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Thursday, 29 June 2017

अतिथि देवो भव / सीताराम गुप्ता


यदि हम अच्छे मेहमान और अच्छे मेज़बान बन सकें तो जीवन कितना आनंदपूर्ण हो जाए!

     हमारी संस्कृति में आतिथ्य को बड़ा महत्त्व प्रदान किया गया है। अतिथि को भगवान का दर्जा दिया गया है। कहा गया है अतिथि देवोभव। इसी का पालन करते हुए अधिकांश लोग घर आए मेहमानों की सेवा-सत्कार में जी जान से लग जाते हैं। जो चीज़ें स्वयं अपने लिए या अपने बच्चों के लिए सुलभ नहीं करवा पाते हैं उन चीज़ों को अपने मेहमानों के लिए सुलभ करवाने का प्रयास करते हैं। निस्संदेह मेहमाननवाज़ी अथवा आतिथ्य हमारे जीवन और व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण अंग है। जो व्यक्ति अथवा परिवार मेहमाननवाज़ी अथवा आतिथ्य में कोताही बरतते हैं वे अपने परिचितों, मित्रों व रिश्तेदारों में ही नहीं समाज में भी न तो सम्मान ही पाते हैं ओर न स्नेह ही। हमें घर आए मेहमानों का यथोचित स्वागत-सत्कार करना ही चाहिए। यह हमें सुसंस्कृत व शिष्ट बनाने के साथ-साथ आनंद भी प्रदान करने में सक्षम होता है। ये भी कहा गया है कि भाग्यवान घरों में ही मेहमान आते हैं। मेरा तो मानना है कि जिन घरों में मेहमान आते हैं और जो आतिथ्य का भरपूर आनंद लेते हैं वही भाग्यवान बनते हैं।

     प्रश्न उठता है कि जहाँ समाज में अतिथि को भगवान का दर्जा दिया गया है वहीं क्या अतिथि को अपने इस दर्जे की गरिमा का पालन नहीं करना चाहिए? कई लोग ऐसे भी होते हैं जहाँ कहीं भी जाते हैं मेज़बान के लिए परेशानी ही पैदा करते हैं। एक अच्छा मेज़बान होने के साथ-साथ एक अच्छा मेहमान बनना भी अनिवार्य है। एक मेहमान को भी चाहिए कि वो जहाँ जा रहा है उनके लिए प्रसन्नता का कारण बने न कि परेशानी का। किसी भी व्यक्ति को कहीं मेहमान के रूप में जाने से पहले कई बातों पर विचार कर लेना चाहिए।

     सबसे पहले तो हमारा यही देखना बनता है कि हम जहाँ अतिथि बनकर जा रहे हैं वहाँ जाना बनता भी है या नहीं। क्या उस परिवार या व्यक्ति विशेष से हमारे ऐसे संबंध है कि हम बेतकल्लुफ़ होकर उनके मेहमान बन जाएँ? कई लोगों को सिर्फ़ पता चाहिए और वे ऐसे लोगों के यहाँ जा पहुँचते हैं जो न तो उन्हें जानते हैं और न उनसे पहले मिले ही होते हैं। ऐसी स्थिति में किसी के यहाँ जा टिकना सरासर ग़लत है। किसी अपरिचित से मिलने जाने में कोई बुराई नहीं लेकिन किसी अपरिचित के यहाँ जाकर टिक जाना बुरी बात है।

     किसी के यहाँ मेहमान बनकर जाने से पूर्व सूचना देना ही नहीं अपितु ये पूछना भी अनिवार्य है कि आप कहीं व्यस्त तो नहीं और हमारे आने से आपको असुविधा तो नहीं होगी। यदि कोई प्रसन्नतापूर्वक अनुमति दे अथवा आग्रह करके बुलाए तभी जाएँ अन्यथा नहीं। जबरदस्ती किसी का मेहमान बनना घोर अशिष्टता है। कई लोग न केवल बिना पर्याप्त सूचना के अथवा असमय स्वयं किसी के यहाँ मेहमान रूपी भगवान बनकर प्रकट हो जाते हैं अपितु अपने साथ अपने मित्रों अथवा रिश्तेदारों रूपी देवी-देवताओं को साथ लेकर साक्षात दर्शन देने को प्रस्तुत हो जाते हैं। अब इस भगवत मंडली को साक्षात अपने सम्मुख पाकर मेज़बान किस क़दर अपने भाग्य पर इठलाने लगेगा आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं।

     जब लोग बिना किसी पूर्व सूचना के आ धमकते हैं तो कई बार मेज़बान को बड़ी असुविधा होती है। शहरों में अधिकांश लोग व्यस्त रहते हैं और उनका कार्यक्रम अथवा दिनचर्या निश्चित होती है। ऐसे में यदि बेमौसम बरसात की तरह कोई मेहमान या मेहमान परिवार आ टपकता है तो उनका सारा कार्यक्रम चौपट हो जाता है। कई बार भारी आर्थिक नुक़सान भी हो जाता है।

     बहुत से लोग बहुत महत्त्वपूर्ण अथवा संवेदनशील पदों पर कार्य करते हैं अतः उनके लिए एकदम से छुट्टी लेना भी संभव नहीं होता। ऐसे में यदि कोई अचानक आकर मेहमान हो जाए तो बड़ी समस्या पैदा हो जाती है। मेज़बान कुछ करना चाहते हुए भी विवश होता है। किसी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न करना अच्छा नहीं। ऐसा करना आपसी संबंधों के लिए घातक भी हो सकता है।

     कभी घरों में परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने कार्यों पर चले जाते हैं और घर पूरे दिन बंद रहता है। कई लोग अपने घरों को किसी दोस्त अथवा रिश्तेदार के भरोसे भी नहीं छोड़ना चाहते अतः ऐसे में कोई मेहमान बिना बुलाए या बिना सूचित किए आ जाता है तो सचमुच बड़ी परेशनी का कारण बनता है। किसी को अपना घर दूसरों के भरोसे छोड़ने के लिए विवश करना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे में कोई असामान्य घटना घटित हो जाती है तो उसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा?

     शहरों में अधिकांश घर अपेक्षाकृत छोटे ही होते हैं और बड़े भी हों तो घर के सदस्यों की आवश्यकता के अनुसार ही बेड अथवा दूसरा फर्नीचर होता है। ऐसे में कई मेहमान आ जाएँ तो स्थिति बहुत ख़राब हो जाती है। यदि घर में चार सदस्य हैं और पाँच-छह सदस्य लंबे समय के लिए मेहमान के तौर पर आ जाएँ तो क्या हालत होगी अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं।

     आज के ज़माने में मेज़बान की आर्थिक स्थिति को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो ऐसे में किसी नज़दीकी रिश्तेदार का भी उसके यहाँ जाकर मेहमान बनना उचित प्रतीत नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति किसी भी कारण से नहीं चाहता कि आप उसके यहाँ मेहमान बनें तो उसके वहाँ जाना निर्लज्जता ही होगी। ऐसी कुचेष्टा कई बार संबंधों में स्थायी विघटन का कारण भी बन जाती है।

     कई लोग कहते हैं कि उन्हें तो बस रात गुज़ारने के लिए स्थान चाहिए दिन में तो ज़रूरी काम निपटाने के लिए या घूमने के लिए बाहर ही रहना होता है। खाना भी बाहर ही खाना पसंद करते हैं। जब आपको मेज़बान से कोई लगाव ही नहीं है तो उनके यहाँ मेहमान बनने की क्या ज़रूरत है? होटल का किराया बचाने के लिए? ऐसे लोगों को किसी शरीफ़ आदमी को बिना वजह परेशान और लज्जित करने की बजाय किसी होटल में ही रुकना चाहिए।

     कई लोग जानते हैं कि हम जहाँ मेहमान होने जा रहे हैं वो लोग हमें पसंद नहीं करते लेकिन फिर भी बेशर्म होकर उनके घर की कुंडी जा खटखटाते हैं। वहाँ रहेंगे भी रौब से। बातें भी ऐसे करेंगे जैसे यहाँ आकर मेज़बान के परिवार पर कोई बहुत बड़ा अहसान कर दिया हो। यदि वो नहीं आते तो मेज़बान महत्त्वहीन ही रह जाता। मेज़बान को ये जताने के लिए कि हम तुम्हारे ऊपर बोझ नहीं हैं आते-जाते कहीं से दस-बीस रुपल्ली की गली-सड़ी सब्ज़ियाँ अथवा फल ख़रीद लाएँगे। ये कहाँ की शालीनता अथवा शिष्टता है।

     कई लोगों को काम के सिलसिले में प्रायः किसी विशेष स्थान पर लगातार जाना पड़ता है और वे हर बार किसी परिचित को परेशान करने से बाज नहीं आते। कई बार तो अपने साथ अपरिचितों तक को ले जाने में भी संकोच नहीं करते जो कि बहुत ग़लत बात है। एक परिचित के यहाँ ऐसा ही एक मेहमान प्रायः आने लगा। कई-कई दिन रुकता। बाद में बिना पूछे ही एक दो को और भी लाने लगा। पहले कुछ अनुशासन रखा लेकिन बाद में कभी रात को दस बजे आ रहे हैं तो कभी बारह बजे। एक दिन जब रात को दो बजे लाव-लश्कर के साथ नशे में धुत्त इन सज्जन का आगमन हुआ तो इन्हें अंदर घुसने देने की बजाय इनका सामान इनके सुपुर्द करके बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ऐसे लोगों के साथ ऐसा करना ही उचित है।

