Tuesday, 14 January 2020

हिन्दी : भारतीय अस्मिता की पहचान



किसी भी देश के निवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना के विकास और पारस्परिक सम्पर्क को बनाये रखने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है, जिसका व्यवहार राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकेl भारतीय जनमानस को जोड़कर रखने के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में देश को जिस  भाषा की आवश्यकता है, वह गुण हिन्दी में विद्यमान हैl इसलिए कि हिन्दी किसी क्षेत्र, जाति-धर्म एवं सम्प्रदाय की भाषा न होकर भारतीय संरचना में व्याप्त राष्ट्रीय एकता की अद्भुत कड़ी के रूप में जानी जाती हैl

सौभाग्य की बात है कि हिन्दी के लिए देवनागरी लिपि के रूप में एक वैज्ञानिक एवं ध्वनि प्रधान लिपि मिली है, जिसका उद्भव ब्राह्मी लिपि से हुआ है, जिससे भारत की प्रायः सभी भाषाओं की लिपियाँ विकसित हुई हैंl प्राचीन भारत में ब्राह्मी और खरोष्ठी नामक दो लिपियाँ प्रचलित थींl ब्राह्मी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर तथा खरोष्ठी (गधे के होंठवाली) लिपि फ़ारसी लिपि की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थीl

जिस प्रकार संस्कृत ने आस्ट्रिक, द्रविड़, ग्रीक, लैटिन, चीनी, तुर्की, अरबी आदि  भाषाओं के अनेक शब्द आत्मसात कर अपने शब्द भण्डार को समृद्ध किया हैl उसी प्रकार हिन्दी ने भी अरबी, फारसी और अंग्रेजी से शब्द ग्रहणकर अपनी शब्द सम्पदा को बढ़ाया हैl क्योंकि कोई भी जीवंत भाषा अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहणकर अपने शब्द भण्डार को समृद्ध करती हैl हिन्दी, हिन्दीभाषी प्रदेशों की 24 भाषाओं एवं अनेक बोलियों से मिलकर बनी हैl बोलियों के विकास एवं परिमार्जन से ही भाषा समृद्ध होती हैl

भाषा सामाजिकता एवं समस्त ज्ञान-विज्ञानं का आधार होती हैl भारत बहुभाषी देश हैl इसकी प्रादेशिक भाषाएँ हर दृष्टि से समर्थ हैंl हिन्दी समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने में संयोजक की भूमिका निभा रही हैl बोलियाँ उसकी ताकत हैंl कहा भी गया है कि किसी भी जीवंत भाषा के प्राण उसकी बोलियों में ही बसते हैंl हिन्दी की बोलियों में रचा बसा साहित्य हिन्दी के लिए अजस्र स्रोत की भाँति हैl हिन्दी के आँचल में 18 बोलियाँ (खड़ी बोली, ब्रजभाषा, बांगरू, बुन्देली, कन्नौजी, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, मैथिली, मगही, भोजपुरी, सेवाती, मालवी, अहीरवाटी, जयपुरी-हड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी, पहाड़ी (पश्चिमी,मध्य एवं पूर्वी) पली-बढ़ी एवं विकसित हुई हैंl

हिन्दी एक जीवंत भाषा हैl हम हिन्दी का एक शब्द बोलते हैं तो उस शब्द की प्रकृति एवं संस्कृति का समन्वयात्मक रूप मन की आँखों के सामने साकार हो उठता हैl वह शब्द अकेला नहीं अपितु अपनी अर्थ संस्कृति के समस्त अलंकरणों के साथ उपस्थित होता हैl ‘गाँव’ शब्द को ही लीजिएl इसका अर्थ केवल उस जगह से तो नहीं है, जहाँ के अधिकांश लोग अशिक्षित और अभाव से भरा जीवन जी रहे होते हैंl बल्कि गाँव जीवन की ज़रूरतों के लिए ईमानदारी के साथ संघर्ष करने के ज़ज्बे का नाम भी हैl घर-आँगन, खेत-खलिहान एवं घर के आसपास स्थित पेड़ की शाखाओं पर घोसले बनाकर रहनेवाले पक्षियों के कलरव ‘गाँव’ शब्द के अर्थ की ही अभिव्यक्तियाँ हैंl        

भारत की तरह चीन भी बहुभाषी देश है, परन्तु उसने राष्ट्रीय भाषा का दर्जा अपने देश की सर्वमान्य भाषा मंदारिन (चीनी) को दी हैl चीन में पढ़ाई-लिखाई का माध्यम भी यही भाषा है, जबकि चीनी चित्रलिपि से विकसित विश्व की सबसे कठिन लिपियों में एक हैl एक लाख करोड़ रुपए की लागतवाली जापान की बुलेट ट्रेन की तकनीक जापानी भाषा के द्वारा ही खोजी गई हैl 12 करोड़ की आबादीवाले जापान में 13 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हैंl रूस, चीन, जापान, अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस और इजराइल जैसे दुनिया के सभी विकसित देश ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा अपनी भाषा में ही  देते हैंl   

भारत को अंग्रेजों से आजाद हुए 72 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, किन्तु देश की सर्वमान्य भाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान अब तक नहीं प्राप्त हो सका हैl अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त एवं पाश्चात्य जीवन शैली से प्रभावित कुछ लोग हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की सामर्थ्य पर सवाल उठाते रहते हैं, जबकि हमने अपनी  भाषा में शिक्षा प्राप्त कर विश्व को बुद्ध और महावीर दिएl चरक जैसे शरीर वैज्ञानिक और शुश्रुत जैसे शल्य चिकित्सक दिएl पाणिनि जैसा वैयाकरण, आर्यभट्ट जैसा खगोलविद,पातंजलि जैसा योग गुरु और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिएl तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय भारतवर्ष में ही थे, जहाँ संसार के अन्य देशों के विद्यार्थी ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने आया करते थेl

भारतीय संविधान ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए उसके विकास सम्बन्धी अनुच्छेद 351 में कहा है, “संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक और वांछनीय हो, वहाँ उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करेl”

परन्तु अंग्रेजी, अंग्रेजों के शासन काल से अब तक देश के शासन की भाषा के रूप में भारतीय जनमानस पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है, जबकि जनता के बोलचाल एवं व्यवहार की भाषाएँ भारतीय हैंl उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय की बहसें आज भी अंग्रेजी में होती हैंl फ़ैसले भी अंग्रेजी में ही लिए जाते हैंl एक ऐसा देश जहाँ की बहुसंख्य जनता को न्यायालय के निर्णय को जानने -समझने के लिए वकीलों की शरण में जाना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती हैl 

राजनीतिक लाभ के लिए भाषा को लेकर भड़काऊ बातें करना तमिलनाडु के नेताओं की प्रकृति रही हैl इस अहिन्दीभाषी प्रदेश में पहले से हिन्दी विरोधी आवाज़ें उठती रही हैंl विरोध करनेवालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम और करुणानिधि भी रहे हैंl 26 जनवरी, सन् 1965 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम ने हिन्दी विरोध में शोक दिवस मनाया थाl हिन्दी विरोध के नाम पर यहाँ संविधान की प्रतियाँ भी जलाई गई थींl आगे चलकर एक समय ऐसा भी आया जब सन् 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि ने विधानसभा के कामकाज से अंग्रेजी हटाने की घोषणा कर दी, जिसका देश भर में ज़ोरदार स्वागत किया गयाl बताते चलें कि तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपालाचार्य ने सन् 1936 में तमिलनाडु में हिन्दी पढ़ना अनिवार्य कर दिया थाl

