Tuesday, 20 July 2021

विचार अब सार्वभौमिक नहीं रहे


कहने और सहने को इस मुकाम पर हम घरबन्दों और घेराबन्दी के पास बहुत समय है. बिताये नहीं बीतता, फिर भी इस अहसास से छुटकारा नहीं है कि यह समय अपर्याप्त है, वह भरा पूरा नहीं है, इसमें बहुत कमियां हैं, हंसी-ठठ्ठा, मेल-मुलाकात, बहरा-मुबाहिसे, बातचीत, गप-सड़ाका आदि नहीं है, जब तक वह सब और इसी तरह का बहुत कुछ न हो तब तक समय पर्याप्त महसूस नहीं होता है, खालीपन से भरे इस समय में मन हो तो किसी के पास मिलने मिलकर बैठने, गपियाने नहीं जा सकते हैं. कहीं जाने करने से पहले सोचना पड़ता है कि ऐसा करने से या ने में कोई खतरा तो नहीं है, जो बहुत सामान्य है, रोजमर्श का है उसको लेकर भी शंका रहती है. समय मानो सेनेटाइज किया जाकर कई बार, दिन में बीसियों बार सैनेटाइज किया जाकर, जैसे सा जाता है, वह खुद अपने पर शंकालु हो उठता सिकुड़ सा वह खुद अपने ही लिये खतरनाक हो सकता है, अगर उसने कोई असावधानी बरतो.

 

सावधान होकर भी समय अपर्याप्त लगता है तो इसलिए कि लगातार सावधानी अपने पर ही चौकसी बन जाती है और प उससे सामान्यता अगर गायब नहीं बहुत कम हो जाती है. रोजमर्रा की जिन्दगी कुछ अधिक हो नियमित, यांत्रिक हो गयी है, उसमें एक नया फल या ताजो सब्जी भी एक घटना का रूप ले लेती है. दिलचस्प यह है कि इस अपर्याप्त समय में जीवन, जैसे-तैसे, फिर भी अपनी गति से चलता जाता हैः उसमें मोह-मत्सर, दूसरों के लिए चिन्ता और सहायता, सत्ता और बाजार को, मीडिया की निर्ममता और नीचता, मुनाफाखोरी, चीजों को बहुतायत, बाज साथियों का चिर जागरूक टुच्चापन आदि सब बदस्तूर चलते रहते हैं. समय न उनकी व्याप्ति कम कर पाया, न ही अभद्रता के लिए उत्साह को स्थगित किया जा सका, कई बार यह सोचकर दहशत होती है कि इतने भयानक और आतंककारी अनुभवों से गुजरने के बाद भी जो टुच्चे थे वे वैसे ही बने रहेंगे, जो दूसरों का शोषण कर अपना पुरुषार्थ प्रगट करते हैं वे वैसा ही करते रहेंगे, अन्याय-हिंसा-हत्या- बलात्कार सिर्फ कम नहीं होंगे और वह जायेंगे. लुटेरे लूटते रहेंगे और भगेड़ी अपनी नीचता के सूअर बाड़े में अपनी मण्डली जमाते रहेगे यह विडम्बना ही है कि प्रकोप के कारण घिर आयी कालछाया में भी मानवीयता को स्थगित करने वाले तत्वों और शक्तियों को रोक-थाम नहीं हो पायी है.

 

देर-सबेर जब हम इस प्रकोप से मुक्त होकर निकलेंगे तो शायद हमारी इसकी पहचान धुंधला चुकी होगी कि हम इस कठिन समय से गुजरकर अधिक मानवीय अधिक संवेदनशील अधिक सहायक होकर नहीं निकल पाये हैं. किसने सोचा था या कल्पना की थी कि आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सा होना की गालिब-उक्ति अब भी चरितार्थ होती रहेगी।

 

पिछड़ता विचार

 

