Friday, 16 October 2020

कुसुमलता पाण्डेय की कहानी

प्रीत वाली पायल बजी

         मिट्टी से लिसड़ा प्रेम का नन्हा अंकुर, पहली दो पत्तियां निकली. एकदम तनी पत्तियां. पौधा बन फलने फूलने को उतावली. एकदम चटक हरियाली ने समूचा कोना ढक लिया. मेरे भीतर स्मृति की अंधेरी नदी में अनगिनत दिये थरथरा उठे. वह लहरों पर तैरते कुछ इस तरह आकार लेने लगें कि संजू नाम लिख गया. फूलों से नहाए वे दिन. मैं पीछे मुड़ा और उन दिनों को देखने लगा.

         संजू को पहली बार अपने घर के सामने से गुजरते देखा. अमलतासी रंग का चूड़ीदार पायजामा. कढाई वाली लाल कुर्ती. स्कार्फ से ढका हुआ चेहरा. उन दो बोलती आंखो से बड़ी पुरानी पहचान महसूस हुई. शाम होतीमैं सड़क से गुजरते लोगों मे वह बोलती आंखे ढूंढने लगा. अगर किसी दिन गाड़ी रिक्शा की आड़ की वजह से दीदारे-यार वाली सूरत नहीं बनती. एक अनमनापन मुझमें उसे न देखने तक फैल जाता. जिस दिन देख लेता मैं, खुद को बडभागी मान बैठता.

          जाने कितने दिनों के बाद उगता हुआ सूरज देखा। भोर का नर्म उजाला ओंस के फूलों पर तितली की तरह मंडराने लगा. संजू आती दिखाई दी. अब हर सुबह उगता हुआ सूरज देखना है. मैंने निश्चय कर लिया. अगर प्रेम वर्ग-पहेली हैं तो उसकी पेंचीदगियों मे मैं उलझता गया. जिसे हल करने मे हार कर शागिर्द बना अपने दोस्त पियूष का.हम दोस्तों की मंडली उसे जेम्स बांड007 कहती. संजू के हिस्से में परिवार का इतना ही दुलार आया,घर के पिछले हिस्से तक जितनी रौशनी जाती है.सुनी तो संवेदनाएं गझिन हो गई.

          वह प्रो.विकास की देखभाल करने लगी हैं. मालूम पड़ने पर लगा,कारू का खजाना मिल गया. सेवानिवृत्त प्रो.सर के दो मंजिला घर में यदि उनके साथ कोई रहता है तो वह अकेलापन हैं. बच्चे सेटेल हो चुके है. पत्नी को किसी बीमारी ने असमय छीन लिया,परन्तु उन्होंने अपनी व्यस्तता का पूरा इन्तजाम कर रखा है. घर के एक कमरे में लाइब्रेरी, जिसमें साहित्य और दर्शन से जुड़ी किताबों का शानदार संग्रह है. वह पत्र-पत्रिकाओं में आलोचना और समीक्षाएं लिखा करते हैं. इतनी व्यस्तता में समय पर दवाई के अलावा कई अन्य जरूरी काम छूट जाते.अखबार में विज्ञापन निकलवाया और जब संजू ने सम्पर्क किया, उसे रख लिया. वह आराम कुर्सी पर बैठे बैठे किताबें तो पढ़ लेते, टेढे-मेढे अक्षरों में लिखना भी हो जाता परन्तु गर्दन में दर्द के कारण टाइप नहीं हो पाती. मुझे जब समय मिलता मैं प्रो.सर के मैटर टाइप कर देता.

           संजू क्या आई अचानक उनके घर जाने के मायने बदल गए.वह घर मंदिर बन गया,मेरे लिए.इधर संझौती को दिया बत्ती का समय होता. मै चाह के दो फूल लेकर चल पड़ता. कमर मे चुन्नी बांधे, मैंने पहली बार वह चेहरा देखा. बिना स्कार्फ के.फूल पर पड़ी क्वारी ओंस जैसा रूप. सादगी भरी बेफिक्री बयान करती आंखेंं.

          सर्दियों के दिन छोटे होने लगे. उनके घर से संजू लौटती, रात का अंधेरा जैसे हो आता. मैंने कई बार साथ चलने को कहा. वह झिझकीलेकिन विकास सर के कहने पर राजी हो गई. खुद मे सिमटी सी बाइकपर बैठती. कुछ दिन बीते. वह थोड़ा खुलने लगी. बाजार से कुछ लेना होता, साथ में खरीद लेती. झिझक वाली धुंध से उगी गूंगी यात्राएं अर्थपूर्ण हो गई. मैं जान न सका. यह मुझे उस दिन पता चला जब अचानक "आप" बदल गया "तुम" मे. कही उस ओंर भी तो नहीं अंखुआने लगे ढेरों सपने.

          फरवरी के मधुमासी दिन. पार्क में खिले फूलों का भरा पूरा यौवन. नर्म धूप के छूने से पेड़ों का रह रह कर झूमना. रूक रूक कर हवा की सरगोशी से बजती पत्तियां और एकान्त की गुदगुदी. तन की कितनी गांठें खुलने लगी. "तुम्हारा प्रेम मेंहदी की खूशबू हो जैसे. मेरे रोम रोम में यह रच बस सा गया है. "विडचैम की पतली रूनझुन वाली आवाज मुझमें उतरी.