 इन दिनों भारत में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर आधारित अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई हैl इन विद्यालयों की भूमिका के प्रति गहरा आक्रोश प्रकट करते हुए साहित्यकार निर्मल वर्मा जी ने कहा है,“ क्या हम अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा पद्धति में ढले विद्यालयों को भंग करने का साहस रखते हैं ताकि अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मनीषा के अनुरूप भारत की युवा पीढ़ी को नये सिरे से दीक्षित किया जा सके?” वर्मा जी ने राजनेताओं के द्वारा जाति और धर्म के नाम पर की जा रही सौदेबाजी से बचने के लिए जनता को सावधान भी किया हैl उन्होंने धर्म को आस्था के स्तर पर भारतीयता की अवधारणा से जोड़ने की अपील की है, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सकेl गुलामी के दिनों का स्मरण करते हुए वर्मा जी कहते हैं-,“ गुलामी में जीते हुए भी हमारे भीतर वे सभी शक्तियाँ विद्यमान थीं, जो हमें अतीत के प्रति आदर और भविष्य के प्रति आस्था से भर सकेंl’’

अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद प्राथमिक शिक्षा को लेकर राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग एवं अन्य राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक महत्त्व की संस्थाओं ने सर्वसम्मति से यह सिफारिश की थी कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिएl मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा के माध्यम से जो भी सीखते हैं, उनके मन-मस्तिष्क पर उसका गहरा प्रभाव पड़ता हैl शोध से यह ज्ञात हुआ है कि किसी विद्यार्थी को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाए जाने पर विषय को समझने के बजाय रटकर याद करना पड़ता हैl  मौलिक चिंतन तभी सम्भव है जब शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होl

 इंडियन एक्सप्रेस के अक्टूबर, सन् 2017 के अंक में छपी ख़बर के अनुसार भारत सरकार ने दिल्ली कार्पोरेशन के अन्तर्गत आनेवाले सभी 1700 से अधिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम से चलाने का निर्णय लिया हैl इसी तरह का अलोकतांत्रिक निर्णय उत्तराखण्ड की सरकार ने अपने यहाँ के 18000 से भी अधिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम का बनाने की घोषणा करके लिया हैl इन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार भी प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अंग्रेजीकरण में लगी हैl सरकारों के ऐसे फ़ैसले संविधान की मूल भावना के विरूद्ध तो हैं ही, देश के 80 प्रतिशत प्रतिभावान विद्यार्थियों के मौलिक अधिकारों को छीनने जैसे हैंl देश के मुट्ठीभर लोग सत्ता पर अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए अंग्रेजी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैंl  हमें जब तक भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा नहीं दी जाएगी, तब तक गाँवों की दबी प्रतिभाओं के उभरने और विकास की मुख्य धारा में आने का अवसर उपलब्ध ही नहीं हो सकेगाl        

आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी सरकारी कार्यालयों में हिन्दी में कार्य करने की संस्कृति का अपेक्षित विकास नहीं हो सका हैl स्थिति यह है कि अंग्रेजी आज भी जन-सामान्य के मन-मस्तिष्क पर बोझ के रूप में विराजमान हैl महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को हमारी बौद्धिक चेतना के विकास में बाधक बताया थाl उन्होंने हिन्दू स्वराज में लिखा था, “अंग्रेजी शिक्षा से द्वेष और अत्याचार बढ़े हैंl अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी हैl भारत को गुलाम बनानेवाले तो हम अंग्रेजी जाननेवाले लोग ही हैंl” 5 फ़रवरी, सन् 1916 को नागरी प्रचारिणी सभा में भाषण देते हुए गाँधीजी ने अपने 36 समर्थकों के साथ जीवनपर्यंत हिन्दी के व्यवहार की शपथ ली थीl उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन और हिन्दी के प्रचार–प्रसार को एक-दूसरे का पूरक बना दिया थाl

गाँधीजी ने 27 दिसम्बर, सन् 1917 को कोलकाता में भाषा को जीवन से जोड़ने और जनता के निकटस्थ रहनेवाली चीज बताते हुए कहा था, “यदि हम अंग्रेजी के आदी नहीं हो गये होते तो यह समझने में देर नहीं लगती कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने से हमारी बौद्धिक चेतना जीवन से कटकर दूर हो गई हैl” गाँधीजी ने युवकों को हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ भी सीखने की सलाह दी थीl एक जगह उन्होंने कहा था, “मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रान्तीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज की सब बातें निरर्थक हैंl प्रत्येक प्रान्त में उसी प्रान्त की भाषा तथा सारे देश के पारस्परिक व्यवहार के लिए हिन्दी और अन्तर्राष्ट्रीय उपयोग के लिए अंग्रेजी का व्यवहार होना चाहिएl’’

गाँधीजी ने देश के आम आदमी की समझ में आनेवाली भाषा को अपनाने पर बल दिया और आम आदमी की समझ में आनेवाली उस भाषा को उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी’ नाम से संबोधित कियाl  इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने हिन्दीतर प्रदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया और सन् 1918 में उन्होंने अपने 18 वर्षीय पुत्र देवदास गाँधी और स्वामी सत्यदेव को हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए मद्रास भेज दियाl हिन्दी के प्रचार के लिए एक कमेटी भी गठित की गयी थी, जिसके सभापति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी थेl गाँधीजी ने सन् 1930 में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वर्धा में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना की थीl उन्होंने भाषा के सवाल को बड़ी ही गंभीरता से लिया थाl भाषा को लेकर हिन्दीभाषी प्रदेश के निवासियों की उदासीनता पर उन्होंने  क्षुब्ध होकर कहा था,“ मुझे खेद है कि जिन प्रान्तों की मातृभाषा हिन्दी है, वहाँ पर भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखलाई देता हैl”

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन मानसिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता को स्वाधीनता से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थेl यह भी मानते थे कि मनुष्य की मानसिक वृत्तियों का विकास मातृभाषा के द्वारा ही सम्भव हैl टंडन जी चाहते थे कि विधायिका और कार्यपालिका ही नहीं, अपितु समस्त विश्वविद्यालय एवं देश की न्यायपालिका के कामकाज भी हिन्दी में होंl हिन्दी-हिन्दुस्तानी एकता के पक्षधर जमनालाल बजाज ने मद्रास हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा था, “हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी ईमान की भाषा है, प्रेम की भाषा है, राष्ट्रीय एकता की भाषा है और आज़ादी की भाषा हैl” हिन्दी और उर्दू भाषा की एकता के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था, “हमें इस देश की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को एक करना है तो उसके लिए हिन्दी और उर्दू का ऐक्य होना चाहिएl इसलिए एक राष्ट्रभाषा का होना ज़रूरी हैl” पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए. पी. जे.अब्दुल कलाम ने देश की एकता के लिए हिन्दी की आवश्यकता को इन शब्दों में प्रकट किया है, “मेरी राय है कि सभी राज्यों में बारहवीं कक्षा तक हिन्दी बोलना अनिवार्य कर दिया जाए, ताकि सारे लोग हिन्दी पढ़ना-लिखना सीख सकेंl”

