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Saturday, 30 September 2023

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष

आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है, आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है, साम्राज्यवाद अपने नये लिबास बाज़ारवाद' के रूप में दुनिया में अपना मायाजाल फैला रहा है ऐसे में गांधी की याद सबसे अधिक आती है। गांधी जीवन भर सांप्रदायिक सौहार्द के लिए संघर्ष करते रहे- हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूती प्रदान करते रहे। सबके दिलों में प्रेम हो भाईचारे का संबंध हो, हिंसा मानवता के लिए कलंक है. उसे कभी धारण नहीं करना चाहिए- इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गांधी का पूरा जीवन समर्पित रहा। घृणा विद्वेष से भरे हुए माहौल में प्रेम की ज्योति लेकर चलने वाला मानवता का यह योद्धा बुद्ध, ईसा और कबीर से शक्ति लेकर आगे बढ़ रहा था। कबीर का यह दोहा वे बार बार दुहराते थे- 'कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहीं। सीस उतारे भूई धेरै, सो पैठे घर माहीं।' उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित करके इस प्रेम, अहिंसा और सत्य के घर में प्रवेश किया था। प्रेम से दीप्त आत्मा लिए उन्होंने सत्य के अनेक प्रयोग किए थे। उन्होंने भारतीय जनता में सिर्फ़ आत्मविश्वास ही नहीं भरा था अपितु आत्म- दृढ़ता और आत्म-निर्भरता पैदा कर स्वाधीनता के पथ पर चलना सिखाया था। क्योंकि वे जानते थे कि किसी भी आंदोलन के लिए आत्म- दृढ़ता और आत्म-विश्वास बराबर की शक्ति रखते हैं। वे मानते थे कि जब प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-विश्वास स्थिर हो जाएगा तो व्यक्ति उन्नति करेगा और उसके साथ समाज भी और आत्म बल तथा आत्म-विश्वास तभी आ सकता है, जब हम सत्य के तद्रूप हो जाएं- व्यर्थ और असत्य सत्य के हो जाएं, करें। हृदय और आत्मा की विशालता सर्वोपरि है, शरीर एवं वैभव की विशालता क्षणिक है। गांधी ने विवेकानंद की तरह आत्मोन्नति के साथ ही सामाजिक या दीन-दुखियों की सेवा, ग्रामोन्नति एवं आत्म-शुद्धि पर जोर दिया। गांधी ने 'अनासक्तयोग' नाम से गीता का भाष्य प्रस्तुत किया था। सही मायनों में गांधी अनासक्त योगी थे, स्थितप्रज्ञ थे।

गांधी जीवन को ही आंदोलन मानते थे- असत्य से आंदोलन, पराधीनता से आंदोलन चाहे वह असत्य समाज में हो, व्यक्ति के मन में हो या सरकार में हो। सरकार, चाहे वह अपनी ही सरकार क्यों न हो, यदि असत्य के मार्ग पर है तो उसके विरुद्ध आंदोलन होना चाहिए। गांधी किसी आंदोलन का हिस्सा नहीं थे, वरन् उनका अपना जीवन ही अपने आप में आंदोलन था। यही कारण है कि गांधी झूठ पाखंड और अनाचारों से भरे माहौल में जहां-जहां गए. एक आंदोलन पैदा हो गया. गांधी से पहले दक्षिण अफ्रीका में कितने लोग गए थे, पर वहां रंगभेद और अत्याचार अन्याय से भरे माहौल में गांधी के जाते ही एक आंदोलन पैदा हो गया और भारत में तो उनका पूरा जीवन ही आंदोलन में बीता। पिछली कई शताब्दियों में गांधी जैसा युगांतकारी व्यक्तित्व पैदा नहीं हुआ। उनकी निरंतर सक्रियता और गतिशीलता हर जगह उथल-पुथल पैदा कर देती थी। एक आंदोलन शुरू हो जाता था। गांधी जहां भी जाते हलचल मच जाती, पुलिस को लाठियां और गोली चलानी पड़ती। ऐसी अशांति मचती कि ब्रिटिश सरकार तक हिल जाती। इसलिए गांधी को जो सत्य और अहिंसा के पुजारी थे, कायर, डरपोक या भीरू नहीं के थे, डरपोक तत्व एक ऐसे योद्धा का था, जिसने बगैर हथियार उठाए, जनतांत्रिक तरीके से अपना संघर्ष चलाया था। इसलिए गांधी होने का अर्थ 'रघुपति राघव राजाराम' जैसा भजन गाना नहीं है, या अत्याचार और असत्य से सिर झुकाकर समझौता कर लेना नहीं। गांधी होने का अर्थ है हर अन्याय और अत्याचार से लड़ना, सड़ी-गली व्यवस्था को समाप्त करने के लिए अशांति और गड़बड़ी पैदा करना और एक आंदोलन शुरू करना जो बेहतर के लिए हो, सुख और शांति के लिए हो।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उन्होंने अपने अहिंसक विरोध के बारे में कुछ बातें कही थीं, जो दिल्ली डायरी के दूसरे खंड में संकलित है- 'आजकल की सरकार व्यवस्थित हिंसा का मानों एक दूसरा नाम है और हम उसे स्वीकार करते हैं, उसकी सत्ता के नीचे रहते हैं। मेरा मत है उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। कई साल पहले मैंने बिहार में इस बात का इशारा किया था। वहां पर पुरुषों ने पुलिस को स्त्रियों का अपमान करने दिया। उनका सामना करने की जगह वे भाग गए। मैंने उनको बुजदिल बनने को नहीं कहा था। उनका तो धर्म था कि स्त्रियों की रक्षा में हिंसक या अहिंसक तरीक़े से जान लड़ा देते। ..... अगर बिल्ली चूहे पर हमला करे और कोई बहादुर चूहा सामने आकर अपने दांत से बिल्ली का सामना करे तो चूहे ने हिंसा की, ऐसा आप कहेंगे? उस समय मैंने यह दलील दी थी, मगर विचार का महत्त्व और अर्थ उस समय आज की तरह स्पष्ट नहीं हुआ था।" गांधी के इस व्यक्तव्य का आज अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि हम अन्याय, अत्याचार, गलत व्यवस्था को सिर झुकाकर स्वीकार न करें अपितु इनके विरुद्ध एक आंदोलन चलाएं और ऐसा करने वाला एक योद्धा ही कहा जाएगा।

