Showing posts with label समीक्षा. Show all posts
Showing posts with label समीक्षा. Show all posts

Saturday, 15 October 2022

भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर ले जाती एक रचना

सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जीवन भर मुक्त हंसी से विपन्न, शोषित और पीड़ित मानवता के लिए वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे और स्वयं अकिचन बने रहे, किंतु उनकी स्वयं की पीड़ा वैसी थी जिसमें साधारण मानव रोने बिलखने और कराहने लगे, पर उन्होंने पीड़ा से जूझते हुए उपफ तक नहीं किया। उनकी पीड़ा वस्तुतः संगीत का रूप धारण कर चुकी थी और इसी का परिणाम है- राम की शक्ति पूजा | बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित 1936 में 'भारत' नामक दैनिक पत्र में प्रकाशित 312 पंक्तियों की यह विराट कविता भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचती है। एक नजर डाल रही है निहारिका गौड़...

'राम की शक्ति पूजा'

कालजयी रचना की यह विशेषता होती है कि समय के प्रवाह में उसमें नए अर्थ भरते चले जाएं। सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जीवन भर मुक्त हंसी से विपत्र, शोषित और पीड़ित मानवता के लिए वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे और स्वयं अकिंचन बने रहे... किंतु उनकी स्वयं की पीड़ा वैसी थी जिसमें साधारण मानव रोने, बिलखने और कराहने लगे, पर उन्होंने पीड़ा से जूझते हुए उफ्फ तक नहीं किया। उनकी पीड़ा वस्तुतः संगीत का रूप धारण कर चुकी थी और इसी का परिणाम है राम की शक्ति पूजा।

बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित 1936 में 'भारत' नामक दैनिक पत्र में प्रकाशित 312 पक्तियों की यह विराट कविता भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचती है। स्मृति संचारी के माध्यम से गहरी प्रबन्धात्मक योजना के साथ मौलिक छंद में रची गई इस तत्सम प्रधान कविता में घटना के तीन पड़ाव है जिसमें कल लड़े गए युद्ध का पूरा वर्णन आगे की व्यूह रचना एवं आठ दिनों तक निरंतर चलने वाली शक्ति पूजा और उसको अंतिम परिणीति का अनुपम दृश्य है।

पहले अनुच्छेद की अट्ठारह पंक्तियों में राम-रावण युद्ध का वर्णन है। दूसरे अनुच्छेद की बारह पंक्तियों में राम और रावण दोनों पक्ष की सेनाओं के लौटने की सूचना है। तीसरे अनुच्छेद में शिविर में बैठकर सेनापति एवं अन्य सभी योद्धा मिलकर अगले दिन के रण की योजना बनाने की तैयारी में हैं। चौथे अनुच्छेद में राम के सैन्य शिविर के परिवेश का वर्णन करते हुए राम के मन में चलने वाले उथल- पुथल के साथ पूर्वदीप्ति शैली के माध्यम से जानकी वाटिका में राम सीता मिलन की स्मृति और फिर आज के युद्ध मिली असफलता तथा उससे उत्पन्न आशंका व्याकुलता का वर्णन है। पांचवें अनुच्छेद में राम के आसुंओं को देखकर शक्ति के प्रति हनुमान के क्रोध को उजागर किया है |

छठे अनुच्छेद में विभीषण संवाद है। स्थिति की विडंबना यह है कि राम का पक्ष कमज़ोर होते ही विभीषण व्याकुल हो उठते हैं, क्योंकि उनका राज्याभिषेक पहले ही किया जा चुका है। अगले अनुच्छेद में राम और विभीषण के चरित्र में अंतर की व्याख्या है, साथ ही राम की विवशता और उनकी आँखों से पुनः गिरते आसुंओं का अलग-अलग योद्धाओं पर उसकी अलग- अलग प्रतिक्रिया का पता चलता है। आठवें अनुच्छेद में जामवन्त श्रीराम को शक्ति आराधना का परामर्श देते हुए आश्वस्त करते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में भी सुनियोजित ढंग से युद्ध चलता रहेगा। नौवें अनुच्छेद में शक्ति की मौलिक कल्पना और पूजन की तैयारी का वर्णन है। दसवां अनुच्छेद दो खंडों में विभक्त है, जिसमें प्रथम खंड में शक्ति पूजा और परीक्षा की व्याख्या है, वहीं दूसरे खंड में महाशक्ति के प्रकट होकर राम में शक्ति के लीन होने का दृश्य है।

निराला जी ने रामकथा का वह हिस्सा चुना, जहां संघर्ष एवं अंतर्द्वद्व सर्वाधिक हैं, दुःख कैसा रघुवर ? मुखर है। कविता का पहला ही वाक्यांश- 'रवि हुआ अस्त' अर्थात संध्या हो गई है, यूँ तो युद्ध कई दिनों आरंभ है, परंतु आज यह क्या हुआ कि राम के सारे शर निष्प्रभ सिद्ध हो रहे हैं। रावण की विध्वंसक अजेयता के आगे राम निरूपाय से हो रहे हैं और असली संघर्ष की शुरुआत यहीं से होती है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों अपनी संक्षितता की दृष्टि से कविता की आदर्श पूर्वपीठिका सिद्ध हुई है।

बोले रघुमणि 'मित्रवर, विजय होगी न समर, अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।' कहते कुछ कर न सके और ये दुखांत जीवन....। छल छल हो गये नयन, कुछ बूंद पुनः ढलके दूगजल अपनी अंतरंग सभा में वे सुग्रीव से कह रहे हैं, ये कहां का न्याय है कि महाशक्ति रावण के पक्ष में चली गई। संकट के समय प्रियजन याद आते है और राम की स्मृति जानकी वाटिका में पहुंच जाती है, जहां पहले-पहल उन्हें सीता के दर्शन हुए थे। इस मिलन प्रक्रिया का एहसास कर उनमें दैवीय शक्ति का संचार होता है। परन्तु फिर महाशक्ति की गोद में बैठे हुए रावण को अट्टहास करता देख राम भावाकुल हो जाते हैं। ये सब देखकर और सारा संवाद सुनने के बाद जामवन्त कहते हैं, दुःख कैसा रघुवर ?

हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो पुरुषोत्तम नवीन।' धारण, आराधन का दृढ़ आराधना से दो उत्तर... ।' महाशक्ति को रावण ने प्रसन्न कर लिया, जो कि अधर्म के पक्ष में है। आप तो धर्म के पक्ष में हैं, आप दोगुनी शक्ति से साधना कर महाशक्ति को अपने पक्ष में कीजिये | इसी सापेक्षता के सिद्धान्त को अपनाकर राम नवरात्र के समय आठ दिन का पूरा विधान बनाकर हनुमान को 108 नील कमल लाने का आदेश दिया। 'चाहिए हमें एक सौ आठ कपि, इन्दीवर' सूर्योदय के साथ शक्ति पूजा आरम्भ होती है।

आठ दिन की पूरी साधना यौगिक साधना है, जिसमें कुंडली उत्थापन की पूरी प्रक्रिया चलती है समाधिस्थ होकर एक जाप पूरा होते ही श्रीराम महाशक्ति के चरणों में एक इंदीवर अर्पित कर देते हैं। इसी तरह क्रमवार 107 नील पद्म महाशक्ति के चरणों में अर्पित किए जा चुके हैं। दुर्गाष्टमी की अर्धरात्रि का समय है। महाशक्ति ये सारी लीला देख रही हैं। ये साधना त्याग की भावना से परिपूर्ण है या स्वार्थवश इस हेतु महाशक्ति सूक्ष्म रूप में आकर राम के पार्श्व में रखे एक सौ आठवें कमल को लेकर अंतर्ध्यान हो जाती है। राम ध्यानस्थ अवस्था में 108वां जाप करने के बाद जैसे ही नीलपद्म उठाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, स्थान रिक्त पाते हैं। उनका मन व्याकुल और नयन सजल हो उठते हैं...।' अपनी प्राणप्रिया जानकी के लिए, कुछ न कर सके और ये दुखांत जीवन...|

'धिक जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध' फिर राम बुद्धि के चरम स्तर पर जाकर समाधान खोजते हैं। उनकी स्मृति बाल्यवस्था में लौटती है और उन्हें याद आता है कि माँ उन्हें राजीवनयन कहा करती थी। अर्थात मेरे पास दो कमल है। प्रतिज्ञा कर वे महाशक्ति का ध्यान करते हुए अस्त्र से अपनी दाहिनी आंख को समर्पित करने के लिए जिस क्षण हाथ उठाते हैं, उसी क्षण देवी प्रकट होती हैं और राम का हाथ थाम लेती हैं। श्रीराम के धैर्य और त्याग प्रसन्न हो महाशक्ति राम के बदन में लोन हो जाती हैं। 'होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन |’

कह महाशक्ति राम के वंदन में हुई लीन। और इसी ज्योतिर्मय चरमोत्कर्ष पर कविता समाप्त होती है। शक्ति का स्रोत मनुष्य के भीतर है, उसे जागृत करने से ही बाहरी विश्व पर विजय प्राप्त होती है |

