Thursday, 12 May 2022

आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ


संवादों में व्यंग्य की संभावनाओं की तलाश

राहुल देव द्वारा संपादित एवं संयोजित पुस्तकआधुनिक व्यंग्य का यथार्थकई मायनों में महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है। किसी भी विचार या सम्प्रत्यय पर विमर्शों के आयोजन उसके प्रचार-प्रसार को नवीन सम्भावनाएँ प्रदान करने में सहायक होते हैं। व्यंग्य एक ऐसी विधा है जो लंबे समय से रची जा रही है। परंतु यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आज की तारीख़ में व्यंग्य विधा है, स्प्रिट है, शिल्प है या बात को कहने का एक अलग ढंग है। कुछ भी हो, व्यंग्य अपनी भाषा,कहन और संस्कारों के साथ साहित्य जगत् में कहीं न कहीं हलचल तो मचाता ही है। हिंदी साहित्य में आज से नहीं बल्कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय से ही व्यंग्य अपने प्रभावों के साथ रचा-बचा हुआ है। इससे पहले भी काव्य में व्यंग्य अपना स्थान किसी न किसी रूप में ग्रहण करता रहा। इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा प्रकाशन द्वारा प्रकाशितआधुनिक व्यंग्य का यथार्थपुस्तक व्यंग्य पर आधारित साक्षात्कारों के रूप में प्रस्तुत की गई है। लेकिन ये साक्षात्कार मात्र ऐसे साक्षात्कार नहीं बनकर रह गए हैं कि जिनमें कुछ प्रश्न दिए जाएँ और उनके उत्तर प्राप्त किए जाएँ। साक्षात्कार की मूल संकल्पना तो प्रस्तुत पुस्तक में उपलब्ध है ही, साथ ही साथ इन सभी साक्षात्कारों के प्रश्न विमर्श की एक मजबूत श्रृंखला भी उत्पन्न करते हैं। इसे हमव्यंग्य विमर्शकह सकते हैं। पुस्तक के संपादक-संयोजक राहुल देव द्वारा व्यंग्य से सम्बंधित पच्चीस-छब्बीस प्रश्नों की एक प्रश्नावली तैयार की गई है और उन्हें कुल चौदह व्यंग्यकारों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक व्यंग्यकार के सामने प्रश्न वही हैं परंतु उनका उत्तर सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोणों और अभिरुचियों के अनुसार दिया है। वैचारिकता और विश्लेषण के विभिन्न गवाक्षों में जब व्यंग्य साहित्य के वैभव विस्तार को देखा गया है, तब बहुत ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी उत्तर भी प्राप्त हुए हैं। व्यंग्य की सामर्थ्य, उसकी आलोचना, विभिन्न लेखकों द्वारा दिए गए योगदान, व्यंग्य में हास्य और करुणा की उत्पत्ति, व्यंग्य की भाषा, व्यंग्य और समकालीन चिंतनधारा, व्यंग्य का लोकधर्मी और जनसंवादी रूप, व्यंग्य साहित्य की समालोचना, व्यंग्य के प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान, व्यंग्य में वैश्वीकरण- उत्तर आधुनिकता- बाजारवाद-महामारी-असहिष्णुता-सांप्रदायिकता-उग्र राष्ट्रवाद जैसे ज्वलंत विषयों की अभिव्यक्ति, दलित-स्त्री-आदिवासी विमर्श और व्यंग्यकार की वैचारिक प्रतिबद्धता जैसे विविधवर्णी प्रश्न व्यंग्य पर न केवल नई दृष्टि डालते हैं, बल्कि व्यंग्य विधा का अपना एक शास्त्र भी इनके माध्यम से विकसित करते हैं। अंत में व्यंग्य लेखन के कारण व्यक्तिगत जीवन में किए गए संघर्षों का सामना, विश्वविद्यालयों में व्यंग्य की स्थिति और व्यंग्य के भविष्य पर भी प्रश्न किए गए हैं।

 