गांधी एक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने अन्यायी ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध तो लगातार आंदोलन चलाया ही, अपने समाज में व्याप्त जात-पात, अस्पृश्यता, ऊंच-नीच आदि को समाप्त करने की कोशिश की। उन्होंने महलों से ज्यादा कुटिया को महत्व दिया। शहर और संभ्रांत वर्ग की जगह गांव और किसान की उन्नत्ति जोर दिया। उन्होंने बेशक़ीमती वेशभूषा की जगह लंगोटी को धारण किया। सन् 1931 में गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए जब गांधी लंदन गए थे, तब उनके ठहरने के लिए लंदन के एक बड़े होटल में व्यवस्था की गई थी, किंतु उन्होंने ईस्ट एण्ड' की मजदूर बस्ती में रहना पसंद किया था। एक लंगोटी बांधे, हाथ में लाठी लिए वे लंदन गए थे ठीक भारतीय किसान की वेशभूषा में कोई तामझाम नहीं, कोई नौकर, अंगरक्षक नहीं। सिर्फ़ कुछ शिष्य और एक बकरी उनके साथ थी। अपने इसी ढंग पर उन्होंने 1930 ई. में दांडी यात्रा की थी एवं नमक कानून को तोड़ा था। इसी वेशभूषा में उन्होंने पूर्वी बंगाल के दंगाग्रस्त क्षेत्र, जिसे नोआखाली कहा जाता है, पैदल यात्रा की थी। अपने जीवन के अंतिम कुछ महीनों में वे दिल्ली की भंगियों की बस्ती में रह रहे थे।

इस तरह गांधी ऐसा करके एक आदर्श उपस्थित कर रहे थे, जिसका एक बड़ा उद्देश्य था। 1945 में गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखा था "हम देश को बदलने के लिए लड़ रहे हैं | तुम मुझे बताओ कि देश को बदलने के लिए तुम्हारे दिमाग में कौन-सा नक्शा है? मेरे दिमाग में देश बदलने का नक्शा है- गांव शक्ति का केंद्र बनेंगे, गरीब के बारे में सोचा जाएगा।" नेहरू ने गांधी के पत्र का जवाब नहीं दिया तो उन्होंने राजकुमारी अमृत कौर से उस पत्र का अंग्रेजी अनुवाद करवा कर नेहरू को पुनः भेजा। तब नेहरू ने उत्तर दिया 'आप जो सोचते हैं, वह मुझे जंचता है।' इस पर गांधी ने पुनः लिखा- 'लेकिन तुम्हें मेरा रास्ता जंचता नहीं। मेरा तुम्हारा रास्ता अलग-अलग है।'

यह सही है कि गांधी और नेहरू के रास्ते अलग-अलग थे। उनकी मर्मस्पर्शी वाणी का नमूना देखिए- 'न जनता को मेरी ज़रूरत है और न उन लोगों को जिनके हाथ में सत्ता है। मैं तो यही चाहता हूं कि मैं काम करते-करते मरूं और जब मेरे प्राण निकलें तब भी मेरे होठों पर ईश्वर का नाम हो।'

मई, 1947 की एक सुबह जब आजादी और देश-विभाजन की तैयारी हो रही थी, दिल्ली की सड़कों पर टहलते हुए एक शिष्य ने उनसे पूछा- 'फैसले की इस घड़ी में आपका कहीं जिक्र नहीं है। ऐसा लगता है, आपको और आपके आदर्शों को तिलांजलि दे दी गई है।' इस पर गांधी ने बड़े ही दुखी मन से जवाब दिया था- 'हां, मेरी तस्वीरों और मूर्तियों को हार पहनाने के लिए हर आदमी उत्सुक रहता है, लेकिन मेरी सलाह मानने को कोई तैयार नहीं।'

गांधी अकेले क्यों हो गए थे? उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं रह गया था। इसका कारण क्या था? सभी नेता सत्ता और ऐश्वर्य के बंदरबांट में लगे थे, दूसरी तरफ विभाजन के साथ बीसवीं सदी के सबसे भयानक दंगों की अग्नि में पूरा देश जल रहा था। अकेले गांधी उस अग्नि को बुझाने के लिए दौरा कर रहे थे। आज़ादी के संघर्ष के रथ को जिस गांधी ने लंबे समय तक खींचते हुए विजय के द्वार तक लाकर खड़ा कर दिया था, वहीं गांधी अकेला हो गया था, उसका सपना धराशायी हो गया था। गांधी विभाजन नहीं चाहते थे। वे कहते थे- 'भारत का बंटवारा मेरी लाश पर होगा। अपने जीते-जी मैं कभी भारत के बंटवारे के लिए तैयार नहीं हो सकता।' लेकिन गांधी को जीते-जी मारकर बंटवारा हुआ। गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता चाहते थे और इसके लिए उन्होंने लगातार प्रयत्न किया था। पर उनके जीवन-काल में ही भीषण मार-काट मची। वे ग्रामोत्थान चाहते थे, किंतु उनके शिष्य सत्ताधारी होकर ऐश्वर्य की जिंदगी जीते हुए उस सीमांत के आदमी को भूल चुके थे। उनके बारे में गांधी ने मृत्यु के पूर्व कहा था- 'ये लोग मुझे महात्मा कहते हैं, लेकिन मैं आपसे बताता हूं कि ये लोग मेरे साथ भंगी जैसा सलूक भी नही करते |’