Saturday, 2 July 2022

2 जुलाई - जन्मदिवस स्व. सुशील सिद्धार्थ

आखेट [व्यंग्य संग्रह] – सुशील सिद्धार्थ        


समाज की बिखरी पड़ी विसंगतियों का बखूबी ‘आखेट‘

              ख्यात व्यंग्यकार, आलोचक,संपादक , चर्चित स्तम्भकार सुशील सिद्धार्थ का जन्म 2 जुलाई 1958 को हुआ और 17 मार्च 2018 को अचानक वो हम सबको अलविदा कह गए।
                 देश के व्यंग्यकारों को एक मंच पर लाने और आपस में विचार विमर्श के लिए एक व्हाट्सएप समूह का गठन लखनऊ के साथी व्यंग्यकारों के साथ वर्ष 2015 में  सुशील जी ने किया - व्यंग्य लेखक समिति ( वलेस ) । व्यंग्य लेखक समिति के जरिए सुशील जी ने समालोचक राहुल देव , भुवनेश्वर उपाध्याय , व्यंग्यकार डॉ सुधांशु नीरज ,लमही पत्रिका के श्री विजय राय के साथ मिलकर व्यंग्य से जुड़ी कई परियोजनाओं को सार्थक और पुस्तकों का प्रकाशन किया। उनके असामयिक निधन से व्यंग्य की कई योजनाएं अधूरी ही रह गईं।
        सुशील जी के छह व्यंग्य संग्रह , दो अवधि कविता संग्रह प्रकाशित हैं।  सुशील जी के जाने के बाद उनका सातवां व्यंग्य संग्रह  ' आखेट ' किताबघर प्रकाशन ,नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। 232 पृष्ठ के इस संग्रह में सुशील जी के 41 व्यंग्य हैं। सुशील जी व्यंग्य संग्रह ' आखेट ' के जरिये समकालीन व्यंग्यकारों में अपने अलग तेवर ,अंदाज और कहन के लिए सबसे अलहदा ,अव्वल और अग्रणी नजर आते हैं। सुशील जी ने ' आखेट  ' व्यंग्य संग्रह के  विषयों के साथ नए प्रयोग किये वहीं प्रचलित विषयों यथा शोकसभा , साहित्यिक गुटवाद , पुरस्कार ,सम्मान ,  साहित्य में मठाधीशों की महिमा जैसे सदाबहार विषयों पर उनके व्यंग्य आज भी ताजगी का अहसास कराते हैं। सुशील जी के व्यंग्य , उस परंपरा के हैं जहाँ व्यंग्य की शब्द सीमा ,निबंध के बराबर मानी गई है और ' आखेट' के  व्यंग्य बराबर विस्तार लिए हुए हैं। सुशील जी ने हर शैली में व्यंग्य रचे फिर वह संवादात्मक हों , कथात्मक हों या नाटकीय शैली में हों। सुशील जी के पास समृद्ध भाषा है जिसका उपयोग उन्होंने अपने व्यंग्य में किया है। ' आखेट' में सुशील जी के व्यंग्य के शीर्षक भी नयापन लिए  हैं ,और व्यंग्य पढ़ने की लालसा जगाते हैं। संग्रह को पढ़ते हुए सुशील जी के व्यंग्य कहने का  अंदाज इतना दिलकश होता है कि आप व्यंग्य से जुड़ जाते हैं। व्यंग्य में उपमाओं की भरमार होती है और इससे व्यंग्य रोचक हो जाता है। सुशील जी अवधि भाषा में निष्णात थे अतः उनके व्यंग्य में भी अवधि  यत्र ,तत्र दिखाई देती है। रामचरित मानस की चौपाइयों ,कबीर के दोहों का व्यंग्य की आवश्यकता के हिसाब से सुशील जी उपयोग करने से नहीं चूकते।
                  संस्थाओं के सेमिनार और कैसे वे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय हो जाते हैं सुशील जी ने बहुत तबियत से लिखा है। माँ - बाप की मृत्यु पर  भी कुछ लोग अपनी व्यस्तताओं और भविष्य के फायदे के कारण घर नहीं आ पाते उनके लिए  व्यंग्य ' अपार दुख के पार ' में सुशील जी ने लिखा है  -    ' इतना मत रोओ। इतना चाहती हो तुम अम्मा को अगर यह बात अम्मा जान जातीं तो दो - चार साल और जी जातीं। '
इस संग्रह के व्यंग्य ' एक अचंभा देखा रे भाई ' में सुशील जी की मुलाकात ,कबीर से हो जाती है और तब कबीर देखते हैं कि वो जो लिख गए हैं ,धरती पर उससे उल्टा और अजीब ही हो रहा है।
व्यंग्य ' गोद लिए जाने का सुख ' में गोद लेने के महत्व को दार्शनिक अंदाज में व्यक्त किया गया है । बानगी देखिए-   ' समाज रचना और स्त्री के साथ एक जैसा आचरण करता है। दोनों को अपने अच्छे होने का प्रमाण रसिकों से लेना होता है। '
' इतिहास गवाह है कि किन्नरों के लिए नवाबों में , नर्तकियों के लिए राजाओं में और शिष्यों के लिए गुरुओं में भांति - भांति के संघर्ष हुए हैं।'
' बूड़ा बंस कबीर का ' व्यंग्य में वर्तमान राजनीति को नँगा किया गया है - ' सपने वे होते हैं जिनको पूरा करने के लिए आप पूरे मुल्क को चैन से सोने नहीं देते । बस एक बार सपना आ जाए कि सबको पछाड़कर आगे निकलना है।'
' सबसे पहले लँगड़ी मारकर कुछ लोगों को लँगड़ा बनाना । फिर उनको मंडल या कमंडल थमा देना। खुद अपार शब्दों के भंडार की चाबी थाम लेना क्योंकि बातें हैं बातों का क्या। हमारे लोग बातपसन्द हैं और बातें अच्छी करने वाले लोग जेब काट ले जातें हैं।'
' तो खेल शुरू । जाति ,धरम ,मजहब ,इलाका जबको बेचना शुरू। सबसे बिकाऊ माल है धरम... इंसानियत।'
व्यंग्य ' सोच व्यापक रहिए ' में सदाबहार बेरोजगारी पर सुशील जी का प्रहार देखिए- ' दिनकर की पुस्तक है - संस्कृति के चार अध्याय । तुम उससे बड़ा ग्रंथ लिखो - बेरोजगारी के पांच अध्याय ' । प्रेमचंद की कहानी है - बड़े घर की बेटी । तुम लिखो - छोटे घर का बेरोजगार बड़ा बेटा।'
' एक दूसरे पर थूकना ही आत्मीयता और पड़ोसी होने का लक्षण है'
' साहित्य में भी ज्यादातर कौन चर्चित है ,वही जो वैचारिक गुंडे हैं , शब्दों के आइटम सांग हैं और काट डालने योग्य हैं। ' 
आखेट में ' दुर्दशा पर चिंतन '  सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यों में से एक है। इस व्यंग्य में राजनेताओं के चरित्र चित्रण के साथ देश की दुर्दशा राजनेता कैसे करते हैं , कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के संवादों द्वारा बताया गया है। एक संवाद देखिए -  'शुगर और ब्लडप्रेशर की तरह अब मानवता ,दया , ममता ,प्यार ,करुणा आदि को नापना आदान हो जाएगा। नापो। वाणी में नम्रता रहे तो हत्या भी अनुष्ठान बन जाती है।'
' प्राणियों में सद्भाव हो ... इसके लिए जरूरी है कि प्राणियों के प्राण हर समय संकट में रहें। जिस समाज मे भय जितना अधिक होता है ,उस समाज में धर्म ,सियासत और बाजार उतना ही अधिक मजबूत होते हैं '
' किसी भी मजहब की पूजा इबादत में आंखे मूंदने का बड़ा महत्व है। मजहब कहता ही है कि आंखे गिरवी रखकर ही सत्य को पाया जा सकता है '
' नेता की बरकत मूढ़ जनता से , वकील की झगड़ों से , डॉक्टर की बीमारों से , अखबारों की दे-दना - दन टाइप खबरों से आती है। '
कार्यालयीन भृष्ट व्यवस्था पर उनका एक व्यंग्य इस तरह कटाक्ष करता है -  ' पैसे का लेन - देन हो जाए तो व्यवस्था से बड़ा कोई दोस्त कोई दूसरा नहीं। पैसा ही लोकतंत्र है। वरना सब षड्यंत्र है '
साहित्यकारों की गुटबाजियों , पुरस्कार, सम्मान के खेलों पर संग्रह में कई व्यंग्य हैं।
' वे जानते थे कि सत्ता पुरस्कार देकर दरबार में कुत्ता पाल लेती है। ये कुत्ते दरबार को चाटते हैं और बाकियों पर भोंकते हैं। उन्होंने कुछ बब्बरशेरों को जबरकुत्तों में बदलते देखा है '
               सुशील जी ने अपने पहले के व्यंग्य संग्रह और आखेट में भी नवीन मुहावरों का सृजन किया है । जैसे -
सहानुभूति की क्रीड़ा, तारीफ के सिक्के, करुणा के कुकुर, परंपरा के चमगादड़, मतलब की खेती, व्याख्या की मोमबत्तियां, बहस की अंत्याक्षरी, इंसानियत का बोझ, तर्कों की तलवार ,संवेदनाओं के टूरिस्ट आदि।
सुशील जी अपने व्यंग्यों में शेरो शायरी की पैरोडी का भी खूब प्रयोग करते हैं -
  ' ए मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हों हमारे करम
मूंग हरदम दलें
साथ अपने चलें
चाकू ,कट्टा ,तमंचा औ बम ।'
सुशील जी के व्यंग्य में पंक्तियां ,सूक्तियां बन गईं लगती हैं-
' भीड़ ,भ्रष्टाचार और भय का सात जन्मों का साथ है।'
' सत्ता बदलती है तो सत्य भी बदल जाता है।'
                व्यंग्य संग्रह आखेट  की भूमिका प्रख्यात व्यंग्यकार पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी जी ने लिखी है। सुशील जी ,ज्ञान जी को अपना व्यंग्य गुरु मानते थे और पचमढ़ी की व्यंग्य कार्यशाला के बाद दोनों में फोन पर लंबे संवाद और बातचीत होती रहती थी।  ज्ञान जी की इस भूमिका को पढ़ने के बाद आखेट में क्या कुछ है और सुशील जी का समकालीन व्यंग्य परंपरा में क्या स्थान है ,जाना जा सकता है। ज्ञान जी की भूमिका के बाद ,इस संग्रह पर किसी के लिए भी कुछ नया कहना बचता नहीं है इसलिए मैंने , ' आखेट' की भूमिका का उल्लेख अंत में किया है। ज्ञान जी ने 'आखेट ' की भूमिका में सुशील जी और उनके व्यंग्य के बारे में कहा है कि समकालीन व्यंग्य के भेड़ियाधसान में आखेट एक ताजा हवा का झोंका जैसा लगेगा और  आखेट व्यंग्य की ताजा बयार है।ज्ञान जी लिखते हैं समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में बल्कि भारतीय भाषाओं की समृद्ध व्यंग्य परंपरा में सुशील जी का व्यंग्य अद्वितीय और कई मायनों में इतना अनोखा है कि उसका आदरपूवर्क उल्लेख किये बिना भारतीय व्यंग्य की ईमानदार बात करना कभी भी सम्भव नहीं होगा।
                 अंत में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में युवा व्यंग्यकारों को यदि व्यंग्य के सौंदर्य शास्त्र को पढ़ना , समझना है तो  'आखेट ' को, सुशील जी के अन्य व्यंग्य संग्रहों को जरूर पढ़ें। सुशील जी के  संग्रह 'आखेट' के व्यंग्य कबीरी विचारधारा और परंपरा के बेहतरीन व्यंग्य हैं और देश ,समाज की बिखरी पड़ी विसंगतियों का बखूबी आखेट करने में सक्षम हैं।


- डा हरीशकुमार सिंह

Saturday, 25 June 2022

हाशिए पर

जो व्यक्ति विगत साठ सालों से लिख रहा हो, उसकी पहली कविता की किताब 83 वर्ष की उम्र में आए तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह अविश्वसनीय ही लगता है। अभी हाल ही में फेसबुक पर एक व्यक्ति की पोस्ट देखी थी, जो अपने 60 वें जन्म दिवस के अवसर पर अपनी प्रकाशित 61 वीं किताब की बात बता रहे थे। आजकल जिनकी चार कविताएं भी कहीं नहीं छपी हो, वे भी जल्दी से जल्दी एक संग्रह ले आना चाहते हैं। ऐसे में एक वरिष्ठ कवि के धैर्य एवं प्रकाशन के प्रति ऐसी उदासीनता की दूसरी मिसाल नहीं मिलती। 

