Sunday, 23 May 2021

सुरेश सौरभ की चार लघुकथाएं

नौटंकीबाज बच्चा

        सरकारी स्कूल के बच्चे मैदान में खेल रहे थे। तभी एक बच्चा रोते हुए, भागते हुए, मास्टर जी के पास आया, उसके पीछे, उसके साथ खेलने वाले कुछ बच्चे भी आ गये। रोता हुआ वह बच्चा मास्टर जी से चिंहुकते हुए बोला- मास्टर जी ये सब मिलकर मुझे मार रहें है।

  "हाय! कित्ता झूठ बोलता हैं यह खुद हम को धड़ाधड़ मार के आ रहा है, ऊपर से, हमारे ऊपर झूठा आरोप लगा रहा है-एक बच्चा मास्टर जी से हैरानी से बोला।

 वह बच्चा रोता रहा।

 "हां हां म...ऽ ऽ मास्टर जी, ये बिलकुल झूट्ठा है- दूसरा बच्चा हकलाते हुए जल्दी-जल्दी में बोला।

बच्चे ने अपना रूदन और तेज का दिया।

  "हां हां मास्टर जी, ये बहुत बड़ा नौटंकीबाज है।... इसका बाप भी बड़ा नौटंकीबाज है, इसका दादा भी नौटंकीबाज है, इसका पूरा खानदान नौटंकीबाज है।....ऐसे ही दूसरो को ये लोग पीटते हैं, मारते हैं और उल्टा रोते हुए थाने में चले जाते हैं ताकि इनका बाल बांका न हो और उल्टा इनसे पिटनेवाला दुबारा फिर पिट जाए पुलिस से।

   अब रोता हुआ वह बच्चा आसमान सिर पर उठा कर कुत्ते जैसा बिलख-बिलख कर रोने लगा।

  "मास्टर जी मेरी गलती नहीं... मास्टर जी यह झूठा, यह मक्कार है! यह धोखेबाज है।.. रोने वाले बच्चे से पिटे बच्चे, दुबारा मास्टर जी से न पिटे, इसलिए अपनी पूरी सफाई देने लगे।  

     अब लड़के का रूदन राग पंचम स्वर में था। मास्टर जी ने अपना माथा पीट कर, एक संटी उठाई। दड़बड़ाते हुए बोले-नालायकों एक साधु से लगने वाले बच्चे को खामखा परेशान कर रहे हो। शिकायती सारे बच्चे फुर्र से फौरन उड़ गए। अब मास्टर जी रोते हुए उस बच्चे के सिर पर हाथ फेर रहे थे। रोने वाला नौटंकीबाज बच्चा, अपनी आंखों में हंस रहा था, मन में कह रहा था, नौटंकीबाजों से दुनिया हारी है।

 

इंसानियत के देवता हारे

       वह मर गई। वह एक वेश्या थी। जब लोगों को यह पता चला कि वह कोरोना से मरी, तो उसके सारे आशिक और भड़ुवे भी मर गए। अब उसकी लाश लावारिस पड़ी थी।.... अब उस लाश को नगर पालिका की कूड़ा गाड़ी लिए जा रही थी। अपने घरों से झांकते हुए लोग उसे देख रहे थे-कह रहे थे, "बड़े-बड़े धन्ना सेठ, नेता, मंत्री जिसके पैरों में लोटा करते थे आज उसी पैरों को कुत्ते भी सूंघना नहीं चाहते। वाह रे! कोरोना तेरी क्रूरता से दुनिया हारी, दुनिया के सारे हुस्न हारे, इंसानियत के सारे देवता हारे।

 