     कई लोगों को न तो खाने-पीने का शऊर होता है और न उठने-बैठने का। न तो ख़ुद अच्छे मेहमान होने का फ़र्ज़ अदा करते हैं और न अपने बच्चों को गंदगी फैलाने से रोकते हैं। न केवल मेज़बान का फ़र्नीचर और दीवारें गंदी कर डालते हैं अपितु क़ीमती सजावटी सामान भी तोड़-फोड़ डालते हैं। किसी के यहाँ जाकर इतना गंदा और अव्यवस्थित कर डालते हैं कि मेज़बार अंदर ही अंदर रो पड़ता है। उनके बच्चे अपना तांडव जारी रखते हैं और माँ-बाप उन्हें रोकने की बजाय उनकी शिष्टता और सद्गुणों के पुल बाँधने में ही लगे रहते हैं।

     एक बार एक सज्जन आए। अपने किसी अन्य रिश्तेदार के यहाँ किसी कार्यक्रम में आए थे। हमसे भी मिलने आ गए। पत्नी समेत आए थे। बतला रहे थे कि किसी फाइव स्टार होटल में रुके हुए थे। फाइव स्टार होटल से निकलकर हमारे ग़रीबख़ाने पर आ गए। पहले तो भाई साहब ने मिठाइयाँ खाकर हाथ बढ़ाकर पास ही लटकते हुए पर्दे से हाथ पौंछ लिए और उनकी श्रीमती जी ने मुंडी घुमाकर चाय पर आ गई पपड़ी को उँगली से उठाकर पीछे की दीवार पर लगा दिया जबकि मेज़ पर ही टिश्यू पेपर मौजूद थे। एक दो बार इशारों से रोकने की कोशिश भी की लेकिन बेकार। शायद फाइव स्टार होटल का असर बना हुआ था। कमी नहीं है ऐसे लोगों की। ऐसे मेहमानों से भगवान बचाए।

     एक बार किसी के यहाँ एक परिवार आया। उनके छोटे बच्चे भी थे। मेज़बान ने उनको ज़मीन पर दरी बिछाकर सुलाने की बजाय अपना बेडरूम दे दिया और ख़ुद फ़र्श पर चटाई डाल कर कई रातें गुज़ारीं। क्योंकि मेहमानें के छोटे बच्चे थे इसलिए बेड पर रबर की शीट बिछा दी थी लेकिन मेहमानों की उद्दण्डता देखिए कि उन्होंने वो शीट हटा दी जिससे बच्चों का मल-मूत्र सीधे गद्दों में पहुँच गया और उनमें इतनी दुर्गंध हो गई कि उन्हें फ़ौरन बदलवाना पड़ा। बार-बार कहने के बावजूद उन्होंने बेड पर रबर की शीट नहीं डाली और कहा कि हमारे बच्चे बिस्तर गीला नहीं करते जबकि वो दोनों क्रियाएँ बिस्तर में ही करते थे। कई लोग होते ही इतने असभ्य और विध्वंसक हैं कि न तो होटलों और धर्मशालाओं को ही बख़्शते हैं और न दोस्तों अथवा रिश्तेदारों को ही। ऐसे मेहमानों से न केवल सख़्ती से पेश आना चाहिए अपितु उन्हें दूर से सलाम कर लेने में भी कोई बुराई नहीं नज़र आती।

     डायपर का शायद नाम भी न सुना हो लेकिन नखरे ही नखरे। हर बात पर नखरे। खाने के वक़्त भी नखरे करते थे। बार-बार कहते थे कि आपके यहाँ ये नहीं बनता वो नहीं बनता। ये सज्जन और सजनी जी अपने बच्चों के लिए कुछ नूडल्स के पैकिट साथ लाए थे और बार-बार उन्हें पकाकर खिलाते थे। कहते थे कि हम बच्चों को सिर्फ़ नूडल्स और डिब्बाबंद दूध वग़ैरा ही देते हैं। भगवान बचाए ऐसे बेवकूफ़ और छिछोरे मेहमानों के नखरों से। जो लोग कहीं रिश्तेदारी वग़ैरा में जाते हुए अपने साथ अपने लिए थोड़ा बहुत खाने-पीने का सामान भी साथ लेकर जाते हैं वो वास्तव में बहुत ही निकृष्ट क़िस्म के लोग होते हैं। वो कभी अच्छे मेहमान या अच्छे इंसान नहीं हो सकते। यदि आपको किसी के घर का खान-पान और रहन-सहन पसंद नहीं है तो आप उनके यहाँ जाते ही क्यों हो?

     कुछ लोग कहीं जाते हैं तो कुछ उपहार अथवा फल-मिठाई आदि भी ले जाते हैं। कुछ ख़ुश होकर तो कुछ मजबूरी में। ये सज्जन भी आम लेकर आए थे। आम इतने बढ़िया थे कि मैंगो शेक बनाने की ज़रूरत नहीं सीधे गिलासों में डालो और सर्व कर दो। आमों की महक से उनका सामान तक महक रहा था। थैले में से बाहर निकालते वक़्त कुछ का शेक ही बाहर आ गया। एक विचित्र गंध उनमें से आ रही थी जिसके कारण उनको सीधे कूड़े की टोकरी के दर्शन करवाना अनिवार्य था। कहने लगे दिल्ली में अच्छे फल मिलते ही नहीं हमारे यहाँ तो बहुत अच्छे और ताज़ा फल मिलते हैं।

     कई लोग जान-बूझकर ऐसे समय में किसी के यहाँ जाते हैं जब वो सर्वाधिक व्यस्त होते हैं अथवा उनके बच्चों की परीक्षाएँ वग़ैरा होती हैं। ऐसे नकारात्मक विचारों वाले मेहमानों का मक़सद ही किसी को परेशान करना अथवा हानि पहुँचाना होता है। ऐसे लोगों को घर में तो क्या गली में भी नहीं घुसने देना चाहिए। न ग़लत लोगों के यहाँ जाओ और न उन्हें बुलाओ। कई लोग किसी मेहमान या मेहमान परिवार की ग़लत हरकतों का बदला लेने के लिए उनके यहाँ जा पहुँचते हैं और उनसे भी बुरा व्यवहार करते हैं जो किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे में दोनों पक्ष ही भर्त्सना के पात्र हैं।

     मेहमान के लिए ज़रूरी है कि वो मेज़बान की इच्छा-अनिच्छा अथवा उसकी भावनाओं का भी ध्यान रखे। संयोग से मेरे पास बहुत से लोग मिलने के लिए आते रहते हैं। अपरिचित अधिक आते हैं। कुछ लोग फोन करके आते हैं तो कुछ बिना सूचना के ही आ जाते हैं। चाहे कोई सूचना देकर आए अथवा बिना सूचना के मुझे तो बहुत ही अच्छा लगता है। कोई हमसे मिलने आया है इससे बड़ी प्रसन्नता की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है? आगंतुकों के साथ गपशप करने व उनके साथ चाय पीने में जो आनंद आता है वह अनिर्वचनीय है। कई लोग चाय नहीं पीएँगे। कहेंगे आपका अमूल्य समय लिया यही क्या कम है? अरे भई जब अमूल्य समय ले लिया तो एक कप चाय भी पी लो। लेकिन कुछ लोग बिल्कुल नहीं पीएँगे। ये कोई अच्छे मेहमान के लक्षण नहीं। ऐसी मानसिकता मेज़बान का सम्मान नहीं। हमें तो दोनों ही स्थितियाँ प्रिय हैं। चाहे कोई हमारे पास आए या हम किसी के पास जाएँ साथ बैठ कर चाय पीना तो वैसे भी बनता ही है।

     कई मेहमान बड़े विचित्र होते हैं। आते तो सूचना देकर ही हैं लेकिन या तो पहले ही आ टपकेंगे या फिर बहुत बाद में। ये मसला गाड़ी के लेट होने से संबंधित नहीं है अपितु उनकी नीयत में खोट का है। आज के युग में कार्यक्रम में किसी भी परिवर्तन की समय पर सूचना देनी चाहिए और ये मुश्किल भी नहीं है लेकिन कुछ लोगों को दूसरों को परेशानहाल देखने में ही आनंद आता है। कई बार ऐसे लोगों का मक़सद किसी से मिलने का नहीं होता अपितु असमय पहुँचकर मेज़बान की व्यवस्था में कमी ढूँढकर उसे लज्जित कऱने का होता है। कई बार कुछ लोग मेज़बान को अपने आने की व उनकी व्यवस्था करने की सूचना तो दे देंगे लेकिन पहुँचेंगे नहीं। ऐसे लोगों का क्या किया जाए?

     छत्तीसगढ़ से एक सज्जन का नवंबर में फोन आया। सज्जन नहीं चचेरे अनुज का फोन था। कहने लगे बच्चे आएँगे। कब आएँगे ये पूछने पर बतलाया कि मार्च में। कौन-कौन आएँगे ये पूछने पर बतलाया कि पता नहीं। चलो बुकिंग वग़ैरा करवा के बतला देना। हऔ। फरवरी के अंत तक कोई सूचना नहीं मिली। हमें व्यवस्था करनी थी सो चिंता हो रही थी। कई बार फोन किया। पता चला कि कई परिवार आ रहे हैं। दस-बारह आदमी तो होंगे। बच्चों समेत अठारह-बीस हो सकते हैं। किस दिन पहुँच रहे हैं कितने दिन रुकने का प्रोग्राम है? दिल्ली पहुँच कर बतलाएँगे। पता चला दस तारीख को दिल्ली पहुँच रहे हैं। सीधे घर आएँगे। नियत समय पर नहीं पहुँचे तो पता किया कि क्यों नहीं पहुँचे? पता चला कि और कहीं निकल गए हैं बाद में आएँगे। कब आएँगे? आने से पहले बता देंगे। रोज़ फोन करके पता करते रहे। तीसरे दिन बतलाया कि आज आ रहे हैं। कितने बजे? दोपहर तक। फिर फोन आया कि और कहीं निकल रहे हैं शाम तक आएँगे। कितने लोग आएँगे? सभी आएँगे।

