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Tuesday, 7 February 2017

नागार्जुन : एक लम्बी जिरह


नागार्जुन उर्फ़ ‘बाबा’ मैथिली और हिंदी के विकट रचनाकार हैं । उन पर जिरह करने का साहस विष्णुचंद्र शर्मा जैसा विमर्शकार ही कर सकता है जो उनके लेखन और जीवन दोनों का 1957 से परस्पर गवाह रहे हैं ।
विष्णुचंद्र शर्मा की पुस्तक ‘नागार्जुन: एक लम्बी जिरह’ दो खण्डों में विभाजित हैं । पहले खण्ड में संस्मरण और पत्र हैं जो ठेठ देसी ज़मीन की सोंधी महक तथा जीवन की जीवन्तता को बड़े इत्मिनान से सहेज-बटोरकर हमारे सामने लाते हैं । इसमें बाबा की लेखक से निकटता महसूस की जा सकती है, जहाँ एक ख़त के माध्यम से लेखक नागार्जुन को याद करते हैं और कहते हैं- “बाबा को श्री श्री का हाथ थामे, स्पर्श ज्ञान करते कवि केदारनाथ सिंह ने भी देखा था ।”[i]
लेखक नागार्जुन के काफी निकट हैं और जब वे उनकी कोठरी जाते हैं तब बाबा उनसे सारे देश-जहान की बातें करते हैं और उनका यह मानना है कि वे बाबा के घर के सामान की तरह हैं ।
लेखक ने बाबा की हर हरकतों को देखा-परखा था । बाबा लेखक के घर आए थे और जब लेखक ने बाबा से यह प्रश्न पूछा कि- “बाबा यह मंडल क्या है ?” तब बाबा ने बड़ी धीमी-मंद हाँसी, उनके चेहरे पर खिल उठी थी, कहा- “यह मंडल और आत्मदाह तो एक लड़ाई का हिस्सा है । यह दलित और औरत की लड़ाई एक दिन में नहीं लड़ी जाएगी । तुम जैसे गैस धीमी और तेज करते हो, ठीक ऐसे ही मंडल की लड़ाई, उनके हक की सामाजिक न्याय की लड़ाई है । वह कहीं धीमी होगी, कहीं तेज ।”[ii]
इस बात से यह स्पष्ट होता हो जाता है कि उस समय दलित और स्त्रियों की हालात एक जैसी ही थी और वे अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रहे थे । बाबा की वाणी मैथिल समाज में भी गूंजती है और इंदिरा गाँधी में देश की धुरी देखने वाले हजारीप्रसाद द्विवेदी के मन में भी । नागार्जुन ने कबीर के बाद आजाद भारतवर्ष के फटेहाल इंसानों को भीतर तक झकझोर दिया था । लेखक ने नागार्जुन द्वारा लिखित उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ और ‘बलचनमा’ का जिक्र भी किया है ।
लेखक ने केवल नागार्जुन के निकट थे बल्कि शमशेर बहादुर सिंह और निराला के भी अच्छे अनुयायी थे । कवि (1957-58) से बाबा का लगाव था
नागार्जुन का ‘मनाधार’ 57 में गाँव और भारतीय कविता’ पर टिका था । लेखक 9/8 के पत्र में याद करते हैं – “‘कवि’ भी दो महीने से नहीं देखा । देहात रहना पड़ा डेढ़ महीने । लिखना-पढ़ना छूट गया था अब भी झंझटों को ठेल रहा हूँ....”[iii] 1957-58 ई. में नागार्जुन ‘अपमान’ और ‘बुद्धू’ के प्रतीक थे । यह बिडंबना-भरा था उनका जीवन । बाद में वह अपना मजाक उड़ाते समय ‘बुद्धूपन’ पर जो कार्टून बनाते थे, वह उनकी कविता का एक विशेष पक्ष है : पक्षधर और आबद्ध पक्ष ।
हिंदी में अभी तक यानी कवि-काल 1957-58 तक सुमित्रानंदन पन्त, महादेवी, अज्ञेय, बालकृष्ण राव, श्रीपत, राय, प्रभाकर माचवे, नेमीचंद जैन, रामविलास शर्मा सभ्य और शिष्ट थे । निराला, उग्र, नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन हिंदी के ‘जाहिल, जपाट और उजड्ड’ कवि और कथाकार माने जाते थे । यही अपमान और बुद्धू का प्रतीक बनने पर उग्र और निराला विद्रोह करते रहे जीवन-भर इस उच्च और सभ्य वर्ग के प्रति । नागार्जुन लगातार तिलमिला उठते थे, प्रकाशकों, राजनेताओं से मिले अपमान पर ।
लेखक ने नागार्जुन के 1957 में 6 पत्रों की स्मृति कथा कही है । यह स्मृति नागार्जुन के बदलाव की भी कथा है । सामूहिक खेती और सामूहिक चेतना का वह दौर था जिसमें नागार्जुन ने अपनी रचनाकार की भूमिका तैयार की थी । पत्र लिखते समय जीवन के दूसरे पहलू से नागार्जुन खुला और अन्तरंग संवाद भी करते रहे हैं । इस दौर की विडंबना भी नागार्जुन की आँख से छिपती नहीं है ।
नागार्जुन की यात्रा एक नितांत परिचित वातावरण से अचानक हमें हमारे जैसे देश के दूसरे वातावरण से जोड़ देती है ।
नागार्जुन का यह परंपरा से संवाद भी है और उनका मनाधार भी । यहीं कालिदास, विद्यापति, रविन्द्रनाथ, केदारनाथ अग्रवाल यानी अपने लेखन के दौर से अलग-अलग ढंग से उनकी विडंबनाओं पर अंतर्मन की कहानी कहते हैं । हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘बाणभट्ट’ से और ‘कालिदास’ से ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘मेघदूत : एक कहानी’ में इसी ज़मीन पर अंतर्मन की कहानी लिखी थी । नागार्जुन के अंतर्मन में सिर्फ निजी ऊहा-पोह का व्यक्तिवादी कथानक- अज्ञेय, जैनेन्द्र, मोहन राकेश जैसा बहुत कम मिलेगा । लेखक को बाबा पत्र लिखते हैं जिनमें वे लेखक के बारे में कहते हैं कि लेखक के जीवन में नाटकीय परिवर्तन आनेवाला है । और दूसरी यह है कि यह समानधर्मा मित्र की-भवभूति की तरह-तलाश करते हैं और चारों ओर की गिरावट, समझौता, ललित लोकायतन का नज़ारा देखकर स्वीकार भी करते हैं ‘बाहर कोई नहीं नज़र आता जिसका अनुशासन मैं मान सकूँ ।’[iv]