आज भी गांधी के बारे में कमोबेश यही स्थिति है। तो फिर गांधी के होने का जो अर्थ है, वह निरर्थक हो गया?

जहां सच्चाई है, ईमानदारी है, निष्ठा है, आस्था है, अन्याय का प्रतिरोध है, अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए उठा जन-आंदोलन है, वहीं गांधी है और वहीं गांधी होने की सार्थकता है।

Sunday, 22 January 2023

पश्चिम में स्त्री-विमर्श और स्त्री-लेखन

यूरोप में 15वीं सदी के इतालियन रैनेसां की चरम परिणिति 18वीं सदी के ज्ञान-प्रसार आंदोलन के रूप में हुई, जिस दौर में बुद्धिवाद चिंतन के केंद्र में आ गया तथा सभी परंपरागत संस्थानों को चुनौतियाँ दी गयी l इसी काल में अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियाँ हुई l स्त्री-मुक्ति आंदोलन की शुरुआत अमेरिका में हुई उसके बाद १८५९ में पीटर्सबर्ग में अगला आंदोलन हुआ l १९०८ में ‘विमेंस फ्रीडम लीग’ की स्थापना ब्रिटेन में हुई l जापान में इस आंदोलन की शुरुआत १९११ में हुई, १९३६ में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मैडम क्यूरी सहित तीन महिलाएँ फ्रांस में पहली बार मंत्री बनी l इस प्रकार विश्व के अनेक देशों में इस आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन १९५१ में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने जब भारी बहुमत से स्त्रियों की राजनितिक अधिकारों का नियम पारित किया, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्त्री-मुक्ति की आंदोलन का प्रारम्भ तभी से माना जाता हैl

संगठित स्त्री-आंदोलन की शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति के दौरान ही हुई थी जब स्त्रियाँ समस्त राजनितिक जन-कारवाइयों में खुलकर हिस्सा ले रही थी l उसी समय स्त्री-अधिकारों के लिए संघर्ष को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ था और ‘विमेंस रिवोल्यूशनरी क्लब’ का भी गठन हुआ था जो संभवतः आधुनिक विश्व इतिहास के प्रथम स्त्री-संगठन थे l इन संगठनों ने क्रन्तिकारी संघर्षों में भाग लेते हुए यह माँग की कि स्वतंत्रता,समानता को किसी प्रकार के लिंगभेद के बिना लागू किया जाना चाहिए l

हालांकि फ्रांसीसी क्रांति के नेतृत्व ने स्त्री-पुरुष समानता और स्त्रियों के सामान अधिकारों के विचार को अस्वीकार कर दिया,लेकिन इस युगान्तरकारी क्रांति ने सामंती संबंधो पर चोट करने  के साथ ही स्त्रियों की कानूनी स्थिति में कई महत्वपूर्ण बदलाव किये l १७९१ के एक कानून द्वारा स्त्री-शिक्षा का प्रावधान,१७९२ की एक आज्ञप्ति द्वारा स्त्रियों को कई नागरिक अधिकार प्रदान करना तथा १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून द्वारा तलाक की प्रक्रिया को आसान बना देना ऐसे कुछ प्रमुख कदम थे l लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के दौरान स्त्री-आंदोलन की ये उपलब्धियाँ एक बार फिर छीन गयी l १८०४ के नेपोलियनिक कोड और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुजुर्रआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अति सिमित कर दिया तथा परिवार,शादी,तलाक,अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकारों के मामलों में उन्हें एक बार फिर वैधिक तौर पर पूरी तरह पुरूषों के अधीन कर दियाl

इसी काल में मेरी वालस्टानक्राफ्ट (mary Wollstonecraft) की प्रसिद्ध पुस्तक “विंडीकेशन आफ टी राइट्स आफ वीमेन”,1792 (vindication of the Rights of Women) प्रकाशित हुई,जिसे आधुनिक काल में नारीवाद विचारों की सबसे पहली महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में स्वीकारा जाता है l उस दौर में और भी कई लेखकों ने यूरोप में स्त्रियों के अधिकारों के बारे में छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखी l मेरी वालस्टानक्राफ्ट ने मूलतः स्त्रियों के बारे में रूसो के विचारों पर कड़ा प्रहार करते हुए यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था l वे समाजवादी नहीं थी,क्योंकि उन्होंने आर्थिक व्यवस्था पर चर्चा नहीं की थी,लेकिन उनके लेखन में इस बात पर लगातार बल दिया गया था की किसी भी अच्छी समाज व्यवस्था का समाज में भारी असमानता के साथ कोई मेल नहीं हो सकता l

 उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भिक तीन दशकों के दौरान यूरोप में सक्रिय स्त्री स्वच्छंदतावादी (रोमांटिक) लेखिकाओं के लेखन को यदि देखा जाए तो उनमें उस समय के स्त्री-आंदोलन का प्रगतिशील पहलू और उसकी सीमाएँ-दोनों ही स्पष्ट नज़र आती है l

