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Wednesday, 14 February 2018

नए साल की आहट और व्यंग्य का कल

(ज्ञान चतुर्वेदी से राहुल देव की फोन वार्ता)


31 दिसंबर 2017
08.05 PM

“हेलो”
“हेलो”
“हाँ भई राहुल कैसे हो ?”
“नमस्ते सर !”
“नमस्ते...नमस्ते ! क्या हाल हैं ?”
“बढ़िया सर...कैसे हैं आप ?”
“बस अच्छे हैं भईया..चल रही है जिंदगी”
“समय होगा सर ?”
“हाँ बोलिए न ?”

“सर मैं सोच रहा था कि मैं ‘मरीचिका’ पर बातचीत का पेंडिंग काम ख़तम कर लूँ | आज मैंने ‘हम न मरब’ पढ़कर ख़तम कर लिया |”

“अच्छा, पढ़ लिया |”

“हाँ सर इतवार का मैंने पूरा सदुपयोग किया, 31 दिसंबर और बहुत अच्छा | कुछ वर्ड तो इसमें इतने कैची रहे कि मैं दिन भर बोलता रहा उन्हें अपने मन में जैसे ‘बंबास्टिक’ एक शब्द आया है उसमें बड़ा इंट्रेस्टिंग है और एक ‘हल्के राजा’ शब्द आया है |”

“उसमें से भैन्चो भी जुड़ा है |” (हंसी)

“अरे बाप रे ! वो तो खतरनाक है | (हंसी) वो तो लगभग हर पेज पर दो तीन बार है |”

“हां, बहुत ज्यादा है |”

“लेकिन मज़ा आया | और मृत्यु को लेकर जिस तरीके से आपने अपने लोकेल को दिखाया है...”

“असल में डेथ को लेके आप जो व्यंग्य की चीज़ें कहना चाहते थे | मतलब जो बातें ओल्ड ऐज, डेथ और फिर भी आपकी पैसे के लिए मारामारी | मतलब एक कमीनापन आदमी का और साथ में फिलोसोफी | उस सबके हिसाब से लिखना चाहता था एक्चुअली तो उसकी कोशिश थी |”

“नही....काफी अच्छा आ गया है और...”

“हर एक का क्या होता है कि वो मुझे ऐसा लगता है कि आपकी जो कोशिश है आपके मन में | मतलब दूसरा आदमी और भी सोच सकता है कि इसमें ऐसा भी हो सकता था | नेचुरल है हर आदमी के अपने अनुभव होते हैं | मृत्यु को लेके आपके अनुभव बहुत सारे हो सकते हैं | जहाँ आपको लगे कि ये चीज़ छूट गयी, ये और हो जाती तो थोड़ा कम्पलीट चीज़ हो जाती तो ये तो है ही.. हर चीज़ में वही है | पर आपने जो मन में सोचा क्या वहां तक आप पहुँच पाए ? बस असली चीज़ आप अपने लिए आंसरेबल होते हो | अभी मैंने जो एक ‘पागलखाना की भूमिका में जो लिखा है जोकि मुक्तिबोध का एक ट्रीटमेंट है | मतलब आपकी रचना के तीन क्षण जो होते हैं तो वही है | जैसे आप वो था कि तीन क्षण रचना के वो होते हैं जिसमें आपके मन में क्या कल्पना आयी थी और उस समय आपकी समझ क्या थी ? जैसे ‘नरकयात्रा’ का था कि जो शायद आपने बात सोची वो लगा कि एक बार में ही पूरी हो गयी | तो आपको रिवाइज करने की जरुरत नही पड़ी | दुबारा लिखने की जरुरत नही पड़ी | ऐसा हुआ | ऐसे ही ‘बारामासी’ में फिर एक बार उसी डायरी में आपने लिखा और करेक्शन लगा दिया | फिर आपको आगे लगा कि पढ़ना चाहिए और वो किस कारण ऐसा हुआ ? चौथे, पांचवे नावेल में आपको कई बार रिराईट करना पड़ा तो वो किस कारण से करना पड़ा आपको कि आप वहां तक नही पहुँच पाए जहाँ आपने सोचा था | आपकी पहली कल्पना क्या इतनी धुंधली थी जो धीरे धीरे खुलती गयी हर रिराईट करने के साथ साथ | ये भी एक कारण हो सकता है | आपकी व्यंग्य की समझ या कहने की समझ इतनी बढ़ गयी है जिसपे कि आप खुद को पाते हो कि नही यार मज़ा नही आ रहा तो उस कारण से | पता नही किस कारण से हुआ पर इसी बीच में जब मैं लिखता हूँ तो मुझे लगता है कि थोड़ा सा और करेक्शन कर लिया जाय | ये अपने छोटे आर्टिकल्स में भी और उपन्यास में भी ये स्थिति आयी है | ये मैं नही जानता किस तरह से ये आई है ?”

“सर वो मैच्योरिटी का एक लेवल है”

“अब में मैच्योरिटी है या ये मेरा अपने ऊपर अविश्वास कहलाये या आपकी चाहत इस बात की कहलाये कि नही यार कुछ और कर लो | कुछ और कर लें क्या इसमें और...”

“और अंत तो इसका सर ‘हम न मरब’ का बड़ा मार्मिक है जो अम्मा के साथ होता है...”

“अच्छा अंत के लिए मैं बड़ा जूझा कि मैं अब कहाँ ख़तम करूँ इसको ?”

“मैं भी सोच रहा था कि आखिर अब इसका अंत कैसे करेंगें आप यह देखना होगा |”

“मैं ये सोचता रहा कि अंत तो अम्मा पर होना चाहिए | ये तो मेरे मन में क्लियर था कि अंत अम्मा पे होयेगा | जब मैं लिखने लगा तो मैंने सोचा कि अंत बब्बा पे नही अंत अम्मा पे होना है क्योंकि अम्मा हैं जो एक्चुअली एक मृत्यु वाला जीवन जी रही हैं जाने कितने साल से और अम्मा के बहाने आप बहुत सारी बातें कह सकते हो तो मुझे लगा था कि अम्मा पे अंत लाया जाए तो मैं अंत में बहुत जूझा हूँ एकाध महीने तो मैंने इसे छोड़ दिया लिखके कि अब क्या करूँगा क्या करूँगा और कहाँ अंत किया जाय ? जैसे कि मैं ‘पागलखाना’ का अंत आपको बताऊ

“जी सर उपन्यास में ‘स्थगित’ से पहले कथा बहुत विस्तृत होती जा रही थी”

“हाँ, उसमें था | बहुत सारी संभावनाएं थीं कि उसमें कुछ भी करूँ | फिर एक दिन मुझे अंत एकदम कौंध गया कि ये अंत होना चाहिए अम्मा का कि अम्मा बाहर का कमरा कहती हैं कि अब उसको कई तरह से लिया जा सकता है कई लोगों ने कहा कि वो अपना बंटवारे में हिस्सा मांग रही हैं | लोगों ने ऐसा भी लगाया है अर्थ बाकायदा अच्छे जो लोग हैं कहानी के उन्होंने ये समझ के लिखा जोकि मैंने नही सोचकर लिखा मैंने तो उसको वही सोचा है | मैंने वही सोचा है कि वो कह रही हैं कि मैं अन्दर पड़ी रहूंगी तो कभी नही मरूंगी क्योंकि अन्दर तक तो वो आते ही नही हैं बाहर बाहर तलाश के निकल जाते हैं जो मृत्यु के दूत आते हैं | मुझे बाहर का कमरा चहिये | वो सारी चीज़ें मिलाके मेरे को लगा कि यहाँ कहीं अंत होना चाहिए | और है भी वैसे उपन्यास को आप कहाँ ख़तम करोगे जैसे ‘बारामासी’ में है तो ‘बारामासी’ में आप कहाँ ख़तम करोगे ? जब सब चल रहा है चल रहा है तो मुझे लगा था वो पोस्टर चिपका देता है उसकी जगह पे | तो सारी दुनिया बदनाम अब नए सिरे से सपने शुरू हो गये हैं | तो नए सिरे से सपने टूटेंगें और नए सिरे से कथा गढ़ी जायेगी कि नई पीढ़ी है न | तो अंत में है हर उपन्यास में वैसे यार छोटे आर्टिकल का भी अंत या कहानी का भी अंत वो मतलब लगे न सायास कि वो आप वहां लाये हो पर वो ऐसा लगे कि यही अंत हो सकता था | मुझे ऐसा लगता है कि अंत में यही तर्क हो सकता है कि यही अंत हो सकता था तो वो है इन सब उपन्यासों में...”

“अच्छा और सर ‘हम न मरब’ में महंत जी का क्या हुआ ? ये मुझे बड़ी जानने की इच्छा हुई | वो भी बड़ा अलग टाइप का चरित्र गढ़ा आपने...”

“(हंसी)...अच्छा आपने एक और ध्यान दिया होगा आपने अभी मेरे उपन्यास पढ़े कि मेरे उपन्यासों में अभी ध्यान आयी ये वाली बात मैं मन से नही कह रहा कि एक चरित्र ये वाले आते हैं जो धार्मिकता में भी हैं और नही हैं धार्मिक | मतलब पूरी तरह से जैसे अगर हम कहें कि ‘बारामासी’ में पहले बड़े भाई साहब जो पूजा पाठ में व्यस्त रहते हैं और वो तय नही कर पा रहे कि हम कहाँ रहें ? मतलब हम इसमें रहें कि उधर रहें | ये उसमें है जो ‘बारामासी’ में चरित्र है | ‘हम न मरब’ में महंत जी का चरित्र पूरी तरह से आया और अगर आप देखेंगें वो उपन्यास जो आपको पसंद नही आया उसमें जो वो हैं जिन्होंने आश्रम खोल रखा है | वो बड़ा गहरे तक उतरे हैं वो आध्यात्म और सब चीज़ों में पर धीरे धीरे वो रच बस गये फिर से वापिस हो गये इसी जीवन में जहाँ वो सबकुछ शामिल है पैसा बनाना और एक झूठी शान को कायम रखना कि राजा हमारे यहाँ आता है और तो वो हर जगह एक धार्मिक चरित्र है जो डीजेनेरेट हो रहा है | ये कॉमन है इन तीनों में | मैंने अभी जब अभी आप इसमें भी पढ़ेंगें जो मेरा ‘पागलखाना’ है उसमें एक चरित्र है जो बड़ा अद्भुत है भई | वो यों है कि सुरंग खोद रहा है वो कि इस दुनिया से निकल जाऊँगा मैं | ये दुनिया जो इसके कब्ज़े में है बाज़ार के तो कहीं तो कोई और दुनिया होगी जहाँ मैं जाऊँगा और खुलूँगा तो एक नई दुनिया मिलेगी जहाँ बाज़ार से उसका एक मन है कि क्या मैं सुरंग खोद के निकल सकता हूँ ? और वो रोज़ घरवालों से छिपके सुरंग खोदता है और लौटता है वो एक चरित्र है वो फिर कैसे धार्मिकता के चक्कर में पड़ता है वो अपनी अलग कथा है वो तो उसमें भी आपसे बात करते हुए लग रहा है कि वो देखो धार्मिकता वाला आया कि उसमें भी वो धार्मिकता में जाता है जिसका कोई अर्थ नही है एक खोखले धार्मिकता का | तो वो तीनों-चारों अब और भी तलाश करें कि क्या आपने जीवन में कोई ऐसे चरित्र देखें हैं क्या जहाँ से आपको ऐसा आता है | मैं नही कह पाता कि क्यों है पर ये तीनों-चारों चरित्र में ये कॉमन चीज़ है | ये अलग लग रहे हैं इसी में आपके महंत जी है जो कहीं बड़ी यात्रा पे निकले थे और इस पड़ाव पे ऐसे टिके कि फिर वो यात्रा तो भूल गये उल्टी यात्रा करने लगे फिर से वापिस है न और कहीं मतलब उनका अपन ने डाइलेमा इसीलिए वहां पर खुला छोड़ा कि वो इसमें तो हैं कि कहीं कुछ होगा यार, कुछ हो तो नही सकता | और जो घरवालों का attitude है उनके प्रति...”

