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Saturday, 29 October 2022

विकास की अवधारणा में गाँव कहाँ हैं ?

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल विशुद्ध में ग्रामीण पृष्ठभूमियों में प्रचुर लेखन करने वाले कथाकार नहीं हैं। यद्यपि अमरकांत ग्रामीण इलाके से ही शहर में आए; जिस तरह हिंदी में अनेक रचनाकार आए हैं। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, जगदीश चंद्र, फणीश्वर नाथ रेणु, राही मासूम रजा, मार्कंडेय, शिवमूर्ति और हरनोट आदि कथाकारों की तरह अमरकांत ग्रामीण लेखन के रचनाकार नहीं हैं, उन्हें हम प्रेमचंद की कहानी की परंपरा को अग्रसर करने वाले कहानीकार अवश्य मान सकते हैं।

 

1950 अथवा आज़ादी के बाद इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, आगरा, बलिया आदि उ.प्र. के शहर इस तरह के शहर थे कि उन्हें बड़ा गाँव, या मझोला शहर कहा जा सकता था। दो दशक पहले तक तो दिल्ली को भी बड़ा गाँव कहते थे, पढ़े-लिखे लोग। आज किन्हीं भी मध्यवर्गीय शहरों की तुलना में वे बेहद मंद, कछुआ चाल, कम जनसंख्या वाले, उद्योग विहीन, छोटे कार्यालयों वाले, उनींदे, वनस्पतियों से घिरे, पैदल और सायकिल प्रमुख शहर थे। शहरों के ऊपर ग्रामीण अक्स था, शहरों में बोलियों का पर्याप्त प्रचलन था । अमरकांत की यही राह थी, यही जगह थी। अमरकांत में जो अद्वितीय विनोद था वह ग्रामीण समाज और मनुष्य से आया था। उनकी कहानियों के विषयों में गाँव, कस्बे और शहर की मिली-जुली अवस्था है। सब एक-दूसरे को 'ओव्हर लैप' करते हुए। अपनी कहानियों, केवल कहानियों के बल पर वे हिंदी के थोड़े बहुत चेखव थे।

 

श्रीलाल शुक्ल नौकरशाह थे। निपुण, बुद्धिमान, शीनकाफ़, दुरुस्त, उच्च सामाजिक, प्रतिष्ठावान तो थे ही उनकी सामाजिक बुनावट भी ऐसी ही थी। अमरकांत शुरुआती दिनों से कम्युनिस्ट थे, 'कम्युनिस्ट' कहानी लिखी थी, छोटी-मोटी नौकरियाँ करते रहे, जीवन कठोर था पर उनमें गिला-शिकवा नहीं रहा। यह उनकी विचारधारा का आचरण था, जीवन भर यह बना रहा। श्रीलाल शुक्ल हिंदी में उस गुट के प्रिय रहे जो वामपंथ विरोधी रहा या जिसका अस्तित्व ही वामपंथ की खिलाफत से बना। वे 'परिमल' में अमूर्त रूप से सक्रिय रहे। उनका दोस्ताना वहीं था। उन्हें समाजवादियों का लाभ मिला। ब्राह्मण होने का भी । बहुत दिनों तक उनके नाम के साथ पंडित शब्द भी लोग लगाते रहे। पर श्रीलाल शुक्ल अपने दमखम, शराफत, हाज़िरजवाबी के बाद भी और 'राग दरबारी' जैसी चर्चित कृति के बाद भी 'बड़े' लेखक नहीं हैं। 'बड़े' शब्द पर मेरा दबाव है कि इसे सही अर्थ में समझा जाए। 'परिमल' के साथी होने के बावजूद 'परिमल' के दिग्गजों ने उन्हें 'बड़ा' लेखक नहीं माना । 'परिमल' के नियंता 'व्यंग्य' को उपहास से देखते थे और इसे ऊँचा दर्जा नहीं देते थे। इस पर कॉफी हाउस की अनेक बहसों का मैं युवा श्रोता भी इलाहाबाद में रहा हूँ।

 