रचना आगे चलती है और अकसर आलोचना थोड़ा पीछे चलती है. विचार और विचारधाराएं आलोचना से भी पीछे चलती हैं. रचना जिस गति से बदलती है, आलोचना नहीं और विचार तो बहुत धीरे बदलता है नयी तकनालजी ने और उसे पोसने वाली मानसिकता ने गति बहुत तेज कर दी है. इस तेज गति से हमकदम हो सकता रचना के लिए भी कठिन हो रहा है. आलोचना इस आपा-धापी में अधीर भले लगे पर पा रही है. विचार तो निश्चय ही इस भागते अधीर समय में पञ्चात्पद है।

 

यह बात पहले भी कही जा चुकी है कि हमारे समय में विचार मात्र की गति शिथिल हो गया है. अभी हाल तक विचार के क्षेत्र में फ्रेंच चिंतक अग्रणी माने जाते थे और थे भी, पर यह चिन्तन, अब चिन्तन पर ही चिन्तन है: चिन्तन उसी के बारे में चिन्तित और जिज्ञासु है जो चिन्तन रचता है, उसके बारे में कम जो बाहर संसार में है या हो रहा है, स्वयं चिन्तन की भाषा अब आत्मसंदर्भित और लगातार दुरूह हो रही है. लगता है यह चिन्तन को आत्मरति का समय है. इस समय वह ज्यादातर उस सचाई की चीर-फाड़ या विशेषण में लगा है जो चिन्तन द्वारा रची जाती है.

 

अगर, कट्टर इस्लामवाद, कट्टर हिन्दुत्व कट्टर नस्लवाद आदि को विचारधारा न जाना जाये, क्योंकि उनका भूगोल सीमित है और वे विश्वव्यापी वृत्तियां नहीं है, समय विचारधाराओं के स्थगन का समय है. दशकों से चली आ रही विचारधाराएं हैं पर उनमें न तो नयी चुनौतियों की शिनाख्त है और न ही तेजी से बदल रहे बौद्धिक सर्जनात्मक परिदृश्य को कोई नयी समीक्षा. उनमें अवस्थित यूटोपिया अब और धुंधले लगते हैं, उनसे कोई नया और समग्र वैकल्पिक महास्वप्न उभरता नजर नहीं आता.

 

शायद मनुष्य अब विचार करने से थक और ऊब रहा है. शायद अब हम सारी मानव जाति के लिए जरूरी नहीं समझत. साद अब सोमवार करना उपभोज्य और मूल्यवान विचारों का वह समय में जिन्हें विश्व-व्याप्ति को कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. शायद इस वृत्ति को विचारों को प्रादेशिकता की वृत्ति कहा जा सकता है. शायद अखिलता अब जरूरी रह गयी है. शायद यह विडम्बना है कि जब नयी तकनालजो, विश्व का भूमण्डलीकरण, संचार संचार और यातायात के नये साधन एक विश्वग्राम बना रहे हैं, तब विश्व में विचारों की प्रादेशिकता पनप रही है. कई कारण महान उत्पात, असन्तुलन, तनाव और नरसंहार आदि हुए हैं, इसलिए, अगर अब कोई ऐसा सर्वव्यापी विचार नहीं है तो इन सबसे उसकी विकराल विकृतियों से बचने की सुविधा 1. मुश्किल सिर्फ यह है कि मनुष्य रचता तो है पर नष्ट भी करता चलता है, उसकी इस इन्द्वात्मकता से मुक्ति कहां हो सकती है, भले विचार अब प्रादेशिकता में विकसित पोषित हों ?

 

हंसने की नीचता

 

इस यहूदी कहावत का कई बार जिक्र करता रहा हूँ ईश्वर के सामने रोओ, आदमी के सामने हंसी उपन्यासकार मिलान कुन्देरा ने कभी कहा था कि अपनी रचना विचित्र देखकर ईश्वर अट्टहास करता है और उपन्यास, कम से कम पश्चिम में ईश्वर के अट्टहास से उपजा है. यह हंसना की बेचारगी मुफलिसी, निरुपायता, राजनैतिक या दूसरों की धार्मिक या आर्थिक फंसाय-अलगाव पर हंसना नहीं होता. यह हंसना दूसरों पर फैसला लादना नहीं, उन्हें अपनी विडम्बना में सजग होकर शामिल करना है. यह हंसना अपने ऊपर हंसना है.