     बीस लोगों के खाने की तैयारी शुरू कर दी। थोड़ी देर बाद फोन आया कि सीधे अभी आ रहे हैं। कितना समय लगेगा? दो-ढाई घंटे। चलो तब तक खाना तैयार हो जाएगा। युद्धस्तर पर खाना बनाने का काम किया जा रहा था। एक घंटे के बाद फिर फोन की घंटी बजी। माथा ठनका। कहीं कार्यक्रम फिर से तो नहीं बदल दिया? आवाज़ आई कि आपकी कॉलोनी के गेट पर पहुँच गए हैं किसी को भेज दीजिए। गुस्सा तो आया पर क्या किया जा सकता था? उनको लेने के लिए गेट तक पहुँचे। फिर गुस्सा आया। घर के दो सदस्य छुट्टी लेकर बैठे थे। एक महाराज की व्यवस्था की थी। बीस-पच्चीस आदमियों का खाना बन चुका था। मेहमान आए थे केवल सवा तीन। क़ायदे से मेहमान नहीं घर के सदस्य ही थे। कारण एक तो भतीजा था और उसकी पत्नी थी जो पहली बार आई थी। उनका दो वर्ष का पुत्र भी स्वाभाविक है पहली बार ही आया था। और साथ में थीं उनकी माताजी। गुस्सा संभव ही नहीं था। कोई शिकायत भी नहीं की। बच्चे को गोद में लेकर खिलाया। प्रेमपूर्वक बातें कीं। सभी को प्रेम से भोजन करवाया।

     अपने स्वजनों को अपने हाथों से खिलाने का आनंद ही कुछ और होता है। अपने बच्चों को खिलाने-पिलाने का अद्वितीय आनंद मिला। कुछ दिन पूर्व इनके ही दूसरे भाई के बच्चे भी आए थे। घर के सामने बीस गज़ की दूरी से होकर निकल गए पर घर नहीं आए। जो पुत्रवधू आई उससे कभी बात नहीं हुई थी। जो पुत्रवधू नहीं आई और जो घर के सामने बीस गज़ की दूरी से होकर निकल गई उससे ख़ूब बातें हुई हैं। नहीं आने के बाद भी हुई हैं। बड़ी अच्छी बच्ची है। फोन करती रहती है। उस पर तो क्रोध आ ही नहीं सकता। किसी न किसी दिन उसको भी अपने हाथों से खिलाने का आनंद मिलेगा आश्वस्त हूँ। जिन पर क्रोध करने की ज़रूरत होती है अगर वो क्रोध के प्रेम को नहीं समझते तो उन पर क्रोध करना बेमानी है। पता नहीं लोग कैसे अपने परिचितों, मित्रों और रिश्तेदारों के घरों के सामने से बिना मिले गुज़र जाते हैं? मैं ऐसा नहीं कर पाता हूँ। और न ऐसी कामना ही करता हूँ। कोई मिलने से इंकार कर दे तो मजबूरी है। हम शहरों में रहें अथवा गाँवों में, अमीर हों अथवा ग़रीब, बहुत पढ़े-लिखे हों या कम पढ़े-लिखे अच्छे महमान और अच्छे मेज़बान बन सकें तो जीवन कितना आनंदपूर्ण हो जाए!

सीताराम गुप्ता
ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
फोन नं. 09555622323
Email : srgupta54@yahoo.co.in


Sunday, 22 June 2014

छोटे शहर की एक सुबह सी है यह ख़बर

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ज्ञानपीठ सम्मान पाने वाले हिंदी के 10वें साहित्यकार हैं | इनकी कवितायेँ जटिल होते जा रहे समय में जीवन के सुकून का सूत्र देती हैं | ‘संवेदन परिवार’ की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए स्पर्श के पाठकों के लिए वरिष्ठ कवि अरुण कमल की यह टिपण्णी हम अमर उजाला शब्दिता से साभार उदृत कर रहे हैं :



केदारनाथ सिंह हमारे समय के सबसे बड़े कवि हैं | उन्होंने हिंदी कविता को एक नया रास्ता दिया, जिसके दोनों तरफ उम्मीद की दुनिया है | जैसा कि वह खुद अपनी कविता के हवाले से कहते हैं कि मुझे सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है, क्योंकि इससे एक उम्मीद होती है कि जो दुनिया सड़क के इस ओर है, उससे कहीं बेहतर दुनिया सड़क के उस तरफ है |

दरअसल, हममें से हर कोई रोज़ कहीं न कहीं कोई सड़क पार करता ही है | पर इससे उम्मीद तो सिर्फ केदारनाथ सिंह ही लगा सकते हैं | उन्होंने बने बनाये खांचों के विपरीत बगैर किसी विरोध के लोक और शास्त्र दोनों परम्पराओं को जोड़ते हुए आमजन के लिए हिंदी कविता को सुलभ और सरल बनाया | उनकी कविताओं में जीवन अपनी पूरी ऊर्जा के साथ मौजूद है | उन्होंने कविता में मनुष्य के विश्वास को फिर से स्थापित किया | केदारनाथ सिंह की कविताओं में गाँव, कस्बे, बाग़-बगीचे और भूले-बिसरे लोग तो आते ही हैं साथ ही उनमें ठेठ गँवई किसान जीवन भी सायास मुखर हुआ है | उनकी शुरू से लेकर अभी तक की कवितायेँ कई पीढ़ियों और श्रोताओं के कंठ में बसी हुई हैं | ऐसे कवि के लिए कोई भी सम्मान कम है | हाँ, ये जरूर है कि हिंदी साहित्य के लिए केदार जी को ज्ञानपीठ सम्मान मिलना उनके महत्त्व को रेखांकित करता है | ‘गिरने लगे नीम के पत्ते...पड़ने लगी उदासी’ से लेकर ‘पानी में घिरे हुए लोग’ और ‘लहरतारा’ जैसी कवितायेँ उनकी अपने समय के सापेक्ष सक्रियता को तो उजागर करती ही हैं, साथ ही सजगता से अपने परिवेश को बयान भी करती हैं | उनके पूरे काव्य खंड की बुनावट में सूक्ष्मता के साथ मनुष्य और पदार्थ में गहराई से प्रवेश करने की क्षमता है, जो हैरानी भरा लगता है | ‘बनारस’ और ‘नदी’ जैसी कवितायेँ उनकी बेहद प्राणवान रचनाएँ हैं | ‘बनारस’ कविता में तो उन्होंने उस शहर के इतिहास, भूगोल के साथ- साथ अध्यात्म का ऐसा तानाबाना बुना है कि पूरी की पूरी कविता जी उठती है | जैसे इसकी बानगी देखिये- किसी अलक्षित सूर्य को/देता हुआ अर्घ्य/ शताब्दियों से इसी तरह/ गंगा के जल में/ अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर/ अपनी दूसरी टांग से बिलकुल बेखबर |

कविता में अघोरपन है, जो शमशान का साधक ही महसूस कर सकता है | जो जीवन और मृत्यु के प्रति निर्विकार भाव रखता हो | इस तरह की कविता में समूचे कालखंड के साथ इतनी सहजता से प्रयोग तो केदार जी ही कर सकते हैं | असाधारण को साधारण और साधारण को असाधारण बनाने की अद्भुत क्षमता है उनमें | ‘अकाल में सारस’ कविता संग्रह में कुछ ऐसी ही कवितायेँ हैं, जहाँ कवि गहराई से, मगर मूल्यबोध के साथ जीवन की पड़ताल करता है | ये कवितायेँ सिर्फ सपाटबयानी नहीं हैं और न ही साहित्य का कोरस | केदार जी की तमाम कवितायेँ जिंदगी के सहजबोध से प्रभावित हैं | वे जटिल होते जा रहे समय में जीवन के सुकून का सूत्र देतीं हैं | उनकी कवितायेँ बोझिल होने से बचती हैं | वे अपनी छोटी-छोटी पंक्तियों में बड़ी-बड़ी बातें करतीं हैं | ये कवितायेँ ऐसी हैं कि परिवेश का एहसास होते ही लोगों की जुबान पर सहज ही आ जातीं हैं | काल से होड़ लेती, उनकी कई कविताओं के स्वर में पैनापन भले ही न हो, परन्तु आहिस्ता-आहिस्ता वे पाठक के दिलोदिमाग पर छा जातीं हैं | बहुत सी कवितायेँ तो ऐसी हैं कि वे बीते और रीते हुए की याद दिला जातीं हैं | जैसे कि ‘फागुन’, ‘फसल’ और ‘दाने’ कविता को पढ़ने के बाद हम गुज़रे हुए कालखंड में चले जाते हैं | ‘दाने’ कविता की एक बानगी- नहीं हम मंडी नहीं जायेंगे/ खलिहान से उठते हुए कहते हैं दाने/ जायेंगें तो फिर लौटकर नहीं आयेंगें/ जाते-जाते कहते जाते हैं दाने | केदार जी के यहाँ कविता बेहद मासूमियत से अपने को बयान करती है | ऐसी मासूमियत कि कोई भी उस पर मर मिटे | ऐसी कविता के लिए तो कालजयी दृष्टि के साथ साथ जीवनबोध भी चाहिए, जो अपने दौर में केदार जी के पास ही है | उनकी बहुत सी कविताओं में पूर्वांचल की धरती की गमक है | जिसमें आंचलिकता भरपूर है |