 "समय के पत्थर पर हमारा प्रेम कितनी गहरी लकीर खींच पाता है, कुछ कह पाना मुश्किल है"

"ऐसा क्यों?":-संजू पर जैसे आसमान से बिजली गिरी हो।

"मुझे गुंडगांव जाना होगा,एक मल्टीनेशनल कम्पनी ने जॉब ऑफर की है":-मैंने बताया

"अरे यह तो खुशी की बात है."अगले ही पल वह गौरैया सी चहक पड़ी.

हां,सो तो है. मैंने बात यही पर वाइंड अप कर दी. कुम्हलाया कमल मैं कैसे देखता.पर संजू खामोश बैठी रही. कही भीतर उद्देलन तूफान की तरह चलता रहा. मैंने कबूतरों की गुटरगूँ से भरे खंडहर तक चहलकदमी का प्रस्ताव रखा.सोचा,गुड़गांव जाने से उपजी उदासी पिघल जाएगी.

           खंडहर के प्रवेश द्वार पर पर पैर रखते ही अपने नीडो मे दुबके सचेत परिन्दे कुनमुना उठे.निचाट उजाड़ खंडहर. अंधेरे के महीन रेशे संजू के गालों से लटों की तरह खेलने लगे. "अंधेरे में परछाई की तरह तुम मेरा साथछोड़ तो न दोगे.":-संजू की आंखों में गहरी झील उग आयी.

"अरे, मैं कोई दुष्यंत हूँ,, जो शकुंतला से अंगूठी गुम होने पर वह भूल गया."मैंने उसे समझाया

           सांझ की झील में अंधेरा जलपाखी की तरह तैरने लगा.हम घरों की ओंर लौटने लगे.रास्ते भर बात बात पर खिलखिला देने वाले होंठ आज नहीं हंसे.मैं संजू को उसके घर से कुछ पहले तक छोड़ने आया. उन आंखो मे उदासी का पानी अभी तक सूखा नहीं था.

           अब तक उसकी छाया को छूकर खुश हो लेता मैं. स्फटिक जैसा पवित्र मन लेकर यह रिश्ता जीता रहा मैं. संजू को खंडहर बन चुकी पाषाण खंड की प्राचीरें भली लगी.उसकी सांझ के झुटपुटे मे प्रेम गंध से नहाई देह आमंत्रित करने लगी.हर रोज. उस दिन. क्षितिज पर,आसमान का धरती की देह पर झुकाव देखा.अंधेरे की पलकें गेरुए उजाले ने चूम ली.अंधेरा कांप उठा.वह सकुचाकर खुद मे ही सिमट गई. मेरे भीतर आदिम चाहना की कच्ची नींद उसी पल टूट गई. सामने हरा-भरा यौवन का जंगल. मैं खुद को जंगली बनने से रोक न सका,पर संजू की मर्जी के बगैर नहीं. भीतर से उठती तरंगों ने एक ही कोण ढूंढ लिया.

           प्यार से पगे वह पल.सुदूर पहाडियों के झुरमुट से पीछे, अकल्प अछोर उतरता रहा.

           अपने शहर में मेरी आखिरी रात. संजू का मायूस चेहरा रह रह कर सामने आता रहा. जैसे वहां उतरती सांझ का अंधेरा जम गया हो.

           रेलवे स्टेशन पर खामोश आंखो ने एक दूसरे के कितने संदेश स्वीकारे.मन के किसी कोने में अनकहा कितना कुछ छूट गया. अगला दिन. नया शहर. नये लोग.नया माहौल. मैं उस परिवेश को खुद मे आत्मसात करने लगा.परिवार में बिना नहाए एक कप चाय नहीं पी थी.यहां आकर दिन भर के काम से उपजा तनाव थकान दो चार पैग से दूर होने लगी.मेरा माज़ी मुझसे दूर होता चला गया, बहुत दूर "जूम लैंस "मे से पास का दृश्य दूर चला जाए.मैं लिव-इन मे एक कलीग्स के साथ रहने लगा.गार्गी नाम था उसका.लड़की नहीं फूलों की बहार हो जैसे. पास होती तो सब मह मह करता.

            वह जिस घर में पेइंग-गेस्ट थी,मंदी के दिनों में उनके बेटे की नौकरी छूट गई. वह अपने परिवार के साथ वापस लौट आया.

           पहले प्यार को अपने भीतर बेरूखी का क्लोरोफार्म सुंघाकर सुला दिया.यह बेहोशी भरी नींद संजू के फोन और मैसेजों से भी न टूटी और दूसरा, वह प्यार था ही कबमेरे फ्लैट के साथ साथ मुझे किसी रिहायशी होटल के कमरे की तरह इस्तेमाल किया.तीन साल का वक्त लगा मुझे छोटा सा सच जानने में कि लिव इन मे दो देह एक छत के नीचे रहती रहती हैं, बिना किसी नियम शर्त से बंधे. जिस दिन गार्गी चली गईं, प्रो.विकास से तर्कों मे विजयी होने का दर्प, युद्ध में हारे सिपाही की तरह सामने सिर झुका कर खडा हो गया.

               सुख देकर दु:ख तो नहीं मिलता

          लड़की की कहानी में पात्र बदलते आ रहे हैं. जाने कब से. घटनाएं घूम फिर कर वही रहती है. अपनी धुरी पर घूर्णन करती. वह बदलती हैं पर निहायत ही मंथर गति से. बेहिसाब बंधनों मे शिथिलता आएगी भी कितनी. बुझे बुझे मन वाली लड़की को रत्ती भर प्रेम मिला.मैं खिल गई. आह!मुझमें अप्लावित ढाई आखर का वह सिंचन. सुनी अनसुनी ढेरों आकांक्षाएं एक साथ फल-फूल उठी.राजीव के आकर्षण की धूप में तन सुनहरा हो आया और मन भी.पहली बार जाना, मेरा वजूद भी हैं.

