Thursday, 12 May 2022

आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ


संवादों में व्यंग्य की संभावनाओं की तलाश

राहुल देव द्वारा संपादित एवं संयोजित पुस्तकआधुनिक व्यंग्य का यथार्थकई मायनों में महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है। किसी भी विचार या सम्प्रत्यय पर विमर्शों के आयोजन उसके प्रचार-प्रसार को नवीन सम्भावनाएँ प्रदान करने में सहायक होते हैं। व्यंग्य एक ऐसी विधा है जो लंबे समय से रची जा रही है। परंतु यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आज की तारीख़ में व्यंग्य विधा है, स्प्रिट है, शिल्प है या बात को कहने का एक अलग ढंग है। कुछ भी हो, व्यंग्य अपनी भाषा,कहन और संस्कारों के साथ साहित्य जगत् में कहीं न कहीं हलचल तो मचाता ही है। हिंदी साहित्य में आज से नहीं बल्कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय से ही व्यंग्य अपने प्रभावों के साथ रचा-बचा हुआ है। इससे पहले भी काव्य में व्यंग्य अपना स्थान किसी न किसी रूप में ग्रहण करता रहा। इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा प्रकाशन द्वारा प्रकाशितआधुनिक व्यंग्य का यथार्थपुस्तक व्यंग्य पर आधारित साक्षात्कारों के रूप में प्रस्तुत की गई है। लेकिन ये साक्षात्कार मात्र ऐसे साक्षात्कार नहीं बनकर रह गए हैं कि जिनमें कुछ प्रश्न दिए जाएँ और उनके उत्तर प्राप्त किए जाएँ। साक्षात्कार की मूल संकल्पना तो प्रस्तुत पुस्तक में उपलब्ध है ही, साथ ही साथ इन सभी साक्षात्कारों के प्रश्न विमर्श की एक मजबूत श्रृंखला भी उत्पन्न करते हैं। इसे हमव्यंग्य विमर्शकह सकते हैं। पुस्तक के संपादक-संयोजक राहुल देव द्वारा व्यंग्य से सम्बंधित पच्चीस-छब्बीस प्रश्नों की एक प्रश्नावली तैयार की गई है और उन्हें कुल चौदह व्यंग्यकारों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक व्यंग्यकार के सामने प्रश्न वही हैं परंतु उनका उत्तर सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोणों और अभिरुचियों के अनुसार दिया है। वैचारिकता और विश्लेषण के विभिन्न गवाक्षों में जब व्यंग्य साहित्य के वैभव विस्तार को देखा गया है, तब बहुत ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी उत्तर भी प्राप्त हुए हैं। व्यंग्य की सामर्थ्य, उसकी आलोचना, विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए योगदान, व्यंग्य में हास्य और करुणा की उत्पत्ति, व्यंग्य की भाषा, व्यंग्य और समकालीन चिंतनधारा, व्यंग्य का लोकधर्मी और जनसंवादी रूप, व्यंग्य साहित्य की समालोचना, व्यंग्य के प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान, व्यंग्य में वैश्वीकरण- उत्तर आधुनिकता- बाजारवाद-महामारी-असहिष्णुता-सांप्रदायिकता-उग्र राष्ट्रवाद जैसे ज्वलंत विषयों की अभिव्यक्ति, दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श और व्यंग्यकार की वैचारिक प्रतिबद्धता जैसे विविधवर्णी प्रश्न व्यंग्य पर न केवल नई दृष्टि डालते हैं, बल्कि व्यंग्य विधा का अपना एक शास्त्र भी इनके माध्यम से विकसित करते हैं। अंत में व्यंग्य लेखन के कारण व्यक्तिगत जीवन में किए गए संघर्षों का सामना, विश्वविद्यालयों में व्यंग्य की स्थिति और व्यंग्य के भविष्य पर भी प्रश्न किए गए हैं।

 