 

इस समय लाखों किसान भयानक सर्दी-बारिश और मुश्किलों के बीच आन्दोलन कर रहे हैं और सत्तारूढ़ शक्तियां और गोदी मीडिया उनकी वाजिव जिद को अड़ियलपन करार देकर उन पर हंस रही हैं. यही नहीं, लगता है कि अदालतें भी उन पर हंस रही हैं. यह हंसी बहुत कुछ कहती है, समस्या को उसको गहरी मानवागता में न निकालने के बजाय उन्हें चैनलों कर हल एक ज और अखबारों में उपहास का पात्र बनाया जा रहा है. सच तो यह है कि ऐसा हंसना नीचता को अभिव्यक्ति है. सत्ता पाते ही राजनीति से सारी मानवीयता का क्षरण लोकतंत्र को क्षत-विक्षत करने जैसा है, लोकतांत्रिक पद्धति से पायी गयी सत्ता उसी लोकतंत्र को कुतर रही है, उसमें लगातार कटौती का सुनियोजित प्रयत्न कर रही

 

गणतंत्र दिवस पर कुछ घुसपैठिये तत्वों द्वारा जो हिंसा आदि हुई उनसे किसान आन्दोलन ने फौरन ही अपने अलग कर लिया था. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक वातावरण बेहद अभद्र, फूहड़ और नीच बना हुआ है. इसमें हंस रहे हैं, उनका हिसाब समय और इतिहास चुकता करेंगे. यह आश्वासन पर्याप्त नहीं लगता. फिर भी, तो करोड़ों हैं जो अपने लोकतंत्र के लिए इस समय से रहे हैं. इसकी अनदेखी अनसुनी तो होगी, हो रही है. इसी से उम्मीद निकलती है. उम्मीद ऐसे आंसुओं की नदी में बहकर ही आयेगी.

 

-          अशोक बाजपेयी

(लेखक वरिष्ठ कवि एवं साहित्यिक, सांस्कृतिक चिंतक हैं)

Saturday, 10 July 2021

इन दिनों कट्टर हो रहा हूँ मैं...

व्यंग्य



आजकल मैं बहुत हीन भावना में जी रहा हूँ । सामान्यतौर पर मैं सामान्य मनुष्य के जैसा जीवन ही जीना चाहता रहा हूँ। मगर अब देख रहा हूँ कि ऐसा सोचना भी मेरा असामान्य है। आजकल ऐसे सोचने वालों को कायर कहा जाता है। कायर ही नहीं बहुत कुछ कहा जाता है, जो यहां लिखा नहीं जा सकता।

 

            कट्टर शब्द को मैं नकारात्मक मानता हूं। मुझे लगता है कोई एक बार कट्टर बन गया तो वह इंसान तो नहीं ही रहता! अब मुझे लगता है कि  मुझे अपनी सोच बदलनी पड़ेगी। पर मैं कट्टर जैसे भारी, महाप्रचलित और अतिआवश्यक शब्द को सिर्फ धर्म के साथ रखने का कट्टर विरोधी हूँ। कट्टर शब्द को सीमित न रखकर इसको व्यापक करने की जररूत है। जैसे कट्टर ईमानदार, कट्टर खूबसूरत, कट्टर ज्ञान, कट्टर दयालु, कट्टर भावुक, कट्टर मेहनती, कट्टर नेता, कट्टर प्रेमी वगरैह। वह कट्टर गोरे रंग पर मरता है। वह कट्टर बेरोजगार है। ऐसे वाक्य बोले और लिखे जाने चाहिए!

 कल बाजार में एक पुराना मित्र मिला ।

 बोला,' यार तुम बहुत ढीले हो!

मैंने उससे पूछा कि फिर मुझे क्या करना चाहिए।

 वह बोला, 'थोड़ा कट्टर बनो!

