औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Saturday, 5 January 2019

हिंदी व्यंग्य साहित्य परिक्रमा 2018


लेखा-जोखा
राहुल देव


हिंदी साहित्य में ‘व्यंग्य’ एक उपेक्षित लेकिन लोकप्रिय विधा रही है | हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों ने इसे हाशिये से उठाकर मुख्यधारा में ला खड़ा किया | हिंदी व्यंग्य के जिस आधुनिक स्वरुप के दर्शन आज हमें होते हैं वह वह व्यंग्य की समृद्ध परम्परा हमें सौंपती है और जिसे बचाए रखने की हमारे नए-पुराने व्यंग्यकारों पर बड़ी ज़िम्मेदारी है | हर वर्ष की तरह इस साल भी तमाम व्यंग्य उपन्यास और संकलन प्रकाश में आये हैं | इस आलेख में प्रस्तुत उनमें से प्रमुख किताबों का लेखा-जोखा इसी बात की पड़ताल करता है |

व्यंग्य समय सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी व्यंग्य-जगत के प्रमुख व्यंग्यकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है। इस सीरीज़ के अंतर्गत शीर्षस्थ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि व्यंग्यकथाओं को सुशील सिद्धार्थ के कसे हुए संपादन में प्रस्तुत किया गया है | इसके माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई के प्रतिनिधि व्यंग्यों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे। उनके चर्चित व्यंग्य संग्रह ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ का नया संस्करण राजकमल प्रकाशन ने इस साल प्रकाशित किया है | परसाई को राजनीतिक व्यंग्य के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है लेकिन इस संग्रह में उनके सामाजिक व्यंग्य ज़्यादा रखे गए हैं। इन्हें पढ़कर पाठक सहज ही जान सकता है कि सिर्फ राजनीतिक विडम्बनाएँ ही नहीं, समाज ने जिन दैनिक प्रथाओं और मान्यताओं को अपनी जीवन-शैली माना है, उनकी खाल-पर छिपे पिस्सुओं को भी वे उतने ही कौशल से देखते और झाड़ते हैं।

राजकमल ने श्रीलाल शुक्ल के कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ का 32वां संस्करण भी इसी वर्ष प्रकाशित किया है | यह एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत्त करता है | शुरू से आखिर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिंदी का शायद यह पहला वृहत उपन्यास है | इस उपन्यास का की कथाभूमि एक बड़े रूपक की तरह से है जिसका सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँव की जिंदगी से है, जो इतने वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्त्वों के सामने घिसट रही है | यह उसी जिंदगी का दस्तावेज है |

समकालीन व्यंग्यकार : आलोचना का आईना युवा आलोचक राहुल देव के संपादन में आया लेख संकलन है | संपादक द्वारा समकालीन समय के 12 चयनित व्यंग्यकार और 12 चयनित आलोचक इसके केंद्र में हैं | अपनी तैयारी में अलग ढब की इस पुस्तक में व्यंग्यकार इसके बिम्ब हैं और आलोचक इसके प्रतिबिम्ब | दोनों ने एक दूसरे की दृष्टि से नितांत विलग रहते हुए अपना अपना पक्ष रखा है जिसे पढ़ना पाठकों के लिए भी एक दिलचस्प अनुभव होगा | इसे दिल्ली के यश पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है | समकालीन समय के शीर्षस्थ व्यंग्यकार डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का बहुप्रतीक्षित उपन्यास ‘पागलखाना’ भी इस वर्ष राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है | बाजारवाद पर केन्द्रित उनका यह उपन्यास दिनोंदिन कठिन होते जा रहे बाज़ार के आगे बिछ चुके भयानक समय की कथा कहता है | ज्ञान जी के साथ राहुल देव ने एक बड़ी अच्छी और लम्बी बातचीत भी की है जिसे रश्मि प्रकाशन लखनऊ ने ‘साक्षी है संवाद’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित किया है | ‘शरद परिक्रमा’ तथा ‘और शरद जोशी’ शीर्षक से राजकमल प्रकाशन ने इस साल शरद जोशी पर दो महत्वपूर्ण किताबें भी प्रकाशित की हैं | शरद परिक्रमा बीसवीं शताब्दी के पाँचवें दशक में नई दुनियामें प्रकाशित उनके व्यंग्य-कॉलम परिक्रमामें छपी व्यंग्य-रचनाओं का संकलन है |

‘राग दरबारी’ की परम्परा में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ ‘मदारीपुर जंक्शन’ युवा लेखक बालेन्दु द्विवेदी का पहला उपन्यास है | अपने रोचक कथ्य-भाषा और शिल्प के कारण यह उपन्यास चर्चा बटोरने में सफल रहा | एक लंबे अंतराल के बाद एक ऐसा उपन्यास पढ़ने को मिला जिसमें करुणा की आधारशिला पर व्यंग्य से ओतप्रोत और सहज हास्य से लबालब पठनीय कलेवर है। कथ्य का वक्रोक्तिपरक चित्रण और भाषा का नव-नवोन्मेष, ऐसी दो गतिमान गाड़ियाँ हैं जो मदारीपुर के जंक्शन पर रुकती हैं। जंक्शन के प्लेटफार्म पर लोक-तत्वों के बड़े-बड़े गट्ठर हैं जो मदारीपुर उपन्यास में चढ़ने को तैयार हैं। ‘साहित्य उपक्रम’ से आया विष्णु नागर का व्यंग्य संग्रह ‘सदी का सबसे बड़ा ड्रामेबाज’ इस किताब के कुछ व्यंग्य निश्चित तौर पर काफी गुदगुदाते हैं | राजनीतिक विषयों पर साफ-सुथरे हास्य के साथ कही गई बातें कहीं चोट करती हैं, तो कहीं सोचने पर मजबूर कर देती हैं, कहीं सवाल पैदा करती हैं, तो कहीं चुटकी लेती हुई सामने आती हैं | व्यक्ति से लेकर व्यवस्था तक कुछ भी नागर जी की पैनी नजर से बचा नहीं है |