          वह खुद मे कितना रहता है, मैं नहीं जानती. मुझमें अखंडित ढंग से रहने लगा.और एक दिन अंतरंगता वाले बादलों ने निजता का सारा आकाश ढंक लिया.

"इन आंखो मे लहराता नीला समुद्र पीना हैं मुझे, प्लीज.":-वह मेरी ओर तीखी प्यास लिए बढ़ा.उन होंठों ने प्यासी जमीन पहली बार छू ली.एक आंच सी सुलग उठी मुझमें. उन पलों में वह अगस्त्य बन गया. देह में उठती बैठती सांसें कांप उठी.उनकी गति तेज हो आई. कबूतरों की गुटरगूँ के शोरसे भरे खंडहरों में उस शाम बिजली की कौंध सी जन्मी.शायद इसलिए कि तुम अपने हिस्से का सुख चुन लो और तुम्हारे छोडे दु:खों के विराने मे अभिशापित सी सिसकती रहूं, सुबकती रहूं. मैं तो समझ बैठी थी कि होंठ से होंठ पर दस्तखत वाला अनुबन्ध उम्र भर सिरजना हैं पर नहीं,यह हमारेरिश्ते का पक्का सुबूत कहांं था. सब जाली दस्तावेज की तरह फर्जी.प्रो. साहब के सामने लव मैरिज के पक्ष मे खड़ा होना अब मछली फंसाने को जाल फेंकने जैसा लगता है.

           हरी दूब जैसी मुलायम छुअन थी,तुम्हारी.कहाँ जान पाई धुंधलके में जिस हरियाली पर मोह उठी हूँ वहां कांटों से भरे कैक्टस के सिवा कुछ नहीं मिलेगा. अपना समुद्र तुम्हें सौंप दिया. अब मैं उजाड़ रेगिस्तान ही शेष बच्चे. रेतीला सपाट मैदान, जहाँ कोई ख्वाहिश नहीं उगती.

           जीवन की अनुकूलता तलाशने प्रवास के कुछ महीने साइबेरियाई चिड़िया आती हैं. उनके साथ तुम आए.बसंत का आना तुम्हारी विदा बना था,तुम जब तक पास थे, दिन हिरण की तरह चौकड़ी भरते हुए गुजरते गए. तुम्हारे जाते ही गीली रेत बन गए. क्या मजाल एक कण टस से मस हो.

          शहर क्या बदला ,तुम बदल गए. तुम सचमुच दुष्यन्त बन गए और मुझे शकुंतला बना डाला.मेरी अनिच्छा के बाद भी.

                  खोकर कितना कम मिला

          एक माह हो गया. शादी के बाद इसी शहर में रहने वाली बेटी मिलने नहीं आई.जब फोन पर बात करने की कोशिश करता हूँ किसी काम का बहाना करके बात नहीं करती.लोगों की निगाहें संजू से इस बेमेल से रिश्ते की वजह पूछती है. वह खिल्ली उड़ाती सी महसूस होती हैं. सच कहूं तो इस कहानी में मुझे नैरेटर होना था.जिन्दगी पीछे छूट चुकी हैं. हांफती हुई उम्र. अपनी बासठ साल की जिन्दगी मे कितने पात्रों को जी चुका हूँ,परन्तु इस कहानी का पात्र बनकर मुझे सिर्फ अफसोस है और शायद आप भी मेरी सोच से सहमत होगे कहानी पढ़ने के बाद ही सही.

              यह कहानी बावफा संजू और उसके बेवफा प्रेमी राजीव की है. कहानी में शब्द दर शब्द, रेशा रेशा यथार्थ मिलेगा. पर बेतरतीब ढंग से फैला पसरा.कोई सुगढ़ क्रमबद्धता नहीं.

                मैं खूब जानता था, क्या चल रहा है उनके बीच .मुझे मालूम था कि दोनों सांझे जीवन के आकाश का हिस्सा बन चुके है.स्थितियों से अनुकूलन बैठाना कैक्टस की विशेषता है. उन दोनों ने स्थितियों को अनुकूल बना लेने की जिद ठानी हैं. देखकर अच्छा लगा.

              उन दिनों वह लड़का लड़की कम,प्यार से भरे हुए प्याले ज्यादा दिखाई पड़ते. बात बेबात छलकते, होंठ खामोश. आंखें हंस देती उनकी. मेरी मौजूदगी में आंखें बचाते हुए एक दूसरे को चोर नजर से देखते.जिस दिन उन दोनों में से एक नहीं आता, उनकी बेचैनी देखता मैं. इन्तजार गर्म दोपहरी हैं, मुश्किल से गुजरती हैं.

               वह पर्त दर पर्त आपस मे खुलते गए. इतना जहां से सब समेट पाना मुश्किल है. झीनी पर्त भी न बची.

              संजू कल तक गाती गुनगुनाती रही. अचानक दीवार पर टंगी बेजान तश्वीर बन गई. मुझे लगा,राजीव चला गया इसलिए उदास हैं. असल वजह मुझे सोया जानकर किसी सहेली से बातचीत से मालूम पड़ी.राजीव से मेरे रिश्ते को दुनियावी अर्थ मिलना बेहद जरूरी हो चुका है.