श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में प्रहसन, मखौल, किस्सा और हास्य का झरना फूटता है। वे मज़ामत के उस्ताद हैं पर उनका सारा किया-कराया क्षणभंगुर है। अगर सूक्ष्मता से श्रीलाल शुक्ल जी की मीमांसा की जाए तो उनमें अर्बन लेखक की आधुनिक प्रवृत्तियाँ नहीं हैं। वे ओवरडेटेड लेखक हैं, परसाई जैसे श्रेष्ठ और देश के बड़े लेखक के साथ भी उन्हें खड़ा किया गया। खड़ा करने वाले का उद्देश्य केवल उन्हें खड़ा करना था, प्रगतिशील विचारधारा के परसाई को कम करने के लिए। श्रीलाल शुक्ल सदा जगमगाती दुनिया में रहे, जबकि अमरकांत के चारों तरफ एक गोबर से बनी कच्ची कोठरी का अँधेरा था। ढिबरियाँ जल रही हैं चारों तरफ और अमरकांत लिख रहे हैं। अमरकांत बड़े लेखक इसलिए भी हैं कि उन्हें कभी गिला-शिकवा नहीं रहा। उन्होंने जिस लेखकीय जीवन को और उत्तर भारतीय समाज को स्वीकार किया उससे उन्हें गहरा प्यार था। उनकी चाल साफ-सुथरी थी। वे खुश दिल रहे और एक बड़े रचनाकार की स्थिरता और तटस्थता उनमें है। अपने समकालीनों की वे गहरी इज्जत करते हैं और गुलगुले से अमरकांत में विचारों का पत्थर बिल्कुल ग्रेनाइट का है। उन्हें दूर किनार में, अपने चुने हुए एकांत में रहना पसंद था इसलिए बड़े-बड़े पराभवों और राजनैतिक शेयर बाज़ार के गिरने उठने बदलने के बावजूद वे अविचलित रहे। मुझे उनके चेहरे की आकृति ब्रेख्त के काफी करीब लगती है। इसलिए निष्कर्ष रूप में यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल के आतिशबाज लेखन और अमरकांत के अँधेरों को एक जगह रख कर पुरस्कृत करना अपमानजनक भी है, और एक हद तक कारिस्तानी भी किशन पटनायक की टिप्पणी सही है, सटीक है। मेरी समझ यह है कि श्रीलाल जी की गाँव के जीवन से क्या शहरवासियों से भी यारी नहीं है।

 

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के पुरस्कार प्रसंग को और विस्तार से जानना हो तो ज्ञानपीठ की यात्रा की तरफ ध्यान देना होगा। ज्ञानपीठ की स्थापना में शोध, मीमांसा, क्लासिकी चेतना का प्रकाशन और आयोजन उसकी गतिविधि का प्रमुख हिस्सा था। 'ज्ञानोदय' में मांस मदिरा, लहसुन प्याज का उल्लेख कहानी, कविता में आने पर उसे संपादित कर दिया जाता था। यह धर्मवीर भारती और रमेश बक्षी जैसे संपादकों के जमाने में बचा हुआ था। फिर 2010 तक आते-आते स्त्रियों पर कुत्सित टिप्पणी भी छपने लगी। आप देखिए कि कैसे ज्ञानपीठ की यात्रा समसामयिक बाज़ार की तरफ रेंग रही है। आधुनिकता और लोकप्रियता और प्रिंट आर्डर की ललक, बाज़ार की तरफ उन्मुख होना, उसका तर्क देने लगना ज्ञानपीठ की महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा हो गया है। इसीलिए ज्ञानपीठ में देश के सबसे महँगे सेल्समैन और अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रवेश विचारणीय है। यह न तो अकारण है और नही बुद्धपना।

 

ज्ञानपीठ भी हिचकते-हिचकते विश्व के ताकतवर पुरस्कारों की राह में उठ रहा है। विश्व राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है, न विश्व बाज़ार में लेकिन उसकी ललक यही है। यह भी मुमकिन है कि सही खिलवाड़ का कूट खेल न कर सकने के कारण वह अधकचरे चपेटे में आ जाए, यह सब भविष्य के खेल हैं। अभी मेरी समझ यह है कि ज्ञानपीठ के निर्णयों में सहजता भोलापन और चातुर्य दोनों मिले-जुले हैं। कई बार उसके निर्णय भारतीय भाषाओं की ताकतवर प्रगतिशील परंपरा की पूरी-पूरी मुखालफत नहीं करते पर उसके चाल-चलन एक लोकप्रिय खुराफात ज़रूर है। जैसे शहरयार को पुरस्कृत में करना।