“उनकी स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है जब वो बब्बा के मरणोपरांत रज्जन-वज्जन के सामने आते हैं”

“वो जानते हैं कि यार ये हरामी है रज्जन | यही तय करेगा कि क्या होगा उन खेतों का | ये साला मेरे को कहीं गड़बड़ न कर दे तो वो बेचारा उसकी चमचागिरी टाइप भी करने लगते हैं और कहते हैं कि रज्जन तो भई बहुत उस्ताद चीज़ हैं मतलब वो बेचारे जो एक ज़माने में बड़ा गुरु की भूमिका में थे पूरे परिवार में वो डीजेनेरेट होके और वो लगभग दरबारी हो जाते हैं रज्जन के है न इस आशा में कि उनको शायद जब बंटवारे की बात होएगी ही तो उस समय ये ध्यान रखें कि कहीं बब्बा का दिया हुआ वो खेत जिसकी रजिस्ट्री वगैरह किसी के नाम से नही हुई थी वो कहीं साले कोई दूसरा क्लेम न कर लें बंटवारे में कि कहीं किसी और के पास न आ जाए तो इसको ओपन करना मैंने सोचा था | कहीं इंटरव्यू पढ़ रहा था ऋषिकेश मुखर्जी का जोकि बहुत बड़े फ़िल्मकार थे | तो उनका ये कहना था कि मेरी फिल्म में कहीं अगर चपरासी का करैक्टर भी है तो मैं उसे पूर्णतः तक ले जाता हूँ | मेरा ये ध्यान रहेगा कि वो फलाने जगह एक चपरासी आया था उसका एक पूरा चरित्र होना चाहिए | वो केवल चपरासी नही है मतलब वो एक चरित्र है | और वो कहानी में भी कहीं आना चाहिए कहानी का वातावरण क्रिएट करने में आना चाहिए उसके चाहे दो सीन हों | बिलकुल छोटा सा चरित्र है और उसकी एक अंत भी होना चाहिए कहानी के हिसाब से और उनका जैसे ‘आनंद’ फिल्म में है | एक है ‘आनंद’ फिल्म देखी होगी आपने ? बहुत अद्भुत, वो चरित्र भी बहुत अद्भुत है | ये बात मैंने उस इंटरव्यू को पढ़ने से पहले नोट की थी | कि देखो उन्होंने ख्याल रखा | एक चपरासी है अमिताभ बच्चन का | अमिताभ बच्चन के माँ बाप नहीं हैं | वो अमिताभ बच्चन को खाना पीना देता है और सब करता है उसको पूरा चरित्र दिया है जब उसका दोस्त आ जाता है तो उसके लिए आखिर में उसका भी रोल दिखाया है कि वो लास्ट में देखता है कि आनंद मर रहा है तब वो कहता है कि मेरे गाँव में एक वैद्य है जो बहुत तगड़ी दवाई देते है और जिससे जरूर ठीक हो जाता है और वो कहता है कि मैं जा के गाँव से दवाई लेकर आउंगा | सीन के अंत अंत में वो दवाई लेने चला गया है और जब ये मर रहे हैं राजेश खन्ना उसकी बाहों में, अमिताभ की तब उसकी एंट्री होती है | दवाई लेके आया है वो तब तक मर गया है और वो खड़ा हुआ है दवाई लेने | तो उसको वहां तक दिया एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा एक छोटा सा क्षण जो है न जो उस चपरासी के महत्व को बनाता है तो मुझे उनकी वो बात बहुत महत्वपूर्ण लगी थी कि आप कोई भी चरित्र जो आपने उपन्यास में उठाया उसको एक जस्टीफ़ाइड एंड तक ले जाओ और अगर आप उसे एंड तक नही ले गये तो उसका भी एक जस्टीफ़ाइड रीज़न होना चाहिए | तो मैंने इसपर भी विचार किया था इनके जो वो हैं महंत जी कि इनको मैं कहाँ छोडू कहानी में ? क्या मैं इनपर कहीं से कुछ लाऊं किसी तरह का कोई दृश्य एक बनाऊ जहाँ पर इनकी कोई नियति तय होनी चाहिए लेकिन नही | इसकी नियति न होना ही इसकी नियति है | इसको यहीं छोड़ो अधूरे में और अधूरे में ये जो लटका हुआ है जो इसकी माँ तब पाठक भी इसकी मानसिकता में समझेगा कि अब बेचारे का पता नही क्या होगा | वो भी सोच रहे हैं कि मेरा क्या होगा और पाठक भी ये सोचे कि अरे पता नही कि इस बेचारे का क्या हुआ होगा बाद में ? तो जब आपने ये प्रश्न मुझसे किया तो ये उत्तर मेरे मन में था कि मैंने भी यही सोचा कि इनका क्या होगा, कुछ कर दिया जाय या छोड़ा जाय ? तो मुझे लगा कि नही सिर्फ छोड़ा जाय कि इनका क्या होगा फाइनल में ? तो ऐसा | अभी मैंने जो ‘पागलखाना’ लिखी है न आपसे पहली बार कर रहा हूँ शेयर मैंने किसी से उसकी थीम नही शेयर करी इसमें छह पात्र हैं जो अलग अलग तरह से बाज़ार से भाग रहे हैं | और ये अलग अलग तरह से भाग रहे हैं | और इन छह पात्रों की नियति आपने बताई है कुल और उसके बहाने से बाज़ार की कथा कही है | इन छह पात्रों में से एक पात्र ये है जो मैंने बोला कि वो सुरंग खोद के भागना चाहता है | मतलब उसमें बड़े वियर्ड से पात्र हैं | ये फंतासी का एक अलग लेवल है | ये बिलकुल अलग है | ये मेरे हिसाब से मेरा भी अलग लेवल है कि मैंने एक इस तरह की चीज़ ट्राई करी है | बिलकुल अलग चीज़ ट्राई करने की कोशिश की है | कि एक ये दुनिया है ये दुनिया से अगर मैं भागने की कोशिश करूँ तो क्या मैं भाग पाऊंगा ? और इस बहाने से उस दुनिया को समझने की कोशिश की है |  तो वो कैसे भागता है और एक एक पात्र कैसे भागने की कोशिश करता है वो कहाँ फंसता जाता है वो और एकाध जो लड़ने की कोशिश करता है इससे या इसपे निगाह रखने की कोशिश करता है जो इस शक में पड़ा हुआ है तो ये सारे पात्र वो हैं जिनका मोहभंग हो गया है बाज़ार से कुछ भागना चाहते हैं कुछ लड़ना चाहते हैं कुछ छिपना चाहते हैं इस दुनिया में रहते हुए भी और छिप नही पाते | ये उनकी दुनिया है | तो बड़ी अजीब सी डरावनी सी दुनिया है वो पूरी उपन्यास की और है पर मुझे लगा था यार ये भी तो लिखते लिखते मुझे लगा था कि ये पात्र क्यों नही हो सकते ? बिलकुल हो सकते हैं | ये जो मैं लिख रहा हूँ ये पात्र बिलकुल हो सकते हैं | भई आज की दुनिया में जो आदमी बैठा हुआ है वह एक रिटायर्ड आदमी है | वो बैठा हुआ है और वो बहुत दुखी है कि जो उसने बचत की हुई थी बैंक में रखा हुआ था पैसा उसकी ब्याजदर गिरती जा रही है जिससे घर चलता था | पहले दस परसेंट मिल जाता था फिर नौ परसेंट सात परसेंट छह परसेंट पांच परसेंट इसपे आ गयी | उसकी इनकम गिरती जा रही है और उसे अब डर लगने लगा है कि सरकार का अब भरोसा नही है | ये जो बाज़ार किसी दिन ये कह दे अगर कि मैं तुम्हारा पैसा जब्त करता हूँ या तुमने बहुत खा लिया अब ये सरकार बाज़ार को देगी पैसा तो तुम क्या करोगे ? और क्यों नही कर सकती ? तुम्हे लगता है कि नही कर सकती पर ये बताओ क्यों नही कर सकती ? सरकार को एक आर्डर ही तो निकालना है |”

“जी सर वही सब होने वाले लक्षण दिख भी रहे हैं आजकल”

“करेक्ट, तो मैंने एक ऐसे पात्र की कल्पना की जो भयंकर डरा हुआ है कि कुछ भी हो सकता है | कोई भी मुझे अपने घर से बेदखल कर सकता है | कोई भी कुछ कर सकता है मेरा क्या होगा ? मैं क्या कर सकता हूँ ? ऐसे पात्र बनाये हैं | तो वो बहुत एक अलग किस्म की कहानी है | पता नही कितनों को क्या पसंद आएगी | पर उस व्यंग्य के बहाने बाज़ार को बहुत विश्लेषित किया गया है | बाज़ार की चीज़ों को | हाँ मतलब उसमें एक पात्र है जिसके सपने खो गये हैं | अब उसे सपने नही आते | बहुत परेशान है वो कि उसे सपने नही आते | और घरवाले समझाते हैं उसे कि तुम क्यों, उसे सपने नही आते तो ऐसी क्या बात है यार | तुम मतलब चूतिया आदमी हो | सपना नही आता तो नही आता | ये कोई बहुत बड़ी बात हो गयी है और वो हैरान है कि दुनिया को पता ही नही है कि सपने न आने से क्या हो जाता है ? अगर दुनिया सपने देखना बंद कर दे तो दुनिया कहाँ जायेगी ? तो सपने और बाज़ार को वहां जोड़ा है | ऐसे करके व्यंग्य में बाज़ार के बहुत सारे पक्षों को लेके कुछ पात्र क्रिएट करे हैं और फिर उस बहाने से बात करने की कोशिश करी है | तो जरा गंभीर किस्म की फैनटेसी हो गयी पर मुझे लगता है मैंने बात बहुत करी है उसमें बाज़ार को और उसमें मैं आपको ये सारी बातें बता रहा हूँ कि मैं इसके एंड में उलझ गया था कि छह पात्र हैं अब कहाँ जाओगे ? इसका एंड कहाँ करोगे ? अरे बाप रे मैं कितना परेशान रहा | मैंने प्रभु जोशी से डिस्कस किया कि यार ऐसा ऐसा है इसकी थीम थोड़ा बहुत प्रभु जोशी को मालूम है दूसरा अब आपको मालूम है | और किसी को मैंने बात ही नही करी इस पर कि मेरा उपन्यास क्या है | मैं केवल आपको बात कर रहा हूँ | क्योंकि आप मुझे समझदार लगे | इतने आपसे लम्बी बात हुई हैं कि मुझे लगा कि नही आपमें एक उस उस क्रिएटिविटी की बड़ी समझ है तो इसलिए मैं बहुत सोचता था इसका एंड कहाँ होना चाहिए ? मतलब इसको जब आप पढ़ोगे तो देखोगे कि ये बहुत ही अलग है मतलब इसके एंड की आपको इसलिए तारीफ करनी पड़ेगी कि मेरे इस उपन्यास को पढ़ते हुए कि आप भी सोच रहे हो कि ये कहाँ जाना चाहिए ? और एंड इतना सटीक है ‘पागलखाना’ का कि बिलकुल वो पूरी मेरी कथा को एकदम जस्टीफ़ाइड लेंग्थ पर पहुंचाता है | तो वो एंड बहुत कठिन होता है किसी भी चीज़ का उपन्यास को कहानी में कहना तो वो बड़ा कठिन होता है तो उसकी कोशिश करना चाहिए | कहाँ क्लोज करोगे कहानी को ताकि देखो अंत मुझे लगता है कि अंत वहां होना चाहिए जहाँ पे कहानी तो अंत किताब तो अंत हो जाए पर एक नई कहानी चल पड़े आदमी के मन में | मतलब वो बात, वहां एंड होना चाहिए | मतलब आप बहुत सारा अनकहा सा छोड़ दें एंड में और एक नई कहानी के बीच छोड़ दें मतलब मन में उसके पाठक के मन में | वो है उपन्यास का सही अंत | अगर मैंने सब कह दिया | मैंने कहानी क्लोज कर दी अब आपके लिए कुछ भी नही छोड़ा सोचने को तो हो गया कहानी ख़तम हो गयी चल भैया लड्डू ख़तम अब स्वाद ख़तम फिर सौंफ खा लो है न तो सौंफ खा लोगे तो वो भी ख़तम हो जायेगा लड्डू के स्वाद में तो वो नही | वो आपके मन में एक स्वाद और भूख दोनों बनी रहे वो आपके कहानी का अंत होना चाहिए, मुझे ऐसा लगता है | तो ये है, इसका चक्कर ये है | “

“और एक चीज़ मैंने और देखी है सर कॉमन जैसे कि आपने अभी चरित्र एक बताया कि कॉमन सा है अपने नेचर में और एक कुत्ते भी बड़े कॉमन हैं आपके उपन्यासों में...’नरकयात्रा’ में कुत्ता है, ‘बारामासी’ में कुत्ता है, ‘मरीचिका’ में भी श्वान है और ‘हम न मरब’ में भी है | तो ये डोग्गी प्रेम आपका हर जगह दिखता है”