परिक्रमा

पहले वह अस्पताल के 'बड़े' साहब के पास गई। 'बड़े' साहब ने 'छोटे' साहब के पास भेजा। छोटे साहब ने 'उस' साहब के पास भेजा। 'उस' साहब ने 'फलाने' साहब के पास भेजा, 'फलाने' ने 'ढिकाने' के पास भेजा। इस तरह वह दिन भर भटकते हुए मर गई। अगले दिन अखबार में खबर छपी-प्रसव कराने लिए, अस्पताल में भर्ती होने के लिए, आई एक प्रसूता,सारा दिन कोरोना जांच के लिए अपने पति के साथ यहां-वहां भटकती रही, किसी ने उसे अस्पताल में भर्ती नहीं किया, जिससे वह मर गई। डीएम साहब ने उस अस्पताल के 'बड़े' साहब को आदेश दिया है कि प्रसूता कैसे मरी इसकी निष्पक्ष जांच करें।

 

अमानवीयता

 पति खामोश मुँह लटकाए बैठा था। पत्नी बोली,“क्या हुआ? आज जाना नहीं है क्या?

   पति एकदम से फट पड़ा-नहीं! अब घर में ही पड़े-पड़े खाना है और मर जाना है। दुनिया के लिए छुट्टी है, पर हम पुलिस वालों के लिए नहीं, हमें तो बस मरना है ड्यूटी पर।

  “बात क्या है,पूरी बात, बताओ तो सही?“

  “क्या बताएँ? आंय! क्या बताएँ? अस्पताल नहीं? डाक्टर नहीं? दवाएँ नहीं? ऑक्सीजन नहीं? बस सेन्ट्रल विस्टा खा लो, स्टेडियम खा लो, और मंदिर खा लो, बच जाएँगे सब कोरोना से। लाइलाज लोग मर रहें हैं, उनके पास लाश फूँकने तक का पैसा नहीं? गंगा में शव बहाए जा रहे हैं। कुत्ते नोंच रहें हैं। अब तुम्हीं बताओ,जब उस लाश को कुत्ते नोंच रहे थे, दुनिया तमाशा देख रही थी, तब हम लोगों ने किसी तरह टायर-फायर से उसे जला दिया, तो हमारे ही ऊपर हाकिम हावी है। कह रहा है, तुम ने अमानवीता की, इसलिए निलंबित।

  “हाकिम को देखना चाहिए क्या सही है, क्या गलत?

  “सब अंधे-बहरे हो गए हैं। हाकिम को मोर नचाने से फुरसत कहाँ? जो हमारी और जनता की तकलीफों को समझे?

  “अब क्या करोगे?“

   “घर में बैठ कर भगवान का स्मरण करते हुए, अपनी अमानवीयता का पश्चाताप करेंगे।

    अब दोनों से खामोशी से मुँह लटकाए बैठे थे, उनके चेहरों से अपराध भाव टप-टप टपक रहा था। ऐसा लग रहा था, कोरोना से बेमौत मरने वालों के असल दोषी-दुश्मन वहीं हो।

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नाम- सुरेश सौरभ

मूल नाम- सुरेश कुमार

पिता-स्वः केवल राम

शिक्षा- बीए(संस्कृत)  बीकाम, एम०ए० हिंदी, यूजीसी नेट हिंदी ।

पत्नी- श्री मती अंजू , बेटी-कृति शाक्य

माता- श्री मती कमला देवी।

पता- निर्मल नगर लखीमपुर- खीरी उ० प्र० पिन-262701

जन्म तिथि-03-06-1979

प्रकाशित-दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हरिभूमि, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, सोच विचार ,विभोम स्वर, कथाबिंब, पंजाब केसरी, ट्रिब्यून सहित देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं एवं बेब पत्रिकाओं में सैकड़ों लघुकथाएं, बाल कथाएं व्यंग्य लेख ,कविताएं, समीक्षाएंआदि प्रकाशित।

प्रकाशित पुस्तकें- एक कवयित्री की प्रेमकथा (उपन्यास), नोट 'बंदी', तीस-पैंतीस,वर्चुअल रैली (लघुकथा संग्रह) अमिताभ हमारे बाप (हास्य-व्यंग्य) नंदू सुधर गया (बाल कहानी संग्रह),निर्भया (कविता संग्रह), १०० कवि, ५१ कवि, काव्य मंजरी, खीरी जनपद के कवि (संपादित ग्रंथ)।