अन्ना सीवार्ड,हेलेन मारिया विलियम्स,मेरी हेज़ अन्ना,जोअन्ना बेली,हन्ना मोर,फेनी बर्नी,जेन टेलर,डोरोथी वर्ड्सवर्थ,मेरी लैम्ब,मेरी शेली आदि चर्चित स्त्री- स्वच्छंदतावादी लेखिकायें स्त्री-शिक्षा,स्त्रियों की पारिवारिक-सामाजिक स्थिति आदि प्रश्नों को उठाती हुई एक ओर जहाँ मेरी वालस्टानक्राफ्ट की परंपरा को विस्तार दी रहीं थी,वहीँ दूसरी ओर उनकी लेखन में स्त्री-समुदाय की मुक्ति-आकांक्षाओं का प्रमुख स्वर है l वे स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों को अपने लेखन के माध्यम से उठा रही थी l

18वीं सदी के अंतिम दिनों तथा 19वीं सदी में मेरी वालस्टानक्राफ्ट,काल्पनिक समाजवादियों,विलियम थाम्पसन,जेम्स मिल से लेकर सेनेकाफाल कन्वेंशन तथा जॉन स्टूअर्ट मिल तक के प्रारंभिक नारीवादियों ने स्त्रियों के जनतांत्रिक अधिकारों की माँग उठायी थी,19वीं सदी के अंत तक उनमें से अधिकांश मांगों को ब्रिटेन तथा अमेरिका में कानूनी तौर पर मान लिया गया था l स्त्रियों में शिक्षा का विस्तार हुआ,तथा वे ऑफिस एवं अदालतों में काम करने लगी l 19वीं सदी के अंत तक विभिन्न विषयों पर कानून पारित किये गए जिनमें मुख्यतः स्त्रियों से जुडी समस्याओं को उठाया गया l लेकिन 19वीं के अंत तक स्थिति यह बन गयी थी कि स्त्रियाँ अब राजनीतिक बहसों से बाहर नहीं रह गयी थी l घरों के बाहर,विभिन्न प्रकार के संगठनों में स्त्रियाँ हिस्सा लेने लगी थी l ऐसे परिवेश में मतदान का वह अधिकार जिसे एक भारी क्रन्तिकारी माँग के रूप में पेश किया गया था,अब जनतांत्रिक अन्दोलन की एक बहुत ही स्वाभाविक माँग के रूप में सामने आ गया l

    19वीं सदी तक आते-आते स्त्रियों के लिए समान अधिकार की माँग एक प्रमुख राजनितिक प्रश्न की शक्ल लेने लगी l शिक्षा,कानून,राजनीति आदि तमाम क्षेत्रों में एक आंदोलन सा शुरू हो गया तथा स्त्रियों के लिए मतदान के अधिकार की माँग ने एक जन-अभियान का रूप ले लिया l इस दौर के प्रमुख स्त्रीवादी विचारकों में मुख्य रूप से इंग्लैंड के जॉन स्टूअर्ट मिल तथा उनकी पत्नी हेरीएट टेलर तथा अमेरिका की एलिजाबेथ केडी का नाम उल्लेखनीय है,जिनके लेखन में इस पूरे दौर के स्त्रीवादी सोच की सभी प्रमुख बातें निहित है l एलिजाबेथ केडी सिर्फ लेखिका ही नहीं बल्कि अमेरिका में हो रहे स्त्री-आंदोलन की एक सक्रिय कार्यकर्ता भी रह चुकी हैं l 19वीं सदी के अंत तक आते-आते,यूरोप में स्त्री-केन्द्रित चिंतन और सामाजिक आंदोलनों ने एक ऐसी शक्ल अख्तियार कर ली थी,जिसमें से स्त्री-मुक्ति के परवर्ती सभी प्रकार के सोच के श्रोत को पाया जा सकता है l

  20वीं सदी के प्रारंभ में ब्रिटेन और अमेरिका के स्त्री-आंदोलन के लिए मतदान का अधिकार एक प्रमुख माँग बन गया था l इस दौरान स्त्री और पुरुष दोनों को मतदान का अधिकार नहीं था,ज़ाहिर सी बात है की स्त्रियों को मतदा का अधिकार का प्रश्न सार्थक मताधिकार की माँग के साथ अभिन्न रूप से जुड़ जाता l

स्त्रीवाद के नये आयाम  :

क्रिस्टाबेल पैंकहर्स्ट

ब्रिटेन की स्त्रीवादी नेता, क्रिस्टाबेल पैंकहर्स्ट ( Christabel Pankhurst ) को स्त्रीवाद की आधुनिक सेक्स-केन्द्रित धारा का एक मूल श्रोत कहा जाता है l इन्होंने समाज के प्रगतिशील तबको के बीच पाये जानेवाले ‘पुरुष-श्रेष्ठता’ के तत्वों को देखा था और इसी के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि,सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में सबसे मूल बाधा,पुरूषों द्वारा स्त्रियों को गुलाम बनाया जाना है l क्रिस्टाबेल पैंकहर्स्ट ने भी स्त्रियों के गुलामी के लिए पुरूषों पर उनकी आर्थिक निर्भरता को ज़िम्मेदार बताया l इनका अलग से एक महिला पार्टी था, इन्होंने यह नारा लगाया की स्त्रियों को भी मतदान का अधिकार मिले तथा पुरूषों को सतीत्व का पालन करना चाहिए l