 

शहरयार उर्दू के 'बड़े' शायर नहीं हैं पर उनको पुरस्कृत करके एक प्रगतिशील मुखड़ा ज्ञानपीठ का बनता है। अंतर्विरोधी चीजें इसके पहले श्री हुई हैं- जब निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को ज्ञानपीठ दिया गया। यहाँ पर भी एक कम्युनिस्ट रचनाकार और एक कम्युनिस्ट विरोधी रचनाकार की कूटनीति स्पष्ट है। एक बात ध्यान दें कि ऐसा नामवर सिंह जैसे जूरी सदस्य के खेल से संभव हुआ। नामवर सिंह ज्ञानपीठ के लिए एक मुफीद वजीर हैं। जैसा मैं पहले एक बार अपने एक व्याख्यान में भी बाँदा में कह चुका हूँ कि असली खेल जूरी की नियुक्ति है। इसकी नियुक्ति के पहले ही सालों-साल यह क्रियाकलाप चलता रहता है। यही विभाजन फिर दोहराया गया-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के साथ। ज्ञानपीठ गुरदयाल सिंह और अमरकांत को स्वतंत्र ज्ञानपीठ देने की बेवकूफी कभी नहीं कर सकता। यह केवल बड़े लेखकों को विभाजित और कमतर करने की तकनीक हैं।

 

साम्राज्यवादी दुनिया के बड़े और शातिर तरह से संचालित पुरस्कारों का ज्ञानपीठ का थिंक टैंक अभ्यास कर रहा है। उसके अगले कदम भारतीय समाज और राजनीति की करवटों के आधार पर होंगे। सीधा हस्तक्षेप न भी हो पर जूरी का संगठन, बहुत दूर तक सोच-विचार की कारीगरी है। यह भी हास्यास्पद है कि पिछले कुछ सालों से हिंदी के ताकतवर पुरस्कार हिंदी में सर्वश्री राजेंद्र यादव, अशोक वाजपेयी, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में गये हैं। इन्हें बार-बार पुरस्कार मिले। ये सब जूरी की कारस्तानियाँ हैं।

 

बाज़ार का साम्राज्य, चाहे संचार, मनोरंजन, प्रसाधन का हो या शिक्षा और गाड़ियों का, गाँव की तरफ मुड़ रहा है। कंपनियाँ उधर ही जा रही हैं। यहाँ लूट की बड़ी संभावनाएँ-तपे रास्ते हैं, नया विवेकहीन उपभोक्ता है, कमाऊ मंडियाँ हैं। संभवतः सांस्कृतिक अवचेतन में अमरकांत भी इसीलिए जूरी को खटखटा रहे हों। बाज़ार का, नये साम्राज्य का गाँवों में प्रवेश उनको खत्म कर देने के लिए है, उन्हें लूट कर बदल देने का है। गाँव बचेंगे नहीं, वे उलट जाएँगे। यह कैसे मुमकिन हैं भारत देश में कि शहर तो बदल जाएँ उनका कायाकल्प हो जाए, नगरीकरण तेज बना रहे और गाँव जस के तस बने रहें। बीसों साल तक अमरकांत की सुध नहीं ली गयी और आज जब पुरस्कृत

किया गया (कोन-अंतरे में जाकर) तो मैं इसे इसी पृष्ठभूमि में देख रहा हूँ। इसी तरह 'कौन बनेगा करोड़पति' में घुस घुस कर गाँव के लोगों को लाया जा रहा है और उन्हें दस-पचास लाख दिये जा रहे हैं। यह अचानक वंचित गाँवों से लोगों को लाकर, उनके कठिन जीवन दृश्यों की क्लिपिंग दिखा कर, उनको मार्मिक दिखा कर यही किया जा रहा है, जो ज्ञानपीठ ने किया है। सब तरफ गाँव के उद्धार का यह खेल शुरू हो गया है।

 