हिंदी में महिला व्यंग्य लेखिकाओं की संख्या में अब इजाफा हो रहा है | इस वर्ष उनके व्यंग्य संग्रहों की बात करें तो रुझान पब्लिकेशन से इन्द्रजीत कौर का व्यंग्य संग्रह ‘पंचरतंत्र की कथाएं’, रेडग्रेब बुक्स से शशि पुरवार का ‘व्यंग्य की घुड़दौड़’ और कोर प्रकाशन से वीना सिंह का ‘बेवजह यूँ ही’ प्रकाशित हुए | अर्चना चतुर्वेदी के सम्पादन में व्यंग्य लेखिकाओं का व्यंग्य संकलन 'लेडीज डॉट कॉम' इसी साल प्रकाशित हुआ।

पत्रिकाओं के व्यंग्य केन्द्रित विशेषांकों की बात करें तो इस वर्षलमही का ज्ञान चतुर्वेदी विशेषांक तथा व्यंग्य यात्रा का यज्ञ शर्मा विशेषांक आये | यह दोनों अंक इन रचनाकारों को नजदीक से जानने के लिए काफी प्रचुर सामग्री उपलब्ध कराते हैं |

‘सेल्फी बसन्त के साथ’ कमलेश पांडेय का व्यंग्य संग्रह इस साल रुझान पब्लिकेशन से आया | बैंकिंग जगत की सच्चाइयों की पोल खोलता वेद माथुर का हास्य-व्यंग्य उपन्यास ‘बैंक ऑफ़ पोलमपुर’ टिनटिन पब्लिकेशन से आया | रश्मि प्रकाशन से ब्रजेश कानूनगो का व्यंग्य संग्रह ‘मेथी की भाजी और लोकतंत्र’ छपा | वनिका पब्लिकेशन से डॉ सुशील सिद्धार्थ और डॉ नीरज शर्मा के सम्पादन में ‘व्यंग्यकारों का बचपन’ अनूपमणि त्रिपाठी के संपादन में आया ‘व्यंग्य प्रसंग’ 29 युवा व्यंग्यकारों के व्यंग्यों का संकलन है | अमन प्रकाशन कानपुर से सुशील सिद्धार्थ और राहुल देव के संपादन में युवा व्यंग्यकारों को साथ लेते हुए ‘नए नवेले व्यंग्य’ व्यंग्य संकलन निकाला | इसके अतिरिक्त अन्य उल्लेखनीय व्यंग्य संग्रहों की बात की जाए तो उनमें सुरेश कांत का ‘कुछ अलग’, सुशील सिद्धार्थ का ‘राग लंतरानी’, अरविन्द खेड़े का ‘हरपाल सिंह का लोकतंत्र’, शशांक दुबे का ‘असल से तो नकल अच्छी’, सुनील जैन का ‘बारात के झम्मन’, आलोक पुराणिक का ‘जूते की ईएमआई’, राजेश कुमार का ‘मेरी शिकायत यह है कि’, अरुण अर्नव खरे का ‘हैश टैग और मैं’, आशीष दशोत्तर का ‘मोरे अवगुन चित में धरो’, सुरेश अवस्थी का ‘दशानन का हलफनामा’, निर्मिश ठाकर का ‘निर्मिशाय नमः’ आदि रहे |

गुणवत्ता की दृष्टि से पत्र-पत्रिकाओं में उसकी चमक थोड़ी फीकी कही जा सकती है | अधिकांश व्यंग्य लेखकों में स्तंभों/ कालमों में छपने की जल्दबाजी तथा व्यंग्य लेखन के लिए जरुरी साहस और गहरी व्यंग्यदृष्टि का अभाव वहां देखने को मिला | कुल मिलाकर व्यंग्य साहित्य के लिए यह वर्ष मिलाजुला रहा |

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9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203
मो. 09454112975

Sunday, 16 December 2018

स्त्रियों की चीत्कार : दर्दज़ा



आशीष
(शोधार्थी)पीएच.डी हिंदी
नागालैंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, कोहिमा
मो. नंबर- 9540176311
ईमेल- chunashish@gmail.com