             राजीव के रवैये ने संजू से उस रिश्ते का धरातल छीन लियाइसके बाद वह गहरी उदासी भरी घाटियों में कब तक भटकती .वापसी के सारे रास्ते बंद हो चुके थे. चयन अपना जो था. वह निरूपाय जान देने पर अमादा थी.मेरी प्रतिष्ठा क्या दो प्राणों से ज्यादा मूल्यवान थी.काफी सोच विचार के बाद संजू से शादी का निश्चय किया.

              उसके घरवालों को लगा कि संजू के भाग्य जाग गए. जबकि शादी क्या उसके सम्मान पर चुनरी डाल दी मैंने. क्लैडर से समय ने सवा तीन साल नोंचकर फेंक दिए.पल पल का हिसाब बेमानी है. यह कहानी को अनावश्यक रुप से लम्बा ही खींचेगा.हां संजू के लिए इस घर मे अलग कमरा है और नमन हूबहू राजीव की जीरॉक्स कॉपी लगता है.

             जबरदस्त कोहरीली और सर्द हवा से ठिठुरती रात.दस साढे दस का समय.संजू नमन के साथ शायद अपने कमरे मे सो चुकी होगी. मैं ब्लोअर की आंच के सहारे किसी लेखक मित्र का ताजा छपा उपन्यास पढ़ने में तल्लीन था.मोबाइल ने बजना शुरू किया. स्क्रीन पर राजीव का नाम चमकता देखकर मैं चौंक पड़ा.निहायत ही शुष्क औपचारिकता के साथ "हैलो"बोला.

"हैलो!विकास सर नमस्कार',मैं राजीव... लहरों की तरह अलमस्त अंदाज में बात करते राहुल की आवाज में भारीपन व लड़खड़ाहट रही. कही कुछ टूटा फूटा था."

"आधुनिक जीवनशैली बेहतर है के पक्ष में मैने आपसे कई बार लम्बी जिरह की.इस भ्रम में हमने कई साल गंवा डाले.अपने शहर में बीते दिनों की यादें सुकून देती हैं. ऊपर से आकर्षक किन्तु भीतर से बोझिल हैं यहां जिन्दगी. वर्क लोड और कम्पटीशन का स्लो प्वाइजन है यह आधुनिकता. जिन कंधों पर सर रखकर लोग सुख-दुख बांटते हैं. सरोकार बदले, कंधा भी बदल दिया."

राजीव तुमने शराब पी है, मैने पूछ लिया.

"हां पी है. खैर मेरी छोड़िए, आप कैसे है और संजू आपकी देखभाल करती हैं वह."

"राजीव मै स्वस्थ हूँ और संजू यही है मेरे पास"

        बेनतीजा मोड़ पर खडी़ कहानी अपने अंत की आज भी राह देख रही हैं.

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कुसुमलता पाण्डेय 

शिक्षा- स्नातक डिप्लोमा

सम्प्रति- स्वतन्त्र लेखन

रचनाऐं- दैनिक जागरण, कथाक्रम, सर्वसृजन, वर्तमान साहित्य, जनसंदेश टाइम्स हरिभूमि स्वतन्त्र भारत, उत्तर प्रदेश, इत्यादि पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित आकाशवाणी लखनऊ से कहानी प्रसारित अनुभूति के इन्द्रधनुष कविता संग्रह में कविताएं समीक्षा कहानी संग्रह

जलेस लखनऊ इकाई सदस्य

सम्मानः सर्वसृजन कथा सम्मान 2015

ईमेल- pandey.kusum537@gmail.com

Tuesday, 29 September 2020

शेष अगले अंक में (उपन्यास अंश) – अरविन्द तिवारी

(कस्बाई पत्रकारिता पर लिखा गया हिंदी का पहला व्यंग्य उपन्यास। उ.प्र. हिंदी संस्थान के प्रेमचन्द पुरस्कार से सम्मानित)

यह उपन्यास कस्बाई पत्रकारिता को केंद्र में रखकर लिखा गया है। पृष्ठभूमि राजस्थान का नागौर ज़िला मुख्यालय है जिसमें राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और लोकल अख़बारों के पत्रकारों के क्रियाकलापों का ताना बाना बुना गया है। उपन्यास का नायक ज़िले का जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी प्रशांत कुमार है जो घाघ पत्रकारों के गुटों के बीच पिसता है। पत्रकारिता का शौक गैर पत्रकारों में भी व्याप्त है और वे छद्म नामों से पत्रकारिता कर रहे हैं। लोकल अख़बार कई तरह से आर्थिक धनोपार्जन में लिप्त हैं। लोकल अख़बारों की पीत पत्रकारिता का चिठ्ठा इस उपन्यास का मुख्य पहलू है। पीत पत्रकारिता के अलावा जबरन विज्ञापनों की वसूली, ज्यादा प्रतियां दिखाकर कम छापना और पेड न्यूज इन अख़बारों की आय का स्रोत है। नेताओं और बुद्धिजीवियों की अख़बार में छपने की ललक उनसे कई तरह के समझौते करवाती है। सियासत में अख़बारों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी इस उपन्यास में उभारा गया है। पत्रकार किस तरह राजनेताओं से फ़ायदा उठाते हैं, यह उपन्यास उसका प्रमाण भी प्रस्तुत करता है। पत्रकार किस तरह युवाओं को पत्रकारिता का ग्लैमर दिखाते हैं और उनके झांसे में आकर युवा किस तरह सड़क पर आ जाते हैं, इसकी जीवंत कथा कहता हुआ यह उपन्यास कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी उपस्थित करता है। आदि से अंत तक व्यंग्यात्मक भाषा शैली से लबरेज़ यह उपन्यास पिछली सदी के अंतिम वर्षों में लिखा गया था। इसकी भाषा की विशेषता को कई समीक्षकों ने रेखांकित किया है। दैनिक जागरण के सर्वे में यह उपन्यास चर्चित उपन्यासों में से एक माना गया था।