राष्ट्रीय एकता के लिए डॉ राममनोहर लोहिया का हिन्दी को अपनाने पर विशेष बल थाl लोहियाजी कहा करते थे, “हम समझते हैं कि अंग्रेजी के होते यहाँ ईमानदारी का आना असम्भव हैl’’ समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने अंग्रेजी का खुलकर विरोध करते हुए राजनेताओ से अपील की थी कि जिस भाषा में वोट माँगते हो, उसी भाषा में प्रशासनिक काम-काज भी करोl कवि ‘अज्ञेय’ ने बड़े दुःख के साथ कहा था,- “जब हम राजनीतिक दृष्टि से पराधीन थे तब तो हमारे पास स्वाधीन भाषा थीl अब जब हम स्वाधीन हो गये तो हमारी भाषा पराधीन हो गईl” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जो सरकार जनता से उसकी भाषा में संवाद नहीं करती, वह सरकार अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन में अक्षम मानी जाती हैl  

आपको ज्ञात होगा कि संविधान लागू होने के मात्र 15 वर्षों तक देश का कामकाज अंग्रेजी में किए जाने का प्रावधान थाl उसके बाद हिन्दी को राजभाषा के रूप में पूरे देश में लागू होना था, पर तमिलनाडु के हिन्दी विरोधियों के उग्र एवं अराजक रवैये के आगे झुककर सरकार ने सन् 1963 में ही राजभाषा विधेयक पारित कर दिया, जिससे सन् 1965 के बाद भी देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बना ही रह गयाl
          
संवैधानिक दृष्टि से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है किन्तु अंग्रेजी के वर्चस्व ने उसे उसके ही घर में परमुखापेक्षी बना दिया हैl केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दो राजभाषा अधिनियम बनाये थेl अधिनियम की धारा 3/1 के अधीन हिन्दी के साथ अंग्रेजी को सहभाषा के रूप में अपनाने का निश्चय किया गया था l इसके चलते यह स्थिति बन गई कि पहले हिन्दी के साथ अंग्रेजी को जारी रखने की अवधि 15 वर्ष निश्चित की गई, किन्तु सहभाषा के रूप में इसके प्रयोग की अवधि अनिश्चितकालीन कर अंग्रेजी को अनंत काल तक बने रहने की खुली छूट दे दी गईl राजभाषा अधिनियम की धारा 3/2 के अन्तर्गत यह शर्त रख दी गई कि जब तक भारत के किसी एक भी राज्य की सरकार हिन्दी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाने से इनकार कर देती है, तब तक हिन्दी संघ की राजभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकतीl राजभाषा अधिनियम 1963 के अनुसार केन्द्रीय सरकार का कामकाज अंग्रेजी में किया जा सकता हैl राजभाषा नियम 1976 बनने से ‘क’ क्षेत्र के केन्द्रीय कार्यालयों में कामकाज केवल हिन्दी में, ‘ख’ क्षेत्र में हिन्दी और अंग्रेजी में तथा ‘ग’ क्षेत्र के राज्यों की सरकारों को पत्रादि अंग्रेजी में लिखने का प्रावधान हैl

संविधान लागू होने के समय अष्टम अनुसूची में हिन्दी, संस्कृत, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, बंगाली, उड़िया, मलयालम, पंजाबी, असमिया, उर्दू एवं कश्मीरी सहित कुल 14 भाषाएँ थीं। सन् 1967 में सिंधी, सन् 1992 में कोंकणी, मणिपुरी एवं  नेपाली सहित 18 हो गईं। सन् 2004 में मैथिली, बोडो, संथाली व डोगरी के सम्मिलित हो जाने से अष्टम अनुसूची में अब कुल 22 भाषाएँ हो गई हैं। राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए देश के कुछ राजनेता हिन्दी की बोलियों को संविधान की अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने की कोशिश में लगे हैंl जबकि हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की अष्टम अनुसूची में सम्मिलित करवाने की कोशिश या हिन्दी को बचाने के लिए देवनागरी लिपि के बजाय उसे रोमन लिपि में लिखने की क़वायद अनुचित, अव्यावहारिक एवं हिन्दी को ही कमजोर करने जैसी हैl भाषा और बोली के बीच के भेद को शब्दावली से नहीं, बल्कि लिपि के आधार पर समझा जा सकता हैl हिन्दी भाषा की इन बोलियों की लिपि भी देवनागरी है और बोलियों को भाषा मान लेने पर नुकसान हिन्दी का ही होना हैl

हिन्दी की किसी बोली का अष्टम अनुसूची में सम्मिलित होने के पश्चात् उसका स्वतंत्र अस्तित्व बन जाता हैl वह मूल भाषा से अलग  समझी जाने लगती हैl हिन्दी की बोलियाँ जब तक हिन्दी के साथ हैं, तब तक उसके बोलनेवालों की गणना हिन्दी के अन्तर्गत होगीl  जिस दिन कोई बोली संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल हो जाएगी, उस दिन से उसे अपनी मातृभाषा लिखनेवाले संवैधानिक रूप से हिन्दीभाषी नहीं गिने जाएंगेl आज तक अपने बोलनेवालों की संख्या के बल पर ही हिन्दी राजभाषा के पद पर आरूढ़ हैl भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की अष्टम अनुसूची शामिल करने की माँग एक दशक से उठ रही हैl हिन्दी की कई बोलियों के संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल हो जाने से हिन्दी का संख्या बल घट रहा हैl यदि यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो संख्या बल की कमी के चलते एक दिन हिन्दी को देश की राजभाषा के पद से पद्च्युत होना भी पड़ सकता हैl ये अंग्रेजीवाले ‘बाँटो और राज करो’ की आदत से बाज आनेवाले नहीं हैंl    

भारतीय संविधान ने भाषा से संबंधित विषयों को संविधान के अनुच्छेद 120 210 तथा अनुच्छेद 343 से 351 तक में वर्णित किया है। इसमें भाषा से संबंधित कुल 11 अनुच्छेद हैं। अनुच्छेद 344(1) 351 अष्टम अनुसूची की भाषाओं की मान्यता को दर्शाते हैं। यह सुनकर हिन्दी प्रेमी आहत होंगे कि अष्टम अनुसूची में जिन 38 भाषाओं को सम्मिलित किए जाने की बात इन दिनों ज़ोरों पर चल रही है, उसमे एक भाषा अंग्रेजी भी है और जिस दिन अंग्रेजी अष्टम अनुसूची में जगह पा गई, उस दिन संविधान के अनुच्छेद 344(1)351 के अनुसार भारत सरकार का संवैधानिक उत्तरदायित्व होगा कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह वह अंग्रेजी का भी ध्यान रखेl क्या अंग्रेजी को अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगानेवालों को नहीं मालूम कि अंग्रेजी को संवैधानिक मान्यता दिलाना दासता की मानसिकता को दृढ़ करने जैसा है?