खतना आमतौर पर पुरूषों का किया जाता है। यह मुस्लिम धर्म में 'पाकी' के नाम पर किया जाता है, जिसे वैज्ञानिकों के द्वारा भी इस आधार पर लाभदायक बताया गया है कि इसके द्वारा कई खतरनाक बीमारियों से बचा जा सकता है। वहीँ स्त्रियों के खतना या यूँ कहें सुन्नत प्रथा का बेहद क्रूर,दर्दनाक और अमानवीय चेहरा प्राचीन रिवाज के रूप में अफ्रीका महाद्वीप के मिस्र, केन्या, यूगांडा, जैसे लगभग 30 देशों में यह परम्परा आज भी मौजूद है। सबसे पहले इस प्रथा का विवरण रोमन साम्राज्य और मिस्र की प्राचीन सभ्यता में मिलता है। मिस्र के संग्रहालयों में ऐसे अवशेष रखें हैं जो इस प्रथा की पुष्टि करते हैं। उत्तरी मिस्र को अपनी उत्पत्ति का मूल स्रोत मानने वाले एक समुदाय विशेष के लोग महिला खतना को अपनी परम्परा और पहचान मानते हैं। यही वजह है कि पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में स्त्रियों का खतना करने का रिवाज आज भी जारी है। यूनीसेफ के आंकड़ों के अनुसार खतना या सुन्ना के कारण महिला जननांग को विकृत करने की यह अमानवीय प्रथा अफ्रीका और मध्यपूर्व के 29 देशों में प्रचलित है और आज विश्व में ऐसी 20 करोड़ महिलाएं हैं जिनका खतना किया गया है।

यह प्रथा विशेषकर बोहरा मुस्लिम समुदाय में है, जिसमें फीमेल जेनिटल अंग को बचपन में ही काट दिया जाता है। दरअसल वह अंग ही स्त्री की मासिक धर्म और प्रसव पीड़ा को कम करता है। इस भयावह क्रिया के अंतर्गत बच्ची के हाँथ-पैर कुछ औरतें पकड़तीं हैं और एक औरत चाकू या ब्लेड से उसकी भगनासा (क्लाइटोरल हुड) काट देती है। खून से लथपथ बच्ची महीनों तक दर्द से तड़पती रहती है। कई बार इस से बच्चियों की मौत भी हो जाती है। इस प्रथा के पीछे की वजह भी हास्यास्पद है जहाँ, अफ्रीका में युवा लड़कियों की शादी तभी होती है,अगर उन्होंने बचपन में खतना करवाया होता है, क्योंकि वहां पर लड़कियों का खतना ही उनके कुंआरे और पवित्र होने का प्रमाण माना जाता है। लड़कियों का खतना करने के पीछे एक संकीर्ण पुरुषवादी मानसिकता जिम्मेदार है ताकि वो लड़की युवा होने पर अपने प्रेमी के साथ यौन संबंध न बना सके।

सघन संवेदनात्मकता और चुनौतीपूर्ण कथाविन्यास के कारण समकालीन कथाजगत में सार्थक हस्तक्षेप करने वाली जयश्री रॉय भूमंडलीकरण के दौर के बाद वाली कथा-पीढ़ी की एक सुपरिचित कथाकार हैं। `अनकही', `तुम्हें छू लूँ जरा', `खारा पानी' और `कायान्तर' नामक चार कथा-संग्रहों तथा `औरत जो नदी है', `साथ चलते हुये', ‘दर्दज़ा’ और `इकबाल' शीर्षक उपन्यासों के बीच फैला उनका रचना-संसार स्त्री-पुरुष संबंधों में व्याप्त जटिलताओं को तो बारीकी से विश्लेषित करता ही है, समय और समाज के हाशिये पर जीने को अभिशप्त लोक-समूहों के जीवन-संघर्ष और स्वप्नों को भी एक सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

सुपरिचित कथाकार जयश्री रॉय के चौथे और नवीनतम उपन्यास दर्दजा के केंद्र में मुस्लिम स्त्रियों का वह शारीरिक एवं मानसिक दर्द है जिसे वे दशकों से झेलती आ रही हैं| दर्दजा उपन्यास में जयश्री रॉय नयी सौन्दर्य दृष्टि के लिए संघर्ष करती हैं। इस दृष्टि का संबंध केवल अश्वेत प्रजाति के रूप-रंग-व्यवहार से मान लेना ठीक नहीं होगा। उस जीवन की पतनोन्मुखता विश्लेषणों के बीच से श्रम से सँवरते मामूली जीवन की अनेक छवियों को रचते हुए लेखिका उस पूरे परिवेश को हमारे परिचित आत्मीय क्षेत्र में बदल देती है। खानाबदोश जीवन की विशेषताएं वैसी ही सहजता के साथ इस उपन्यास में दर्ज है। जयश्री राय ‘दर्दज़ा’ के माध्यम से अपने पाठकों के सम्मुख दर्द की उस दास्तान को जिंदा कर देती है जिसे देखकर ही शायद शेक्सपीयर याद आते हैं कि नरक खाली हो गया है और सभी शैतान इसी लोक में आ गए हैं।

सुन्नत विभिन्न देशों व समाजों में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे- इथोपिया में फालाशास, ईजिप्ट में ताहारा, सूडान में ताहुर, माली में बोलोकोली (पवित्र करना), ककिया में बुनडू आदि। यह सर्वविदित है कि मुस्लिमों में खतना होता है परन्तु ‘दर्दज़ा’ पुस्तक में मुस्लिम स्त्रियों के सुन्नत की जीवंत झांकी प्रस्तुत की गयी है जो कि बहुत ही वीभत्स तरीके से किया जाता है। भले ही यह कथा हमारे देश भारत की नहीं है लेकिन इस उपन्यास में बहुत सारी कष्टकारी स्थितियां ऐसी हैं जिसे विदेशी मुस्लिम महिला के समान ही हमारे देश की तमाम महिलाओं को झेलना पड़ता है चाहे वे किसी भी धर्म की ही क्यों न हो।

