औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Monday, 16 October 2017

दीपक शर्मा 'सार्थक' के दो व्यंग्य



कितना जताते हैं

हर किसी की अपनी-अपनी समस्याएं हैं। अधिकतर लोगों को ये शिकायत है कि दुनियां उनसे हर चीज छुपाती है पर हमारी समस्या अधिकतर लोगों वाली नहीं है। हमारी समस्या भी हमारी तरह अजीब है।
मैंने महसूस किया है कि आज कल लोग छुपा नहीं रहे हैं बल्की जता रहे हैं। जिसके पास जो है उसे वो जताने में लगा है।आजकल मुझे हर जगह 'जताने' वाले लोग मिल जाते हैं
मकान मालिक किराएदार पर अनावश्यक धौंस जमाकर जता रहा है कि घर उसका है।फुटपात पर कार चलाकर कार वाला जता रहा है कि उसके पास कार है।
मन्दिर जाओ तो वहां अमीर लोग बड़ा चढ़ावा चढ़ाकर भगवान को ये जता रहे हैं कि "देखो भगवान..! हम ही तुम्हारे सबसे बड़े भक्त हैं।"
आज सुबह न्यूज़ पेपर उठाया तो देखा मुख्य पृष्ठ पर एक डियोड्रेन्ट का ऐड है। डियोड्रेंट ने ये जता दिया कि आज की पहली ख़बर मैं हूं।उस डियो के ऐड पर एक महिला का चित्र था जो ये जताने में लगी थी कि " दुनियां वालों देख लो...मैं महिला ही हूं।" सुबूत के तौर पर वो खुद को प्रदर्शित कर रही थी।
वैसे देखा जाए तो मज़ा छुपाने में नहीं जताने में ही है।पूर्व प्रधानमन्त्री जी खुद को छुपाते थे इसलिए जनता ने नकार दिया वहीं वर्तमान प्रधानमन्त्री जी जताने में विश्वास रखते हैं इसी लिए जनता की आँखो के तारे हैं।इसी तरह पटेलों ने गुजरात में महारैली करके और मराठों ने महाराष्ट्र में रैली करके जता दिया कि प्रदेश उनका है।श्वेत अमेरिकियों ने 'ट्रम्प चाल' चलकर डेमोक्रेट हिलेरी को चित्त करके जता दिया कि अमेरिका आज भी उनका है। इससे पता चलता है ये दुनियां जताने वालों की है।
लोग न जाने क्या-क्या जता रहे हैं पर सबसे ज्यादा जो चीज जताई जा रही है वो 'प्रेम' हैं। हर व्यक्ति अवसर की तलाश में है, मौका मिला नहीं कि प्रेम जता दिया, बस जताने का तरीका सबका अलग-अलग है। कुछ लोग एसिड फेंक कर प्रेम जताते हैं। कुछ लोग लड़कियों के आगे पीछे चक्कर काट के प्रेम जताते हैं।
इसी बीच देशप्रेम की सुनामी आ गई है।हर कोई देशप्रेम जता रहा है। भला हो सोशल मीडिया का जो हर किसी को देशप्रेम जताने का अवसर दे रहा है। सारे भड़के हुए देशभक्त इसी तलाश में हैं कि कोई व्यक्ति वर्तमान सरकार की कोई आलोचना कर दे और उन्हें देशप्रेम जताने का मौका मिल जाए। ये सारे फेसबुकिया देशभक्त अपना देशप्रेम जताने के चक्कर में किसी को भी गद्दार से शुरूवात करके आतंकवादी तक बना देते हैं।इस तरह अपने अन्दर मची देशप्रेम की खुजली शान्त करते हैं। ये जताने वालों की ज्याती कब तक चलेगी भगवान जाने पर मैने भी आज जता दिया है कि हम तो अपने ही राग में गाएंगे जिसे नहीं पसन्द है...हमारी बला से..!