Tuesday, 20 May 2014

उपन्यास अंश- 'अहिल्या' : कुंती मुकर्जी





‘’जिंदगी जैसे बिखर रही है. एक एक पल समेटने के उपक्रम में हज़ारों कण आपस में टकराकर ऐसे अलग हट रहे हैं जैसे इनका कोई अस्तित्व न हो”.
          अहिल्या शाम के धुंधलेपन में बैठी है.. उसकी ज़िंदगी में भी ऐसी ही शाम घिर रही है. यह शाम तो रात में बदल जाएगी, फिर सुबह होगी... लेकिन अहिल्या की ज़िंदगी...?
          वह अपने आप से हज़ारों सवाल पूछ्ती है, कुछ के जवाब उसे स्वत: मिल जाते हैं और कुछ सवाल, सवाल बन कर रह जाते हैं.
          इंसान कभी-कभी कितना मजबूर हो जाता है. अपनी ज़िंदगी की सुरक्षा के लिये जो जाल बुनता है, एक दिन उसी में फंसकर रह जाता है. अहिल्या की ज़िंदगी भी इसी तरह का मकड़जाल है जिसमें वह उलझकर रह गयी है.
          शाम ढल गयी. धीरे – धीरे रात धरती की गोद में उतरने लगी. सर्दी का मौसम होने से जल्दी अंधेरा छा गया. अहिल्या ने मुड़कर अपने घर की ओर देखा. कमरे में अंधेरा छाया हुआ था. उठ कर उजाला करने का मन नहीं हुआ.
          वह वैसी ही कुर्सी पर पड़ी रही.पास के लौंगान के पेड़ पर बहुत सारे पक्षी शोर मचाते हुए शान्त हो गये.
अहिल्या आत्मविश्लेषण करने लगी.
          “ज़िंदगी!  मैं तुझे किस नाम की परिभाषा दूं. एक ही शरीर में मैंने कितनी ज़िंदगियाँ जी है, इस पैंसठ वर्ष के जीवन में मैं अनेकों बार जी कर मरी हूँ. मनोचिकित्सक सम्मोहित करके आंतरिक बातें निकालते हैं. मुझे सम्मोहित होने की ज़रूरत ही नहीं है. आज मेरा मन सब कुछ कह्ने को उतावला हो रहा है. मैं अपना भविष्य नहीं जान सकती लेकिन मेरा अतीत एक गुलदस्ते की तरह मेरी गोद में पड़ा है.
          हर इंसान के जीवन में उसका बचपन उसके जीवन की नींव होती है. मेरे जैसा बचपन किसीको ना मिले. कहते हैं कि हर लड़की अपनी मां पर जाती है. मेरी मां एक ऐसी इंसान थी जो सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिये जीती थी. वह न एक अच्छी पत्नी  बन सकी,न एक अच्छी मां ही बनी. वह एक पेशेवर वेश्या थी. कहते है कि मां कभी कुमाता नहीं होती और माँ की बुराई करना भी शास्त्र सम्मत नहीं है, लेकिन मेरे साथ जो हुआ क्या वह विधि-विधानुसार ठीक हुआ....? मेरे मन में कई प्रश्न उठते हैं जिसका उत्तर ढुँढ़ने के लिये अपने क्रिया-कलाप और अपने माँ के जीवन मंथन करने के अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं बचता है.
          मेरे पिताजी बहुत अच्छे इंसान थे. उन्होने मेरी मां को वेश्यावृत्ति के दलदल से निकाल कर एक अच्छी ज़िंदगी दी. उससे शादी की, एक घर दिया. एक औरत के जीवन में जो सुख चाहिये था,वह सब कुछ उसे दिया. लेकिन मेरी मां खुश नहीं थी. उसे हर दिन नये जिस्म की भूख थी जो मेरे पिता के घर में नहीं मिल सकता था. वह मजबूर थी क्योंकि मेरा अस्तित्व उसके गर्भ में आ गया था. मुझसे छुटकारा पाने की उसने बहुत कोशिश की लेकिन मेरे पिता के समझाने पर वह चुप तो हो गयी लेकिन मन ही मन मुझसे और मेरे पिता से कुढ़ने लगी.
          1945. सर्दी का मौसम. एक गुलाबी शाम को मेरा जन्म हुआ. कहते हैं कि बच्चे के जन्म होने से पहले ही उसका भाग्य जन्म ले लेता है. मेरा भी भाग्य दुर्भाग्य बनकर पहले ही जन्म ले चुका था.
          मेरे पिताजी मुझे पाकर बहुत खुश हुए. जन्म के इक्कीसवें दिन में मेरा नामकरण संस्कार हुआ.
          लोग कहते हैं कि नाम में क्या रखा है? लेकिन मैं कहती हूँ कि नाम ही में ही तो सब कुछ रखा है. इंसान का कर्म उसके नाम द्वारा ही पहचान में आता है अन्यथा नाम के बिना इंसान का क्या अस्तित्व...? दूसरी बात नाम का प्रभाव भी इंसान के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. एक बच्चे का पुरा भविष्य उसके माता पिता के हाथ में होता है. हमारे गांव में तब एक ही पंडित हुआ करते थे. दिन को रात या रात को दिन, जो भी वे कहते थे उसी को ब्रह्मवाक्य मान लिया जाता था. पंचांग देखकर, उंगलियों पर कालगणना करके पंडित जी ने कहा कि बच्ची का जन्म मेष राशि, कृत्तिका नक्षत्र में हुआ है. उसके नाम का पहला अक्षर होना है. पूजा विधि करने के पश्चात पंडित जी ने स्वयं मेरा नाम रखा – अहिल्या .एक शापित नाम. नाम का कितना असर पड़ता है यह मुझे साठ साल के बाद पता चला. तब तक बहुत देर हो चुकी थी. जो कुछ मेरे  साथ होना था हो चुका जो कुछ मुझे भुगतना था मैं भुगत चुकी  .....आज मेरा मन जीवन के हर गीले-शिकवे से मुक्त होना चाहता है. इस शाम की बेला में हे मन तू पंछेबन उड़ चल अतीत की उस गली में जहाँ मैं अपने लिये इंसाफ़ के फूल तोड़ लाऊँ.......       
          मैं एक बहुत ही अच्छी बेटी थी. मेरे पिता को मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं हुई. शादी के बाद एक अच्छी पत्नी, अच्छी बहू और एक अच्छी मां बनी. इसके बावजूद मैं न एक बेटी बन पायी, न बहू, पत्नी और न ही मां. न मैंने कभी अपना घर त्यागा, न पलायन किया, लेकिन परिस्थिति ने मुझसे सब कुछ छीन लिया. पहले  मैं शास्त्रों को दोष दिया करती थी कि नारी के विरुद्ध कितनी बेड़ियां बनायी गयी हैं. नारी ही धर्म का पालन करे , पतिव्रता बने, व्रत पूजा पाठ करे लेकिन मर्यादा का उल्लंघन होने पर उसे सात पीढ़ी का सत्यानाश करने वाली कहा गया है. अगर मेरे जीवन में विविध घटनाएँ नहीं घटती तो मैं भी यही धारणाएँ रखती.
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बारह साल की उम्र में जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ाव देखकर और विभिन्न लोगों से मिलके, तरह-तरह के अनुभवों से गुजरकर मुझमें थोड़ी समझ आने लगी थी. पहले मैं बिल्कुल नहीं बोलती थी लेकिन अब कुछ कुछ बात समझने और बोलने लगी थी. इसका एक कारण यह था कि मेरी जेठानी की बेटी प्रमिला, जो मुझसे एक साल बड़ी थी, मेरी अच्छी दोस्त हो गयी. वह बहुत तेज लड़की थी और कॉलेज जाने कारण बहुत सारी बातें जानती थी. उससे बात करके मुझमें  संचार होता था. वह मेरी सुंदरता की भक्त थी. सुंदर तो वह भी थी लेकिन मुझ जैसे नैन नक्श नहीं थे, न ही वह मुझ जैसी गोरी थी. मगर उसमें एक कशिश थी.

स्कूल से आने के बाद वह अक्सर मेरे पास रसोई में चली आती और अपनी सहेलियों की बातें बताती, कभी अपने टीचर की. धीरे-धीरे मैंने देखा वह अपनी सहेलियों की कम, टीचर की ज़्यादा बातें करती है. आखिर एक दिन उसने अपनी मन की बात बता दी –

“ चाची, मैं आपसे एक बात बतलाती हूँ किसीसे कहना नहीं “

“ नहीं कहूंगी “

“ मैं अपने टीचर को मन ही मन चाहती हूँ “

“ तो इसमें कौन सी छुपाने वाली बात है ?”

