Tuesday, 4 May 2021

मध्यप्रदेश का गौरव ‘मालवा ’

            मध्यप्रदेश के पश्चिमी अंचल में स्थित सुरम्य क्षेत्र जो मालवा के नाम से जाना जाता है जिसके चप्पे-चप्पे पर स्वर्णिम अतीत की छाप पड़ी है। मालवा का नाम लेते ही एक ऐसे क्षेत्र की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है जहां पर पवित्र नर्मदा और क्षिप्रा नदी का जल कलकल करके बहता है। क्षिप्रा के किनारे पर सिंहस्थ पर्व पर प्रत्येक बारह वर्ष में धार्मिक समागम होता है। राजस्थानी, गुजराती, मराठा और मुगल संस्कृति का ऐसा मिला-जुला रूप जिसकी धार्मिक सहिष्णुता में शेव, वैष्णव, बौध्द, जैन धर्म मिले हुये हैं। उज्जैन में महाकाल का मंदिर, बड़वानी में भगवान बाहुबली की विशाल मूर्ति, सांची के स्तूप, विदिशा में बराह की मूर्ति इस अंचल के अतीत की कहानी कहते हैं।

            यहां के दाल-बाफले पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं और मालवा की पहचान हैं। महेश्वर और चंदेरी की विश्व प्रसिद्ध साडियां, ओंकारेश्वर और महाकाल का ज्योतिर्लिंग, मांडू के महल, भोपाल के ताल और मालवा के कश्मीर नाम से जाना जाने वाले नरसिंहगढ़ की सुरम्य पहाड़ियाँ जहां पर भगवान महादेव के मंदिर में सावन के सोमवार पर लगने वाले मेले, लोक नृत्य ‘‘माच’’ भोले-भाले मेहनती आदिवासी भाइयों की निश्चल हंसी और इंदौर के प्रसिद्ध नमकीन, मिक्सचर मिलकर अपनेपन का ऐसा एहसासस कराते हैं कि जो भी मालवा में आता है वो मालवा का ही हो जाता है। चाहे विश्व प्रसिद्ध संगीतज्ञ स्व. पं. कुमार गधर्व हों या प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. डाॅ.श्री शिवमंगल सिंह ‘‘सुमन’’ आज ये ठेठ मालवी कहे जाते हैं।

            मालवा भारत के मध्य भाग में स्थित वह सुविख्यात क्षेत्र जो मालवा के पठार के साथ ही नर्मदा की घाटी तक फैला है। यों तो इस क्षेत्र की राजनीतिक सीमायें समय-समय पर बदलती रही हैं परन्तु सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं के आधार पर मालवा की सीमाओं का निर्धारण इस प्रकार किया जा सकता है। उत्तर पश्चिम में मुकंदवाड़ा से होती हुई शिवपुरी से कुछ ही दक्षिण में इसकी उत्तरी सीमा निकलती है। पूर्वी सीमा पर चंदेरी, विदिशा, भोपाल और होशंगाबाद के क्षेत्र मालवा के अंतर्गत आते हैं। पश्चिम में मालवा और गुजरात प्रदेश की सीमाओं का निर्धारण दाहोद नगर से होता है। उससे उत्तर में राजस्थान का प्रतापगढ़, बांसवाड़ा तथा दक्षिण में झाबुआ मालवा के ही अंग हैं। नर्मदा घाटी में असीरगढ़ किला की अग्रभूमि को छोडते हुये पश्चिमी निमाड़ से लेकर होशंगाबाद तक का सारा क्षेत्र भी मालवा में ही आता है।

            मालवा के इतिहास की श्रृंख्ला प्रागेतिहासिक काल से लेकर महाभारत काल तक फैली हुई है। प्रागेतिहासिक काल में मालवा में निषाद और द्राविड़ संस्कृति फैली हुई थी जिनके अवशेष महेश्वर, नागदा और उज्जैन आदि स्थानों पर की गई खुदाई में मिले हैं। आर्यों ने द्राविड़ों को पराजित कर इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य किया। आर्यों के विश्वास और भावनाओं के साथ द्राविड़ परंपराओं का समन्वय वैदिक काल से होने लगा था। तब मालवा की आदिम आर्य संस्कृति का विकास क्षिप्रा, चंबल, नर्मदा आदि नदियों के तट पर हुआ। उज्जैन, महेश्वर, विदिशा, मंदसौर आदि नगर हजारों वर्षों से भारत भर में विख्यात रहे।

