वीरेंद्र यादव द्वारा लिखित यह आलेख  आज बाबा नागार्जुन  के जन्मदिन के अवसर पर  यहाँ संलग्न है-


नागार्जुन के उपन्यास बलचनमाके लेखन-प्रकाशन  के लगभग सात दशक बाद इसका यह  पुनः पाठ महज एक उपन्यास पर पुनर्विचार न होकर औपन्यासिक विधा की उस सामर्थ्य से रूबरू होना है जिसे महज साहित्यिक पाठ से नहीं समझा जा सकता . इसके लिए जरूरी है कि  उपन्यास को महज साहित्यिक संरचना के रूप में सीमित न  कर उसे सामाजिक संरचना के रूप में भी विश्लेषित किया जाय. यहाँ दिलचस्प  यह तथ्य है कि 1936 के जिस वर्ष में  प्रेमचंद के अंतिम उपन्यास गोदानका प्रकाशन हुआ था बलचनमाकी  कथावस्तु  का समापन वर्ष वही है. बलचनमाका घटनास्थल बिहार का दरभंगा जिला है तो उसका घटनाकाल 1937 की शुरुआत तक का  है. गोदानकी कथाभूमि तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के अवध इलाके की  है लेकिन कथासमय लगभग वही है स्वाधीनता आन्दोलन और प्रांतीय  असेम्बलियों  के चुनाव पूर्व तक का . गोदानके राय साहब भी स्वधीनता आन्दोलन में जेल जाते हैं और बलचनमाके फूल बाबू भी . गोदानका  होरी भी शूद्र खेतिहर है और बलचनमाका बालचंद भी .होरी भी अपने खेत को बचाने का संघर्ष करता है और बलचनमा भी . जिस तरह गोदान’  स्वाधीनता आन्दोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले देसी प्रभुवर्गों की दुहरी भूमिका का उद्घाटित करता है उसी तरह बलचनमाउपन्यास  भी .  धनिया की ही तरह बलचनमा भी यह प्रश्न उठाता है कि सोराजी हो गए तो क्या ,थे तो आखिर बाबू-भैय्या ही न ! गरीब-गुरबा का दुःख ये लोग क्या जानें ?” प्रेमचंद और नागार्जुन के उपन्यासकार का यह अंतर अवश्य  था कि जहाँ प्रेमचंद अपने वर्तमान की कथा लिख रहे थे वहीं नागार्जुन प्रेमचंद के समय की कथा डेढ़ दशक के अंतराल   के साथ  लिख रहे थे . प्रेमचंद अपने समय के  स्वाधीनता आन्दोलन के साक्षी थे तो नागार्जुन स्वाधीन भारत  के बनते स्वरूप को भी  देख रहे थे . इसीलिये वे निर्णायक रूप में बलचनमाकी जुबानी यह कहला सके कि ,   “जैसे  अंगरेज बहादुर से सोराज लेने के लिए बाबू-भैय्या लोग एक हो रहे हैं ,हल्ला-गुल्ला और झगड़ा-झन्झट  मचा रहे हैं उसी तरह जन-बनिहार ,कुली-मजूर और बहिया-खवास लोगों को अपने हक़ के लिए बाबू भैय्या से लड़ना होगा.”  

 