“ अरी बुद्धू ! मेरा मतलब है मैं उससे प्यार करती हूँ जैसे तुम मेरे चाचा से करती हो. “
“ प्यार ? यह क्या होता है ?”
“ क्यों,तुम मेरे चाचा से प्यार नहीं करती हो ?”
“ नहीं मैंने सिर्फ शादी की है, मुझे नहीं पता प्यार क्या होता है. “
“ तो सुनो. “ ...... उसने बड़े ही सयाने ढंग से मुझे समझाया. 
प्यार वह भावना है जो हमारे मन में उत्पन्न होता है जब हम अपने मनचाहे शख्स को देखते हैं. यह लड़का – लड़की दोनों तरफ़ से होता है और कभी कभी एक तरफा भी होता है. मैं एक तरफा प्यार करती हूँ क्योंकि मेरे टीचर को मेरे मन की बात का पता नहीं. दिन रात उसी की सोच मन में रहती है. मन में तरह तरह के आवारा ख्याल आते हैं. उठना बैठना, खाना पीना, उसीके बारे में सोचना. अगर वो हमें देखकर मुस्कुरा दें तो हम निहाल हो जायें.
“ तुम इतनी बातें कैसे जानती हो ?”
“ मेरी कुछ बड़ी सहेलियाँ हैं. वे भी लड़कों से प्यार करती हैं, उनसे मिलती हैं और किताब में ख़त छुपाकर उनको देती हैं. “
“ क्या तुमने भी अपने टीचर को ख़त लिखा है ?”
“ हाँ, लेकिन दिया नहीं है. “
“ तो...कब दोगी ?”
“ जब कॉलेज की छुट्टी होगी तो दे दूंगी “
वह और बातें बताना चाहती थी तब तक मनीष आ गया. मनीष जब भी आता मुझे अकेले देखकर मेरा गाल छू देता और मुझे अपनी ओर खींचने की कोशिश करता, मगर मैं उसका हाथ झटक देती. प्रमिला के जाते ही उसने मुझे अपने गले से लगा लिया. मैं उससे छूटने की कोशिश करने लगी कि तभी किसीके पैरों की आहट सुनाई दी. वह मुझे छोड़कर पीढ़े पर बैठ गया और मैं उसे खाना परोसने लगी.
उस रात मुझे नींद नहीं आयी. मैं प्रमिला की बातों पर विचार करने लगी थी. मेरा मन भी जैसे प्यार की अंगड़ाई ले रहा था. लेकिन मनीष का ख्याल मेरे मन में नहीं आता था. मुझे उससे डर लगता था. वह मुझे अकेले पाकर कुत्ते की तरह झपटता था. ... लेकिन प्रमिला तो कहती है जिससे हम प्यार करते हैं हर समय केवल उसी के बारे में सोचते हैं.
उस रात मुझे ज्ञानोदय हुआ था, शादी करना और प्यार करना दो अलग बातें हैं.
कुछ दिनों से मेरे पेड़ू के निचले हिस्से में बहुत दर्द होता था. मैं रात में बिस्तर पर उठ-उठकर बैठ जाती थी, लेकिन अपनी सास से कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी. मेरे शरीर के निचले हिस्से में कुछ गीला-गीला सा लगता. चूंकि मैं प्रमिला के ज़्यादा करीब थी इसीलिये जब शाम को वह मुझसे मिलने आयी मैंने अपनी पीड़ा के बारे में बता दिया. उसने तुरंत कहा –
“ इसका मतलब है कि तुम्हें बहुत जल्दी ही मासिक होने वाला है. “
“ मासिक क्या होता है और मुझे क्यों होगी ?”
“ होगी. सभी लड़कियों को होती है, यही तो उसके जवान होने की निशानी है. तुम मां बन सकती हो, बच्चों को जन्म दे सकती हो. “
“ यह कैसी दुनिया की बात कर रही हो प्रमिला ?”
“ यही होता है “
“ तुम्हे कैसे पता “
“ हमारी कक्षा में पढ़ाई जाती है – इसका नाम है मानव शरीर विज्ञान – ठहरो मैं आती हूँ “
वह अपने कमरे में गयी और एक किताब उठा लायी. कुछ पन्ने पलट कर मुझे मानव शरीर का चित्र दिखाया – नंगे स्त्री और पुरुष का. मुझे उसने रजोदर्शन के बारे में विस्तार से बताया. इन सब बातों से मुझे अजीब सा डर और एक प्रकार का झटका लगा.
तीन दिन के बाद प्रमिला की बातें सच निकलीं. मेरा रजोदर्शन हो गया. रात में हुई थी जब मैं गहरी नींद में थी. सुबह उठी तो मेरा सारा कपड़ा लाल रंग का हो गया था. यह देखकर मैं रोने लगी.
मेरे रोने की आवाज़ से मेरी सास जाग गयी.
“ क्या हुआ अहिल्या ? क्यों रो रही है ?”
तभी रोशनी में उसकी दृष्टि मेरे कपड़ों और बिस्तर पर पड़ी.
“ रोने धोने की कोई ज़रूरत नहीं है. उठो कपड़े बदलो. “
सास ने प्रमिला की मां को आवाज़ लगायी. उसे कुछ हिदायत दी. मैं बाथरूम में अपने को साफ़ करके जब वापस आयी तो मेरी जेठानी ने मुझे कुछ नर्म पुराने कपड़े लगाने को दिये और मुझे रसोई में जाने से मना किया. तीन दिन तक मैं हल्की-फुल्की काम करती रही. चौथे दिन मेरी जेठानी ने मुझे नहाने को कहा. मुझे सुंदर नयी साड़ी पहनने को दिया और कहा – “ अहिल्या अब तुम साड़ी पहना करो. सिंदूर की बिंदी रोज लगाना. अब फ्रॉक नहीं पहनना है, किसी भिखारिन को दे देना. “
शाम को कॉलेज से जब प्रमिला आयी तो मुझे साड़ी में देखकर मुझसे लिपट गयी.
“ चाची! तुम देखते देखते कितनी बदल गयी. सुंदर तो हो ही अब और सुंदर दिख रही हो. देखना आज से तुम चाचा के कमरे में सोने जाओगी.”
“ प्रमिला तुम कभी कभी बहुत ज़्यादा बोलती हो, मैं मनीष के कमरे में क्यों सोऊंगी? “ मैं कुछ नाराज़ सी हो गयी.
“ क्योंकि तुम उसकी पत्नी हो. “ मेरी नाराज़गी का उसपर कोई असर नहीं पड़ा. उसने बहुत कुछ कहा जिसे सुनकर मुझे ठंडा पसीना आने लगा.

