Sunday, 28 August 2022

डिजिटल समय में बौद्धिक संपदा का कॉपीराइट

जब भी जीवन में कुछ नया आता है, उसके साथ बहुत सारी सुविधाएं हमें मिलने लग जाती हैं। लेकिन बहुत बार हमारा ध्यान इस तरफ नहीं जाता है कि नया अपने साथ कुछ चुनौतियां, कुछ उलझनें भी लेकर आता है। अब यही बात देखें कि हाल के बरसों में हम डिजिटल सामग्री के कितने अभ्यस्त हो गए हैं। कभी हम संगीत सुनने के लिए रिकॉर्ड्स खरीदते थे, फिर कैसेट्स, सीडी और पेन ड्राइव तक जा पहुंचे और अब ये सब बासी हो चुके हैं। अपना मनचाहा सब कुछ हमें इनके कौर ही सुलभ है। ऐसा ही किताबों के मामले में भी हुआ है। मौखिक परम्परा से ताडपत्र और उनसे मुद्रण तक पहुंचने के बाद अब जमाना बहुत तेजी से डिजिटल की तरफ भाग रहा है। कागज पर छपी किताब की बजाय किण्डल जैसे किसी ई रीडर पर किताब पढ़ना आम होता जा रहा है। पुस्तकालयों की जगह ई पुस्तकालय चलन में आने लगे हैं। इससे सुविधा तो हुई है। मेरे दुबले-पतले किण्टल में पांचेक सी किताबें तो हैं ही, और कम्प्यूटर की मेमोरी में भी हज़ार दो हजार किताबें पड़ी है और ये सब कोई जगह नहीं घेर रही है। जगह भी नहीं घेर रही और इनमें से बहुत सारी किताबों के लिए मैंने कोई कीमत भी नहीं चुकाई है। पढ़ने के शौकीन दोस्तों को यह बात जरूर याद आ रही होगी कि हाल में जैसे ही गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि के अंग्रेजी अनुवाद को बुकर पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई, हममें से बहुतों के पास, हमारे शुभ चिंतकों की कृपा से इस उपन्यास की पीडीएफ आ पहुंची।

 

किसी भी सामग्री का, चाहे वह किताब हो, संगीत हो, तस्वीर हो, कुछ भी हो इस तरह सुलभ हो जाना निक्षय ही सुखद है। लेकिन यह सबके लिए सुखद नहीं है। इसके साथ बहुत सारे नैतिक, वाणिज्यिक और वैधानिक मुद्दे भी जुड़े हैं, जिनकी तरफ अगर हमारा ध्यान नहीं जाता है, तो जाना चाहिए। पढ़ने के शौकीनों को यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि इन्टरनेट पर किताबों के दो बहुत बड़े खजाने हैं, जिनका नाम प्रोजेक्ट गुटनबर्ग और इण्टरनेट आर्काइव है। अमरीका में अवस्थित प्रोजेक्ट गुटनबर्ग पर लगभग साठ हजार किताबें, जिनमें से ज्यादातर क्लासिक श्रेणी की है, पड़ने के लिए निशुल्क उपलब्ध है। इसी में यह बात और जोड़ दूं कि ये सब किताबें वे हैं जो कॉपीराइट मुक्त है, अर्थात इनके रचनाकारों के निधन को एक निश्चित अवधि बीत चुकी है। यह अवधि अलग-अलग देश में अलग-अलग है। भारत में यह अवधि रचनाकार की मृत्यु के बाद वाले वर्ष से साठ वर्ष की है। कॉपीराइट मुक्त रचनाओं के इस तरह सर्व सुलभ कराने पर कोई बड़ा नैतिक, आर्थिक, वैधानिक मामला नहीं बनता। लेकिन अमरीका का ही एक और संस्थान है इण्टरनेट आकांडव, जहां बहुत सारी ऐसी किताबें भी निशुल्क और सार्वजनिक रूप से सुलभ है जो अभी तक कॉपीराइट मुक्त नहीं है। इसके परिचय में कहा गया है कि "इण्टरनेट आर्काइव लाखों निशुल्क पुस्तकों, चलचित्रों, सॉफ्टवेयर, संगीत, वेबसाइट और अन्य सामग्री की अलाभकारी लाइब्रेरी है"। इसकी स्थापना 1966 में हुई थी। इसका उद्देश्य है कि "जो लोग पढ़ सकने में अक्षम है उन्हें सहायता दी जाए, भावी पीढियों के लिए डिजिटल सामग्री को संरक्षित किया जाए और ज्ञान तक पहुंच का जनतांत्रिकरण किया जाए" शायद ही कोई अध्येता हो जिसने कभी न कभी इस लाइब्रेरी की सेवाओं का लाभ न उठाया हो। लेकिन सन 2020 में अमरीका के चार बड़े प्रकाशकों ने इस लाइब्रेरी के खिलाफ कॉपीराइट के उल्लंघन का एक वाद प्रस्तुत कर दिया। इन प्रकाशकों ने न केवल इण्टरनेट आर्काइव द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं पर सवाल खड़े किये है, इन्होंने कोविद महामारी के दौरान मार्च 2020 में इसी लाइब्रेरी द्वारा स्थापित नेशनल इमरजेंसी लाइब्रेरी को भी अपनी आपत्तियों के घेरे में लिया है। इस इमरजेंसी लाइब्रेरी की स्थापना के पीछे उद्देश्य यह था कि कोविड महामारी के कारण अधिकांश लाइब्रेरियों के बंद हो जाने से ज्ञान सामग्री तक शिक्षकों की पहुंच अवरुद्ध हो गई है, अतः उन्हें वैकल्पिक सामाग्री उपलब्ध कराई जाए प्रकाशकों ने इन दोनों सुविधाओं को चुनौती दी और कहा कि इनके कारण बड़े पैमाने पर कॉपीराइट का स्वैच्छिक उल्लंघन हो रहा है और उनको अनुमति के बिना तथा उन्हें कोई भुगतान किए और किताबें (बेशक अपने डिजिटल रूप में) सुलभ कराई जा रही हैं।