हमारे देश के दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों के विकराल अर्थशास्त्री भी अंततः गाँवों की ज़रूरत, उसकी जगह, उसकी अनिवार्यता के ऊपर गहरा प्रश्न चिह्न लगा चुके हैं। विकास की अवधारणा में गाँव कहाँ हैं? यह देखना एक दिलचस्प बात है।

 

उत्तर भारत में पारंपरिक गाँव के निशान तो तेजी से मिटे हैं। आने वाले समय में गाँव के बिंब और बदलने वाले हैं। इस देश में ऐसे इलाके भी हैं जहाँ बड़े किसान को ज़मीन का मुआवजा 5 से 15 तक भी मिला है। यह रकम रंग लाएगी। यह गिनती के लोगों का प्राप्य है पर इसका विनाश बड़ी ग्रामीण जनसंख्या पर होगा। अपराध, भुखमरी, भेद और रक्तपात का तीखा अनुभव देखने को मिलेगा। गाँव में बड़ी रकम फेंकी जा रही है जो अंततः बाज़ार का नियंत्रण उन्हीं इलाकों में बढ़ाएगी।

 -  ज्ञानरंजन

Saturday, 12 August 2017

कौन कितना जानता है परसाई को



मृत्यु के बाद हमारे देश में कुछ धार्मिक कर्मकांड होते हैं और अगर मौत एक साहित्यकार की है तो कुछ साहित्यिक कर्मकांड भी होते हैं। इसके बाद सारे दायित्व पूरे हो जाते हैं। भारतीय समाज में एक खास प्रवृत्ति यह भी है कि जब तक देह सामने होती है तब तक वाचाल संस्कृति और उसके क्रियाकलाप बने रहते हैं पर जैसे ही आदमी ओझल हुआ उसके मूल्यांकन और उसके क्रियाकलाप बने रहते हैं पर जैसे ही आदमी ओझल हुआ उसके मूल्यांकन, उसके अधूरे काम के प्रति लोग विमुख हो जाते हैं। हालांकि परसाईजी ने अपनी तरफ़ से कुछ भी काम अधूरा नहीं छोड़ा पर आज तक उनका वास्तविक मूल्यांकन नहीं हुआ है। एक ही गम्भीर प्रयास विश्वनाथ त्रिपाठी ने किया है। पर अभी आलोचना कर्म की बहुत सारी जिम्मेदारियां बकाया है। मौत के बाद एक दूसरी चीज द्रष्टव्य यह है कि मरने वाले व्यक्ति को कुछ ज्यादा ही जान लेने का दावा किया जाता है। एक तरह से लोग मृतात्मा पर लद जाते हैं। मैं परसाई की ही शैली के पालन का प्रयास कर रहा हूं। अपने जीवन के अन्तिम काल में परसाई की आवाज में कमजोरी ही नहीं थी, एक गहरी करुणा थी। इस संसार की अनेक विफ़लतायें और मनुष्य-जाति की सांस्कृतिक पतनोन्मुखता और संसार के संवारने वालों के क्षीण संघर्ष की त्रासदी परसाई की वाणी में उतर आई थी। इस आवाज में एक तन्हाई थी। बलिष्ठ लोग परसाई के साथ केवल दिखावटी रूप में थे।बलिष्ठ संस्कृति परसाई को निगलना चाहती थी। मैं आपको काफ़ी पुराने दिनों में ले चलना चाहता हूं। वह समय जब परिमल का उभार था और प्रयोगवाद, कलावादी घरानों का हिन्दी पर गहरा दबदबा था। यह सातवें दशक की शुरुआत थी। परिमल का एक विशाल साहित्यकारी समुदाय परसाई को नापसन्द करता था। प्रगतिशील लोग परसाई को सूंघ रहे थे और परसाई के लेखन में गहरी आस्था उनमें नहीं थी। बाद में परसाई उनको उपयोगी लेखक लगे। अनेक समाजवादी भी उनको पसन्द नहीं करते थे। मैं यह बताना चाहता हूं कि परसाई ने इस तरह कठिन परिस्थितियों में अपना लेखन प्रारम्भ किया। वे लगभग अकेले थे। अपने कुछ मित्रों के सिवाय। स्थानीय मित्रतायें उनके पास थीं। मुक्तिबोध जैसे लोग उनके साथ थे पर मुक्तिबोध स्वयं अकेले थे और एक अकेला आदमी दूसरे अकेले व्यक्ति को जितना दे सकता है इतना परसाई को मिला। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि परसाई को मध्यप्रदेश ने अपना लेखक माना। प्रिय लेखक माना। यह गहरी लोकप्रियता और आवेग उनके साथ रहा। लोकप्रिय हो जाना बहुत खतरनाक है। ऐसे लोग प्राय: भीतर से अकेले होते हैं। बाहर जगमग संसार, एक समुद्र की तरह हहराती जनप्रियता और भीतर खुशी और उदासी की दुनिया। परसाई का उद्देश्य व्यंग्य लिखना और यशकामना नहीं था। वे एक स्वप्न संसार की पूर्ति के लिये कंटीले मार्ग पर चल निकले थे। लोकप्रिय व्यक्तियों को बाहर ही बाहर जान लिया जाता है। उनसे बहुसंख्यक समाज का और प्रशंसकों का संवाद-रिश्ता बन्द हो जाता है। लोकप्रिय व्यक्ति भीतर से अकेले होते हैं। अगर परसाई के पास एक अचूक दृष्टि न होती, अगर वे एक गोताखोर जैसे न होते, अगर वे बालमुकुन्द गुप्त से चली आई हिन्दी की विरल निबन्ध परम्परा की अग्रगामी कड़ी न बन जाते, अगर उन्होंने अपनी एक अद्वितीय शैली की रचना न कर ली होती और अगर उनके पास सदैव कुलबुलाता एक विचार न होता, अगर उनके पास गहरी मार्मिकता और बेचैनी के साथ एक सुन्दर मनुष्य और संसार का स्वप्न न होता तो आप मेरी बात पर गौर करिये कि शास्त्रीय संसार में परसाई पर हमला बोल दिया जाता और परसाई के बारे में एक क्रूर हिंसक प्रतिक्रिया का बोलबाला होता। पर एक अद्भुत बेमिसाल लोकप्रियता ने उन्हें बचा लिया। अब परसाई नहीं हैं तो उनको बचाने वाले जिन मर्मज्ञों की जरूरत साहित्य संसार में है उसकी प्रतीक्षा हमें करनी है। परसाई जैसे लेखक पर कभी भी हमला हो सकता है। उपेक्षा जो मन्द है, उभर सकती है। क्योंकि ताउम्र अनेक लोग बैठे रहे हैं अवसरों की तलाश में। परसाई के भक्त उनकी रक्षा नहीं कर सकते। रक्षा-कवच साहित्य और कला और समाज के मार्ग से ही निर्मित होता है। परसाई और उनके विचार को पसन्द करने वाले पाठक हैं। परसाई को नापसन्द करने वाले लेकिन इसको छिपाकर रखने वाले और ऊपरी तारीफ़ करने वाले पाठक हैं और परसाई को एक तात्कालिक आस्वाद के धरातल पर पसन्द करने वाले लोग हैं। इस सबके साथ उनका पाठक संसार बनता है जो शायद प्रेमचन्द के बाद हिन्दी में सबसे बड़ा संसार है। बस आलोचक इससे जबर्दस्त हाल से विचलित हैं। वे इसी कारण परसाई के पास आये हैं। वे परसाई की उपेक्षा का, आत्मघात करने का जोखिम नहीं उठा सकते। वे बहादुर लोग नहीं हैं। से साफ़ परसाई को इनकार भी नहीं कर सकते। इसलिये जब परसाई का प्रारम्भ काल था, जब वे सृजनात्मक और राजनीतिक दंगल में कूद रहे थे, जब जल-प्लावन में से एक अंकुर या पत्ता निकल रहा था तब परसाई के पास एक अच्छा मित्र-समाज था। प्यारे लोग थे जो अब भी उनके साथ हैं। उनमें से कुछ दिवंगत भी हो गये जैसे मुक्तिबोध जैसे मायाराम सुरजन, पर साहित्य संसार में दिग्गजों ने चुप्पी मार ली थी। इस बात की पड़ताल की जानी और किस्से को साफ़ कर देना चाहिये। जैसे यह पता लगाया जाये कि आलोचना में परसाईजी के ऊपर नामवर सिंह ने क्या कभी कोई परसाई की महत्ता को रेखांकित करने वाली बहस चलाई? प्रगतिशील लेखक संघ की मध्यप्रदेशीय दावतों में आने के बाद नामवर जी ने होशियारी दिखाई कि परसाई का नाम लेने लगे। विदित हो कि मिथिलेश्वर जैसे लेखक को सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड दिया गया परसाई को नहीं जबकि यह नामवर सिंह के हाथ में था।