-    अजय अनुरागी

समीक्षक, व्यंग्यकार, कथाकार

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यहां प्रस्तुत अंश में पुष्पकुमार नाम के एक युवा शिक्षक के जीवन की विसंगतियों का चित्रण है। यह युवा शिक्षक, पत्रकारिता के ग्लेमर में फंसकर एक अख़बार अपने निवास के पते से निकालता है। इस अखबार का मालिक और संपादक जयपुर  में निवास करता है। पर स्थानीय स्तर पर पुष्पकुमार ही संपादक माना जाता है। चुनाव की पेड न्यूज के चक्कर में वह मुसीबत में फंस जाता है। इस अंश में पेड न्यूज पर ही फोकस है, जिसके बरक्स फेक पत्रकार मुसीबत में फंसता है।

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चुनावी हवा

 

अतिरिक्त गोभी आने पर जैसे सब्जी मंडी का विस्तार हो जाता है, उसी तरह चुनाव घोषित होते ही राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय समाचार पत्रों ने अपने पेज बढ़ा दिए।

नागौर के अख़बार भी पीछे नहीं थे। ‘तलवार’ और ‘प्रदेश समाचार’ दोनों ही बड़ी सज धज के साथ निकल रहे थे। ‘तलवार’ ने वैश्याओं के इंटरव्यू वाला धारावाहिक बन्द कर दिया।

कन्हैयालाल स्नातक के अख़बार को तेजपाल देख रहे थे। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने नए अख़बार के लिए कार्यवाही कर दी थी। अभी तक एन.आई.आर. से अख़बार स्वीकृत होकर नहीं आया था। कन्हैयालाल स्नातक उन्हें समझाते समझाते थक गए थे कि अख़बार चलाना उतना आसान नहीं है, जितना दिखाई देता है। तेजपाल को हठधर्मिता उनके खानदान से विरासत में मिली थी। त्यागपत्र देने की विरासत की भांति वे हठधर्मिता की विरासत को पीढ़ियों तक सहेजना चाहते थे, अविवाहित रहकर।

   "सरकारी मुलाजिम कम पत्रकार" पुष्पकुमार ने योजनाबद्ध तरीके से समाचारों का संकलन किया। सबसे पहले जनता दल के प्रत्याशी को निशाना बनाया। तीर बिलकुल सही स्थान पर लगा। जनता दल के प्रत्याशी ने जब पांडेय वाले लोकल अख़बार (जिसे पुष्पकुमार नागौर में देखते थे) में पढ़ा कि उनकी जीत तय है, तो वे सीधे अख़बार के दफ़्तर  पहुंचे जहां दफ़्तर के नाम पर एक पुरानी मेज़ और दो पुरानी कुर्सियां मय चारपाई के उनके स्वागत के लिए मौजूद थीं। प्रकाशक, संपादक, क्लर्क, संवाददाता आदि को ढूंढने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं आई क्योंकि यह समस्त कार्य एक ही व्यक्ति करता था और संयोग से वह व्यक्ति लुंगी बनियान में अपनी चप्पल पॉलिश करता हुआ बरामद हो चुका था।

  जनता दल के प्रत्याशी को लगा कि वह गलती से किसी पढ़ने वाले छात्र के कमरे पर आ गया है,लेकिन जब पुष्प कुमार ने लुंगी के ऊपर पत्रकारिता का कुर्ता पहना,तो वास्तव में वह कमरा अख़बार के दफ़्तर जैसा लगने लगा।पुष्पकुमार ने बताया,चूंकि अख़बार नागौर से निकलता है और जयपुर में छपता है, अतः यह केंपनुमा कार्यालय समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति उसी तरह करता है,जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली से प्राप्त होने वाले प्रति यूनिट चावल और गेहूं आम आदमी की भूख को मिटा देते हैं।

 जनता दल के प्रत्याशी के मन मस्तिष्क पर चुनाव सवार था,इसलिए अख़बार को दस हज़ार की सहायता देकर आश्वस्त हो गया कि इस अख़बार के कारण उसके वोटों में कम से कम दस हज़ार  की वृद्धि अवश्य होगी।

पुष्पकुमार ने आश्वस्त किया,"आपकी हवा बनाने में हमारा अख़बार पूरा प्रयास करेगा।"पुष्पकुमार ने चुनाव आयोग को भी धन्यवाद दिया कि उसने विधान सभा का कार्यकाल पूरा होने से तीन महीने पहले ही चुनाव करवा दिए।

  धन्यवाद उन्होंने जनता दल के प्रत्याशी को भी दिया क्योंकि अब उनके अख़बार में जनता दल के प्रत्याशी की हवा बिगाड़ने का काम शुरू होने जा रहा था!

