Saturday, 15 October 2022

भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर ले जाती एक रचना

सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जीवन भर मुक्त हंसी से विपन्न, शोषित और पीड़ित मानवता के लिए वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे और स्वयं अकिचन बने रहे, किंतु उनकी स्वयं की पीड़ा वैसी थी जिसमें साधारण मानव रोने बिलखने और कराहने लगे, पर उन्होंने पीड़ा से जूझते हुए उपफ तक नहीं किया। उनकी पीड़ा वस्तुतः संगीत का रूप धारण कर चुकी थी और इसी का परिणाम है- राम की शक्ति पूजा | बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित 1936 में 'भारत' नामक दैनिक पत्र में प्रकाशित 312 पंक्तियों की यह विराट कविता भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचती है। एक नजर डाल रही है निहारिका गौड़...

'राम की शक्ति पूजा'

कालजयी रचना की यह विशेषता होती है कि समय के प्रवाह में उसमें नए अर्थ भरते चले जाएं। सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जीवन भर मुक्त हंसी से विपत्र, शोषित और पीड़ित मानवता के लिए वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे और स्वयं अकिंचन बने रहे... किंतु उनकी स्वयं की पीड़ा वैसी थी जिसमें साधारण मानव रोने, बिलखने और कराहने लगे, पर उन्होंने पीड़ा से जूझते हुए उफ्फ तक नहीं किया। उनकी पीड़ा वस्तुतः संगीत का रूप धारण कर चुकी थी और इसी का परिणाम है राम की शक्ति पूजा।

बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित 1936 में 'भारत' नामक दैनिक पत्र में प्रकाशित 312 पक्तियों की यह विराट कविता भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचती है। स्मृति संचारी के माध्यम से गहरी प्रबन्धात्मक योजना के साथ मौलिक छंद में रची गई इस तत्सम प्रधान कविता में घटना के तीन पड़ाव है जिसमें कल लड़े गए युद्ध का पूरा वर्णन आगे की व्यूह रचना एवं आठ दिनों तक निरंतर चलने वाली शक्ति पूजा और उसको अंतिम परिणीति का अनुपम दृश्य है।

पहले अनुच्छेद की अट्ठारह पंक्तियों में राम-रावण युद्ध का वर्णन है। दूसरे अनुच्छेद की बारह पंक्तियों में राम और रावण दोनों पक्ष की सेनाओं के लौटने की सूचना है। तीसरे अनुच्छेद में शिविर में बैठकर सेनापति एवं अन्य सभी योद्धा मिलकर अगले दिन के रण की योजना बनाने की तैयारी में हैं। चौथे अनुच्छेद में राम के सैन्य शिविर के परिवेश का वर्णन करते हुए राम के मन में चलने वाले उथल- पुथल के साथ पूर्वदीप्ति शैली के माध्यम से जानकी वाटिका में राम सीता मिलन की स्मृति और फिर आज के युद्ध मिली असफलता तथा उससे उत्पन्न आशंका व्याकुलता का वर्णन है। पांचवें अनुच्छेद में राम के आसुंओं को देखकर शक्ति के प्रति हनुमान के क्रोध को उजागर किया है |

छठे अनुच्छेद में विभीषण संवाद है। स्थिति की विडंबना यह है कि राम का पक्ष कमज़ोर होते ही विभीषण व्याकुल हो उठते हैं, क्योंकि उनका राज्याभिषेक पहले ही किया जा चुका है। अगले अनुच्छेद में राम और विभीषण के चरित्र में अंतर की व्याख्या है, साथ ही राम की विवशता और उनकी आँखों से पुनः गिरते आसुंओं का अलग-अलग योद्धाओं पर उसकी अलग- अलग प्रतिक्रिया का पता चलता है। आठवें अनुच्छेद में जामवन्त श्रीराम को शक्ति आराधना का परामर्श देते हुए आश्वस्त करते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में भी सुनियोजित ढंग से युद्ध चलता रहेगा। नौवें अनुच्छेद में शक्ति की मौलिक कल्पना और पूजन की तैयारी का वर्णन है। दसवां अनुच्छेद दो खंडों में विभक्त है, जिसमें प्रथम खंड में शक्ति पूजा और परीक्षा की व्याख्या है, वहीं दूसरे खंड में महाशक्ति के प्रकट होकर राम में शक्ति के लीन होने का दृश्य है।