मैंने उसे शुक्रिया कहा।

'किस बात के लिए!' उसने पूछा।

'आपने थोड़ा कहकर बहुत रियायत दे दी!

वह मुस्कुराया। बोला,' शुक्र है तुम जाग गए!

' क्या अब जागना भी होगा!', मैंने पूछा। 

वह हँसा और हाथों की उंगलियों को हिलाते हुए बोला,' बिना जागे कट्टर नहीं बन सकते..

' यह भी गजब है! बचपन में मां जगाती थी, तो जवानी में  घड़ी। सोचा था ,अब आराम से सोऊंगा तो तुम जैसे चिंतक जगा रहे। ट्रेन में किसी सहयात्री की तरह घड़ी-घड़ी भाईसाहब कौन सा स्टेशन आया, पूछने वाले की तर्ज पर चैन से न रहने देना!' मैंने उलाहना दिया।'

'भइया अपने धर्म के हो तो जागना पड़ेगा!' उसने सर हिलाया।

'अगर मैं किसी और धर्म का होता तो!'

'तब तो कोई जरूरत नहीं थी।'

'क्यों!'

'वह तो पहले से जागे हैं!'

'अच्छा! तुम सारी खबर रखते हो! वैसे जागने का काम चौकीदार का होता है!'

'जागते तो चोर भी हैं!' उसने यह कर अपनी एक आंख दबाई।

'फिर मुझे कैसे जागना होगा!' मैंने पूछा।

'जैसे मैं जागा हूँ!' वह बोला। 

अब जाकर मैंने उसे गौर से देखा। भरा हुआ चेहरा। चमकता हुआ। विज्ञापन वाली भाषा में कहूं तो विटामिन ई, एलोविरा से युक्त खिला-खिला चेहरा। एक मैं हूँ कि जागने की वजह से मेरे आँखों के नीचे काले गड्ढे पड़ चुके हैं और यह...

'मैं काफी देर तक जागता हूं मित्र!'

यह सुनकर वह हँसा।

'नीद सेहत के लिए बहुत जरूरी है।' उसने सुझाव दिया।

'फिर जागने की बात क्यों करते हो!'

'अरे यार जागने का मतलब वो नहीं है, जो तुम ले रहे हो!'

'फिर मैं कैसे लूं!'

'जागने का मतलब जाग्रत अवस्था। अपनी संकृति से प्रेम। राष्ट्र के प्रति भक्ति...'

'मुझे लगता है यह सब मैं करता हूँ!'

'जागने का मतलब देशद्रोहियों पर नजर भी! खतरा बढ़ता ही जा रहा!' यह कह कर वह इधर-उधर देखने लगा।

'ये काम तो सरकार,सेना, पुलिस लोगों का है!'

'तुम हो बेवकूफ! अपने आसपास पहचानो!'

'जल सेना के ग्यारह जवान जासूसी करते हुए पकड़े गए, जब सेना ही नहीं पहचान पा रही तो हमारे जैसा साधारण इंसान क्या पहचानेगा!'

'कपड़े से पहचानो!'

'कपड़े से कैसे पहचान होगी!  सेना के जवान सब वर्दी में ही थे ! मुझे कोई और काम-धंधा नहीं है क्या!' मैंने उसे झिड़का।

'तुम्हें काम-धंधे की पड़ी है! चाहे देश जल जाए! हैएं!!!' उसने मुझे घूरा। मैं समझ चुका था यह अपनी टेक नहीं छोड़ेगा।

 

'तुमनेे तो मेरी आँखें खोल दी मित्र। देश के लिए अब मैं जागूंगा! अगली बार जब तुमसे मिलूंगा तो मैं पूरा कट्टर बन कर मिलूंगा.. शायद तुमसे भी ज्यादा! क्योंकि मैं अपने देश को सच्चा नहीं.. नहीं... कट्टर प्यार करता हूँ!!'' 

