Saturday, 11 December 2021

‘बहुत कुछ है पर दिखता नहीं है कुछ भी’

- अनूप कुमार

      पिछले छह-सात दशकों की हिन्दी कविता में डा. रणजीत अपने वैचारिक तेवर और प्रयोगधर्मिता के चलते एक अलग स्थान बनाये हुए हैं। मूलतः मार्क्सवादी होने के बावजूद वे अपने आप को कभी विचारधारा के बने बनाये खाचों में फिट नहीं कर पाये। मार्क्सवादी क्रान्तियाँ निस्संदेह उनके लिए प्रेरणा का स्रोत रहीं परन्तु उन जनसंघर्षों के फलस्वरूप स्थापित हुई सर्वहारा की तानाशाहियों के साये तले पलते अन्याय और अत्याचार का भी उन्होंने अपनी कविताओं और शुरूआती दौर में लिखी गई कहानियों में जमकर विरोध किया। इस विरोध के चलते उन्हें पर्याप्त आलोचना और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का शिकार भी होना पड़ा। कुछ व्यक्तिगत कारणों से और कुछ समझ में न आने वाली बात का त्वरित विरोध करने की अपनी प्रवृत्ति के कारण वे कभी वामपंथी लेखन की राजनीति की मूलधारा में सम्मिलित नहीं रह सके। इस सब के बावजूद वे जीवन के नवें दशक में भी सक्रिय और सचेत हैं। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से वे अपने बच्चों के साथ बंगलुरू में रह रहे हैं। लेखन कार्य आयुजनित समस्याओं के चलते कुछ मन्द अवश्य हुआ है परन्तु बन्द नहीं हुआ। इधर उनका एक नया कविता संकलन प्रकाशित होकर आया है - बिगड़ती हुई आबोहवा। इस संकलन में उनकी पिछले दो दशकों की कविताएँ संकलित हैं। यद्यपि कुछ ऐसी कविताएँ भी हैं, जो पिछले संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

संकलन का आगाज़ उल्टे रस्तेशीर्षक कविता से होता है, जिसमें रणजीत ने उदारीकरण और वैश्वीकरण जैसे आकर्षक शब्दों के पीछे की सच्चाई को छह दोहों में बयान करने की कोशिश की है। विश्व व्यापार संगठन और दूसरे तमाम अन्तर्राष्ट्रीय इदारों की भूमिका पर एक दोहा बड़ा सारगर्भित बन पड़ा है - विषम खेल है, नियम उन्हीं के, वे निर्णायक/वे ही प्रतियोगी हैं, वे ही भाग्य विधायक।

इसके अतिरिक्त स्वागत मेंऔर दो षट्पदियाँभी इसी मौजूं पर लिखी गई कविताएँ हैं। काला कुआँ (ब्लैक होल)शीर्षक कविता ब्लैक होल के वैज्ञानिक सिद्धान्त पर लिखी गई उल्लेखनीय कविता है जो अस्तित्व और अनस्तित्व की गुत्थी को समझने का प्रयास करती है - बहुत कुछ है पर दिखता नहीं है कुछ भी/वास्तव में कुछ भी नहीं है/पर निगल जाता है सब कुछ को/डुबो देता है/एक अस्तित्वहीनता के अंधे कुएँ में/ नहीं, न पानी, न पृथ्वी, न हवा/ कुछ भी तो नहीं है/ पर सारे पदार्थों को बना देता है अपदार्थ।                                           

(पृष्ठ-5)

पर्यावरण डा. रणजीत के चिन्तन का एक महत्वपूर्ण बिन्दु रहा है। उन्होंने काफी पहले पर्यावरण विषयक हिन्दी कविताओं का एक संकलन खतरे के कगार तकभी सम्पादित किया था। पर्यावरण प्रदूषण और परमाणु युद्ध के सन्दर्भ में उनकी कविताएँ प्रभावशाली बिम्ब प्रस्तुत करती हैं। इस संकलन में भी उनकी एक कविता परेशान मत करो, बच्चों!उनके पर्यावरण चिन्तन को प्रतिबिम्बित करती है-

मात्र मिट्टी, बालू, पत्थरों का ढूह नहीं है यह/जीवित, जागृत, जंगम है यह पृथ्वी/एक अरब जीव-प्रजातियों का/हलचल-भरा वैश्विक मधुछत्ता/यह साँस लेती है, धड़कती है/सोती है, जागती है/करूणा और क्रोध करती है।                                                                           

(पृष्ठ-20)

कुछ वर्षों पहले उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में किन्नरों की राजनैतिक सफलता ने सबको अचंभित कर दिया था। कई स्थानों पर किन्नरों ने स्थानीय निकाय के चुनावों में जीत हासिल की थी। इसके अनेक राजनैतिक निहितार्थ निकाले गए। किसी ने इसे वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था से मतदाताओं का मोहभंग बताया, तो कुछ लोगों ने दूसरे कारण बताये। किन्नरों की जीतउसी दौर में लिखी गई कविता है, जिसमें कवि इससे अचंभित तो दिखता है, इसमें कुछ व्यवस्थागत संदेश भी देखता है परन्तु किसी परिवर्तनकामी प्रवृत्ति से नहीं जोड़ता। अंततः हुआ भी यही, धीरे-धीरे वह प्रवृत्ति समाप्त हो गई और राजनीति फिर उसी ढर्रे पर चलने लगी -

पर गोरखपुर की जनता ने/किसी स्थापित राजनीतिक दल की गोद में जाने के बजाय/एक हिजड़े की बंजर गोद पसंद की/क्या यह जनता की मसखरी थी/आशादेवी के साथ?/या मतदाता यह देखना चाहते थे देखें/हिजड़े क्या करते हैं राजनेता चुने जाने के बाद?

मिल्कियतशीर्षक कविता आरक्षण और विभिन्न कानूनों के ज़रिए सामाजिक समानता और न्याय प्राप्त करने की मृगमरीचिका और उसकी परिणति को प्रदर्शित करती है - तुम चाहे जितने कानून बनवा लो नये नये/मिल्कियत तो हमारे ही पास रहेगी/तुम प्रधान की सीट आरक्षित कर दो/औरतों के नाम/हम अपनी ठकुरानी या बहू को लड़वा देंगे/ सीट पिछड़ी जाति की हुई तो/हम अपने दूधिये को खड़ा कर देंगे/ तुम सीट अनुसूचित जाति की घोषित करो/हम अपने धोबी या नाई को लड़वा देंगे                                                          

                                                                           (पृष्ठ-6)

इस क्रम में असली क्रान्तिशीर्षक कविता भी सामाजिक समानता और न्याय के संघर्ष तथा उसके उद्देश्य पर एक सार्थक टिप्पणी करती प्रतीत होती है -

घोड़े पर सवार एक चमार/चाबुक बरसा रहा है/घोड़े से उतार दिये गये एक ठाकुर साहब पर/सचमुच एक क्रांति आ गई है/पैदल सवार हो गये हैं/और सवार पैदल/उन्होंने अपनी जगहें बदल ली हैं/पर घोड़े और चाबुक?/ वे ज्यों के त्यों हैं/असली क्रांति तो वह होगी जिसमें/न घोड़े रहेंगे, न चाबुक/सब पैदल होंगे अपने ही पांवों पर चलते हुए।                                                           

(पृष्ठ-30)

इसी विचार बिन्दु के आस-पास घूमती कविता हो सारा संसार बराबरभी अच्छी बन पड़ी है, जो विचार के साथ साथ शिल्प को भी साधे रखने की कवि की कुशलता को अभिव्यक्त करती है -

मालिक और मजूर बराबर/बाम्हन और चमार बराबर।/एक एक को दस दस बंगले/यह अन्याय अपार बराबर।/रोटी, कपड़ा, घर इलाज पर/सबका हो अधिकार बराबर।                                               

(पृष्ठ-70)