अशोक प्रियदर्शी एक सुपरिचित वरिष्ठ कहानीकार, आलोचक एवं कवि रहे हैं। इनकी कविताओं की पहली किताब “हाशिये पर” हाल ही में प्रकाशित होकर आई है। किताब का नाम हाशिये पर होने की भी अपनी कहानी है। कभी धर्मयुग पत्रिका में उनकी व्यंग्य कविताओं का कॉलम प्रकाशित हुआ करता था , जिसका नाम था हाशिये पर। उसी कॉलम के नाम पर इस संग्रह का नाम रखा गया है। स्वभावतः इस संग्रह में वैसी कई कविताएं हैं, जो धर्मयुग के उस कॉलम में प्रकाशित हुई थी। संग्रह में कुल इक्यावन कविताएं संकलित हैं। ये कविताएं व्यंग्य कविताएं है।
व्यंग्य कविताओं की खूबी होती है कि ये बिना प्रत्यक्ष आघात किये, चुटीले अंदाज में सामाजिक एवं राजनैतिक विद्रूपताओं पर करारा चोट करती है एवं पाठकों के अंतस्तल को झकझोरती है। लेकिन आज व्यंग्य के नाम पर मंचीय कवि कविताओं के बदले सीधे सीधे चुटकुले पढ़ रहे हैं, फूहड़ता परोस रहे हैं, जो बहुत निराशाजनक परिदृश्य उपस्थित करता है। गद्य में तो व्यंग्य अभी भी पढ़ने को मिल जाता है लेकिन व्यंग्य-कविता अभी दुर्लभ हो गयी है। ऐसे में अशोक प्रियदर्शी जी की ये कविताएं निश्चय ही प्रशंसनीय एवं पठनीय है। 
अशोक प्रियदर्शी जी के इस इस संकलन में शामिल हरेक कविता अपने चुलबुले अंदाज ए बयान के माध्यम से, अपनी वक्रोक्तियों  से घाव करे गंभीर वाली बात को चरितार्थ करती है। समाज में व्याप्त सामयिक विसंगतियों एवं विडंबनाओं की ओर संकलन की कविताएं जिस अंदाज में इशारा करती है, उससे एक तरफ तो हंसी भी आती है और दूसरी तरफ दिल में एक कचोट भी उठती है। व्यंग्य कविताओं की यही तो विशेषता भी होती है। इनकी व्यंग्य कविताओं का चुटीला अंदाज सहज ही पाठकों तक कविता की अंतर्वस्तु को प्रेषित कर देता है एवं मर्म को छूता है। संग्रह की कविताओं में जहाँ एक ओर राजनैतिक व्यंग्य हैं, वहीँ दूसरी ओर समाज के दुराग्रहों एवं विचित्र मान्यताओं की भी खबर ली गयी है। 
अशोक प्रियदर्शी जी की काव्य-चेतना प्रगति और परंपरा के बीच एक सधा हुआ संतुलन बना कर चलती है। हजारों सालों की अनुभव जनित एवं सिद्ध परंपराओं को प्रगतिशीतलता के नाम पर हठात त्याज्य बना देना उनकी चिंतन पद्धति का उद्देश्य नहीं है लेकिन रूढ़ एवं प्रतिगामी विचारों एवं लोकाचारों पर करारी चोट करते भी वे दिखते हैं। वे जितनी सहजता से राजनीतिक चुटकी लेते हैं, उतनी ही सहजता से एवं चुटीले अंदाज में प्यार मुहब्बत की बातें भी कर लेते हैं। 
अपनी एक छोटी सी कविता “सम्मेलन” में कवि कहते हैं : 
“जो सर्वदलीय राजनीतिक सम्मेलन होना था, हुआ? 
क्या हुआ? 
हुआ .... होना क्या था !! 
हुआ-हुआ” 
.... 
आज भी अगर हम देखें तो राजनीति में “हुआ-हुआ” ही हो रहा है। अब तो उससे भी आगे बढ़ कर संसद में भी हुआ-हुआ होने लगा है। जिस उद्देश्य से संसद या विधानसभाओं में जनता के प्रतिनिधि चुन कर जाते हैं, जनता के हित में उस उद्देश्य की पूर्ति हेतु शायद ही कोई काम करते हुए दिखते हैं । अपनी कविताओं में कवि जनहित से हो रहे इस राजनीतिक खिलवाड़ पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। 
एक दूसरी कविता “सहयोग -भावना “ देखिए :
शिक्षक ‘अशेष’ कविताई भी करते थे, 
जहाँ-तहाँ छपते थे। 
लिखा प्रकाशक को – 
कि , संग्रह एक प्रस्तुत है, 
बहुजन प्रशंसित है, 
चाहें तो छाप दें 
पत्र शीघ्र आप दें । 
लिखा प्रकाशक ने – 
कि पत्र मिला, हर्ष हुआ। 
अभी कुछ ज्यादा ही 
पड़ी है पांडुलिपियाँ। 
सेवा कर सकेंगे नहीं, 
इसका है विषाद । 
सहयोग-भावना के लिए धन्यवाद । 
सहयोग भावना के लिए ऐसे धन्यवाद वाले पत्र से भला कौन रचनाकार परिचित नहीं होगा? आज जबकि रोज नए प्रकाशक बाजार में आ रहे हैं और थोक भाव से नई पुस्तकों की घोषणा हो रही है, वहीं विडम्बना यह कि प्रकाशकों का एक ही रोना है कि हिन्दी की किताबें बिक नहीं रही है। भाई किताबें बिक नहीं रही तो छाप क्यों रहे हो?
भारत में समाजवाद एक ऐसा ख्याली पुलाव है, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही लगातार पकाया जा रहा है। लेकिन आज तक इस पुलाव का चावल कच्चा का कच्चा ही रहा है। लेकिन समाजवाद के झुनझुने को बजाकर कई स्वघोषित समाजवादी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बन गए । समाजवाद शीर्षक की एक छोटी से कविता में कवि इस स्थिति का अत्यंत ही मज़ाहिया अंदाज में बहुत ही सही आकलन प्रस्तुत करते हुए कहते हैं : 
“एक आदमी ने 
सड़क पर पाया एक कोडा 
तो खुश होकर बोला-
बस, अब घुड़सवार होने में घटता है थोड़ा, 
जीन, लगाम, घोडा ! 
-हमने छू ही लिया है समाजवाद, 
बस, कुछ ही है रोड़ा!”

इसी मिजाज की एक और कविता देखें : 
शास्त्रों में सत्य ही कहा है –
“संघे शक्ति कलियुगे!’
इस घोर कलिकाल में 
अपने संघ-शक्ति वाले राष्ट्र में 
शक्ति की घनघोर भक्ति है। 
शक्ति याने सत्ता ! 
मंत्रिपद ! मौज और भत्ता! 
अपने व्यंग्य कविताओं के माध्यम से कवि 

कहते सबसे अच्छा व्यंग्य वही होता है, जो स्वयं पर ही किया आता है। ऐसे में जबकि कवि अपने व्यंग्य वाण हर दिशा में चला रहा हो, अपने ही साहित्य समाज को भला कैसे बख्श सकता है। अपनी एक कविता “पारिवारिक उपन्यास” में कवि लिखते हैं :

एक कथाकृति हाथ लगी । 
भूमिका में लिखा था- 
लेखक आभारी है पत्नी का 
जिन्होंने रचने की प्रेरणा दी। 
लेखक के अमुक-अमुक बेटे-बेटियों ने 
तल्लीनता से प्रूफ देखें 
कृति समर्पित थी पूज्य पिता-माता को, 
रचना रुचेगी सभी भाइयों को, बहनों को, 
प्रकट किया था लेखक ने विश्वास। 
कवर पर लिखा था- 
पारिवारिक उपन्यास! 

किसी भी रचनाकार की रचनाओ में उसके जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति होती है।   रचनाकार का अनुभव संसार जितना वृहत  होता है , उसकी रचनाओ में उतना अधिक वैविध्य और परिपक्वता परिलक्षित होती  है।  जीवन में जितने ज्यादा संघर्ष रचनाकार ने किये होते हैं,  उतनी व्यापक करुणा और संवेदना उसकी कविता में परिलक्षित होती है। अशोक प्रियदर्शी जी केा अपार जीवनानुभावों से उपजी व्यंग्य की विदग्धता उनकी तात्कालिक कविताओं को भी स्थायी भाव देती है, जिसके कारण वे बासी नहीं होती और अब भी तात्कालिक बनी हुई हैं ।  अत्यंत सरल, सहज एवं सौम्यता की प्रतिमूर्ति अशोक प्रियदर्शी जी कि यह किताब न केवल पठनीय बल्कि संग्रहणीय भी बन पड़ी है। 
किताब नोशन प्रेस से प्रकाशित है एवं इसका मूल्य 149/- रुपये है। किताब अमेजन पर उपलब्ध है। 

#नीरज नीर

Thursday, 2 June 2022

पुरातत्व का रोमांस : प्राचीन सभ्यताओं की रोमांचक कहानियाँ

हाल ही में प्रख्यात लेखक डॉ भगवतशरण उपाध्याय की चर्चित पुस्तक ‘पुरातत्व का रोमांस’ कई वर्षों बाद सामने आई है। इसका पुनर्प्रकाशन किया है भारतीय ज्ञानपीठ ने। इसका प्रथम संस्करण करीब चालीस साल पहले ज्ञानपीठ ने ही 1967 में निकाला था। इसके आमुख में खुद डॉ उपाध्याय लिखते हैं- “पुरातत्व का रोमांस जैसा कोई प्रकाशन भारतीय भाषाओं में नहीं हुआ।” दुनियाभर में जहां पुरातात्विक खोजें लगातार चल रही हैं और लगातार मानवेतिहास से जुड़े नए नए तथ्यों का लगातार उद्घाटन हो रहा है, यह हिन्दी के लिए बड़े आश्चर्य की बात है चार दशक बीत जाने के बाद भी उसी पुस्तक का प्रकाशन हो रहा है। इस बीच कोई नई कृति इस विषय में सामने नहीं आई। हिन्दी में कहानी, कविता और उपन्यास तो खूब मिल जाएंगे, आलोचना पर भी सवा-सत्ताईस किताबे हर साल निकलती हैं मगर इससे हटकर अन्य विधाओं-विषयों में पुस्तकों का प्रकाशन नहीं के बराबर होता है। पुरातत्व का रोमांस पुस्तक डॉ उपाध्याय की प्राचीन सभ्यताओं के उत्खनन स्थलों की बरसों तक की गई लगातार यात्राओं का परिणाम है।

हजारों वर्ष पुराने पत्थरों, मिट्टी के टुकड़ो, हड्डियों के हिस्सों और खंडित प्रतिमाओं में ऊपरी तौर पर चाहे किसी को आकर्षण नज़र न आए, मगर इनमें एक रोमांस छुपा है। अतीत से लगाव मनुष्य का स्वभाव है। सिर्फ निकट इतिहास तक इस लगाव को देखने के आदी लोग शायद इस रोमांस को महसूस न कर सकें। इतिहास को पौराणिक आख्यानों के जरिये समझनेवालों नें तो समाज की ऐतिहासिक चेतना को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। लोग राजा-महाराजाओं की प्रेम कहानियों अथवा युद्धों की वीरगाथाओं को ही इतिहास समझ बैठे हैं जो प्राचीन ग्रंथों में दर्ज है। दरअसल इतिहास इन सबसे परे वहां अपने असली रूप में ठिठका खड़ा है जहां उसे काल ने दफ्न कर दिया था। यह रोमांस तब उपजता है जब ज़मीन में दबी शिलाओं, अस्थियों, शिलाखंडों के बीच से सदियों पूर्व के जीवन उभर कर मूर्त होने लगता है। पुरातत्वेत्ता और इतिहासकार जब ठिठके खड़े इतिहास तक पहुंचते हैं तब यह रोमांस उभरता है। प्रस्तुत पुस्तक में दुनियाभर के प्रसिद्ध पुरातात्विक उत्खनन स्थलों के बारे में सपाट ब्योरा नहीं है बल्कि इन सभी स्थानों पर जाकर डॉ उपाध्याय ने उस रोमांस को महसूस किया है। इनमें से कुछ स्थानों के उत्खनन में वे स्वयं भी शामिल थे। मिस्र में तुतनखामुन के मकबरे की खोज, ईस्वी ’79 में रोम के हरकुलेनियम और पाम्पेई नगरों के ज्वालामुखी फटने से लुप्त हो जाने की घटना और फिर सत्रहवी सदी में इन अभिषप्त नगरों के अवशेषों के मिलने की सनसनीखेज़ घटना जिसके बाद ही दो हजार साल पुराना वह इतिहास सामने आया जिसे लोग सिर्फ पौराणिक कथा मानते थे।