नागार्जुन के जीवन में निर्वासन का लम्बा सिलसिला श्रीलंका से शुरू होता है । 1943 में लिखी थी कविता निर्वासन काल में नागार्जुन ने : घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल, याद आता तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल ।”[v]
नागार्जुन सचेतन कवि हैं । “सामाजिक और राजनीतिक चेतना को लेखक की पहली शर्त मानते हुए ब्रेख्त ने मार्क्सवाद के द्वंदात्मक सिद्धांत को कविता में कायम रखा । व्यक्ति और समूह के बीच के वास्तविक तनावों को मजबूती से पकड़ते हुए उन्होंने खासकर छोटी कविताएँ ज्यादा लिखी । शब्दों की भरमार से कविता को बनाया और भाषा के सजीले कपड़ों को उतारते हुए नंगी और ठिठुरती हुई भाषा को समाज के निचले वर्गों तक पहुँचाया जहाँ यह म्यान रहित भाषा कविता को हथियार की शक्ल दे सकी ।”[vi]
इतिहास की ओर जाते हुए लेखक ने यात्री और नागार्जुन और वैद्यनाथ मिश्र, यानी एक आदमी के तीन अलग-अलग कद और रूप एक-दूसरे की जैसे तलाशी ले रहे थे । वैद्यनाथ मिश्र के मन में मैथिल-संस्कार थे जो तरौनी गाँव के मैथिल समाज का संस्कार था जो उनके स्वभाव में अन्तर्निहित था । जिस प्रकार वैद्यनाथ मिश्र के संस्कार उनके मैथिल समाज में थे वहीं दूसरी तरफ यात्री राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत की यात्रा में रहे हैं और पालि भाषा के जानकार की हैसियत से श्रीलंका में भी बौद्ध विहारों में और विद्यालयों में घूमे हैं ।
नागार्जुन समाजवादी आंदोलन में जेल काट चुके हैं । नागार्जुन गाँव के किसानों की आगुवाई कर चुके हैं । खद्दर की मोटी पोशाक, मोटा दाना-पानी और न टूटने वाला सजीव संघर्ष । यह समय राष्ट्रीय आंदोलन का था । नागार्जुन कम्युनिस्ट हो चुके थे और उनकी कविताओं में व्यंग्य तीखा हो रहा था । और फिर देश की स्वाधीनता के बाद के पचास वर्षों में नागार्जुन एक ऐसे लेखक रहे हैं जिनसे मिलने से मंत्री, नेता तथा बुद्धिजीवी  डरते थे । नागार्जुन व्यंग्य विनोद के बावजूद अपने भीतर एक करुण, मर्माहत आदमी है, जो ‘जन-जन के जीवन में साहस’ पैदा करना चाहता है ।
कला और जीवन को अलग-अलग खातों में बाँटकर जो आलोचक बंदरबाँट की सीख देते हैं, वह अक्सर रतिनाथ की चाची का लांछित जीवन, उनके प्रति घृणित कुचेष्टाएँ और उसकी अदम्य साहसिक आत्मीयता के सन्दर्भ में इस पूरे मैथिल प्रदेश की संस्कृति को पहचान नहीं पाए हैं । नागार्जुन के उपन्यास अतीव रोचक होते हैं । उनमें सांस्कृतिक तनाव का अहसास पाठक के मन में बना रहता है । उनके प्रतीक आँचलिक संस्कृति से भरे पूरे होते हैं ।
लेखक ने नागार्जुन की भाषा को भी स्पष्ट किया है । वे मानते हैं कि उनके व्यक्तित्व की तरह सीधी, चुटीली और बेलाग है उनकी भाषा । उनकी भाषा के संस्कार मैथिल समाज की किसी आतंरिक संगती की याद दिला देते हैं ।
पुस्तक के दूसरे खण्ड में बाबा की पक्षधर कविताओं को केंद्र में रखा गया हैं । वह कई अंतर्धाराओं के परस्पर घात-प्रतिघातों को झेलती हुई कभी तेजी से तो कभी मंद गति से संवेदनाओं और संस्कारों को अर्थ देती हैं । विष्णु जी ने उनके काव्य-संसार पर वैज्ञानिक सोच, इतिहास और काल-बोध तथा संरचना की दृष्टि से मौलिक चिंतन किया है । बाबा के बहाने यह जिरह ब्रेख्त, मुक्तिबोध और समकालीन कविता परिदृश्य को भी साफ करने का कार्य करती हैं ।
नागार्जुन उपन्यास और कविता में एक ही जमीन पर खड़े नज़र आते हैं । वह ज़मीन है “अपने समय के यथार्थ से साक्षात्कार की ज़मीन ।”[vii] यथार्थ से साक्षात्कार करने की नागार्जुन की कसौटी के दो आधार रहे हैं : एक वाम दलों का विभाजन और मार्क्सवाद का जनाधार । दूसरा : किसान कवि कुटुंब का कवि होता है ।
‘रेणु’ के बाद ‘महाजनी सभ्यता’ के व्यामोह से लगातार संघर्ष करते रहे श्रीलाल शुक्ल । ‘रागदरबारी’ से ‘विश्रामपुर का संत’ तक वह अपने उपन्यासों में सामंती मानसिकता से ही लड़ते रहे । नागार्जुन ने बार-बार वाम दलों के भटकाव के बीच अपनी पक्षधर भूमिका तैयार की थी । नागार्जुन ‘क्षुब्ध-मथित’ कवि और कथाकार हैं । उन्हें कोसने वाले डॉ. बच्चन सिंह (आलोचना), डॉ. विजयमोहन सिंह (हंस) जैसे आलोचक भी समझ नहीं सके ।
नागार्जुन ठेठ किसान हैं । किसान-पुत्र नागार्जुन में जितना साम्यवाद का सारतत्व है उतना ही वहाँ किसान का ‘पैथास’ भी मिलता हैं । यह पीड़ा-दर्दी-किसान ‘रेणु’ में भी लयबद्ध हैं । प्रेमचंद में वहीं किसान बेचैन दार्शनिक है । नागार्जुन अपने भीतर झाँककर जब हँसते हैं तो वहाँ जनवादी किसान के ‘लोअर डेप्थ’ का गहरा अनुभव नज़र आता है । अपने किसान-पत्र के अनुभव पर जब नागार्जुन सोचते हैं तो वह कहीं दार्शनिक लगते हैं और वहीं बेचैन क्रांतिकारी ।
नागार्जुन और मुक्तिबोध का अंतर्मन, आलोचकों की सीमा की गहराई से जाना जा सकता है । नागार्जुन अपने स्वभाव-सी खरी जनवादी कविता लिखकर वही यांत्रिक आलोचकों को रोकते हैं । “कविता की ऐसी व्याख्या करोगे तो कवि और जनवादी कविता का दम ही घुट जाएगा ।”[viii]