बचा रहूंगा मैंभी एक अदभुत कविता है जो इस विचार के इर्द गिर्द घूमती है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति किस तरह से उन तमाम लोगों की स्मृतियों में जीवित रहता है, जिन से उसका कभी न कभी कोई सम्पर्क रहा हो या उसके नाम अनाम पाठक भी उसको जीवित रखते हैं अपनी स्मृतियों में -

मैं भी रहूंगा/रहूँगा अपने बच्चों की स्मृतियों/ अपनी किताबों में/-अगर उनमें से कोई बची रही/ किसी घर, किसी पुस्तकालय में। रहूंगा अपने अनगिनत विद्यार्थियों, श्रोताओं/ सामाजिकों की स्मृति में/दूकानदारों, सब्जीवालों,/बिजली ठीक करने /वाले मिस्त्रियों /राजगीरों, बढ़इयों, घरेलू नौकरानियों, रिक्शेवालों/ और स्कूटर मैकेनिकों की स्मृतियों में/ जिन जिन से मेरा साबका पड़ा है इस जीवन में/ वनस्थली विद्यापीठ और बांदा और बीकानेर की/उन छात्र-छात्राओं की स्मृतियों में                                                                            

(पृष्ठ-47)

शान्ति से मरूंगा मैंइस संकलन की मूल्यवान कविताओं में से एक है। इस रचना में तमाम सफलताओं-असफलताओं और जय-पराजय के बावजूद जीवन को सार्थक ढंग से जीने का संतोष दिखता है - शान्ति से मरूंगा मैं/बिना किसी कष्ट के/मैंने जीवन को भरपूर जिया है/भर भर कर पिया है प्याला/और छलकाया है उसे चारों ओर/संघर्ष किया है मैंने उदग्रीव, उर्ध्वबाहु जुल्म से जबर से/यह नहीं कि सफल ही रहा हूँ/उसमें हारा भी हूँ/हुआ हूँ हताश भी अनेक बार/पर गम नहीं पाला उस हार का/टूटा नहीं हूँ कभी।

इसी रचना की अगली पंक्तियों में मृत्योपरांत अंगदान और शरीरदान के जरिए भी जीवन को सार्थक बनाने का अद्भुत उल्लास दिखता है - मेरी आँखें/अंधेरे में टटोल रहे/किसी दलित, अल्पसंख्यक/शोषित-पीड़ित स्त्री को, बच्चे को/देंगी नवजीवन का प्रकाश --/गुर्दे भी काम आ जाएँ शायद/किन्हीं जरूरतमंदों के/नष्ट नहीं करूंगा लेकिन/शेष बचे तन को भी जलाकर या दफना कर/पढ़ें इसे एक पाठ्यपुस्तक की तरह छात्र/चिकित्सा विज्ञान की प्रयोगशाला में।                                        

(पृष्ठ-47)

हर युग में साहित्य की दो समानांतर धाराएँ अस्तित्व में रही हैं। एक ओर जनपक्षधर विद्रोही धारा रही है तो दूसरी ओर दरबारी, मठवादी और सत्ता के करीब रहने वाली धारा भी समानांतर चलती रही है। दूसरी धारा कई बार सृजनात्मक रूप से कमजोर होने के बावजूद भी साहित्यिक चर्चा परिचर्चा का हिस्सा बनी रहती है, तो पहली धारा जनजीवन से जुड़कर भी साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा से दूर रहती है। अशोक वाजपेयी की एक कविता सुनकरसाहित्य और कला क्षेत्र में व्याप्त तमाम तरीके के जोड़-तोड़ और गोलबन्दी पर बेहतरीन टिप्पणी है-

      कुछ लोग जो मुझसे ज्यादा सफल हुए/ज्यादा मान्य, ज्यादा प्रसिद्ध/ज्यादा ऊँचे पदों तक पहुंचे/ज्यादा सम्मानित किये गये/नज़दीक पहुंचे कुछ ज्यादा बड़े लोगों के/ज्यादा बार छपे स्तरीय पत्रिकाओं में/ज्यादा भाषाओं में अनूदित किये गये/उन पर तरस आया आज पहली बार/विचारों से कुछ ज्यादा ही कीमत/ वसूल कर ली इन उपलब्धियों ने।  मुझसे कम ही कर पाये अपने जीवन से प्राप्त।/नहीं तो क्यों करनी पड़ती उन्हें अपने आखिरी दौर में यह प्रार्थना:/एक जीवन ऐसा भी दें प्रभु!/तन कर खड़े रह सकें जिसमें/बिना घुटने टेके।                                                   

(पृष्ठ-64)

डा. रणजीत ने प्रेम कविताएँ भी लिखी हैं परन्तु उनका प्रेम-कविताएँ सामान्य प्रेम कविताओं से अलग हैं। उनकी कुुछ कविताएँ स्त्री-पुरूष के मध्य समानता पर आधारित सम्बन्धों की वकालत करती हैं तो कुछ कविताएँ दैहिक अनुभूतियों को भी एक अलग अंदाज में प्रस्तुत करती है। निस्संदेह इन कविताओं में सेक्स को लेकर भी एक अलग दृष्टिकोण है क्योंकि वह स्त्री-पुरूष सम्बन्धों का एक अनिवार्य भाग है -

जब तुम मेरे शरीर को सहलाती हो/मेरी आँखें बंद क्यों हो जाती हैं?/क्योंकि त्वचा सबसे प्राचीन इन्द्रिय है/ और आँखें सबसे बाद की/विकास के क्रम में।                             

(प्राक्जान्त्विक आस्वाद, पृष्ठ-45)

इसी प्रकार तुम्हें चूम कर’, ‘परीक्षा और प्यार’ ‘दर्पण व्यक्तित्व’ ‘कभी-कभी’ ‘चूमा कर’,‘अच्छी लगती हैऔर प्रियेभी उल्लेखनीय प्रेम कविताएँ हैं।

      डा. रणजीत की कविताओं से गुजरना अनुभव और अनूभूतियों के एक अदभुत संसार से गुजरने जैसा है। जीवन के विशाल कैनवास में फैली उनकी रचनाओं में विज्ञान के अदभुत रहस्यों को जानकर उत्पन्न आश्चर्य है, तो औद्योगिक सभ्यता के द्वारा नष्ट की जा रही प्रकृति की चिन्ता भी; सामाजिक मसले हैं, तो स्त्री-पुरूष प्रेम की नितान्त व्यक्तिगत अनुभूतियाँ भी। इस काव्य-संकलन की कुछ कविताएँ नितान्त साधारण हैं और कविता कम, सपाट बयानी ज्यादा लगती हैं। कुल मिला कर बिगड़ती हुई आबोहवाडा. रणजीत के रचना-संसार के विभिन्न आयामों को दिखाता एक पठनीय काव्य संकलन है।

- अनूप कुमार

200, नरोत्तम नगर, सिधौली, सीतापुर-261303    

 

Thursday, 18 November 2021

लेखा-जोखा


व्यंग्य परिक्रमा 2021

-    राहुल देव

 