हिन्दी भारतीय अस्मिता की पहचान हैl राजभाषा के रूप में देश के शासकीय प्रयोजनों को सिद्ध करने के साथ राष्ट्रभाषा के रूप में देश की एकता और अखण्डता को मजबूत बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी इसके कन्धों पर हैl इसमें देश की परम्परा, विश्वास, धर्म, संस्कृति एवं लोकनीति के स्वर समाहित हैंl हिन्दी भारतीय जनमानस के हृदय की भाषा हैl भारत का सर्वांगीण विकास  हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति के द्वारा ही सम्भव हैl
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बलवन्त
ग्राम- जूड़ी, पोस्ट- तेन्दू , तहसील- राबर्ट्सगंज
जनपद- सोनभद्र- 231216 (उत्तर प्रदेश)
मो. : 7337810240   Email-  balwant.acharya@gmail.com
(पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी, कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीस बेंगलूर-560053 (कर्नाटक)

Thursday, 19 December 2019

लेखा-जोखा 2019 / साहित्य में व्यंग्य


व्यंग्य यथार्थ में शामिल विसंगतियों की सुरुचिपूर्ण आलोचना है | एक लोकप्रिय विधा होने के कारण कम प्रतिभा वाले लेखक भी इसकी ओर आकर्षित होते हैं | हिंदी में व्यंग्य लेखन जितना सरल लोगों ने बना रखा है उतना आसान है नही | अन्य विधाओं के बनिस्पत व्यंग्य लिखना अपेक्षाकृत कठिन विधा मानी जाती है लेकिन जिस रफ़्तार से आज व्यंग्य के नाम पर व्यंग्य लिखा जा रहा है उनमे बहुत कम ही रचनाकार पाठकों के दिल में जगह बना पाते हैं | जाहिर है पूर्ववर्ती व्यंग्य लेखन की अपेक्षा वर्तमान व्यंग्य में वह गुणवत्ता मौजूद नही है | इसके और भी तमाम कारण हो सकते हैं जिनका विश्लेषण यहाँ अभीष्ट नही है वह फिर कभी | इधर पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य की स्वीकार्यता बढ़ी है और सोशल मीडिया पर भी उसका स्पेस बढ़ा है | वर्षांत में व्यंग्य साहित्य की जो भी प्रमुख किताबें प्रकाशित हुईं उनका लेखा-जोखा पाठकों के सुलभ सन्दर्भ हेतु इस आलेख में प्रस्तुत किया जा रहा है | 


वर्ष 2019 व्यंग्य साहित्य की दृष्टि से काफी भरापूरा कहा जा सकता है | इसी साल राजकमल प्रकाशन ने हरिशंकर परसाई की चर्चित किताब ‘निठल्ले की डायरी’ और शरद जोशी की अनुपलब्ध पुस्तक ‘वोट ले दरिया में डाल’ के नए संस्करण छापे | किताबघर प्रकाशन से स्मृतिशेष व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ के अंतिम व्यंग्य संग्रह ‘आखेट’ प्रकाशित हुआ | जिसमे उनके द्वारा समय- समय पर लिखित व्यंग्य रचनाओं को शामिल किया गया है | संग्रह की रचनाओं में एक अलग ही भाषाई तासीर और शैलीगत ताजगी है | व्यंग्य के स्त्री स्वरों में जहाँ वरिष्ठ लेखिका स्नेहलता पाठक का व्यंग्य संग्रह ‘सच बोले कौवा काटे’ प्रकाशित हुआ वहीँ दूसरी ओर रुझान पब्लिकेशन से आया उभरती व्यंग्य लेखिका इन्द्रजीत कौर का नया संग्रह ‘पंचरतंत्र की कथाएं’ चर्चा में रहा | व्यंग्य की एकदम युवा लेखिकाओं में ही अंशु प्रधान, समीक्षा तैलंग और अनीता यादव के पहले संग्रह क्रमशः ‘हुक्काम को क्या काम’ (बोधि प्रकाशन), ‘जीभ अनशन पर है’ (भावना प्रकाशन) और ‘बस इतना सा ख्वाब है’ (दिल्ली पुस्तक सदन) से प्रकाशित हुए |


वरिष्ठ व्यंग्यकारों के नए व्यंग्य संग्रहों की बात करें तो उनमे जवाहर चौधरी का 'बाज़ार में नंगे', अरविन्द तिवारी का व्यंग्य संग्रह ‘डोनाल्ड ट्रम्प की नाक’, सुरेश कान्त का व्यंग्य संग्रह ‘मुल्ला तीन प्याजा’, बुलाकी शर्मा के दो संग्रह ‘प्रतिनिधि व्यंग्य’‘टिकाऊ सीढ़ियाँ उठाऊ सीढ़ियाँ’, गिरीश पंकज के दो व्यंग्य संग्रह ‘आन्दोलन की खुजली’ और ‘पूंजीवादी सेल्फी’, कैलाश मंडलेकर का व्यंग्य संग्रह ‘बाबाओं के देश में’, श्रवण कुमार उर्मिलिया का व्यंग्य संग्रह ‘चुगलखोरी का अमृत चापलूसी का चूर्ण’ और पूरन सरमा के व्यंग्य संग्रह ‘श्री घोड़ीवाला का चुनाव अभियान’, राजेन्द्र वर्मा का व्यंग्य संग्रह ‘लक्ष्मी से अनबन’ और हरिशंकर राठी का ‘युधिष्ठिर का कुत्ता’ मुख्य रहे | व्यंग्य उपन्यास की दृष्टि से यह वर्ष उल्लेखनीय नही रहा | कुमार सुरेश का लोकोदय प्रकाशन से आया व्यंग्य उपन्यास ‘तंत्रकथा’ एक अच्छा उपन्यास बन सकता था लेकिन वह अपनी कथावस्तु की सपाटबयानी और चरित्रों के इकहरेपन का शिकार होकर फ्लॉप रहा |


नई पीढ़ी के व्यंग्यकारों में संतोष त्रिवेदी का व्यंग्य संग्रह ‘नकटों के शहर में’, अशोक व्यास का ‘विचारों का टैंकर’, प्रभाशंकर उपाध्याय का ‘प्रतिनिधि व्यंग्य’, संतराम पाण्डेय का ‘अगले जनम मोहे व्यंग्यकार ही कीजो’, विजी श्रीवास्तव का ‘इत्ती सी बात’, अनूपमणि त्रिपाठी का ‘अस मानुष की जात’, सुदर्शन सोनी का ‘अगले जनम मोहे कुत्ता ही कीजो’, सुधीर कुमार चौधरी का ‘विषपायी होता आदमी’, अलंकार रस्तोगी के दो व्यंग्य संग्रह ‘दो टूक’‘डंके की चोट पर’, संजीव निगम का ‘अंगुलिमाल का अहिंसा का नया फंडा’, अमित शर्मा का ‘लानत की होम डिलीवरी’, अजय अनुरागी का ‘एक गधे की उदासी’ और पंकज प्रसून की व्यंग्य कहानियों का संग्रह ‘द लम्पटगंज’ प्रमुख रहे |


युवा लेखक भुवनेश्वर उपाध्याय के सम्पादन में ‘व्यंग्य व्यंग्यकार और जो जरुरी है’ संकलन वनिका पब्लिकेशन से इसी वर्ष आया | उनका खुद का भी एक व्यंग्य संग्रह ‘बस फुंकारते रहिये’ शीर्षक से छपा | विवेक रंजन श्रीवास्तव के सम्पादन में ‘मिलीभगत’ नाम से समकालीन व्यंग्यकारों के व्यंग्यों का एक संकलन भी निकला | व्यंग्य की एकदम प्रारंभिक पीढ़ी को लेकर उनके चुनिन्दा व्यंग्यों का संग्रह राजेन्द्र शर्मा के सम्पादन में ‘हिंदी हास्य-व्यंग्य’ शीर्षक से आया | 300 से 700 शब्दों के मध्य छपने वाले दैनिक पत्रों के व्यंग्य कॉलम्स और स्तंभों में वह धार नज़र नही आयी | छिटपुट को छोड़ दें तो उनमे औसत व्यंग्यों का बोलबाला रहा | पत्रिकाओं में भी ‘व्यंग्य यात्रा’ को छोड़कर बाकियों का ट्रैक अलग ही दिशा में भटकता दिखा | उनमे एक सजग सम्पादन और गंभीर व्यंग्य दृष्टि का अभाव दिखा | नए वर्ष में उम्मीद की जानी चाहिए की लेखक अपनी किताबों को लाते हुए जल्दबाजी न दिखाएँ व उनमे रचनाओं का चयन करते हुए गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दें | व्यंग्यकार अपनी आलोचना को सकारात्मक भाव से ग्रहण करें तभी व्यंग्य विधा साहित्य में अपना सही मुकाम हासिल कर सकेगी |