सिमोन द बोउवार

आधुनिक स्त्री-आंदोलन में सिमोन द बोउवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है l उनकी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ जिसका हिंदी अनुवाद ‘स्त्री-उपेक्षिता’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है l उन्होंने अपने अध्ययन में यही दिखाया है की स्त्री पैदा नहीं होती,बल्कि बनायी जाती है l इस पुस्तक में अस्तित्ववादी विचारों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है l सिमोन ने आधुनिक स्त्रीवादी विचारधारा की आधारशिला रखी जिसमें स्त्री-मुक्ति के अनिवार्य शर्त के रूप में स्त्री को अपने स्त्रीत्व से मुक्त होना बताया गया l  

बेट्टी फ्रीडेन

60 के दशक में एक विस्फोट की तरह पश्चिम में जिस नए स्त्रीवाद का जन्म लिया, उनमें बेट्टी फ्रीडेन का महत्वपूर्ण स्थान है l उनकी पुस्तक “The Feminine Mystique”,१९६३ में प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी समाज में स्त्रियों की स्थिति पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है l उनका कहना है की इस युद्ध के बाद अमेरिका में स्त्रियों को यह यकीन दिलाया जा रहा था की उनका जीवन घर के चारदीवारों में ही सुखी है l फ्रीडेन में परंपरागत नैतिकता का गहरा बोध था ,उन्होंने अपने पुस्तक के ज़रिये अमेरिकी स्त्रियों के खिलाफ बुने जा रहें रहस्यों को तोड़ा तथा उन्होंने अमेरिकी स्त्रियों को चारदीवारी से स्वतंत्र करने का प्रयास किया l

अमेरिका तथा यूरोप के सभी देशों में स्त्रीवादी आंदोलन के एक नए दौर का प्रारंभ हुआ जिसे स्त्रीवाद के इतिहास में दूसरी लहर के रूप में जाना जाता है l दूसरी लहर की देन लिसे वोगेल को दिया जाता है , लिसे स्त्रीवादी नेता तथा सिद्धांतकार है l वोगेल लिखती हैं कि –

“आमतौर पर यह नारी-मुक्ति आंदोलन ‘काली या मजदूर वर्ग की महिलाओं को अपने संगठन की ओर बहुत अधिक आकर्षित नहीं कर सका था,लेकिन नारी-मुक्ति आंदोलन के प्रयास इस ओर जारी थे तथा वे इन महिलाओं को शामिल करना सबसे ज़रूरी समझते थे l पीटी गयी महिलाओं के शरण-स्थल,निकट सम्बन्धियों द्वारा शारीरिक हमलों से बचाव की होटलाइन,बलात्कार सम्बन्धी मामलों के केंद्र,महिलाओं के स्वास्थ्य केंद्र,काम के स्थलों पर विभिन्न प्रकार के अभियानों आदि से स्थानीय इलाकों की कुछ गरीब और मजदूर वर्ग की महिलाओं को भी लाभ मिला l कई जगहों पर नारी-मुक्ति के समूहों में सिर्फ मजदूर वर्ग की महिलाएँ ही थी l काली विद्रोही महिलाओं की एक छोटी,किन्तु महत्वपूर्ण संख्या ऐसी थी जो नस्ल और वर्ग के आधार पर गुलामी की सच्चाई से इंकार न करते हुए भी अपने को नारीवादी कहती थी l”[1]  

इस प्रकार वोगेल ने नए विद्रोहों तेवर के साथ स्त्रीवाद की विभिन्न धाराओं का बहुत ही सजीव चित्र पेश करने का प्रयास किया है l

        निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है की साहित्यिक क्षेत्र में स्त्री-लेखन की एक सशक्त भूमिका रही है l स्वतंत्रता के पूर्व की लेखिकाओं ने व्यक्ति स्वातंत्र्य का समर्थन करते हुए सामाजिकता को महत्व दिया और स्वातंत्र्योत्तर लेखिकाओं के रचनाओं में मनोविश्लेषण,व्यक्तिवाद आदि को महत्व दिया l समय के साथ इस जीवन में स्त्री को हमेशा शोषित होआ पड़ा है,कष्टों को झेलना पड़ा है l इस शोषित और पीड़ित स्त्री के जीवन यथार्थ को वाणी देने का प्रयास स्त्री-लेखन ने किया हैं l इन लेखिकाओं ने स्त्री-सम्बन्धी समस्याओं को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया तथा विश्लेषित भी किया है l

   स्त्री-लेखन अपनी तमाम खूबियों और खामियों के बावजूद आधी दुनिया को अपनी रचनाओं में बड़ी खूबसूरती के साथ उपस्थित किया है l लेखिकाओं ने महज स्त्री-जीवन पर ही नहीं लिखा है,बल्कि जीवन की तमाम संवेदनाओं पहलुओं को अभूतपूर्व ढंग से कई मायनों में पुरुष रचनाकारों से ज्यादा कामयाबी हासिल की हैं l स्त्री-लेखन की शुरुआत ऋग्वेद से पूर्व हो चुकी थी,लेकिन उन्हें दर्शाया नहीँ गया l सन १९६० के बाद ही स्त्री-लेखन सक्रिय रूप में उभरा है l बदलते सन्दर्भ,अर्थतंत्र का दबाव,शिक्षा-प्रसार,स्त्री-जगत में अस्मिता का साक्षात्कार,विज्ञान एवं तकनीकी का आविष्कार आदि विभिन्न कारणों से पुराने मूल्यों का विघटन होकर वहाँ नए मूल्य विकसित हो रहे हैं l परिवर्तित मूल्यों ने जहाँ एक ओर वैवाहिक मान्यताओं में बदलाव उपस्थित किया है,वहीँ दूसरी ओर दाम्पत्य जीवन में अनेकानेक समस्याओं को प्रस्तुत किया हैं l संबंधों के इस बदलाव ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है पारिवारिक एवं दाम्पत्य जीवन में एक बिखराव तथा टूटन की स्थितियाँ उत्पन्न हो गयी है l स्त्री के अवलोकन बिंदु से स्त्री-जीवन की विविध समस्याओं को साहित्य में लेखिकाओं ने अंकित किया है l