               दरअसल बलचनमाएक खेतिहर  मजदूर के संघर्षशील युवा के रूप में  व्यक्तित्वांतरण की कथायात्रा है. नागार्जुन के कहन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने  कथा-सूत्र को वृहत और सूक्ष्म दोनों ही धरातलों  पर विरल रचनात्मकता के साथ कथात्मक बनाते हैं. उपन्यास के पहले ही पृष्ठ पर दो कलमी आम चुराने के अपराध में बलचनमा के पिता के पीटे जाने और मृत्यु की घटना  बिहार के सामन्ती जुल्म तले शूद्रों और दलितों की जिस दारुण यातना का चित्र उकेरता है वह एक साथ चाक्षुष और वाचिक है. बलचनमा जाति का ग्वाला था. उसी के शब्दों में हमारे गाँव में पंडितों का बड़ा दबदबा है.राज ही उन्हीं का है .हाँ भैय्या ,आजकल भी . अब तो थोडा बहुत जमाना बदल भी गया है ,मुदा कुछ पाहिले  अगर तुम इसी भांति सतमहला बाल छंटाये, दाढी-मूंछ साफ़ किये मेरी बस्ती में पहुँच जाते ,तो परलय (प्रलय) मच जाता . दादी की कही हुयी बात सुनाऊँ . मेरा बाबू  एक बार ढाका से आया ,बावडी छंटाकर. बूढ़े मालिक उन दिनों महजूत थे . उन्होंने मेरे बाप को बड़ा ही फटकारा .पछ्वारी टोल के पंडित बबुवन झा बुलाये गए और उन्होंने फ़तवा दिया .नदी के किनारे जाकर असतूरा(उस्तरा) से बाल कटाना होगा .बाबू को झख मारकर माथ मुड़ाना पड़ा . एक बार मेरा मामा आया तो हाट पर जाकर उसने दाढ़ी बनवाई .मुझे भी ले गया था .मेरे भी बाल छंटवा दिए थे .क्या पूछते हो भाई, कितना बावेला मचा उस रोज ! अगले ही दिन मुझे भी परास्चित(प्रायश्चित) करना पड़ा”. बलचनमा के शब्दों में  ‘मलिकाइन नहीं चाहती थी कि मैं अच्छर बाचूं  या गिनती-पहाडा याद करूँ.क्योंकि छोटी जातवालों को जो एक आखर भी ज्ञान देता है उसका अपना ही तेज घटता है ;और जो कोई शूद्र को समूची पोथी पढ़ा दे उसके पितर स्वर्ग छोड़कर नरक में रहने को मजबूर होते हैं!’  अपने समूचे कथ्य में यह उपन्यास इस तरह के प्रसंगों और विवरणों के माध्यम से सामाजिक न्याय के उस गर्भ-गृह का पता देता है जहाँ से मंडल-मंदिर की परिघटना को भी समझा जा सकता है.  अपनी संरचना में  यह उपन्यास बलचनमा का आत्मकथात्मक वृत्तांत है. उसी के शब्दों में गालियां ,पिटाई,तिरस्कार,अपमान, दुतकार और फटकार यही वह रास्ता था जिस पर से मेरा जीवन आगे की ओर खिसक रहा था .लेकिन उसे नयी दुनिया का साक्षात् तब हुआ जब वह अपनी मलिकाइन के भतीजे फूल बाबू के खवास(अनुचर) के रूप में पटना आया. 

        ‘बलचनमाके फूल बाबू के चरित्रांकन के माध्यम से नागार्जुन स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल उस अभिजात और प्रभुत्वशाली वर्ग का क्रिटिक रचते हैं जिसकी कांग्रेस में प्रभावी  भूमिका थी . सेठ साहूकारों के स्वाधीनता आन्दोलन में जुडाव का  तथ्य औपन्यासिक कथ्य में कुछ यूं अंतर्गुम्फित है कलकत्ता ,बम्बई के सेठ-साहूकार भीतर ही भीतर गांधीजी का पक्ष ले रहे थे .उनको साफ साफ लौकता था कि सुराज होने से सबसे जास्ती भलाई उन्हीं की होगी .वे देख रहे थे कि सरकार झुकती है ,तो सुराज मिलता है .सुराज मिलता है तो अधिक से अधिक कल-कारखाने वे खड़ा कर सकते हैं . अभी जो देस को दुहकर सारी धन-संपदा अंगरेज ले जाते हैं ,सुराज होने पर वह सब सीधे उनके खजाने में आने लगेगी.’   गांधी जी का सुराजियों को निर्देश था कि वे आश्रम में अपने साथ नौकर चाकर नहीं रखेंगें .नागार्जुन बलचनमामें यह तथ्य उद्घाटित करते हैं कि किस तरह बड़े घरों और उच्च जातियों के लोग वालिन्टीयर के नाम पर अपने साथ नौकर खवास रखते थे . इन सब का काम उनकी जातियों के अनुसार निर्धारित होता था .  ‘फूल बाबू का सुभाव बड़ी जातवालों के सुभाव से लाख गुना अच्छा थालेकिन बलचनमा का उनसे  मोहभंग तब हुआ जब उन्होंने   मलिकार द्वारा उसकी बहन के साथ दुर्व्यवहार करने पर उसे कोई मदद नहीं की  . फूल बाबू से निराश  बलचनमा का निष्कर्ष था  कि बाबू-भैया लोग वहीं तक हमारा पक्ष लेंगें जहाँ तक उनका अपना मतलब रहेगा.’  लेकिन बलचनमा की यह निराशा तब पूर्णता प्राप्त करती है जब वह बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए कांग्रेस की ओर से दी जाने वाली मदद के दौरान फूल बाबू के भ्रष्ट आचरण को देख कर कांग्रेस के बारे में सोचने लगा कि स्वराज मिलने पर बाबू-भैया लोग आपस में ही दही-मछली बाँट लेंगें ,जो लोग आज मालिक बने बैठे हैं आगे भी तर माल वही उड़ावेंगें हम लोगों के हिस्से सीठी ही सीठी पड़ेगी.’  उपन्यास में बिहार भूकंप में कांग्रेस के रिलीफ फंड की किंचित विस्तृत चर्चा से  इस तथ्य का भी रहस्योदघाटन होता है कि भ्रष्टाचार में भी अगड़ी, पिछड़ी और दलित जातियों में भेदभाव किया जाता था . निम्न जातियों को कागज पर  और वास्तव में दी जाने वाली राशि का प्रतिशत कम था  जबकि उच्च जातियों में अधिक. उदहारण स्वरुप तारानंद झा के नाम पर रकम  लिखी थी 30 रु.जबकि मिले थे उन्हें 15रु.. इससे अलग बुद्धू चमार और करीम बक्स के नाम लिखे गए थे 15 रु. जबकि दिए गए थे उन्हें मात्र 3 रु.  