भारतीय साहित्य विश्वकोश में 41 लघुकथाएं शामिल। यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया में लघुकथाओं व हास्य-व्यंग्य लेखों की व्यापक चर्चा।

एक लघुकथा ‘कबाड़ी’ पर शार्ट फिल्म का निर्माण।

चौदह साल की उम्र से लेखन में सक्रिय।

मंचों से रचनापाठ एवं आकाशवाणी लखनऊ से रचनापाठ।

सम्मान-भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर प्रताप नारायण मिश्र युवा सम्मान, हिन्दी साहित्य परिषद् सीतापुर द्वारा लक्ष्य लेखिनी सम्मान, लखीमपुर की सौजन्या, महादलित परिसंघ, परिवर्तन फाउंडेन्शन सहित कई प्रसिद्ध संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

सम्प्रति -प्राइवेट महाविद्यालय में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।

मो-7376236066

Email-sureshsaurabhlmp@mail.com

विज्ञान और इतिहास से कम जरूरी नहीं है साहित्य


पिछले दिनों फेसबुक पर  एक लेखक ने  लिखा कि हिंदी के साहित्यकार दावा करते हैं कि वे जनता के लिए लिखते हैं, जबकि जनता उन्हें नहीं पढ़ती। सचाई यह है कि वे अपने लिए लिखते हैं लेकिन इस बात को स्वीकार नहीं करते।  इस तरह की बातें अकसर हिंदी के प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकारों का मजाक उड़ाने के भाव से कही जाती है। लेकिन कई बार खुद कई प्रगतिशील-जनवादी लेखक भी इस तरह के द्वंद्व में पड़ जाते हैं और वे अपने ही बीच के लेखकों को लेकर यह कहने लगते हैं कि जनता उन्हें नहीं पढ़ती।

एक बार राजेंद्र यादव ने मुझसे कहा था कि हिंदी के साहित्यकार हमेशा एक Guilt (ग्लानि) का शिकार रहते हैं। वे इस बात का रोना रहते हैं कि कोई उन्हें नहीं पढ़ता या दूसरी भाषाओं में उनसे बहुत अच्छा लिखा जा रहा है या वे अपने पहले के लेखकों जैसा नहीं लिख पा रहे।

आइए सबसे पहले जनतापर विचार करें। जनता की परिभाषा को लेकर लेखकों के बीच एक रूढ़ विचार कायम है। बहुतों की नज़र में जनता का मतलब है-गरीब जनता। भूखा-नंगा आदमी ही जनता है। इसी नज़रिए से इस तरह की प्रतिक्रिया जन्म लेती है कि किसान कहीं जींस पहनता हैया किसान कहीं पिज्जा खाता है जनता आधुनिक काल का और जनतांत्रिक युग का शब्द है। इसने प्रजा की जगह ली है। यह कोई समरूप (Homogenous) इकाई नहीं है। इसमें कई समुदाय शामिल हैं। लेखक अपने आप में जनता का हिस्सा हैं। एक प्रोफेसर भी जनता है और छात्र भी। एक डॉक्टर भी जनता है और इंजीनियर भी। फिर यह गलतफहमी भी दूर कर लेनी चाहिए कि मेहनतकश जनता साहित्य (खासकर लिखित साहित्य) पढ़ती है। हां, गीतों, नाटकों और सिनेमा आदि माध्यमों के जरिए वह साहित्य से जुड़ी जरूर  रहती है।  मेहनतकश जनता के पास इतना अवकाश नहीं होता कि वह साहित्य पढ़ सके। प्रमुखतया  शिक्षित मध्यवर्ग ही साहित्य पढ़ता-लिखता है। दुनिया के हर हिस्से में और अपने देश की हर भाषा में साहित्य पढ़ने वाला तबका शिक्षित मध्यवर्ग ही है।

 