जैसे भाग्य ने मेरे लिये सब कुछ तय कर रखा था. प्रमिला तो सिर्फ़ एक साधन थी जिसके मुख से भविष्यवाणी हो रही थी.
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                                      छह
ससुराल में हमारा घर बहुत बड़ा था. बारह कमरे का घर. छत अच्छे किस्म के टिन से बड़े ही कलात्मक ढंग से बना हुआ था. बड़ी बड़ी खिड़कियों में शीशे लगे हुए थे. एक बड़ा सा बंद बरामदा, चारों तरफ़ शीशे लगे हुए. ठंड के मौसम में धूप जब छनकर आती तो मेरी सास सुबह का गुनगुना धूप वहीं पर अपनी आराम कुर्सी पर लेट कर लिया करती थी. उसके लिये चाय नाश्ता मैं वहीं पर देती. हमारा घर राजमार्ग के किनारे था, अत: रास्ते में आने-जाने वाले लोग साफ़ नज़र आते थे. मेरी सास की नज़र से कोई नहीं बचता. जब कभी मेरे पिता की गाड़ी उधर से गुजर जाती तो उस दिन मेरी शामत आ जाती. मेरी सास दिन भर मुझे गाली देती रहती. मैं उसकी नाराज़गी समझ गयी थी क्योंकि प्रेमा ने कहा था कि मेरी सास कभी मेरे पिता पर फिदा थी और मेरे पिता ने उसे ठुकरा दिया था. प्रेमा ही ने मुझे बताया था कि मेरी जननी और मेरी सास कभी सहेली हुआ करती थीं. इधर मेरी शादी के बाद मेरी जननी कभी मुझे देखने नहीं आयी थी. लेकिन मेरी नयी मां हज़ार पाबंदी के बावजूद मेरी बहनों को लेकर मुझसे चोरी छिपे मिल लेती थी.
बरामदे में एक बड़ी सी पुरानी घड़ी थी जिसे दीवार पर टांग दिया गया था. उसका पेंडुलम हर एक घंटे में टोंग-टोंग कर बजता रहता. मेरी सास अपनी और मेरी दिनचर्या इसी घड़ी के सहारे तय करती. यह घड़ी एक बड़े सेल से चलती और बिल्कुल सही समय दिखाती... मैंने इसे कभी रुकते हुए नहीं देखा.
इस घर में आये हुए मुझे बारह साल हो गये जिस दौरान मेरे जीवन के दो अभिन्न अंग मुझसे जुड़ गये – यह बड़ी घड़ी और लीची का पेड़. न घड़ी कभी रुकी और न ही कभी मेरे दिन फिरे. अलबत्ता लीची हर साल फलता रहा. हम तीनों सिर्फ़ देने के लिये ही थे, बदले में हमें कुछ नहीं मिलता जबकि हम तीनों को सिर्फ़ अपने जीवन के हिसाब से ख़ुराक चाहिये थी. मुझे पेट भर खाना, तन ढँकने को कपड़ा; वृक्ष को खाद और पानी; घड़ी को अच्छी सेल. हम तीनों में घड़ी की ही नसीब अच्छी थी क्योंकि वह प्राकृतिक वस्तु नहीं था. इंसान चाहे कितना ही स्वार्थी क्यों न हो, आदमी द्वारा बनायी हुई चीज़ों की देखभाल उसे करनी ही पड़ती है. प्राकृतिक चीज़ें अपना खुराक प्रकृति से ले लेती हैं और इंसान अपना जुगाड़ चाहे जैसे भी हो कर लेता है.
मैं सुबह शाम बहुत सारा खाना बनाती क्योंकि बच्चे बड़े हो रहे थे और उनका पेट भी बड़ा हो रहा था. मैं सबको खिलाकर तब खाती. मेरी सास मेरी एक-एक कौर गिनती. मैं जब आटे की रोटी बनाती, एक छुपाकर रख देती थी जिसे घास काटने जाते हुए रास्ते में खाकर पानी पी लेती.
मेरी एक-एक पल की ज़िंदगी रफ़्तार पकड़ने लगी. सहेलियों की मदद से मैंने घास काटना, बोझ बनाना सीख लिया. जीवन के छोटे मोटे गुर भी सीखने लगी. कुछ सखियों ने बतलाया, कुछ मैंने अनुभव से सीखा. घास काटते काटते मैं लकड़ी भी काटने लगी और केरोसीन स्टोव पर न पकाकर मैं चूल्हे पर भी पकाने लगी. स्टोव मैं सिर्फ़ चाय बनाने के लिये और खाना गरम करने के लिये रखती.
मनीष का मेरे साथ पति का रवैया नहीं था. मैं उसके लिये सिर्फ़ एक भोग्या थी, उसके शारीरिक सुख का साधन थी. जब मुझे मासिक होता तब मैं देखती कि वह बेहद हिंसक बन जाता. वह अप्राकृतिक ढंग से मुझसे पेश आता. मुझे उससे घृणा होने लगी.
मुझे पेट का दर्द शुरु हो गया था. मैंने घरेलू दवा की मगर कोई राहत नहीं मिल रही थी. अत: मैं गांव के डिस्पेंसरी में डॉक्टर के पास गयी. जाने से पहले मैंने उसके बक्से से एक नयी कंघी लेकर अपना बाल संवार लिया. शाम को जब वह घर आया तो उसने कंघी मेज़ पर रखी देख ली. उसने मुझसे कुछ पूछे बिना ही मेरी चोटी पकड़कर ज़ोर से खींचकर मुझे ज़मीन पर पटक दिया. मेरे चेहरे पर इतने ज़ोर से थप्पड़ मारा कि चेहरा नीला पड़ गया. उसने मुझे भद्दी गाली दी – “ तुम्हें बाहर कोई आदमी नहीं मिलता जो तुम्हें कंघी दे सके. मेरी चीज़ें अगर दुबारा छूओगी तो हाथ तोड़ दूंगा....कंगाल की औलाद कहीं की...”
मैं पेट दर्द और बाल खींचने के दर्द से दोहरी हो गयी. लेकिन हाय री किस्मत ! मुझे तो एक-एक पल जीना था. समय के साथ-साथ चोट खाते खाते मेरा स्त्रीत्व भी जागने लगा था. मैं अपमानित महसूस करने लगी थी जबकि इससे पहले मैं अपनी नियति समझ कर हर दु:ख आंसू पीकर झेल लेती थी.
खुली हवा और शारीरिक श्रम से मेरा यौवन निखर गया. पच्चीस साल की पूर्ण युवती थी, मेरे समान सुंदरी गांव में कोई भी औरत नहीं थी. सभी मर्द मनीष के भाग्य पर ईर्ष्या करते और मनीष नित्य प्रतिदिन मेरा अपमान करता रहता. कभी रसोईघर में मुझे अकेला पाकर मेरा कपड़ा ऊपर कर देता. एक औरत के लिये इससे बड़ा दु:ख और क्या हो सकता है कि उसका पति ही उसका इस प्रकार अपमान करे. मैं किसीसे ये बातें नहीं बता सकती थी..अपनी सहेलियों से भी नहीं क्योंकि पूरे गांव में बात फैल सकती थी.
कहते हैं कि सबके अच्छे और बुरे दिन आते हैं. मेरे बुरे दिन से ही अच्छे दिन निकलने लगे.
अगस्त का महीना. ईख की कटनी शुरु हो गयी थी. अत: हम सभी औरतें मुँह अँधेरे ही ईख की पत्तियां चुनकर घर आ जातीं. फिर चाय नाश्ता करके लकड़ियां काटने पों बोंजे के घने जंगल कि ओर चली जातीं.
धरती और औरत एक जैसी ही होती हैं – भरी बरसात के बाद जब धूप निकल आती है तो धरती सद्य:स्नाता की तरह निखर जाती है. औरत भी तीन दिन के रजस्राव के बाद प्रथम स्नान करके जब आती है उसके सौंदर्य में अद्भुत निखार देखने को मिलता है.
लगातार सप्ताह भर बारिश के कारण हम कोई भी बाहर घास या लकड़ी के लिये नहीं थीं. उसी दौरान मेरा रजस्राव शुरु हो गया था. जिस दिन बरसात रुकी उसी दिन मैं भी नहाकर, बाल खुली रखकर सखियों के साथ लकड़ी के लिये जंगल की ओर चल पड़ी. लीला ने कहा “ अहिल्या बाल खुला मत छोड़, भूत प्रेत के छूने का डर रहता है. अभी तुम सद्य:स्नाता हो. “
“ मैं इतना बाल , वह भी भीगे, कैसे बांध सकती हूँ. मेरे बाल तो जल्दी सूखते भी नहीं हैं.
“ कुछ भी करो, बांध लो “
अत: मैंने पतली चुनरी से अपने बाल बांध लिये.
जंगल में प्रवेश करते ही औरतें लकड़ी काटने के लिये इधर – उधर बिखर गयीं. लीला ने हाथ में रस्सी सम्भालकर दूसरी तरफ़ जाते हुए मुझसे कहा – “ लीला मैं पश्चिम की तरफ जाती हूँ, तुम इधर नदी के पास लकड़ी काटो...लेकिन अधिक दूर मत जाना. जंगल में आवाज़ लगाना ख़तरनाक है. हम सभी इस नदी के किनारे मिलेंगे. “
मैं जंगल में नदी के किनारे पहली बार आयी थी. पहाड़ से उतरती नदी. बरसात से नदी भरी हुई थी. कल-कल की मोहक आवाज़ मन को मुग्ध कर रहा था. मैं नदी के किनारे किनारे कुछ दूर तक गयी. मुझे पतली और लम्बी लम्बी सीधी, चिकनी चीनी अमरूद के पेड़ मिले. मैं खुश हो गयी और जल्दी जल्दी लकड़ी काटने लगी. आधे घंटे में मेरा ढोने लायक बोझ तैयार हो गया. मैंने उसे खूब कसकर बांध के एक पेड़ के किनारे लगा दिया. मैं अपनी सहेली को आवाज़ देने ही वाली थी कि मुझे याद आया उसने जंगल में आवाज़ देने से मना किया था. मैंने इधर-उधर देखा. इतने में मुझे लकड़ी काटने की आवाज़ सुनाई दी. निश्चिंत होकर मैं नदी के किनारे एक पत्थर पर बैठ गयी और अपने बाल खोलकर पीठ पर फैला दी. पेड़ों के बीच से धूप छनकर पिघली, पतली सोने की लकीर सी पत्तों पर पड़ रही थी. मैंने अपना पैर पानी में डाला और इधर-उधर देखने लगी. पक्षियों की चहचहाहट मन को मोह रहा था. दूर समुद्र का नीला आंचल फैला था. मदिर बहती हवा मेरे माथे पर आये पसीने की बूँदों ठण्डक पहुँचा रही थी. एक जादुई सा वातावरण मेरे चारों ओर फैला था. मुझे हल्की झपकी लग गयी.
न जाने कितनी देर हो गयी थी ! किसी मर्दानी आवाज़ ने मुझे जगा दिया.
Quellejolie femme - desse de jingle “ अर्थात कितनी सुंदर औरत – वन देवी.
मैंने आंखें खोल दीं. मेरे सामने हाथ में बंदूक लिये जंगल का गार्ड खड़ा था. मेरा रंग पीला पड़ गया, गला सूख कर चिपक गया. मैंने मन ही मन कहा हे भगवान अब मैं क्या करूँ ‘.  जल्दी से उठने की कोशिश में मेरा पैर फिसला और मैं नदी में जा गिरी. नदी गहरी नहीं थी लेकिन बरसात का पानी भरा हुआ था. मैं पानी से निकलने की कोशिश कर ही रही थी कि उसने अपना हाथ बढाकर मुझे किनारे खींच लिया. मनीष के अलावा किसी और पुरुष ने अब तक मेरा हाथ नहीं पकड़ा था. लेकिन जब इस गार्ड ने मेरा हाथ छुआ तो मेरे शरीर में एक झटका सा लगा.  पहले तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि यह स्थिति आएगी और दूसरी बात यह कि मनीष ने हज़ारों बार मेरा हाथ पकड़ा था, खींचा था लेकिन मुझे कोई भी अनुभूति नहीं हुई थी.
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. मैं कभी किसी पराये मर्द के सामने न खड़ी हुई थी और न बात की थी. उसने मुझसे कहा “ तुम यहाँ अकेली क्या कर रही हो ? “ मैंने हकलाते हुए कहा “ मैं अकेली नहीं हूँ, मेरी सहेलियाँ भी साथ हैं और भीतर लकड़ी काट रही हैं “.
“ अच्छा !! तुम लोग लकड़ी काट रही हो ? आज पकड़ी गयी. क्या तुम लोगों को पता नहीं यहाँ लकड़ी काटना मना है...जुर्माना देना पड़ेगा ? तुम्हारी लकड़ी कहाँ है ?
मैंने इशारे से पेड़ की ओर दिखा दिया. उसने मुस्कुराकर कहा “ अब तुम मेरे कब्जे में हो. कहाँ हैं तुम्हारी सहेलियाँ ?”
शायद लीला ने गार्ड को देख लिया था और उसने सब औरतों को आगाह कर दिया था. सभी अपनी अपनी लकड़ी छुपाकर स्वयं भी छुप गयीं.
गार्ड ने इधर-उधर देखा मगर कोई आवाज़ न पाकर मुझसे कहा “ तुम्हारी कटनी मुझे दो. “
मैं रुआँसू हो गयी. अगर कटनी गार्ड ले लेगा तो मेरी सास मेरा न जाने क्या हाल करेगी. कटनी जहाँ मैं बैठी थी वहीं पड़ी थी. मैंने उसे दिया नहीं. गार्ड मुझे खूब गहरी दृष्टि से देख रहा था. आसपास कोई आवाज़ भी नहीं सुनाई दे रही थी. मुझे डर लगने लगा.
गार्ड ने कहा “ लगता है तुम अकेली हो. क्या तुम्हें मालूम नहीं कि सरकारी जंगल में लकड़ी काटना मना है ?
मैंने इंकार में सिर हिला दिया.
“ क्या नाम है तुम्हारा ?“
“ अहिल्या “
“ कहाँ रहती हो ?
“ लालमाटी “
“ अच्छा तुम ही बताओ मैं क्या जुर्माना लिख दूँ “
मैं चुप रही. बहुत देर तक मैं चुप रही और वह मुझे एकटक देखता रहा.
मैं मन ही मन लीला को गाली दे रही थी कि मुझे कहाँ फँसा दिया. गार्ड से ज़्यादा मुझे मेरी सास और मनीष का डर लग रहा था. अत: मैंने कहा –
“ मुझे जाने दें, अब मैं कभी लकड़ी काटने नहीं आऊंगी “
उसने मेरी बात पर हँसकर कहा “ सच कह रही हो ?
“ हाँ, मुझे नहीं मालूम था कि इधर लकड़ी काटना मना है “
“ तुम बहुत भोली हो “
“ मैं जाना चाहती हूँ “
“ मैं तुम्हे जाने दूंगा इस शर्त पर कि तुम इस पत्थर पर बैठो और कुछ देर मुझसे बातें करो “
 मैं एक पत्थर पर बैठ गयी लेकिन मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था और मेरा ध्यान घर की तरफ़ था. मैं सोच रही थी कि अगर सारी औरतें मुझे छोड़ कर चली जाएँ तो मैं अकेली कैसे घर जाऊंगी,और सास को क्या जवाब दूंगी.
गार्ड भी एक पत्थर पर बैठ गया लेकिन अपना बंदूक कंधे पर टांगे ही रखा. उसने कहा  “ तुम्हारा पति लकड़ी नहीं लाता है ?
मैंने कहा “ वह रोटी, बर्तन और बहुत सारा घरेलू सामान बेचता है. सुबह से निकलकर शाम को ही घर आता है. “
“ तुम्हारे घर में कौन कौन रहता है ?”
मैंने अपने घर के लोगों का पूरा वर्णन कर दिया. सिर्फ़ इतना नहीं बताया कि मेरे पति और मेरी सास का स्वभाव कैसा है.
मैं खड़ी हो गयी – “ अब मैं जाऊँ ?
उसने मेरा हाथ पकड़कर फिर से पत्थर पर बैठा दिया. उसके छूने से मुझे बड़ा ही अजीब सा अहसास हुआ जैसा कि मुझे पहले कभी भी नहीं हुआ था.
मैं नहीं जानती थी कि गार्ड के मन में मेरे प्रति दया का भाव आया या......
उसने मुझसे कहा –
“ तुम रोज़ लकड़ी काट सकती हो और अपनी सहेलियों को भी कह सकती हो लेकिन याद रखना सीधी चिकनी लकड़ी और टेकोमा की लकड़ी मत काटना “.
“ मैं जा रहा हूँ, अपनी सहेलियों को बुला सकती हो, उधर झाड़ी में छुपी हुई हैं.” उसने हाथ के इशारे से घनी झाड़ियों की ओर दिखाया और नदी के किनारे किनारे घने जंगल में गुम हो गया.
एक बुलबुल की क्वी क्वी आवाज़ से जैसे मेरी तंद्रा टूटी. मैं धीरे-धीरे और डरते-डरते घनी झाड़ियों की ओर बढी. लीला को आवाज़ देते ही सभी औरतें एक साथ निकल आयीं.
“ क्या हुआ अहिल्या ? वह गया ? तुम्हारी कटनी तो नहीं छीन ली नासपिट्टा ने ?
“ एक साथ इतना सवाल करोगी तो किसका उत्तर दूँ “
“ लगता है तुमने उसपर जादू कर दिया है “ – एक सहेली ने मेरे हाथ में कटनी देखकर कहा.
“ जल्दी चलो घर, धूप सर पर चढ़ आया है. मेरी सास आज मेरी खाल खींच लेगी. “
समय का ध्यान आते ही सभी औरतों ने अपनी अपनी छुपायी हुई लकड़ी निकाली, गठरी बाँधी और हम घर की ओर चल पड़ीं. रास्ते में कोई बाधा नहीं आयी लेकिन मेरा दिल जोर-जोर से लगातार धड़क रहा था. एक तो घर का डर समाया हुआ था, दूसरा गार्ड की बातें सोचकर.
यह दिन मेरे जीवन का एक अच्छा दिन था. घर आयी तो सास घर में नहीं थी.                 