  अगले अंक में  अपनी योजना को कार्यरूप देते हुए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी की हवा बहने का समाचार छापा।अख़बार के अनुसार वह हवा चारों दिशाओं में बह रही थी।

जहां कहीं वह हवा नहीं बह रही थी,अख़बार के इरादे भांपकर कहा जा सकता था कि अगले अंक तक वहां अवश्य बहने लगेगी। इन छूट गए स्थलों में एक स्थल अख़बार का दफ़्तर अर्थात पुष्पकुमार का निवास भी शामिल था।

  धूप के बाद छाया और छाया के बाद धूप होती है,प्रकृति के इस नियम को समझाने के लिए कुछ लोगों ने पुष्पकुमार के यहां धावा बोला।पहला धावा भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी की ओर से बोला गया।यह धावा एक तरह से सुकून देने वाला था।जिस अंदाज़ में पार्टीजन उनके यहां पहुंचे,यह कोई नहीं कह सकता था कि वे मारपीट या तोड़फोड़ नहीं करेंगे।हड़बड़ा गए थे पुष्प कुमार।

अख़बार को दिखाते हुए उनसे पूछा गया,"हमारे प्रत्याशी के पक्ष में हवा बहने का समाचार आपने दिया है?"

"जी हां..... हां जी"पुष्पकुमार की धड़कन जो लगभग बंद होने जा रही थी,चालू हो गई।

"बहुत बहुत धन्यवाद आपका।मुझे आप अपना कार्यालय दिखाएंगे।"

"जी हां,आप कार्यालय में ही खड़े हैं।"

"अच्छा मज़ाक है.....खैर आप नहीं दिखाना चाहते तो कोई बात नहीं।चुनाव के दिनों में सभी सतर्कता बरतते हैं।ये रखिए दस हज़ार रुपए हमारी ओर से अख़बार के लिए।"

"और हां,आपने जो हमारी हवा बहने का समाचार छापा था,वह चुनाव होने तक लगातार छापते रहिए।"

"आप चिंता न करें।"

पुष्पकुमार प्रसन्न थे।वह ऐसे सुखद क्षणों में जो ग़ज़ल गुनगुनाया करते थे उसे गाने लगे।

"चांदी जैसा रूप है तेरा सोने जैसे बाल

एक तू ही धनवान है गोरी बाक़ी सब कंगाल"।

इस ग़ज़ल के प्रति पुष्पकुमार का प्रेम इस कदर था कि पत्रकार जगत उनका संबंध किसी गौरवर्ण नारी से जोड़ने लगा।पत्रकार जगत में गौरवर्ण केवल मिस आरती का था।पर जिस तरह का बर्ताव वह पत्रकारों से करती थीं,उसे देखकर यह दावा नहीं किया जा सकता था कि कोई पत्रकार उनका दीवाना है।

अनहोनी को होनी में तब्दील करने वाले पत्रकार अंततः पुष्पकुमार की ग़ज़ल गायिकी का संबंध मिस आरती से जोड़कर प्रकरण समाप्त कर देते थे।इस तरह के संबंध की भनक जब पुष्पकुमार के पिता को लगी तो वह पत्रकार मिस आरती से मिलने गए।बताते हैं कि मिस आरती ने उन्हें टका सा जवाब देते हुए कहा,वे किसी पुष्पकुमार को नहीं जानती।उन्होंने उस व्यक्ति को देखा तक नहीं,जिसके बाप होने का दावा वह कर रहे हैं।

पुष्पकुमार ने ग़ज़ल गाकर खाना खाया और"बीस हज़ार रुपए का क्या किया जाय"विषय पर गहन चिंतन करने लगे।दो प्रत्याशियों से दस दस हज़ार मिल गए,शेष चुनाव में खड़े प्रत्याशियों से वसूल करने की कार्य योजना बनाने लगे।उन्होंने तय कर लिया कि इस खुशी में इस अख़बार के मालिक जयपुर निवासी पांडेय जी को शामिल नहीं करेंगे।

वह चारपाई पर थे,और जैसा रिवाज़ है चारपाई ज़मीन पर ही थी, अतः उनके सपनों को वांछित ऊंचाई नहीं मिल पाई थी।किवाड़ अधखुले थे।बनियान,अंडरवियर और उनके नयन भी अधखुले ही थे।

भड़भड़ाकर दरवाज़ा पूरा खुल गया!

बाहर खड़ी जीप पर लगे झंडे को देखकर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था कि आगंतुक जनता दल के थे।कुछ रोज़ पहले ही जनता दल की हवा बहाने के दस हज़ार रुपए पुष्पकुमार वसूल चुके थे।आज फिर उन्हीं की ओर से अख़बार को सहायता पहुंचाने की कार्रवाई शुरू हुई।सबसे पहले उनके चेहरे को आठ दस थप्पड़ों की निर्विघ्न सहायता प्राप्त हुई।इसके बाद पीठ,पेट और अंत में टांगों को सहायता दी गई।सहायता काफी मजबूत किस्म की थी,इसलिए खड़े नहीं रह सके पुष्पकुमार।

   "हरामजादे!हमारी हवा बहनी बन्द हो गई।भाजपा की हवा चलने लगी।निकाल दस हज़ार रुपए।हमें पता चल गया, तू मास्टर है।सरकारी नौकर होकर अख़बार चलाता है।हम तुझे जेल भिजवाएंगे।"

पुष्पकुमार बेहोश होना चाहते थे,किन्तु यह सोचकर कि बेहोश होते ही ये लोग कमरे में रखे सभी रुपए ले जाएंगे,उन्होंने बेहोश होना मुनासिब नहीं समझा।उन्होंने दस हज़ार रुपए ऐसे दिए जैसे कोई सेठ डकैतों को तिज़ोरी की चाबी सौंपता है।