रचनात्मक रूप से लगातार अच्छा लिखने की छटपटाहट बहुत अच्छी चीज हैं लेकिन मेरा मानना है कि यह एक जेनुइन लेखक का स्वाभाविक गुण है। खुद को बेहतर करने की प्रक्रिया कोई कौंध के रूप में नही बल्कि निरंतर चलती रहती है बहुत ही धीमी आंच की तरह। जिसकी गवाह उसकी समग्र रचनायात्रा होती है। ऐसे में लेखक या कवि को चाहिए कि बस अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए रचने का आनंद/ पीड़ा महसूस करते हुए देखे कि क्या वह अपनी रचना में वह कह सका जो वह सोचते हुए कहना चाहता था। अगर आप खुद के लिखे हुए से संतुष्ट हैं, अपने शब्दों पर अपनी भाषा पर आपको विश्वास है तो कोई बड़ी चिंता की बात नही। आज चुनौतियां निश्चित रूप से बड़ी हैं लेकिन उन्हें अपने ऊपर हावी नही होने देना चाहिए। सब छोड़ दीजिए बस स्वतंत्र रूप से रचिये। बाज़ार ने लोगों का टेस्ट बदलकर रख दिया है, लेखक/कवि भी उससे अछूते नही। हमें उसके झांसे में नही आना चाहिए। समकालीन व्यंग्य को लेकर बहुत सारी चिंताएं हैं । व्यंग्य जगत में संवाद से ज्यादा विवाद चलते रहते हैं। कविता, कहानी में इतनी उखाड़-पछाड़ देखने को नही मिलती | मुझे लगता है कि इसका एक कारण यह भी है कि व्यंग्य लेखन को लोग बहुत हल्के में लेते हैं जबकि यह अपने आपमे अत्यंत कठिन व गंभीर साहित्यिक विधा है। अलेखकों और मीडियाकरों के अंकुशहीन प्रवेश से माहौल दूषित हुआ है इन दिनों। सार्थक आलोचना के अभाव में पाठक के समक्ष भी भ्रम की स्थिति हो गयी है। बाजार की आवश्यकता और सोशल मीडिया की इसमें बड़ी भूमिका है। सार्थक और चिंतनशील रचनाशीलता को बचाना एक चुनौती है फिलहाल। हर साल की तरह इस साल भी हिंदी व्यंग्य साहित्य की तमाम किताबें इस साल प्रकाशित हुईं जिनका वार्षिक लेखा-लोखा यहाँ पाठकों के सुलभ सन्दर्भ हेतु प्रस्तुत किया जा रहा है |

व्यंग्य लेखकों में इस साल अरविन्द तिवारी और अश्विनी कुमार दुबे ने जमकर लिखा और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं | इंडिया नेटबुक्स से अरविन्द तिवारी का व्यंग्य संग्रह ‘पुरस्कार की उठावनी’ प्रकाशित हुआ जिसमे लॉकडाउन समय में लिखे गये उनके चालीस व्यंग्य शामिल हैं | साहित्य और कोविड इस संग्रह के प्रमुख व्यंग्य विषय रहे | वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से एक साफ़-सुथरे और विषयगत विविधता को समेटे हुए ‘अरविन्द तिवारी के संकलित व्यंग्य’ शीर्षक व्यंग्य संग्रह का प्रकाशन भी हुआ | अश्विनी कुमार दुबे की बात करूँ तो उनके एक के बाद एक लगातार चार व्यंग्य संग्रह आए पहला ‘इधर होना एक महापुरुष’ प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता से, दूसरा ‘माया महा ठगनी हम जानी’ शिवना प्रकाशन, सीहोर से, तीसरा ‘बरसात ने दिल तोड़ दिया’ इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल से और चौथा ‘करतब जमूरों के’ इंक पब्लिकेशन, इलाहाबाद से | इन तीनों पुस्तकों को मिला लें तो इस साल उन्होंने ढाई सौ से अधिक व्यंग्य लिखे | दुबे जी की विसंगतियों का सौन्दर्यबोध कलात्मक चिंतन की भंगिमा लिए हुए रहता है इसलिए अधिक मात्रा में लिखने के बावजूद वे अपनी व्यंग्य रचनाओं की पठनीयता बचा ले जाते हैं | उनकी रचनात्मक सक्रियता चकित करती है | हालांकि प्रकाशक उनकी पुस्तकों के मूल्य इतने अधिक रखते हैं कि वे आम पाठक की पहुँच से बाहर ही प्रतीत होती हैं |

 


अपने आपको व्यंग्य का उदण्ड विद्यार्थी कहने वाले सुनील जैन राही की दो किताबें इस साल आयीं | बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित व्यंग्य विमर्श की पुस्तक 'व्यंग्य का केवाईसी' तथा व्यंग्य संग्रह 'साहब की फुंसी' | व्यंग्य विमर्श की इस जरूरी पुस्तक में आपने लगभग सभी चर्चित विद्वानों के आलेख एक जगह संकलित कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। होता यह है कि व्हाट्सएप व फेसबुक पर होने वाली चर्चाओं पर आने वाले विचार एक साथ किसी पुस्तक के रूप में न आ पाने के कारण उनकी भविष्य की उपादेयता समाप्त हो जाती है।  व्यंग्य में आलोचना की वैसे ही बड़ी कमी है जिसे आप की यह पुस्तक पूरा करने का विनम्र प्रयास करती है। 'साहब की फुंसी' राही जी का चौथा व्यंग्य संग्रह है | उनके इस संग्रह के व्यंग्य पढ़कर पता चलता है कि आपके भीतर नैसर्गिक व्यंग्य प्रतिभा है। आपने समय के साथ अपनी व्यंग्य शैली को बहुत विकसित कर लिया है। इस पुस्तक में शामिल आपके चुनिंदा 46 व्यंग्यलेख व्यंग्य प्रदेश में आपकी सतर्क व सशक्त उपस्थिति का परिचय देने में पूर्णता समर्थ हैं। आपने बहुत ही सरल-सहज, आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग कर अपनी वाग्विदग्धता से समकालीन सामाजिक- राजनीतिक विसंगतियों की जमकर खबर ली है। इन व्यंग्य लेखों में प्रवृत्तियों को लेकर लेखक की समझ और पक्षधरता सराहनीय है। संग्रह में बीच-बीच में आने वाले सूक्तिपरक वाक्य लेखकीय कलम की धार प्रकट करते हैं और बताते हैं कि व्यंग्यकार की पैनी नजर से बच पाना बहुत मुश्किल है।

 


बिहारी बाबू विनोद कुमार विक्की खूब सक्रिय रहने वाले व्यंग्यकार हैं | दीक्षा प्रकाशन से उनके सम्पादन में 23 व्यंग्यकारों का साझा व्यंग्य संग्रह ‘खरी-खरी’ प्रकाशित हुआ | साझा व्यंग्य संकलनों के क्रम में चक्रवर्ती व्यंग्य लेखक लालित्य ललित के सम्पादन में हम 3 हमारे 30 साझा संग्रह इसी वर्ष शाया हुआ | डॉ लालित्य ललित, हरीश कुमार सिंह के संयुक्त सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से 75 श्रेष्ठ व्यंग्यकारों की रचनाओं का संचयन ‘अब तक 75’ शीर्षक से छपा | इस साल नॉएडा के प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स ने व्यंग्य विधा की सर्वाधिक किताबें प्रकाशित कीं | अन्य प्रकाशित संकलनों की बात की जाय तो उनमे राजस्थान के सक्रिय व्यंग्य लेखक फारूख आफरीदी और कविता मुखर के सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ‘चटपटे शरारे’ शीर्षक व्यंग्य संकलन प्रकाशित हुआ | लालित्य ललित और राजेश कुमार के सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ‘इक्कीसवीं सदी के 251 अंतर्राष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार’ नामक व्यंग्य संकलन निकला |