परसाई जब ख्याति की चोटी पर थे, परसाई जब एक बहुत कपटपूर्ण संघर्ष से बाहर निकल आये तब शाबासी  देने वाले सामने आते हैं। दूसरी तरफ़ अशोक वाजपेयी परसाई के भक्त, प्रशंसक और मददगार थे। इसमें कोई भी भ्रम नहीं कि परसाई के जीवन-सम्बन्धी संकटों में वे सदा काम आये। उन्होंने प्रचार-प्रसार के साथ मदद करने में उत्साह दिखाया। लेकिन परसाई के विचारों का कांटा ऐसा था कि अशोक वाजपेयी परसाई पर पूर्वग्रहका अंक कभी नहीं निकाल पाये।श्रीकांत वर्मा पर तो उन्होंने निकाला जबकि उनको प्राथमिक तौर पर परसाई ने ही वसुधा में छापा था लेकिन श्रीकान्त वर्मा अशोक वाजपेयी को  इसलिये प्रिय थे क्योंकि वे कम्युनिस्ट विरोधी थे। अशोक वाजपेयी अंतत: कम्युनिस्ट विरोधी विचारधारा की उपज हैं। अशोक वाजपेयी के एक ताजा साक्षात्कार की इस पंक्ति पर लोग गौर करें, " जिनकी मार्क्सवाद में अगाध आस्था है उनके साहित्यिक अवदान से मैंने कभी इस कारण कभी संकोच नहीं किया। जिनमें मुक्तिबोध, त्रिलोचन से लेकर धूमिल, विनोदकुमार शुक्ल, केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह आदि शामिल हैं।" इनमें हरिशंकर परसाई नहीं हैं या फ़िर आदि-आदि में होंगे। हरिशंकर परसाई को मुकम्मल जानना आसान नहीं है। इसका दावा करना भी असम्भव है। इसमें समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र और आलोचना-कर्म की बहुतेरी जटिलतायें हैं। कबीर ने कहा था कि जो घर फ़ूंकै आपना सो चले हमारे साथ। शायरी में भी कहा गया है यह इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजै, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। तालस्ताय जैसे महान साहित्यकार और मनुष्य की भीतरी तहों तक प्रवेश कर जाने वाले साहित्यकार तक ने दोस्तोएवस्की की मौत पर लिखा था कि वे मुझे बहुत प्रिय थे, मैं उनसे कभी नहीं मिलामैं उनको बहुत नहीं समझ सका लेकिन उनकी मृत्यु पर ऐसा लगा कि  मेरे भीतर का कोई आधार जैसे टूट गया।" इस दौर में तो लेखक सबसे बदनसीब व्यक्ति है। साहित्य के बाहरी संसार में तो एक लपलपाता हिंसात्मक लावा उबल रहा है। और लोग उसमें लोगों को फ़ेंकने के लिये इंतजार कर रहे हैं। परसाई को वे लोग सबसे कम जानते हैं जो धड़ाधड़ व्यंग्य लिख रहे हैं और विक्रय संसार के जरूरी अंग बन गये हैं। विडम्बना यह है कि कहते हैं कि उनकी प्रेरणा परसाईजी हैं। कल्पना की जा सकती है कि परसाई इससे कितने मर्माहत होते रहे होंगे। परसाई को गालिब, मीर, तुलसी, फ़ैज और फ़िराक बहुत पसन्द थे। इससे परसाई के भीतरी मिजाज का अन्दाज लगाया जा सकता है। परसाईजी के व्यक्तित्व की  विवेचनात्मक खोज और उनके विपुल साहित्य की उपयुक्त आलोचना अभी शेष है।