फलाने-ढमाके

दो ही मित्र हैं मेरे, एक 'फलाने' दूसरे 'ढमाके'
'फलाने' राष्ट्रवादी हैं जबकी 'ढमाके' सेकुलर हैं। 'फलाने राष्ट्रवादी' बहुत गंभीर रहते हैं, ज्यादा मुस्कुराते नहीं।
उन्हीं के शब्दों में कहें तो-
" ज्यादा हँसने वाले लोग चूतिया होते हैं, ऐसे लोगों की बात में वजन नहीं होता है।"
फलाने राष्ट्रवादी का मानना है कि 'राष्ट्रवाद' गंभीरता के खोल में ही रहता है अत: ज्यादा हँसने मुस्कुराने से राष्ट्रवाद शिथिल हो सकता है।वही ढमाके का हाल बहुत बुरा है, बुरा होना भी चाहिए क्योंकि ढमाके सेकुलर जो ठहरे । वैसे हँसते ढमाके भी नहीं हैं। उनको डर है कि कहीं किसी ने उन्हें हँसते हुए रंगे मुह पकड़ लिया तो लोग ये ना समझ लें कि अच्छे दिन आ गए हैं। इसलिए 'ढमाके सेकुलर' हमेशा उदास रहते हैं। वो चहरे पर मुर्दानगी लिए बसंत में भी पतझड़ सा मुँह बनाए बैठे रहते हैं।
लेकिन असल समस्या ये है की फलाने और ढमाके को एक ही घर में रहना पड़ता है।जहाँ  दिक्कत ये है कि 'फलाने राष्ट्रवादी' चाहते हैं घर का माहौल गंभीर रहे, जाहिर है फलाने को गंभीरता  पसंद जो है। वहीं ' सेकुलर ढमाके' चाहते हैं कि घर में हर कोई उदास रहे। कोई कभी ख़ुश ना दिखे और घर में अच्छे दिन ना आ पाएं। 'फलाने राष्ट्रवादी' त्याग की बाते करते हैं जबकी  'ढ़माके सेकुलर' दिन-रात चीख-चीख कर बोल रहे हैं की उन्हें बोलने आजादी नहीं है।
जैसे -जैसे  समय बीतता जा रहा है, समस्या विकराल होती जा रही है। 'फलाने राष्ट्रवादी' दिनोदिन और गंभीर होते जा रहे हैं, वही 'ढमाके सेकुलर' दिन पर दिन और उदास होते जा रहे हैं। बिचारे घर के लोग तो मुस्कुराना भूल ही गए हैं।क्योंकि जब 'फलाने राष्ट्रवादी' की घर में चलती है तो वो घर को डण्डे की ताकत से गंभीर बना देते हैं ताकि घर में राष्ट्रवाद बना रहे।लेकिन जब घर में 'ढमाके सेकुलर' की चलती है तो वो घर वालों में दुनियां भर का डर एवं असुरक्षा का भाव पैदा करके उदास बना देते हैं।
इधर कुछ दिनों से 'फलाने राष्ट्रवादी' राष्ट्रवाद को लेकर गंभीरता के साथ-साथ भावुक भी रहने लगे हैं।अभी उसी दिन की बात है भावुकतावश फलाने ने ढमाके को अपना समझकर दो तीन कन्टाप(थप्पड़) मार दिए। फिर क्या था,  'ढमाके सेकुलर' को और उदास होने का मौका मिल गया अत: वो और उदास हो गए।
वैसे तो 'फलाने राष्ट्रवादी' का रहन-सहन, खान-पान,पहनावा सभी कुछ पश्चमी सभ्यता के जैसा है। उनके बच्चे भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते हैं, पर भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के वो पैदाइसी ठेकेदार हैं। दो पैग विदेशी दारू पीते ही उनके अंदर राष्ट्रवाद हिलोरे मारने लगता है, जो अन्त में 'ढमाके सेकुलर' को हजार गालियां देने के बाद शान्त हो जाता है। 'ढमाके सेकुलर' भी कम नहीं है, वो उदासी की तलवार लिए, डटकर हर अच्छी चीज़ का सामना कर रहे हैं।
हाल ही में मुझे पता चला है कि 'फलाने राष्ट्रवादी' वैज्ञानिक भी हैं, उन्होने 'राष्ट्रोमीटर' नाम की एक मशीन बनाई है, जो 'राष्ट्रवाद' नापती है। अब 'फलाने राष्ट्रवादी', राह चलते किसी भी व्यक्ति को गिराकर, राष्ट्रोमीटर डालकर उसके अंदर के राष्ट्रप्रेम को नाप लेते हैं। अगर किसी व्यक्ति का राष्ट्रप्रेम 'फलाने राष्ट्रवादी' के तय मानक से थोड़ा भी कम होता है तो उसे फलाने के कोप का भाजन बनना पड़ता है। 'ढमाके सेकुलर' मौके की नज़ाक़त भांप कर और उदास हो गए हैं।
इधर कुछ दिनों से फलाने और ढमाके, दोनो लोग मुझसे नाराज़ चल रहे हैं। इसका कारण ये है कि मैं दोनो लोगों से हँसकर बात करता हूँ। 'फलाने राष्ट्रवादी' को मेरी हँसी देखकर लगता है कि मैं राष्ट्रवाद को लेकर न तो गंभीर हूँ और न ही भावुक हूँ, अत: वो मुझसे नाराज़ रहते हैं।
'ढमाके सेकुलर' भी मुझे अपना दुश्मन समझने लगे हैं क्योंकि मेरी हँसी, उनकी उदासी को चोट पहुचाती है।
उन्हें डर है कहीं मेरी हँसी से अच्छे दिन ना आ जाएं।
मुझे भी उनकी फिक्र नहीं है, बस 'घर' की फिक्र है। जिसे फलाने और ढमाके मे मिलकर घर की जगह मरघट बना दिया है।