दुनियाभर की सभ्यताओं और धर्मग्रंथों में जिस जलप्रलय का उल्लेख है, उसकी सत्यता को प्रमाणित करनेवाली विश्व की महानतम पुरातात्विक खोज का रोमांचक वर्णन भी पुस्तक में है। 19वी सदी के मध्य में ईस्ट इंडिया कंपनी के कारिंदे कर्नल रॉलिंसन ने ईरान में तैनाती के दौरान पुरातात्विक स्थलों की खूब खाक छानी। उसने कीलाक्षर लिपि पढ़ डाली। जलप्रलय की गाथा का पहला लिखित प्रमाण इन्ही कीलाक्षरों में मिला था। शिलाओं, मिट्टी की ईंटों पर उत्कीर्ण साहित्य विश्व के प्राचीनतम लिखित दस्तावेज हैं। वर्तमान के प्रतीकों की पुष्टि जब अतीत के प्रतीकों अर्थात पुरातात्विक प्रमाणों से हो जाती है तब सच्चा इतिहास जीवंत होता है। धर्म, पुराण और गाथाओं से परे। अतीत का रोमांस, पुरातत्व का रोमांस यहीं उभरता है। ‘अभिप्राय’ पर इस हफ्ते प्रस्तुत है इस पुस्तक पर अजय चंद्रवंशी का समीक्षात्मक आलेख...

_________________________________________________________________________


'रोमांस' का एक अर्थ 'रोमांचक कहानी सुनाना' भी होता है। इस अर्थ में भगवतशरण उपाध्याय का 'पुरातत्व का रोमांस' रोमांचक कहानियों का पिटारा है।यों तो ये 'कहानियाँ' ऐतिहासिक तथ्य हैं मगर लेखक की वर्णन शैली ने इसमे ललित निबंधों सी रोचकता ला दी है,जिससे इसका आकर्षण और बढ़ गया है। जो इतिहास की किताबों को 'नीरस' मानकर उससे दूर भागते हैं उन्हें इस किताब को एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।

विज्ञान के अनुसंधानों को जटिल और श्रमसाध्य माना जाता है। विज्ञान के हमारे वर्तमान उपलब्धियों के पीछे कितने वैज्ञानिकों के लगन, समर्पण,कुर्बानी और जुनून का योगदान रहा है,यह हम अक्सर पढ़ते रहे हैं। मगर मानव सभ्यता के अतीत की पड़ताल भी विज्ञान के शोध की तरह ही रहा है, यह कम लोग जानते हैं।प्राचीन सभ्यताओं को प्रकाश में लाने,उनके उत्खनन, लिपियों को पढ़ने के लिए कितनी मेहनत की गई है,कितनी समस्याओं से जूझना पड़ा है और इसे अंजाम देने के लिए कितने जुनूनी लोग हुए हैं यह जानना रोचक और प्रेरणास्पद है।

भगवतशरण जी ने इस पुस्तक में इतिहास के कुछ चुनिंदा महत्वपूर्ण प्रसंगों का जिक्र किया है।ये प्रसंग पुरातत्ववेत्ताओं अथवा इतिहास की पड़ताल में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के जुनून, उनके समर्पण को दिखाता है कि कैसे अपने काम के प्रति समर्पण, कुछ कर गुजरने की चाह, रहस्य को सुलझा लेने की अदम्य कामना वाले व्यक्तियों के कारण हम आज अतीत को बेहतर जानते हैं। वे जुनूनी चाहते तो सुविधाभोगी जीवन जीते हुए एक औसत व्यक्ति की तरह इस दुनिया से विदा ले सकते थे,मगर उन्होंने वह राह चुनी जिसके कारण आज हम सब मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का दम भरते हैं।
                         ■

कल्पना कीजिये जब जेम्स प्रिंसेप(1837) ने अनथक श्रम के बाद ब्राम्ही लिपि को पढ़ने में सफलता प्राप्त की उस क्षण उसने कैसा महसूस किया होगा! इस 'सुख' को महसूस करने वालों की संख्या अवश्य कम हो सकती है,कइयों के लिए यह फ़िजूल का काम भी हो सकता है मगर ऐसे लोग पहले भी थे और आज भी हैं। कहना न होगा लेखक स्वयं इस 'रोमांस' को महसूस करते हैं। लिखा है-

"उस ब्राह्मी लिपि के पठन की कहानी वस्तुतः पुरातत्त्व का रोमांस है। प्रिन्सेप.ने बारह-बारह वर्ष उसकी गाँठें खोलने के प्रयत्न किये पर वह निष्फल रहा। और एक रात जब वह सुबह के गहराते अँधेरे में ब्राह्मी अक्षरों को मन की आँखों से अपलक निहार रहा था, एकाएक उसे कुछ सूझा – ताम्रपत्रों में लिखावट का अन्त अधिकतर सदा एक ही प्रकार के अनुस्वारान्त दो अक्षरों से क्यों होता है, ताम्रपत्र वस्तुतः दानोल्लेख है, अधिकतर ब्राह्मणों को दिये दान की सनद है, कहीं अन्त के अनुस्वारान्त दोनों अक्षर संस्कृत के 'दान' शब्द को तो व्यक्त नहीं करते? और बिस्तर से कूदकर प्रिन्सेप अँधेरे में खड़ा हो गया। उसने चिराग़ जलाया और ज्ञान का चिराग़ उसी माध्यम से अचानक जल उठा — उसने ताम्रपत्रों और उनकी नक़लों पर नज़र डाली, शब्द दान ही था। दो अक्षर पढ़ लिए गये 'दा' और 'न' और जहाँ-जहाँ उनका संयोग हुआ वहाँ-वहाँ उनके ज्ञान का प्रकाश पड़ा और धीरे-धीरे एक के बाद एक ब्राह्मी लिपि के सारे अक्षर सार्थक हो उठे।" (पृ.14)

                          ■

मिश्र की प्राचीन सभ्यता अपने विशालकाय पिरामिडों और हजारों साल से सुरक्षित शवों 'ममी' के लिए चर्चित रही है।एक तो इन उन शवगृहों तक पहुंचना, उनकी सही जगह तलाशना ही दुष्कर रहा है, उस पर प्रायः उन प्राचीन शवगृहों को पूर्व में ही उनमें उपलब्ध 'खजानों' के कारण लुटेरों द्वारा लुटा जा चुका होता है। ऐसे में कोई सुरक्षित शवगृह ढूंढा जाना अपने आप मे इतिहास की बड़ी उपलब्धि थी। इस काम को अमेरिकी पुराविद हॉवर्ड कार्टर (1922) ने कर दिखाया।

मिश्र के अधिकांश शासकों की कब्रें ढूंढी जा चुकी थी,केवल 'तूतनखामन' की बाकी रह गयी थी जिसकी अहर्निश खोज जारी थी।कार्टर भी लार्ड कार्नार्वन के साथ इस पर काम कर रहे थे।और अंततः कार्टर ने कुछ लुटेरों के क्लू से वह कब्र ढूंढ लिया।विडम्बना कि जो इतिहासकारों के लिए कठिन था वह कई बार लुटेरों के लिए अपेक्षाकृत आसान था। भगवत शरण जी लिखते हैं कि प्राचीन समय से ही कब्रें धन के लालच में लूटी जाती रही हैं। अक्सर इसमे उनमें काम करने वाले मजदूरों तथा पुरोहितों की भूमिका हुआ करती थी। कार्टर ने देखा कि लुटेरे तूतनखामन की कब्र में भी प्रवेश कर चुके थे और चीजें बिखरीं थी। फिर भी इतने सामानों का सुरक्षित रहना आश्चर्य की बात है। सम्भवतः लुटेरे जल्दबाजी में थे या उनकी उपस्थिति का पता लग गया होगा और वे भाग खड़े हुए हों और चैंबर को बाद मे फिर सील किया गया होगा।

भागवत शरण जी किस तरह इतिहास के विस्मयकारी विवरणों के बीच मानवीय सम्वेदना ढूंढ लेते हैं उसकी बानगी देखिए-

"और तभी लोगों ने कुछ और देखा, ऐश्वर्य और राजसी वैभव से भरे स्वर्ण को राशि से दमकते उस कक्ष को सहज मानवीयता से मुखर करता एक अत्यन्त मर्महर दृश्य–विदा के अन्तिम क्षणों में प्रिय के सवर्णभाल पर प्रिया द्वारा छोड़ा फूलों का हार। फूल कुम्हलाकर सूख गये थे, पर रंग उनके अब भी पहचाने जा सकते थे। सवा तीन हज़ार साल जैसे अपनी काल-परिधि को लाँघ पास आ गये। अतीत चाहे जितनी भी दूर का हो, वर्तमान से कितना निकट है! कारण कि दोनों एक ही काल-प्रसार के छोर हैं, कारण कि अजस्र बहती मानवीयता दोनों को अपने स्नायुओं से जोड़े हुए है। अपने अट्ठारह वर्षीय प्रिय तूतनखामन को उसकी प्रिया ने किस साध से प्यार किया था, किस करुण कठोरता से वह उससे अन्तकाल में विलग हुई थी, यह इन सहस्राब्दियों पार के रंगों को, रस की वर्णिम दीप्ति को, आज भी जीवित रखनेवाली मालिका के फूलों से प्रकट है।"(पृ. 34)

तूतनखामन के खजाने का ध्यान सबको रहा,फूल को नजरअंदाज किया गया!