निराला जी ने रामकथा का वह हिस्सा चुना, जहां संघर्ष एवं अंतर्द्वद्व सर्वाधिक हैं, दुःख कैसा रघुवर ? मुखर है। कविता का पहला ही वाक्यांश- 'रवि हुआ अस्त' अर्थात संध्या हो गई है, यूँ तो युद्ध कई दिनों आरंभ है, परंतु आज यह क्या हुआ कि राम के सारे शर निष्प्रभ सिद्ध हो रहे हैं। रावण की विध्वंसक अजेयता के आगे राम निरूपाय से हो रहे हैं और असली संघर्ष की शुरुआत यहीं से होती है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों अपनी संक्षितता की दृष्टि से कविता की आदर्श पूर्वपीठिका सिद्ध हुई है।

बोले रघुमणि 'मित्रवर, विजय होगी न समर, अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।' कहते कुछ कर न सके और ये दुखांत जीवन....। छल छल हो गये नयन, कुछ बूंद पुनः ढलके दूगजल अपनी अंतरंग सभा में वे सुग्रीव से कह रहे हैं, ये कहां का न्याय है कि महाशक्ति रावण के पक्ष में चली गई। संकट के समय प्रियजन याद आते है और राम की स्मृति जानकी वाटिका में पहुंच जाती है, जहां पहले-पहल उन्हें सीता के दर्शन हुए थे। इस मिलन प्रक्रिया का एहसास कर उनमें दैवीय शक्ति का संचार होता है। परन्तु फिर महाशक्ति की गोद में बैठे हुए रावण को अट्टहास करता देख राम भावाकुल हो जाते हैं। ये सब देखकर और सारा संवाद सुनने के बाद जामवन्त कहते हैं, दुःख कैसा रघुवर ?

हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो पुरुषोत्तम नवीन।' धारण, आराधन का दृढ़ आराधना से दो उत्तर... ।' महाशक्ति को रावण ने प्रसन्न कर लिया, जो कि अधर्म के पक्ष में है। आप तो धर्म के पक्ष में हैं, आप दोगुनी शक्ति से साधना कर महाशक्ति को अपने पक्ष में कीजिये | इसी सापेक्षता के सिद्धान्त को अपनाकर राम नवरात्र के समय आठ दिन का पूरा विधान बनाकर हनुमान को 108 नील कमल लाने का आदेश दिया। 'चाहिए हमें एक सौ आठ कपि, इन्दीवर' सूर्योदय के साथ शक्ति पूजा आरम्भ होती है।

आठ दिन की पूरी साधना यौगिक साधना है, जिसमें कुंडली उत्थापन की पूरी प्रक्रिया चलती है समाधिस्थ होकर एक जाप पूरा होते ही श्रीराम महाशक्ति के चरणों में एक इंदीवर अर्पित कर देते हैं। इसी तरह क्रमवार 107 नील पद्म महाशक्ति के चरणों में अर्पित किए जा चुके हैं। दुर्गाष्टमी की अर्धरात्रि का समय है। महाशक्ति ये सारी लीला देख रही हैं। ये साधना त्याग की भावना से परिपूर्ण है या स्वार्थवश इस हेतु महाशक्ति सूक्ष्म रूप में आकर राम के पार्श्व में रखे एक सौ आठवें कमल को लेकर अंतर्ध्यान हो जाती है। राम ध्यानस्थ अवस्था में 108वां जाप करने के बाद जैसे ही नीलपद्म उठाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, स्थान रिक्त पाते हैं। उनका मन व्याकुल और नयन सजल हो उठते हैं...।' अपनी प्राणप्रिया जानकी के लिए, कुछ न कर सके और ये दुखांत जीवन...|

'धिक जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध' फिर राम बुद्धि के चरम स्तर पर जाकर समाधान खोजते हैं। उनकी स्मृति बाल्यवस्था में लौटती है और उन्हें याद आता है कि माँ उन्हें राजीवनयन कहा करती थी। अर्थात मेरे पास दो कमल है। प्रतिज्ञा कर वे महाशक्ति का ध्यान करते हुए अस्त्र से अपनी दाहिनी आंख को समर्पित करने के लिए जिस क्षण हाथ उठाते हैं, उसी क्षण देवी प्रकट होती हैं और राम का हाथ थाम लेती हैं। श्रीराम के धैर्य और त्याग प्रसन्न हो महाशक्ति राम के बदन में लोन हो जाती हैं। 'होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन |’

कह महाशक्ति राम के वंदन में हुई लीन। और इसी ज्योतिर्मय चरमोत्कर्ष पर कविता समाप्त होती है। शक्ति का स्रोत मनुष्य के भीतर है, उसे जागृत करने से ही बाहरी विश्व पर विजय प्राप्त होती है |

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज सोमवार 17 अक्टूबर, 2022 को     "पर्व अहोई-अष्टमी, व्रत-पूजन का पर्व" (चर्चा अंक-4584)    पर भी है।
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    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  2. कालजयी रचना

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  3. निराला की शक्ति पूजा का अत्यंत सुंदर प्रस्तुतीकरण !

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