Thursday, 26 January 2012

कविता और कविता -राहुल देव


कविता
फूट पड़ती है
स्वतः
अपने आप ही
जैसे किसी ठूँठ मेँ
अचानक कोँपले
फूट पड़ेँ;
या
किसी जंगल मेँ
झाड़ियोँ का
एकदम उग आना.
ठीक उसी प्रकार
कविता उग आती है
बगैर कुछ कहे
बगैर किसी भूमिका के
मेरे मस्तिष्क मेँ
और मैँ
उसे सजा लेता हूँ
कागज के
किसी पन्ने पर!
-(मरुगुलशन मेँ प्रकाशित)


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