           प्रथम साक्षात्कार सूर्यकांत नागर का है जिसमें विभिन्न प्रश्नों के आलोक में उन्होंने अपने उत्तर दिए हैं। एक अच्छा व्यंग्य क्या है, इस पर उत्तर देते हुए वे कहते हैं,“व्यंग्य में लोकमांगलिक चेतना होनी चाहिए। परिवेश जितना व्यापक होगा, संवेदना जितनी तीव्र होगी, विसंगति जितनी गहरी होगी, अभिव्यक्ति जितनी तिलमिला देने वाली होगी; व्यंग्य उतना ही सार्थक होगा। वरिष्ठ व्यंग्यकार सूर्यबाला डिमांड और सप्लाई के बीच गुणवत्ता का स्तर न संभाल पाने और व्यंग्य के बाज़ार की माँग के हिसाब से अपने आप को तुरत-फुरत ढालने की आपाधापी को वर्तमान समय में लिखे जा रहे व्यंग्य की असली चुनौतियाँ मानती हैं। प्रेम जन्मेजय व्यंग्यकार होने के साथ-साथ प्रख्यात पत्रिकाव्यंग्ययात्राके कुशल संपादक भी हैं। आपके व्यंग्य नाटक भी पर्याप्त चर्चा में रहे हैं। साक्षात्कार में दिए गए उनके उत्तर जितने सटीक और विश्लेषणात्मक हैं, उतनी ही व्यंग्यात्मकता से भरपूर भी हैं। प्रेम जन्मेजय व्यंग्य को बौद्धिक चेतना के आलोक में देखते हैं।उनकी व्यंग्य के अर्थ को केवल एक सुशिक्षित मस्तिष्क ही ग्रहण कर सकता है। प्रेम जन्मेजय के उत्तर अपेक्षाकृत लंबे हैं और व्यंग्य पर एक बड़े विमर्श की प्रशस्त करते चलते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों से पर्याप्त चर्चित हैं। अपने उपन्यासमरीचिकाकी पौराणिक भाषा में व्यंग्य साधने पर वह विस्तार से बात करते हैं। उनकी दृष्टि में समकालीन व्यंग्य अलग तरह के उत्सव में मुब्तला है।

 

         किसी भी विधा के लिए समीक्षा-समालोचना की प्रक्रिया विधा को वैचारिक प्रसार प्रदान करने में सहायक होती है।राहुल देव स्वयं भी कविता और व्यंग्य के सुधी समालोचक रहे हैं, इसीलिए उन्होंने व्यंग्य की आलोचना पर भी प्रश्न रखे हैं। हिंदी साहित्य की मुख्यधारा की आलोचना ने समकालीन व्यंग्य से दूरी ही बनाए रखी है। परंतु धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है। इससे सम्बंधित प्रश्न का उत्तर देते हुए जवाहर चौधरी व्यंग्य की समालोचना पर कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की सूचना देते हैं। अरविंद तिवारी की दृष्टि में हास्य को व्यंग्य में से निकाला नहीं जा सकता। सर्वश्रेष्ठ हास्य वह है जिसमें हास्य की स्थितियाँ होते हुए भी करुणा उत्पन्न हो। अश्विनी कुमार दुबे भी व्यंग्य का उत्स करुणा में मानते हैं। कैलाश मंडलेकर व्यंग्य को एक किस्म का अक्षर युद्ध स्वीकार करते हैं और आज के विडम्बनापूर्ण समय के यथार्थ की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए व्यंग्य और उसकी सामाजिक उपादेयता को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनकी दृष्टि में व्यंग्य समाज को आईना दिखाता है और बाज़ारवाद के दौर में लोग अपने समय के सत्य से दूर भागते हैं। आज के दौर में लिखे जा रहे व्यंग्य की असली चुनौतियों के सम्बंध में गिरीश पंकज का विचार है,“समकालीन सिस्टम ऐसे व्यंग्य पसंद नहीं करता जो उसका चीरहरण कर ले। और भूल से अगर किसी जगह विद्रोही किस्म का व्यंग्य छप भी गया तो छापने वाले की फजीहत हो सकती है। इसलिए अब चलताऊ किस्म के व्यंग्य ही अधिक लिखे जा रहे हैं और यही चुनौती है कि व्यंग्य की धार कुंद होती जा रही है।गिरीश पंकज व्यंग्य को साहित्यिक संस्कारों और लोकमंगल की भावना के साथ रचे जाने पर जोर देते हैं। राजेंद्र वर्मा व्यंग्य के अतिशय सीमित शब्दों में लिखे जाने को व्यंग्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं मानते। व्यंग्य की चुनौतियों पर बात करते हुए उनका कथन है,“व्यंग्य में लेखकीय दायित्व का निर्वाह प्रमुख चुनौती है। व्यंग्य अख़बारों के कालम के हिसाब से लिखे जा रहे हैं, विशेषतः उनकी विचारधारा और सम्पादकों के निर्देशों को ध्यान में रखकर। ऐसे में व्यंग्य जिसे सत्ता का स्थायी प्रतिपक्ष माना जाता है, अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहा है।किसी भी रचना के सर्जन से पहले ही यदि उसका एक खाँचा या ढर्रा फिक्स कर दिया जाए तो यह स्थिति कदापि अच्छी नहीं कही जा सकती। अजय अनुरागी व्यंग्य के समक्ष चार स्तरों पर चुनौतियों को स्वीकारते हैं--स्वयं के स्तर पर, समाज के स्तर पर, सत्ता के स्तर पर तथा प्रशासन के स्तर पर। उनकी दृष्टि में लोक संवेदना और जनपीड़ा का अनुभव करने वाला व्यंग्यकार ही अपनी आक्रोशमयी अभिव्यक्ति को जनसंवाद से जोड़ सकेगा। इंद्रजीत कौर अच्छे व्यंग्य में विसंगतियों पर पैनी नज़र, पैनी कलम, पात्र-समय और पृष्ठभूमि के अनुसार भाषा, यथोचित प्रतीक, स्पष्ट विचार, विचार का अंत तक निर्वाह;इन तत्त्वों की उपस्थिति को आवश्यक मानती हैं। आज के उतावलेपन के दौर में व्यंग्यकार जनता से सीधा सम्वाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। अनूपमणि त्रिपाठी इसेस्टंट और इंस्टेंटका दौर कहते हैं। ऐसे में कंटेंट का संकट होना लाजिमी ही है। जो कॉमेडी आज फिज़ाओं में तैर रही है, वस्तुतः वह हास्य नहीं अपितु हास्यास्पद है। पंकज प्रसून व्यंग्य का मूल स्वर प्रतिरोध मानते हुए व्यंग्य के उज्ज्वल भविष्य पर कहते हैं,“जब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी, भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद रहेगा; व्यंग्य का भविष्य उज्ज्वल ही रहेगा। इसमें कोई संशय नहीं।