'यह हुई न बात!' उसने जोश में मेरे कंधे पर शाबाशी दी। 

 

तभी उसके मोबाइल पर झम से एक संदेश आया। उसने वह संदेश दिखाया। संदेश कह रहा कि जो कट्टर है, इसे लाइक करें। उसने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया।

'लो तुम लाइक करो!' बोला।

'मैं अभी कट्टर कहां हुआ!' मैं उससे बताता हूँ। उसने उसे झट से लाइक कर दिया। मैं मन मसोस कर उसके उत्साह को देखता रह गया।

'अब तो अपनी सुरक्षा की व्यवस्था भी खुद ही करनी पड़ेगी!' जाते-जाते बोला।

 

मैं देख रहा हूं,जागने पर जोर कौन  दे रहा! विधान सभा-संसद में जो नेता सोता है वो! मुझको अंधेरे में रखकर बीमा बेचने वाला परम मित्र ये! जाग जाऊं पर सही रास्ता कौन बताएगा! मुझे जगा कर आराम से कौन सोएगा! अगर मैं वाकई जाग गया तो जगाने वालों के चेहरों जैसा मेरा भी चेहरा चमकदार होगा कि नहीं! पता नहीं इनको जागने पर क्या दीखता है। मुझे तो जागने पर संडास दीखता है... और सबसे बड़ी बात जागने के बाद रौशनी तो होगी न!

 

             मैं बाजार में घूम रहा हूँ। इधर-उधर नजर घुमा रहा हूँ। देखिए, फलां कह रहा कि इसमें इतने प्रतिशत एक्स्ट्रा है।  अलां कह रहा कि यह बचत नहीं महाबचत है। आज सीधे-साधे से काम नहीं चलता! अपने बिकने को लेकर ये प्रोडक्ट भी कट्टर हो गए हैं। पर मैं तो मनुष्य हूँ। मैं सोचता हूँ। मुझे क्या बेचना है,क्या खरीदना है! मेरे कट्टर होने से क्या भला होना है! किसका भला होना है! अगर होना है तो कैसे भला होना है। हमने वोट देकर जिनको चुना था। आज वही हमसे कट्टर होने को कह रहा। मैं सोचता हूँ ,कट्टर हो कर मुझे क्या मिलेगा! हां मगर पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी पार्टी को हमारे घर का वोट उसे जरूर मिलेगा! अथार्त कट्टर मतलब पुश्त दर पुश्त वोटर होने की गारंटी ..

 

घूमते-घूमते मैं केले के ठेले के पास आ गया हूँ।

'कट्टर केले कैसे दिए!'उधेड़बुन में मैं उससे पूछता हूँ।

' पचपन रुपये दर्जन!'

''आएँ!!' दाम तो वाकई कट्टर हैं!' मैं सोचता हूँ और आगे बढ़ लेता हूँ।

'पचास लग जाएंगे !' वह अपनी कट्टरता कुछ कम करता है। मेरे हिसाब से अभी भी बहुत ज्यादा थी। मैं यह जानता हूँ कि दाम की कट्टरता तय करने के पीछे इसका कोई हाथ नहीं। वह भी मेरी ही तरह है। 'कवि कहना चाहता है कि..' के जैसे हम वहीं रट कर चलने वाले लोग हैं, जिसे हमें रटा दिया जाता है।

 

'नहीं नाश्ते में आज गर्व खाऊंगा!' मैं उससे कहता हूं

'आज तो खा लेंगे सर! मगर कल!' वह हँसता है।

'आज जो गर्व खाया है । मैं जानता हूँ वो पचेगा नहीं। इसको पचाने के लिए मनुष्यता का त्याग करना पड़ता है। इतिहास बदलना होता है। कल उल्टी हो ही जाएगी। नाश्ते की नौबत और तबियत ही नहीं होगी!'

' मगर परसों सर!'

'हां मगर परसो क्या!' मैं सोच में पड़ जाता हूँ।

परसों तुम्हारा ठेला लूट लूंगा!' मैं मजाक करता हूँ। वह सहम जाता है। मुझे झेंप नहीं गुस्सा आता है। यह मजाक को इतनी गम्भीरता से क्यों ले रहा! मजाक को सच समझ रहा!

