Saturday, 2 June 2018

व्यंग्य लेखन बिगड़ैल अश्व पर आरोहण जैसा / फारूक़ आफरीदी



व्यंग्यलेखन उस बिगड़ैल अश्व पर आरोहण जैसा है जो सवार को कभी और किसी भी वक्त गिरा सकता है। ऐसे में व्यंग्य लेखन उसके मानस और उसके इतिहास, उसके व्यवहार, उसके चरित्र और वंश परम्परा को गहनता से समझने के साथ अपने अनुभवों के आधार पर टेकलकरने जैसा है। इसमें जीवन के गहरे अनुभव, अध्ययन और भाषाई चातुर्य बल्कि चातुर्य ही नहीं भाषा को रचना के प्रकृति के अनुरूप बरतने का शिल्प भी आना जरूरी है अन्यथा रचना स्थूल बन कर रह सकती है जिसे हम सपाट बयानी कहते हैं। व्यंग्य के पुरोधाओं के द्वारा बरते गए मुहावरों की लीक पर चलकर हम लंबे समय तक अपनी अलग पहचान नहीं बना सकते है। प्रकृति के जितने रूप हमारे सामने हैं, मनुष्य की जितनी प्रकृतियाँ और प्रवृतियाँ हमारे सामने हैं उनके बर्ताव को भी यथासंभव आत्मसात किया जाए और उनमें कोई नई भाषा, नए मुहावरे गढ़े जाएं तभी व्यंग्य में नई पहचान बन सकेगी। दुर्भाग्यवश व्यंग्य का वर्तमान परिदृश्य कुछेक व्यंग्यकारों को छोड़कर किसी ना किसी के लीक पर चलता अधिक प्रतीत होता है। यह लेखन वैसा बिलकुल नहीं है जैसा कालेज या विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों द्वारा साहित्य के मूल सिद्धांतों के पाठ में पढ़ाया जाता है। यहाँ तो रोज अपना नया पाठ और उसका पुनर्पाठ सामने लाना पड़ता है। इसकी भौतिकी आपको स्वयं गढ़नी पड़ती है।

व्यंग्य गुरु आपको कोई मंत्र तो दे सकता है लेकिन उस मंत्र का जाप जब तक आप अपनी कठिन साधना और कसौटी पर नहीं कसेंगे तब तक उसकी कोई सार्थकता नहीं और ना ही सिद्धि मिलेगी। सिद्धि के लिए आपकी दृष्टि, आपकी सोच, आपकी मेधा और उसके बरतने के आपके हथियारों को रोज सान देनी पड़ेगी। जो इतना कुछ काम अपने पूरे समर्पण से कर पाएगा वह व्यंग्य सिद्ध पुरुष की श्रेणी में पहुंचेगा अन्यथा समाज में जैसे आज के संत और जैसी उनकी संतई है वैसे ही व्यंग्यकार भी व्यंग्यई करते रहें। उसका जैसा प्रभाव होगा, वैसा होगा।

व्यंग्य में आजकल सतही अंदाज के दौर-दौरे का आधिक्य चल रहा है। इसके लिए बढ़ता प्रिंट मीडिया जिम्मेदार है। कहते हैं ना कि जो भी विद्यार्थी हिन्दी में स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहा या कर चुका है वह अपने को साहित्यकार मानकर चलता है। इसके इतर प्रिंट मीडिया का हर पत्रकार संपादकीय पृष्ठ पर अनिवार्य रूप से दिये जाने वाले दैनिक व्यंग्य कालम को अपनी जागीर समझकर जैसा चाहे घिसट मारता है। यही नहीं प्रकाशक अपना रुपया बचाने के लिए अपने स्टाफ को एक आवश्यक दायित्व के रूप में इस कालम को बारी बारी हाथ आजमाने का माध्यम बना देता है। इसके पीछे भी यही धारणा काम करती है कि स्टाफ को इस लेखन के लिए कुछ अतिरिक्त नहीं देना पड़ेगा। ऐसे कालमों का उद्देश्य अखबार के पाठकों की रस-रंजकता को बनाए रखना है। उसे सटीक या गंभीर व्यंग्य से कोई लेना देना नहीं । समाज की विसंगतियों, विद्रूपताओं, अन्याय, अत्याचार, भेदभाव अथवा जन संघर्षों के प्रति चेतना का भाव जगाने की बजाय उनका क्षणिक मनोरंजन करना ही इसका निहित है। हमारे बहुत से तथाकथित व्यंग्यकार इसे तल्लीनता से कर रहे हैं। विडम्बना है कि कतिपय बड़े और नामवर व्यंग्यकार भी इससे अछूते नहीं हैं। फर्क इतना है कि वे यह सब करते हुए कुनेन की टिकिया साथ रखते हुए कुछसंदेश अवश्य देने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ कुछ नया अनुभव किया जा रहा है कि हाल के वर्षों में देश की सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य पत्रिका व्यंग्ययात्राके तत्वावधान में इसके यशस्वी संपादक डॉ प्रेम जनमेजय व्यंग्य को प्रतिष्ठित ऊँचाइयाँ प्रदान करने के सार्थक प्रयासों में लगे हैं।व्यंग्य यात्राके अब तक प्रकाशित 51 अंक व्यंग्य साहित्य को लेकर उनकी प्रतिबद्धता की साख भरते हैं। यह व्यंग्य के इतिहास में माइल स्टोन की तरह दर्ज होने योग्य है।

वस्तुतः कोई किसी को व्यंग्य लिखना नहीं सिखा सकता, किन्तु खास तौर से जो नए लेखक इस क्षेत्र में आ रहे हैं, उन्हे इन माध्यमों से स्तरीय लेखन की ओर प्रवृत तो किया ही जा सकता है। उनकी लेखनी को परिष्कृत तो किया ही जा सकता है। यह काम भी यदि ईमानदारी और निष्ठा के साथ किया गया तो व्यंग्य तो समृद्ध होगा, साथ ही समाजचेता के रूप में व्यंग्यकार अपनी सार्थक उपस्थिति भी दर्ज करा सकेंगे। यह उपक्रम अनवरत जारी रहा तो आने वाले समय मे व्यंग्य को हिन्दी साहित्य में सम्मानजनक स्थान तो मिलेगा ही बल्कि अन्य विधाओं के अनुरूप महत्व भी मिलेगा। अभी कतिपय साहित्यकार व्यंग्य विधा के नाम पर जिस तरह नाकभौं सिकोड़ते आए हैं, वे भी इसकी महत्ता स्वीकार करेंगे। वैसे इतना तो हुआ है कि अब व्यंग्य हिन्दी साहित्य की अछूत विधा नहीं रही । पिछले पचास से सौ सालों में हमारे अनेक बड़े साहित्यकारों नें कमोबेश व्यंग्य विधा को बरता है। इसके अतिरिक्त व्यंग्य आलोचना के क्षेत्र में भी अब उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। व्यंग्य आलोचना की सैद्धांतिकी के लिए डॉ सुभाष चंदर, डॉ सुरेश कान्त, गौत्तम सान्याल, डॉ रमेश तिवारी, सुशील सिद्धार्थ, फारूक आफरीदी, राहुल देव, डॉ अजय अनुरागी, एमएम चंद्रा, आदि बहुत गंभीरता के साथ कार्य कर रहे हैं। व्यंग्य की आलोचना के लिए अन्य कई वरिष्ठ व्यंग्यकार भी अपने स्तर पर यदा-कदा भूमिका निभाते आ रहे हैं।

बी-70/102, प्रगति पथ, बजाज नगर, जयपुर 302015

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