व्यक्तिगत व्यंग्य संग्रहों की बात करें तो उनमे भावना प्रकाशन नयी दिल्ली ने लालित्य ललित का 25वाँ व्यंग्य संग्रह ‘मुर्गे बेहद खुश हैं’, रश्मि प्रकाशन लखनऊ से डॉ राकेश ऋषभ का व्यंग्य संग्रह ‘जादू की छड़ी’, राजमंगल प्रकाशन से डॉ जवाहर धीर का व्यंग्य संग्रह ‘टेढ़ी गर्दन वाला शहर’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से डॉ पिलकेंद्र अरोड़ा का व्यंग्य संग्रह ‘श्री गूगलाय नमः’,  राजपाल एंड संस नयी दिल्ली से वरिष्ठ व्यंग्यशिल्पी डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का नया व्यंग्य संग्रह ‘नेपथ्य लीला’, सर्वप्रिय प्रकाशन दिल्ली से डॉ प्रदीप उपाध्याय का व्यंग्य संग्रह ‘ये दुनिया वाले पूछेंगें’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से दीनदयाल शर्मा का संग्रह ‘एक ही उल्लू काफी है’, बोधि प्रकाशन जयपुर से जसविंदर शर्मा का नया संग्रह ‘उलझा हुआ यक्ष प्रश्न’ नाम से आया, वंश पब्लिकेशन भोपाल से राजशेखर चौबे का व्यंग्य संग्रह ‘निठल्लों का औजार’, भावना प्रकाशन नयी दिल्ली ने युवा लेखक राकेश सोहम का व्यंग्य संग्रह ‘टांग अड़ाने के मज़े’, अक्षरा पब्लिशर्स दिल्ली से वरिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज का व्यंग्य संग्रह ‘पत्नी पीड़ित संघ’, सुदर्शन सोनी का हास्य-व्यंग्य संग्रह ‘पतियों का एक्सचेंज ऑफर’, ‘बाथरूम में हाथी’ सुदर्शन वशिष्ठ का व्यंग्य संग्रह इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से, बोधि प्रकाशन जयपुर से इंदौर के वरिष्ठ व्यंग्य लेखक ब्रजेश कानूनगो का संग्रह ‘पाषाणपुष्प का किस्सा’ नाम से छपा, किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर ने वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल का व्यंग्य संग्रह ‘गांधीजी का चश्मा’ नाम से प्रकाशित किया, इनके अतिरिक्त इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से रामस्वरूप दीक्षित का व्यंग्य संग्रह ‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ही प्रभात गोस्वामी का संग्रह ‘चुगली की गुगली’, इंडिया नेटबुक्स से ही अशोक गौतम का व्यंग्य संग्रह ‘अतिथि करोनो भवः’, अद्विक पब्लिकेशन से सूरज प्रकाश का व्यंग्य संग्रह ‘डॉक्टर साहिबा के डोगिज बीमार हैं’, इंडिया नेटबुक्स से वीरेंद्र नारायण झा का व्यंग्य संग्रह ‘राईट टू गाली’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ही देवकिशन राजपुरोहित का संग्रह ‘मेरा गधा गधों का लीडर’, संस्मय प्रकाशन से लालित्य ललित के संग्रह ‘पाण्डेय जी छज्जे पर’ तथा इंक पब्लिकेशन से युवा व्यंग्यकार अलंकार रस्तोगी के व्यंग्य संग्रह ‘जूते की अभिलाषा’ आदि उल्लेखनीय रहे |



प्रकाशन के क्षेत्र में इसी साल कदम रखने वाले प्रयागराज के रुद्रादित्य प्रकाशन से वरिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज सामाजिक विसंगतियों के व्यंग्यात्मक आख्यानों की पुस्तक ‘एक था रावण’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ | वरिष्ठ व्यंग्य लेखक डॉ प्रेम जन्मेजय की व्यंग्य कहानियों का संग्रह ‘तीसरी प्रेमिका’ प्रलेक प्रकाशन मुंबई ने प्रकाशित किया, वरिष्ठ व्यंग्य लेखिका सूर्यबाला के व्यंग्य संग्रह ‘भगवान ने कहा था’ का नया संस्करण प्रभात प्रकाशन नयी दिल्ली से इसी साल प्रकाशित हुआ | लम्बे समय से लिख रहे व्यंग्यकार श्रीकांत चौधरी का व्यंग्य संग्रह ‘गिद्धों का प्रजातंत्र’ इंडिया नेटबुक्स से छपा | 5 विशिष्ट व्यंग्यकारों ज्ञान चतुर्वेदी, आलोक पुराणिक, सूर्यबाला, प्रेम जन्मेजय, हरीश नवल के साक्षात्कारों को लेकर डॉ पिलकेंद्र अरोरा के सम्पादन में वनिका पब्लिकेशन बिजनौर से ‘साक्षात व्यंग्यकार’ शीर्षक पुस्तक आयी |

व्यंग्य उपन्यासों में वर्तमान व्यंग्य के शीर्ष व्यक्तित्व डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का छठा व्यंग्य उपन्यास ‘स्वांग’ राजमकल प्रकाशन नयी दिल्ली ने प्रकाशित किया जोकि पाठकों के मध्य अपनी विषयवस्तु, पठनीयता और समग्र व्यंग्य दृष्टि के कारण काफी सराहा गया | हिंदी कवि सम्मेलनों के यथार्थ को लेकर लिखा गया अरविन्द जी का चौथा व्यंग्य उपन्यास ‘लिफाफे में कविता’ का प्रकाशन इसी वर्ष प्रतिभा प्रतिष्ठान नयी दिल्ली से हुआ | जयपुर के लेखक डॉ अजय अनुरागी का पहला व्यंग्य उपन्यास ‘जयपुर तमाशा’ किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर से प्रकाशित हुआ | व्यंग्य लेखिका मीना अरोड़ा का हास्य-व्यंग्य उपन्यास ‘पुत्तल का पुष्पवटुक’ शब्दाहुति प्रकाशन दिल्ली से और पेनमेन इन्फोटेक गाज़ियाबाद से यशवंत कोठारी के ‘तीन लघु व्यंग्य उपन्यास’ शीर्षक से एक ही जिल्द में प्रकाशित हुआ |

गद्य व्यंग्य की तुलना में पद्य व्यंग्य के क्षेत्र में कम ही किताबें इस साल आयीं | वनिका पब्लिकेशन बिजनौर से लखनऊ के व्यंग्यकार सूर्यकुमार पाण्डेय की व्यंग्य विनोद कविताओं का संग्रह ‘खरी-मसखरी’ शीर्षक से आया | इसके अतिरिक्त मेरी नज़र में व्यंग्य कवि जयशंकर सोनोलिया का व्यंग्य काव्य संग्रह ‘झंडा-डंडा-प्रजातंत्र’ राजमंगल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ |



समग्र और आलोचना के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण किताबें प्रकाश में आयीं जिसका जिक्र करना जरुरी है | इसमे पहली पुस्तक साठोत्तरी हिंदी व्यंग्य लेखन के चर्चित हस्ताक्षर ‘प्रो. अशोक शुक्ल समग्र’ रहा जिसका सम्पादन डॉ राहुल शुक्ल ने किया है | यह समग्र संकल्प प्रकाशन कानपुर से प्रकाशित हुआ | दूसरी किताब डॉ सुरेश माहेश्वरी की ‘व्यंग्यालोचन का इतिहास’ रही जिसे विकास प्रकाशन कानपुर ने प्रकाशित किया | मेरे स्वयं के संयोजन एवं सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स ने भी साक्षात्कार के फॉर्म में एक व्यंग्य विमर्श की पुस्तक ‘आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ’ शीर्षक से प्रकाशित की |

‘व्यंग्य यात्रा’ के कई महत्वपूर्ण अंक तो आए ही साथ ही ‘अनवरत’ पत्रिका का व्यंग्य यात्रा के यशस्वी संपादक प्रेम जन्मेजय पर केन्द्रित विशेषांक भी निकाला | वाराणसी से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘सोच विचार’ ने भी वरिष्ठ लेखिका सूर्यबाला पर अपना अंक केन्द्रित किया | कोलकाता से प्रकाशित ‘मुक्तांचल’ त्रैमासिकी का डॉ पंकज साहा के अतिथि सम्पादन में व्यंग्य विशेषांक भी इसी साल आया जिन्हें काफी सराहा गया |