            आज के मालवावासियों को शायद ही यह मालूम होगा कि मालवा को मालवा का नाम देने वाले यहां के मूल निवासी निषाद और द्रविड़ नहीं बल्कि आज के पंजाब प्रांत से निकले हुय मालवगण थे। महाभारत में मालवगणों का उल्लेख प्राचीन भारत की एक जाति विशेष के संघ के रूप में मिलता है। महाभारत के युद्ध में मालवगण कौरवों की ओर से लड़े थे। उस समय वे पंजाब के रावी और चिनाब के दोआबा में रहते थे। यूनानी इतिहासकार एरियन ने सिकंदर के आक्रमण के समय मालवगणों की वीरता और युद्ध कौशल का वर्णन करते हुये लिखा है कि भारतीय जातियों में मालव सबसे अधिक वीर और युद्ध कुशल थे। जिनका सामना करने से सिकंदर की सेना भी हिचकिचाने लगी थी। जिसके कारण विश्व विजयी सिकंदर को स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व करना पड़ा और बहुत जानमाल का नुकसान उठाने के बाद मालवों को पराजित करने में सफलता मिली।

            मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद बार-बार आक्रमण के फलस्वरूप पंजाब पर विदेशियों के अधिकार करने के कारण अपनी स्वतंत्रता तथा स्वशासन को संकटापन्न देखकर ई.पूर्व की दूसरी सदी में मालवगण विवश होकर पंजाब छोड़कर दक्षिण पूर्व की ओर बढ़े और उसी शताब्दी में अजमेर से दक्षिण पूर्व की ओर उस प्रदेश में जा पहुंचे जो उस समय दो भागों में बंटा था। पश्चिमी भाग अवंतिका और पूर्वी भाग दशार्ण के नाम से जाना जाता था। मालवों ने शकों को पराजित कर इन दोनों क्षेत्रों को एकता के सूत्र में पिरोया और यह सारा क्षेत्र उन्हीं के नाम से मालवा कहलाने लगा। मालवगणों का स्वाधीनता प्रेम और जनतंत्रीय भावनायें इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विशेषताओं में सम्मिलित हो गई। इस प्रकार जिस नई विस्तृत राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इकाई का निर्माण हुआ, आगे चलकर उसका भारतीय इतिहास में सदैव विशेष महत्व रहा।

            मालवागण की दूसरी देन राष्ट्रीय महत्व की है, वह है-उनका मालव संवत। आज जिसे हम विक्रम संवत के नाम से जानते है जो परंपरा के अनुसार उज्जैन के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की विजय के समय (ई.पू. 57) से शूरू हुआ था पूर्व में मालव संवत् या मालवेश संवत् कहलाता था। मालवों के स्वतंत्रता प्राप्ति की स्मृति में इस संवत् का प्रारंभ हुआ था। ईसा की तीसरी शती के पूर्व ही राजस्थान, मालवा तथा उनके पड़ोसी प्रदेशों के शिलालेखों में कृत संवत् के नाम से इस संवत् का उल्लेख मिलता है। ईसा की पांचवी सदी के बाद के शिलालेखों में कृत संवत् के साथ ही इसे मालवा संवत् लिखा जाने लगा था। मालवा में सदियों से चली रही सांस्कृतिक, साहित्यक, वैज्ञानिक, शिल्पकला आदि सभी परंपरायें गुप्त काल में सुद्रड़ हो गई थी। मालवगण भी तक तक इस क्षेत्र के जनसाधारण में विलीन हो गये थे।