“शायद इसमें न हो मुझे याद आ रहा है ‘पागलखाना’ में नही तो चारों जगह तो है और मैंने बहुत सारे फुटकर में बहुत तरह से लिखा है | मुझे पता नही क्यों कुत्ता एक आम आदमी टाइप लगता है | जैसे आम आदमी की नियति है बेचारे की कि वो सब जानता है लेकिन मुझे हमेशा कुत्ते की शकल देखकर लगता है जैसे उसे सब पता है | तुम बाहर निकलते हो और कार में बैठते हो और कुत्ता वहां से देखता है आपको तो मुझे हमेशा लगता है कि एक आम आदमी जो सड़क पे हैं वो जिस भाव से देखता होगा और आपको जो समझता है वो भी आपको है | कुत्ता बेहद समझदार प्राणी है | बहुत समझदार है और बहुत सहने वाला प्राणी है | वो अपनी नियति के साथ जीना सीखकर नियति को ढोना सीख गया है एक्चुअली | कुत्ते को आप रोटी देते हो तो वो बेचारा...तुम दस बार लात मारते हो ग्यारहवीं बार रोटी लेकर आते हो तो वो आ जाता है आपके पास | तो ये कुत्ते की बेशर्मी नही है ये ये उसकी बेचारे की नियति को ढोना है | तो मुझे पता नही क्यों उसकी बहुत सारी बातें...और मुझे कुत्ते इसके बावजूद कई बार खूब खेलते दिखते हैं, एक दूसरे का पीछा करते दिखते हैं | आपस में बिना बात के लड़ते दिखते हैं | तो मुझे लगता है कि हमेशा जैसे गरीब आदमी लड़ रहा है बिना बात के, छोटी-छोटी लड़ाईयां लड़ रहा है, गालियाँ दे रहा है फिर आपस में मिलके खेल भी रहा है, हँस भी रहा है, कोई गाने भी गा रहा है कहीं बैठके तो वो जो मुझे कुत्ते हैं मुझे हर जगह मैंने कुत्ते के इन सारे पक्षों को लिया है | अभी आपके पास मेरे फुटकर उतने पहुंचे नही हैं और मैंने बहुत से तो अभी दिए ही नही हैं | मैंने अमेरिका में पहला कुत्ते पर एक पढ़ा था अमेरिका गया था तो मुझे लगा था कि यार कुत्ते पालने वाले बहुत देखे थे मैंने तो मेरे को लगा कि इनको कुत्ते का एक बिलकुल नया स्वरुप दिखाया जाय | तो मैंने कुत्ते पर एक बहुत बढ़िया आर्टिकल अभी याद नही आ रहा कि क्या था वो पर उसकी शुरूआत यहाँ कहीं से होती थी कि मेरे घर में इस बात पर विवाद है कि कुत्ता पाला जाय कि नही पाला जाय ? मेरी पत्नी कहती है कि मेरे रहते एक और की गुंजाईश नही है | यहाँ से ये शुरू होता है | और फिर वो कुत्ते को लेके बहुत मज़े लेकर लिखा गया है |”

“इस बार पर मुझे लगता है कि आपके घर में कुत्ता तो जरूर पला होगा ?”

“हाँ, हमारे यहाँ नही पला है | हमारी पत्नी इसके खिलाफ हैं | हमारी बेटी बहुत चाहती है पर हमारे पड़ोस में, हमारी बेटी, हमारी बेटी की बेटी इनको कुत्तों से बड़ा लगाव है | हमारी बेटी की ससुराल में कुत्ता है पर हमारे घर पर कुत्ता नही है | पर मैंने कुत्तों पर बहुत लिखे हैं कई तरह के लिखे हैं | कुत्ता कहीं न कहीं पात्र रूप में आ ही गया है | एक मैंने लिखा था मुझे याद आता है जहाँ ज्योतिषी ये कह देता है कि तुम कुत्ते को रोटी डालो | मतलब काले कुत्ते को रोज़ रोटी डालिए | काला कम्बल दान करिए | अब आप काला कुत्ता ढूंढ रहे हैं कि रोटी डालना है उसको | है न और साले मिलते नही हैं आपको | तो वो उस पर एक मैंने व्यंग्य लिखा है | मेरे व्यंग्य बहुत कुत्ते पर बहुत लिखे हैं | मेरा ख़याल है दस-बारह व्यंग्य तो कुत्ते पर ही हैं | सटीक हैं कुत्ते पर | और इनमे हर जगह कुत्ता पात्र है |”

“हम न मरब में तो गधा और घोड़ा भी है”

“हाँ गधे और घोड़े भी हैं जो आपके आसपास ये ऐसे चरित्र हैं कुत्ते, गधे, घोड़े | मुझे ये लगता है कि ये हमारे जीवन का बड़े अहम हिस्सा हैं | मतलब आपके आदमी होने के | क्योंकि आदमी में बहुत सारा कुत्तापन है”

“जी सर इतिहास में भी हम लोग पढ़ते हैं कि कुत्ता आदमी का सबसे पहला मित्र था”

“मैं वही कह रहा हूँ कि कुत्ते में बहुत सारा आदमीपन है और आदमी में बहुत सारा कुत्तापन है |”

“बिलकुल सही लाइन आपने कही”

“तो वो सारा मेरे को हमेशा लगता है | तो मुझे लगता है कि ये बड़े इंट्रेस्टिंग जानवर हैं जो आदमी का इवैल्यूएशन दिखाते हैं कि आदमी यों विकसित हुआ | और ये अभी भी आदमी के साथ के यात्री हैं | मुझे लगता है आदमी के बढ़ने के, देखने के- कि आदमी जो पहले घोड़े पर घूमता था अब साला ये करने लगा | अब तो गाड़ियाँ आने लगीं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ चलाने लगा आदमी |”

“लेकिन सर मैंने एक चीज़ और देखी है कि जैसे सर कुत्ता है, हमारे आसपास के और जानवर हैं मतलब तमाम सी चीज़ों को आप ओब्जेर्व करके उसे रचनात्मक साहित्य में इतने अच्छे से ढालते हैं वो चीज़ आजकल देखने को नही मिलती है लेखकों की रचनाशीलता में कि वो ऐसी चीज़ों को उसमें लेके आयें”

“मुझे सारी प्रॉब्लम आज की रचनाशीलता में ये लग रहा है कि आदमी पकने नही देता | विचार को नही पकने देता फिर रचना को नही पकने देता और वो अपने लिखे को एक बार भी काटता नही है देखता नही है | लिखते हुए भी नही देखता | एक चीज़ होती है, एक और होता है कि कई रचनाएँ मेरी ऐसी हैं जहाँ मैंने बिलकुल नही काटा पर वो मन में कई बार काटी गयी होंगीं लिखते हुए | मैंने लिखते हुए एक वाक्य लिखा और वो रुक गया कि यार ये वाक्य नही बन रहा ये कुछ और बनेगा | और मैंने शायद लिखके नही काटा बल्कि मन में ही ख़ारिज किया उस वाक्य को जो बन रहा था और उसको नए सिरे से कुछ लिखा फिर लिखा | वो बात अब लोग करते ही नही हैं, जल्दी बहुत है | फ़ास्टफ़ूड का ज़माना है | वो पचे न पचे, उसका कितना स्वाद हो, वो कितना गरिष्ठ हो जायेगा, क्या है वो नही है | जैसे जब हमारी माँ बटलोई में दाल बनाती थीं तब गैस तो थी नही तो चूल्हा जलता था | कुकर होते नही थे, दाल गलने में टाइम लगेगा | तो उसपे दाल चढ़ जाती थी और फिर दाल चढ़के धीरे-धीरे खदकती थी | अब वो स्वाद जो है वो अभी आ ही नही सकता जो अब तुरंत कुकर में करके निकालते हैं | उस टाइम पीरियड का लॉस जो है वो स्वाद में दिखता है | है वो भी दाल, उसमें भी मसालों के कम्पनसेशन से एक स्वाद आ जाता है पर अगर आप उस पुराने स्वाद पर जाएँ... बहुत सारे हैं हांडी में जो पका के बनती थी चाहे वो नॉनवेज आइटम हो वेज आइटम हो ऐसी रचना कहाँ है ? मुझे लगता है हम पकने का समय नही दे रहे हैं | हमारे मन में एक विचार आया कि हमें अब बुंदेलखंड के अपराध पर लिखना है | अब बस इतना ही विचार आया है और ये विचार पिछले तीन महीने से उपन्यास ख़त्म होते होते जैसे ही ख़तम हुआ और टाइप होना शुरू हुआ तो ये मन में विचार आया कि अब कैसे करें ? मैंने कई शुरूआत और कई चरित्र मन में लेके खारिज कर दिए हैं अभी तक कि मुझे क्या करना चाहिए ? वो मन में आप एक चरित्र सोचते हो तो आप कुछ चैप्टर्स सोच लेते हो उसके कि ऐसे-ऐसे बढ़ेगा फिर आप उसे पूरा खारिज करते हो तो ये मन का रिराइटिंग ही है न | मन में आप उपन्यास को लिख रहे हो और खारिज कर रहे हो | जब आप पूरे उस जगह पहुँच जाओ कि नही यार अब चालू करते हैं | अब यहाँ आएगा वो उपन्यास फिर आप उस दिन चालू करेंगें | और एक है कि चलो एक उपन्यास तो आ गया अब अगला उपन्यास जरूर अगले साल के अंत तक आ ही जाना चाहिए | एक इस तरह से भी सोच सकते हैं तो जो पात्र हाथ में आये उसी पे चालू कर देते हैं | फिर आपके मन में वो पका न पका, मज़ा आया न आया या जो आपने सोचा था | फिर वही बात आयी कि आपको जो पहले क्षण में कौंधना चाहिए बात वो कौंधी कि नही कौंधी ? तो बस वो जब तक नही कौन्धेगी तब तक आप अगला उपन्यास नही चालू कर सकते | मेरे मन में बहुत सारी चीज़ें चालू होती हैं मैं कहाँ से शुरू करूँगा ? मैं कौन से पात्र लूँगा, कहाँ से क्या चीज़ें ज्यादा दिखाने की कोशिश करूँगा ?”

“सर समकालीन व्यंग्य परिदृश्य में ऐसे तो दो चार नाम भी नही दिखते जो इस तरह से सोचते हों, लेखकीय तौर पर चुनौतियाँ लेने के इच्छुक लेखक नही दिखते हैं आपके जैसे”

“व्यंग्य में तो कोई कर ही नही रहा | व्यंग्य में तो बहुत ही कष्ट वाली बात है |”

“जी सर नए लोगों को तो छोड़ दीजिये जो लोग पुराने हो गये हैं वे भी नही कर रहे |”

“हाँ बिलकुल नही कर रहे, उनका मन है छप जाय, फेसबुक पे आ जाय, चार जने तारीफ कर दें | एकाध पुरस्कार मिल जाय | पुरस्कार बहुत से हैं व्यंग्य में जिसमें सारी जिंदगी बन गयी फलानी जगह मुझे चीफ गेस्ट बना दे कोई | देखिये क्या है कि जब आपके उद्देश्य ही बहुत छोटे होंगें तो फिर बात भी छोटी होगी | हमारा उद्देश्य है ही नही ये वाली बात रियली मैं झूठ नही बोलता मैंने यहाँ पे बोला भी था कि मैंने कभी नही सोचा कि भई मेरे को कोई पुरस्कार दे देगा | मेरी आप तारीफ कर दोगे | मेरी कोई किताब निकली तो कोई समीक्षा इसकी फलानी जगह में डाल देगा तो बड़ा मज़ा आ जायेगा | अरे मेरी ज्यादातर किताबों की समीक्षाएं आयी ही नहीं | हमारी ज्यादातर किताबों की समीक्षा स्वतःस्फूर्त किसी ने डाल दीं तो आ गयीं और अच्छे लोगों ने लिख डालीं पर मैंने पहली बार किसी को समीक्षा के लिए कहा था अगर अपने उपन्यास का तो मैंने ‘हम न मरब’ के लिए प्रभाकर श्रोत्रिय को कहा था | श्रोत्रिय जी को कहा था कि सर आप पढ़िए... मेरे गुरु जैसे थे | मैंने कहा कि सर आपने मेरी किसी किताब को फोन पर तो हमेशा कहते हो कि बड़ी तुम्हारी अच्छी है ये वो.. क्या आप इसको लिखके और क्या आप इसपर लिखेंगें पढ़के ? और आपको जैसा लगे वैसा ही लिखिएगा | मैंने उनको बिलकुल कहा ये नही कि सर आपका एक आशीर्वाद हो जायेगा तो बड़ा अच्छा होगा तो आदमी दबाव में आ जाता है न कि यार ये मेरे को गुरु मानता है और बड़ा अब इसे कैसे करें | मैंने कहा सर आप बड़े आलोचक हैं आपने कविता और और नाटक और उपन्यास और हर चीज़ की आलोचना की है | बहुत बड़े आलोचक हैं आप तो आप इस उपन्यास को उसी निगाह से पढ़िएगा और आपको बिल्कुल जैसा लगे | मैं जरा भी इस बात का बुरा नही मानूंगा कि आपको अच्छा लगा, बुरा लगा, क्यों लगा ये सब | मैंने कहा मैंने आपकी चिलम नही भरी कभी मैं आपकी मन से इज्जत करता हूँ कि आप बड़े आलोचक..तो मैं एक बड़े आलोचक की निगाह से अपने उपन्यास को समझना चाहूँगा | तो आप उसको वैसा ही लिखिएगा”