इन सभी किताबों में कुछ को पाठकों का प्यार मिला तो कुछ को पाठकों ने सिरे से खारिज़ कर दिया | कुछ पुस्तकालयीय खरीद की भेंट चढ़ गयी तो कुछ ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर धूम मचाई | कुछ मिलाकर लेखकों को यह समझ लेना चाहिए है कि सार्वजनीन लेखन के क्षेत्र में पाठक हमारा पार्टनर है। रचना में हम उससे झूठ नही बोल सकते। हमारा काम रचना में जवाब देते रहना नही होना चाहिए बल्कि हम सवाल का आईना रखते जाएं, जवाब उसे खुद खोजने दें। कला अपने सामाजिक अर्थ में यथार्थ का सामना ऐसे ही करती है। रचना जीवन को अलग अलग कोणों से देखती है, उसके भीतर झांकती है। कला कोई तत्व नही बल्कि एक दबाव है। रचना कला के उस दबाव की परिणति है। हम भाषा मे व्यंग्य का कारोबार न चलाएं जो वास्तव में व्यंग्य है ही नही। असली व्यंग्य क्या होता है यह हमारी परंपरा हमें बताती है जिसे पढ़कर, गुनकर आत्मसात कर ही समझा जा सकता है। लिखने से पहले आप सोचिये कि क्या व्यंग्य आपके लिए पैशन है। आप जिस चीज़ के बारे में पैशनेट होते हैं, उसके बारे में लगातार बातें करते रहते हैं। मेरे लिए आलोचनात्मक अर्थों में व्यंग्य के बारे में लगातार बातें करते रहना यही है। व्यंग्य की सर्वस्वीकृति के लिए साहित्यिकता और मनोरंजन की प्रवृत्ति के बीच के अंतर को समझना होगा | मेरा मानना है कि हँसने वाला व्यक्ति अपनी मौलिकता में ज्यादा गंभीर होता है | व्यवस्था की खामियों को व्यंजना में ढालकर प्रस्तुत करना ही व्यंग्य की खूबसूरती है | यह खूबसूरती आने वाले साल दर साल कायम रहेगी ऐसी उम्मीद हम इस विधा में काम करने वाले हर एक लेखक से करते हैं |

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9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर उ.प्र. 261203

Saturday, 11 September 2021

अच्छी रचना दोषरहित हो यह आवश्यक नहीं - श्रीलाल शुक्ल

{श्रीलाल शुक्ल जी से प्रख्यात कथाकार एवं साहित्यिक पत्रिका तद्भव के संपादक अखिलेश से हुई बातचीत। यह बातचीत तद्भव के प्रवेशांक के मौके पर हुई थी। तद्भव का पहला अंक श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित था। इस इंटरव्यू में श्रीलाल जी ने अपने उपन्यास रागदरबारी, लेखन प्रक्रिया, निजी जिन्दगी और पसंद-नापसन्द से जुड़े अनेक सवालों का जबाब दिया था |}

 

सवाल- बचपन का गांव किस तरह याद करते हैं?

जबाब- जसके दो पक्ष हैं। जमींदारी वाले दिनों की व्यवस्था में जकड़ा हुआ गांव जिसमें अलग-अलग जातियों की अपनी-अपनी परम्परायें, अपने तौर तरीके थे। किसी भी तरह की वर्ग चेतना नहीं थी। हर आदमी की अपनी हैसियत मुकर्रर थी। गंदी गलियां, बच्चे रास्ते आदि थे और एक भी पक्का मकान नहीं था। दूसरा पक्ष परिवेश और प्रकृति का था। गांव के तीन ओर खेत और विस्तीर्ण जंगल थे। चौथी ओर लखनऊ जाने वाली सड़क थी और घनी अमराइयों का सिलसिला था। आज जब उस गांव के बारे में सोचता हूं तो वह एक ओर कई अद्भुत व्यक्तित्वों और दूसरी तरफ अपनी प्राकृतिक मोहकता के कारण याद आता है।

 

सवाल- उस गांव में आप बड़े हो रहे थे। घर परिवार, साहित्यिक वातावरण कैसा था?

जबाब- गांव में मेरे वंश के कई परिवार थे जिनमें दो सम्पन्न थे,बाकी बहुत गरीब थे। मेरा परिवार गरीबों कापरिवार था पर पिछली दो-तीन पीढ़ियों से पढन-पाठन की परम्परा थी। बचपन से लेकर १९४८ तक जब मुझे विपन्नता के कारण एम.ए. और कानून की पढ़ाई छोड़नी पड़ी गरीबी तथा साहित्य के प्रति अदम्य आग्रह, इम तत्वों के द्वारा मेरे व्यक्तित्व का संस्कार

होता गया।

 

सवाल- आपने अपने परिवार में दो तीन पीढ़ियों से पठन पाठन की परम्परा की बात कही है, उसके बारे में कुछ अधिक बतायें।

जबाब- मेरे बाबा अध्यापक थे और उर्दू फारसी की सामान्य जानकारी के साथ संस्कृत के बहुत अच्छे पंडित थे। उनके द्वारा रचित कुछ श्लोक भी उपलब्ध हैं। मेरे पिता बहुत छोटे किसान थे; उन्होंने स्कूली शिक्षा नहीं पायी थी पर हिंदी, उर्दू, संस्कृत का उन्हें सामान्य ज्ञान था। पिता के चचेरे भाई चंद्रमौलि शुकुल १९०७ के ग्रेजुएट थे और बी.ए. की परीक्षा में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। अपने समय के वे अच्छे लेखक और शिक्षाशास्त्री थे। इस वातावरण के कारण मुझे १०-११ वर्ष की अवस्था से ही हिन्दी की तत्कालीन सभी पत्र-पत्रिकायें और पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिलने लगा था; उसी के साथ साहित्यिक रचना का प्रोत्साहन भी।

 

सवाल- उक्त प्रोत्साहन से क्या-क्या लिखा?

जबाब- बहुत अच्छा है कि उन दिनों की लिखी हुई चीजें अब उपलब्ध नहीं हैं। पर ग्यारह वर्ष की अवस्था से लेकर उन्नीस वर्ष तक मैंने उन दिनों के फैशन के अनुकूल न जाने कितनी कवितायें लिखीं, कहानियां लिखीं और उपन्यास भी लिखे, कुछ आलोचनात्मक निबंध भी। इनमें से कुछ की प्रशंसा भी हुई और कुछ कवितायें छपीं भी। इनमें से दो-तीन कहानियां मेरे संग्रह 'यह घर मेरा नहीं है' में देखी जा सकती हैं जैसे 'अपनी पहचान' और 'सर का दर्द'। पर बी.ए. तक आते-आते मेरा रचनात्मक उफान खत्म हो गया था और मैं अपनी शिक्षा तथा जीवन यापन की समस्याओं में धंस गया था।

 

सवाल- लेखन में वापसी कब और कैसे संभव हुई?

जबाब- लिखने से विरत हो जाने के दिनों में भी मैं आधुनिक हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य बराबर पढ़ता रहता था। उ.प्र. प्रशासनिक सेवा में मेरे आ जाने के बाद १९५३-५४ में हमीरपुर जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में रहते हुये वहां के अपेक्षाकृत शांत जीवन में मुझे पुन: लिखने की प्रेरणा मिली। एक रेडियो नाटक की रूमानियत और अवास्तविकता से भरी हुई प्रवृत्ति के खिलाफ प्रतिक्रिया दिखाते हुये मैंने 'स्वर्णग्राम और वर्षा' नाम की एक घोर यथार्थपरक व्यंग्यपूर्ण रचना लिखी। इसे धर्मवीर भारती ने निकष-१ में स्थान दिया। मुझे सुखद विस्मय हुआ कि निकष-१ पर आने वाली पाठकों की चिट्ठियों में मेरी इस रचना का उत्साह  से स्वागत हुआ और कई पत्र पत्रिकाओं के सम्पादकों ने भारती से मेरे बारे में पूछताछ की। उसके बाद भारती ,विजयदेवनारायण साही और केशव चंद्र वर्मा जैसे मित्रों के प्रोत्साहन से मैंने नियमित लेखन शुरु कर दिया। वास्तव में मेरा उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' इन्हीं मित्रों को समर्पित है। 

 

सवाल- आपके ये मित्र साहित्य की यथार्थवादी परम्परा के लेखन के घोर विरोधी संगठन 'परिमल' के आधार स्तम्भ थे। आपका परिमल से क्या नाता बना?