       विष्णुचंद्र शर्मा ने नागार्जुन की भाषा की टिप्पणी दी है । उन्होंने जब नागार्जुन से पूछा : “‘बाबा कविता की भाषा क्या होती है ?’ वे हँसे । कहा- ‘वाक्यों या शब्दों का समूह नहीं होती भाषा । जीवन का समूह ज़रूर भाषा को कह सकते हैं ।”[ix]
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा है । डॉ. रामविलास शर्मा, कबीर की भाषा को दस्तकारों की भाषा मानते हैं । वैसे हिंदी के कम कवि है, जो कबीर की भाषा में गलती पकड़ सकते हैं । कविता की भाषा में सादगी होती है । ‘राम की शक्तिपूजा’ के निराला, ‘नए पत्ते’ में भाषा के विकास के माध्यम से जीवन के विकास के लिए ही लड़ते रहे । कवि की लड़ाई उसे अनवरत एक साँचा बनाना और उसे तोड़ना सिखाती है । दूसरी तरफ मुक्तिबोध की भाषा हिंदी को बड़ा फलक देती है । वह एक ही कविता में, पिकासो की बड़ी पेंटिंग और ब्रेख्त के नाटक पर एक साथ काम करते हैं । एक ही कविता में वह पत्रकार, कलाकार, कवि, क्रांतिकारी, दार्शनिक, वैज्ञानिक का विशाल फलक रचते हैं । कविता की एक नई भाषा फंतासी में वह आजन्म विचरण करते हुए, यथार्थ को ‘पुनर्नवा’ करते हैं । यह हिंदी को दुनिया की भाषा मुक्तिबोध ने दी ।
अज्ञेय संपन्न घुमक्कड़ थे और राहुलजी भी घूमना पसंद करते थे । अज्ञेय की कविता में, जनता के अनुभव के शब्द नहीं आते, जबकि जन आन्दोलनों में हिस्सा लेकर नागार्जुन कविता की भाषा को आंदोलन का हिस्सा बनाते हैं ।
नागार्जुन एक मार्क्सवादी लेखक हैं, वे पहले अपनी खरी समीक्षा करते हैं, फिर समाज की बाहरी भूल, गलती का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं । नागार्जुन के कई रूप हैं । ‘राजनीतिक पत्रकारिता के स्तर पर क्रांतिकारी जोश उभारनेवाले ओजस्वी वक्ता नागार्जुन ! जातीय हिंदी कविता का नया यथार्थवादी नागार्जुन ! सर्वहारा वर्ग के अद्भुत आत्मीयता-भरे अभिभावक नागार्जुन ।
इस पुस्तक में लेखक ने नागार्जुन, मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा जैसे लेखकों की तुलना उनके लेख द्वारा की है । नागार्जुन और मुक्तिबोध पुरानी पद्धतियों को छोड़कर और इतिहास दृष्टि में मुक्ति पाकर भिन्न तरीका अपनाते हैं । लेखक ने समसामयिक कविता का वर्ग-आधार में कई लेखकों को अपने विषय का आधार माना । ब्रिटिश दरबार के बाहर थे प्रेमचंद । प्रेमचंद के वर्ग-संघर्ष की कसौटी थी घृणा । यह सामंत वर्ग और साम्राज्यवाद से घृणा की कसौटी, हमारी आजादी की कसौटी रही थी । यानी जनता के अपने वर्ग-संघर्ष से प्रेमचंद ने जनवादी मिज़ाज का लेखन रचा था । प्रेमचंद और निराला ने हिंदी की प्रगतिशील चेतना को दरबार से बाहर निकाला था । निराला के बाद की प्रगतिशील कविता की विधा आज भी है । शमशेर में लोक-चेतना की इच्छा, मुक्तिबोध में इतिहास दर्शन का ज्ञान और नागार्जुन में क्रांतिकारी भारत की कर्मशीलता हैं ।
       आखिरी पाठ में विष्णुचंद्र ने नागार्जुन के सौन्दर्य बोध को उल्लेखित किया है । वे कहते हैं कि नागार्जुन का मन ऐसे चालू साहित्यकारों के साथ नहीं मिलता था । वह प्रकाशकों, सरकारों और सेठों के दलाल गोत्र के साहित्यकारों से बराबर दूर रहते थे । वह पटना, दिल्ली, भोपाल और लखनऊ में चौकन्नी आँखों से उच्चपदस्थ ऑफिसरों की हरकते देखते थे, और दलाल गोत्र के साहित्यकारों से उनका फर्क भी बताते चलते थे । नागार्जुन की स्मृति और सौंदर्य बोध में उनका विवेक दिखाई देता है ।
“‘टुकड़े-टुकड़े दास्तान’ सुनाती हुई नागार्जुन की कविता ही है उनकी आत्मकथा ।”[x]
नागार्जुन का कवि कर्म स्वाभिमानी कवि का कवि-कर्म है । नागार्जुन, भारतेंदु मंडल के पत्रकार कवि थे इसलिए जब सोवियत संघ, उनके जीवन काल में ही बिखर गया । नागार्जुन की निगाह मिथला, अवधी, भोजपुरी जनता पर दृढ़ता से टिकी रही । उनके सपने में सोवियत संघ का जनपक्ष का सौंदर्य था, जीवन में वह अपनी जनता के प्रति पक्षधरता के प्रतिबद्ध कवि थे । वे हजारीप्रसाद द्विवेदी के पड़ोसी कवि माने जाते हैं । दोनों ‘संस्कृति की पावनता’ के हिमायती रहे । यह तर्क पद्धति नागार्जुन ने अपने सौंदर्य बोध को समझाने में बार-बार इस्तेमाल की है । यह सौंदर्य उनके ही मूल्यों और प्रेम का अर्थ खोलते हुए सर्वहारा संस्कृति के लोक दृश्य में परिभाषित होता है । ‘संस्कृति के पावनतम’ मूल्यों को वे परंपरा में खोजते हैं और वर्तमान की विडंबना में उसे बचाते चलते हैं ।
विशेषताएँ : इस पुस्तक में विष्णुचंद्र ने नागार्जुन से अपनी निकटता उनके द्वारा लिखे पत्र का विस्तृत विवेचन करते हैं । पुस्तक के दो खण्ड हैं जिसमें पहले खण्ड में पत्र और संस्मरण हैं और दूसरे खण्ड में नागार्जुन के काव्य संसार और वैज्ञानिक दृष्टि से चिंतन किया है । इसी बहाने यह जिरह ब्रेख्त, मुक्तिबोध और समकालीन कविता परिदृश्य को भी साफ करने का कार्य करती है । बाबा नागार्जुन के काव्य के विमर्शों पर अब तक की यह पुस्तक भिन्न और मुख्य है ।                           