           प्रथम साक्षात्कार सूर्यकांत नागर का है जिसमें विभिन्न प्रश्नों के आलोक में उन्होंने अपने उत्तर दिए हैं। एक अच्छा व्यंग्य क्या है, इस पर उत्तर देते हुए वे कहते हैं,“व्यंग्य में लोकमांगलिक चेतना होनी चाहिए। परिवेश जितना व्यापक होगा, संवेदना जितनी तीव्र होगी, विसंगति जितनी गहरी होगी, अभिव्यक्ति जितनी तिलमिला देने वाली होगी; व्यंग्य उतना ही सार्थक होगा। वरिष्ठ व्यंग्यकार सूर्यबाला डिमांड और सप्लाई के बीच गुणवत्ता का स्तर न संभाल पाने और व्यंग्य के बाज़ार की माँग के हिसाब से अपने आप को तुरत-फुरत ढालने की आपाधापी को वर्तमान समय में लिखे जा रहे व्यंग्य की असली चुनौतियाँ मानती हैं। प्रेम जन्मेजय व्यंग्यकार होने के साथ-साथ प्रख्यात पत्रिकाव्यंग्ययात्राके कुशल संपादक भी हैं। आपके व्यंग्य नाटक भी पर्याप्त चर्चा में रहे हैं। साक्षात्कार में दिए गए उनके उत्तर जितने सटीक और विश्लेषणात्मक हैं, उतनी ही व्यंग्यात्मकता से भरपूर भी हैं। प्रेम जन्मेजय व्यंग्य को बौद्धिक चेतना के आलोक में देखते हैं।उनकी व्यंग्य के अर्थ को केवल एक सुशिक्षित मस्तिष्क ही ग्रहण कर सकता है। प्रेम जन्मेजय के उत्तर अपेक्षाकृत लंबे हैं और व्यंग्य पर एक बड़े विमर्श की प्रशस्त करते चलते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों से पर्याप्त चर्चित हैं। अपने उपन्यासमरीचिकाकी पौराणिक भाषा में व्यंग्य साधने पर वह विस्तार से बात करते हैं। उनकी दृष्टि में समकालीन व्यंग्य अलग तरह के उत्सव में मुब्तला है।

 