अभय कुमार दुबे के अनुसार, जयश्री रॉय की कृति दर्दजाके पृष्ठों पर एक ऐसे संघर्ष की ख़ून और तकलीफ़ में डूबी हुई गाथा दर्ज है जो अफ़्रीका के 28 देशों के साथ-साथ मध्य-पूर्व के कुछ देशों और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ जातीय समुदायों की करोड़ों स्त्रियों द्वारा फ़ीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (एफ़जीएम या औरतों की सुन्नत) की कुप्रथा के ख़िलाफ़ किया जा रहा है। स्त्री की सुन्नत का मतलब है उसके यौनांग के बाहरी हिस्से (भगनासा समेत उसके बाहरी ओष्ठ) को काट कर सिल देना, ताकि उसकी नैसर्गिक कामेच्छा को पूरी तरह से नियंत्रित करके उसे महज़ बच्चा पैदा करने वाली मशीन में बदला जा सके[1]

इस उपन्यास के केंद्र में एक गरीब मुस्लिम परिवार है जिसमें तमाम बच्चे पैदा हुए- कुछ मरे, कुछ जीवित रहे। उसी परिवार में माहरा भी है। माहरा की बड़ी बहन का जब सुन्नत होता है और घर से बाहर एक झोपड़ी में महीना भर घाव सुखाने के लिए रखा जाता है तब माहरा अच्छे से इस प्रक्रिया को समझ नहीं पाती है। इस दौरान महीने भर घाव सुखाने हेतु अलग झोपड़ी में रखा जाता है, जिसमें से बहुत कम ही लड़की स्वस्थ घर लौट पाती है क्योंकि, सुन्नत की प्रक्रिया के बाद अधिकांश लड़कियाँ हथियार के संक्रमण या सही उपचार की कमी के कारण मर जाती हैं या दीर्घावधि तक झेलती रहती हैं। कुछ का तो मुत्रद्वार हमेशा-हमेशा के लिए ख़राब हो जाता है जिसके कारण पेशाब को रोकना असंभव हो जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप वे हमेशा बदबू देती रहती हैं। ऐसी स्त्रियों को घर, परिवार और गाँव से बहार निकाल दिया जाता है और उसे पागल घोषित कर दिया जाता है। इसी तरह की एक स्त्री-पात्र के माध्यम से लेखिका समाज को धिक्कारती है- ...करे कोई और भरे कोई! बदबू आती है मुझसे? घिन आती है? आने दो! मेरे तो शरीर से बदबू आती है, लेकिन तुम सबके रूह से बदबू आती है, तुम सबके सब सड़ गए हो.....कीड़े पर गये हैं तुम सबमें...[2]

उपन्यास की शुरुआत अपने आसन्न सुन्नत की बात सुनकर माहरा के घर से भाग जाने की घटना से होती है| तपते रेगीस्तान के बीहड़ की भीषणताओं के बीच वह अपने बंधु-बांधवों द्वारा पकड़ ली जाती है, नतीजतन वह फिर से अपने घर लाई जाती है और उसका सुन्ना कर दिया जाता है| सुन्ना के दौरान और उसके बाद माहरा अथाह पीड़ा की अंतहीन श्रृंखलाओं से गुजरती है| लेकिन वह उन स्त्रियों में से नहीं है जो दर्द से समझौता कर के गाय-बकरियों की-सी निरीह और परवश ज़िंदगी जीने को ही अपनी नियति मान हमेशा-हमेशा के लिए खुद को व्यवस्था के हाथों सौप देती हैं| वह प्रतिरोध करना जानती है| प्रतिरोध में विफल होने के बावजूद फिर-फिर उठ खड़ा होने का हौसला रखती है| खुद के लिए देखे सपनों को अपनी बहन, बेटी और माँ सहित दुनिया की हर स्त्री की आँख में स्थानांतरित कर हमेशा के लिए उसे जिंदा रखना जानती है| स्त्री-जीवन की तमाम तकलीफ़ों से मुक्ति पाकर एक मनुष्य की तरह जीने का यह सपना माहरा ने खुली आँखों से देखा है और उसे हासिल करने के लिए प्रतिरोध से लेकर विद्रोह तक का हर जतन करती है|

धर्म चाहे जो भी हो सबमें कुछ न कुछ कुरीतियाँ हैं जिसके साथ तर्क-वितर्क करना धर्म के ठेकेदारों को कतई पसंद नहीं हैकोई धर्म तर्क-वितर्क पसंद नहीं करता। एक चीज हर जगह देखने को मिलती है कि धर्म व रीती-रिवाजों के नाम पर स्त्रियों के मन-मस्तिष्क में ऐसा गोबर भर दिया जाता है कि स्त्री ही स्त्री का शोषक बन जाती है| ‘दर्दज़ा’ उपन्यास में लेखिका कहती हैं- लोगों की आँखों में मजहब, रीती-रिवाजों का ऐसा पर्दा पड़ा है कि वे कुछ तार्किक ढंग से सोच ही नहीं पाते।[3] कुछ लड़कियों के द्वारा सुन्ना के बारे में पूछने पर साबीला की दादी कहती हैं- औरत का जिस्म ही पाप का गढ़ है। जहाँ इच्छाएं जन्मती हैं, उत्तेजना पैदा होती है उस हिस्से को शरीर से अलग कर देना ही भला। औरत खता की पुतली होती हैं, हव्वा की बेटियां......इनका भरोसा क्या फिर जिस औरत का सुन्ना न हुआ हो, उसे कौन मर्द अपनायेगा, कैसे उसे भरोसा होगा कि इस औरत ने कोई गुनाह नहीं किया!... जवाब में एक लड़की बोली..क्यों मर्दों को तो यह साबित नहीं करना पड़ता कि वह कुँवारा है या नहीं।[4] वास्तव में उपन्यास में उद्धृत ये पंक्तियाँ, मुस्लिम युवतियों के उस दर्द को बयाँ करती है, जिसे वो न जाने कितनी पीढ़ियों से भोगने को अभिशप्त हैं| धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांड के नाम पर जारी यह क्रूरतम अमानवीय कुप्रथा दरअसल स्वच्छता के आवरण में यौन शुचिता और शारीरिक पवित्रता की पितृसत्तात्मक साज़िशों का नतीजा है, जो स्त्री देह और उसकी यौनिकता को अपनी संपत्ति मानती है।