deepsarthak19@gmail.com

9198605670

Monday, 9 October 2017

अमित शर्मा का व्यंग्य


गुरुगिरी मिटती नहीं हमारी


हमारा देश हमेशा से ज्ञान का उपासक रहा है और इस पर कभी किसी को कोई शक नहीं रहा है। ज्ञान के मामले में हम शुरू से उदार रहे है,केवल बाँटने में यकीन रखते है। ज्ञान की आउटगोइंग कॉल्स को हमने सदा बैलेंस और रोमिंग के बंधनो से मुक्त रखा है। हमने विश्व को शून्य देकर अपने पुण्य को इसी में विलीन किया। ज्ञान की उपासना और पूजा कर हम ईवीएम में बिना किसी छेड़खानी के पूर्ण बहुमत से विश्वगुरु के पद आरूढ़ हुए थे जहाँ हमने बिना किसी घोटाले और नोटबंदी के पद की गरिमा और गरिष्ठता बनाए रखी थी। पद की ज़द में आने के बाद उसकी ज़िद छूटना मुश्किल होता है। पद के मद को किसी भी नशामुक्ति अभियान के ज़रिए त्यागना आसान नहीं होता है। जिस तरह से एक बार कोई व्यक्ति अगर सांसद/विधायक के पद को निपटा दे तो  फिर आजीवन अपने नाम के आगे पूर्व सांसद/विधायक सटाए रहता है ठीक उसी प्रकार एक बार विश्वगुरु के आसन पर आसीन होकर हमने इतना ऐतिहासिक सीन शूट कर दिया है कि अब भी हमारी "गुरुगिरी" के चर्चे है। हम ने अपने ज्ञान को इतना बुलंद कर दिया है कि अब ज़ब चाहे हम अपनी गुरुगिरी को गुरुत्वाकर्षण के पार भेज सकते है।