        सच तो यह है कि बलचनमाअपने समूचे कथ्य में स्वाधीनता आन्दोलन के कांग्रेसी नेतृत्व का निम्नवर्गीय दृष्टिकोण से किया गया  आलोचनात्मक भाष्य है. छोटे छोटे विवरणों और  लुप्त व अचर्चित प्रसंगों के माध्यम से यह स्वाधीनता इतिहास की उन अनुपस्थितियों को दर्ज करता है जिनके  बिना स्वाधीनता आन्दोलन की प्रकृति को सम्पूर्णता में नहीं समझा जा सकता . उपन्यास उन परिवर्तनकामी आंदोलनों की सामर्थ्य और सीमा को भी रेखांकित करता है जो कांग्रेस के बरक्स उठ खड़े हुए थे. उपन्यास के राधा बाबू का कांग्रेसी से सोसलिस्ट हो जाना और किसान सभा के नेतृत्व में आन्दोलन ऐसे ही प्रसंग है. बलचनमा के लिए सोसलिस्ट होने का मतलब था कि दरभंगा के महराज हों  चाहे पटना के लाट साहब मुफ्त का खाना किसी को नहीं मिलेगा -- सब काम करेगा ,सब दाम पावेगा ..लूल अपंग, बूढ़-बेकार सबकी जिम्मेवारी सरकार को उठानी पड़ेगी ,पैसे के बल पर कोई किसी को बंधुआ गुलाम नहीं बना सकेगा ...जिसका हर-फार उसकी धरती! जिसका हुनर और जिसका हाथ उसी का कल-कारखाना’  सच है कि राधा बाबू जैसे सोसलिस्ट नेताओं की भूमिका गाँव को गरमाने तक थी लेकिन इन आन्दोलनों के चलते बलचनमा जैसों का व्यक्तित्वांतरण हाशिये के समाज की बड़ी शक्ति थी. बलचनमा का यह संकल्प कि हमने यह तय कर लिया है कि आगे बित्ता भर भी जमीन मालिकों को हडपने नहीं देंगेंउपन्यासकार की ल मेहनतकशों का साथ दिया . लेकिन अपने अंतिम परिणतियों में यह उपन्यास निम्नजन की विजयगाथा न होकर उनकी संघर्षचेतना का ही वाहक है. उपन्यास के अंत में बलचनमा का आत्मस्वीकार है कि मैं बंधा था और जाल में सभी अंग उलझे हुए थे .हाँ दांतों से एक की कलाई को चांपे हुए था.