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दस 
मैं लगभग दो महीने के बाद घर से बाहर निकली. मन में न जाने कैसा कैसा ख्याल आ रहा था, जैसे मैं लकड़ी लेने के लिये न जा कर सिर्फ राम से मिलने जा रही हूँ. इन दो महीनों में वह चौबीसों घण्टे मेरे दिल दिमाग पर छाया रहा था लेकिन मेरे पास इतनी फुरसत नहीं होती थी कि मैं चैन से बैठकर उसके बारे में दो पल सोच सकूँ. घर का काम खत्म ही नहीं होता था. रात में थककर जब मैं अपने कमरे में जाती तो पति का सान्निध्य मुझे कुचल कर रख देता.
ऑक्टोबर का महीना. बहुत सारे खेतों में ईख कट गया था और तेज़ हवा मुक्त होकर बह रही थी, उस चंचल गोरी की तरह जो अभी-अभी जवान होकर खुले मैदान में दौड़ रही हो, निश्चिंत, निडर मानो दुनिया में खुशियों के सिवाय और कुछ भी नहीं है.
खुली हवा में खड़ी होकर मैंने गहरी सांस ली और चारों ओर अपनी दृश्टि दौड़ाई. हर तरफ बड़े बड़े खेत. एक खुला खुला मैदान सा दिख रहा था. ईख के सूखे पीले पत्ते कालीन की तरह बिखरे हुए थे. कहीं-कहीं खेतों में काम भी हो रहा था. औरतें सूखे पत्ते बांधकर लाली बना रही थीं ताकि कटे हुए ईख की जड़ से नयी कोपलें आसानी से निकल आये.
लीला मेरे पास आकर खड़ी हो गयी. “ क्या देख रही हो ? “ उसकी बात ने मेरी तंद्रा भंग कर दी.
“ पता नहीं राम मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा ! “
“ चलो जल्दी. खड़ी खड़ी सोचती रहोगी तो बेचारे राम का और क्या हो सकता है....! दौड़ लगाओ, हमारी झुण्ड की औरतें नहीं दिख रही हैं. पता नहीं आज कौन से रास्ते वे जाएंगी “
हम दोनों जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाने लगीं.एक मोड़ पर देखा कि औरतें हमारी राह देख रही हैं. शोभा हमारी झुण्ड में सबसे बड़ी थी. उसने मुझसे कहा –
“ अहिल्या ! आज हम सभी औरतें सालाज़ी की तरफ जा रही हैं. उधर कपूर का अच्छा जंगल है, हमें आने में देर हो सकती है. “ उसने एक लाल रीबन अपनी चोटी से खोलकर पेड़ की जड़ में घास में छुपा दिया और कहा –
“ अगर तुम पहले आओगी तो यह रीबन लेकर घर चली जाना और अगर हम पहले आ गयी तो तुम्हारा इंतज़ार करेंगी “
इतने में मैंने राम को आते देख लिया. सारी औरतें अपनी राह चल दीं. लीला भी मुझे चिकोटी काटकर उन लोगों से जा मिली.
राम मेरे सामने आकर खड़ा हो गया. हम एक दूसरे को अपलक देखते रहे. मेरे मन में कहने के लिये बातें समुद्र सी हिलोरें ले रही थी लेकिन उसे सामने पाकर सारे शब्द बर्फ बन गये. उसकी तरफ भी शायद यही हाल था. तभी तो वह चुप था. नीचे ढलान में ईख से भरी हुई एक लॉरी की आवाज़ से हमारी तंद्रा भंग हुई. राम ने बड़े प्यार और तरलता से कहा – “ अहि !“
जब मैंने उससे नज़रें मिलायी तो जैसे सारी कायनात का दर्द उसकी आंखों में समाया हुआ था. मुझसे बोला “ चलो चलते हैं. मैं तुम्हें आज स्वर्ग में ले चलूंगा “
वह मुझसे बहुत सारी बातें करता रहा और मैं धड़कते दिल से उसकी बातें सुनती रही. जब उसने मेरा हाथ पकड़कर कुछ ऊंचाई पर चढ़ाया तब कहीं जाकर मैं अपनी स्वाभाविक स्थिति में आयी. कुछ चढ़ाई चढ़कर हम फीडर कनाल के किनारे किनारे चलने लगे. मैंने राम को सादे कपड़े में देखकर कहा – “ आप यूनिफॉर्म नहीं पहने हैं ?
“ लीला ने मुझसे वादा किया था कि आज जरूर तुम्हें यहाँ लायगी इसीलिये आज मैंने छुट्टी ले ली है “             
“ अगर मैं नहीं आती तो ?
“ तो क्या होता, इसी तरह रोज़ तुम्हारा इंतज़ार करता रहता “
उसने मुझे बाहों में भरकर चूम लिया.
“ छोड़ो भी; अगर कोई आ गया तो ?
“ कोई नहीं आयेगा. तुम जानती हो हम कहाँ हैं – 32 ड्रॉप्स की तरफ. देख नहीं रही हो जंगल कितना घना है “
राम के साथ सच में मुझे पता ही नहीं चला हम कहाँ आ गये थे. मैंने अपनी नज़र चारों तरफ दौड़ाई. जंगल इतना घना कि कहीं कहीं दिन में भी घुप्प अँधेरा था. कनाल बहुत सारे मोड़ से होकर गुजर रहा था. कहीं तो एकदम संकरा हो जाता था. मैं कुछ डर सी गयी और एक मोड़ पर ठिठक गयी.
राम ने हाथ पकड़कर कहा – “ डरो नहीं अहि ! “
“ हम कहाँ जा रहे हैं “ कुछ आशंकित होकर मैंने पूछा.
“ मैंने तुम्हें कहा था न स्वर्ग “
वह मेरा हाथ थामे थोड़ी चढ़ाई चढ़ने लगा, मैं सम्मोहित सी उसके साथ चलने लगी. झाड़ियों में कुछ आहट सी हुई. मैं डर कर राम से लिपट गयी. उसने हँसकर मेरे कंधे थपथपाकर कहा – “ उधर देखो, एक हिरन “ मैंने देखाएक बहुत ही सुंदर हिरन हमें अपनी बड़ी बड़ी पनीली आंखों से देख रहा था. उसके सर पर चार सींग थे और वह जवान, बहुत ही सुंदर जीव था.
मैंने पहली बार इस जंगल में हिरन देखा. राम ने कहा – “ शिकार का मौसम बंद हो गया है तभी तुम इसे देख रही हो. लेकिन इधर इस जगह पर शिकार करना मना है. इसीलिये तुम्हे इधर बहुत सारे हिरन के झुण्ड देखने को   मिलेंगे “
“ क्या इधर लोग नहीं आते हैं ?  यहाँ रास्ता भी तो नहीं है “
“ लोग 32 ड्रॉप्स के पार नहीं आते “
बातें करते करते हम बहुत ही घने जंगल में आ गये. पास ही कहीं से झरने की आवाज़ आ रही थी. नदी के कल कल की आवाज़ से मुझे प्यास लग गयी थी. वैसे भी चलते चलते काफी गरमी लग रही थी.
“ थोड़ा सब्र करो, मैं तुम्हें एक जगह दिखाता हूँ – अपनी आँखें बंद करो “
मैंने अपनी आंखें बंद की. राम ने मुझे कुछ कदम चलाया, फिर कहा “ अब अपनी आंखें खोलो ”
जब मैंने आंखें खोलीं तो मेरा मुँह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया. मेरे सामने एक जलप्रपात था जो पूरे वेग से ऊपर से गिर रहा था. चाँदी सा तरल पानी – मैं नीचे उतर गयी और उसके नीचे आ गयी. पानी के छीटों से मेरा पूरा बदन भीग गया. मैंने खूब पानी पिया और अपनी लटों को खोल दिया. मेरे बाल बहुत लम्बे और घने थे. पानी के छींटे पड़ने पर वे और भी लम्बे दिखने लगे. मैं पानी से खेलने लगी. यह भूल गयी कि मैं कौन हूँ और कोई मुझे एकटक देख रहा है. मैं तो झरने के पानी में मिलकर उसके साथ एकाकार हो रही थी. ऊपर से झरने का पानी गिर रहा था, इधर मेरे मन में प्यार का झरना फूट पड़ा था. उस वक़्त सिर्फ मैं थी, प्रकृति थी, झरना था और मेरा अमर प्रेमी था जो मुझे जन्मों जन्मों से इसी प्रकार निहार रहा था.
“ अहि, बस भी करो, चलो बहुत भीग गयी हो .“ राम ने अपना हाथ बढ़ाकर मुझे अपनी तरफ खींच लिया.
“ अब चलो मैं तुम्हें एक और जगह ले चलता हूँ “
कुछ और घने जंगल में हम चले. लगभग दस मिनट के बाद मैंने एक बहुत ही सुंदर कुटिया देखी. लकड़ी और पत्तों की बनी हुई. हल्का-हल्का अँधेरा. कभी घने पेड़ों के बीच से सूर्य की किरणों की पतली रेखा दिख जाती थी, लेकिन हवा के चलते ही वे गायब हो जातीं.
मैंने राम से कहा इस बीहड़ जंगलमें किसकी कुटिया है. राम ने उसका दरवाजा खोलकर भीतर खींच लिया. “ यह हमारा है. इन दो महीनों में मैंने तुम्हारे लिये तैयार किया था. “
मेरी आंखें जब अंधेरे की अभ्यस्त हो गयीं तो मैंने देखा भीतर ज़मीन पर जंगली फूलों की कालीन बिछी हुई है – बहुत सारा फूल जैसे कोई शैया हो. राम ने कहा – “ ये सारे फूल मैंने तुम्हारी याद में चुन चुन कर रखा है . “
उसने मेरे भीगे हुए सारे कपड़े एक एक कर उतार दिये और कुटिया में टांग दिया. मैंने कोई आपत्ति नहीं की. उसने मुझे अपनी बाँहों में उठाकर फूलों भरी ज़मीन पर लिटा दिया और अपने भी सारे वस्त्र उतार कर मेरेबगलमें लेट गया. कुटिया में अँधेरा था. हम एक दूसरे को सिर्फ हाथों से और एक दूसरे की इंद्रियों से महसूस कर सकते थे. फूलों की खुशबू और राम के हाथों का कोमल स्पर्श मेरे अंग-अंग में अमृत घोल रहा था. मेरे मन की जो प्यास मेरे लिये अजनबी थी उसका परिचय मुझे होने लगा. राम ने मेरे कानों में मधुर रस घोलते हुए कहा –
“ अहि, मैं आदम और तुम हव्वा हो. तुम अपने आपको भूलकर मेरी बाँहों में समा जाओ. आज हम मिलकर ऐसे एक हो जाएँ जैसे फूल और खुशबू. अपनी रसना को मेरी रसना से मिलने दो और अपने अंगों को मेरे अंगों में पिघलने दो...कुछ मत बोलो...इस घड़ी को प्रेम रस में डूब जाने दो. “
मैं प्रेम रस में पिघलकर उसकी बाँहों में बहने लगी. मेरे शरीर में इतना आनंद था, इसका आभास मुझे कभी नहीं हुआ था. राम जैसे मेरे एक एक अंग से प्रेमरस की धारा बहा रहा था और मैं आनंद विभोर हो रही थी. मेरा मन-प्राण  तृप्त हो रहा था और उस क्षण मेरे शरीर में मानो सहस्र कमल खिल गये. कृतार्थ होकर मैंने राम को जोर से भींच लिया और धरती आकाश स्थिर हो गये, हवा थम गयी, नदी झरना बहना भूलकर हमारे साथ पूर्णानंद की स्थिति में आ गये.