तमाम वैश्विक संकटो और झंझटो के बावजूद कुछ तो बात है कि "गुरुगिरी" मिटती नहीं हमारी। मुझे लगता है कि, हमारी गुरुगिरी इसीलिए भी नहीं मिटती क्योंकि हम हर गुरुपूर्णिमा को गुरुगिरी का रिन्यूअल करवा लेते है। इसके अलावा हम नियमित रूप से अपनी गुरुगिरी का रंग रोगन करवा के इसे नया बनाए रखते है। भारतवर्ष ने वर्षो से निस्वार्थ भाव से ज्ञान की गंगा बहाकर अज्ञान को शरण देकर उसका हरण किया है। इसी सदाशयता कि चपेट में आकर ज्ञान गंगा अब मैली हो चुकी है जिसे अब स्वच्छ्ता ही सेवा समझकर सरकारी तरीके से असरकारी बनाने के प्रयास ज़ारी है।  

हमने योग के ज़रिए ज्ञान मुद्रा का भी प्रसार किया और ज्ञान से मुद्रा भी अर्जित की। शांति और अहिंसा के सफ़ेद कबूतर उड़ाने से पहले हम चिड़िया उड़ खेला करते थे, हालाँकि उस समय देश सोने की चिड़िया हुआ करता था इसीलिए उस समय इस खेल का बाजार मूल्य देश की जीडीपी निर्धारित करता था। हालाँकि अब भी कई लोग पहले वाली फ़ीलिंग लाने के लिए सोकर ही चिड़िया उड़ाते है। 

पहले ज्ञान की बैलगाड़ी गुरुकुलो पर हाँकी जाती थी। अब ज्ञान स्कूल, कॉलेज,कोचिंग इंस्टिट्यूट्स की सवारी कर जल्द ही लंबी दूरी तय कर लेता है लेकिन सबसे अद्भुत बात यह है हम ज्ञान के लिए कभी शैक्षणिक संस्थानों या योग्यताओ पर निर्भर नहीं रहे। ज्ञान का उद्भव हमारे भीतर से होता रहा है और हर भारतीय इस प्रतिभा का मुकेश अंबानी है मतलब धनी है। बिना किसी कोच के शुरू से हमारी सोच रही है की, कराह रही इंसानियत को फर्स्ट एड से पहले ज्ञान की सख्त ज़रूरत है और इसके लिए इंसानियत पुस्तको और अध्ययन का इंतज़ार नहीं कर सकती है। अत: ज्ञान का उत्पादन स्वयं के भीतर से होना चाहिए। "अहं ब्रह्मास्मि" जैसे कल्याणकारी सूत्रवाक्य भी हमारी इसी सोच से उपजे है।

असाक्षरता जैसी समस्या कभी हमारे ज्ञान के आड़े नहीं आई क्योंकि हमारा ज्ञान बहुत महीन और सूक्ष्म है जिसे हम पतली गलियो से भी आराम से प्रवाहित करवा लेते है। चाहे देश भर में कहीँ भी किसी भी घटना की डिलीवरी हो,  सारे ऑन ड्यूटी गुरु अपने ज्ञान की तलवारे भांजने तुरंत अपने बिल में से बाहर आकर किसी ने किसी के नाम का बिल ज़रूर फाड़ते है। हर मुद्दे पर अपनी विशेषज्ञ राय रखकर हम लघुता को तलाक दे, अपनी गुरुता को कुपोषण से बचाकर पुष्ट करते है।

ज्ञान और गुरुओ का अथाह भंडार होने के बाद भी विश्व के विकसित देशो की तुलना में पिछड़ जाना हमारी सादगी, बड़प्पन और त्याग दर्शाता है क्योंकि हम विश्वगुरु होने के नाते किंग बन सकते थे लेकिन किंग या किंगमेकर कुछ ना बनकर हमने विकास की बाधा दौड़ की प्रतिस्पर्धा को कम किया है। 