         किसी भी विधा के लिए समीक्षा-समालोचना की प्रक्रिया विधा को वैचारिक प्रसार प्रदान करने में सहायक होती है।राहुल देव स्वयं भी कविता और व्यंग्य के सुधी समालोचक रहे हैं, इसीलिए उन्होंने व्यंग्य की आलोचना पर भी प्रश्न रखे हैं। हिंदी साहित्य की मुख्यधारा की आलोचना ने समकालीन व्यंग्य से दूरी ही बनाए रखी है। परंतु धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है। इससे सम्बंधित प्रश्न का उत्तर देते हुए जवाहर चौधरी व्यंग्य की समालोचना पर कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की सूचना देते हैं। अरविंद तिवारी की दृष्टि में हास्य को व्यंग्य में से निकाला नहीं जा सकता। सर्वश्रेष्ठ हास्य वह है जिसमें हास्य की स्थितियाँ होते हुए भी करुणा उत्पन्न हो। अश्विनी कुमार दुबे भी व्यंग्य का उत्स करुणा में मानते हैं। कैलाश मंडलेकर व्यंग्य को एक किस्म का अक्षर युद्ध स्वीकार करते हैं और आज के विडम्बनापूर्ण समय के यथार्थ की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए व्यंग्य और उसकी सामाजिक उपादेयता को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनकी दृष्टि में व्यंग्य समाज को आईना दिखाता है और बाज़ारवाद के दौर में लोग अपने समय के सत्य से दूर भागते हैं। आज के दौर में लिखे जा रहे व्यंग्य की असली चुनौतियों के सम्बंध में गिरीश पंकज का विचार है,“समकालीन सिस्टम ऐसे व्यंग्य पसंद नहीं करता जो उसका चीरहरण कर ले। और भूल से अगर किसी जगह विद्रोही किस्म का व्यंग्य छप भी गया तो छापने वाले की फजीहत हो सकती है। इसलिए अब चलताऊ किस्म के व्यंग्य ही अधिक लिखे जा रहे हैं और यही चुनौती है कि व्यंग्य की धार कुंद होती जा रही है।गिरीश पंकज व्यंग्य को साहित्यिक संस्कारों और लोकमंगल की भावना के साथ रचे जाने पर जोर देते हैं। राजेंद्र वर्मा व्यंग्य के अतिशय सीमित शब्दों में लिखे जाने को व्यंग्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं मानते। व्यंग्य की चुनौतियों पर बात करते हुए उनका कथन है,“व्यंग्य में लेखकीय दायित्व का निर्वाह प्रमुख चुनौती है। व्यंग्य अख़बारों के कालम के हिसाब से लिखे जा रहे हैं, विशेषतः उनकी विचारधारा और सम्पादकों के निर्देशों को ध्यान में रखकर। ऐसे में व्यंग्य जिसे सत्ता का स्थायी प्रतिपक्ष माना जाता है, अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहा है।किसी भी रचना के सर्जन से पहले ही यदि उसका एक खाँचा या ढर्रा फिक्स कर दिया जाए तो यह स्थिति कदापि अच्छी नहीं कही जा सकती। अजय अनुरागी व्यंग्य के समक्ष चार स्तरों पर चुनौतियों को स्वीकारते हैं--स्वयं के स्तर पर, समाज के स्तर पर, सत्ता के स्तर पर तथा प्रशासन के स्तर पर। उनकी दृष्टि में लोक संवेदना और जनपीड़ा का अनुभव करने वाला व्यंग्यकार ही अपनी आक्रोशमयी अभिव्यक्ति को जनसंवाद से जोड़ सकेगा। इंद्रजीत कौर अच्छे व्यंग्य में विसंगतियों पर पैनी नज़र, पैनी कलम, पात्र-समय और पृष्ठभूमि के अनुसार भाषा, यथोचित प्रतीक, स्पष्ट विचार, विचार का अंत तक निर्वाह;इन तत्त्वों की उपस्थिति को आवश्यक मानती हैं। आज के उतावलेपन के दौर में व्यंग्यकार जनता से सीधा सम्वाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। अनूपमणि त्रिपाठी इसेस्टंट और इंस्टेंटका दौर कहते हैं। ऐसे में कंटेंट का संकट होना लाजिमी ही है। जो कॉमेडी आज फिज़ाओं में तैर रही है, वस्तुतः वह हास्य नहीं अपितु हास्यास्पद है। पंकज प्रसून व्यंग्य का मूल स्वर प्रतिरोध मानते हुए व्यंग्य के उज्ज्वल भविष्य पर कहते हैं,“जब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी, भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद रहेगा; व्यंग्य का भविष्य उज्ज्वल ही रहेगा। इसमें कोई संशय नहीं।

 

         इन सभी प्रश्नों में और उनके उत्तरों में एक बात कॉमन है। अधिकांश व्यंग्यकारों ने व्यंग्य परम्परा को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय हरिशंकर परसाई,शरद जोशी,रविंद्र त्यागी को दिया है। इसी प्रकार व्यंग्य की सार्वकालिक महान कृति पर बात करते हुए अधिकांश व्यंग्यकारों का उत्तरराग दरबारीप्राप्त हुआ है। इससे इन कृति और कृतिकारों की व्यंग्य क्षमता का आकलन सहज रूप से ही किया जा सकता है।

 

             पुस्तक में जितने भी साक्षात्कार हैं, सभी में दिए गए उत्तर बौद्धिकता और वस्तुनिष्ठता से भरपूर है। व्यंग्य समय और समाज की विद्रूपताओं को सामने लाता है। जब इन पच्चीस-छब्बीस प्रश्नों को समकालीन साहित्य के प्रख्यात् व्यंग्यकारों के सामने रखा जाता है, तब व्यंग्य को रचने-लिखने के साथ-साथ व्यंग्य को देखने-समझने के उनके दृष्टिकोण का भी पता चलता है। राहुल देव के शब्दों में,“यह गोलमेज टाइप का विमर्श साक्षात्कार के फॉर्म में है। इसकी उद्देश्यपरकता और विषयवस्तु को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक को साक्षात्कार की पुस्तक के बजाय व्यंग्य विमर्श की किताब कहना ज्यादा उचित होगा।अपनी उपयोगिता और उद्देश्य को प्रस्तुत पुस्तक स्वयं सिद्ध करती है। व्यंग्य विधा की विशिष्टता से परिचित होने के लिए यह पुस्तक निश्चित रूप से पठनीय और संग्रहणीय है। यह पुस्तक व्यंग्य पर संवादों में संभावनाओं की तलाश करती दिखाई देती है। व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के साथ संपादक राहुल देव की पूर्व प्रकाशित साक्षात्कार पुस्तकसाक्षी है संवादकी परम्परा में ही प्रस्तुत पुस्तक को देखा-जाना चाहिए ।