“आपने तो सर बहुत ही अच्छे और स्वथ्य ढंग से कहा नही तो बहुत लोग तो ऐसे भी रहते हैं कि भैया लिखो तो मैं किताब भिजवाऊ न लिखो तो न भिजवाऊ | ऐसे लोग भी पल्ले पड़ जाते हैं या कहेंगें कि आप ज्ञान जी पर आ के सीमित हो जाते हो आगे नाम क्यों नही लेते हो | अब मैं क्या बताऊ कि आप उस लेवल का लिख ही नही पा रहे हो तो मैं केवल आपको खुश करने के लिए कैसे नाम ले लूँ भाई | आपको मैं अपनी उस श्रेणी में तो नही रख सकता |”

“हाँ, मतलब क्या है कि वो एक होता है कि लिस्ट बोलना कि भई सबको खुश हो जाएँ | वो भी हैं, वो भी हैं, वो भी हैं, वो भी अच्छा लिखते हैं, वो भी ज्ञान जी की पीढ़ी के इतने लोग लिख रहे तो वो ठीक बात है | मैं इस बात का बुरा भी नही मानता कि इससे क्या फर्क पड़ने वाला है | तीन-चार लोग आपस में एक दूसरे को बड़े व्यंग्यकार हैं कहते रहते हैं सभी छोटे व्यंग्यकार हैं पर आपस में बड़े व्यंग्यकार कहते हैं एक दूसरे को | वो उनको बोलेंगें, वो उनको बोलेंगें और बड़े खुश हैं आपस में कि हम तो बड़े व्यंग्यकार हैं | इतनी छोटी सीमा के अन्दर कर रहे हैं वो कि मैं वही हमेशा कहता था एक बार मैंने शरद जोशी सम्मान मिला था इधर बम्बई में शरद जोशी परिवार ने जो शरद जी के नाम पर किया है एक लाख रुपये का...नेहा ने | तो मैं उसमें बोला था कि हम हमारी प्रॉब्लम ये हो गयी है कि हमारा बेटा था छोटा और वो बड़ा भी हो गया है और दसवीं-ग्यारहवीं में पढ़ने लगा तो गली के बच्चों के साथ जाके क्रिकेट खेलता था और कहता था कि आज मैंने पापा छह छक्के मारे | छक्के की बाउंड्री जहाँ खेल रहे हैं वहां से नाली तक है और वहां तक चौका है तो जब हमने अपनी सीमायें बहुत छोटी कर लीं तो हम तो छक्के भी मारेंगें, चौवे भी मारेंगें हम तो सब कुछ करेंगें | तो अपने जब अपने छोटे-छोटे उद्देश्य कर दिए और उसमें चीज़ों को विजय करने लगे आप और उस विजय में अपने आपको दिग्विजयी समझने लगे आप तो फिर बहुत कठिन हो जाती है तो दिग्विजय की आपकी कल्पना और आपकी जो है नाप, नपती का जो तरीका है वो इतना कमज़ोर है, इतना छोटा है कि आप बिलकुल कह सकते हो कि हम दिग्विजयी हो गये क्योंकि हमने तो..हमारी दुनिया ही एक कमरे के बराबर है | उस कमरे के बाहर एक अनंत तक दुनिया है वो हमने देखी ही नही | बस वही चीज़ है | सब जगह वही है | कहो तो लोग बुरा मान जाते हैं और कहो तो लोग कहते हैं कि ज्ञान जी का दिमाग ख़राब हो गया है | अरे भैया उनकी तारीफ हो जाती है तो वो तो अपने आपको देवता समझने लगे अपने आपको भगवान समझने लगे... ऐसी बातें...व्यंग्य के अपने आपको खुदा समझते हैं | अब आप क्या बोलोगे ? आप सही बात कह भी नही सकते | सही बात कहोगे तो यही होता है कि ज्ञान जी को तो अपने मन में बहुत वो आ गया अपने ऊपर घमंड | ये घमंड की बात है ही नही भई | ये घमंड की बात हम कर ही नही रहे | हम कहाँ घमंड की बात कर रहे | हम तो अपना... जैसे आपने कहा कि आपका ये उपन्यास है मुझे मज़ा नही आया इसमें मान के चलूँ कि नही यार आपको तो समझ ही नही है | हमारी तो ये सीमा थी आपने इसको समझा नही और हमने तो ग़ज़ब की चीज़ लिखी थी आपने समझी नही | हर आदमी को अपनी राय रखने का हक़ है और हर आदमी जब आपको बताता है तो कुछ चीज़ें आपके लेखन की इंगित करता है जिनमें आप आगे जब लिखते हो तो एक कांशस ही नही.. सोच के नही कि यार राहुल ने ऐसा कहा था | आपके अवचेतन में एक इस तरह की जो सच्ची आलोचनाएँ हैं जहाँ किसी को लगा एक समझदार आदमी को लगा कि ऐसा रहा जैसा कुछ समझदारों को लगा जो मुझे भी बाद में लगा कि नही इसमें वो ज्यादा हो गया जोकि मैंने रिराईट करके तीन तीन, चार चार, पांच पांच बार रिवाइज करके देखा था कि नही कि इसमें गाली को कितना कम कर दूँ | जब ये छप के आ गयी और तब कई लोगों ने कहा तो मेरे मन में आया कि हाँ शायद ज्यादा हो गया और इसे और कम मैं कर सकता था | ऐसा मुझे लगा | पर वो कांशसली भी लगा और सबकांशसली मेरे मन में आया कि अब अगला जब लिखेंगें कभी तो ये नही कि आप कोई कांशस लेंगें | आपको आपकी रचना का एक फीडबैक आया तो हर बार आप अपनी गलतियों से, अपनी कमजोरियों से, अपने उससे सीखते हैं कि आपने क्या किया और क्या करना चाहिए और वही एक इम्पोर्टेन्ट चीज़ है | आप अगर सीखते नही हैं और हमारे यहाँ ज्यादातर लोग नही सीखते |”

“वो वरिष्ठता के आसमान पर पहुंचकर नीचे देखना ही नही चाहते |”

“वो कहेंगें कि मैं कह रहा हूँ मेरी किताब पर लिखो मतलब मेरी तारीफ करो | वो कहेंगें कि तुम अगर लिख सको तो भेजता हूँ | ‘भेजता हूँ’ का मतलब है- कहीं बुराई मत कर देना | तुम्हे लिखना है कि बहुत गज़ब की चीज़ व्यंग्य में की गयी है | पॉजिटिव अच्छी-अच्छी चीज़ें इसपे लिखना है आपको | गड़बड़ मत करना कहीं | ये है उनका |”

“तो फिर हमको लगता है कि लोग मन से लिखते भी नही है | जब अइसे ही है तो बगैर पढ़े लिखे देते हैं |”

“आज की समीक्षा बिना पढ़ी समीक्षा है ज्यादातर में | कोई आप आज किताब भेजते हो और पन्द्रह दिन में उसकी समीक्षा भी कहीं छप जाती है तो कैसे ? आपने दो रचनाएँ पढ़ी और चन्द जो आपके चुने हुए वाक्य हैं जो आप किसी के भी बारे में बोल सकते हैं जिसमें नाम भर डालना है बाकी वाक्य वही हैं | हैं न | तो आप डाल देते हो और एक समीक्षा बन जाती है | और आपको चूँकि उस आदमी को थोड़ा खुश करना है किसी कारण से | तो हमने तो इस कारण से कोई कारण ही तय नही किया | हमने जिन्दगी में कभी आपसे चाहा ही नही कुछ | हमने कभी नही कहा कि हम राहुल जी को कहीं किसी जगह बैठे हों किसी पुरस्कार समिति में तो मेरा नाम ले लेंगें, कहीं बोलेंगें तो मेरे बारे में बोल देंगें | हमें जब आपसे ये नही चहिये और ये अभी की बात कहो कि तुमने इतना लिख लिया कि हम कहेंगे कि अब आप हमारा नाम तो लोगे ही यार हम तो तब की बात बता रहे हैं जब बिलकुल हमने लिखना शुरू किया था | हमने लिखना शुरू किया तो हमने कभी नही कहा कि आप हमारे को, हमारी तारीफ करो, हमको छापो | हमें भगवान ने अपने आप इतना दिया है |”

“और व्यंग्य में तो मैं सोचता हूँ सर कि होगा क्या मतलब आपके बाद दूर दूर तक कोई दिख ही नही रहा है | जैसे काम करने के लिए होना भी तो चाहिए न कोई |”

“कोई कोशिश ही नही करने की कोशिश कर रहा | और जहाँ पे जो रुक जाता है वो उससे ऊपर डेवलप नही होना चाहता |”

“और वो किताबें जैसे कि उत्कृष्ट रचनाएँ, चयनित रचनाएँ, चुनिन्दा रचनाएँ करके फेंट-फेंटकर सबका आता रहता है जिनमे नया कुछ भी नही है |”

“आप कितने भी निकाल दो यार | आप ये सोचो लोग जाने कितना पीछे पड़ते होंगें मेरे पीछे एक मित्र पड़े हुए थे कि साहब हम निकाल रहे हैं | मैंने कहा कि देखो यार मेरे से मत उम्मीद करना कि मैं तुम्हे कोई रचना दूंगा क्योंकि मेरे पास इतना समय नही है | तुम्हारे पास मेरी किताबें हैं, तुम्हे निकलता है तुम जो निकालना हो बना लो संग्रह मुझे कोई दिक्कत नही है एक किताब तुम निकाल सकते हो | अभी कुछ दिन पहले निकाली हैं उनने लाजवाब व्यंग्य करके कुछ ऐसा ही निकाले हैं छह आदमियों के उसमें मेरा भी है | तो मेरे को तो जब छप गयी तब उन्होंने बताया कि आपने भाई साहब कहा था एक बार तो मैंने निकाल दी और आपका दस हज़ार रुपये का चेक और किताब वहां पहुँच जायेगी घर पर | मैंने कहा बढ़िया है भेज दो | इससे ऊपर हम तो मतलब कोशिश करते ही नही कि हमारे पर आप एक किताब या कुछ और |”

“नही सर आपका तो समझ में आता है लेकिन जिनका कुछ भी नही है वो भी आपके पीछे पीछे छह लोग अपनी भी निकाल दें तो वो तो एक ये होता है न कि आपके पीछे उनका भी नाम हो जायेगा जब ऐसे लोगों ने आपके लेवल का वो काम ही नही किया है |”

“वो कर ही रहे हैं, ऐसे ही कर रहे हैं |”

“जी वो ऐसे ही करके अपनी किताबों की संख्या बढ़ा रहे हैं |”

“बड़ा कठिन है... अच्छा दूसरे दो एक लोग मुझसे ये भी कहते हैं कि साहब लोग तो आपको इस्तेमाल कर रहे हैं | हमने कही कि देखो हमारा नाम अगर हो गया है मान लीजिये तो उस नाम को इस्तेमाल कोई भी कर सकता है | हम तुमको भी पूरी स्वतंत्रता देते हैं कि तुम हमारा नाम लेके जो सही बात होगी हमसे जो बात होगी तुम ये रेफरेन्सेस इस्तेमाल कर लो, अपने लिए कर लो हमें कोई मतलब नही | कल के दिन राहुल एक लम्बी सी टिपण्णी लिखके फेसबुक पर डाल दें कि ज्ञान जी से बड़ी जबरदस्त बात हुई और उन्होंने इतनी इतनी बातें करीं, उन्होंने मुझे पहली बार कहा कि मैं केवल तुमको कह रहा हूँ ‘पागलखाना’ के बारे में मैंने आज तक किसी को थीम नही बताई तो ये भी एक हो सकता है ज्ञान चतुर्वेदी को इस्तेमाल करके अपने आपको प्रोजेक्ट करना | इतना हम बेवकूफ नही हैं हम समझते हैं कि ये जो कोई करता भी है इस तरह से काम करता है तो पर हम भी मुस्कुरा के छोड़ते हैं कि चलो कर लिया किसी ने क्या हो गया ? इसमें हमारा क्या बिगड़ा ? हमारा क्या बना ? हाँ तो हमने कहा कि हम तो अवेलेबल हैं, हमारा साहित्य भी अवेलेबल है | कोई अगर हमसे बात करता है तो |”

“वैसे सर जो लोग ऐसा कहते हैं मुझे लगता है वो इस क्षोभ में रहते हैं या कुंठा में रहते हैं कि वो नही कर पा रहे हैं दूसरा कर ले रहा है |”