[i] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 27
[ii] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 27
[iii] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 41
[iv] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 51
[v] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 61
[vi] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 24
[vii] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 80
[viii] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 91
[ix] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 102
[x] नागार्जुन : एक लम्बी जिरह, ले. विष्णुचंद्र शर्मा, पृ. सं. 178
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 राज्य लक्ष्मी -  शोधार्थी ph.d hindi
 central university of Hyderabad
q no D 32 non teaching staff quarters,HCU-500046

Wednesday, 1 June 2016

शोध आलेख - दूधनाथ सिंह कृत आख़िरी कलाम / सतीश कुमार


आखिरी कलाम’: अयोध्या के कार सेवकों का मनोविज्ञान

            वर्तमान माहौल में जब चिन्तनशील विवेक के लिए जगह सिमटी जा रही हो, जब चारों ओर अन्ध आस्थाओं का घना कुहरा छाया हो, जब मीडिया-प्रक्षेपित धर्म और संस्कृति की धुन्ध में साम्प्रदायिकता का डरावना शोर सुनाई पड़ रहा हो, जब सत्ता-बल, धन-बल और पशु-बल संगठित हो रहे हों, तब विचारशील व्यक्ति क्या करे ? चुप्पी साध ले ? लेकिन यह तो आत्महत्या होगी। इतना ही नहीं, यह मनुष्य की सर्जनात्मक क्षमता में अविश्वास भी होगा। आखिर मनुष्य अपनी आदिम बर्बर अवस्था से, इतिहास की अनेक-अनेक बाधाओं को दूर करता यहाँ तक पहुँचा ही है। फिर यह कैसे मान लिया जाए कि वह यहीं अवरूद्ध ठहरा रह जाएगा।1  इस संदर्भ में प्रख्यात आलोचक प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल लिखती हैं, ‘‘लेखक काल, चेतना और तर्क की हदबंधियों से बाहर होकर भ्रम, विस्मृति और विसंगतियों के बीच अपनी तलाश जारी रखता है।’’2 ऐसे ही विचारशील व्यक्तियों में से एक हैं- दूधनाथ सिंह। जिन्होंने अपने उपन्यास आखिरी कलामके माध्यम से इस प्रक्रिया को गतिशील बनाए रखा है। आखिरी कलामहिन्दूवादी राजनीति के प्रारम्भिक चरण को देश के लिए घातक बताते हुए जिस तरह उस दौर को दर्ज करता है, वह बड़ा जीवन्त है। किस तरह शुद्ध भारतीय, स्वदेशी और भारतीयता के आवरण में संघ देश के शीर्षस्थ शैक्षणिक संस्थाओं में प्रविष्ट हुआ और कैसे अपने सामाजिक संघर्षों की धार कुन्द की, इसका बड़ा वैज्ञानिक विश्लेषण इस उपन्यास में है।“3 अतः ‘‘यह उपन्यास सही समय पर एक सही सर्जनात्मक हस्तक्षेप है।’’4
            