स्त्री के समक्ष जीवन का सारा ताना-बाना सामाजिक और धार्मिक बन्धनों का है,अत: बहुत स्वाभाविक है की इस स्त्री का रचना संसार ‘मैं’ की भावात्मकता से बहुत दूर नहीं निकल पाया है l स्त्री का ‘मैं’ प्रेम के विस्तार,आस-पास की घटनाएँ,घर-परिवार से जुडी समस्यायें ही बहुधा इनका लेखन क्षेत्र है l वैदिक काल के बाद बौद्धिक काल ,फिर एक लम्बी चुप्पी के बाद औद्योगिक काल में नारी-अधिकार और नारी-स्वातन्त्र्य को लेकर स्त्रियाँ मुखे हुई हैं l

  आज के स्त्री-रचनाकारों में कहानी,उपन्यास तथा कविता- ये तीन विधायें प्रमुख: स्वीकृत हैं l भारतीय सन्दर्भ में यदि देखा जाए तो स्त्री-लेखन की शुरुआत थेरीगाथा से शुरू हुई है और आज के आधुनिक काल तक आते-आते स्त्रियों ने अपनी चुप्पी तोड़ी है और रचना-संसार में अपना वर्चस्व बनायें रखा हैं , चाहे वह कहानी-संग्रह हो या उपन्यास लेखन या और कोई भी रचना-विधा हो l उन्होंने स्त्रियों की समस्याओं का मुद्दा लेकर अपने रचना के माध्यम से उन्हें विस्तृत रूप से चित्रण करने का प्रयास किया हैं l आज भी स्त्री-रचनाकारों को चुनौती का सामना करना पड़ता हैं l कठिनाईयों का सामना करते-करते उन्होंने हर क्षेत्र में सफलता पायी हैंl


सन्दर्भ ग्रन्थ सूचि:

1.  नारी प्रश्न – डॉ.सरला माहेश्वरी

2.  लमही,पत्रिका – सं.डॉ.विजय राय

3.  स्त्री-लेखन:स्वप्न और संकल्प – डॉ.रोहिणी अग्रवाल

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[1] नारी-प्रश्न , सरला माहेश्वरी – पृष्ठ सं – ४०


प्रस्तुतकर्ता: राज्य लक्ष्मी (ph.d)

हैदराबाद विश्वविद्यालय, ph. 9866041833,

Email- rsreenasingh62@gmail.com.

Saturday, 29 October 2022

विकास की अवधारणा में गाँव कहाँ हैं ?

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल विशुद्ध में ग्रामीण पृष्ठभूमियों में प्रचुर लेखन करने वाले कथाकार नहीं हैं। यद्यपि अमरकांत ग्रामीण इलाके से ही शहर में आए; जिस तरह हिंदी में अनेक रचनाकार आए हैं। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, जगदीश चंद्र, फणीश्वर नाथ रेणु, राही मासूम रजा, मार्कंडेय, शिवमूर्ति और हरनोट आदि कथाकारों की तरह अमरकांत ग्रामीण लेखन के रचनाकार नहीं हैं, उन्हें हम प्रेमचंद की कहानी की परंपरा को अग्रसर करने वाले कहानीकार अवश्य मान सकते हैं।

 

1950 अथवा आज़ादी के बाद इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, आगरा, बलिया आदि उ.प्र. के शहर इस तरह के शहर थे कि उन्हें बड़ा गाँव, या मझोला शहर कहा जा सकता था। दो दशक पहले तक तो दिल्ली को भी बड़ा गाँव कहते थे, पढ़े-लिखे लोग। आज किन्हीं भी मध्यवर्गीय शहरों की तुलना में वे बेहद मंद, कछुआ चाल, कम जनसंख्या वाले, उद्योग विहीन, छोटे कार्यालयों वाले, उनींदे, वनस्पतियों से घिरे, पैदल और सायकिल प्रमुख शहर थे। शहरों के ऊपर ग्रामीण अक्स था, शहरों में बोलियों का पर्याप्त प्रचलन था । अमरकांत की यही राह थी, यही जगह थी। अमरकांत में जो अद्वितीय विनोद था वह ग्रामीण समाज और मनुष्य से आया था। उनकी कहानियों के विषयों में गाँव, कस्बे और शहर की मिली-जुली अवस्था है। सब एक-दूसरे को 'ओव्हर लैप' करते हुए। अपनी कहानियों, केवल कहानियों के बल पर वे हिंदी के थोड़े बहुत चेखव थे।

 