माहरा जहीर की संभवतः चौथी बीबी बन के जाती है। सम्भोग करने के दौरान माहरा चिल्ला उठी जैसे लगा उसके भीतर कोई खूंटा ठोक दिया हो और अब प्राण नहीं बचेंगे, क्योंकि अभी उसके गुप्तांग का उचित विकास भी नहीं हुआ था, लेकिन इधर जहीर मुस्कुरा रहा था और गर्व महसूस कर रहा था जैसे किला फतह किया हो। इसके बाद वह बाहर चला जाता है और माहरा तड़पते हुए कब सो गयी या बेहोस हो गयी पता ही नहीं चला। सुबह जब उसे जगाया गया तो देखा कि कमरे में माँ सहित कई औरतें बिस्तर पर गिरे खून को देख कर बधाईयाँ दे रही हैं। माहरा बाद में उस घर में जो अनुभव करती है -मेरे औरत होने ने मुझे खत्म कर दिया है जैसे मैं खुद को ढ़ोती हूँ और प्रतिपल जीने की कोशिश में मरती हूँ. जाने क्यों इस दुनिया के बाशिंदों ने जीवन को मृत्यु का पर्याय बनाकर रख दिया है| मौत से पहले भी मौत! एक बार नहीं, कई बार.....बार-बार![5] इस उपन्यास में दर्द जिस सघनता के साथ अभिव्यंजित हुआ है, ऐसा अन्यतम उदाहरण मिलना मुश्किल है| जयश्री रॉय ने स्त्रियों के खिलाफ होने वाले इस अत्याचार की भीषण यातना को उसी अंतरंग आत्मीयता और मारक प्रभावोत्पादकता के साथ दर्दजा में पुनर्सृजित किया है| यह उपन्यास इस अमानवीय त्रासदी के खिलाफ एक समर्थ और मानीखेज विद्रोह और प्रतिरोध की आवाज़ के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है|

प्रसिद्ध तेलुगू लेखक तापी धर्माराव की चर्चित पुस्तक इनपकच्चडालु, जिसका हिन्दी अनुवाद डॉक्टर सी वसन्ता ने लोहे की कमरपेटियाँ शीर्षक से किया है, में तेलुगू की एक लोकोक्ति का उल्लेख किया गया है -  मुद्र मुद्र लगाने उंदि मुगुशुरु पिल्ललनि कन्नदि यानी, मुहर ज्यों की त्यों है, और वह तीन बच्चों की माँ बन गई|
‘दर्दज़ा’ महीन संवेदनात्मक बुनावट का उपन्यास है| संवेदना का रस इसके रग-रेशे में नमक और चीनी की तरह घुला हुआ है| इस उपन्यास के कथात्मक विस्तार को मोटे तौर पर तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है: पहला हिस्सा माहरा के सुन्ना-प्रसंग से शुरू होकर उसकी शादी तक का है तो दूसरा हिस्सा उसके ससुराल जाने से लेकर उसकी माँ की मृत्यु तक का| तीसरा हिस्सा माहरा की बेटी मासा के दस साल की होने के बाद से लेकर उसकी मुक्ति तक यानी उपन्यास के अंत तक का है| इन तीनों पड़ावों के बीच मुख्य कथा के समानान्तर घटित होने वाली छोटी-बड़ी कई महत्वपूर्ण घटनाएँ और इस क्रम में पात्रों के आपसी सम्बन्धों का सघन संजाल है जो संरचना के स्तर पर इसे एक मजबूत औपन्यासिकता प्रदान करता है| दर्दज़ा की विशेषता इस बात में नहीं कि यह स्त्री खतना संबंधी तकलीफ़ों को बहुत संवेदनशीलता से दर्ज करता है बल्कि इसकी विशेषता इस बात में निहित है कि यह धार्मिक आडंबरों और कर्मकांड की आड़ में समूर्ण स्त्री समाज पर आरोपित पितृसत्तात्मक आचार संहिताओं का प्रतिरोध करते हुये उसे हर कदम पर चुनौती देता है |