 

         इन सभी प्रश्नों में और उनके उत्तरों में एक बात कॉमन है। अधिकांश व्यंग्यकारों ने व्यंग्य परम्परा को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय हरिशंकर परसाई,शरद जोशी,रविंद्र त्यागी को दिया है। इसी प्रकार व्यंग्य की सार्वकालिक महान कृति पर बात करते हुए अधिकांश व्यंग्यकारों का उत्तरराग दरबारीप्राप्त हुआ है। इससे इन कृति और कृतिकारों की व्यंग्य क्षमता का आकलन सहज रूप से ही किया जा सकता है।

 

             पुस्तक में जितने भी साक्षात्कार हैं, सभी में दिए गए उत्तर बौद्धिकता और वस्तुनिष्ठता से भरपूर है। व्यंग्य समय और समाज की विद्रूपताओं को सामने लाता है। जब इन पच्चीस-छब्बीस प्रश्नों को समकालीन साहित्य के प्रख्यात् व्यंग्यकारों के सामने रखा जाता है, तब व्यंग्य को रचने-लिखने के साथ-साथ व्यंग्य को देखने-समझने के उनके दृष्टिकोण का भी पता चलता है। राहुल देव के शब्दों में,“यह गोलमेज टाइप का विमर्श साक्षात्कार के फॉर्म में है। इसकी उद्देश्यपरकता और विषयवस्तु को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक को साक्षात्कार की पुस्तक के बजाय व्यंग्य विमर्श की किताब कहना ज्यादा उचित होगा।अपनी उपयोगिता और उद्देश्य को प्रस्तुत पुस्तक स्वयं सिद्ध करती है। व्यंग्य विधा की विशिष्टता से परिचित होने के लिए यह पुस्तक निश्चित रूप से पठनीय और संग्रहणीय है। यह पुस्तक व्यंग्य पर संवादों में संभावनाओं की तलाश करती दिखाई देती है। व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के साथ संपादक राहुल देव की पूर्व प्रकाशित साक्षात्कार पुस्तकसाक्षी है संवादकी परम्परा में ही प्रस्तुत पुस्तक को देखा-जाना चाहिए ।

 

पुस्तक: आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स, नोएडा संपादन: राहुल देव मूल्य: 400/- (पेपरबैकपृष्ठ: 230

 

 

-          डॉ. नितिन सेठी

सी-231,शाहदाना कॉलोनी

बरेली(243005)

मो. 9027422306

आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ

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