Saturday, 24 August 2019

जीवन से संधि की कविता



संदर्भ : जाबिर हुसेन की किताब आईना किस काम का
शहंशाह आलम

यह अभिसंधि का समय है।
यह अभिसंधि यानी यह कुचक्र, षड्यंत्र, धोखा, मिलीभगत किससे? यह प्रश्न अनुसंधान चाहता है। यह अनुसंधान एक कवि ही कर सकता है। कवि का काम यही तो है, पहले अपने आसपास के समय की छानबीन करना, तब कविता लिखना। बहुत सारे कवि ऐसा नहीं करते होंगे।उन्हें लगता होगा कि कविता लिखने के लिए किसी जाँच-पड़ताल की आवश्यकता क्या है? इसकी आवश्यकता है। आप जिस और जैसे समय को जी रहे हैं, उसकी जाँच नहीं करेंगे, तो अपने समय की कविता लिखेंगे कैसे? यह शास्त्र-सम्मत कार्य नहीं है। यह कार्य अथवा यह व्यवस्था एक कवि की है। आपकी कविता की लंबी आयु के लिए यह ज़रूरी है कि आपके भीतर एक अनुसंधानकर्ता भी होना चाहिए। तभी आप अभिसंधि से भरे इस समय का सही-सही इंवेस्टिगेशन कर पाएँगे।
जाबिर हुसेन की उनके पचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश के ख़ास मौक़े पर एकदम ख़ास तरीक़े से छपकर आई कविता की किताब ‘आईना किस काम का’ की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे हमेशा यही लगता है कि पहले वे अपने समय का अनुसंधान करते हैं, फिर कविता लिखते हैं। अनुसंधान की इस अनिवार्यता को, इस आवाजाही को, इस अवलोकन को मानने से ही तो कविता की जीवंत धारा सदियों से बहती चली आ रही है। और कविता में यथार्थ का आलोक फैलता रहा है। और यथार्थ है, तभी आप झूठे इतिहास से मुक्ति चाहते हैं। इन कारणों से भी जाबिर हुसेन की कविता इतिहास से मुक्ति की कविता है,‘हल्की दस्तक ने / मेरा ध्यान / उपन्यास से हटा दिया / दरवाज़ा खोलते ही / अँधेरे का हमला हुआ / चेहरा एकदम से अजनबी था / मेरे पूछे बग़ैर / आने वाले ने कहा / मैं इब्न बतूता हूँ / कई सदी बाद / दोबारा इंडिया आया हूँ / जामा मस्जिद में / किसी ने आपका / पता बताया / इतनी रात गए / आपको ज़हमत देने के लिए / माफ़ी चाहता हूँ / दरअसल अगले दो-तीन दिन यहाँ रहकर / मुझे गुजरात जाना है / सोचा आपसे मिलता चलूँ / तब तक मेरी पत्नी जग गई थी / इब्न बतूता के लिए क़हवा ले आई थी / क़हवा पीते-पीते इब्न बतूता ने कहा / बहुत बदल गया है इंडिया / पहचान में ही नहीं आता / समंदर दरिया नदियाँ सब बदल गए हैं / लोगों की पोशाक भाषा भी पहले जैसी / नहीं रह गई / मैं तो ये तब्दीली देख हैरान हूँ / मैंने शब बख़ैर कहते हुए / उन्हें मेहमानों के / सोने का कमरा दिखाया (‘उस रात आए थे इब्न बतूता’, पृष्ठ : 19-20)।’
इब्न बतूता अपने समय के महान यात्री थे और महान लेखक भी और महान खोजक भी। अरब देश से थे। अपनी यात्रा के दौरान भारत आए थे। उन्होंने अपनी यात्रा के वृत्तांत को लिखते हुए कई मुल्कों के अछूते रहस्यों को खंगाला और खोला था।
जाबिर हुसेन ने ‘आईना किस काम का’अपने इस नए कविता-संग्रह में इब्न बतूता को केंद्र में रखकर कई कविताएँ लिखी हैं –‘वो जो इब्न बतूता ने नहीं लिखा’, ‘उस रात आए थे इब्न बतूता’, ‘इब्न बतूता ने अपनी आँखों से देखा और शर्मसार हुए’, ‘एक और मंज़र जो इब्न बतूता ने देखा’, ‘अभिवादन’, ‘जम्हूरी निज़ाम में’, ‘राजा ने कहा’, ‘सूरज का निकलना’, ‘नज़र रक्खो’, ‘नमक की बोरियाँ’, ‘आख़िरी ख़ाहिश’, ‘कुछ भूख से मरे’, ‘काँटों से संवाद’, ‘वंशगत’, ‘अमावस’, ‘विसंगति’ इन कविताओं को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि ये कविताएँ इतिहास के कम यथार्थ के परिदृश्य ज़्यादा खोलती हैं। कारण यह है कि इब्न बतूता इतिहास हो गए हैं, मगर जाबिर हुसेन यथार्थ हैं। जाबिर हुसेन की कविता का यह दर्शन यही वजह है कि जो दर्शन मार्क्स या लेलिन का रहा है। जो दर्शन फ़ैज़ या नाज़िम हिकमत का रहा है। जो दर्शन ब्रेख़्त, लोर्काया नेरूदा का रहा है। जो दर्शन धूमिल या मुक्तिबोध का रहा है। जो दर्शन शमशेर या केदारनाथ अग्रवाल का रहा है। जो दर्शन केदारनाथ सिंह या राजेश जोशी का रहा है। जो दर्शन चंद्रकांत देवताले या लीलाधर जगूड़ी का रहा है। जो दर्शन राजेश जोशी या वीरेन डंगवाल का रहा है। जो दर्शन आलोकधन्वा या अरुण कमल का रहा है। या जो दर्शन गुलज़ार और जावेद अख़्तर का रहा है। कविता का वही विश्वरूप वाला दर्शन जाबिर हुसेन की कविता का भी है। यह दर्शन है, तभी कविता सार्थक है। जीवन से संधि वाला यह दर्शन आपको आदमी के जीवन के निकट जो ले जाता है। कविता आदमी के निकट है, तभी आप सिर्फ़ भारत के नहीं, विश्व के कवि कहलाते हैं।
     जाबिर हुसेन की कविता विश्व कविता कोश में शुमार की जाने वाली कविता है। इनकी कविता ‘आख़िरी ख़ाहिश’(पृष्ठ : 31) में अलबेरूनी आते हैं, तो ‘उस रात ऐसा कुछ हुआ था’(पृष्ठ : 53)शीर्षक कविता में हुसेन इब्ने सैफ़ आते हैं।‘सदियों बाद’(पृष्ठ : 60) शीर्षक कविता में सुकरात आते हैं, अरस्तू आते हैं, अफ़लातून आते हैं, ब्रेख़्त, नाज़िम हिकमत, फ़ैज़, मार्क्स, लेलिन, गोर्की आते हैं। ‘समंदर’(पृष्ठ : 69) शीर्षक कविता में मक़बूल फ़िदा हुसेनआते हैं, तो माधुरी दीक्षित भी आती हैं, ‘घोड़े की तेज़ /हनहनाहट के साथ / मक़बूल फ़िदा हुसेन / का ताँगा / समंदर के मुहाने पर आकर / ठिठक गया / पानी की लहरों पर उसे / माधुरी दीक्षित के / पैरों के निशान / दिखाई दिए / हुसेन की मुट्ठियाँ / रेत से भर गईं।’