मैं अपनी सहेलियों का अहसान कभी नहीं भूल सकती. दोपहर हो गया था. सूरज पश्चिम की राह पर था. जब हम वापस आये तो सारी औरतें पेड़ की छाया में बैठी हमारी राह देख रही थीं. मुझे देखते ही सभी चहक उठी ‌‌-
“ अहिल्या ! हमारा तो प्राण ही सूख रहा था कि हम तुम्हे ढूँढ़ने कहाँ जाएँ. तुम्हे छोड़कर घर जाने का सवाल ही नहीं उठता. फिर सोचा था कि कहीं तुम चली तो नहीं गयी, लेकिन रीबन तो अपनी जगह पर ही है “
मुझसे पहले राम ने शोभा को जवाब दिया – “ तुम्हारी सहेली मेरी हिफ़ाजत में थी. भला मैं तुम लोगों को कैसे निराश करता. लो तुम्हारी सहेली अब तुम लोगों की जिम्मेदारी “
उसने मेरी लकड़ी की गठरी ज़मीन पर रख दी और चला गया. हमें एक दूसरे को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी. हमारे मन अब एक दूसरे से बातें कर रहे थे.
जब मैं घर आयी तो मेरे अंग अंग से खुशी झलक रही थी. मैंने बाथरूम में घुसकर नल खोल दिया. अपने सारे कपड़े उतारकर मैं आंखें बंद करके उस पल का आनंद लेने लगी और मन ही मन कह रही थी “ हाँ मैं औरत हूँ.मैं भी प्यार के काबिल हूँ, मुझे भी प्यार करने वाला कोई है. मैं उपेक्षित नहीं हूँ. इस धरती में मेरी भी अहमियत है...” और मेरे मुँह से कई बार राम ...राम  निकल गया.
मैं ठण्डा पानी अपने अंगों पर डालने लगी. मेरा शरीर तपने लगा. जी चाह रहा था कि राम आ जाये और मुझे फिर से अपनी बाँहों में लेकर सौ बार रमन करे. तभी माँ माँ की आवाज़ आयी. मैं जल्दी से कपड़े पहन कर बाहर आ गयी. मेरी सास ने मेरे बेटे को मुझे बुलाने के लिये भेजा था. उसकी कोई सहेली आयी थी, चाय बनाना था.
उस दिन मैंने अपने बालों में एक फूल लगाया और गहरी लाल बिंदी लगायी. पहले मैं हल्के पीले रंग के सिंदूर का टीका लगाती थी लेकिन अब मेरे प्यार का रंग गहरा होकर मेरे माथे की शोभा बढ़ा रही थी.   
रात में मनीष मेरी लाल बिंदी देखकर साँड़ की तरह भड़क गया. मेरे बालों का फूल नोचकर ज़मीन पर फेंक पैर से कुचल दिया. वह शराब पीता था मगर बहुत कम. फिर भी रोज़ उस पर हल्का-हल्का नशा रहता था. इस स्थिति में वह ज़्यादा ख़तरनाक होता था. वह मेरे शरीर से सारे कपड़े नोंच देता था. मुझे प्यार के शब्द न बोलकर अश्लील गाली दे देकर मेरे हर अंग को दांत से काटता था. कुछ दिनों से मैंने देखा था कि वह जल्दी ही स्खलित हो जाता था. उसके बाद मेरे साथ अप्राकृतिक ढंग से पेश आता था. मैं विरोध करती तो मेरे बालों को अपने हाथ में लेकर मुझे मारता. इतना दर्द होता कि कभी कभी मैं बेहोश हो जाती. वह मेरे बेहोश शरीर को भी नहीं बख्शता. सुबह मेरा शरीर बुरी तरह टूटता.
इधर राम के साथ जंगल में, जो मेरे लिये एक उपवन था, मैं रमन करती. मैं दिन में प्रेम का अमृत रस पीती और रात में अपने पति के वासना का विष पीती. मैं एक ही शरीर में दो औरत की ज़िंदगी जी रही थी. इसी विरोधाभास ने मुझे क्या से क्या बना दिया !!

(कुंती मुकर्जी के शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ‘अहिल्या’ से)

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...