सहायता पहुंचाने वाले चले गए।

पुष्पकुमार ने करहाते हुए अपने पड़ोसी को बेहोश होने की सूचना दी और बेहोश हो गए।

 

पत्रकार जगत ने इस घटना को हाथोंहाथ लिया।काफी समय से पत्रकार की पिटाई वाली घटना का इंतजार पत्रकारों को था।प्रतीक्षा की घड़ियां बीत गईं और एक अख़बार के कार्यालय पर हमला हो गया।

सभी पत्रकार उत्साहित थे,प्रफुल्लित थे,संगठित थे।सबसे पहले राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में नागौर पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में राम अकेला का बयान आया।इसके बाद कन्हैयालाल स्नातक का बयान आया।यह बयान भी नागौर पत्रकार संघ की हैसियत से आया।तीसरा बयान जो नागौर पत्रकार संघ की हैसियत से छपा,वह"रेगिस्तानी रंग"के ज़िला संवाददाता शैलेन्द्र सुमन का था,जो किसी राष्ट्रीय दैनिक में छपा था।

 नागौर पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में तीन व्यक्तियों द्वारा घटना की निन्दा का समाचार पढ़कर पाठकों को विश्वास हो गया कि नागौर के पत्रकार संगठित हैं!उनमें एकता बनी हुई है तथा वे हिंसक कार्रवाई के विरुद्ध एक मंच पर खड़े हैं।पुष्पकुमार का हाल चाल पूछने वालों का तांता लग गया।हमला चूंकि अख़बार के दफ़्तर पर किया गया था, अतः जिला कलेक्टर को भी अस्पताल का मुआयना करना पड़ा।एस. पी.साहब भी आए।

   राम अकेला,मनीष के साथ आए।इनके जाने के बाद कन्हैयालाल स्नातक और के.के.गोस्वामी आए,जो राम अकेला के जाने की प्रतीक्षा में काफी देर से गेट पर खड़े थे।कन्हैयालाल स्नातक के प्रिय शिष्य और "प्रदेश समाचार"के कार्यकारी संपादक तेजपाल मय फोटोग्राफर के अस्पताल आए।मिस आरती भी आईं,जिन्होंने पुष्पकुमार के पिता से दो टूक शब्दों में कहा था कि वे किसी पुष्पकुमार को नहीं जानती।पी.आर. आे.प्रशांत कुमार और शैलेन्द्र सुमन साथ साथ आए और काफी देर तक बैठे रहे।"मरीज के पास पत्रकारों को देर तक नहीं बैठना चाहिए" के सिद्धांत को परे धकेलते हुए शैलेन्द्र सुमन ने पुष्पकुमार को ढांढ़स बंधाया।पुष्पकुमार उनके इस कृत्य पर आंसू छलकाए बिना नहीं रह सके।

पी.आर.ओ.प्रशांत कुमार फल लाए थे।

मो. इब्राहीम जो एक रिटायर्ड अध्यापक थे और जिनका मिशन मरीजों को फ़्री फल बांटना था, फलों के साथ उपस्थित थे।मो.इब्राहीम एक ईमानदार और नेकदिल इंसान थे।दिन दशा ख़राब होने के कारण इनका परिचय पत्रकार जगत से हो गया था।मित्र को वह पीठ पीछे भी मित्र मानते थे,इसलिए पूरी रात पुष्पकुमार के पास बैठे रहे।

कालू जी कोफ्ते वाले भी पुष्पकुमार को देख आए।उनके स्थाई ग्राहक थे पुष्पकुमार।

पुष्पकुमार की माताजी और भाई अा गए थे।पिताजी नहीं आए लेकिन,जैसा उनकी माताजी ने बताया,वे पुष्पकुमार के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं।

    इतने बड़े बड़े लोग आए,इसलिए सम्बन्धित थाने की पुलिस को भी आना पड़ा।यद्यपि वह अपनी आदत के अनुसार एफ.अाई.आर. दर्ज़ कराने के बाद पूछताछ के लिए पूरे अड़तालिस घंटे बाद अाई थी तथापि पूरी सज धज के साथ अाई थी।थाने के रोजनामचे में रवानगी दिखाकर अाई थी।पुष्पकुमार घायल थे, अतः पूछताछ के लिए अपने साथ कागज लेकर अाई थी।अस्पताल में सबके सामने काग़ज़ कैसे मांगती पुलिस?पुलिस द्वारा मांगने का कार्य भिखारियों की तरह सार्वजनिक रूप से नहीं होता,बल्कि रतिक्रिया की तरह गोपनीयता के साथ संपन्न किया जाता है।इसे पुलिस का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पूछताछ पूरे अड़तालिस घंटे की देरी के बावजूद मरीज़ अभी तक अस्पताल में पड़ा था।

     पुलिस ने पुष्पकुमार के बयानों से पहले उनके बैड के आस पास डंडे घुमाए।पुलिस की मंशा यह थी कि बैड के आस पास भिनभिनाती मक्खियां वहां से हट जाएं।पुष्पकुमार के परिजनों ने कदाचित इसका दूसरा अर्थ लगाया।वे डंडे के डर से वार्ड छोड़ गए!वार्ड में कुछ मरीज़ जो पिछली रात से लगातार कराह रहे थे,पुलिस की इस कार्रवाई से मौन हो गए।

    पुष्पकुमार ने अपने बयान में कहा कि वह पांडेय के साथ उनके अख़बार के दफ़्तर में निवास करते हैं, अतः उन्हें अख़बार का संपादक समझकर पीटा गया।पीटने वाले जनता दल के झंडे वाली जीप पर सवार थे और जनता दल के प्रत्याशी के पक्ष में समाचार न छापने के कारण गालियों का लयबद्ध उच्चारण कर रहे थे। गालियों का असर उनकी देह पर नहीं पड़ा,अलबत्ता पिटाई कुछ इस ढब से हुई कि उनके पोर पोर में पीड़ा भरी है।

      अख़बार के संपादक पांडेय उनके मित्र हैं, अतः निवास स्थान नहीं बदल सकते।वह अपने पिता से अलग पांडेय के कार्यालय में रहते हैं।पांडेय अख़बार के काम काज के लिए जयपुर जाते आते रहते हैं, अतः अकेले रहने पर उन्हें जान का ख़तरा है...