अपनी सम्पूर्ण औपन्यासिक संरचना में आखिरी कलामहिंदू फासीवादी खतरे की पृष्ठभूमि में एक ऐसी जीवन्त जिरह है जो धर्म, धर्मनिरपेक्षता, जनतन्त्र, मीडिया, मुसलमान वामपंथ से लेकर लोहियावादी राजनीति तक का विस्तार लिए है। लेकिन उपन्यासकार का सर्वाधिक मुखर है हिन्दू धर्म की मनुष्यविरोधी संरचना को बेपर्दा करने तथा धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के उस पोले आधार को उजागर करने में जो उसकी विफलता के लिए जिम्मेदार हैं।5  अयोध्या में कारसेवकों की आक्रामकता व बाबरी मस्जिद के आसन्न ध्वंस पर धर्मनिरपेक्ष शक्तियों से उसका सीधा चुनौतीपूर्ण सवाल करते हैं- कहाँ है तुम्हारे वर्ग-मुक्त मानस की जनता ? यह मस्जिद-मस्जिद का सवाल नहीं . . . यह मनुष्य होने या न होने का सवाल है।’’6
            
कथाकार ने उपन्यास का जो ताना-बाना बुना है, उसके समूचे में तत्सत् पांडेय की आत्मग्लानि से भारी यह बड़बड़ाहट पहले पन्ने से लेकर उन आखिरी पन्नों तक फैली हुई है, जिन पर कारसेवकों का तांडव, फौजी बूटों का आतंक, कफ्र्यू का सन्नाटा और दिसंबर की कड़ाके की ठंड एक साथ मौजूद हैं। उपन्यास इसी शोर और सन्नाटे का मिला-जुला करूण संगीत है जिसे सुनते हुए ऐसा लगता है कि हिंसक कार-सेवकों की भीड़ में तत्सत पाण्डेय, सर्वात्मन और बिल्लेश्वर निरीह निरुपायों की तरह फँस गए हैं जिसका परिणाम आचार्य जी के जीवन के अंत से होता है- ‘‘मुझे घर ले चलो सर्वात्मन। आचार्य जी के मुँह से आर्तभाव से निकला। फिर एक हिचकी।’’ खगेन्द्र ठाकुर आखिरी कलामका मूल कथ्य बताते हुए लिखते हैं- ’’भारतीय समाज और राजनीति के बढ़ते हुए रूढि़वाद, अंधविश्वास और धर्मतांत्रिक राजनीति के अभिमानों के फलस्वरूप बढ़ता हुआ उन्माद और उसके प्रभाव से पैदा हुआ आतंक।’’7

            यह आश्चर्यजनक नहीं है कि इस उपन्यास में साम्प्रदायिकता का विखंडन नहीं है। दो घटनाएँ हैं- पुस्तकालय कांड और बाबरी मस्जिद ध्वंस। दोनों में कारसेवक हैं। ‘‘कार-सेवक कौन थे ? कहाँ-कहाँ से आए थे ? उन्हें कौन इकट्ठा कर लाया था ? उन्हें भोजन कौन करा रहा था? वे क्या सिर्फ भीड़ थे या नेतृत्व चालित समूह ? उनके नेतृत्व का तात्कालिक और दीर्घकालिक एजेंडा क्या था ? उन्हें उत्तेजित, उन्मादित कौन कर रहा था ? मस्जिद तोड़ने के औज¬ार उनके पास कहाँ से आ गए ? वे मंदिर बनाने जुटे थे या मस्जिद तोड़ने ? मंदिर तो बना नहीं फिर मस्जिद क्यों तोड़ दी गई ? सवालों का काफिला है पर लेखक उससे? मुँह चुराता है। टेªन से लौटते कारसेवकों की हरकतें तो पूरी परिघटना की पूँछ है। इसके पीछे भयानक विचार है- धार्मिक और जातिगत श्रेष्ठता के सिद्धान्त की स्थापना और ब्राह्मणों द्वारा पेशवाराजी की स्थापना का स्वप्न। पर आप आधा-अधूरा, संपादित, लेखक द्वारा सेंसर्ड दृश्य देखिए। उसकी कलात्मकता पर ताली बजाइए। कला की आड़ में छद्म बौद्धिकता कैसे मनुष्यता को पीछे ले जाने का तर्क जुटाती है, उसी का नमूना है- आखिरी कलाम’’8