तूतनखामन के मकबरे की खोज के बाद उससे जुड़े व्यक्तियों के निधन से उस समय एक अफवाह फैली कि यह फ़राओं के शांति भंग करने का अभिशाप है। यद्यपि मरने वालों के निधन के अपने कारण बताए गए फिर भी इस अफवाह की गूंज आज भी 'कहानी को रोचक' बनाये रखने के लिए दोहराई जाती है।

                               ■

इटली के दो नगर 'हरकुलियस' और 'पॉम्पेई' ईसवी के प्रथम शताब्दी(79 ई.) में विसूवियस ज्वालामुखी के फटने से लावा और राख में दबने से कुछ घण्टो में नष्ट हो गए थे।लोगो को सम्भलने तक का समय नहीं मिला और जो जहां जिस हाल में था लगभग उसी अवस्था मे वहीं दफ़न हो गया। जिन्हें थोड़ा वक्त मिला वे भी कुछ नहीं कर सके और आस-पास ही दब गए। संयोग से रासायनिक क्रियाओं से ये लगभग पत्थर से फ़ासिल बन गए और जब इन स्थलों को खोजा गया तब जैसे पूरा शहर जीवंत हो उठा।रोम के प्रसिद्ध इतिहासकार प्लिनी भी इस अग्निकांड में मारे गए थे।

बिडम्बना कि इन नगरों को खोद निकालने वाले पुराविद 'विन्केलमान' की हत्या एक अपराधी ने धन के लालच में 1768 में कर दी थी।

                           ■

ईजियन सागर के पार लघु एशिया के सागर तट पर स्थित प्राचीन नगर 'त्राय'(ट्रॉय)के खोज की कहानी जितना रोचक है उतना ही व्यक्ति के लगन और प्रतिबद्धता का प्रतीक भी । ग्रीक पौराणिक कथाओं में एक ऐसी घटना का उल्लेख हुआ है जिसमे देवराज ज़ीयूस वृषभ का रूप धारण कर लघु एशिया से राजकुमारी यूरोपा को हर ले गया था।इस प्रकार की घटनाओं में अंतिम अन्धकवि होमर के काव्य-प्रबंध 'इलियद' में मुखरित हुई है। वह स्पार्टा की राजकुमारी हेलेन के लघु एशिया के त्राय के राजकुमार पोरिस द्वारा हरण और परिणामतः ग्रीकों द्वारा त्राय के विध्वंश की कहानी है।

1829 के लगभग इस कहानी को जर्मनी के मैकेलेंबर्ग गांव का एक सात वर्षीय बालक 'श्लीमान' अपने पिता से सुनकर इतना रोमांचित हुआ कि इस कहानी के शहर को ढूंढ निकालने का संकल्प कर लिया। "और श्लीमान ने बड़े होकर त्राय को ही नहीं, होमर के महाकाव्य इलियद के स्मरकेन्द्र को ही नहीं, क्रीती सभ्यता को खोद निकाला।"(पृ.47)लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उसने अपना जीवन दांव पर लगा दिया। इसके लिए उसने पहले मोदी के दुकान पर काम किया।एक-एक पैसा जोड़ता मगर पर्याप्त न होने पर एम्सटर्डम के एक फर्म में नौकरी की।कई भाषाएं सीखकर सेंट पीटर्सबर्ग पहुंचकर आयात-निर्यात का व्यवसाय शुरू किया।इसमे उसने काफी धन कमाया।फिर उसके बाद-

"फिर तो श्लीमान ने उस त्याग का परिचय दिया जिसका उदाहरण मानव जाति के इतिहास में नहीं। उसने अपना सारा व्यवसाय एक दिन सहसा समाप्त कर दिया और अर्जित धनराशि लेकर वह तुर्की की ओर चल पड़ा। संसार के किसी व्यापारी के पास सफल व्यापार की दुकानों की वह श्रृंखला होती तो वह स्वर्ग-अपवर्ग के सुख छोड़ उसकी साधना करता और अनन्त धन, केवल धन के स्वामित्व के लिये, अर्जित कर चलता। पर श्लीमान को वह अभीष्ट न था। उसको अभीष्ट तो त्रॉय को खोद निकालना था जो उसके जीवन के बालपन की प्रतिज्ञा थी,धन मात्र उसे पूरा करने का जरिया था।"(पृ.49)

                            ■

जलप्रलय की कहानी अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं सुमेरी,बाबुली, असूरी, खत्ती, ग्रीक, लातीनी, भारतीत,चीनी आदि में मिलती है। भगवतशरण जी के अनुसार मूल कहानी दज़ला-फ़रात नदियों के फ़ारसी खाड़ी से लगे मुहाने पर बसे सुमेर के नगरों के आदिम इतिहास से सम्बद्ध है। अन्य सभ्यताओं ने मूल प्रेरणा यहीं से ली है।भारतीय पुराणों में जलप्रलय की घटना की कहानी 'मनु' से सम्बद्ध है जिसका सबसे प्राचीन उल्लेख 'शतपथ' ब्राम्हण में हुआ है। इधर कुछ भारतीय विद्वानों मसलन डॉ रामविलास शर्मा (पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद )में  जलप्रलय की मूलकथा के भारतीय संभावना की बात की है। मगर भगवतशरण जी के अनुसार-

"जल-प्रलय की वह कहानी सबसे अधिक विस्तार से बाइबिल की पुरानी पोथी के छठे, सातवें और आठवें अध्यायों में और सुमेरी बाबुली-असूरी अभिलेखों
में लिखी है। जैसे भारतीय कहानी में जल-प्रलय से मनु जीवों की रक्षा कर नयी सृष्टि उत्पन्न करते हैं वैसे ही यहूदियों की कहानी में हज़रत नूह ने जल-प्रलय से रक्षा कर नयी सृष्टि का आरम्भ किया था। पर मनु और नूह की कहानी से पहले की जल-प्रलय- सम्बन्धी कहानी असूरी-बाबुली और सुमेरी ईंटों पर उनसे सदियों पहले-
और सुमेरी में तो सहस्राब्दियों पहले – लिख ली गयी थी असुरी-बाबुली कहानी में जल-प्रलय का नायक मनु और नूह की तरह ज़िउसुद्धू है और उससे भी पहले सुमेरी कहानी का नायक उत्-निपिश्तिम है। यह जल- प्रलय के असूरी-बाबुली-सुमेरी महाकाव्य 'गिलगमेश' में प्रबन्ध रूप से प्रस्तुत है जो संसार का सबसे पहला वीरकाव्य है। निनेवे में मिली बारह ईंटों पर 'गिलगमेश' का अधूरा काव्य लिखा पड़ा था जो अब पढ़ लिया गया है और दूसरी भाषाओं में उसी प्राचीन लिपि में लिखे अन्य पाठों से पूरा कर लिया गया है। इसके एक पाठ की ईंटें ब्रिटिश म्यूज़ियम, लन्दन में, दूसरी पाठ की ईंटें सोवियत रूस के लेनिनग्राद नगर के 'एरमिताज़ते संग्रहालय' में रखी हुई है।"(पृ.67)

जल-प्रलय की कहानी ईसा से करीब 3500 वर्ष पूर्व घटी मानी जाती है। कहानी 'क्यूनीफॉर्म' लिपी में गीली ईंटो पर लिखी गई थी। इन ईंटो को पुराविद लेयार्ड ने 'निनेवे' की खुदाई में प्राप्त किया था। मगर ब्रिटिश म्यूजियम के प्रभारी जार्ज स्मिथ ने उसे पढ़ा तो कहानी अधूरी थी।फिर उसे पूरा ढूंढने का अभियान शुरू हुआ।लंदन के प्रसिद्ध अखबार 'डेली टेलीग्राफ' के आर्थिक सहयोग से स्वयं जार्ज स्मिथ ने निवेवे की पुनः खुदाई करायी। भाग्य ने उसका साथ दिया। स्मिथ ने तीन सौ से ऊपर पट्टिकाएं लेकर लंदन लौटा जिसमे जल-प्रलय की कहानी पूरी करने वाली ईंटो पर लिखे अभिलेख भी थे। कहानी पूरी हो गयी।

                         ■

मानव सभ्यता के विकास में पुनर्जन्म और किसी और लोक की यात्रा की अवधारणा सामान्य रही है। कई सभ्यताओं में इस 'यात्रा' को सुखद बनाने के लिए राजा-रानियों के साथ उसके सेवकों, पत्नियों, पशुओं से लेकर उसके प्रिय और उपयोग के वस्तुओं को दफनाया जाता रहा है। ऐसे कब्रों में 'रानी शुबाद की कब्र' चर्चित है। सुमेरी सभ्यता के इस रानी की कब्र की खुदाई लियेलार्ड वूली ने 1927-28 में की थी।कब्र में रानी शुबाद के साथ नौ नारियों और एक पुरूष के अस्थिपंजर थे।पुरूष तन्त्री वादक था। स्त्रियां दासी थीं। पास ही जहर के प्याले थे जिससे इन्होंने जहर पीया था। रानी के श्रृंगार के लिए कीमती पिटारियाँ थी जिनके भीते अंजन से इत्र-फुलेल तक सभी सामान मौजूद थे। शुबाद के अस्थिपंजर में सिर पर ताज,कानो में भारी कुंडल,विविध हार जो सोने और कीमती पत्थरों के बने थे। चांदी-सोने की गंगा-जमुनी बकरियाँ, चांदी के जहाज, अनेकानेक अलंकरण जैसे तैसे पड़े थे।

                           ■

इसी तरह मिश्र की सभ्यता में पुनर्जन्म और मृत्यु के बाद जीवन की कल्पना ने विशाल पिरामिडों और संरक्षित शवों 'ममी' को जन्म दिया।इस पुस्तक के हवाले से देखें तो 'खुफु' के पिरामिड मे प्रवेश करने वाला पहला बाहरी व्यक्ति अंग्रेज पुराविद विलियम मैथ्यू फ्लाइन्डर्स पेट्री था जिसने 1880 में वहां प्रवेश किया था।

"पेट्री ने उन महान सम्राटों द्वारा निर्मित पिरामिडों के अचरज भीतर-बाहर से कोने-कोने देख लिये। वस्तुतः देखना उसे बाहर से कहीं ज़्यादा भीतर से था और बड़ी उम्मीदों के साथ उसने उन लाशों को खोजा जिनकी सँभाल के लिये मिस्र के फ़राऊनों ने उन आश्चर्यों का निर्माण किया था। पर खूफ़ के महान पिरामिड के शव-कक्ष में जो पत्थर का ताबूत रखा था वह खाली मिला। जिसकी रक्षा के लिए वह इमारत खड़ी की गयी थी, वह स्वयं वहाँ न था, लाश लापता थी। खुफ्रन के गगनचुम्बी पिरामिड में रखे जिस बाहरी पत्थर के ताबूत में पिरामिड-निर्माता का शव रखा गया था, उसमें अब वह शव तो न था, वहाँ वह पत्थर के टुकड़ों से ज़रूर भरा था। मनकौरा के पिरामिड में उसके शव-कक्ष में
फ़राऊन मनकौरा की 'ममी' टुकड़ों में बिखरी पड़ी थी। पेट्री ने जो खोजा वह तो नहीं पाया— राजाओं के शरीर के अवशेष वहाँ उसे नहीं मिले — पर मिस्त्री तत्त्व
का रहस्य उसने भेद डाला। हज़ारों साल पहले मरे मानव को, उसके विगत वातावरण को फिर से जिन्दा कर आज का जीवित मानव उससे सदियों की बात पूछ और जान रहा था, स्वयं मक़बरों के नीचे के पानी में हलता, कीचड़ में सना।"(पृ.80)