जबाब- लेखक के रूप में जब मैं उभरा तब तक इलाहाबाद में परिमल की धार खत्म हो चुकी थी और उसके सदस्य अलग-अलग ढंग से अलग-अलग स्थानों पर जाकर लिखने लगे थे। 

 

सवाल- लेकिन परिमल के बारे में आपका अपना दृष्टिकोण क्या रहा?

जबाब- विजय देव नारायण साही, भारती, सर्वेश्वर, केशवचंद्र वर्मा से मेरी घनिष्ठ मैत्री थी। ये सब परिमल के सक्रिय सदस्य थे लेकिन परिमल ने मुझे कभी आकृष्ट नहीं किया।

 

सवाल- आपके रागदरबारी के पूर्व के दो उपन्यासों में ग्रामीण जीवन के दुखों, संघर्षों, मुसीबतों के प्रति आपका रवैया सहानुभूतिपूर्ण दिखता है। उसे मैं पक्षधरता भी कहना चाहूंगा लेकिन तमाम लोगों का कहना है कि राग दरबारी में गांव के प्रति आपका दृष्टिकोण उपहासपूर्ण है।

जबाब- उपहासपूर्ण दृष्टि मैंने नहीं डाली है। ग्रामीण जीवन में जो प्रवत्तियां थीं मैंने उन्हें लिखा । गांव में आदमी भांग घोटता है, नंगे बदन रहता है, विपन्न है तब भी वह ठिठोली करता है, हंसता है, बातें करता है, एक जीवंत वातावरण सृजित करता है...

 

सवाल-राग दरबारी में ग्रामीण समाज की संकट में भी हंसते रहने की दुर्घर्ष क्षमता का चित्रण है कि या समाज में व्याप्त पतनशीलता का चित्रण है?

जबाब- दोनों है।

 

सवाल- लेकिन कभी-कभी ऐसा हुआ कि जिसे सहानुभूति मिलनी चाहिये वह आपके निशाने पर है, जैसे लंगड़।

जबाब- राग दरबारी में अनेक छोटे-छोटे चरित्र हैं जिनकी उपहास्पदता को लेकर मैंने सम्पूर्ण वातावरण का निर्माण किया है, मगर अंतत: वे तंत्र के ऊपर किये गये मेरे आघात को अधिक तीव्र बनाते हैं। लंगड़ को ही लें, उसका चरित्र उपहास्पदता ज्यादा प्रकट करता है या सत्ता तंत्र के अन्याय को?

 

सवाल- क्या ऐसा नहीं सम्भव हो सकता था कि लंगड़ को बख्स देते और सिर्फ सत्ता तंत्र को ही निशाने पर रखते?

जबाब- लंगड़ को बख्शने न बख्शने का क्या सवाल है? वह जैसा है मैंने वैसा ही चित्रित किया है। उस पर मैंने कोई वैल्यू जजमेण्ट नहीं दिया है।

 

सवाल-रागदरबारी व्यंग्य का महाविस्तार है लेकिन कुछ आलोचकों का कहना है कि रागदरबारी का जो व्यंग्य है वह कथा के बाहर की टिप्पणियों में है न कि स्थितियों में।

जबाब- वे मानकर चलते हैं कि व्यंग्य को स्थितियों में ही अंतर्निहित होना चाहिये। अपनी उसी मान्यता पर वे राग दरबारी को कसते हैं। जबकि मैं दूसरी तरह की लेखन शैली अपने लिये चुनता हूं। और यह तो मानना पड़ेगा कि कोई लेखक अपनी विषयवस्तु के अनुरूप शैली चुनने के लिये स्वतंत्र है। अगर यथार्थ के उद्‌धाटन में मेरी शैली आलोचकों के ढांचे से अलग चली जाती है तो यह मेरा दोष नहीं है, उनके बनाये पूर्व निर्धारित ढांचे की अपर्याप्तता है।

 

सवाल- राग दरबारी में जो भाषा है, वह आपके यहां पहले नहीं थी, बल्कि समूचे हिंदी लेखन में वह सम्भव न थी। वह भाषा एक विस्फोट थी। कैसे वह भाषा आविष्कृत हुई?

जबाब- एक तरफ अवधी है और दूसरी तरफ आपने गौर किया होगा, अंग्रेजी के मुहावरे आते हैं। अंग्रेजी का मुहावरा जहां मैंने इस्तेमाल किया है, वह अनुवाद कर के नहीं, उसकी प्रकृति को हिंदी में आत्मसात करने की कोशिश की है। हां ज्यादा मूलभूत रूप से अवधी है जिसको इस्तेमाल किया है खड़ी बोली के क्रियापदों और व्याकरण के अंतर्गत।

 

सवाल- राग दरबारी में बेला को छोड़ कर स्त्री पात्र नहीं हैं। और बेला की भी कोई खास अहमियत नहीं है।

जबाब- दरअसल भारतीय ग्राम पुरुष प्रधान है। वहां स्त्री आनुषांगिक अस्तित्व मात्र है। मगर राग दरबारी में स्त्री चरित्रों के न होने के पीछे अनिवार्यत: यह कारण नहीं है। राग दरबारी का जो तंत्र है, कथा का सूत्र है, उसमें स्त्री चरित्रों की गुंजाइस नहीं बनती।

 

सवाल- राग दरबारी छपने से पूर्व आपको यह उम्मीद थी कि यह इतनी महत्वपूर्ण कृति सिद्ध होगी?

जबाब- मेरे दिमाग में यह बात स्पष्ट थी कि कुछ हो न हो, भौतिक तथ्य तो यह था ही कि परिहास की मुद्रा में ४५० पृष्ठों का हिन्दी का तो क्या, मैं समझता हूं कि समस्त भारतीय भाषाओं का यह पहला उपन्यास है। जब एक नितांत भिन्न प्रकार का प्रयोग किया जायेगा तो तो कहीं न कहीं खामियां भी होंगी; यही हुआ। तब भी और आज भी मेरे भीतर स्पष्ट है कि अच्छी रचना दोषरहित हो यह आवश्यक नहीं। बहरहाल... राग दरबारी लिख लेने के बाद यह तो मुझे मालूम था कि इसमें खामियां भी हैं लेकिन इसकी अन्य विशेषताओं के कारण मैं अवश्य आशा करता था कि इसका कोई विशेष प्रभाव होना चाहिये।

 

सवाल- उपन्यास को आप कितनी बार लिखते हैं?

जबाब- कम से कम तीन बार तो लिखना ही पढ़ता है।

 

सवाल- सबसे अधिक ड्राफ्ट किस उपन्यास के हुए?

जबाब- मैं समझता हूं कि राग दरबारी भी तीन चार बार लिखा गया था।विस्रामपुर का संत बहुत बार लिखना पड़ा। 

 

सवाल- कौन सी चीजें आपको एक ही कृति को पुन: लिखने को विवश करती हैं?

जबाब- दो चीजें । एक तो उपन्यास लिखने में जो उपकथायें होती हैं उन्हें मैं पहले से पूरी तरह सोचता नहीं हूं, उनका आविष्कार लिखते समय ही होता है। बाद में पहले की घटनाओं का भी रूप बदलना पड़ता है और कभी- कभी वे घटनायें खारिज कर दी जाती हैं। दूसरी चीज, जहां मुझको भाषागत कृत्रिमता नजर आती है या पता चला कि भावना का आवेग उसमें ज्यादा है या अनावश्यक विशेषणों की भरमार हो रही है तो उनको काटता छांटता हूं। कोशिश करता हूं कि वह देखने में, पढ़ने में बहुत ही साधारण मालूम दे, हां ध्वनि उसकी असाधारण मालूम हो।

 

सवाल- जैसा आपने कहा है कि कहानी को आप दोयम दर्जे की विधा मानते हैं उपन्यास की तुलना में, फिर भी आपने कहानियां लिखीं?