 

पुस्तक: आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स, नोएडा संपादन: राहुल देव मूल्य: 400/- (पेपरबैकपृष्ठ: 230

 

 

-          डॉ. नितिन सेठी

सी-231,शाहदाना कॉलोनी

बरेली(243005)

मो. 9027422306

Friday, 11 March 2022

आशा भरी दृष्टि का दिग्दर्शन: बन्द गली से आगे

            मनुष्य का जन्म सामाजिक परिवेश में होता है। इस सामाजिक परिवेश के अपने कुछ विशिष्ट नियम और संस्कार होते हैं और मनुष्य इनमें बंधा होता है। इससे बाहर जाकर, इससे विलग होकर व्यक्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। अपने व्यक्तिगत जीवन को मनुष्य समष्टिगत दायित्वों के सामने सदैव पीछे रखकर चलता है। समष्टिगत मूल्य, व्यक्तिगत मूल्यों से सदैव अधिक महत्त्वपूर्ण और महत्तर स्थान रखते हैं। मनुष्य अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में एक प्रकार का सामंजस्य बिठाता है और अपने जीवनमार्ग को सुगम बनाता है। परंतु कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं कि व्यक्ति अपने बाह्य शारीरिक आवरण से आंतरिक शरीर को कुछ अलग-सा महसूस करता है। ऐसी विशेषताएँ और विरूपताएँ व्यक्ति को नर और नारी के रूप से अलग जाकरट्रांसजेंडरकी उपाधि से अभिहित करती हैं। ट्रांसजेंडर उन्हें माना जाता है जो अपने प्राकृतिक लिंग के अनुसार आचरण करके उससे विपरीतलिंगी आचरण करते हैं। ट्रांसजेंडर समाज में अनेक रूपों में पाये जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से हिजड़ा, किन्नर, गे, लेस्बियन, हेट्रोसेक्सुअल, बाईसेक्सुअल आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

 