 ‘बलचनमाका पुनःपाठ जरूरी है  और उच्च जातियों के लोग वालिन्टीयर के नाम पर अपने साथ नौकर खवास रखते थे . इन सब का काम उनकी जातियों के अनुसार निर्धारित होता था .  ‘फूल बाबू का सुभाव बड़ी जातवालों के सुभाव से लाख गुना अच्छा थालेकिन बलचनमा का उनसे  मोहभंग तब हुआ जब उन्होंने   मलिकार द्वारा उसकी बहन के साथ दुर्व्यवहार करने पर उसे कोई मदद नहीं की  . फूल बाबू से निराश  बलचनमा का निष्कर्ष था  कि बाबू-भैया लोग वहीं तक हमारा पक्ष लेंगें जहाँ तक उनका अपना मतलब रहेगा.’  लेकिन बलचनमा की यह निराशा तब पूर्णता प्राप्त करती है जब वह बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए कांग्रेस की ओर से दी जाने वाली मदद के दौरान फूल बाबू के भ्रष्ट आचरण को देख कर कांग्रेस के बारे में सोचने लगा कि स्वराज मिलने पर बाबू-भैया लोग आपस में ही दही-मछली बाँट लेंगें ,जो लोग आज मालिक बने बैठे हैं आगे भी तर माल वही उड़ावेंगें हम लोगों के हिस्से सीठी ही सीठी पड़ेगी.’  उपन्यास में बिहार भूकंप में कांग्रेस के रिलीफ फंड की किंचित विस्तृत चर्चा से  इस तथ्य का भी रहस्योदघाटन होता है कि भ्रष्टाचार में भी अगड़ी, पिछड़ी और दलित जातियों में भेदभाव किया जाता था . निम्न जातियों को कागज पर  और वास्तव में दी जाने वाली राशि का प्रतिशत कम था  जबकि उच्च जातियों में अधिक. उदहारण स्वरुप तारानंद झा के नाम पर रकम  लिखी थी 30 रु.जबकि मिले थे उन्हें 15रु.. इससे अलग बुद्धू चमार और करीम बक्स के नाम लिखे गए थे 15 रु. जबकि दिए गए थे उन्हें मात्र 3 रु.  

        सच तो यह है कि बलचनमाअपने समूचे कथ्य में स्वाधीनता आन्दोलन के कांग्रेसी नेतृत्व का निम्नवर्गीय दृष्टिकोण से किया गया  आलोचनात्मक भाष्य है. छोटे छोटे विवरणों और  लुप्त व अचर्चित प्रसंगों के माध्यम से यह स्वाधीनता इतिहास की उन अनुपस्थितियों को दर्ज करता है जिनके  बिना स्वाधीनता आन्दोलन की प्रकृति को सम्पूर्णता में नहीं समझा जा सकता . उपन्यास उन परिवर्तनकामी आंदोलनों की सामर्थ्य और सीमा को भी रेखांकित करता है जो कांग्रेस के बरक्स उठ खड़े हुए थे. उपन्यास के राधा बाबू का कांग्रेसी से सोसलिस्ट हो जाना और किसान सभा के नेतृत्व में आन्दोलन ऐसे ही प्रसंग है. बलचनमा के लिए सोसलिस्ट होने का मतलब था कि दरभंगा के महराज हों  चाहे पटना के लाट साहब मुफ्त का खाना किसी को नहीं मिलेगा -- सब काम करेगा ,सब दाम पावेगा ..लूल अपंग, बूढ़-बेकार सबकी जिम्मेवारी सरकार को उठानी पड़ेगी ,पैसे के बल पर कोई किसी को बंधुआ गुलाम नहीं बना सकेगा ...जिसका हर-फार उसकी धरती! जिसका हुनर और जिसका हाथ उसी का कल-कारखाना’  सच है कि राधा बाबू जैसे सोसलिस्ट नेताओं की भूमिका गाँव को गरमाने तक थी लेकिन इन आन्दोलनों के चलते बलचनमा जैसों का व्यक्तित्वांतरण हाशिये के समाज की बड़ी शक्ति थी. बलचनमा का यह संकल्प कि हमने यह तय कर लिया है कि आगे बित्ता भर भी जमीन मालिकों को हडपने नहीं देंगेंउपन्यासकार की ल मेहनतकशों का साथ दिया . लेकिन अपने अंतिम परिणतियों में यह उपन्यास निम्नजन की विजयगाथा न होकर उनकी संघर्षचेतना का ही वाहक है. उपन्यास के अंत में बलचनमा का आत्मस्वीकार है कि मैं बंधा था और जाल में सभी अंग उलझे हुए थे .हाँ दांतों से एक की कलाई को चांपे हुए था.