श्रीलाल शुक्ल नौकरशाह थे। निपुण, बुद्धिमान, शीनकाफ़, दुरुस्त, उच्च सामाजिक, प्रतिष्ठावान तो थे ही उनकी सामाजिक बुनावट भी ऐसी ही थी। अमरकांत शुरुआती दिनों से कम्युनिस्ट थे, 'कम्युनिस्ट' कहानी लिखी थी, छोटी-मोटी नौकरियाँ करते रहे, जीवन कठोर था पर उनमें गिला-शिकवा नहीं रहा। यह उनकी विचारधारा का आचरण था, जीवन भर यह बना रहा। श्रीलाल शुक्ल हिंदी में उस गुट के प्रिय रहे जो वामपंथ विरोधी रहा या जिसका अस्तित्व ही वामपंथ की खिलाफत से बना। वे 'परिमल' में अमूर्त रूप से सक्रिय रहे। उनका दोस्ताना वहीं था। उन्हें समाजवादियों का लाभ मिला। ब्राह्मण होने का भी । बहुत दिनों तक उनके नाम के साथ पंडित शब्द भी लोग लगाते रहे। पर श्रीलाल शुक्ल अपने दमखम, शराफत, हाज़िरजवाबी के बाद भी और 'राग दरबारी' जैसी चर्चित कृति के बाद भी 'बड़े' लेखक नहीं हैं। 'बड़े' शब्द पर मेरा दबाव है कि इसे सही अर्थ में समझा जाए। 'परिमल' के साथी होने के बावजूद 'परिमल' के दिग्गजों ने उन्हें 'बड़ा' लेखक नहीं माना । 'परिमल' के नियंता 'व्यंग्य' को उपहास से देखते थे और इसे ऊँचा दर्जा नहीं देते थे। इस पर कॉफी हाउस की अनेक बहसों का मैं युवा श्रोता भी इलाहाबाद में रहा हूँ।

 

श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में प्रहसन, मखौल, किस्सा और हास्य का झरना फूटता है। वे मज़ामत के उस्ताद हैं पर उनका सारा किया-कराया क्षणभंगुर है। अगर सूक्ष्मता से श्रीलाल शुक्ल जी की मीमांसा की जाए तो उनमें अर्बन लेखक की आधुनिक प्रवृत्तियाँ नहीं हैं। वे ओवरडेटेड लेखक हैं, परसाई जैसे श्रेष्ठ और देश के बड़े लेखक के साथ भी उन्हें खड़ा किया गया। खड़ा करने वाले का उद्देश्य केवल उन्हें खड़ा करना था, प्रगतिशील विचारधारा के परसाई को कम करने के लिए। श्रीलाल शुक्ल सदा जगमगाती दुनिया में रहे, जबकि अमरकांत के चारों तरफ एक गोबर से बनी कच्ची कोठरी का अँधेरा था। ढिबरियाँ जल रही हैं चारों तरफ और अमरकांत लिख रहे हैं। अमरकांत बड़े लेखक इसलिए भी हैं कि उन्हें कभी गिला-शिकवा नहीं रहा। उन्होंने जिस लेखकीय जीवन को और उत्तर भारतीय समाज को स्वीकार किया उससे उन्हें गहरा प्यार था। उनकी चाल साफ-सुथरी थी। वे खुश दिल रहे और एक बड़े रचनाकार की स्थिरता और तटस्थता उनमें है। अपने समकालीनों की वे गहरी इज्जत करते हैं और गुलगुले से अमरकांत में विचारों का पत्थर बिल्कुल ग्रेनाइट का है। उन्हें दूर किनार में, अपने चुने हुए एकांत में रहना पसंद था इसलिए बड़े-बड़े पराभवों और राजनैतिक शेयर बाज़ार के गिरने उठने बदलने के बावजूद वे अविचलित रहे। मुझे उनके चेहरे की आकृति ब्रेख्त के काफी करीब लगती है। इसलिए निष्कर्ष रूप में यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल के आतिशबाज लेखन और अमरकांत के अँधेरों को एक जगह रख कर पुरस्कृत करना अपमानजनक भी है, और एक हद तक कारिस्तानी भी किशन पटनायक की टिप्पणी सही है, सटीक है। मेरी समझ यह है कि श्रीलाल जी की गाँव के जीवन से क्या शहरवासियों से भी यारी नहीं है।

 

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के पुरस्कार प्रसंग को और विस्तार से जानना हो तो ज्ञानपीठ की यात्रा की तरफ ध्यान देना होगा। ज्ञानपीठ की स्थापना में शोध, मीमांसा, क्लासिकी चेतना का प्रकाशन और आयोजन उसकी गतिविधि का प्रमुख हिस्सा था। 'ज्ञानोदय' में मांस मदिरा, लहसुन प्याज का उल्लेख कहानी, कविता में आने पर उसे संपादित कर दिया जाता था। यह धर्मवीर भारती और रमेश बक्षी जैसे संपादकों के जमाने में बचा हुआ था। फिर 2010 तक आते-आते स्त्रियों पर कुत्सित टिप्पणी भी छपने लगी। आप देखिए कि कैसे ज्ञानपीठ की यात्रा समसामयिक बाज़ार की तरफ रेंग रही है। आधुनिकता और लोकप्रियता और प्रिंट आर्डर की ललक, बाज़ार की तरफ उन्मुख होना, उसका तर्क देने लगना ज्ञानपीठ की महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा हो गया है। इसीलिए ज्ञानपीठ में देश के सबसे महँगे सेल्समैन और अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रवेश विचारणीय है। यह न तो अकारण है और नही बुद्धपना।

 