कविता में जब जीवन की बात की जाती है, तो एक प्रश्न यह खड़ा क्या जा सकता है कि जीवन मनुष्यों के अलावा दूसरों में भी है, फिर कविता में किसके जीवन की बात की जाती रही है? स्वीकारता हूँ। जीवन मनुष्यों के अलावा पशु-पक्षियों में भी है। मैं तो यह भी मानता हूँ कि पेड़ में भी, पानी में भी, पहाड़ में भी और हवा में भी जीवन है।एक कवि होने के नाते अथवा एक गद्यकार होने के नाते मुझसे कहिए तो साहित्य में सबके जीवन की रक्षा की बात की जाती है। इस बहुजन वाली बात में कोई हत्यारा, कोई बलात्कारी, कोई ज़ालिम बादशाह शामिल नहीं है। ये लोग जनसमूह को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। मेरे विचार से, जाबिर हुसेन की कविता भी उस व्यापक बहुसंख्यक लोगों के समर्थन की कविता है, जिन लोगों को आज मुट्ठी भर लोग ख़ूब सता रहे हैं। वर्तमान पर दृष्टि डालिए तो वही मुट्ठी भर लोग, जो सत्ता में हैं, जो प्रशासन में हैं, जो व्यापार में हैं, सबको परेशान कर रहे हैं। यह नया गठजोड़ है। आप देखिए न, सत्ता आपको किस तरह कुचलती है। प्रशासन आपको किस तरह अपराधी घोषित करता है। व्यापारी आपको किस तरह लूटता है।कोई कवि इस गठबंधन का विरोध करता है, तो किस तरह उस कवि को परिधि से बाहर कर दिया जाता है, ‘जब रास्ते में / छूट गए / क़ाफ़िले मेरे / किसने मचाई / लूट, बताएँ / आप क्या (‘किसने मचाई लूट’, पृष्ठ : 197)।’
जाबिर हुसेन की कविता में सबकुछ क्रमबद्ध है –मूल्य, समाज, व्यक्ति, अवधारणा, बोध,पथ और पाथेय। इन सबमें जाबिर हुसेन की मनुष्यता शामिल है। मनुष्यता से भरी जाबिर हुसेन की कविता आपके एकांत तक को आदमी के बोलने की आवाज़ से भर देती है ताकि आप ख़ुद को अपने जीवन के संघर्ष में अकेला अथवा अलग न समझ लें। अकेले होंगे, तो शिकार कर लिए जाएँगे, ‘बरामदे में वो कबसे / उदास बैठा है / अमीरे शहर ने उसको / तलब किया है आज (‘अमीरे शहर का बुलावा’, पृष्ठ : 247)।’और यह भी कि जिस राजनीतिक परिवेश में हम सब जी रहे हैं, वह इतना धुँधला है, इतना गँदला है, इतना दुर्गंध से भरा है कि आदमी केजीवन के लिए घातक है।आज की तथाकथित राजनीति बस मार-काटजो चाहती है, बस भेद-भाव जो चाहती है, बस युद्ध और नरसंहार जो चाहती है, ‘आश्चर्य नहीं / सरकार है तो / मुमकिन है / कुछ भी / मुमकिन है (‘मुमकिन है’, पृष्ठ : 300)।’
कविता को कई लोग अकसर कोई ऐसी-वैसी शै समझकर इससे दूर जाने की कोशिश करते हैं। जाबिर हुसेन की कविता के साथ ऐसा करना नामुमकिनहै। इनकी कविता आपको अपने जीवन से बाँधकर रखती है। इन कविताओं का जीवन आपके जीवन से बँधा जो है।जाबिर हुसेन की कविता की संधि यही है, ‘ये क़ाफ़िले / जो मेरे शहर से / गुज़रते हैं / तुम्हारे नाम की / तस्बीह कैसे / पढ़ते हैं (‘तस्बीह’, पृष्ठ : 242)।’जाबिर हुसेन का आह्वान यह भी है, ‘किसी दिन / ख़ाब में आओ / मेरी बस्ती का ये / वीरान खंडहर / देखकर जाओ / कि दीवारों पे इसकी / मौत के जाले / पड़े हैं / इसके दरवाज़े पे / अँधी शक्ल के / ताले पड़े हैं / यहाँ इंसाफ़ की / गर्दन पड़ी है / यहाँ गुमनाम कुछ / लाशें गड़ी हैं / मेरी बस्ती के / इस वीरान खंडहर को / न जाने क्यों / कोई आईना कहता है / कोई क़ानून कहता है (‘आईना’, पृष्ठ : 212)।’
‘आईना किस काम का’ में लगभग तीन सौ कविताएँ जाबिर हुसेन ने शामिल की हैं। सभी ताज़ा कविताएँ हैं। पुस्तक को पढ़ते हुए इन कविताओं से आप अपना अनुबंध तोड़ नहीं सकते।इसलिए कि जाबिर हुसेन की कविता के साथ कविता के पाठकों का वर्षों पुरानानाता है। और यह नाता ऐसा है कि जिसमें आम आदमी के लिए अपनापा भरा हुआ है। कविता का यह सिवान आपको तभी इधर-उधर जाने नहीं देता, बाँधे रखता है, कविता की भूमि से।‘आईना किस काम का’ की कविता का तर्ज़े-बयाँ समकालीन हिंदी कविता को एक अलग, अनूठा, दुर्लभ आस्वाद देता है। शमशेरके पास भाषा का यह जादू था। या भाषा के जादू का ऐसा असर गुलज़ार की नज़्मों में आप पाएँगे। नेरूदा को भी यह जादूगरी आती थी,लेकिन भाषा का यह जादू-डालना जाबिर हुसेन का अपना है।
     जाबिर हुसेन की ये कविताएँ एहतिजाज की कविताएँ हैं। बग़ावत और राजद्रोह की कविताएँ हैं। यहएहतिजाज किससे, सीधे राजा से। राजा की राजाज्ञा ऐसी है कि एहतिजाज ज़रूरी है। एहतिजाज यानी प्रतिकार करने का ऐसा तरीक़ा न नेरूदा के पास मिलता है, न शमशेर के पास और न गुलज़ार के पास। और समकालीन कविता के कुछेक कवियों को छोड़ दीजिए, तो राजा के विरुद्ध खड़े होने का यह सलीका या जिसको हुनरमंदी हम कहते हैं या जिसको शऊर हम कहते हैं, सिर्फ़ और सिर्फ़ जाबिर हुसेन के पास है। आप इनकी इब्न बतूता-सीरिज़ की कविताएँ देख लीजिए या फिर आप ‘आईना किस काम का’के चारों खंडों की अधिकतर कविताओं के असल मर्म तक पहुँचकर देख लीजिए, यहाँ कही गई बातें सिद्ध हो जाएँगीं। कवि का ख़्याल यही है कि जीवन है, तभी आदमी की संधि कविता के साथ है। अब जब आदमी ही नहीं रहेगा, तो कविता किसके लिए रची जाएगी, सो ये कविताएँ आदमी को बचाए रखने की कविताएँ हैं। तभी येकविताएँआदमी को  एहतिजाज करना सीखाती हैं, ‘दश्त की / जानिब कोई / क्योंकर / चले शहर अपना / दश्त से कुछ / कम है क्या (‘शहर अपना’, पृष्ठ : 103)।’
आईना किस काम का (कविता-संग्रह) / कवि : जाबिर हुसेन / प्रकाशक : दोआबा प्रकाशन, 347 एम आई जी, लोहियानगर, पटना –800 020 / मूल्य : ₹499 / मोबाइल संपर्क : 09431602575