             कारसेवकों के मनोविज्ञान को समझने के लिए उपन्यास में वर्णित आचार्य और सर्वात्मन के वार्तालाप दृष्टव्य है। सर्वात्मन जब आचार्यजी को ये बताते हैं कि ये ‘‘कारसेवक हैं, अयोध्या जा रहे हैं।’’9 तो उसके प्रत्युतर में आचार्यजी कारसेवकों पर टिप्पणी करते हुए सर्वात्मन को बताते हैं कि ‘‘अच्छा . . . हाँ, वहाँ कारजहै। जानते हो सर्वात्मन, यह शब्द कैसे बना है ? ‘कार्यसे। फिर कारज’, फिर खतम। और तब उसमें सेवकलगा। सिख गुरूओं ने सबसे पहले इसे चलाया। उसमें अपनी आस्था का निर्माण भी था और उसमें लगे हुए आत्मबलिदान भी देना पड़ सकता था। यों यह शब्द पवित्र हुआ। लेकिन हर पवित्र चीज़ अपवित्र भी तो हो सकती है। आप एक ही पानी में बार-बार हाथ धोएँगे तो वह मैला तो होगा ही। और फिर कारजका वही अर्थ नहीं होता जो कार्यका होता है। शब्द सिर्फ रूप में तद्भव नहीं होते, अर्थ में भी हो जाते हैं। कोई पवित्र कारजनहीं बोलता। कारजकिसी बेबसी या जि़द या अन्ध श्रद्धा के शुभ सम्पादन या समापन को भी कहते हैं। कारजहोता है अन्तिम छुटकारा पाने के लिए। कारजहमारे यहाँ तेरहीको भी कहते हैं, जब भटकता हुआ आत्मन् इस लोक से मुक्त होता है। कारजकिसी प्रयत्न के अन्त को कहते हैं। वह साध्य है और कारसेवक उसके साधन। निमित्त मात्र। कारजशुभ-अशुभ दोनों होता है। . . . ये कारसेवक किस तरह के कारजको जा रहे हैं ?’’10 कारसेवकों के लिए कारसेवा अर्थात् बाबरी-मस्जिद ध्वंस किसी उत्सव से कम नहीं था। जैश्रीराम जैश्रीरामकी ‘‘एक मार्शल धुन पर ये बोल निकालते हुए कारसेवक अन्धाधुन्ध नाच रहे थे। इतनी ठंड में भी पसीने से थक-बक, उनके माथे पर बँधे हुए जैश्रीरामके जोगिया पट्टे भीगकर गीले हो गए थे।’’11 इन कारसेवकों की उत्पत्ति कब हुई ? इसकी जानकारी लेखक आचार्यजी और माधवानंद की बातचीत के माध्यम से देता है। इस संदर्भ में इनके वार्तालाप का कुछ अंश उल्लेखनीय है-
            ‘क्यों, अब क्या हुआ ?’
            ‘शायद बाढ़ आएगी।
            ‘यह दरवाजा कौन पीट रहा है ? वहाँ तो आधी रात होगी।
            ‘कारसेवक हैं।
            ‘कारसेवक ?
            ‘तुम इन्हें नहीं जानते।
            ‘से कब पैदा हो गए ?’
            ‘आजादी के बाद।12

प्रस्तुत उपन्यास में लेखक कारसेवकों की स्थिति के माध्यम से वर्णन करता है कि धर्म का कठमुल्लापन व्यक्ति को किस सीमा तक उन्मादी बना देता है और वह किस सीमा तक घातक हो सकता है। लेखक के अनुसार, ‘‘बसों के आगे-पीछे भगवा बितान खींचकर बाँधे गए थे और लगातार नारों की गूँज उठ रही थी- कुछ इस तरह जैसे अन्दर जैश्रीरामबै्रंड का बारूद हो, जो कभी अचानक बसों की छतों पर भी लोग थे जो भीतर के नारों को तुक और लय में आकाश तक उठा रहे थे। अब ये नारे छतफाड़ नहीं, आसमान-फाड़ थे, जिनको भगवा शब्दावली में गगनभेदीकहते हैं।’’13 चारों ओर उत्तेजक कनफोड़ू नारों की चीख-पुकार है-
‘‘धर्म-संघ की है ललकार
सुन ले दिल्ली सरकार।
राम लला की जै
सिया माई की जै . . .’’14

लोगों में अपने धर्म के प्रति अंधश्रद्धा होती है जिसका लाभ धर्म के बड़े-बड़े ठेकेदार उठाते हैं और वे इस षडयंत्र के द्वारा सत्ता की डोर अपने हाथों में रखते हैं। ऐसे लोग भलीभाँति जानते हैं कि धर्म एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा वे बहुत बड़े जनसमुदाय पर अप्रत्यक्ष रूप से अधिकार कर, अपनी मर्जी से उसका प्रयोग कर सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में तत्सत पांडेय सर्वात्मन को कहते हैं- ‘‘मैं जब यहाँ से शुरू करता हूँ कि धर्म एक षडयंत्र है तो जाहिर है, धर्म-निरपेक्षता का क्या मतलब। और सच यह है सर्वात्मन, कि धर्म एक वृहद्, अनजाना षडयंत्र है मानवता के खिलाफ। धर्म एक ठगी है, धर्म डराता है। अंधत्व प्रदान करता है। धर्म कहता है अंधे होकर चलो, तुम्हारी लाठी मैं हूँ। धर्म में अब कुछ भी ऐसा नहीं जिसे हासिल किया जा सके। धर्म मनुष्य की सांसारिक, मनोवैज्ञानिक कमजोरी को भुनाता है। जो आज के नैतिक सवाल हैं, धर्म के बिना भी हल किए जा सकते हैं।’’15

धार्मिक उन्माद इतना फैल चुका है कि इसमें समाज के सभी वर्ग अन्धे हो गए हैं। आखिरी कलामका प्रमुख पात्र तत्सत पांडेय धर्म का पूरी तरह मजाक बनाते हुए धर्म के बारे में कहते हैं- ‘‘यह छूआछूत का एक रोग है जो भारतीयों में कुछ ज्यादा ही फैला है। भारतीय बुद्धिजीवी तो इसे राजरोग की तरह पालते हैं। उन्होंने कहा कि यह एक विश्व-विश्रुत जालसाजी है जिसकी खिलाफ़त को पागलपन करार दिया जाता है। भीख माँगने से लेकर यातना देने और हत्या तक इसका इस्तेमाल किया जाता है।’’16 और ऐसा होता भी है। सभी कारसेवक इस रोग से ग्रसित हैं जिसकी पुष्टि फोन पर बात करने के लिए लाइन में लगे हुए एक कारसेवक के कथन से (सर्वात्मन के साथ बातचीत के दौरान) स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है- ‘‘अपने घर खबर करने के लिए। कि सही-सलामत पहुँच गया हूँ और कारसेवा पूरी करके ही लौटूँगा।’’17