          ‘बलचनमाकी विशेषता यह भी है कि यह अपने समय और समाज का प्रमाणिक दस्तावेज भी है. बिहार के तत्कालीन  सामंती समाज में उच्च सवर्ण जातियों में स्त्रियों को लेकर क्या नजरिया था इसका खुलासा भी उपन्यास में बेबाकी के साथ कई प्रसंगों में हुआ है. स्त्रियों के पढने लिखने के प्रति ग्रामीण समाज के कुलीन वर्ग की सोच थी कि पढता सूगा गाहक को अपनी ओर खींचता है ,पढ़ती लडकी काबिल दूल्हे को अपनी ओर खींचती है .इससे बाप का काम हलका होता है .शादी हुयी कि पढ़ाई बंद .बाप भी आँख मूँद लेता है ,ससुर भी.लेकिन निम्न जातियों के बीच उनके श्रमशील होने के चलते स्थिति भिन्न थी . उच्च जातियों और निम्न जातियों के बीच स्त्रियों की इस भिन्नता को उपन्यास के इस अंश से समझा जा सकता है. गरीबों के यहाँ बहू हो चाहे बेटी ,खेत में काम करने जाना पड़ेगा ,पानी भरना होगा ,माल-मवेशी चराने होंगें .सिंगार पटार में बर्बाद करने लायक बखत गरीब घर की जनानी को कहाँ से मिलेगा ? बड़ी जातवाले चाहे कितना ही गरीब हों ,उनके घर की औरतें रोजी-धंधा के कामों में मर्दों का हाथ नहीं बटा सकतीं .उनके यहाँ औरतें निकम्मी निठल्ली  बैठी रहती हैं .जितना ही बड़ा खानदान होगा ,औरतों में उतना जास्ती निठल्लापन पाओगे .हमारी औरतें मेहनत-मजूरी का दाना खाती हैं . अपनी माँ-बहनों और बहू-बेटियों के HATHहाथ-पैर  हमारे यहाँ सिरिफ छूने मसलने या नचाने-थिरकाने का सामान नहीं हुआ करते; हमारी जिन्दगी का सहारा हैं वे हाथ-पैर.’  यही कारण है कि निम्न जातियों में बेटी-बेटे को लेकर भिन्न दृष्टिकोण भी उपन्यासकार  कुछ यूं प्रस्तुत करता है-हमारी बिरादरी  बराहमन की ,भूंईहार-रजपूत की नहीं है कि लडकी के सीन्थ में सेंदूर पड़ना पहाड़ हो जायेगा .काहे की सोच ,काहे की फिकिर ?’ इसी प्रकार नागार्जुन अपने इस उपन्यास में धार्मिक कर्मकांड का संबंध भी आर्थिक सम्पन्नता से जोड़ते हैं. उपन्यास की इन पक्तियों से इसे बेहतर समझा जा सकता है महंथ बैरागी किसके-किसके गले में कंठी बांधते फिरेंगें ? कोठी-बखारी में धान चाउर भरा हो ,बाग़-बगीचे में तर-तरकारी ,फर-फूल लगा हो तभी कंठी की इज्ज़त बची रहती है .गरीबों के गले में चार दिन भी कंठी सही-सलामत बंधी नहीं रह सकती .’ 