शहंशाह आलम
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पटना – 800015 (बिहार)
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Thursday, 11 July 2019

कविता में वर्चस्ववाद के ख़िलाफ / चंद्रेश्वर


एक वरिष्ठ कवि का मानना है कि 'कविता कभी-कभार संभव होती है | वह स्वयं लिख जाती है | वह लिखी नहीं जाती है | यानी कविता लिखना और कवि होना एक तरह से ईश्वरीय विधान है | जबकि मेरा मानना है कि 'दुनिया रोज़ बदलती' रहती है | इस रोज़ बदलती दुनिया में समय के साथ-साथ जीवन और समाज की स्थितियाँ उनकी सच्चाइयाँ भी बदलती रहती हैं | इन सारी चीज़ों और उनके बदलावों पर अगर आपकी पैनी नज़र है तो आप उसके प्रति तटस्थ या चुप नहीं रह सकते हैं | कविता अगर समय की दबंगियत का प्रतिकार है, अगर वह कमज़ोर की ज़ुबान है तो कोई कवि कविता के संभव होने की प्रतीक्षा में भला कबतक चुप्पी साधकर बैठा रह सकता है! ये तो वो ही बात हो गयी कि किसी बड़े ज़ुल्मी या आततायी के अंत के लिए लोगबाग स्वयं संगठित होकर प्रतिकार या प्रतिरोध के बदले किसी अवतार की प्रतीक्षा करें |

इस तरह मेरे विचार से कविता में शाश्वत मूल्यों जैसी कोई बात नहीं होती है | यह बात प्रगतिशील-जनवादी लेखकों द्वारा बार -बार दुहरायी जाती रही है कि कविता अपनी समसामयिकता या तात्कालिकता में ही महत्वपूर्ण और कालजयी होती है | वह  शब्दों के ज़रिए समय के पदचाप को चिन्हित,रेखांकित या दर्ज़ करने का काम करती है | वह 'समय सहचर' या 'कालयात्री' की तरह है| वह अपने समय में होकर भी अपने अतीत और भविष्य से पूरी तरह संपृक्त होती है | 

दूसरी बात कि अपना कुनबा बढ़ता देखकर हर किसी को प्रसन्नता होती होगी | कुछ ऐसे वरिष्ठ कवि जो अपनी उम्र और लेखन की वरिष्ठता के नाते लगभग शीर्ष पर पहुँचने की स्थिति में होते हैं, वे उसी अनुपात में नयी पीढ़ी से चिढ़ने या उनकी टाँग खिंचाई में क्यों लग जाते हैं ? उनकी अनुदारता क्यों बढ़ती जाती है ?  वे अपने इर्द-गिर्द मीडियाकर चापलूसों या प्रशंसकों की ही उपस्थिति क्यों चाहते हैं ? यह शीर्ष पर पहुँचने वालों की नियति होती है या कोई अभिशाप है यह ?

क्या ऐसे शीर्ष रचनाकारों के बारे में भी नहीं कहा जा सकता है कि वे वर्चस्ववादी या सामंती संस्कारों के व्यक्ति हैं ?  क्या यह एक क़िस्म की अहमन्यता ही नहीं है ? यह ऐसे ही हुआ कि आप अपनी फ़सल खेत से खलिहान तक,खलिहान से घर तक लाने में क़ामयाब होने के बाद किसी दूसरे किसान को सफल होते हुए नहीं देखना चाहते !

क्या ऐसा नहीं है कि हर नए बदलते समय में कविता अपने लिए नया रास्ता अन्वेषित कर लेती है! कविता अपना 'फॉर्मेट' बना लेती है | कथ्य-रूप की पुरानी बहस में अगर कलावादियों की बात न करें तो लगभग यह स्थापना सर्वविदित है कि कविता में कथ्य अपना शिल्प तलाश लेता है |  आदमी जब सफ़र पर निकलता है तो राह ख़ुद -ब-ख़ुद दिखती जाती है या राह बनती जाती है | पहले से राह जानी-पहचानी हो और मंज़िल दिखती हो, कोई ज़रूरी नहीं है | पहले से किसी बने -बनाए ढाँचे में कविता लिखना एक तरह का शास्त्रीयतावाद है | अगर ऐसा ही होता तो  कविता आदिकाल से अपने रूप या शिल्प-संरचना को लेकर स्थिर या जड़ होती | मगर दुनिया में किसी भाषा में ऐसा नहीं होता है | अगर ऐसा होता तो आज भी हमारी हिन्दी में दोहा -चौपाई या कवित्त ही की शैली या संरचना में कविगण लिख रहे होते | हिन्दी में आधुनिक काल के भीतर ही देखा जाय तो भारतेन्दु युग से आज तक कविता ने शिल्प-संरचना को लेकर एक लंबी यात्रा की है | उसमें कई तरह के बदलाव दिखते हैं | शास्त्रीयतावादी इस बदलाव के प्रति हमेशा अपनी नाक-भौंहें सिकोड़ते रहते हैं | अगर महावीर प्रसाद द्विवेदी युग में ही निराला जैसी शख़्शियत कविता में नयी प्रयोगशीलता के साथ सामने नहीं आती तो हिन्दी कविता बंद दरवाज़े के भीतर दम तोड़ रही होती या तोड़ चुकी होती | पर समय-समय पर निराला जैसी शख़्शियतें अपनी-अपनी भाषाओं में कविता के लिए नए रास्ते तलाशती रहती हैं |

पुराने शिल्प को लेकर कविता में  यह प्रवृत्ति मध्यकालीन रीतिवादी कवियों में ज़्यादा दिखाई देती है | समकालीन कविता में भी ऐसी कोशिश एक तरह का रीतिवाद है| इस तरह की रीतियों या रूढ़ियों से आज की कविता को बचाए जाने की ज़रूरत है | हमारे बीच आज भी ऐसे कई कवि हैं जिनकी कविताओं में 'क्रॉफ्टिंग' पूर्व नियोजित होती है | यह भी एक क़िस्म का कलावाद ही है | इसी तरह आज कविता में छंद का अभ्यासपूर्ण प्रयास भी कविता में कथ्य की अबाध प्रस्तुति के लिए एक तरह की बाधा है |कोई वरिष्ठ कवि  यह क्यों चाहता है कि नयी पीढ़ी उनको ही फॉलो करे ! 