संक्षेप में, परकाया प्रवेश की विलक्षण लेखकीय क्षमता और संवेदना की सघनतम तीव्रता के संयुक्त रसायन से निर्मित दर्दजा का प्रभाव इतना सूक्ष्म और मारक है कि वह किसी पाठक के आलोचकीय विवेक को लंबे समय तक अपने गिरफ्त में ले सकता है| उपन्यास में व्यंजित स्त्रियों की तकलीफ पाठकों के लिए इस कदर अपनी हो जाती है कि, इसे पढ़ते हुये पाठक को अपने स्थान और काल का भी भान नहीं रहता| नतीजतन अपने वजूद और लिंग से मुक्त हो वह कब खुद ही उपन्यास की मुख्य चरित्र माहरा में तब्दील होकर माशामें अपनी बेटीका चेहरा देखने लगता है, उसे भी पता नहीं चलता| पाठ के दौरान किसी पाठक को भोक्ता में तब्दील कर देना और कृति की चिंता को पाठक की निजी चिंता में बदल देना, इस उपन्यास एवं उपन्यासकार की सबसे बड़ी विशेषता है| जयश्री रॉय ने इस उपन्यास में पीड़ा से प्रतिरोध तक की संघर्ष यात्रा को कलात्मक रचनाधर्मिता के साथ पुनराविष्कृत किया है |

सन्दर्भ-सूची
1.      रॉय, जयश्री . (2016) . दर्दज़ा . नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन . प्रथम संस्करण . ISBN- 978-93-5229-266-0
3. बिहारी, राकेश . (फ़रवरी 26, 2017 ) . दर्दज़ा . समालोचन (ऑनलाइन पत्रिका) https://samalochan.blogspot.com/2017/02/blog-post_26.html




[1]  http://www.vaniprakashan.in/details.php?lang=H&prod_id=7847&title
[2] रॉय, जयश्री . (2016) . दर्दज़ा . नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन . पृष्ठ सं. 174
[3]रॉय, जयश्री . (2016) . दर्दज़ा . नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन . पृष्ठ सं. 77
[4] वही, पृष्ठ सं. 59
[5] रॉय, जयश्री . (2016) . दर्दज़ा . नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन . पृष्ठ सं. 60