        अपनी सम्पूर्णता में बलचनमाका औपन्यासिक महत्व इस तथ्य में अन्तर्निहित है कि यह स्वाधीनता आन्दोलन के प्रथम दौर का  आंतरिक क्रिटिक तत्कालीन सामाजिक संरचना में रच बस कर प्रस्तुत करता है. विशेषरूप से उल्लेखनीय है इस उपन्यास की वह आत्मकथात्मक संरचना .जिसके अंतर्गत उपन्यासकार ने बलचनमा की कहानी बलचनमा की जुबानी प्रस्तुत की है. दो राय नही कि परकाया प्रवेश के बिना यह संभव नहीं था . लेकिन नागार्जुन  का बलचनमा’  में यह परकाया प्रवेश महज एक तकनीकी दक्षता न होकर वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर हाशिये के निम्नजन के साथ एकाकार होने की प्रतिबद्धता का सुफल भी है. आज जब मुख्यधारा के साहित्य में वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर हाशिये के समाज से एकाकार होने की परम्परा का दिनोंदिन क्षरण हो रहा है तब इस परम्परा की श्रेष्ठ कृतियों के रेखांकन द्वारा इसकी जरूरत और महत्व को  समसामयिक सन्दर्भों में पुनर्परिभाषित किये जाने की जरूरत दरपेश है |



Monday, 28 June 2021

भय और लालच से आती है गुलामी

- अरुण कुमार त्रिपाठी

 

आज 46 साल बाद यह कहना और देखना सुखद है कि देश में दोबारा आपातकाल लागू नहीं हुआ। वह 21 महीने का दुःस्वप्न अब इतिहास का विषय बन चुका है और आज सत्ता में बैठे दल और उसके नेता यह दावा करते नहीं थकते कि हमने आपातकाल से लड़ाई लड़ी थी इसलिए हमें आजादी की कीमत मालूम है। लेकिन दिक्कत यह है कि इस देश का मध्य वर्ग और आम जनता न तो आपातकाल को समझने को तैयार है और न ही ऐसी व्यवस्था करने के लिए सतर्क है कि वैसी स्थितियां दोबारा न आएं। यही बदहवासी हमारे दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है। 

यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि आपातकाल या गुलामी का दौर इसलिए नहीं आता कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री हैं या कांग्रेस पार्टी सत्ता में है। वह इसलिए भी नहीं आता कि जेपी जैसा नैतिक शक्ति वाला लोकनायक उन्हें चुनौती देता है। वह जिन प्रवृत्तियों के कारण आता है वह अगर हमारे समाज में मौजूद रहती हैं तो उसके आने का खतरा सदैव बना रहता है। यही कारण है कि आपातकाल घोषित न होते हुए भी किसी न किसी रूप में रहता है और आपातकाल की घोषणा के बावजूद उसकी बेड़ियां जगह जगह टूटती रहती हैं। महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में कहा था कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम नहीं बनाया बल्कि हमने अपनी आजादी उन्हें सौंप दी। वे इसकी वजह लालच में देखते थे। उनका कहना था कि जो समाज लालची हो जाएगा उसके लिए आजादी बचा पाना मुश्किल है। इसी के साथ वे भय वाले तत्व को भी जोड़ते थे। आजाद रहने और आजादी की रक्षा करने के लिए लालच और भय से मुक्त रहना बहुत जरूरी है। गांधी ने भारतीय समाज के इन्हीं दोनों कमजोरियों को तोड़ा और तब वे देश को आजादी दिला पाए।

समाजवादी नेता डा राममनोहर लोहिया इस बात से परेशान रहते थे लोगों ने जितने जोश से आजादी की लड़ाई लड़ी उतने जोश से बराबरी की लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए जातिवाद और आर्थिक गैर बराबरी के विरुद्ध उनकी लड़ाई परवान नहीं चढ़ सकी या जितनी चढ़ी उससे डा लोहिया संतुष्ट नहीं थे। अन्याय और गैर बराबरी के खिलाफ उस लड़ाई को जयप्रकाश नारायण आगे ले जाना चाहते थे लेकिन वे पहले आपातकाल और बाद में अपने लोगों में व्याप्त पद की लालच में उलझ कर चूक गए। इसी बात को कुछ दिनों पहले आपातकाल दिवस पर भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था। उनका कहना था कि वे जिन स्थितियों के कारण देश में आपातकाल लगा था वे स्थितियां आज भी मौजूद हैं। उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने एनजेएसी(राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) संबंधी निर्णय देते हुए कहा था कि देश में वे स्थितियां आज भी मौजूद हैं जिनके कारण आपातकाल लगा था। इन स्थितियों से न तो पूंजी के सहारे चलने वाला मीडिया निपट सकता है और न ही एनजीओ। वैसी स्थितियों के घटित होने को रोकना है तो स्वतंत्र न्यायपालिका का होना बहुत जरूरी है।