ये पिरामिड आज कितने भी भव्य लगें,इनके पीछे की एक हक़ीक़त यह भी है-

"देश की लाख-लाख जनता पिरामिडों के निर्माण के खर्च के लिये आवश्यक अनिवार्य 'कर' देती, बीस-बीस साल तक एक-एक फ़राऊन जीवन में तैयारी करने में, शव को समाधि देने के लिये पिरामिड बनवाने में खर्च करता,जीवन मृत की तैयारी में ही गुजर जाता। नूबिया और इथियोपिया के मजूर, फिलिस्तीन और सीरिया के मजूर, द्वीपों के मजूर लाख-लाख की संख्या में काम करते। खूफ़ के एक पिरामिड बनाने में ही एक लाख मजूरों का उपयोग हुआ था। जीवन के.पचीस से पैंतीस साल तक के सबसे ताक़तवर दस साल ये गुलाम-मजूर पिरामिडों के निर्माण में खरचते और जब एक खेवे के मजूर पैंतीस साल की उम्र में बूढ़े हो जाते, मर जाते, या बूढ़े या मरे हुए समझ लिये जाते, तब उनकी जगह दूसरों से भर ली जाती, और यही क्रम सदियों चला करता, क्योंकि पिरामिडों के निर्माण का क्रम कभी टूटता नहीं था।

निर्माण क्या था, मनुष्य की निरन्तर बलि थी। तबकी लिखी कहानी आज भी पढ़ी जा सकती है -फ़राऊन पूछता, काम ढीला क्यों चल रहा है? मन्त्री कहता,
मजूर गुलाम दोचित्ते हो गये हैं। फ़राऊन पूछता, क्यों? मन्त्री कहता, वे आप तो यहाँ हैं, उनके बाल-बच्चे दूर वतन में हैं— नूबिया में, इथियोपिया में, फ़िलिस्तीन
में, सीरिया में। फ़राऊन कहता, उनके बाल-बच्चों को बुला लो। बाल-बच्चे बुला लिये जाते, रेगिस्तान में घर की तरह दीखनेवाले बिलों में गुलामों के क़ुनबे ढूँस दिये जाते। फिर कार्य शिथिल होता और फ़राऊन पूछता, काम ढीला क्यों चल रहा है ? मन्त्री कहता, गुलाम दोचित्ते हो गये हैं। फ़राऊन पूछता, क्यों ? मन्त्री
कहता, इसलिए कि बच्चे, जो घर पर हैं, उनके लिये इन्हें मोह हो आता है, कि पत्थरों की ढुलाई में अगर जान गयी, जो अक्सर चली जाती है, तो इन बच्चों का क्या होगा? फ़राऊन कहता, बच्चों को नील में डुबा दो। और लाख-लाख.बच्चे नील-नदी की मँझधार में डुबा दिये जाते!"(पृ.81)

                         ■

सभ्यता के विकास क्रम में मानव समाज यौन नियमन के अलग-अलग मन्ज़िलों से गुजरा है। यौन साम्यवाद से एकल विवाह तक की मंज़िल के कई पड़ाव रहे हैं। यद्यपि यह भौगोलिक और समाज सापेक्षिक भी रहा है और एक ही समय मे अलग-अलग समाजो में यौन नैतिकता के मूल्य भी भिन्न-भिन्न रहे हैं।कई प्राचीन समाजो के यौन नियमन आज हमें आश्चर्य चकित लग सकते हैं। लेखक ने प्राचीन बाबुल के 'ज़िग्गुरत' का उदाहरण दिया है जहां प्रत्येक विवाहिता पत्नी को पत्नीत्व का कानूनी अधिकार तभी मिलता, जब वह फीस लेकर अजनबी से सहवास कर लेती। इस प्रयोजन के लिए काम की देवी मिलित्ता के मंदिर को चुना जाता था। ज़ाहिर है यह घटना काम तृप्ति के लिए नहीं अपितु सामाजिक आधार के लिए बरती जाती।

भागवत शरण जी भारतीय मंदिरों में काम मूर्तियों का चित्रण, देवदासी प्रथा, शलभंजिकाओं के चित्रण को इसी परंपरा से जोड़ते हैं-

"और कोनारक(कोणार्क) तो प्रतीक मात्र है, उसके प्रकार के मन्दिरों की संख्या अनेक हैं, पुरी से खजुराहो तक। यह कहना तो आज कठिन है कि कोनारक और तत्सम मन्दिरों का सम्बन्ध वेश्याओं अथवा उनकी वृत्ति से था या नहीं पर उनके बहिरंग रूपायन से स्पष्ट प्रकट है कि काम-विलास की अनन्त प्रक्रियाएँ उन मन्दिरों- द्वारा समादृत हुई थीं। कोनारक, भुवनेश्वर, पुरी, काशी, खजुराहों के मन्दिरों के बहिरंग हज़ारों यौन आसनों से अलंकृत हैं, जिनके मन्दिरों से सम्बन्ध की चर्चा में काफ़ी विस्मय प्रकट किया जाता है। यद्यपि जिस सन्दर्भ में हम इस प्रसंग को देख रहे हैं उसमें विस्मय का स्थान है नहीं। इन मन्दिरों के इन यौन-सन्दर्भों की परम्परा का प्रारम्भ तो स्थापत्य-वास्तु में, पूजन के सान्निध्य में, भारत में भी कब का हो गया था। साँची के महान स्तूप को घेरनेवाली दूसरी पहली सदी ई. पू. की रेलिंगों पर आदमकद नग्न शालभंजिकाएँ निर्मित हैं और मथुरा के जैन स्तूप की कला की तो गौरव ही फेरने वाली रेलिंगों की नयी नंगी यक्षिणियाँ हैं, जिनका कामविलास उससे भिन्न नहीं जिसकी ओर कालिदास ने अपने 'मेघदूत' में यक्षों को नायक बनाकर संकेत किया है। देवालयों के शृंगारिक रूपायनों और यौन उत्कीर्णनों का, अर्द्धचित्रों का, घना सम्बन्ध था, प्राचीन प्रतीकों के अतिरिक्त,एलोरा के कैलास मन्दिर से लेकर खजुराहो के मन्दिरों तक।"(पृ.86)

यद्यपि देवालयों में काम मूर्तियों के चित्रण सम्बन्धी और भी स्थापनाएं हैं जिनका चित्रण भगवतशरण जी ने नहीं किया है।

                            ■

मिश्री सभ्यता के 'रहस्य' को समझने में 'रोज़ेत-शिला' कुंजी साबित हुआ। इसकी प्राप्ति से ही मिश्र की चित्र-लिपी को पढ़ने सफलता प्राप्त की जा सकी। यह अभिलेख नेपोलियन के अभियान के दौरान 1798 में नील नदी के रोज़ेता नामक मुहाने पर प्राप्त हुआ था।इसमे तीन-तीन लिपियों में एक ही लेख खुदा है। सबसे ऊपर चौदह पंक्तियों में सिंह,बाज, सर्प, मनुष्य, हाथ-पैर आदि के चित्र बने थे।बीच में बत्तीस पंक्तियों में अनेक प्रकार के चिन्ह बने थे,जिनमे जहाँ-तहाँ चित्रों की आकृतियां भी दिखाई पड़ती थीं। नीचे तीसरी लिखावट ग्रीक अक्षरों की थी,ग्रीक भाषा मे लिखी,54 पंक्तियों में।
चूंकि रोमन लिपि ज्ञात थी इसलिए मिश्री लिपि को तुलनात्मक अध्ययन से पढ़ने की सम्भाबना बढ़ गयी।

लिपि को पढ़ने में एक समस्या और सुलझानी पड़ती है। लिपिबद्ध भाषा की। इस समस्या को सुलझाया इंग्लैंड के भौतिक विज्ञानी टामस यंग ने। उसने पता लगाया कि वह भाषा 'कुफ़्ती' थी। इस टामस ने सफलता की दिशा को आगे बढ़ाया मगर लिपि को पूरी तरह डिकोड करने में फ्रांस के फ्रांस्वा शाम्पोलियो ने सफलता प्राप्त की।

शाम्पोलियो बेहद प्रतिभाशाली था।19 साल के लगभग वह विश्वविद्यालय में इतिहास का प्रोफेसर हो गया था।

"शाम्पोलियो ने पाया-जिस सम्बन्ध में हर किसी ने भूल की थी- कि चित्राकृतियाँ मिश्री चित्र-लिपि में केवल वस्तु के रूप की ओर ही संकेत नहीं करतीं,वे कई बार ध्वनित चिन्ह का रूप भी ले लेती हैं, कितनी ही बार ध्वन्यात्मक वर्ण या अक्षर भी बन जाती हैं। और एक साथ उस चित्र-लिपि, चिह्न और विचार-चित्र-लिपि का भेद खोलकर रख दिया। आज जो मिस्त्री लिपियों का अध्ययनविद्यार्थी करते हैं उन्हें गुमान भी नहीं कि उनके 'प्राइमरों' के तैयार होने में शाम्पोलियों का कितना रक्त सूखा है, उसको निर्धनता से कितना युद्ध करना पड़ा
है, कितनी उनींदी रातें बितानी पड़ी हैं, कितनी मेधा का खर्च हुआ है।

कारतूसों के भीतर बन्द संज्ञा-नामों के अक्षरों को विचारचिन्हों, ध्वन्यात्मक वर्णों के रूप में अन्य चित्रों से वह सालों सम्बन्धित करता गया और एक दिन उनका समूचा भेद खुल गया। सहस्राब्दियों पहले प्रस्तुत, सहस्राब्दियों पहले विस्मृत, मिस्त्री लिपियों का पढ़ा जाना सुकर हो गया। रोजेता शिला की मिस्री लिपियाँ दो प्रकार की थीं: चित्र-लिपि और चिह्न लिपि । वस्तुतः अतिप्राचीन काल में ही मिस्र में चित्र-लिपि का आविष्कार हुआ था जिसका पहले और अधिकतर उपयोग धर्मसम्बन्धी, देवसंज्ञक विषयों के आलेखों के लिये हुआ। हज़ारों साल बाद उस पवित्र लिपि का उपयोग जनसाधारण ने करना चाहा जिसका पुरोहितों से सम्बन्धित 'हिरेटिक' नाम पड़ा, जो सर्वथा चित्र-लिपि से कुछ भिन्न थी। ईसा से अनेक सदियों पहले उस लिपि का एक तीसरा रूपान्तर हुआ, तेज़ लिखने के लिये, 'देमोतिक' कहलाया। वैसे तो प्राचीनतम 'हीरोग्लीफ़िक' अथवा चित्र-लिपि में चिह्नों, ध्वन्यात्मक अक्षरों का आरम्भ हो गया था पर उनका विशेष विकास देमोतिक में ही हुआ। शाम्पोलियों ने तीनों में से प्रत्येक मिस्री लिपि को पढ़कर उनके विविध प्रकारों का अन्तर खोज निकाला। और प्राचीन मिस्र की समूची सभ्यता, उसके देवताओं और उपासकों के समूचे धर्मादेश और विश्वास, उसके सम्राटों की विजय प्रशस्तियाँ, उसका सारा पिरामिडों, मन्दिरों, स्तम्भों की।दीवारों पर खुदा साहित्य सहस्राब्दियों बाद मनुष्य के अध्यवसाय से पढ़ा जाने लगा।"(पृ.94)

प्रसंगवश सिंधुघाटी सभ्यता के लिपि के अभी तक नहीं पढ़े जा सकने का एक कारण अभी तक किसी द्विभाषिक अभिलेख का न मिलना भी है जिसमे एक लिपि पढ़ी जा चुकी हो। यानि इस सभ्यता को अभी भी अलनी 'रोजेटा-शिला' की तलाश है।