प्रख्यात् पत्रकार जी. पी. वर्मा की पुस्तकबंद गली से आगेथर्ड जेंडर विमर्श पर चिंतन के नये द्वार खोलती है। उल्लेखनीय यह भी है कि इनमें ट्रांसमैन और ट्रांसवूमैनदोनों ही सम्मिलित हैं। अपनी बाहरी और आंतरिक संरचना की पहचान को निर्धारित करने के लिए इन ट्रांसजेंडर को बहुत सी जानी-अनजानी कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। पारिवारिक रूप से ये बहिष्कृत ही रहते हैं। अधिकांश के माता-पिता और सम्बंधी उन्हें अपनाने से कतराते हैं। इसके पीछे सामाजिक नियमों और बंधनों के दबाव हो सकते हैं। प्रसन्नता की बात यह भी है कि कुछ ट्रांसजेंडर को उनके अपने परिवारों का सराहनीय साथ और सहयोग भी मिलता है। ट्रांसजेंडर्स को तथाकथित सभ्य समाज की क्रूरता और शोषण का लगातार सामना करना पड़ता है। इनके जीवन के पन्नों को पलटने पर नकली सहानुभूतियों और झूठे दिखावों के सफेद-स्याह निशान आसानी से देखे जा सकते हैं। अपने अंदर के पुरुष और स्त्री के होने, छिपे रहने और उनके सामने आने के अंतर्द्वन्द्वों को ये ट्रांसजेंडर अक्सर ही महसूस करते हैं। सामाजिक जीवन की लंबी और अनवरत चलने वाली दौड़ में ट्रांसजेंडर अपने तन और मन को संभालते और साधते हुए, अपनी शारीरिक पहचान को छुपाते और दर्शाते रहते हैं। इस कार्य में इनकी मानसिक चेतनाशक्ति इनके जीवन को संवेदनापूर्ण और रससिक्त बनाती है।ट्रांसजेंडर का अपना शरीर कौन सा है, यह प्रश्न उनके जीवन के साथ-साथ सदैव चलता है। यह होने या होने का भाव उससे कभी नहीं छूटता। इसी द्वंद्व में वह अपने दिल की आवाज़ सुनता है और उसे अपने जीने की राह का इशारा अनजाने में ही मिलता चला जाता है। ये ऐसे अनदेखे इशारे हैं, ऐसी अनसुनी आवाज़ें हैं, ऐसे अनछुए स्पर्श हैं; जो उन्हें दुनिया के किसी भी अवरोधों को पार कर अनचीन्हे रास्तों पर आगे बढ़ते जाने की शक्ति और प्रेरणा प्रदान करते हैं। ये रास्ते कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए ट्रांसजेंडर को उसके आत्म से परिचित करवाते हैं। उसे रूबरू करवाते हैं उन अंदरूनी आवाज़ों से जिन्हें सामाजिक नियमों के शोर-शराबे में सुना नहीं जा सकता, दुनियावी ताने-बाने में देखा नहीं जा सकता। इन्हीं का सहानुभूतियों से भरा हुआ सम्बल पाकर ट्रांसजेंडरबंद गली से आगेकी यात्रा भी करना चाहते हैं। जी.पी. वर्मा शायद तभी अपनी पुस्तक का नामबंद गली से आगेरखते हैं। ट्रांसजेंडर का भरी दुनिया की चकाचौंध से बचकर एक अकेली और आत्मनिर्वासित दुनिया की तरफ चलना भी एक मजबूरी ही है जो उनके विचारों और वैयक्तिकता के अन्तर्जाल से भी उन्हें दूर ले जाती है। पुस्तक के समर्पण में भी लेखक का कथन उल्लेखनीय है,“उनको जो फूलों से खिलते घर उपवन में बिखर जाते परतंग गलियों के सीलते कमरों में आसमाँ छूने के सतरंगी सपनों के हौसले लिए।1

 

पुस्तक की भूमिका भूतो भविष्यतिमें जी.पी. वर्मा लिखते हैं,“नैसर्गिक संवैधानिक, दोनों प्रकार के अधिकारों से ट्रांसजेंडर अब तक वंचित रहे। मानवाधिकार के हिमायती भी इनके उन्नयन के लिए कुछ कर पाए। कारण सरकारों की उदासीनता। समाज का इनके प्रति घृणा-भाव। इनकी अजूबी शारीरिक संरचना के प्रति दुराव। फिर भी वह जीवन डगर पर अडिग और अविराम है। देखा जाए तो इनका वजूद इस्पात से निर्मित उस विराट् जलपोत के समान है जो जीवन सागर की तूफानी तरंगों पर बढ़ता है। उनसे मोर्चा लेता है। कभी विजयी होता है, कभी हार जाता है। पर वह ठहरता तब तक नहीं जब तक वह डूब ही नहीं जाता है। यूँ तो ज़िन्दगी स्वयं गहरे सागर-सी शान्त और तूफानी है। वह बहुत पेचीदा भी है। कभी-कभी उसे जीने वाले पेचीदा बना देते हैं। कभी पेचीदगियों में गढ़े लोग ही जिन्दगी के समक्ष चुनौती बनकर उसे झकझोर देते हैं। इसी श्रेणी में आते हैं वे लोग जो सृष्टिकृत नर-मादा के विरूप हैं। इन्हें थर्डजेंडर या किन्नर के रूप में जाना जाता है।2 पुस्तक की लंबी भूमिका में लेखक ने थर्ड जेंडर, किन्नर आदि को ऐतिहासिकता के दृष्टिकोण से भी देखा है। प्रस्तुत पुस्तक कुल पांच खंडों में विभाजित है। पहला खंड हैजीवन चरितजिसमें कुल सोलह ट्रांसजेंडर्स का जीवन दर्शाया गया है। उल्लेखनीय यह भी है कि ये जीवनचरित स्वयं इन ट्रांसजेंडर्स द्वारा अपनी ही भाषा-शैली में लिपिबद्ध किए गए हैं। ये आत्मकथात्मक शैली में रचे गए हैं जिनमें ट्रांसजेंडर के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की विडंबनाएँ, विवशताएँ, विद्रूपताएँ विविध रूपों में हमारे सामने आती हैं।