Thursday, 16 August 2018

समकालीन व्यंग्य की चुनौतियां / डॉ अतुल चतुर्वेदी



समकालीन व्यंग्य इन दिनों संक्रमण के दौर से गुजर रहा है । संक्रमण के दौर से इसलिए क्योंकि वहां बहुत कुछ नया बन रहा है व्यंग्य के नए सर्जक आ रहे हैं और बहुत कुछ पुराने मिथ टूट भी रहे हैं । आखिर हो भी क्यों न व्यंग्य की विरासत यदि आप व्यंग्य के सही और वर्तमान स्वीकृत रूप में माने यानि की गद्य व्यंग्य की तो आज वो सन् 60 से लगभग आधी सदी की यात्रा तय कर चुकी है और पचास सालों में नदी से काफी पानी बह जाता है । इस समय व्यंग्य की लगभग पांच पीढ़ियां एक साथ काम कर रही हैं ।समकालीन व्यंग्य के समक्ष इस समय कई चुनौतियां हैं । ये चुनौतियां उसे कई तरफ से मिल रही हैं विधा के स्वरूप को लेकर उसकी आलोचना के मानदंडों को लेकर और इन सबसे ज्यादा लोकप्रियता के चलते उसमें हो रही भारी घुसपैठ को लेकर जिसने उस विधा में भारी भगदड़ सा माहौल बना दिया है । हम जानते हैं कि व्यंग्य इस समय की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है और राजनीतिक , सामाजिक , धार्मिक  परिस्थितियों के चलते उसके फलने फूलने की गुंजाइश भी काफी है । उसके सामने खुला मैदान पड़ा है , कच्चे माल की कमी नहीं है । पत्र पत्रिकाओं और सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार के चलते प्रकाशन के अवसर भी अनगिन हैं । यश और धन भी कम नहीं है कम से कम दूसरी विधाओं के चलते तो स्थिति संतोषजनक है ही । जाहिर है ऐसी स्थिति में किसी विधा में कई संकट और चुनौतियां खड़ी होनी ही हैं । व्यंग्य भी इन्ही समस्याओं और प्रश्नों से रूबरू हो रहा है । व्यंग्य को अपनी ये बेड़ियां स्वयं तोड़नी होंगी और इन प्रश्नों के उत्तर स्वयं ढूंढने होंगे व्यंग्य यूं भी किसी अवतारवाद में विश्वास नहीं करता है । वो तो मूर्तिभंजक है , किंगमेकर नहीं । वो परंपरा ध्वसंक है , मठध्वसंकर्ता है अनुगामी नहीं । लेकिन हम देख रहे हैं कि साहित्य की दूसरी विधाओ की तरह व्यंग्य में भी मठाधीशी शुरू हो गयी है । अपने अपने प्रिय रचनाकारों को लांच किया जा रहा है । दूसरे संभावनाशील व्यंग्यकारों को या तो अनदेखा किया जा रहा है या फिर उन पर जानबूझकर प्रश्न चिह्न लगाए जा रहे हैं । व्यंग्य के क्षेत्र में ऐसे स्वनामधन्य आलोचक घुस आए हैं जिनको व्यंग्य क्या साहित्य की बेसिक समझ तक नहीं है वो पूरे जोर शोर से अपनी ढपली पीट रहे हैं और पसंद नापंसद बता रहे हैं । व्यंग्य माना कि एक विद्रोही विधा है और व्यंग्यकार समाज के आलोचक लेकिन क्या किसी भी विधा में इतना अराजक माहौल ठीक है ? क्या व्यंग्य के लेखकों को मिल बैठकर और उसके समीक्षकों को कुछ आलोचना और विधागत न्यूनतम सहमति कार्यक्रम नहीं बनाना चाहिए कि किसे हम व्यंग्य कहेंगे और किसे नहीं ? व्यंग्य के नाम पर कूड़ा करकट  कब तक परोसे जाएगा  भला ? जहां तक विधा की प्रतिष्ठा का प्रश्न है व्यंग्य को पर्याप्त प्रतिष्ठा मिल चुकी है हालांकि ये प्रक्रिया राग दरबारी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलते ही शुरू हो चुकी थी लेकिन फिलहाल व्यंग्य के क्षेत्र मे  स्थापित नए पुरस्कार और ज्ञान चतुर्वेदी को पद्म श्री मिलने से व्यंग्य की प्रतिष्ठा में अभिवृद्धि ही हुयी है । व्यंग्य में हास्य और व्यंग्य वाला मुद्दा भी अब बासी हो चुका है । कुछ रचनाकार और व्यंग्य में हास्य को त्याज्य मानते हैं और उससे परहेज करते हैं लेकिन हास्य की उपस्थिति अनिवार्य तो नहीं कही जा सकती है लेकिन यदि ह्यूमर रहता है तो पाठक रचना के प्रति एकाग्र रहता है और रोचकता बरकरार रहती है । हां ये जरूर है कि वो रचना का उद्देश्य न बन जाए और व्यंग्यकार उसमें रस लेकर अपने लक्ष्य को न भूल जाए जिसपर उसे प्रहार करना है ।  कुछ रचनाकार व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति से सहमत कम हैं । जबकि कुछ व्यंग्यकारों  का हास्य के युक्तियुक्त समावेश से परहेज नहीं है । आज का व्यंग्य सुधार की भावना से आया है और वो संहार के बघनखे भी पहने हुए हैं ऐसे में उसमें आक्रोश ही नहीं है वो करूणा और चिंतन भी उत्पन्न करता है लिहाजा वहां पर हास्य की गुंजाइश स्वभावतः ही कम हो जाती है । दूसरी विधाएं जहां मात्र संकेत करके ही रह जाती हैं व्यंग्य दिशा भी बताता है और दायित्वबोध भी । प्रेम जनमेजय साफ कहते हैं कि दिशाहीन और दायित्वहीन व्यंग्य व्यंग्य नहीं हो सकता है । इसी बात को युवा व्यंग्य लेखक  सरोकार के नाम से अभिहित करते हैं । आज के व्यंग्य में आक्रोश के स्वर के साथ साथ चिंतन की गहराई भी है । लेकिन व्यंग्यकारों को फार्मूलाबद्ध लेखन से बचना होगा । सिर्फ शब्दों के खिलवाड़ और निश्चित विषय से हटकर नए विषय भी ढूंढने होंगे । अखबारों में भारी खपत होने के कारण व्यंग्यकार राजनीतिक विषयों पर ज्यादा कलम चलाते हैं वहां वही संभावनाएं हैं । लेकिन कुछ दिनों बाद वो विषय मर जाता है क्योंकि राजनीति तो माया है और माया महाठगिनी हम जानी लेकिन व्यंग्यकार नही जान रहे हैं या शायद जान के भी अनदेखी कर रहे हैं । मैं यह नहीं कह रहा कि अखबारी लेखन बुरा है आखिर शरद जोशी , परसाई , स्वयं ज्ञान जी ने अलग व्यंग्य संकलन की भूमिका में इसकी उपादेयता और सीमा के महत्व को स्वीकारा है और इंडिया टुडे , पत्रिका आदि में लेखन किया है लेकिन वो व्यंग्य लेखन अपनी शर्तों