जबाब- मेरे कहने का अर्थ यह नहीं कि मुझे कहानियों से परहेज है या उसके प्रति मेरे मन में कोई आकर्षण नहीं । दूसरे यह भी था कि हिन्दी में पांचवे या छठे दशक में कहानियों के बहुत से आंदोलन चले,उनको लेकर जो घालमेल था उससे मुझे लगता था कि इस समय कहानियां लिखना केवल कहानियां लिखना नहीं है। उसे लिखने का अर्थ है किसी आंदोलन में शामिल होना, जो स्वभाववश मेरे लिये बहुत पसंदीदा स्थिति नहीं थी।

 

सवाल- व्यंग्य आपकी रचना का मूल स्वर रहा है पर कहानियों में व्यंग्य की आजमाइश कम है?

जबाब- बहुत सी कहानियां आपको ऐसी मिलेंगी जिसमें व्यंग्य का स्वर परिस्थिति में अंतर्निहित हुआ है। मेरी आरम्भिक कहानियां 'अपनी पहचान' और बाद की 'दंगा', 'सुरक्षा', 'शिष्टाचार' आदि ऐसी कहानियां हैं।

 

सवाल- व्यंग्य को लेकर आपकी स्थापना है कि व्यंग्य विधा नहीं, एक शैली है, इसे थोड़ा स्पष्ट करेंगे?

जबाब- भारतीय साहित्य की परम्परा में व्यंग्य अभिव्यक्ति की एक भंगिमा है। अमिधा, लक्षणा, व्यंजना में व्यंजना का प्रयोग करते समय आपका जो आधार रहता है वह व्यंग्य है। इस रूप में भारतीय साहित्य में व्यंग्य को कभी वैसी विधा नहीं माना गया जिस रूप में नाटक या कविता आदि थे। पाश्चात्य साहित्य में जरूर यह एक विधा के रूप में रहा मगर बीसवीं सदी तक आते-आते वहां भी यह एक विधा के रूप में समाप्तप्राय हो गया। हुआ यह कि व्यंग्य के सभी महत्वपूर्ण तत्व सामान्य लेखन में घुलमिल गये। कहानी में, कविता में, उपन्यास में उन सभी विशेषताओं का समावेश सम्भव हो गया जो प्राचीन समय में व्यंग्य के उपासन माने जाते थे। लेकिन जब मैं यह कहता हूं तो इसका मंतव्य यह नहीं कि व्यंग्य नाम की चीज ही समाप्त हो गयी। आज भी व्यंगात्मक शैली में लिखी गयी कहानी या उपन्यास का रस दूसरा होगा, दूसरी शैली में लिखी गयी रचना का दूसरा।

 

सवाल- व्यंग्य के दो रूप माने जाते हैं, त्रासदीपूर्ण व्यंग्य और हास्य व्यंग्य, आपकी दृष्टि में कौन अधिक महत्वपूर्ण है?

जबाब- मैंने जिसे हाई कामेडी कहते हैं, उसी में ज्यादातर कृतियां लिखी हैं, कम से कम राग दरबारी का वही मूड है।

 

सवाल- एक बड़े लेखक के रूप में आप भारतीय समाज की मुख्य चुनौतियां क्या पाते हैं?

सवाल- बड़े लेखक की बात जाने दें, व्यक्तिगत रूप से मेरी दृष्टि में सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक दिशाहीनता की है जिससे लगभग सभी पार्टियां ग्रस्त हैं। वे अपने चुनाव घोषणा पत्र भले ही अलग-अलग निकालें लेकिन किसी के घोषणापत्र में यह स्पष्ट नहीं होता कि उस पार्टी के विचार से समग्र रूप से समाज का क्या स्वरूप होना चाहिये। सभी पार्टियों के तात्कालिक लक्ष्य हैं । इसी का परिणाम है कि समाज के सर्वांगीण विकास की कोई दिशा नहीं दिखाई दे रही है।

 

सवाल- भारतीय लोकतंत्र का भविष्य?

जबाब- भारतवर्ष में अराजकता और अस्तव्यस्तता को शताब्दियों तक झेलने की असाधारण क्षमता रही है। इसी आधार पर आप कह सकते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य वही है जो उसका वर्तमान है।

 

सवाल- आपके लिये सुख का क्या अर्थ है?

जबाब- मेरा एक लेख है 'जीवन का एक सुखी दिन'। उसमें मैंने सब निषेधात्मक पक्षों को लिया है कि आज यह नहीं हुआ आज वह नहीं हुआ। आधुनिक जीवन के जितने भी खिझाने वाले पक्ष हैं, उनकी सूची दे दी है कि यह नहीं तो दिन अच्छा बीता । लेकिन सुख का पाजिटिव पक्ष होता है वह बहुत आध्यात्मिक विषय है। सच्चाई यह है कि इस प्रश्न के मेरे दिमाग में कई उत्तर हैं जिनका एक बातचीत में विश्लेषण करना मेरे लिये मुश्किल होगा। अब एक पहलू तो यही है कि नितांत अभाव ,कमियों के होते हुये भी एक दार्शनिक स्तर पर सुख की कल्पना की जा सकती है। जैसे जिस समय महात्मा गांधी लम्बे-लम्बे अनशन कर रहे थे ,भूखे प्यासे थे तो क्या कहा जाये कि वे बहुत दुखी थे? या सुखी ? हां, सहज ढंग से कहा जा सकता है कि कि सुख यह है कि कोई आकांक्षा न हो जो आपको कचोटती हो, ऐसा कोई तात्कालिक अभाव न हो जिससे आपके ऊपर दबाव पड़ रहा हो, मनुष्य या प्रकृति द्वारा सृजित ऐसा कोई कारण न हो जो आपको शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट दे रहा है। यहां भी आप देख रहे हैं कि कोई पाजिटिव बात नहीं, निषेधात्मक चीजें ही हैं। इसी रूप में मैं भौतिक सुख की कल्पना करता हूं।

 

सवाल- पाजिटिव चीजें मसलन संगीत, अच्छा संग, प्रकृति आदि...

जबाब- एक समय था जब ये सब चीजें मुझे उत्साहित करती थीं, मगर धीरे-धीरे शायद इस समय मेरी प्रवृति बदल रही है। मुझे लगता है कि शायद इन सबके बिना भी एक ऐसे मनोलोक की सृष्टि की जा सकती है जिसमें संतोष ,आत्मिक शांति यानी सुख का अनुभव हो सकता है। हो सकता है कि यह अवस्था के कारण हो...

 

सवाल- जिस तरह की दृष्टि की बात आप कर रहे हैं उसकी रचना में बाह्य जगत के उपादान हैं या वह पूरी तरह आत्यंतिक और निरपेक्ष सृष्टि है?

जबाब- राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिदृश्य पर, उसके भीतर रहते हुये आपको कुछ न कुछ ऐसी युक्तियां खोजनी पड़ेंगी जिनसे आप संतोष और सार्थकता का अनुभव कर सकें, अन्यथा आप खीझ की स्थिति में रहेंगे। इनसे बचने के लिये संगीत, विविध कलायें, अच्छे मित्रों का साथ, ये स्थूल आधार मदद करते हैं। मगर कुछ समय बाद ये अपना जादू खोने लगते हैं। तब आपको अपने भीतर, कह लीजिये कि आध्यात्मिक स्तर पर कोई खोज करनी पड़ेगी। में आध्यात्मिक शब्द का प्रयोग कर रहा हूं, किसी धार्मिक अनुष्ठान की बात नहीं कर रहा हूं।

 

सवाल- एक समय तो ऐसा था ही जब आपको संगीत से गहरा लगाव था। मेरे ख्याल से वैसा उत्साह भले न हो लेकिन लगाव अभी भी है, आपको किस तरह का संगीत पसंद है?