 

मैं जिऊँगीविद्या राजपूत की आत्मकहानी है जिसमें विभिन्न अवरोधों और समस्याओं का सामना करते हुए जीवन और मृत्यु के खेल के बीच विद्या राजपूत अपनी पहचान की तलाश करती हैं। एक लड़के के शरीर में जन्म लेने के बाद ऑपरेशन द्वारा अपना लिंग परिवर्तित करवाकर वह स्त्री बनती हैं।मितवासंगठन के माध्यम से विद्या राजपूत आज ट्रांसजेंडर समाज का भला कर रही हैं। रुद्रप्रयाग में जन्मे धनंजय चौहानमैं अधूरी नहींके माध्यम से अपनी बात रखते हैं। उल्लेखनीय है कि धनंजय चौहान विश्व के ट्रांसजेंडर समाज के रोल मॉडल हैं। गजब के आत्मविश्वास और समर्पण के कारण उनके कार्यों को दर्शाताएडमिटेडनाम से एक वृत्तचित्र भी उनके ऊपर बनाया जा चुका है। वह पहले ट्रांसजेंडर हैं जिन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में बी.. ऑनर्स किया और विश्वविद्यालय में टॉप किया। अन्य अनेक विषयों में भी उन्होंने डिप्लोमा और डिग्रियां प्राप्त कीं। कानून की पढ़ाई करते के लिए लॉ कॉलेज में दाखिला तो मिला परंतु छात्रों के दुर्व्यवहार के कारण कानून की पढ़ाई वह पूरी नहीं कर पाए। धनंजय चौहान का जन्म एक लड़के के रूप में हुआ था परंतु तीन वर्ष की उम्र से ही उन्हें लगने लगा कि वह लड़का नहीं लड़की हैं। सन् 2009 में उन्होंने एक गैर सरकारी संगठनसक्षम ट्रस्टका गठन किया। राज कनौजिया एक ट्रांसमैन हैं। उनका जन्म मुंबई में हुआ था। आगे चलकर उनकाहमसफर ट्रस्टसे जुड़ाव हुआ। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने उन्हें मुंबई में चल रहे नौ टारगेट इंटरवेंशन केंद्रों को संचालित करने की जिम्मेदारी सौंपी। अपने कार्य को विस्तार देते हुए उन्होंने हमसफर ट्रस्ट के अंतर्गतउमंगनामक ग्रुप बनाया। सिमरन बालिया का जन्म बिहार में एक लड़के के रूप में हुआ था। आर्यन एक ट्रांसमैन हैं जिन्होंने छोटी सी उम्र में शरीर सौष्ठव प्रतियोगिताओं में एशिया के पहले ट्रांसमैन बॉडीबिल्डर होने का खिताब प्राप्त किया। पप्पी देवनाथ त्रिपुरा के प्रथम ट्रांसमैन हैं। रुद्रांशी एक ट्रांसवूमैन हैं जिनका जन्म अजमेर में हुआ था। उन्होंने कविता लेखन में भी कई पुरस्कार जीत चुके हैं। अपनी आत्मव्यथा बताने के साथ-साथ उन्होंने अपनी तीन कविताएँ भी प्रस्तुत की हैं।

 