ज्ञानपीठ भी हिचकते-हिचकते विश्व के ताकतवर पुरस्कारों की राह में उठ रहा है। विश्व राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है, न विश्व बाज़ार में लेकिन उसकी ललक यही है। यह भी मुमकिन है कि सही खिलवाड़ का कूट खेल न कर सकने के कारण वह अधकचरे चपेटे में आ जाए, यह सब भविष्य के खेल हैं। अभी मेरी समझ यह है कि ज्ञानपीठ के निर्णयों में सहजता भोलापन और चातुर्य दोनों मिले-जुले हैं। कई बार उसके निर्णय भारतीय भाषाओं की ताकतवर प्रगतिशील परंपरा की पूरी-पूरी मुखालफत नहीं करते पर उसके चाल-चलन एक लोकप्रिय खुराफात ज़रूर है। जैसे शहरयार को पुरस्कृत में करना।

 

शहरयार उर्दू के 'बड़े' शायर नहीं हैं पर उनको पुरस्कृत करके एक प्रगतिशील मुखड़ा ज्ञानपीठ का बनता है। अंतर्विरोधी चीजें इसके पहले श्री हुई हैं- जब निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को ज्ञानपीठ दिया गया। यहाँ पर भी एक कम्युनिस्ट रचनाकार और एक कम्युनिस्ट विरोधी रचनाकार की कूटनीति स्पष्ट है। एक बात ध्यान दें कि ऐसा नामवर सिंह जैसे जूरी सदस्य के खेल से संभव हुआ। नामवर सिंह ज्ञानपीठ के लिए एक मुफीद वजीर हैं। जैसा मैं पहले एक बार अपने एक व्याख्यान में भी बाँदा में कह चुका हूँ कि असली खेल जूरी की नियुक्ति है। इसकी नियुक्ति के पहले ही सालों-साल यह क्रियाकलाप चलता रहता है। यही विभाजन फिर दोहराया गया-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के साथ। ज्ञानपीठ गुरदयाल सिंह और अमरकांत को स्वतंत्र ज्ञानपीठ देने की बेवकूफी कभी नहीं कर सकता। यह केवल बड़े लेखकों को विभाजित और कमतर करने की तकनीक हैं।

 

साम्राज्यवादी दुनिया के बड़े और शातिर तरह से संचालित पुरस्कारों का ज्ञानपीठ का थिंक टैंक अभ्यास कर रहा है। उसके अगले कदम भारतीय समाज और राजनीति की करवटों के आधार पर होंगे। सीधा हस्तक्षेप न भी हो पर जूरी का संगठन, बहुत दूर तक सोच-विचार की कारीगरी है। यह भी हास्यास्पद है कि पिछले कुछ सालों से हिंदी के ताकतवर पुरस्कार हिंदी में सर्वश्री राजेंद्र यादव, अशोक वाजपेयी, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में गये हैं। इन्हें बार-बार पुरस्कार मिले। ये सब जूरी की कारस्तानियाँ हैं।

 

बाज़ार का साम्राज्य, चाहे संचार, मनोरंजन, प्रसाधन का हो या शिक्षा और गाड़ियों का, गाँव की तरफ मुड़ रहा है। कंपनियाँ उधर ही जा रही हैं। यहाँ लूट की बड़ी संभावनाएँ-तपे रास्ते हैं, नया विवेकहीन उपभोक्ता है, कमाऊ मंडियाँ हैं। संभवतः सांस्कृतिक अवचेतन में अमरकांत भी इसीलिए जूरी को खटखटा रहे हों। बाज़ार का, नये साम्राज्य का गाँवों में प्रवेश उनको खत्म कर देने के लिए है, उन्हें लूट कर बदल देने का है। गाँव बचेंगे नहीं, वे उलट जाएँगे। यह कैसे मुमकिन हैं भारत देश में कि शहर तो बदल जाएँ उनका कायाकल्प हो जाए, नगरीकरण तेज बना रहे और गाँव जस के तस बने रहें। बीसों साल तक अमरकांत की सुध नहीं ली गयी और आज जब पुरस्कृत

किया गया (कोन-अंतरे में जाकर) तो मैं इसे इसी पृष्ठभूमि में देख रहा हूँ। इसी तरह 'कौन बनेगा करोड़पति' में घुस घुस कर गाँव के लोगों को लाया जा रहा है और उन्हें दस-पचास लाख दिये जा रहे हैं। यह अचानक वंचित गाँवों से लोगों को लाकर, उनके कठिन जीवन दृश्यों की क्लिपिंग दिखा कर, उनको मार्मिक दिखा कर यही किया जा रहा है, जो ज्ञानपीठ ने किया है। सब तरफ गाँव के उद्धार का यह खेल शुरू हो गया है।

 

हमारे देश के दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों के विकराल अर्थशास्त्री भी अंततः गाँवों की ज़रूरत, उसकी जगह, उसकी अनिवार्यता के ऊपर गहरा प्रश्न चिह्न लगा चुके हैं। विकास की अवधारणा में गाँव कहाँ हैं? यह देखना एक दिलचस्प बात है।

 

उत्तर भारत में पारंपरिक गाँव के निशान तो तेजी से मिटे हैं। आने वाले समय में गाँव के बिंब और बदलने वाले हैं। इस देश में ऐसे इलाके भी हैं जहाँ बड़े किसान को ज़मीन का मुआवजा 5 से 15 तक भी मिला है। यह रकम रंग लाएगी। यह गिनती के लोगों का प्राप्य है पर इसका विनाश बड़ी ग्रामीण जनसंख्या पर होगा। अपराध, भुखमरी, भेद और रक्तपात का तीखा अनुभव देखने को मिलेगा। गाँव में बड़ी रकम फेंकी जा रही है जो अंततः बाज़ार का नियंत्रण उन्हीं इलाकों में बढ़ाएगी।

 -  ज्ञानरंजन

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गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...