                     ■

सिंधुघाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में राखलदास बनर्जी द्वारा एक कुषाण कालीन बौद्ध स्तूप के खुदाई से हुई।दरअसल स्तूप के नीचे गहरे में इस सभ्यता के अवशेष थे,और स्तूप का निर्माण भी उसी सभ्यता के ईंटो से कराया गया था। मोहनजोदड़ो स्थानीय भाषा का शब्द है जिसका अर्थ 'मृतकों का टीला' है। विडम्बना की आधुनिक काल मे भी इस स्थल ने मनुष्य की 'बलि' ले ली। दरअसल 1937 में प्रतिभाशाली इतिहासकार ननिगोपाल मजूमदार की उत्खनन के दौरान पैसे की लालच में बलुची कबीलाई डाकुओं ने हत्या कर दी थी। मोहनजोदड़ो अपने नगर नियोजन, सड़को, नालियों के प्रबंधन के लिए प्रसिद्ध है।

                      ■

पन्द्रहवी शताब्दी के अंत मे इतावली नाविक कोलम्बस ने चीन और भारत की सीधी राह खोजने, सोने का नगर 'एल्दोरादो' खोजने स्पेन से चल पड़ा था। भारत और चीन तो राह के अंत मे होने से उसे नहीं मिले और बीच मे ही अमेरिका महाद्वीप आ मिला और उन्होंने उसे ही भारत कहा और उसके निवासियों को इंडियन अथवा भारतीय। मगर वह उन 'मयों' का साम्राज्य था जिसे आज रेड इंडियन के नाम से पुकारते हैं। माया सभ्यता की खोज का श्रेय स्टीफेंस और टॉमसन को जाता है। फके ने माया सभ्यता के नगरों का पता लगाया, दूसरे ने 'चिचेनइट्ज़ा' के नरभोजी कुँए का।

"हाँ, मय लोगों के साम्राज्य भी थे, फैले साम्राज्य, जिनकी सीमाए कम से कम चार बड़े राज्यों— मैक्सिको, होन्दूरस, गुआतेमाला और युकातान—को घेरती थीं। साम्राज्य जो अनजाने युगों से चलकर 16वीं सदी ई. के मध्य तक बचा रहा था और जिसका नाश कोलम्बस के बाद साम्राज्य निर्माण की कामना से वहाँ पहुँचने वाले स्पेनियों ने किया। उनकी ही एक जाति आज भी संयुक्त राज्य अमेरिका में बसी 'इंडियन' कहलाती है जो अधिकतर गोरे अमेरिकनों से मिलने से परहेज़ करती है और जिनके गाँव में बसनेवाले कुनबे न तो अपने बच्चों को अमेरिकी स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं और न रुढ़िवादी बूढ़े अमेरिकनों का मुँह तक देखना चाहते हैं । उनके घर मिट्टी के हैं, उनकी भाषा अपनी है। मध्य अमेरिका.में रहनेवाले उनके भाई - बन्द – इंका, परूबियन, मायन आदि — कहलाते हैं और अपने गोरे मालिकों से भिन्न बादामी रंग के प्रायः नौकरों की ज़िन्दगी बिताते हैं। उन्हीं के पूर्वजों ने कभी मध्य अमेरिका में अपने साम्राज्य खड़े किये थे। इ
मयों का उस मय असुर से कोई सम्बन्ध नहीं, जो प्राचीन असुरिया का था, जिसके नाम का उल्लेख बार-बार भारतीय वास्तु-ग्रन्थों में हुआ है। ये मय कौन थे, इसका
पता आज तक नहीं चला, यद्यपि अटकल इस सम्बन्ध में अनेक लगाये गये हैं"(पृ.105)

माया सभ्यता के चिचेनइट्ज़ा के मंदिर में बलि का कुआं है जिसमे उस समय देश मे अकाल पड़ने और संकट आने पर युवक-युवतियों की बलि दी जाती थी।

"स्पेन की राजधानी माद्रिद में 1863 में एक डायरी मिली। डायरी युकातान के आर्चबिशप दिएगो दे लान्दा ने लिखी थी, प्रायः तीन सौ साल पहले, 1566
में। दे लान्दा ने मय ख्यातों के आधार पर लिखा था-
'जब-जब देश में अकाल पड़ता, उस पर संकट आता, तब-तब पुजारियों और साधारण जनता का, पाताल के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, जुलूस निकलता। पुजारी क़ीमती और पवित्र चढ़ावे की वस्तुएँ लिये जाते और उन्हें बलिके कुएँ में झोंक देते। चढ़ावे की इन पवित्र वस्तुओं में लावण्यवती सुन्दरियाँ होतीं,.युद्ध में पकड़े तरुण होते।'

फिग्ररोआ का वृत्तान्त सुनिए-
‘देश के स्वामियों और श्रीमानों की रीति थी-साठ दिन संयमपूर्वक उपवास कर वे पौ फटते ही बलि के कुएँ पर जा पहुँचते। फिर उनमें से प्रत्येक स्वामी और श्रीमान इंडियन (रेड इंडियन) जाति की अपनी स्त्रियाँ कुएँ में यह कहकर डाल देते कि देवता से माँगना कि स्वामी का साल उसके मनोरथों को पूरा करे। 'हाथ-पैरों से निर्बन्ध नारियाँ धमाके के साथ तेज़ी से जल में गिरतीं। अगले दोपहर उनमें से जो चिल्लाकर पुकार सकती थीं, पुकारतीं, और डोरें ऊपर से उन तक लटका दी जातीं। जब वे अधमरी ऊपर आतीं, उनके चारों ओर अलाव जला दिये जाते, सुगन्धित द्रव्यों का धुआँ कर दिया जाता। जब धीरे-धीरे वे होश में आतीं तब कहतीं-नीचे हमारी जाति के अनेक लोग हैं, नर-नारी और उन्होंने हमारा स्वागत किया था। और जब वे उन्हें देखने सिर ऊपर करतीं तब उन पर मार पड़ती, और जब चोट से तिलमिलाकर वे अपने सिर नीचे झुकातीं तब उन्हें लगता कि नीचे अतल गहराइयाँ और गढ्ढे दिखाई पड़ रहे हैं, और तब नीचे वाले लोग स्वामियों के वर्ष-फलक के सम्बन्ध में उनके प्रश्नों का उत्तर देते।"

कल्पना की जा सकती है अंधविश्वास के करण कितने अकाल मौत मरते थे! एडवर्ड टॉमसन ने लांदा के ये विवरण पढ़े थे और औरों की तरह उस पर अविश्वास नहीं किया अपितु उस बलिकूप को ढूंढने की ठान ली और अंततः चिचेनइट्जा और उसके बलिकूप को ढूंढ निकाला।

"चिचेन इत्ज़ा के उस पवित्र बलि-कूप में सबसे अधिक महत्त्व की मिली.वस्तुओं में प्रधान नर-कंकाल थे जिनमें अधिक संख्या नारी अस्थि-पंजरों की थी। और उनसे भी कहीं अधिक दिलचस्प एक खोपड़ी थी, बूढ़े मर्द की खोपड़ी। बूढ़े आदमी का भोग कूप का देवता कभी स्वीकार नहीं करता था, इससे स्पष्ट है कि बूढ़े आदमी को कूप में डाला जाना पुजारियों को सम्मत न रहा होगा।क्या यह सम्भव है कि कोई जवान मर्द या लड़की अपने भाग्य के साथ क्रूर पुरोहितों को भी एक झटके में बलि कूप के देव की भेंट के लिए घसीटती चली गयी
हो ?"(पृ.125)

                       ■

आगे के अध्यायों में भगवतशरण जी ने गान्धार में बौद्ध प्रभाव, पाणिनि,सन्त थॉमस का उस क्षेत्र में आगमन, ग्रीक और भारतीय संस्कृति से बने गांधार कला,बुद्ध की प्रारंभिक मूर्तियों का जिक्र किया है।

मृदगांव(सारनाथ) जहां बुद्ध ने 'धर्मचक्र प्रवर्तन' किया की खोज, सहेठ(श्रावस्ती) की खोज,अम्बपाली की अमराई,कंकाल पहरुआ का जिक्र है।

फिर 'पुरातत्व की पुजारिन' ग्लैडिस और आइलीन तथा पुरातत्वेत्ता वेंडेल फिलिप्स के अरब अभियान,संकट और बच निकलेने का रोचक जिक्र है।

आख़िर में मृत सागर के तीर की गुफाओं में मिले अभिलेखों को प्राप्त करने की कठिनाइयों का जिक्र है।

इस तरह पूरी पुस्तक रोचक विवरणों से भरा है।इसमे जानकारी के साथ गद्य का प्रवाह भी है जो इतिहास जैसे विषय के लिए दुर्लभ है। ऐसा भी नहीं कि इसके लिए ऐतिहासिकता से समझौता किया गया हो। लंबे उद्धरण देने से लेख लम्बा अवश्य हो गया है मगर उस 'रोमांस' को पाठकों को महसूस करवाने के लिए यह आवश्यक लगा। यह मात्र झलक है प्यास बुझाने के लिए पुस्तक तक जाना होगा।


—-----------------------------------------------------------------
पुस्तक- पुरातत्व का रोमांस
लेखक-भगवतशरण उपाध्याय
प्रकाशन-भारतीय ज्ञानपीठ
प्रकाशन वर्ष-1967
—--------------------------------------------------------------------
    