लेकिन क्या भारत का नागरिक यह बात दावे के साथ कह सकता है कि उसके नागरिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए न्यायपालिका सक्षम और तत्पर है? शायद हां शायद न। ऐसा इसलिए क्योंकि न्याय का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि देरी से किया गया न्याय न्याय न करने के बराबर है(जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड)। हाल में दिल्ली हाई कोर्ट ने जब दिल्ली दंगों के सिलसिले में यूएपीए(अवैध गतिविधियां निरोधक कानून) के तहत गिरफ्तार आसिफ इकबाल तन्हा, नताशा नरवाल और देवांगना कलीथा तो जमानत दी तो यह उम्मीद बनी कि नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमारी अदालतें समर्थ हैं। लेकिन उसी के साथ उनकी रिहाई से पहले जिस तरह पुलिस ने उनके राज्य और घर तक जाकर छानबीन की वह न्यायपालिका की उपेक्षा और तौहीन करने जैसा ही काम था। 

दिल्ली पुलिस के व्यवहार पर टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मगन बी लोकुर ने कहा है कि उसका व्यवहार अमिताभ बच्चन की फिल्म शहंशाह जैसा था। जिस तरह उस फिल्म में अमिताभ बच्चन एक खलनायक को अदालत में नाटकीय तरीके से फांसी से लटका देते हैं वैसे ही दिल्ली पुलिस ने 24 मई को एक वर्चुअल सुनवाई के दौरान जमानत मिलने के बाद भी अभियुक्तों को अदालत से ही नया मुकदमा लगाकर गिरफ्तार कर लिया था। उनका कहना था कि वह घटना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध थी। अभिव्यक्ति की आजादी से सख्ती से निपटा जा रहा है और हजारों युवा जो सरकार के विरुद्ध बोलने का साहस करते हैं उन्हें जेल में डाल दिया गया है। इसी तरह की टिप्पणी करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने भी उन युवाओं को जमानत दी है। अदालत का कहना है कि यूएपीए कानून जो कि आतंकवादी गतिविधियों से निपटने का दावा करता है उसे उन युवाओं पर लगाना अनुचित है जो अहिंसक तरीके से विरोध प्रदर्शन के अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग कर रहे हैं। 

निश्चित तौर पर आज देश में आपातकाल नहीं है। लोग सीएए और एनआरसी के विरुद्ध आंदोलन किए। कृषि कानूनों के विरुद्ध भी छह महीने से डटे हैं। लेकिन यूएपीए, राजद्रोह कानून, एनएसए, महामारी अधिनियम और दूसरे दमनकारी कानूनों का जिस तरह से हर उस नागरिक पर प्रयोग किया जा रहा है जो सरकार की आलोचना और विरोध करने का साहस करता है एक प्रकार से लघु आपातकाल की स्थिति निर्मित करता है। ऊपर से लव जेहाद कानून, धर्म परिवर्तन रोकने संबंधी कानून और आटी कानून वगैरह जितनी तेजी से इस्तेमाल किए जाते हैं वे सब अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का काम कर रहे हैं। यह सही है कि आपातकाल के दौरान न तो दक्षिण के लोग ज्यादा नाराज हुए थे और न ही भारत का मध्यवर्ग। कहा जाता था कि ट्रेनें समय से चल रही  हैं और लोग दफ्तर समय से जा रहे हैं। भारतीय नौकरशाही और नौकरीपेशा वर्ग में शायद ही इस्तीफे हुए हों। जबकि महात्मा गांधी ने जब असहयोग आंदोलन छेड़ा तो लोगों ने अपनी नौकरियां छोड़ दी थीं। फिर भी 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल ने एक ओर प्रेस की आजादी का दमन किया तो दूसरी ओर विपक्ष के प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया। संविधान को संशोधनों में बदल दिया और सत्ता में बैठे लोगों ने अपनी हर तरह से सुरक्षा सुनिश्चित कर ली। उसके बारे में आचार्य जेबी कृपलानी का वह कथन बहुत मशहूर है कि आज हमारे पास कोई संविधान नहीं है बल्कि सिर्फ संशोधन हैं। 