दूधनाथ सिंह ने अपने उपन्यास आखिरी कलाममें हिंदूत्व के उभार के फलस्वरूप हिंदू नेताओं की क्रूर नीतियों का वर्णन किया है जो कारसेवकों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर बहुत बड़े जनसमुदाय को वोट बैंक में बदलना चाहते हैं। ललकार दिवसके दिन एक भाई जी उन्मादी कारसेवकों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है तभी भीड़ में एक व्यक्ति दूसरों को पीछे धकेलता हुआ कहता है- ‘‘अरे हट, अभी तो हम पावरमें हैं। अगर अब नही तो फिर कब ? कल को पावरचला जाएगा तो सारी रथयात्रा, सारी कारसेवा धरी रह जाएगी। अरे, तू किसके आर्डर से गऊ बना शास्तर बखान रहा है . . . हट्। फिर वह आएगा वह मुल्ला हरामजादा . . . इस बार तेरी राम की पैड़ीलाल हो जाएगी।’’ दूसरे शब्दों में कहें तो जो कारसेवक आम लोगों को लूटते हैं तंग करते हैं उन्हें रोकने की बजाय राजनीति शह देती है ताकि उनकी आड़ में वे अपने अनुचित कार्यों को भी बेहिचक पूरा कर सकें। अतः कारसेवकों के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से सत्ताधारी लोगों की स्वार्थ नीतियाँ काम कर रही हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा यह कहना कि ‘‘मैं कारसेवकों पर गोली नहीं चलवाऊँगा’’18 इसी ओर संकेत करता है।
वस्तुतः साम्प्रदायिकता फैलाने में धर्म के विकृत रूप का सहारा लिया जाता है। क्योंकि एक तो धर्म के अंतर्गत एक बहुत बड़ा जनसमूह आ जाता है, दूसरा उस जनसमूह की अपने धर्म पर अंधी श्रद्धा होती है। यही कारण है कि आखिरी कलाममें कारसेवकों की भीड़ का सत्ताधारी लोग अपने स्वार्थ हित के लिए प्रयोग करते हैं। प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल इसका कारण धर्म नहीं बल्कि उसको संचालित करने वाले स्वार्थांध लोगों को मानती हैं और अपनी आलोचनात्मक पुस्तक समकालीन कथा साहित्य: सरहदें और सरोकार में लिखती हैं कि ‘‘खतरनाक धर्म नहीं, धर्म को अपने हक में भुनाने वाले शातिर इरादे हैं। दूसरे, अपने आप में धर्म इतना संहारक भी नहीं कि अकेला विनाश का तांडव करता फिरे। सत्ता और समर्थन पाए बिना वह महत्त्वहीन है, पिछवाड़े पड़ी गुठली या छिलके की तरह। इसलिए धर्म और राजनीति एक-दूसरे का संबल पाकर अपने को बचाने और टिकाने की कूटनीति है।’’19 मनुष्य के भीतर जड़-धार्मिकता सुप्त-असुप्त अवस्था में विद्यमान होती है। परंतु जब कोई प्रतिधर्मी उसे उन विकृतियों के बारे में अवगत करवाता है, तो वह उसे अपने धर्म का अपमान समझकर, उसके विरूद्ध खड़ा हो जाता है। यही कारण है कि आखिरी कलामउपन्यास में उन्मादी कारसेवक बाबरी मस्जिद गिराने को आतुर दिखाई पड़ते हैं और अंततः गिरा कर ही अपने अहं की तुष्टि करते हैं।

बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद अयोध्या में कर्फ्यू लगाया गया। लेकिन यह कर्फ्यू केवल अयोध्यावासियों के लिए ही था। उपन्यासकार के शब्दों में, ‘‘कर्फ्यू था, कर्फ्यू नहीं था। सुबह छह बजे के लगभग भी काफी अंधेरा था। सरयू गाढ़े कोहरे में दफ़न थी। पुल भी घने कोहरे में डूबा हुआ था। लेकिन पुल पर और राम की पैड़ीके सामने और फैज़ाबाद जाने वाली सड़क पर हजारों लोग जैश्रीरामके नारे लगाते हुए चल रहे थे। बीच-बीच में मिलिट्री ट्रकों की कोहरे में डूबी हेडलाइट दीख पड़ती। सर्वात्मन बाँध से चलकर पुल की ढ़लान से मुख्य सड़क पर आया। ठठ् की ठठ् भीड़ दक्खिन, फैज़ाबाद की ओर जार रही थी। बीच-बीच में वे ट्रकों के लिए रास्ता छोड़ देते, लेकिन फ़ौजियों को देखते ही नारे लगाना और तेज़ कर देते। अद्भुत फ़्लैग-मार्च और अद्भुत कफ़्र्यू था, जिसमें न तो कोई गोली चल रही थी, न वे लोग छिपने की जगह ढ़ूँढ़ रहे थे। हाँ, अयोध्या के लोग घरों में ज़रूर बन्द थे। उनके लिए कफ़्र्यू निश्चित ही था।’’20 वहाँ के बड़े जंक्शनों को जाने वाली सभी ट्रेनों पर कारसेवकों का कब्जा हो गया था। जिसकी जानकारी रमाशंकर द्वारा तब दी जाती है, जब सर्वात्मन, रमाशंकर को आचार्यजी को अस्पताल पहुँचाने के लिए एंबुलेंस या ट्रेन पर प्रबन्ध करने के लिए आग्रह करता है। सर्वात्मन के मुख से ट्रेन का नाम सुनते ही रमाशंकर की उँगली हवा में उठी, ‘‘हाँ, कल रात से तो बड़े जंक्शनों को जानेवाली सभी ट्रेनें कारसेवक एक्सप्रेसहो गई हैं। और ऊपर-नीचे-ठसाठस। लाशें और घायल और जैकारे- सब एक साथ लदकर जा रहे हैं। कौन रोक सकता है, सरकार ही निकम्मी है। और निकम्मी भी क्या, सब मिली-भगत है।’’21