जबाब- संगीत अगर अच्छा हो तो सब तरह का पसंद है मगर मुख्यत: शाष्त्रीय संगीत, ख्याल की गायकी ज्यादा आकर्षित करती है।

 

सवाल- कोई ऐसी ध्वनि ,संगीत से इतर कोई ध्वनि जो आपको आकर्षित करती है?

जबाब- कुछ ध्वनियां तो मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। जैसे रात को और अलस्सुबह खिड़की के बाहर बारिश की आवाज। इसी प्रकार खास तौर पर जाड़े में, हल्की हवा की आवाज मेरे लिये अत्यंत उत्तेजक है।

 

सवाल- पसंदीदा रंग कौन सा है?

जबाब- फूलों को छोड़कर चटक रंग मुझे पसन्द नहीं । मेरे पास शायद ही कोई कमीज, कुर्ता या ऐसी शर्ट होगी जो गाढ़े रंग की हो। हल्का भूरा, हल्का नीला, स्लेटी, सफेद कुछ इस प्रकार के रंग मुझे ज्यादा आकर्षित करते हैं।

 

सवाल- आपके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति क्या है और सबसे बड़ा दुर्गुण क्या है?

जबाब- दुर्गुण मैं बड़ी आसानी से बता सकता हूं। वह यह है कि मैं किसी भी विषय के ऊपर एकाग्र होकर लम्बे समय तक काम नहीं कर पाता हूं। शक्ति अगर है तो वह है कि मैकेनिकल और तकनीकी चीजों को छोड़कर नयी चीजों, नये व्यक्तियों, नये विचारों के प्रति मुझमें तीव्र जिज्ञासा रहती है। इन सबको जानने, समझने या कहूं किसी मानवीय अनुभव के लिये मेरा दिमाग ज्यादा खोजपूर्ण है।

 

सवाल- ऐसी कोई चीज जिससे आप मुक्त होना चाहें?

जबाब- पान-तम्बाकू की लत थी लगभग तेरह वर्ष पहले छोड़ दी। रहा सुरापान, मैं चाहता हूं उससे भी पूरी तौर पर मुक्त हो जाऊं। लम्बे-लम्बे समय तक उससे मुक्त भी रहा। मैं सुरापान को अपने व्यक्तित्व की समग्रता में असंगत पाता रहा हूं । इसी से आगे के लिये आशान्वित हूं।

 

सवाल- खाने में क्या पसंद है?

जबाब- खाने में कोई विशेष रुचियां नहीं हैं। मैं शाकाहारी हूं । दूसरी संस्कृतियों के भोजन एग्जाटिक फूड में मेरी विशेष दिलचस्पी नहीं है। शाकाहारी भोजन जो भी ठीक ढंग से बना हुआ हो, वही अच्छा लगता है। मिर्च मशाले ज्यादा पसंद नहीं, पर 'ब्लैंड' चीजें भी उतनी ही कम पसंद हैं।

 

सवाल- दोस्त कैसे अच्छे लगते हैं?

जबाब- पारस्परिक निष्ठा और निश्छलता तो होनी ही चाहिये। इसके अलावा जिन विषयों में मेरी रुचियां हैं, साहित्य, संगीत, इतिहास, नाटक, सिनेमा आदि में जिनसे इन विषयों पर संवाद बन सके। इसके अतिरिक्त लेखक कलाकार तो आते ही हैं मुकाबले दूसरे व्यवसाय के लोगों के । साथ ही वंश के लोगों से, रिश्तेदारों से भी मेरे बराबर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहे हैं। उनके साथ बैठकर अवधी में गांव घर की बातें करने का अटूट आकर्षण है। इसके अवसर भी बराबर मुझे मिलते रहते हैं।

 

सवाल- कैसी स्त्रियां आपको सुंदर लगती हैं?

जबाब- आपका यह प्रश्न सुनकर मेरे दिमाग में कई चेहरे कौंधे और लगता है कि चेहरे का कोई ऐसा माडल नहीं है जो सभी में समान रूप से मौजूद हो। फिर भी जो रूप की सुंदरता है वह कुछ हद तक तो होनी ही चाहिये। घरेलूपन की कद्र करता हूं पर मात्र घरेलूपन उबाऊ चीज है। जीवन की विराट सम्भावनाओं से से कुछ खींचने की जिसमें रुचि हो, चाहे वह साहित्य संगीत कला का क्षेत्र हो या किसी व्यवसायिक विशिष्टता का वही मुझे ज्यादा आकर्षित कर सकती है। अत्यंत बहिर्मुखी प्रवृत्ति न तो मुझे पुरुष मित्रों में अच्छी लगती है, न नारी मित्रों में ही। और कहने की शायद जरूरत नहीं कि व्यवहार में निष्कपटता भी सौन्दर्य का लक्षण है।

 

सवाल- इन गुणों की कसौटी पर किसे खरा पाया आपने?

जबाब- इसे दिखावा न समझें तो मैं अपनी दिवंगता पत्नी का जिक्र कर सकता हूं। इसके अलावा, मेरा सौभाग्य रहा कि पुरुष मित्रों की तरह इस कोटि की नारी मित्रों को लेकर भी मैं सर्वथा विपन्न नहीं हूं। पर उनका नाम न लेना ही बेहतर होगा क्योंकि उसके बाद हो सकता है आपके प्रश्न साक्षात्कार को छोड़कर जिरह के दायरे में पहुंच जायें।

 

सवाल- लेखक का विचारधारा से क्या रिश्ता होता है?

जबाब- लेखक अपने सामान्य जीवन व्यापारों में किसी भी विचारधारा से प्रतिबद्ध रहे, यह उसका हक है। पर रचनाकार की हैसियत से लेखक की प्रतिबद्धता उसको राह खोजने की, चुनौतियों से जूझने की, भटकने की कठिनाइयों से बचा लेती है। यदि लेखक वास्तव में अत्यधिक संवेदनशील और प्रतिभाशाली न हुआ तो वह इसके रूढ़िग्रस्त इकहरेपन में फंसने का खतरा भी पैदा कर सकती है।

 

सवाल- आपकी विचारधारा क्या है?

जबाब- जिसे आप दक्षिणपंथ कहते हैं, उससे मैं बहुत दूर हूं। मैं भारतीय परिस्थितियों में रचनाकर्म की पहली शर्त उसकी समाजधर्मिता को मानता हूं और इस सिद्धांत को कि रचनाकार की मूल प्रतिबद्धता केवल अपनी रचना के प्रति होती है एक अस्पष्ट और वायवीय वक्तव्य मानता हूं। लेकिन पिछले कई दशको में राजनीतिक उठापटक के दौरान साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा की जो गति बनी है और उसे अपने बचाव के लिये जितने मैकेनिज्म खोजने पड़ रहे हैं, उससे मैं बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं हो पा रहा हूं। संक्षेप में, भले राजनीति की भाषा में इस रुख को संदिग्ध माना जाये, मैं सड़क के बीच कुछ कदम पर बायीं ओर खड़ा हूं।

 

सवाल- आज आप मुड़कर अपने अब तक के लेखन को देखते हैं तो कैसा लगता है?

जबाब- शायद प्रत्येक लेखक का यह अनुभव हो, मुझे यह ही लगता है कि अब तक जितना हुआ तटवर्ती लेखन भर है, अभी धारा के बीच जा कर लहरों से मुकाबला करना बाकी है।

‘बहुत कुछ है पर दिखता नहीं है कुछ भी’

- अनूप कुमार        पिछले छह-सात दशकों की हिन्दी कविता में डा. रणजीत अपने वैचारिक तेवर और प्रयोगधर्मिता के चलते एक अलग स्थान बनाये हुए ह...