            मालवगणों ने इस प्रदेश को जो सांस्कृतिक एकता दी थी उसे परमारों के राज्य ने पूर्ण स्थायित्व प्रदान किया और तदंतर में मालवा राजनीतिक एकता के साथ ही भौगोलिक इकाई भी बन गया। प्रतापी परमार राजा भोज के शासन काल में मालवा सािहत्य और संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बन गया था। राजा भोज की मृत्यु के बाद परमार राजा शक्ति हीन हो गये। सन् 1223 ई. में मालवा की धरती पर प्रथम मुसलमान सुल्तान इल्तुतमिश के कदम पड़े। उज्जैन तक धावा मारकर और लूटपाट करके वह यहां से चला गया। उसके बाद परमार राजाओं का दिल्ली सल्तनत से संघर्ष चलता रहा और अंत में वे पराजित हुये। सन् 1401 के बाद मालवा के सुल्तान दिलावर अली के पुत्र होशंगशाह ने मांडू को अपनी राजधानी बनाया। उसने तथा उसके बाद में अन्य सुल्तानों ने समय-समय पर मांडू में अनेकों सुंदर महल, मस्जिदें, मकबरे तथा बावड़ी आदि बनवाये जिनके कारण ही मांडू के वे भग्नावशेष भारतीय स्थापत्य कला के सुंदरतम स्मारक के रूप में आज भी दर्शनीय हैं। सन् 1561 ई. में अकबर की सेना ने मालवा को पहली बार मुगलिया सल्तनत का हिस्सा बना लिया। लगभग सवा सौ वर्षों तक मुगलों के शासनकाल में मालवा अधिकाधिक समृद्ध होता गया। सूरत आदि बंदरगाहों के द्वारा विदेशों तक से बराबर व्यापार चलता रहता था। मालवा में तब महीन धागे के कपड़े बुने जाते थे। यहां की छींट, छपे हुये तथा अन्य रंग-बिरंगे कपड़ों की विदेशों में बहुत मांग थी।

            सन् 1699 के प्रारंभ में कृष्णाजी सावंत के नेतृत्व में मराठों ने प्रथम बार नर्मदा पार कर मालवा में प्रवेश किया और ई. सन् 1737 के अंत में मराठों की विजय के साथ मुगलों के शासन का अंत मालवा में हो गया। पेशवा से सहमति पाकर मालवा में तीन मराठा घरानों होलकर, पवांर और सिंधिया के द्वारा अलग-अलग राज्यों की स्थापना इंदौर, देवास एवं ग्वालियर में हुई। मालवा में मराठा राज्य की स्थापना से पहले ही दोस्त मोहम्मद नामक अफगान सरदार ने भोपाल को अपनी राजधानी बनाकर मालवा के दक्षिण पूर्व भाग में अपना राज्य स्थापित कर लिया था जो मराठों के विरोध के होते हुये भी उसके उत्तराधिकारियों के अधिकार में बराबर बना रहा।

            तीनों मराठा राज्यों के आपसी संघर्ष और स्थानीय राजपूत राजाओं, जमींदारों के साथ युद्ध होने का पूरा-पूरा लाभ अंग्रेजों ने उठाया और सन् 1817 ई. में मालवा पर लार्ड हेस्टिंग्ज ने अंग्रेजों का अधिपत्य स्थापित कर दिया। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद पूरे भारत की तरह मालवा में भी रानी विक्टोरिया के नाम पर अंग्रेज शासन चलाने लगे। अंग्रेजों द्वारा अपने शासन को ठीक से चलाने के लिये शिक्षा, डाक-तार, पुलिस व्यवस्था, न्यायपालिका, नगरपालिका आदि क्षेत्रों में कई सुधार किये गये। सड़कें, रेल परिवहन और चिकित्सा हेतु अस्पताल की व्यवस्था की गई। 18वीं सदी के अंत के बाद ही अंग्रेजों के आधीन प्रांतों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न होने लगी थी। जिसकी अंतिम परिणती 15 अगस्त 1947 को पूरे देश के साथ मालवा में भी स्वाधीनता के सूर्य के जगमगाने के साथ हुई। 26 जनवरी 1950 के दिन भारत का संविधान इस क्षेत्र पर भी लागू हुआ। राज्य पुनर्गठन आयोग के सुझावों को मान्य कर नवंबर 1956 को नये मध्यप्रदेश का गठन किया गया जिसमें भोपाल राज्य और  मध्य भारत (मालवा) विलीन कर दिये गये। निषाद, द्राविड़ और आर्य संस्कृति का मिला-जुला रूप मालवगणों की कर्म भूमि विक्रमादित्य, राजाभोज, कालीदास जैसे पुत्रों की मां, मांडू के सुल्तान बाजबहादुर और रानी रूपमती की प्रणय स्थली, मुगलों की सल्तनत और अंग्रेजों के आधीन रहा, मालवा क्षेत्र नये मध्यप्रदेश में अपनी सार्थक भूमिका खोजने लगा।

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अशोक व्यास

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