हमारा मानना है कि विकास एक सरकारी कार्यक्रम है जो अपनी गति से चलना चाहिए जबकि गुरुगिरी हमारा एक निरंतर और शाश्वत प्रोजेक्ट है जो विश्व मानव के कल्याण के लिए सदियो से चला आ रहा है और इस मामले में अभी फिलहाल हमारे सामने बाकि सब फटेहाल है।


bhilwaraamit9@gmail.com

Monday, 2 October 2017

मूल्यांकन - 5 : विनोद कुमार शुक्ल

'स्पर्श' पर चल रही मूल्यांकन शीर्षक आलोचना श्रृंखला में विजेंद्र, विष्णु नागर, भगवत रावत और वीरेन डंगवाल के बाद इस क्रम में अब प्रस्तुत है वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल के कविता कर्म पर अख्तर अली का आलेख |



विनोद कुमार शुक्ल पढ़े जाने का सुख प्रदान करती कविताओ के कवि हैं

जो युवा घटिया साहित्य के स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गये है , उन्हें बतौर उपचार विनोद जी की रचनाओ का अध्ययन करना चाहिए उन्हें शीघ्र स्वास्थ लाभ होगा | साहित्य के इस कास्मेटिक युग में विनोद जी का लेखन नई राह दिखाने वाला लेखन है | गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर का काव्य लेखन जिस प्रकार लोगो के दिलो दिमाग में नशे की तरह छा गया था, वैसा ही प्रभाव विनोद जी का काव्य लेखन पैदा कर रहा है | लेखन का एक काल वह था लेखन का एक काल यह है |

ऐसे कवियों की सूची बहुत लम्बी है जो हमको प्रभावित करते है लेकिन विनोद जी तो दीवाना बना देते हैउनका अंदाज़े बयाँ तो देखिये

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मै नही जानता था
हताशा को जानता था /
इसलिए मै उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढाया
मेरा हाथ पकड़ कर वह खड़ा
हुआ
मुझे वह नही जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था /
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दुसरे को नही जानते
थे
साथ चलने को जानते थे |

विनोद जी कविताओं में गजब का संसार रचते है | इनके शब्द द्रृश्य,रंगलय, संगीत से ओत प्रोत होते है | इनके शब्द कविता में नृत्यांगना की तरह थिरकते है, अभिनेता की तरह मटकते हैबच्चे की तरह मचलते है | विनोद जी के शब्द कभी शिशु की तरह घुटने चलते है तो कभी खिलाडी की तरह उछलते है | कवि कविता में स्वयं से बात करता है ,खुद से सवाल करता है खुद को जवाब देता है लेकिन उसका काव्यात्मक हुनर खुद से पूछने को समाज से पूछना और खुद को जवाब देने को समाज को जवाब देने में की महीन कारीगरी में तब्दील हो जाता है | कहने सुनने का यह अंदाज़ देखिये

दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेगे की पूरी आशा से
सात समंदर पार चले जाना चाहिये
जाते जाते पलट कर देखना चाहिए
दुसरे देश से अपना देश
अन्तरिक्ष से अपनी पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होगे की याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होगे की होगी
घर में अन्न जल होगा की नहीं की चिंता
पृथ्वी में अन्न जल की चिंता होगी
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होंगा
और पृथ्वी की तरफ लौटना
घर की तरफ जैसा |

विनोद जी कविता में जीवन गढ़ते है | जीवन को जीने का सलीका सिखाने वाली कविताओं के कवि का नाम है विनोद कुमार शुक्ल | आपकी छोटी सी छोटी कविता में भी बहुत बड़ा उपन्यास समाहित है | भाषा को सरल से सरलतम बना देना और अर्थ को गहन से गहनतम कर देना ऐसे रचनाकार है विनोद जी | सौम्य भाषा, सामान्य विषय और कलात्मक शिल्प इन तीन विशेषताओ का यह काव्य शिल्पी कविता में धीरे से कहता है लेकिन उसकी झंकार दूर तक सुनाई देती है | कवि रच कर चुप हो जाता है फिर कई दशको तक उसकी रचना बोलती हैउनका पाठक बोलता हैसमीक्षक बोलता हैआलोचक बोलता है | कवि चुप हो जाता है कविता बोलती रहती है, बानगी देखिये आप स्वय कह उठेगे वह वह क्या लिखा है