उसी तरह कहा जा सकता है कि आज संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार महज कागजी हैं और उन पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून वास्तविक हैं। तमाम धर्मग्रंथ संविधान के ऊपर नाच रहे हैं और संविधान खामोश है। उसकी भावनाएं खामोश हैं। कानून के बारे में मशहूर समाजशास्त्रीय सिद्धांत है कि वे कहीं होते नहीं। वे जब तोड़े जाते हैं तब प्रकट होते हैं। सवाल उठता है कि जो सुप्रीम कोर्ट यूपीए सरकार के दौरान आईटी कानून की धारा 66 ए को खारिज करने का साहस दिखा सकता है वह इस समय क्यों नहीं निवारक नजरबंदी कानूनों के खतरनाक हिस्सों को उड़ा देता। इसी तरह राजद्रोह, धार्मिक भावनाएं भड़काने और धर्मस्थलों का अपमान करने वाले  वगैरह के कानून लोगों को परेशान करने और डराने के लिए लगाए जाते हैं। न्यायालयों का उन पर दिया जाने वाला फैसला एक तो काफी देर से आता है दूसरे कार्यपालिका उससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। वह नए नए मुकदमे लगाकर न्यायपालिका को मुंह चिढ़ाती है।

इसलिए आज आपातकाल से लड़ने की शक्तियां कमजोर हैं। उसकी वजह है कि मीडिया लालच में डूबा हुआ है और विपक्ष अपने परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण भयभीत है। इसी तरह  न्यायपालिका और कार्यपालिका भी अपनी अपनी वजहों से भयभीत हैं। भय और लालच के इस वातावरण में समता के लिए जनता के सचेत होने का तो सवाल ही नहीं है, वह स्वतंत्रता और बंधुत्व के लिए भी जागरूक नहीं है। गांधी जिस बात पर बहुत जोर देते थे वो यह कि अगर आप हिंदू और मुस्लिम एकता कायम कर दो तो हम एक साल में आजादी दिला कर दिखा देंगे। इस बात को थोड़ा पलट कर सोचें तो कहा जा सकता है कि बिना सांप्रदायिक एकता के आजादी बेमानी है। आज वही स्थिति है। गहरे सामाजिक विभाजन के बीच आज लोग आपातकाल का यह कहकर स्वागत कर सकते हैं कि वह तो दूसरे संप्रदाय को सबक सिखाने के लिए लगाया गया है। 

इसलिए आज सबसे ज्यादा जरूरी है आपातकाल को समझना और उन कारणों पर विचार करना जिनके कारण वह लगाया गया था। उस समय भी देश में बेरोजगारी और महंगाई थी। भ्रष्टाचार चरम पर था। लोग सरकार से निराश थे। आज महामारी के दौर में जनता दो बार लाकडाउन झेल चुकी है। महामारी की दो लहर झेलकर तीसरी लहर की आशंका में जी रही है। इतनी सारी परेशानियों के बीच वह अपने मौलिक अधिकारों को भूलती जा रही है। सत्ता में बैठे लोग सारी बहस को या तो धार्मिक दायरे में ला रहे हैं या फिर जो कुछ कर रहे हैं उसे अहसान जताते हुए। जनता या तो इस सब को अपना भाग्य मान रही है या विधि का विधान। ध्यान रहे कि आपातकाल सदैव संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ही नहीं आता। वह सदैव जेपी और इंदिरा गांधी के टकराव के रूप में भी नहीं आता। उसका मूल भाव जनता और उसके शासक के बीच का टकराव है और शासक वर्ग और संगठन का जनता पर हावी हो जाना है। जनता में भय और लालच जितनी होगी उसके आने और कायम रहने की उतनी ही आशंका रहेगी। लेकिन जनता भय और लालच से जितनी मुक्त होगी उतना ही कमजोर होगा आपातकाल।




विचार अब सार्वभौमिक नहीं रहे

कहने और सहने को इस मुकाम पर हम घरबन्दों और घेराबन्दी के पास बहुत समय है. बिताये नहीं बीतता , फिर भी इस अहसास से छुटकारा नहीं है कि यह समय अप...