     बयान के बाद पुलिस ने परम्परा के निर्वाह के लिए कुछ ऐसे प्रश्न पूछे जिनका स्तर अाई. ए.एस.प्रतियोगी परीक्षा के अनुकूल था।एक दो प्रश्न ऐसे भी थे,जिनका जवाब होता ही नहीं।कठिन प्रश्नों में से एक प्रश्न किसी अज्ञात लड़की से सम्बन्धित था।पुलिस यह जानना चाहती थी कि इस मार पीट की पृष्ठभूमि में कहीं कोई लड़की तो नहीं है।पुष्पकुमार के लिए यह प्रश्न कठिन था,जबकि पुलिस के लिए ऐसा प्रश्न सामान्य था। मर्डर या तीन सौ सात की वारदातों के कारणों का जब पता नहीं चलता,तब भारतीय पुलिस घटना को किसी न किसी लड़की से जोड़ देती है।

   ज़ाहिर था कि पुष्पकुमार घटना के सम्बन्ध में किसी लड़की की भूमिका को नकार कर पुलिस से असहयोग कर रहे थे।पुलिस को ऐसे लोगों की चोटों से कोई हमदर्दी नहीं होती।पुलिस ने उनके बयान के नीचे असहयोग करने जैसा कुछ लिख दिया।

  जयपुर से अख़बार के असली संपादक पांडेय जी भी अा गए।पुष्पकुमार ने उनको दस हजार रुपयों वाली बात नहीं बताई।उन्होंने सिर्फ़ यह कहा कि अख़बार के लगातार दूसरे अंक में जनता दल के प्रत्याशी की हवा बहने का समाचार नहीं छप सका,इसलिए यह हादसा हुआ।उन्हें पांडेय समझकर पीटा गया।पांडेय जी एस. पी.और ज़िला कलेक्टर से मिले।दोनों ने उन्हें त्वरित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।पुष्पकुमार को हर तरह का आश्वासन देकर पांडेय जी जयपुर लौट गए।

     पिटाई वाले एपिसोड के प्रारम्भ में ही दर्शकों ने अनुमान लगा लिया था कि पीटने वालों को पकड़ा नहीं जाएगा।उनका अनुमान सही निकला।किसी की गिरफ़्तारी नहीं हो सकी। गिरफ़्तारी के सम्बन्ध में पुष्पकुमार उत्सुक भी नहीं थे।

      पुष्पकुमार के अस्पताल से छुट्टी के बाद दो सिपाहियों ने उनकी सुरक्षा का जिम्मा संभाल लिया।इस तरह का सुरक्षा कवर पुष्पकुमार के लिए नया अनुभव था।दोनों सिपाही कमरे पर ऐसे रहते जैसे उनका ही कमरा हो।पुष्पकुमार सहमे सहमे रहते।

    रात को सिपाहियों ने जब बिस्तर की मांग की तो पुष्पकुमार ने चुनाव आयोग को कोसा।समय से पहले फ़रवरी में चुनाव करवाने की क्या ज़रूरत थी।एक रजाई की व्यवस्था उन्होंने पड़ोसियों से कर ली।दूसरी रजाई मांगने के लिए वह पी.आर.ओ.प्रशांत कुमार के घर गए।उनके अलावा किसी पत्रकार से उन्हें रजाई की उम्मीद नहीं थी।उनके पिता के यहां सनिल की रजाइयों के ढेर लगे थे,लेकिन अपने मां बाप से सहायता लेना उन्हें स्वीकार्य नहीं था।

  पुष्पकुमार ने पांडेय के अख़बार में नागौर पुलिस के ख़िलाफ़ खूब छापा था। यदि ये सिपाही उन ख़बरों का बदला लेने लगे तो? पुष्पकुमार के शरीर में सिहरन दौड़ गई। जाहिर है यह ठंड वाली सिहरन नहीं थी। सिपाहियों के सो जाने से पुष्पकुमार को थोड़ी राहत मिली। पुष्पकुमार अपनी चारपाई पर थे और दोनों सिपाही ज़मीन पर सो रहे थे। अब थोड़ा बहुत जो भय था, वह कोने में टिकी हुई दो रायफलों का था। मशीन का क्या भरोसा। अपने आप चल गई तो?

   पता नहीं चूहा था या बिल्ली, एक रायफल दीवार से खिसक कर पुष्पकुमार के ब्रीफकेस पर तिरछी होकर ठहर गई।

  उसकी नली पुष्पकुमार की चारपाई के ऐन सामने थी। पत्रकारिता की सारी दिलेरी काफूर हो गई।

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उपन्यास : शेष अगले अंक में

लेखक : अरविंद तिवारी

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष: 2000

कुसुमलता पाण्डेय की कहानी

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