वस्तुतः आम आदमी चाहे वह बहुसंख्यक समुदाय से हो या अल्पसंख्यक समुदाय से, यदि वह साम्प्रदायिक हजूम का हिस्सा बनता है तब भी उसी की क्षति होती है और यदि नहीं बनता तब भी नुकसान उसी का होना होता है। आखिरी कलामउपन्यास में अयोध्या में रहने वाले मुस्लिम लोगों की न केवल मस्जिद गिरा दी जाती हैं बल्कि उनकी बस्तियाँ भी जला दी जाती हैं। उपन्यास के अन्त में जब कारसेवक अपने काम को अंजाम देकर रेल द्वारा अपने गन्तव्य स्थान पर वापिस जाते हैं तो रास्ते में वे रेल को रोककर खेतों में काम करने वाले, गरीब लोगांे, शहर के लोगों को न केवल तंग करते हैं अपितु उनको लूटने, उनके साथ बदसलूकी करने, उनकी झोंपडि़याँ जलाने आदि कार्यों को भी प्रशंसनीय ढ़ंग से करते हैं। यहाँ तक कि स्टेशन मास्टर को भी नहीं बख्श्ते, उसे थप्पड़ तक मार देते हैं।
हिंदू भी इन भावों से बचे नहीं रह पाते, जो कारसेवक रूपी हजूम का हिस्सा नहीं बनते। इसलिए सर्वात्मन जब उन्मादी माहौल में सहारा ढूढ़ने का प्रयत्न करता है तो उसे कहीं कोई सहायता नहीं मिलती। न आम आदमी उसकी कोई सहायता कर पाता है, न प्रशासन। एक खंडहरनुमा मस्जिद में रूकने पर, बिल्लेश्वर के मन में डर प्रकट होता है कि जब वे घरों को जला सकते हैं तो उनके लिए टूटी-फूटी मस्जिद को गिराना कौन-सी बड़ी बात है। बीमार तत्सत पांडेय को लेकर वे मारे-मारे फिरते हैं ताकि कोई सवारी मिल जाए या फिर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचा जा सके। इस स्थिति में सर्वात्मन सोचता है- ‘‘अयोध्या के इस नरक से किसी तरह बाहर जाने को मिले। चाहे कहीं- किसी गाँव, किसी झोंपड़ी, किसी गली-कूचे में, जहाँ सामान्य मनःस्थिति वाले निरीह और निर्भय और भोले-भाले, दुखी-सुखी लोग हों, जहाँ कोई अपना बिस्तर छोड़ दे . . . जहाँ कोई दौड़कर तपता जलाए और हाथ-पैर गर्म हों . . . जहाँ यह लगे कि हम जिंदा हैं और मुर्दों और प्रेतों और अय्यारों और चिंघाड़ते पागलों के बीच नहीं हैं।’’22  इस प्रकार की स्थिति में भय व असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होना स्वाभाविक है।

अतः कह सकते हैं कि ‘‘आखिरी कलामहिन्दूवादी राजनीति के प्रारम्भिक चरण को देश के लिए घातक बताते हुए जिस तरह उस दौर को दर्ज करता है, वह बड़ा जीवन्त है। किस तरह शुद्ध भारतीय, स्वदेशी और भारतीयता के आवरण में संघ देश के शीर्षस्थ शैक्षणिक संस्थाओं में प्रविष्ट हुआ और कैसे उसने सामाजिक संघर्षों की धार कुन्द की, इसका बड़ा वैज्ञानिक विश्लेषण उपन्यास में है।’’23 ‘‘आज जब बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात 2002’ के बाद साम्प्रदायिक फासीवाद एक दुःस्वप्न नहीं वास्तविकता बन गया है, तब उन कारकों की पहचान जरूरी है जिनसे यह मानस बनता है। आखिरी कलामजहाँ धर्मोन्मादी फासीवाद का निर्माण प्रक्रिया से साक्षात् कराता है वहीं इसके मूल उत्स पर प्रहार का भी आह्वान करता है।’’24

सन्दर्भ-
1-            सं० नामवर सिंह, आधुनिक हिंदी उपन्यास-2, पृ० 299
2-            डॉ० रोहिणी अग्रवाल, इतिवृत्त की संरचना और संरूप, पृ० 19
3-            ज्योतिष जोशी, उपन्यास की समकालीनता, पृ० 167
4-            सं० नामवर सिंह, आधुनिक हिंदी उपन्यास-2, पृ० 300
5-            वीरेन्द्र यादव, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, पृ० 213-214
6-            दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 150
7-            खगेन्द्र ठाकुर, उपन्यास की महान परम्परा, पृ० 178
8-            अरूण प्रकाश, उपन्यास के रंग, पृ० 68-69
9-            दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 107
10-         दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 107
11-         वही, पृ० 304
12-         वही, पृ० 161-162
13-         वही, पृ० 127
14-         दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 109
15-         वही, पृ० 150
16-         वही, पृ० 229
17-         वही, पृ० 346
18-         दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 412
19-         डॉ० रोहिणी अग्रवाल, समकालीन कथा साहित्य : सरहदें और सरोकार, पृ० 56
20-         दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 408
21-         दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 411-412
22-         दूधनाथ सिंह, आखिरी कलाम, पृ० 395
23-         ज्योतिष जोशी, उपन्यास की समकालीनता, पृ० 167
24-         वीरेन्द्र यादव, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, पृ० 225


-सतीश कुमार
शोधार्थी, हिंदी विभाग
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक

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