तब यह कहा जाएगा कि जब साहित्य मिडल क्लास को ही पढ़ना है तो क्या जरूरत है गरीब पर, किसान, मज़दूरों पर लिखने की? वे तो पढ़ेंगे नहीं। यह बात भले ही सही हो, फिर भी उन पर लिखने की जरूरत है। मध्यवर्गीय पाठक को यह बताना है कि वह किस समाज में जी रहा है। उसके अलावा किन वर्गों के लोग समाज में हैं और वे किन हालात में जी रहे हैं। उस वर्ग के प्रति मध्यवर्ग में संवेदना जगाने का काम साहित्य करता है। दुनिया भर में सर्वहारा वर्ग के लिए लड़ाई मध्यवर्ग ने ही लड़ी है। क्या प्रेमचंद और उनके समकालीनों ने छुआछूत पर या अछूतों के जीवन पर जो लिखा क्या उसका असर स्वाधीनता संग्राम और उस दौर में चल रहे सामाजिक आंदोलनों पर नहीं पड़ा होगा? निश्चित पड़ा होगा। उन दिनों कांग्रेस के प्रस्तावों में दलितों में पक्ष में जो बातें समय के साथ जुड़ती चली गईं, क्या उनमें  साहित्य का योग नहीं होगा? यह योगदान सीधा नहीं होता है। यह परोक्ष होता है। मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में के मध्यवर्गीय नायक का संघर्ष ही यही है कि कैसे वह सर्वहारा वर्ग के साथ जुड़ जाए।

 

यह भी कहा जाता है कि साहित्य तो ज्यादा लोग पढ़ नहीं रहे, कुछ ही लोग घुमा-फिराकर पढ़ते हैं तो उसका समाज पर थोड़े ही कोई असर पड़ता होगा। कई गंभीर लेखक भी यह सोचकर अपने लेखन से उदासीन होने लगते हैं। यह भी एक गलत सोच है। किसी चीज का महत्व उसकी अति उपलब्धता से नहीं आंका जा सकता। पाब्लो नेरूदा ने कहा था कि कवि को आलू की तरह लोकप्रिय नहीं होना चाहिए। चलिए, मान लिया कि साहित्य बहुत कम लोग पढ़ते हैं। तो क्या इसलिए न लिखा जाए? सवाल है कि दर्शनशास्त्र कितने लोग पढ़ते हैं? बहुत कम लोग पढ़ते हैं  तो क्या दार्शनिक होने बंद हो गए? दर्शन पर किताबें नहीं आ रहीं? अर्थशास्त्र ही कितने लोग पढ़ते हैं? तो क्या अर्थशास्त्र पर काम बंद हो गयाअमर्त्य सेन को नोबेल मिलने से पहले कितने लोग जानते और पढ़ते थे? पाठक कम होने के कारण उनको अपना काम बंद कर देना चाहिए थायह बात विज्ञान पर भी लागू होती है।

 

दरअसल साहित्य की उपयोगिता और औचित्य पर सवाल वही उठाते हैं, जो कहीं न कहीं इसे दोयम दर्जे का काम मानते हैं। वे सोचते हैं कहानी-कविता से क्या होने वाला हैजबकि एक साहित्यकार का महत्व वैज्ञानिक, दार्शनिक, अर्थशास्त्री और इतिहासकार से जरा भी कम नहीं है। साहित्य का काम अपने समय को दर्ज करना है। साहित्य मनुष्यता की स्मृति को सुरक्षित रखती है और यह काम वह इतिहास से एक कदम आगे बढ़कर करती है। आखिर क्यों साहित्य को इतिहास का एक प्रमुख स्रोत माना गया हैआखिर क्यों मौर्यकाल को समझने के लिए हमें विशाखदत्त के नाटक मुद्राराक्षस की भी जरूरत पड़ती हैआखिर क्यों अमेरिका में गुलामी प्रथा को समझने के लिए अंकल टॉम्स केबिन को पढ़ना पड़ता है। गुलामी के विरुद्ध सिविल वॉर के लिए इसी उपन्यास ने कई योद्धा तैयार किए थे। जब इतिहासकार गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह पर लिखने लगते हैं तो नील की खेती करने वाले किसानों की दर्दनाक गाथा का बयान करने के लिए उन्हें दीनबंधु मित्र के बांग्ला नाटक नील दर्पणका हवाला देना पड़ता है। जब यह नाटक लिखा गया, तो कितने लोगों ने पढ़ा होगा या देखा होगा, कहा नहीं जा सकता। इसी तरह लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा भारत में शुरू की गई राजस्व व्यवस्था परमानेंट सेट्लमेंटको समझने के लिए प्रेमचंद के गोदानसे बेहतर और क्या हो सकता है? आज जब कोरोना जैसी महामारी फैली है तो हमें कामू के प्लेग की याद आ रही है। लव इन दि टाइम ऑफ कॉलरा की याद आ रही है। हमें राजेंद्र सिंह बेदी की कहानी  क्वारंटीन  और रेणु की पहलवान की ढोलक याद आ रही है। हरिशंकर परसाई का व्यंग्य तो खूब पढ़ा गया लेकिन अब उनकी आत्मकथा पढ़ी जा रही है जिसमें प्लेग की चर्चा है। आज इन रचनाओं को खोज-खोजकर पढ़ा जा रहा है ताकि हमें आज की समस्या को समझने का सूत्र और उससे लड़ने का संबल मिल सके। यह साहित्य का एक बड़ा काम है।  आज की कोई रचना जिसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा हो, हो सकता है, दशकों बाद किसी कारण से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाए और उसे खोजकर पढ़ा जाए।