और विषयों के चयन में सावधानी के साथ किया गया है । सही है कि हर नया व्यंग्य लेखक शुरूआती दौर  अपनी शर्तों पर व्यंग्य लेखन नही कर सकता और स्थापित होने में समय लगता है लेकिन कम से कम हम दूसरी पत्रिकाओं में पेशेवर दृष्टि को छोड़कर भी कुछ लिखें भले ही वहां उतनी प्रसिद्धि या धन नहीं मिले तो क्या । ये याद रखिए कि लोकप्रियता व्यंग्य की क्षमता भी है और सीमारेखा भी । व्यंग्य को आज  पाठ्यक्रम में स्थान मिल रहा है , व्यंग्यकारों पर शोध हो रहे हैं , एम फिल में व्यंग्य को लेकर लघु शोध प्रबंध लिखे जा रहे हैं । ये व्यंग्य की बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण है । उसे लगातार सम्मान मिल रहा है । लेकिन व्यंग्यकार विशेषतः व्यंग्य कवि मंच पर अभी भी वही फूहड़ पत्नी , साली , पुलिस , राजनेता जैसे घिसे पिटे विषयों पर अटके हुए हैं । ये प्रवृत्ति घातक है । नए व्यंग्यकारों ने यद्यपि  मनुष्य की छद्म प्रवृत्तियों , आर्थिक मसलों , अन्तर्राष्ट्रीय विषयों , नयी तकनीक , फिल्म  आदि को लक्षित कर व्यंग्य लिखे हैं जो कि व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में विषय की नीरसता और दोहराव को तोड़नें में सहायक सिद्ध हुआ है ।  नए व्यंग्यकार लगातार नयी जमीन तोड़ रहे हैं और उनसे बहुत उम्मीद है उन पर व्यंग्य को पकड़ने की दृष्टि और कहने का तरीका , वक्रोक्ति , समर्थ भाषा सब है लेकिन अभी उनके व्यंग्य संकलनों का इंतजार है । इन व्यंग्यकारों की  यात्रा का लंबा सफर अभी बाकी है और इनसे काफी उम्मीदें है बशर्ते ये व्यंग्य की चकाचौंध और मठाधीशी की अहंकारिता के शिकार न हो जाएं । लेकिन व्यंग्यकारों को  व्यंग्य को विविध रूपों में प्रस्तुत कर अपनी सामर्थ्य का लोहा मनवाना होगा । व्यंग्य एक तात्कालिक प्रतिक्रिया के स्वरूप उभरता है ऐसे में उसमें जल्दबाजी और असावधानियों को संभावना रहती है । खासकर अखबारी व्यंग्य में । अखबारी व्यंग्य त्याज्य नहीं है लेकिन विषय विविधता और शब्द सीमा तथा व्यावसायिकता और होड़ के चलते बहुत सार्थक और लंबी रचनाएं सामने नहीं आ पातीं हैं । व्यंग्यकारों को यह मोह कम करना होगा और सुदीर्घ तैयारी से ठोस रचनाएं सामने लानी पड़ेगी । हमारे आलोचकों को भी परसाई , शरद जोशी , त्यागी की त्रयी से हटकर अब उसके बाद के व्यंग्यकारों पर ध्यान देना चाहिए । उनकी परंपरा के वाहकों ने पर्याप्त सृजन किया है जिस पर हिन्दी के शीर्ष आलोचकों का ध्यान जाना चाहिए । साथी ही व्यंग्यकार अपने आलोचक स्वयं विकसित करें और निष्पक्ष चर्चा और समीक्षा करें तब ही जाकर व्यंग्य का भला होगा । सोशल मीडिया पर फेस बुक और व्हाट्स एप्प पर व्यंग्य के समूह बने हुए है लेकिन कुछ एक को छोड़कर अधिकतर पर बधाई और वाह- वाह की रस्म अदायगी चलती रहती है ।  हां व्यंग्य को लेकर विमर्श का वातावरण और पहल व्यंग्य यात्रा पत्रिका  जरूर करती रही है । अट्टहास, नई गुदगुदी जैसी पत्रिकाएं भी व्यंग्य की अलख वर्षों से  जगाए हुए हैं । इसी संदर्भ में अभी हाल में वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेश कांतद्वारा शुरू की गयी पत्रिका हैलो इंडिया का उल्लेख भी जरूरी है जिसने अपनी चयन सामग्री और सुंदर ले आउट से पहचान बनानी शुरु कर दी है । गोइंनका फाउडेशन की हास्यम व्यंग्यम , व्यंग्योदय , हास्य व्यंग्य वार्षिकी भी यथासंभव व्यंग्य विमर्श और रचनाओं के प्रकाशन के माध्यम से व्यंग्य को चर्चा के केन्द्र में बनाए रखने का ईमानदार प्रयास करती दिखायी देती हैं । परसाई , शरद जोशी , श्रीलाल शुक्ल पर विशेषांक और व्यंग्य को केन्द्र में लाने में व्यंग्य यात्रा का काम ऐतिहासिक रहा है ।  व्यंग्य अपार संभावनाओं की विधा है । व्यंग्य के आगे खुला आसमान है जरूरत है सामर्थ्यवान परिंदों के उड़ान भरने की । व्यंग्य को इलेकट्रानिक मीडिया का भी उपयोग करना चाहिए , नए विषयों को आत्मसात करना चाहिए और इन सबसे बढ़कर व्यंग्यकारों को स्वाध्याय और संतुलित प्रगतिशील दृष्टि रखनी चाहिए यही व्यंग्य की नयी चुनौतियां हैं जिससे उन्हें पार पाना है । व्यंग्य के क्षेत्र में सद्य प्रकाशित संग्रह नए नवेले , व्यंग्य बत्तीसी और अर्चना चतुर्वेदी द्वारा संपादित लेडीज.काम महत्वपूर्ण कदम हैं । महिला व्यंग्यकारों की रचनाओं और उनके लेखन को एक बानगी के रूप में इसमें  प्रस्तुत किया गया है । व्यंग्य समीक्षा में भी राहुल देव, भुवनेश्वर उपाध्याय, अजय अनुरागी, सुशील सिद्धार्थ, रमेश तिवारी आदि से उम्मीद है कि वे भविष्य में सार्थक और निष्पक्ष आलोचना द्वारा व्यंग्य विधा के उन्नयन के लिए उत्कृष्ट प्रयास करेंगे । एक शुभ लक्षण है कि आज व्यंग्य प्रकाशन के लिए कई प्रकाशन समूह आगे बढ़ कर पहल कर रहे हैं वनिका पब्लिकेशन, अमन प्रकाशन, भावना प्रकाशन ने विगत वर्षों में कई नए और स्थापित व्यंग्यकारों को प्रकाशित किया है । यह सब व्यंग्य की बेहतरी की दिशा में निश्चित ही शुभ संकेत है लेकिन व्यंग्यकारों को अपने दायित्वों और लेखन की गुणवत्ता की ओर भी ध्यान देना होगा । जब तक लेखन में जन सरोकार और कथ्य़ में अनूठापन नहीं आएगा तब तक पाठक नहीं जुड़ेंगे । क्योंकि अंततः देर सबेर पाठक की अदालत में ही रचना की लोकप्रियता और स्वीकार्यता से ही उसकी प्रभावशीलता का फैसला तय होता है ।
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