“करेक्ट, मैंने उनको यही तो कहा कि तुम हो, तुम भी उपलब्ध हो मैं तुम्हारे लिए उपलब्ध हूँ तुमसे बात भी करता हूँ फोन पर तो तुम जैसा चाहो | मुझे क्या दिक्कत है अगर मेरे इस्तेमाल होने से आपके कद में अगर एक चौथाई इंच भी इजाफा होता है तो मैं कहीं उसके खिलाफ नही हूँ कर लो | पर मैं अगर उसमें एन्जॉय करने लगूं, मज़ा लेने लगूं | अपने आपको ग़लतफ़हमी में डाल दूँ कि यार इतने लोग मेरे बारे में बात कर रहे हैं तो मैं कोई महान आदमी हूँ तो फिर मैं चूतिया हूँ | फिर वो नही होगा मेरे को मेरे मन में कभी नही आती है ये बात कि मेरे को फ़लाने | उस दिन आप थे उस प्रोग्राम में जहाँ लोगों ने बड़ी-बड़ी बातें मेरे बारे में कहीं और मेरे को मैं बिल्कुल चिकने घड़े की तरह बैठा था मैं | मेरे मन पर कुछ नही आ रहा था जो कह रहे थे | चाहे आलोक ने कहा हो, चाहे अनूप कह रहा हो चाहे सुशील कह रहे हों | मेरे मन में बिलकुल नही आता कि आप मेरी तारीफ कर रहे हो तो बहुत अच्छी बात है | आप अगर कुछ कह रहे हो तो आप अपनी समझ के हिसाब से कह रहे हो | आप आलोचना में तो कहते हो राहुल आये और व्यंग्य पर लिखे कविता छोड़े इसमें आ जाय पर इसमें वो आ भी जाय तो बताओ वो किस पर लिखे ? आप किसकी रचनाशीलता को रेखांकित करें और क्या करें ? या हम वापिस जाएँ शरद जोशी, परसाई और इनपर ही बात करें फिर अभी तक | है न | किसी भी पूर्वजों की बात करना तब बहुत उचित होता है जब वर्तमान में भी जो पीढ़ी है वह कुछ कर रही हो | वर्तमान की पीढ़ी केवल हल्ला कर रही है और मार्केटिंग कर रही है | ये वो इन्जीनियरिंग के छात्र हैं जो मार्केटिंग कर रहे हैं | ये इन्जीनियरिंग करना छोड़ चुके हैं | मैं एक बार अपने बेटे से बात कर रहा था कि ऐसी इन्जीनियरिंग की डिग्री से क्या फायदा बेटा कि मकेनिकल में की और फिर तुम जाके मार्केटिंग कर रहे हो | और जो ब्रिलियंट हैं वो ज्यादा कर रहे हैं | जो ब्रिलियंट है उसने फट से एमबीए किया एमबीए करके वो उसने इलेक्ट्रॉनिक में किया था और वो आज बैंक में कुछ कर रहा है तो उसने इलेक्ट्रॉनिक किया क्यों ? पांच साल में क्यूँ किया ? तो आज की स्थिति वही है कि आज के जो व्यंग्यकार हैं वो उन ब्रिलियंट इन्जीनीयर्स की तरह हैं जिन्होंने इन्जीनियरिंग पढ़ी और मार्केटिंग में लग गये | इन्जीनियरिंग से उनका दूर-दूर तक सम्बन्ध नही तो ब्रिलियंट इस मामले में हैं कि उन्हें लगा कि ये एक ऐसी ब्रांच है जिसमें घुस के अपन मार्केटिंग में जा सकते हैं | वो इसलिए केवल व्यंग्य में घुसे और व्यंग्य में घुस के मार्केटिंग में चले गये और व्यंग्य की मार्केटिंग कर रहे हैं | देखिये आप बहुत क्लोजली वाच करेंगें तो लोग मार्केटिंग कर रहे हैं | लोग डाल रहे हैं मेरी इस साल की तीसरी किताब और मैंने ऐसा किया, मैंने वैसा किया |”

“लेखकों के न्यू इयर रेसोल्यूशन आने शुरू हो गये हैं फेसबुक पर कि अगले साल मेरे इतने उपन्यास लाइन में हैं |”

“हाँ कि अगले साल मेरे तीन उपन्यास, चार उपन्यास आयेंगें और पांचवां ये होगा और छठवां ये रहेगा | क्या करें ऐसी... अपनी अपनी बात कहने की समझ है क्या करेंगें आप | चलें अच्छा बंद करें |”

“हाँ सर, ‘मरीचिका’ पर फिर बात करते हैं | शुभ रात्रि सर, हैप्पी न्यू इयर |”

“हैप्पी न्यू इयर आपको भी |”

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ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com


Sunday, 4 February 2018

समकालीन कविता में वस्तुजगत के बिम्ब - अमीर चन्द वैश्य



समकालीन कविता में वस्तुजगत के बिम्ब
अमीर चन्द वैश्य

हम हमेशा वर्तमान में सेाचते-विचारते हैं। अपना दैनिक काम-काज करते हैं। लेकिन हमारा आज हमारे बीते हुए कल से जुड़ा रहता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। कल आज में बदलता है और आज आनेवाले कल में। भाषा और साहित्य में भी ऐसा ही क्रम चलता है। आज की कविता कल से जुड़ी हुई है, लेकिन उसमें कुछ परिवर्तन अवश्य दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार कल जो कविता सामने आएगी, वह आज से कुछ भिन्न होगी। परिवर्तनशील जगत् में प्रतिपल परिवर्तन हो रहा है। लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते है। कालान्तर में हम देखते हैं कि समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन उपस्थित हो गया है। और हम भी बदल गए हैं। हमारी भाषा बदल गई है और हमारा साहित्य भी। इसीलिए आज की कविता कल की कविता से भिन्न है। लेकिन भिन्न होते हुए भी वह उससे विलग नहीं है।

आजकल हिन्दी कविता के संसार में अनेक पीढ़ियों के कवि सर्जना-संलग्न हैं। अनेक वरिष्ठ कवि हैं। अनेक कनिष्ठ कवि हैं। लेकिन युवा कवियों और कवयित्रियों की संख्या अगणित है। सवाल यह है कि कवि कविता क्यों रचता है और उसकी पहचान कैसे निर्मित होती है। पहले सवाल का जबाव यह है कि अभिव्यक्ति की उद्दाम आकांक्षा प्रत्येक व्यक्ति में होती है। वह अपनी बात दूसरे तक संप्रेषित करना चाहता है इसलिए काव्य-रचना का एक कारण यह  है कि कवि अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना चाहता है। लेकिन उसकी पहचान अपनी जनपदीय रागात्मकता से बनती है। त्रिलोचन शास्त्री युवा कवियों से कहा करते थे कि यदि तुम्हें कवि के रूप में अपनी पहचान निर्मित करनी है तो तुम जहां के रहनेवाले हो वहां का जन-जीवन निकट से देखो। अनपढ़ लोगों को बात करते हुए सुनो। उनसे भाषा सीखो। और अपनी कविता में उनका जीवन अपनी भाषा में इस प्रकार रचो कि उनका परिवेश उसमें अभिव्यक्त हो। तुम्हारी काव्य-भाषा उनकी बोली-बानी के शब्दों से सुगन्धित हो। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी लिखा है कि देश प्रेम की शुरूआत स्थानीय प्रेम से होती है। जिसे अपनी जन्म-भूमि से कोई लगाव नहीं है, उसे अपने देश से कैसे लगाव होगा। कविवर रसखान ब्रजभूमि, ब्रजपति और ब्रजभाषा पर न्योछावर थे।

त्रिलोचन अवध के रहनेवाले थे। अतएव उनके काव्य में अवध के जनपद का जीवन अभिव्यक्त हुआ है। उन्होंने लिखा है मैं उस जनपद का कवि हूं जो भूखा-दूखा है। अपनी गरीबी का कारण नहीं समझता है। रामायण का पारायण करके स्वयं को धन्य मानता है। त्रिलोचन ने अपने काव्य में अपने स्थानीय जनजीवन और उसके परिवेश को अनेक रूपों में व्यक्त किया है। क्या आपने कभी नीम पर खिले हुए फूल देखे हैं। उनका रंग कैसा होता है। त्रिलोचन ये बातें जानते थे। वे पेड़-पौधों को निकट से देखते थे। उन्होंने फूले हुए नीम का वास्तविक वर्णन इस प्रकार किया है- ‘‘नीम में नव फूल आए/ सुरभिमय वातास/ मधुर मंजरियां तरंगित/ कर रहीं मधु मौन इंगित/ भर रहा ऋतुराज में प्रति श्वास में विश्वास/ सुरभिमय वातास।‘‘ (धरती, पृष्ठ-114) यह सुरभिमय वातास  बाहर निकलकर ही सूंघी जा सकती है। खुले मैदान में अथवा किस बाग में अथवा जंगल में। विशेष रूप से गांव के परिवेश में। महानगर के लोग ऐसी वातास से प्रायः वंचित रहते हैं। लेकिन आजकल मानवीय स्वार्थ पेड़ काट रहा है। कवि अलीक ने गांव की पुरानी लीक पर चलते हुए यह अभिलाषा व्यक्त की है कि नीम का पेड़ न काटा जाए। हरा-भरा पेड़ काटना पाप माना गया है। इसीलिए इस कविता में चिड़िया दगड़ू प्यारे से कहती है-‘‘ क्यूं/ काटा/ नीम का पेड़/ मेरा जीवन क्यों बांटा/ जिस पर मेरा बसेरा था/ दिवस पल फेरा था/ क्यों काटा नीम का पेड़ ?‘‘ (कबीर राग, पृष्ठ-103) पेड़ों के कटने पर नगरों में दूर-दूर तक छाया नहीं दिखाई पड़ेगी। ऐसी हालत में गांव का युवक महानगर में सोचेगा- ‘‘धूप में/ जब भी जलें हैं पांव/ घर की याद आई।‘‘

तो, घर की याद उसे ही आती है, जिसे अपने घर से हार्दिक लगाव होता है। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र ने अपनी जन्म-भूमि ग्राम धरमपुर (तहसील सहसवान, जिला-बदायूं, उत्तर प्रदेश) को अपनी कविताओं में बार-बार याद किया है। इसका प्रमाण है उनकी याद शीर्षक कविता, जो स्मृत रूप-विधान के आधार पर रची गई है। रतलाम की सुबह शीर्षक लम्बी कविता में वह धरमपुर को याद करते हुए कहते हैं- ‘‘गांव में कहा करते/ आम होता है वहां/ दुमट धरती जहां/  पानी रहे मीठा/ याद आता/ अपना गांव धरमपुर मुझको/ थोड़े नीचे/ जहां पानी था निरा मीठा/ बाग ही बाग थे भरे आमों के।‘‘ लेकिन मरूभूमि में पहुंचकर वह सोचते हैं- ‘‘नहीं देखे आम के वृक्ष हरियाते/ न उनका महकता बौर।‘‘ अपनी जन्म-भूमि के प्रति ऐसा हार्दिक लगाव कम कवियों में लक्षित होता है। कहावत है प्रीत घटै परदेस बसे। लेकिन विजेन्द्र की कविता ने ये कहावत झुठला दी है।

वस्तुतः काव्य सर्जना के लिए यह जरूरी है कि कवि बाहरी जगत् को अपनी ज्ञानेन्द्रियों से निरन्तर देखता-परखता रहे। रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-ध्वनि का ज्ञान इन्द्रियों के ही माध्यम से होता है। जिन कवियों का इन्द्रिय-बोध जितना व्यापक होता है, उनके काव्य की अन्तर्वस्तु भी उतनी ही विस्तृत होती है। इस सन्दर्भ में संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि का नाम अग्रगण्य है। उनके बाद कालिदास का नाम कनिष्ठका पर आता है। कालिदास का मेघदूत उनके व्यापक इन्द्रिय-बोध का रागात्मक स्वरूप है। किस कवि को कौन से फूल पसन्द है। यह बात उसकी कविताएं पढ़कर समझी जा सकती है।

हिन्दी के युवा कवि नीलकमल ने प्राकृतिक पर्यवेक्षण और निरीक्षण के आधार पर ‘ककून’ लम्बी कविता की रचना की है। इस कविता में कवि ने अपने अनुभव के आधार पर यह विचार व्यक्त किया है कि रेशम के कीड़े अपनी क्र्रियाशीलता से दूसरों के लिए रेशम के धागे रचते हैं। और अपने जीवन का बलिदान कर देते हैं। कवि का यह विचार कविता की वास्तविकता बन गया है। यह कविता हमारे व्यापक समाज से जुड़कर निर्मम वास्तविकता का उद्घाटन करती है। इस सन्दर्भ में कवि आक्रोश-भरी भाषा में कहता है- ‘‘मुट्ठी-भर प्रभुओं के तन पर रेशम का मतलब/ करोंड़ों नागरिक ककूनों की असमय मृत्यु/ स्कूलों में मारे जाते शिशु ककून/ कालेजों में मारे जाते युवा ककून/ घरों में दम तोड़ती स्त्री ककून/ दफ्तरों कारखानों में मृत्यु का वरण करते/ मजदूर ककून।‘‘ (यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है, पृष्ठ-79) नीलकमल ने रेशम के कीड़े ककून को अनेक सामाजिक सन्दर्भों से जोड़कर उसे अभिनव अर्थवत्ता प्रदान की है। साथ-ही-साथ क्रूर व्यवस्था की आलोचना भी की है। इस कविता के मूल में है कवि का जागरूक इन्द्रियबोध, जिसके आधार पर कविता का विस्तार किया गया है। 