‘’जो मेरे घर कभी नहीं आएगे
मै उनसे मिलने
उनके पास चला जाउंगा |
एक उफनती नदी कभी नहीं आऐगी मेरे घर
नदी जैसे लोगो से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाउंगा |
पहाड़,टीले ,चट्टानें ,तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आयेगे मेरे घर
खेत खलिहानों जैसे लोगो से मिलने
गाँव गाँव ,जंगल गलियाँ जाउंगा |
जो लगातार काम से लगे है
मै फुरसत से नहीं
उनसे एक जरुरी काम की तरह
मिलता रहूँगा |
इसे मै अकेली आखिरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा |’’

कविता की सबसे अच्छी बात यह होती है की कविता कभी खराब नहीं होती है ,वह या तो बहुत अच्छी होती है या थोड़ी कम अच्छी होती है , क्योकि कविता में कविता की वजह होती है ,उसकी ज़रूरत होती होती है ,उसके गर्भ में बेहतर जीवन जीने का संदेश होता है,प्रेम की महत्ता होती है ,प्रेम को बचाये रखना का निवेदन होता है ,अनहोनी की चेतावनी होती है , सावधान हो जाने का ऐलान होता है , इंसान की इंसानियत को बचाये रखने का प्रबंध होता है ,ज़ुल्म के खिलाफ निडर खड़े हो जाने का आव्हान होता है ,युद्ध का शंखनाद होता है | कविता निहित विचार के कारण कविता होती है अपने प्रारूप के कारण नहीं | जिसमे एक उम्दा सोच न हो भले वह कविता की शैली में लिखी गई कुछ शब्दों का जमावड़ा हो लेकिन हम उसको कविता नही मानते ,हम तो इसे कविता स्वीकार करते है

जाते जाते ही मिलेगे लोग उधर के
जाते जाते जा सकेगे उस पार
जाकर ही वहा पहुच जा सकेंगा
जो बहुत दूर संभव है
पहुच कर संभव होगा
जाते जाते छूटता रहेगा पीछे
जाते जाते बचा रहेगा आगे
जाते जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब
तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा
और कुछ भी नहीं में
सब कुछ होना बचा रहेगा |

विनोद जी कविता के माध्यम से पाठक को असहिष्णुता के रेगिस्तान से निकाल कर प्रेम और विश्वास की चांदनी रात में ले आते है | आप समय को भाषा की रात का समय होने नही देते ,इनके लेखन में सदैव भाषा प्रातः काल के समय में होती है | इन्होने कविता के सहारे सोच की स्व्च्छत्ता को खड़ा किया है | विनोद जी के पास कहने का जो लहजा है वह संयमित लहजा है ,नाराजगी में भी भरपूर नरमी समाहित है ,क्रोध और उत्तेजना का इनके लहजे में कोई स्थान नहीं ,बावजूद इसके भूख की चिंता में लिखी गई कविताये शांत स्वरूप की गुस्सैल रचनाये है , कविता में कवितापन को बचाने के लिये कवि ने कविता में चीखा भी बहुत शांति से है , और यह शांतिपूर्ण चीख वहां तक पहुची है जहाँ तक उसे पहुचना था या पहुचाना था , देखिये -

मै दीवार के ऊपर
बैठा
थका हुआ भूखा हूँ
और पास ही एक कौआ है
जिसकी चोच में
रोटी का टुकड़ा
उसका ही हिस्सा
छीना हुआ है
सोचता हूँ की आय
न मै कौआ हूँ
न मेरी चोंच है
आखिर किस नाक नक्शे का आदमी हूँ
जो अपना हिस्सा छीन नहीं पाता|