संजना सिंह चौहान बचपन से ही लड़कियों जैसा महसूस करती थीं। वे लिखती हैं,“ सामान्यतः बचपन और यौवन आशा-महत्त्वाकांक्षाओं के फूलों से महकता चमन होता है। लेकिन मैंने इस चमन में सैर नहीं की। मैंने तो नश्तर से भी तेज बबूल की झाड़ियों से घिरे सीमित मैदानों में ही काँटों से बचने के लिए भागदौड़ करते-करते जीवन के इस पड़ाव पर ठहराव पाया है। अब मैं भूत के पीड़ादायक क्षणों और काँटों को याद करके गुज़रे वक़्त से या उन लोगों से जिन्होंने मुझे तिरस्कार और अपमान दिया, कोई शिकवा या शिकायत नहीं करना चाहती। ही मैं उस पर विलाप करना चाहती हूँ। मैंने तो जीवन में आने वाले हर अंधेरे में प्रकाश की मद्धिम किरण ढूँढने का प्रयास किया है ताकि मैं उस प्रकाश के सहारे जीवन की भावी राहों को देख सकूँ,उन पर बढ़ सकूँ।अपनी अज्ञात किंतु नियति द्वारा निर्धारित मंजिल को पा सकूँ।3 उल्लेखनीय है कि संजना सिंह चौहान एशिया की पहली ट्रांसजेंडर हैं जिन्हें स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सम्मानित किया गया।अब्दुल रहीम अपने आलेखसोशल डिस्टेंसिंग से मुक्ति कबके माध्यम से अपनी पीड़ा रखते हैं। उनका मानना है कि कोरोनावायरस सदियों में पहली बार आया है, पाबंदियाँ लाया है। सब जगह लॉकडाउन हुआ। सोशल डिस्टेंसिंग ने लोगों को दूर कर दिया है। कहीं कोरनटाइन में रहे लोग, पर यह कुछ दिन का मेहमान है,चला जाएगा। समाज पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। लेकिन हम फिर भी इससे मुक्त नहीं होंगे। कोरोना तो हमारे जीवन में उस दिन से प्रवेश कर गया था जब हमने जन्म के बाद होश संभाला। हमने अपना आज तक का जीवन कोरनटाइन और सोशल डिस्टेंसिंग में गुजारा है।आज भी हम सबसे अलग-थलग हैं। लोग हमसे मिलने, हमसे बात करने और हमारे पास आने से हिचकते हैं, झिझकते हैं। प्रस्तुत आलेख में उन्होंने अपने दिल की बात चार-पांच छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से भी रखी है। उनकी पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं

 

       खुदा ने जो बनाया

       बस वही हूँ मैं

       ग़लत सही

       जो कुछ भी है मेरे भीतर

       कुदरत ने रचा है

       मेरा वजूद

       कुछ भी नहीं 4

 

भैरवी अरमानी ने लंबे आत्मसंघर्ष के पश्चात् तंत्र-मंत्र और ज्योतिष विद्या में भी निपुणता प्राप्त की। उन्होंने अपनी शल्य चिकित्सा भी अपना जेंडर परिवर्तन के लिए नहीं करवाई है। अपनी माँ को याद करते हुए वे लिखते हैं

 

      तू हमेशा रहना माँ

      मेरे बाद भी

      तेरा ही विस्तार हूँ मैं

      तेरी अभिव्यक्ति

      कुछ लोग कहते हैं माँ पर हूँ

      कुछ कहते हैं पिता पर

      मैं जानता हूँ माँ, मन मेरा तू है

      और तन है पिता

      इस आधे-आधे में तू ज्यादा है माँ

      तू हमेशा रहना माँ

      मेरे बाद भी 5

 

स्त्रिती चन्द्रन,माही,भावेश जैन प्रिया बाबू, दीपिका ठाकुर, अमृता जैसे ट्रांसजेंडर अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में आज पर्याप्त नाम अर्जित कर रहे हैं। प्रिया बाबू नेअरवानिगल समूह वाराईवियलऔरमूनरमपालिन मुगमजैसी पुस्तकें भी लिखी हैं। इन सभी आत्म जीवनचरितों को पढ़ते हुए एक बात स्पष्ट होती है कि लगभग सभी ट्रांसजेंडर को पारिवारिक और सामाजिक अवहेलनाओं का सामना करना पड़ा है। कुछ ने अपने गुणों को निखारा और समाज में अपना एक विशिष्ट मुकाम भी बनाया है।ये जीवनचरित यह भी दर्शाते हैं कि इन्हें भी