वस्तुतः बाहरी दुनिया को देखने-परखने के बाद ही संवेदनशील कवि और अधिक संवेदशील होता है। आचार्य शुक्ल कहा करते थे कि शब्द-काव्य रचने से पहले वस्तु जगत् के काव्य का अनुशीलन अनिवार्य है। उनकी मान्यता है कि कविता करूणा और प्रेम के भावों की अभिव्यक्ति से समाज में लोकमंगल की स्थापना करती है। करूणा की प्रवृत्ति रक्षण की ओर होती है और प्रेम की रंजन की ओर। जीवन की विषमता देखते हुए रक्षण पहले है। रंजन बाद में।

वयोवृद्व कवि छविनाथ मिश्र ने लोक मांगलिक भावना की अभिव्यक्ति धूप और मां के रागात्मक सम्बन्ध से इस प्रकार की है- ‘‘धूप किसी भी ऋतु की हो/ नरम-गरम सुषम / जैसी भी होती है/ वह मां जैसी होती है/ दूब के पातों पर पसरी/ सुनहली हरीतिमा जैसी होती है/ खेत में हो या सीवान में हो/ वह न किसी धर्म की होती है/ न किसी मजहब की होती है/ वह हम सब की होती है/ नरम-गरम सुषम/ जैसी भी होती है/ मां जैसी होती है।‘‘ (वागर्थ, अंक 196, नबम्वर 2011, पृष्ठ-17) इस कविता में कवि ने अपने इन्द्रियबोध के आधार पर विचारबोध और सौन्दर्यबोध की ऐसी आकर्षक अभिव्यक्ति की है कि पाठक का मन स्वार्थ-संकुचित घेरे से बाहर निकल आता है। उसका मन धूप के समान ही संवेदनशील हो जाता है।

आज की युवा कविता के लिए मैं की आवश्यकता नहीं है। हम की आवश्यकता है। व्याकरण के अनुसार हम इसलिए उत्तम पुरूष है कि वह अपने साथ सबको लेकर चलता है। महाकवि निराला का मैं हम में बदलता रहता है। इसी प्रकार विजेन्द्र का मैं भी हम का समानार्थी हो जाता है। हिमाचल प्रदेश के युवा कवि सुरेश सेन निशान्त अपनी कविताओं में मैं के साथ-साथ हम का भी प्रयोग करते हैं। इस दृष्टि से उनकी जामुन और बर्फ कविताएं पठनीय हैं। पहली कविता जामुन में कवि ने इस बात पर शोक व्यक्त किया है कि बहुत पुराना था वह पेड़ जामुन का। छायादार भी था। लेकिन उसे कटवाकर वहां मन्दिर बनवा दिया गया। इससे कवि को हार्दिक वेदना महसूस होती है। वह सोचता है- ‘‘खाली हाथ जब लौटूंगा मां को क्या जबाव दूंगा/ हाट में कहीं बिक भी नहीं रहे/ कोई दूसरा पेड़ भी नहीं बोया हमने/ इस अरसे में।‘‘ कवि की वेदना यह है कि जामुन का पेड़ कट गया है। अब उसके मीठे फल कभी नहीं प्राप्त होंगे। हमारी धार्मिक अंधता कितनी क्रूर हो गई है प्रकृति के प्रति। ऐसा ही विचार विजेन्द्र ने भी अपनी कविताओं में व्यक्त किया है। यदि सुरेश सेन निशान्त को जामुन का पेड़ कटने से दर्द का अहसास होता है तो विजेन्द्र को आम के बाग कटने और उजड़ने से पीड़ा महसूस होती है। इस प्रकार युवा पीढ़ी वरिष्ठ पीढ़ी से भावात्मक नाता जोड़ रही हैं। यह नाता बता रहा है कि पर्यावरण का विनाश जीवन के लिए खतरे की घंटी है। कितने ऐसे युवा कवि हैं जो, प्रकृति के प्रति संवेदनशील हैं। यह शोध का विषय है। सुरेश सेन निशान्त पर्यावरण विनाश के प्रति इतने चिन्तित हैं कि पहाड़ पर बर्फ न गिरने पर उन्हें आसमान से बरस रही भीषण गर्मी से परेशान होना पड़ता है। पर्यावरण-विनाश ने पहाड़ी जनों को विस्थापित कर दिया है। वे रोजी-रोटी के लिए पहाड़ से पलायन कर रहे हैं। कवि निशान्त की चिन्ता ऐसे लड़के-लड़कियों के प्रति गहरी है, जो बसों में बैठकर दूर शहरों की ओर चले गए, लौटकर वापस नहीं आए पहाड़ों पर। 

उत्तराखण्ड निवासी हरीशचन्द्र पाण्डेय इलाहबादी कवि के रूप में विख्यात हैं। उनकी एक कविता है ‘बर्फ गिर रही है।‘ यह दृश्य देखकर वह कहते हैं- ‘‘कोलाहलो, अपने-अपने पांव समेट लो/ शरीसृपों, भूमिगत हो जाओ/ बर्फ गिर रही है।‘‘ लेकिन अब ‘‘बर्फ पिघल रही है/ कैमरे स्वर्ग में उतरने के साक्ष्य जुटा रहे हैं/ बर्फ को जी भर जीकर सैलानी आ रहे हैं/ उनके हाथों में ताजा अखबार हैं/ अखबारों में लोग ठंड से मर रहे हैं।‘‘ (वागर्थ, अंक 231, अक्टूबर 2014, पृष्ठ-82) इस कविता में भी कवि का इन्द्रियबोध सजग हैं। उसने परस्पर विरोधी भावों का निरूपण करके ठंड से मरनेवाले लोगों के प्रति शोक संवेदना व्यक्त की है। ऐसी कविताएं पढ़कर और समझकर निदा फाज़ली का शेर याद आ रहा है- ‘‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें/ किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।‘‘

महेश चन्द्र पुनेठा भी पहाड़ी परिवेश के कवि है। वह अपने आस-पास की प्रकृति को निकट से देखते-परखते हैं। और फिर स्थानीय पेड़ खिनुवा के बारे में कहते हैं- ‘‘खिनुवा का पेड़ हूं मैं/ तुम कहां पहचानोगे मुझे/ मैं नहीं दे सकता तुम्हें/ सरस स्वादिष्ट फल/ नहीं बन सकता हूं तुम्हारी हवेली की/ दरवाजे-खिड़कियों की चौखट/ मेरे पास नहीं हैं/ चित्ताकर्षक और सुगन्धित फूल/ जिन्हें सजा सको/ तुम अपने फूलदानों में।‘‘ (शुक्रवार, साहित्य वार्षिकी, 2013, पृष्ठ-183) महेश चन्द्र पुनेठा का तुच्छ और उपेक्षणीय खिनुवा का पेड वरिष्ठ कवि विजेन्द्र के महत्त्वहीन लेकिन महत्त्वपूर्ण कुकुरभाँगरा से जुड़कर अपनी उपयोगिता की घोषणा कर रहा है। इस प्रकार प्रकृति-पर्येवेक्षण का सूत्र दोनों कवियों को जोड़ रहा है।

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतना त्रासद उलट-फेर हो गया है कि हमारा लोक तो अभावग्रस्त और संत्रस्त है, लेकिन तंत्र अपनी मौज में मस्त है। इसीलिए अदम गोंडवी कहते हैं-‘‘ तुम्हारी मेज चांदी की, तुम्हारा जाम सोने का/ यहां जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।‘‘ (धरती की सतह पर, पृष्ठ-41)। यह घनघोर विषमता नई नहीं है। बहुत पुरानी है। याद कीजिए सुदामा की पत्नी का कथन- ‘‘या घर तैं कबहूं न गयौ पिय टूटो तवा औ फूटी कठौती।‘‘ आज के भारत में अमीरों की संख्या तो बहुत कम है, लेकिन गरीब असंख्य हैं। तभी तो दुष्यन्त कुमार ने कहा था- ‘‘कल नुमाइश में मिला था चीथड़े पहने हुए/ मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।‘‘ ऐसे भूखे-नंगे हिन्दुस्तान की दुर्दशा का कारण विदेशी पूंजी है। हमारी सरकार की उदारीकरण और निजीकरण की नीति ने उसके लिए सभी द्वार खोल दिए हैं। मोदी सरकार भी अमरीकी कम्पनियों को आमंत्रित कर रही है। आइए। पधारिए। धन कमाइए। हमारे बेरोजगारों को रोजगार दीजिए। ऐसे कुटिल समय में जनपक्षधर युवा कवि कहता है- ‘‘जन की पीड़ाओं को/ जब शब्द देता है/ कवि/ हाहाकार करता है/ व्यथाओं का समंदर/ उसकी कविता में/ लोकतंत्र के मसीहा/ पुरस्कृत करते हैं कवि को/ बताते हैं/ उसे/ मानवता की पीड़ा का गायक।‘‘ (कपिलेश भोज, यह जो वक्त है, पृष्ठ-69) वास्तविकता यह है कि सरकारी तंत्र चाहता ही नहीं हैं कि कवि और लेखक उसके विरोध में कुछ लिखें, जिसे पढ़कर जनता जागरूक हो। अतएव अनेक सत्तामुखी कवि मधुर भाषा में सत्ता की नख-दन्त-विहीन आलोचना करते हैं। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह कुम्भन दास के प्रति कविता में कहते हैं- ‘‘फिर भी कविवर जाते-जाते पूछ लूं/ ये कैसी अनबन है/ कविता और सीकरी के बीच/ कि सदियां गुजर गईं/ और दोनों में आज तक पटी भी नहीं।‘‘ (सृष्टि पर पहरा) वास्तव में केदारजी यह चाहते हैं कि सत्ता की सीकरी से कविता के सम्बन्ध कटु न होकर मधुर हों। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं है। भक्तिकाल के कवि सत्ता की सीकरी से दूर रहे। आधुनिक कवियों में निराला के अलावा केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, विजेन्द्र जैसे कवि आज की सत्ता के केन्द्र दिल्ली से हमेशा दूर रहे। वस्तुतः केदारनाथ सिंह नागार्जुन की परम्परा के कवि नहीं हैं। यदि होते तो नागार्जुन के समान राजनेताओं की तीखी आलोचना करते। उनकी कविता में त्रिलोचन काव्य जैसी विविधता भी नहीं है। पुरस्कारों से किसी कवि का बड़प्पन नहीं आंका जा सकता है। यह तल्ख हकीकत है आज का युवा कवि कुछ कविताएं लिखने के बाद पुरस्कार-प्राप्ति के लिए जुगाड़ करने लगता है। यह दूषित प्रवृत्ति कविता को हानि पहुंचा रही है। वयोवृद्ध कवि मलय जानते हैं कि समाज में जो कुछ घटित हो रहा है, अच्छा या बुरा। उसे संवेदनशील कवि देख सकता है और समझ सकता है। उनका कहना है- ‘‘एक और/ उगता दिन दिखता है/ इस सौर मंडल में/ मनुष्य ही है/ जो सूर्य की तरह/ उगता हुआ थरथराता है/ उसका थरथराना जारी है/ कम नहीं हुआ अभी तक/ जिसे सब नहीं/ देख पाते/ कवि देख पाता है/ जब वह अपनी धड़कनों की/ लहरदार ऊँचाई पर आकर/ खड़ा होकर भी/ खड़ा नहीं रहता।‘‘ (वागर्थ,2013, पृष्ठ-62)

आजकल मानवता और दानवता का द्वन्द्व चल रहा है। छल-छद्म और स्वार्थ हावी हो रहे हैं। अतः मनुष्य का हृदय निर्मल नहीं है। और न हो सकता है। वर्ग-विभक्त समाज में कोई भी कवि अजातशत्रु नहीं होता है। उसकी कविता अपने शत्रु को पहचानती है। शम्भु बादल कहते हैं कि मै सच कहता हूं।‘‘ गीता-कुरान हाथ में ले/ काली कामरेड की जमीन पर/ सच कहता हूं/ भारत घायल है/ घाव बहुत गहरे हैं।‘‘ (वागर्थ, वही अंक, पृष्ठ-67) सवाल यह है कि भारत घायल क्यों है। जबाव है घनघोर आर्थिक विषमता के कारण। उदारीकरण और निजीकरण की वजह से। घायल भारत का मतलब है भारत के बहुसंख्यक किसान और मजदूर, जो आजकल त्रासद जीवन विताने के लिए अभिशप्त हैं। सियाराम शर्मा ने ठीक लिखा है-‘‘ बर्बर पूंजी और हिंस्र साम्राज्यवाद के दौर में लोक और प्रेम सर्वाधिक संकटग्रस्त हैं। वर्तमान काल के भयावह संकट के समय अतीत की प्रेरक स्मृति उत्साह का संचार करती है। निर्मल प्रेम ने असाध्य कार्य साधे हैं। अतः निजी और सामाजिक जीवन के व्यवहार में निश्छल प्रेम-व्यवहार अनिवार्य है, जो कभी-कभी दिखाई पड़ता है। रेखा चमोली का कहना है- ‘‘प्रेम में/ चट्टानों पर उग आती है घास/ किसी टहनी का/ पेड़ से कटकर/ दूर मिट्टी में फिर से फलना फूलना/ प्रेम ही तो है/ प्रेम में पलटती हैं ऋतुएं।‘‘ (पेड़ बनी स्त्री, पृष्ठ-66) वरिष्ठ कवि विजेन्द्र भी अपने दाम्पत्य प्रेम को तीर्थराज प्रयाग के समान पवित्र मानते हैं। दाम्पत्य प्रेम से भरे प्रेम को तीर्थराज कहना कवि की उदात्त कल्पना है।