मेरे वरिष्ठ कवि  यह भी कहते हैं कि कविताएँ जो याद हो जाएँ,वे ही श्रेष्ठ होती हैं | मेरे लिहाज़ से आज के समय में  श्रेष्ठ कविताओं की यह कोई कसौटी नहीं है | आज छपाई की तकनीक ने हमें यह सुविधा दी है कि हम किसी कवि के काव्य- संग्रह को प्रकाशक से खरीदकर घर ला सकते हैं और उसे इच्छा हुयी तो बार -बार पढ़ सकते हैं | हम दुनिया भर के कई कवियों को पढ़ते रहते हैं, पर ज़रूरी नहीं कि उन सबको याद भी रखें | यह एक क़िस्म का ग़लत हठ है | हाँ,यह संभव है कि अपने प्रिय कवियों की कुछ कविताएँ हम कंठस्थ कर लें ,सहज -स्वाभाविक रूप से | पर इस स्मृति को लेकर हम कविता के लिए कोई मानक नहीं तय कर सकते हैं | मेरे वरिष्ठ कवि का यह कहना कि हम सच्चे काव्य प्रेमी हैं और कई कवियों की कविताओं को मौखिक सुना सकते हैं, इससे न तो कविता महत्वपूर्ण हो जाती है, न ही कविता को रचने वाला कवि | ऐसा कहना एक तरह के दंभ को ही सामने लाता है|  यह एक तरह की जुमलेबाजी है | यह मदारी की भाषा है| यह भी ज़रूरी नहीं कि कोई कविता को कंठस्थ कर उसे बेहतर समझता भी हो | इस तरह की बातों से सामान्य लोगों को भले भ्रमित किया जाए, कोई समझदार आदमी तो इस झाँसे में नहीं आ सकता है | ऐसे तो फ़िल्मी गीत ज़ल्द याद हो जाते हैं | वे संगीतात्मक भी होते हैं| मगर इससे वे स्तरीय काव्य में नहीं बदल जाते हैं | दूसरी तरफ कुछ फ़िल्मी गीत अपनी कथ्य -संवेदना की जीवंतता या मज़बूती के चलते महत्वपूर्ण या श्रेष्ठ कविता में बदल जाते हैं | मेरा यह भी मानना है कि कोई ज़रूरी नहीं कि  संगीत कविता को स्तरीय या महत्वपूर्ण बनाये | मेरी दृष्टि से कविता को प्रभावशाली बनाता है उसका कथ्य | यह बात दुहराते रहने या स्मरण रखने के लिए है | अगर कवि की बात में ही दम नहीं तो कविता प्रस्तुति के आधार पर प्रभावशाली नहीं हो सकती है| हाँ,कला-शिल्प और संरचना  के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है | इससे भाषा का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है | पर कला पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर कवि को अंततः कलावाद की तरफ़ ले जाता है | हिन्दी कवि रघुवीर सहाय यूँ ही नहीं कहते कि 'जहाँ कला ज़्यादा होगी, वहाँ कविता कम होगी|'अर्थात् सच्ची कविता की जान तो उसके कथ्य में होती है |  कविता में कथ्य -शिल्प का बेहतरीन परिपाक उसे बेशक श्रेष्ठता की ओर ले जाता है | इससे भला कौन इंकार करेगा !

अगर आप अपनी कविताओं को बढ़िया तरीके से, नाटकीय अंदाज़ में सुना सकते हैं तो यह कविता को प्रस्तुत करने की कला हो सकती है | इससे भी यह ज़रूरी नहीं कि वह एक श्रेष्ठ कविता है | अगर आवाज़ का ही जादू सर्वोपरि होता तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें /नज़्में आज उनके मरणोपरांत महत्वपूर्ण नहीं होतीं | सच्ची कविता के लिए सिर्फ़ उक्ति वैचित्र्य का होना भी मायने नहीं रखता है | मेरा अब भी यक़ीन है कि सच्ची और प्रभावशाली कविता अभिधा की सादगी में ही महत्वपूर्ण होती है |  आज अगर मंचों पर अपने समय में गले और आवाज़ को लेकर बेकल उत्साही  'पॉपुलर' थे तो उनकी छपी शायरी बेजान क्यों लगती है ? इसी तरह दूसरी ओर रफीक सादानी और अदम गोण्डवी जैसे शायर जो लोक जीवन से गहरे जुड़े थे, उनकी कविताई में लोकचेतना से जुड़े प्रभावशाली कथ्य और उसके सादगीपूर्ण कहन का जादू लंबे समय तक आगे भी बना रहेगा | इनकी कविताई लोक की पीड़ा, उसके संघर्ष को लोक की ही कलात्मक ज़ुबान में सामने रख देती है | कुछ कवि शताब्दियाँ लाँघ जाते हैं अपनी कविताई के दम पर | कुछ कवि  अपनी मृत्यु के तत्काल बाद विस्मृत होने लगते हैं | अगर  निराला या मुक्तिबोध ,नागार्जुन या धूमिल या गोरख पांडेय या  वीरेन डंगवाल या अदम गोण्डवी की कविताएँ  महत्वपूर्ण बनी हुयी हैं तो अपने कथ्य और उसमें समाहित जन की या लोक की पीड़ा अथवा अाशा-आकांक्षाओं  को लेकर ही |

कवि के लिए लोक का अनुभव विशेष मायने रखता है | अगर कवि बड़े शहर में जनजीवन की हलचलों से दूर एकाकी और सुविधाभोगी जीवन जीने का अभ्यासी है तो वह अपनी कविता में उक्ति वैचित्र्य या जुमलेबाजी  के ज़रिए ऐसी कविताएँ रचेगा जो या तो दार्शनिकता का पुट लिए होंगी या कोरी वैचारिक या स्पंदनहीन | कविता में लोकजीवन या जनजीवन से अलग-थलग कवि 'क्राफ्ट्स' पर चाहे जितनी मेहनत करे और साल में किसी एक कविता की रचना करे, पर कविता में वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है तो वह असरदार नहीं हो सकती है| लोगबाग क्यों कहते हैं कि 'घी का लड्डू टेढ़ो भला' ! अगर लड्डू  देशी शुद्ध घी का है तो ढेढ़ा होने पर भी स्वाद में बेहतरीन होगा | अगर वह घटिया डालडा या तेल का होगा तो स्वाद में कमतर हो जायेगा |  यहाँ पर घी के टेढ़े लड्डू के लिए भी लोक की स्वीकृति दिखाई देती है | यह बात कविता के कथ्य-शिल्प पर भी लागू होती है | कथ्य दमदार हो तो कविता स्वीकार की जा सकती है, पर ख़ाली शिल्प के दम पर उसका लोक के आगे टिकना कठिन है |  वैसे भी घी के लड्डू का एकदम सुंदर और गोल होना बहुत मुश्किल होता है | ऐसे ही दमदार कथ्य वाली कविता शिल्प में तोड़-फोड़ करते हुए सामने आती है | इसका मतलब यह नहीं है कि कवि को अपनी कविता में शिल्प -संरचना या कलापक्ष के प्रति लापरवाह होना चाहिए | ऐसे मेरा मानना है कि कविता में कथ्य-शिल्प दोनों का उम्दा होना एक आदर्श और समुन्नत स्थिति है |

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हिन्दी : भारतीय अस्मिता की पहचान

किसी भी देश के निवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना के विकास और पारस्परिक सम्पर्क को बनाये रखने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता होती ...