हर समय महान रचनाएं नहीं लिखी जा रही होती। लेकिन बहुत  सारी साधारण रचनाएं  कई बार कुछ बड़ी रचनाओं की ज़मीन तैयार करती हैं। इसलिए हर तरह के लेखन की अपनी भूमिका है।

कुछ लोग इस बात को नकारात्मक रूप में कहते हैं कि लेखक ही लेखक को पढ़ते हैं। दरअसल हर लेखक पहले एक पाठक भी होता है। ऐसा थोड़े ही है कि जो लेखक हो गया वह दूसरों को पढ़ना बंद कर दे। लेखक पाठक भी होता है और पाठक लेखक भी होता है। साहित्य पढ़ने वाले ज्यादातर पाठक कुछ न कुछ खुद भी लिखते हैं। हां, वे बहुत नियमित और व्यवस्थित नहीं हो पाते। विशुद्ध पाठक विरल ही होते हैं। दूसरी बात है कि पाठक भी कई समूहों का समुच्चय होता है। इसमें खुद लेखक आते हैं, चित्रकार, रंगकर्मी और पत्रकार आते हैं। साहित्य के शोधकर्ता और शिक्षक अपनी जरूरतों के चलते भी साहित्य पढ़ते हैं। कुछ लोग छात्र जीवन में साहित्य पढ़ते हैं, तो कुछ लोग सेवानिवृत्ति के बाद। हर साहित्य प्रेमी के परिवार की नई पीढ़ी में एक न एक साहित्यानुरागी पैदा होते रहते हैं। इसलिए साहित्य के पाठकों का सिलसिला बना रहता है। हिंदी में वह थोड़ा अदृश्य है जरूर, पर यह कहना कि कोई पाठक ही नहीं है,गलत है।

साहित्य असल में एक विशिष्ट कार्य है। लिखना भी और पढ़ना भी। एक समाज की सांस्कृतिक अभिरुचि इतनी उन्नत हो जाए कि एक बहुत बड़ा हिस्सा इस विशिष्टता को हासिल कर ले, यह एक आदर्श स्थिति है। और इस स्थिति को लाने का दायित्व साहित्यकारों का भी है, लेकिन सिर्फ उन्हीं का नहीं। यह कई चीजों पर निर्भर करता है। अगर किसी समाज में यह स्थिति नहीं आई है, तो इससे साहित्य और साहित्यकारों का महत्व कम नहीं हो जाता। 

 


- संजय कुंदन

23.5.21

 

विचार अब सार्वभौमिक नहीं रहे

कहने और सहने को इस मुकाम पर हम घरबन्दों और घेराबन्दी के पास बहुत समय है. बिताये नहीं बीतता , फिर भी इस अहसास से छुटकारा नहीं है कि यह समय अप...