मकान को घर में बदलने का महान कार्य प्रेम भाव ही करता है। संतोष चतुर्वेदी कहते हैं- ‘‘कौन कहता है/ कि महज दीवारों और छतों से/ बनते हैं घर/ वे तो खिड़कियां और दरवाजे हैं/ जो देते हैं घर को/ सही तौर पर/ उसका मुकम्मिल स्वर।‘‘ और यह मुकम्मिल स्वर गूंजता है प्रेमालाप से। मकान मे घर-परिवार के लोग बसते हैं, तब वह घर का रूप धारण करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि नई पीढ़ी के कवियों की संवेदना का सूत्र विजेन्द्र के भाववोध से जुड़ा हुआ है। घर-परिवार में अकेलापन नहीं होता है। इसीलिए गृहस्थ आश्रम को सर्वोपरि माना गया है। संकट आने पर एकजुट गृहस्थी प्रतिकूल परिस्थतियों का सामना करती है।  त्रिलोचन ठीक कहते हैं- ‘‘आए न बहुत दिन बादल/ बरसा न बहुत दिन पानी/ मिलकर वे दोनों प्रानी/ दे रहे खेत में पानी।‘‘ ऐसा दाम्पत्य प्रेम अपना विस्तार करके संपूर्ण जीवन-जगत् से अनायास जुड़ जाता है। यह प्रेम भाव ही है जो हमें बलिदानी क्रान्तिकारियों के प्रति मन में श्रद्धा जगाता है। लेकिन दुष्टों और आतंकवादियों के प्रति घनघोर घृणा का भाव उत्पन्न करता है। युवा कवि भरत प्रसाद जुझारू छात्र नेता चन्द्रशेखर की शहादत के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहते हैं- ‘‘चन्द्रशेखर, तुम जा ही नहीं सकते/ क्योंकि तुम, तुम नहीं सब बन गए हो/ सपने जो बनाए, क्या मिट गए सभी/ नहीं चन्दू नहीं/ वो तो आत्मा में बस गए हैं।‘‘ (एक पेड़ की आत्मकथा, पृष्ठ-41) । इस कवितांश में शहीद चन्द्रशेखर को चन्दू कहकर भरत प्रसाद ने अपनी आत्मीयता सहज भाव से व्यक्त की है। इस प्रकार प्रेम व्यापक होकर अन्तरराष्ट्रीयता का पक्षधर हो जाता है। प्रतिरोध की भूमिका का निर्वाह करता है। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र अमरीकी साम्राज्यवाद का प्रखर विरोध करते हुए कहते हैं- ‘‘दैत्य को पछाड़ो/ जो करता है दोहन उगते देशों का/ जो छीनता है हमारे खनिज स्रोत/ हमारे जल-प्रपात/ हमारे फल-फूल।‘‘ आजादी के बाद से ही देश की सामाजिक गतिकी इतनी विषम हो गई है कि वर्तमान पीढ़ी स्वाधीनता के बलिदानियों का विस्मरण कर रही है। वास्तविकता तो यह है कि ‘‘वोट हमारा हार हमारी जीत-जश्न उनके/ द्यूत सभा में शकुनी के पांँसे बिछी बिसाते हैं।‘‘ अर्थात् हमारी राजनीति महाभारत कालीन राजनीति हो रही है। छल और कपट से भरी हुई। सत्ता लोगों को अपने भ्रम-जाल में फांसकर अपना उल्लू सीधा किया करती है। ऐसी विषम परिस्थति में अशोक तिवारी जैसे जागरूक कवि का कहना है कि कम्युनिष्ट बनना चहता हूं । क्योंकि ‘‘मैं मानता हूं/ लोकतांत्रिक प्रणाली का होता है मुख्य आधार जन/ होती है जिसके अन्दर कुव्वत/ जालिम के खिलाफ/ उठ खड़े होने की, टकराने की/ तीसरी दुनिया के सपने को/ हकीकत में बदलने की।‘‘ (दस्तखत, पृष्ठ-116) दुनिया के विकासशील देश तभी आगे बड़ सकते हैं, जब आज की एक ध्रुवीय दुनिया पर अंकुश लगाया जाए। अर्थात् अमरीकी साम्राज्यवाद का विरोध किया जाए। विरोध के लिए आवाज बुलन्द की जाए। कवि विजेन्द्र का कहना है कि बोलने से सन्नाटा टूटता है। व्यवस्था दहलती है। उनका यह कहना ठीक है- ‘‘बोलो तुम अपनी जबान बोलो/ बोलना पथरीली जड़ता को तोड़ता है, बोलो/ वह तुम्हारी अजेय ताकत है/ मुक्तिकामी जीवन की सक्रिय लय।‘‘ आज हमें प्योर पोएट्री की आवश्यक्ता नहीं है, क्योंकि ऐसी कविता राजनीति निरपेक्ष होती है। आज राजनीति सापेक्ष कविता की आवश्यक्ता है। इसलिए कि समाज में जो कुछ भी परिवर्तन होता है, वह जन विरोधी राजनीति के बदलने से होता है। वर्तमान राजनीति का छल-छद्म देखकर आरजू लखनवी फरमाते हैं- ‘‘रहवर रहजन न बन जाए कहीं, इस सोच में/ चुप खड़ा हूं भूलकर रास्ते में मंजिल का पता।‘‘ आरजू लखनवी की यह मनोदशा असमंजस भरी मालूम होती है। इकबाल तो सामाजिक विषमता देखकर स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- ‘‘जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोटी/ उस खेत के हर गोश-ए-गंदुम को जला दो।‘‘ अतएव आज का लोकधर्मी कवि श्रमी जनों को अपनी कविता के केन्द्र में उपस्थापित करके उनकी साधारणता को विशेषत्व प्रदान कर रहा है। इसका उदाहरण हमें अशोक तिवारी की कविता ‘नीम गांव वाली’ में मिलता है। इस कविता की श्रमशीला महिला अनामिका है। अर्थात् लोग उसे उसके नाम से नहीं पुकारते हैं। उसे कामवाली कहा करते हैं या नीम गांववाली। यानी उसकी पहचान ही समाप्त कर दी है। यह हमारे समाज की निर्ममता है जो निम्न वर्ग के प्रति ऐसा संवेदनहीन व्यवहार करती है। अशोक तिवारी ठीक लिखते हैं- ‘‘वो औरत/ नहीं पुकारी गई जो कभी भी/ किसी एक खास नाम से/ पुकारा गया कभी उसे घर/ तो कभी घेर के नाम से/ कभी गांव से/ कभी शहर के नाम से।‘‘ (दस्तखत, पृष्ठ-67) वस्तुतः यह सामन्ती मनोवृत्ति है। पहले भी थी और आज भी है। बड़े लोग छोटे लोगों को अक्सर कमीन कहा करते हैं। उनकी उपेक्षा करते हैं। रहीम ने इसी बात की ओर संकेत करते हुए कहा है- ‘‘रहिमन देख बड़ेन कौ लघु न दीजिए डारि/ जहां काम आवै सुई कहा करै तलवारि।‘‘ ऐसी सामन्ती मनोवृत्ति का विरोध समकालीन कविता में किया जा रहा है। कवि और कवयित्रियां दोनों ही सामन्ती जीवन-मूल्यों का विरोध कर रहे हैं। घर-परिवार में नारी को द्वितीय श्रेणी का व्यक्ति समझा जाता है। अतः पद्मजा शर्मा नारी की विवशता का निरूपण करते हुए यह संकल्प भी करती हैं- ‘‘मेरी जीत हो न हों/ अब हारूंगी तो नहीं/ अब तक मारा खुद को/ सीधी-भोली-विनम्र कहलाने को/ पर अब मरूंगी तो नहीं/ यह भी तय समझें/ भले हरा न पाउं/ पर हारूंगी नहीं।‘‘ (हारूंगी तो नहीं, पृष्ठ-44) स्त्री-पुरूष के प्रेम-सम्बन्ध कभी इकतरफा नहीं हो सकते। सम्बन्धों में समतुल्यता अनिवार्य है। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था ने सम्बन्धों की समतुल्यता को आघात पहुंचाया है। इसीलिए लोगों के जीवन में प्रेम की कमी दिखाई पड़ती है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। यही सोचकर मनीषा जैन कहती हैं- ‘‘मन को अकेला होने से/ बचा लेती हैं प्रेम की स्मृतियाँ/ इसलिए प्रेम को/ नजदीक ही रखिए/ प्रेम यदि बचा रहा/ तो बचा रहेगा/ चुटकी भर जीवन।‘‘ लोकतांत्रिक व्यवस्था में हम नारी को स्वाधीन रूप में रात-दिन देखते हैं। लेकिन उसकी तथाकथित स्वाधीनता पराधीनता ही है, क्योंकि वह पूंँजी के इशारे पर विज्ञापनों की दुनिया में अपनी देहयष्टि का प्रदर्शन मॉंग और पूर्ति के नियम के अनुसार करती है। इसीलिए जितेन्द्र कुमार कहते हैं- ‘‘साबुन के झाग में/ पहाड़ से गिरती श्वेत जलधार के सामने/ पथरीली नदी के बीच/ मेघ में परिणत उछलते जल की छाया में/ उन्मादी अट्टहास के साथ/ गोरी-गारी बाँहें/ इक्कीसवीं सदी के आगमन का/ स्वागत गान गाती हैं। ‘‘ (समय का चन्द्रमा, पृष्ठ-111) आज की नारी का यह स्वतंत्र रूप क्या उसकी वास्तविक आजादी है। नहीं।

घर-परिवार में स्त्री का महत्व सहअस्तित्व में निहित है। प्रेमचन्द का कथन है कि नारी में कुछ कठोरता होनी चाहिए और पुरूष में कुछ कोमलता। मलय और विजेन्द्र जैसे कुछ वरिष्ठ कवि पत्नी को विशिष्ट महत्व प्रदान करते हैं। मलय अपनी दिवंगता पत्नी सावित्री को संबोधित करते हुए कहते हैं- ‘‘जीवन की निपट जर्जरता में/ तुम्हारी कमाई हुई/ धीरज की/ सघन साधना के सार से/ जब मैं/ मनुष्य हो गया/ तुम धरती में समा गईं/ मैं अपने वसन्त का अधूरा अनन्त हों गया/ लड़खड़ा गया/ भीतर से बाहर तक/ तुम्हारी अनुपस्थिति में/ खुद को सही-सही/ देख नहीं पाता।‘‘ (कवि ने कहा, पृष्ठ-123, 124) वस्तुतः घर-परिवार में स्नेह का सूत्र एक को दूसरे से बांधे रहता है। इसीलिए रहीम ने कहा है- ‘‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोरौ चटकाय/ टूटै से फिर जुरै नहिं, जुरै गांठ परि जाय।‘‘ प्रेम की व्यापक भावना से प्रेरित होकर पुष्पिता अवस्थी नवजात अश्वेत शिशु के जन्म पर मां की ममता का गान करती हैं और रंग-भेद की आलोचना। ‘‘वैज्ञानिक सदी के/ सत्ताधारियों की कोशिशों/ और अत्तरराष्ट्रीय मानव अधिकारों के संगठनों के बावजूद/ गोरे आज भी बने हुए हैं/ सर्वश्रेष्ठ/ जबकि मछेरों और लुटेरे योद्धाओं से अधिक नहीं रहे कभी कुछ/ अपनी मानसिकता से/ आज भी वैसे ही भूखे और भुक्खड़।‘‘ (समकालीन सरोकार , मई, 2012) प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि पुष्पिता अवस्थी प्रवासी भारतीय कवयित्री हैं। अश्वेतों के महान गायक पॉल राब्सन को संबोधित करते हुए विजेन्द्र ने ओजपूर्ण लम्बी कविता में आह्वान किया है कि आज अश्वेतो को आज तुम्हारी आवश्यकता है।