परसाई ने एक खतरनाक मार्ग का चुनाव किया था इसलिये उन्हें प्रशस्ति तो बाद में कलावादी और सत्तावादी सरकारी लोग देते रहे पर उनकी समीक्षा और पड़ताल का सच्चा प्रयास नहीं किया गया। इसके पीछे एक धोखाधड़ी है।विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है और बार-बार जोर देकर लिखा है कि परसाईजी वर्तमानता के साहित्यकार हैं। उन्होंने इसको प्रमाणित करने के लिये अनेक उदाहरण भी दिये हैं। पर उदाहरण सरल मार्ग तक लाकर छोड़ देते हैं। आप अगर लेखक के तलघर में प्रवेश नहीं करते तो तो उदाहरण का अनर्थ कर सकते हैं। लेखक का तलघर सबसे रहस्यपूर्ण कबाड़ से भरी जगह होती है। यह जितनी भी ऊबड़-खाबड़ हो लेकिन यही वह जगह है जहां से लेखक की अंतरात्मा तक आप जा सकते हैं, बशर्ते कि आप जाना चाहें और यह कि आपकी गहरी मंशा हो, कूबत हो। व्यंग्य परसाईजी का शस्त्र था और निबन्ध उसकी विधा। कभी-कभी वे कहानी के इर्द-गिर्द भी घूमते हैं। उन्हें बार-बार कोरा व्यंग्यकार न कहा जाए। वे कोरे व्यंग्यकार नहीं थे। दूसरे, परसाई समय का अतिक्रमण करते हैं। बल्कि उनकी रचना यह बताती है कि समय जो आने वाला है वह कितना भयानक हो सकता है।

और यह सब उन्होंने एक छोटे शहर में रहते हुये किया जहां बुन्देली ऐंठ जबर्दस्त है। यही बात मैंने शाहजहांपुर में हृदयेश के लिये कही थी। इससे श्रीलाल शुक्ल को सख्त एतराज था। पर मैं अपनी बात से डिगा नहीं हूं। परसाई ने अवसरों को ठुकराया और एक छोटे शहर में रहने का चुनाव किया। इस छोटे शहर जबलपुर से ही उन्होंने भूमंडल का स्पर्श किया। इससे ही उनकी ताकत का, कल्पना का, दृष्टि का और चुनाव का पता चलता है। इस देश के महानगरों में एक जंजाल और गुटबंद है। अब सारी आलोचना और प्रशंसा इन महानगरों में पकड़कर कैद कर ली गयी है। अब वैसी ही संस्कृति पनप गई है वैसे ही जन्म हो रहे हैं वैसे ही मरण। आलोचना की नापतौल, आलोचना की घ्राण शक्ति, आलोचना का अवसरवाद अब इन महानगरों में अपनी दुनिया खड़ी कर रहा है। वहां बहुत सारे आकर्षण हैं। वहां बुद्धिजीवियों और अनोखे बुद्धिकर्म करने वालों की कमी नहीं है। लेकिन हिन्दी का विपुल और सर्वेश्रेष्ठ लेखन इन महानगरों से गायब है। बिल्कुल गायब यह है यह नहीं कहूंगा। पर जब लेखक बाजार से बहुत दूर रहता है और जब वह एक अत्यन्त शान्त समय का चुनाव करता है, जब वह सन्तोषी होता है तब भी उसको गर्वोन्नत भविष्य मिल सकता है यह परसाई ने सिद्ध कर दिया। संसार के अनेक महान लेखकों ने अपने एकान्त को पसन्द किया है और परसाई को जबलपुर प्यारा भी था। स्वार्थी आत्मायें अपनी लौकिक सफ़लताओं के लिये शहर-दर-शहर भटक रही हैं। उनके आगे नौकरी का सवाल नहीं है। उनको चमकीला सम्पत्ति- संसार चाहिये और चाहिये सत्ता का हक।

परसाई इस समय में, इस सबसे विरत एक अनोखे जागरण की जरूरत में लगे रहे।

-ज्ञानरंजन जी की पुस्तक कबाड़खाना से


ज्ञानरंजनजी की किताब कबाड़खाना का विवरण निम्न है-
किताब का नामकबाड़खाना, लेखक– ज्ञानरंजन, प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-191,  मूल्य- 225

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...