● अजय चन्द्रवंशी,कवर्धा(छत्तीसगढ़)
मो. 9893728320

Thursday, 12 May 2022

आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ


संवादों में व्यंग्य की संभावनाओं की तलाश

राहुल देव द्वारा संपादित एवं संयोजित पुस्तक ‘आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ’ कई मायनों में महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है। किसी भी विचार या सम्प्रत्यय पर विमर्शों के आयोजन उसके प्रचार-प्रसार को नवीन सम्भावनाएँ प्रदान करने में सहायक होते हैं। व्यंग्य एक ऐसी विधा है जो लंबे समय से रची जा रही है। परंतु यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आज की तारीख़ में व्यंग्य विधा है, स्प्रिट है, शिल्प है या बात को कहने का एक अलग ढंग है। कुछ भी हो, व्यंग्य अपनी भाषा,कहन और संस्कारों के साथ साहित्य जगत् में कहीं न कहीं हलचल तो मचाता ही है। हिंदी साहित्य में आज से नहीं बल्कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय से ही व्यंग्य अपने प्रभावों के साथ रचा-बचा हुआ है। इससे पहले भी काव्य में व्यंग्य अपना स्थान किसी न किसी रूप में ग्रहण करता रहा। इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ’ पुस्तक व्यंग्य पर आधारित साक्षात्कारों के रूप में प्रस्तुत की गई है। लेकिन ये साक्षात्कार मात्र ऐसे साक्षात्कार नहीं बनकर रह गए हैं कि जिनमें कुछ प्रश्न दिए जाएँ और उनके उत्तर प्राप्त किए जाएँ। साक्षात्कार की मूल संकल्पना तो प्रस्तुत पुस्तक में उपलब्ध है ही, साथ ही साथ इन सभी साक्षात्कारों के प्रश्न विमर्श की एक मजबूत श्रृंखला भी उत्पन्न करते हैं। इसे हम ‘व्यंग्य विमर्श’ कह सकते हैं। पुस्तक के संपादक-संयोजक राहुल देव द्वारा व्यंग्य से सम्बंधित पच्चीस-छब्बीस प्रश्नों की एक प्रश्नावली तैयार की गई है और उन्हें कुल चौदह व्यंग्यकारों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक व्यंग्यकार के सामने प्रश्न वही हैं परंतु उनका उत्तर सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोणों और अभिरुचियों के अनुसार दिया है। वैचारिकता और विश्लेषण के विभिन्न गवाक्षों में जब व्यंग्य साहित्य के वैभव विस्तार को देखा गया है, तब बहुत ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी उत्तर भी प्राप्त हुए हैं। व्यंग्य की सामर्थ्य, उसकी आलोचना, विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए योगदान, व्यंग्य में हास्य और करुणा की उत्पत्ति, व्यंग्य की भाषा, व्यंग्य और समकालीन चिंतनधारा, व्यंग्य का लोकधर्मी और जनसंवादी रूप, व्यंग्य साहित्य की समालोचना, व्यंग्य के प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान, व्यंग्य में वैश्वीकरण- उत्तर आधुनिकता- बाजारवाद-महामारी-असहिष्णुता-सांप्रदायिकता-उग्र राष्ट्रवाद जैसे ज्वलंत विषयों की अभिव्यक्ति, दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श और व्यंग्यकार की वैचारिक प्रतिबद्धता जैसे विविधवर्णी प्रश्न व्यंग्य पर न केवल नई दृष्टि डालते हैं, बल्कि व्यंग्य विधा का अपना एक शास्त्र भी इनके माध्यम से विकसित करते हैं। अंत में व्यंग्य लेखन के कारण व्यक्तिगत जीवन में किए गए संघर्षों का सामना, विश्वविद्यालयों में व्यंग्य की स्थिति और व्यंग्य के भविष्य पर भी प्रश्न किए गए हैं।

 

           प्रथम साक्षात्कार सूर्यकांत नागर का है जिसमें विभिन्न प्रश्नों के आलोक में उन्होंने अपने उत्तर दिए हैं। एक अच्छा व्यंग्य क्या है, इस पर उत्तर देते हुए वे कहते हैं,“व्यंग्य में लोकमांगलिक चेतना होनी चाहिए। परिवेश जितना व्यापक होगा, संवेदना जितनी तीव्र होगी, विसंगति जितनी गहरी होगी, अभिव्यक्ति जितनी तिलमिला देने वाली होगी; व्यंग्य उतना ही सार्थक होगा। वरिष्ठ व्यंग्यकार सूर्यबाला डिमांड और सप्लाई के बीच गुणवत्ता का स्तर न संभाल पाने और व्यंग्य के बाज़ार की माँग के हिसाब से अपने आप को तुरत-फुरत ढालने की आपाधापी को वर्तमान समय में लिखे जा रहे व्यंग्य की असली चुनौतियाँ मानती हैं। प्रेम जन्मेजय व्यंग्यकार होने के साथ-साथ प्रख्यात पत्रिका ‘व्यंग्ययात्रा’ के कुशल संपादक भी हैं। आपके व्यंग्य नाटक भी पर्याप्त चर्चा में रहे हैं। साक्षात्कार में दिए गए उनके उत्तर जितने सटीक और विश्लेषणात्मक हैं, उतनी ही व्यंग्यात्मकता से भरपूर भी हैं। प्रेम जन्मेजय व्यंग्य को बौद्धिक चेतना के आलोक में देखते हैं।उनकी व्यंग्य के अर्थ को केवल एक सुशिक्षित मस्तिष्क ही ग्रहण कर सकता है। प्रेम जन्मेजय के उत्तर अपेक्षाकृत लंबे हैं और व्यंग्य पर एक बड़े विमर्श की प्रशस्त करते चलते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों से पर्याप्त चर्चित हैं। अपने उपन्यास ‘मरीचिका’ की पौराणिक भाषा में व्यंग्य साधने पर वह विस्तार से बात करते हैं। उनकी दृष्टि में समकालीन व्यंग्य अलग तरह के उत्सव में मुब्तला है।

 

         किसी भी विधा के लिए समीक्षा-समालोचना की प्रक्रिया विधा को वैचारिक प्रसार प्रदान करने में सहायक होती है।राहुल देव स्वयं भी कविता और व्यंग्य के सुधी समालोचक रहे हैं, इसीलिए उन्होंने व्यंग्य की आलोचना पर भी प्रश्न रखे हैं। हिंदी साहित्य की मुख्यधारा की आलोचना ने समकालीन व्यंग्य से दूरी ही बनाए रखी है। परंतु धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है। इससे सम्बंधित प्रश्न का उत्तर देते हुए जवाहर चौधरी व्यंग्य की समालोचना पर कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की सूचना देते हैं। अरविंद तिवारी की दृष्टि में हास्य को व्यंग्य में से निकाला नहीं जा सकता। सर्वश्रेष्ठ हास्य वह है जिसमें हास्य की स्थितियाँ होते हुए भी करुणा उत्पन्न हो। अश्विनी कुमार दुबे भी व्यंग्य का उत्स करुणा में मानते हैं। कैलाश मंडलेकर व्यंग्य को एक किस्म का अक्षर युद्ध स्वीकार करते हैं और आज के विडम्बनापूर्ण समय के यथार्थ की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए व्यंग्य और उसकी सामाजिक उपादेयता को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनकी दृष्टि में व्यंग्य समाज को आईना दिखाता है और बाज़ारवाद के दौर में लोग अपने समय के सत्य से दूर भागते हैं। आज के दौर में लिखे जा रहे व्यंग्य की असली चुनौतियों के सम्बंध में गिरीश पंकज का विचार है,“समकालीन सिस्टम ऐसे व्यंग्य पसंद नहीं करता जो उसका चीरहरण कर ले। और भूल से अगर किसी जगह विद्रोही किस्म का व्यंग्य छप भी गया तो छापने वाले की फजीहत हो सकती है। इसलिए अब चलताऊ किस्म के व्यंग्य ही अधिक लिखे जा रहे हैं और यही चुनौती है कि व्यंग्य की धार कुंद होती जा रही है।” गिरीश पंकज व्यंग्य को साहित्यिक संस्कारों और लोकमंगल की भावना के साथ रचे जाने पर जोर देते हैं। राजेंद्र वर्मा व्यंग्य के अतिशय सीमित शब्दों में लिखे जाने को व्यंग्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं मानते। व्यंग्य की चुनौतियों पर बात करते हुए उनका कथन है,“व्यंग्य में लेखकीय दायित्व का निर्वाह प्रमुख चुनौती है। व्यंग्य अख़बारों के कालम के हिसाब से लिखे जा रहे हैं, विशेषतः उनकी विचारधारा और सम्पादकों के निर्देशों को ध्यान में रखकर। ऐसे में व्यंग्य जिसे सत्ता का स्थायी प्रतिपक्ष माना जाता है, अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहा है।” किसी भी रचना के सर्जन से पहले ही यदि उसका एक खाँचा या ढर्रा फिक्स कर दिया जाए तो यह स्थिति कदापि अच्छी नहीं कही जा सकती। अजय अनुरागी व्यंग्य के समक्ष चार स्तरों पर चुनौतियों को स्वीकारते हैं--स्वयं के स्तर पर, समाज के स्तर पर, सत्ता के स्तर पर तथा प्रशासन के स्तर पर। उनकी दृष्टि में लोक संवेदना और जनपीड़ा का अनुभव करने वाला व्यंग्यकार ही अपनी आक्रोशमयी अभिव्यक्ति को जनसंवाद से जोड़ सकेगा। इंद्रजीत कौर अच्छे व्यंग्य में विसंगतियों पर पैनी नज़र, पैनी कलम, पात्र-समय और पृष्ठभूमि के अनुसार भाषा, यथोचित प्रतीक, स्पष्ट विचार, विचार का अंत तक निर्वाह;इन तत्त्वों की उपस्थिति को आवश्यक मानती हैं। आज के उतावलेपन के दौर में व्यंग्यकार जनता से सीधा सम्वाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। अनूपमणि त्रिपाठी इसे ‘स्टंट और इंस्टेंट’ का दौर कहते हैं। ऐसे में कंटेंट का संकट होना लाजिमी ही है। जो कॉमेडी आज फिज़ाओं में तैर रही है, वस्तुतः वह हास्य नहीं अपितु हास्यास्पद है। पंकज प्रसून व्यंग्य का मूल स्वर प्रतिरोध मानते हुए व्यंग्य के उज्ज्वल भविष्य पर कहते हैं,“जब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी, भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद रहेगा; व्यंग्य का भविष्य उज्ज्वल ही रहेगा। इसमें कोई संशय नहीं।”

 

         इन सभी प्रश्नों में और उनके उत्तरों में एक बात कॉमन है। अधिकांश व्यंग्यकारों ने व्यंग्य परम्परा को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय हरिशंकर परसाई,शरद जोशी,रविंद्र त्यागी को दिया है। इसी प्रकार व्यंग्य की सार्वकालिक महान कृति पर बात करते हुए अधिकांश व्यंग्यकारों का उत्तर ‘राग दरबारी’ प्राप्त हुआ है। इससे इन कृति और कृतिकारों की व्यंग्य क्षमता का आकलन सहज रूप से ही किया जा सकता है।

 

             पुस्तक में जितने भी साक्षात्कार हैं, सभी में दिए गए उत्तर बौद्धिकता और वस्तुनिष्ठता से भरपूर है। व्यंग्य समय और समाज की विद्रूपताओं को सामने लाता है। जब इन पच्चीस-छब्बीस प्रश्नों को समकालीन साहित्य के प्रख्यात् व्यंग्यकारों के सामने रखा जाता है, तब व्यंग्य को रचने-लिखने के साथ-साथ व्यंग्य को देखने-समझने के उनके दृष्टिकोण का भी पता चलता है। राहुल देव के शब्दों में,“यह गोलमेज टाइप का विमर्श साक्षात्कार के फॉर्म में है। इसकी उद्देश्यपरकता और विषयवस्तु को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक को साक्षात्कार की पुस्तक के बजाय व्यंग्य विमर्श की किताब कहना ज्यादा उचित होगा।” अपनी उपयोगिता और उद्देश्य को प्रस्तुत पुस्तक स्वयं सिद्ध करती है। व्यंग्य विधा की विशिष्टता से परिचित होने के लिए यह पुस्तक निश्चित रूप से पठनीय और संग्रहणीय है। यह पुस्तक व्यंग्य पर संवादों में संभावनाओं की तलाश करती दिखाई देती है। व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के साथ संपादक राहुल देव की पूर्व प्रकाशित साक्षात्कार पुस्तक ‘साक्षी है संवाद’ की परम्परा में ही प्रस्तुत पुस्तक को देखा-जाना चाहिए ।

 

पुस्तक: आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स, नोएडा संपादन: राहुल देव मूल्य: 400/- (पेपरबैक) पृष्ठ: 230

 

 

-          डॉ. नितिन सेठी

सी-231,शाहदाना कॉलोनी

बरेली(243005)

मो. 9027422306

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...