प्रेम की व्यापक भावना अपना सम्बन्ध मानवीय करूणा से जोड़ती है। रेखा चमोली ने इसका प्रमाण अपनी कविता ‘गणेशपुर की स्त्रियाँ’ में प्रस्तुत किया है। इस कविता का सन्दर्भ है सोलह एवं सत्रह जून 2014 में उत्तराखण्ड में आया हुआ प्रलयकाण्ड, जिसने भीषण त्रासदी उपस्थित कर दी थी। उस संकट की घड़ी में गणेशपुर की स्त्रियों ने मुसीबत में फंसे लोगों की मदद यथाशक्ति की थी। रेखा चमोली ने ठीक कहा है- ‘‘पर सब काम छोड़/ मुसीबत में फँसे लोगों के लिए सड़क पर चूल्हा जलाने का साहस/ हर किसी के बस की बात नहीं/ अजब-गजब हैं गणेशपुर की स्त्रियां/ अजब-गजब है उनकी पुष्पा दी।‘‘ उदारीकरण के दौर में सरकारी मिलें धीरे-धीरे बन्द हो रही हैं। अथवा उन्हें बेचा जा रहा है। बन्द मिलों की जमीन का उपयोग किस प्रयोजन के लिए किया जाएगा। यह बात शम्भु यादव से छिपी हुई नहीं है। उन्होंने इसका कारण अपनी कविता कपड़े की पुरानी मिल में तलाशा है। कविता की शुरूआत होती है इस पंक्ति से- ‘‘सब चीजों को समतल किया जा चुका है/ केवल अब चिमनी बाकी रह गई है।‘‘ अब वह पुरानी सपाट मैदान बन चुकी है। कवि चाहता है कि वह सपाट मैदान बच्चों के लिए खेल का मैदान बन जाए। इसलिए वह कहता है-‘‘ लेकिन मैं कह दूं अपनी भी/ बच्चे खेलते हैं जिस मैदान में/ रहे खेलने का मैदान ही/ नहीं तो जैसा कि बच्चों में बिराजी है सबसे बड़ी इच्छा/ ललचाई लपलप पर/ अपनी किल्लियां गाड़ देते हैं बच्चे।‘‘ (शुक्रवार साहित्य वार्षिकी, सन् 2014, पृष्ठ-197) इस प्रकार शम्भु यादव ने बच्चों की जिद के माध्यम से प्रतिरोध की भावना सादगी से व्यक्त की है।

कविता मनुष्यभाव की रक्षा करती है। आज का युवा कवि स्वयं को व्यापक सन्दर्भों से जोड़कर पर्यावरण के प्रति भी अपनी चिन्ता व्यक्त करता है और साथ ही साथ शोषित मानव के प्रति भी। युवा कवि रजत कृष्ण को जितनी चिन्ता पेड़, पवन, पानी और आग के प्रति है उतनी ही फिक्र अम्बानी के सपनों में पल रहे इस देश के प्रति भी है।- ‘‘यहां/ कुछ चीजें हैं कि/ कभी नहीं बदलीं/ कभी नहीं सुधरीं/ जैसे कि/ फगनू राम गोंड की/ हड़ियल काया में लटक रही/ यह कमीज/ जो फटी है/ वो अब तक/ सिली-तुनी ही न जा सकी/ फगनू राम की/ कमीज का फटापन/ और राम प्रकाश की चप्पल की घिसटन/ हर सरकार को/ दिखती है/ इन्हें बदलने और/ सुधारने की बाते भी/ हर सरकार करती है/ पर किसी भी सरकार के लिए/ कहे हुए को/ पूरा करना/ अब कोई जरूरी तो नहीं रहा/ और टाटा-बिड़ला से/ होते-हुआते/ अम्बानी के सपनों में/ पल रहे इस देश में/ फगनू राम गोंड/ और राम प्रकाश सिंह/ सरकार को/ एक वोट के सिवा/ आखिर देते ही क्या हैं।‘‘ (छत्तीस जनों वाला घर, पृष्ठ-88,89,90) इस कवितांश में प्रश्नात्मक शैली के द्वारा कवि ने आजादी से आज तक के भारतीय लोकतंत्र की असलियत उजागर कर दी है कि अभी तक हमारे समाज में एक भी बुनियादी बदलाव नहीं आया है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है कि कविता मनुष्य कों स्वार्थ संकुचित घेरे से बाहर निकालकर मनुष्यता की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठित करती है। इस सन्दर्भ में रामदरश मिश्र की कविता हाथ पठनीय है। कवि रामदरश मिश्र अपने सीधे हाथ की प्रशंसा करते हुए अचानक एक अपरिचित जन का जला हाथ देखकर उससे उसका कारण पूछते हैं। वह पहले मौन रहता है। फिर अपनी बात कहता है- ‘‘वह चुप रहा/ और शायद मेरी चिकनी हथेलियां देखता रहा/ फिर धीरे-धीरे अपने दोनों हाथ फैला दिए/ वे झुलसे थे।‘‘ वह बोला- ‘‘मैंने एक जलते हुए मकान में से/ एक बच्चे को बचाया था/ फिर अस्पताल में पड़ा रहा।‘‘ (बारिश में भीगते बच्चे) कविता का यह अंश पढ़कर पाठक महसूसता है कि मानो कवि स्वयं अपने सीधे हाथ पर व्यंग्य कर रहा है। पूरी कविता के पाठ के बाद पाठक की सारी सहानुभूति उस अनाम व्यक्ति के जले हुए हाथ के प्रति व्यक्त होने लगती है। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने भी हाथ पर कविता लिखते हुए कहा है- ‘‘उसका हाथ/ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/ दुनिया को/ हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए।‘‘ (जमीन पक रही है) । डा0 सिंह की लघु कविता मात्र सामान्य कथन है, जबकि मिश्र जी की कविता क्रियाशीलता से पाठक के मानस में संवेदना जगाती है। अतः हम कह सकते हैं कि अच्छी कविता की पहचान क्रियाशीलता है। जिन कविताओं में जीवन की क्रियाओं की सक्रियता होती है, वे हमें आकृष्ट करती हैं। युवा कवि जितेन्द्र कुमार अपनी रचना कविता लिखने का वक्त में कहते हैं- ‘‘दूर पूर्वी छोर पर जहां/ चूमता है अम्बर अवनी को/ अरूणाभ क्षितिज/ दे रहा संकेत/ नए दिवस के आरम्भ का/ सूरज दस्तक दे रहा शहर के किबाड़ पर/ कविता लिखने का वक्त है ये।‘‘ (समय का चन्द्रमा, पृष्ठ-8) तात्पर्य यह है कि मानव की क्रियाशीलता से कविता में प्राणों का संचार होता है। भावबोध के साथ-साथ इन्द्रियबोध की भी अभिव्यक्ति होती है। इसके विपरीत क्रियाशीलता से रहित कविताएं प्रायः निष्प्राण हुआ करती हैं।

हमारा समकालीन समाज इतना अधिक बेरहम और बेदर्द है कि उसने हमदर्दी लगभग त्याग दी है। वह शराफत का मुखौटा लगाकर भ्रम से लोगों को ठगा करता है। यही कारण कि आज के समाज में हर बेरोजगार नौजवान परेशान दिखाई पड़ता है। वह स्वयं अपने आप से पूछता है -‘‘ सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है/ इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है/ क्या कोई नई बात नजर आती है हममें/ आईना हमें देखकर हैरान सा क्यों है।‘‘ वास्तव में यह हैरानी और परेशानी आर्थिक विषमता की देन है। अब ये क्रूर वास्तविता उजागर हो गई कि हमारे देश के नौजवानों का भविष्य उनके हाथों में नहीं है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों में है। निजी संस्थानों के हाथों में हैं। साम्राज्यवादी पूंजी के हाथों में है। आजकल हर हिन्दुस्तानी रग्घू रेहन पर रखा हुआ है। इस वास्तविकता की ओर केशव तिवारी ने संकेत करते हुए कहा है- ‘‘यूं तो हर रोज की तरह/ गुजर जाती है शाम/ आज कुछ देर मेरे पास से/ गुजरते हुए ठहर गई/ गांव का आखरी जानवर/ खूंटे पर लौट आया है/ और पहला दिया जल चुका है/ एक नीम अंधेरे में हम/ खोज रहे हैं अपना चेहरा/ हम एक पल को भूल गए थे/ हमारे चेहरे तो कहीं और/ रेहन पर रखे हुए हैं/ एक थकी शाम के धुंधलके में/ दो लापता चेहरे/ एक दूसरे का पता दे रहे थे।‘‘ (समकालीन सरोकार, अगस्त-अक्टूबर, 2013)
अब सवाल यह है कि ऐसी भयंकर अंधियारी रात में विवेकी कवि ज्ञान के प्रकाश से जीवन- पथ कैसे आलोकित करे। इस सन्दर्भ में ज्ञानेन्द्रपति का कहना है- ‘‘दुनिया को धुनिया चाहिए एक/ सब कुछ को जो धुन कर रख दे/ कबीर सा जोलाहा, धुन का पक्का/ उधेड़े फिर बुनकर रख दे।‘‘ तो वर्तमान समाज के लिए कबीर जैसे प्रखर कवि की आवश्यकता है, जो सच को सच कह सके। आजकल जीवन का सच छिपाया जा रहा है। विशेष रूप से मीडिया उसे जनता के सामने लाता ही नहीं है। अतएव समाज को जागरूक करने के लिए जनपक्षधर पत्रिकाओं की आवश्यकता है, जो हमारे लोकतंत्र की पोल खोल सकें। लेकिन पद, पुरस्कार और प्रतिष्ठा के लालच से कवि तल्ख बातें लिखने से बचते हैं। गिने-चुने कवि ऐसे हैं, जो सच को सच कहने का साहस करते हैं। नरेश सक्सेना ने बढ़ती हुई सांप्रदायिकता को दृष्टिगत रखते हुए ईश्वर के बारे में बड़ी तल्ख टिप्पणी की है। उनका कहना है- ‘‘निराकार नहीं है वो/ पर किसी बात पर जबाव नहीं उसके पास/ क्योंकि सब कुछ उसका किया धरा है/ दरअसल मुंह दिखने काबिल/ अब वो रहा ही कहां।‘‘ (विपाशा, सन् 2006,पृष्ठ-73)

यह तल्ख वास्तविकता है कि आजकल भगवान और ईश्वर के नाम पर, अल्लाह और खुदा के नाम पर, राम और रहीम के नाम पर, गॉड के नाम पर बेगुनाहों का खून बेवजह बहाया जाता है। अपने-अपने ईश्वर और अल्लाह की रक्षा के लिए। भारत में बढ़ता हुआ सांप्रदायिक तनाव इस बात का प्रमाण है। और आतंकवाद का प्रकोप भी, जो अमरीकी साम्राज्यवाद की उपज है। ऐसी विषम परिस्थतियों में हिन्दी के जागरूक कवियों का कर्तव्य है कि वे जनवादी जीवनदृष्टि से वर्तमान समय की परिघटनाएं देखें-समझें और परखें। घटनाएं क्यों घटित हो रही हैं, उनका कारण बताएं। इसीलिए आज का कवि अपनी कलम को संबोधित करते हुए कहता है- ‘‘मैं तुम्हें/ अजर अमर नहीं बनाना चाहता/ न चाहता/ तख्त पे सजाना/ मै तो चाहता हूं कि तुम/ वर्ग चेतस द्वन्द्व सांसों में/ बसी होकर/ स्पंदित होती रहो।‘‘ (अलीक, कबीर राग)

अन्त में हम यह उचित समझते है कि समकालीन युवा कविता की कुछ कमियों की ओर संकेत किया जाए। आज का युवा कवि निराला के मुक्त छन्द का प्रयोग नहीं कर रहा है। इसलिए उसकी कविता में लयात्मकता का अभाव है। आवेग की कमी है। गद्यात्मकता की अधिकता है। व्यापक जीवन के विभिन्न अनुभवों का अभाव है। संघर्षशील और क्रियाशील जनों के चित्र उनकी कविताओं में कम लक्षित हो रहे हैं। अधिकतर कविताएं निजी अनुभवों तक सीमित हैं। उनमें वस्तुपरकता और आत्परकता के सामंजस्य का अभाव है। कोई भी समर्थ कवि अपनी परम्परा से जुड़े बिना श्रेष्ठ रचना की सृष्टि नहीं कर सकता है। यदि आदि कवि वाल्मीकि न होते तो क्या साहित्य मे राम-कथा की परम्परा होती। यह सत्य है कि आज का कवि आज के जीवन की बात कहेगा। लेकिन उसके कहने का ढंग निजी होना चाहिए। अपनी निजता की पहचान के लिए उसे जनपदीय जीवन से जुड़ना होगा। वहां के लोगों को अपनी कविता मे उपस्थापित करना होगा। लोगों की बोली-बानी के शब्दों का समावेश अपनी भाषा में करके उनके जीवन संघर्ष का निरूपण करना होगा। कविता में मौलिकता आसमान से नहीं टपकती है। उसका समावेश होता है लोक जीवन के पर्यवेक्षण से। यही कारण है कि हिन्दी कविता की मुख्य धारा लोकधर्मी है। अमीर खुसरो से आज के कवि विजेन्द्र तक। अतः युवा कवियों का यह कर्तव्य है कि यह मुख्य धारा निरंतर अग्रसर करते रहें।
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