'मजाक कर रहा हूँ!' मैं स्पष्ट करता हूँ। वह इसके बाद एक फीकी मुस्कान देता है। कमबख्त अभी भी सच मान रहा!

 

कुछ दिन बाद मैं अपने जागे मित्र के घर पहुंचता हूँ। जिसे मेजबान आ धमकाना कहते हैं।

काउच पर मेरे लिए सोफ़ा ही है , उस पर बैठते ही मैंने कट्टा निकाल कर उनकी गोद मे रख दिया। वह उछल पड़ा। जैसे बचपन में किसी के ऊपर प्लास्टिक का सांप फेंक देते थे।

'ये क्या है! उसने चौंकते हुए पूछा।

'कट्टा है!'

'हां वह तो मैं भी देख रहा हूँ!'

'तुमने कहा था कि कट्टर बनो!'

'तो!'

'तुमसे ज्यादा कट्टर बन गया हूँ, जैसा तुम से कहा था। यह कट्टा तुम्हारे बेटे के लिए लाया हूँ!'

'पागल हो! कैसे चाचा हो तुम! कलम की जगह कट्टा दे रहे हो!' वह गुस्से से बोला। मैं उसके गुस्से को देख रहा था।

'अपने बेटे को दो, जा के!' वह फिर बोला।

'दोस्त, मैं पूरी तरह से जाग चुका हूं। इसलिए उसे पहले ही दे चुका हूं!'

वह एक झटके से उठा। मेरा हाथ पकड़ कर उठाते हुए बोला,' तुम्हें आराम की जरूरत है। लगता है तुम कई दिनों से ठीक से सोये नहीं हो! भरपूर नींद लो जा के!'

मैं जाने लगा तो वह पीछे से टोका,'और ये लेते जाओ!' यह कह कर उसने कट्टा मेरे हाथ में पकड़ा दिया।

सड़क पर आकर मैं हंसा। खूब हंसा। 

 

उसी केले वाले के पास दुबारा पहुंचा। वह मुझे देखकर कुछ घबरा सा गया।

'ये क्या है सर!' वह डरते हुए पूछता है।

'कट्टा!' वह जड़ हो गया।

'अरे, बच्चों का खिलौना है ये!'

इस बात पर वह और डर जाता है। ऐसा क्या गलत बोल दिया मैंने!थोड़ी देर के लिए मैं सोचने लगता हूँ।

'अरे यह प्लास्टिक का खिलौना है! नकली! नकली है पूरी तरह!' मैंने उसे तसल्ली देता हूँ।

'बिल्कुल असली लग रहा था सर!'

'यही तो दिक्कत है आजकल। लोग नकली को असली समझने लगे हैं!'

वह मुस्कुराता है। 

'केले तो कट्टर है न!

'बहुत! चखिए तो सर!

'अभी एक को चखा कर आया हूँ!'

'जी!!!' वह मुझे गौर से देखता है।

'कुछ नहीं,तुम नहीं समझोगे!' मैं हंसता हूँ।

'क्यों नहीं समझेंगे सर! केले के साथ हमको भी कट्टर समझ रहे हैं क्या!'

मैं उसे देखता रह जाता हूँ। इस बात पर मैं तो आज कट्टर केला खा कर रहूंगा। मैं केला खरीद लेता हूँ।मैं केला खाता हूँ।'

'केला कट्टर हो न हो पर मीठा है!

'कट्टर मीठा सर...' वह बोलता है।

 

हम दोनों हंस देते हैं...

 


-          अनूप मणि त्रिपाठी

 

विचार अब सार्वभौमिक नहीं रहे

कहने और सहने को इस मुकाम पर हम घरबन्दों और घेराबन्दी के पास बहुत समय है. बिताये नहीं बीतता , फिर भी इस अहसास से छुटकारा नहीं है कि यह समय अप...