विनोद कुमार शुक्ल काव्य जगत के महानायक है | इन्होने समूचे काव्य जगत को सम्मानित किया है ,इन्हें पढने के पहले पढने की तैयारी करनी होनी चाहिए ,कवि पाठक की दृष्टि से नहीं लिखेगा लेकिन पाठक को उसे कवि की दृष्टि से पढ़ना आना चाहिए , पाठक को कवि की सोच तक पूरे सौ प्रतिशत पहुचना ही होगा | हमे खुद को कविता पढने वाले पाठक नही कविता समझने वाले पाठक बनाना होगा , कविता में सब कुछ स्पष्ट नही होता ये थोड़ी आधी अधूरी भी होती है ,कवि सिर्फ चिंगारी लगाता है विस्फोट हमे स्वयम होना होता है | विनोद जी की कविताओ का असर यह है कि ये पाठक को कवि कर देते है ,इनकी एक कविता पढो तो दस कविताये लिख सकने लायक बुद्धि चार्ज हो जाती है | विनोद जी की कविताये एक सांस में पढने वाली कविताये नहीं होती है , इन्हें धैर्य के साथ रुक रुक कर , समझ समझ कर पढना होता है ,इसमें निहित बिम्ब का आनंद लेना ही इन्हें पढने का सलीका है , पढ़ते पढ़ते आगे जाने के बाद फिर पीछे आना पड़ेगा तब पढने का सुख मिलेगा ,पहली बार में यह पंक्तिया स्पष्ट नही होने वाली ,जैसे-

(एक )
आकाश की तरफ
अपनी चाबियों का गुच्छा उछाला
तो देखा
आकाश खुल गया है |

( दो )
यह चेतावनी है
एक छोटा बच्चा है |

( तीन )
अब पड़ोस के घर जा रहा हूँ
दो कदम ही चला हूँ
घर से दूर ,
मै यात्रा में हूँ
तीर्थयात्रा में |

( चार )
बिहार के बाहर
एक बिहारी मुझे पूरा बिहार लगता है |

( पांच )
हाथी आगे आगे निकलता जाता था और
पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी ||

(छै)
मैंने पूर्वजो को कभी नहीं देखा
मै पूर्वजो के चित्रों को याद करता हूँ |

(सात)
पकडे गए जन्म से गूंगे का न बोल पाना
उसका जबान न खोलना बन जाता हो
और भीड़ को तब तक उसे पीटना है
जब तक उसकी बोली का पता न चले
तब बोली भाषा के झगडे में
एक गूंगे का मरना निश्चित है |

(आठ)
पहाड़ को बुलाने
आओ पहाड़मैंने नहीं कहा
कहा पहाड़मै आ रहा हूँ |
पहाड़ मुझे देखे
इसलिये उसके सामने खड़ा
उसे देख रहा हूँ
पहाड़ को घर लाने
पहाड़ पर एक घर बनाउगा |

यह जरूरी नही होता कि किसी रचनाकार का समूचा लेखन श्रेष्ठ ही हो ,कुछ रचनाये कमजोर और कुछ अस्वीकार भी होती है ,दृष्टिकोण सिर्फ रचनाकार का नहीं होता ,पाठको का भी अपना नजरियाँ होता है ,वह कृति को नकार भी सकता है ,पाठक सदैव नकारने वाली कृति को ही नकारता है | अनावश्यक नकारना पाठक का स्वभाव कभी नही होता | इंटरनेट में कविता कोश ब्लॉग में बच्चो की जो चौदह कविताये है वह कवि के कद की उंचाई की नही है | जिस तरह कुछ कम्पनियों ने तकनीकी खराबी के चलते अपने प्रोडक्ट को बाज़ार से वापस ले लिया उसी आधार पर रचनाकारों को भी अपनी अपेक्षकृत कमजोर रचनाओं को वापस मंगा लेने का प्रावधान होना चाहिए |


अखतर अली
आमानाकाकुकुर बेडा
रायपुर (छत्तीसगढ़)
मो. 9826126781
ईमेल– akakhterspritwala@yahoo.co.in