 

इन आपत्तियों के जवाब में इण्टरनेट आर्काइव ने जो तर्क दिये है वे भी गौर तलब है। उनका कहना है कि वह किसी भी अन्य पुस्तकालय की तरह है। अगर कोई पुस्तकालय किसी किताब की एक प्रति खरीद कर सी या हजार पाठकों को पढ़वा सकता है, तो वह भी तो ऐसा ही कर रहा है। इण्टरनेट आर्काइव का कहना है कि वहां से भी एक समय में एक किताब एक ही पाठक को दी जाती है, इसलिए वस्तुतः उनमें और किसी और पुस्तकालय के व्यवहार में कोई अंतर नहीं है। जब पारम्परिक पुस्तकालय किसी किताब को खरीद लेने के बाद चाहे जितने पाठकों को पढ़ने के लिए दे सकता है तो इण्टरनेट आर्काइव ऐसा क्यों नहीं कर सकता? लेकिन इस तर्क के जवाब में प्रकाशकों ने यह तर्क दिया कि कागज़ पर छपी किताब और उसका डिजिटल संस्करण समान नहीं है, इसलिए इन दोनों के प्रति कानून का नजरिया भी अलग-अलग होना चाहिए।

 

"यह मामला भले ही अमरीका का है, हम भारतीयों के लिए भी यह विचारणीय तो है ही ऊपर मैंने रेत समाधि के पीडीएफ संस्करण का जिक्र किया। बेशक यह संस्करण और इसका वितरण अवैध था। मान लीजिए किसी ने इस संस्करण को पढ़ कर किताब खरीदने पर होने वाले पैसे बचा लिए तो इससे प्रकाशक का, और लेखक का भी हक़ मारा गया। प्रकाशक ने किताब को प्रकाशित करने पर जो खर्च किया, आपने उसकी भरपाई में अपना योग नहीं दिया। आदर्श स्थित यह है कि लेखक को भी उसके रचना कर्म के लिए रॉयल्टी मिले। अगर किताब बिकेगी ही नहीं तो लेखक को रॉयल्टी कैसे मिलेगी? नैतिक अनैतिक का सवाल तो है ही। यहां यह भी याद दिलाता चलूं कि कॉपीराइट वाली बात भारत में भी समय-समय पर उठती रही है। बहुतों को याद होगा कि कविता कोश में अपनी कविताएं शामिल कर लेने पर अनेक कवियों या उनके प्रकाशकों द्वारा आपत्ति करने के बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया था।

 

भारत के संदर्भ में, जहां तकनीक अभी बहुत ज्यादा चलन में नहीं है, इस बात को संगीत, फिल्मों और सॉफ्टवेयर की पायरेसी के माध्यम से भी समझा जा सकता है। वे दिन अब बहुतों की तो स्मृति में भी नहीं होंगे जब हम अपनी पसंद के किसी गाने को बार-बार सुनने के लिए 78 आरपीएम को रिकॉर्ड खरीदते थे। बाद में जब कैसेट वाला जमाना आया तो बजाय महंगी कैसेट खरीदने के हम खाली कैसेट खरीदकर उस पर गाने भरवाने लगे। और अब तो वह समय आ गया है जब करीब-करीब सारा ही संगीत निशुल्क सुलभ है। इस बात से रिकॉर्ड कम्पनियों और संगीत से जुड़े कलाकारों पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसी तरह, भारत और बहुत सारे अन्य देशों में ऑरिजिनल सॉफ्टवेयर खरीदने का चलन कम है। सरकारी दफ्तरों तक में पायरेटेड सॉफ्टवेयर का प्रयोग आम है। कम्पनियां इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने के भरसक प्रयास कर रही है पर हम जुगाड़ लोग हर प्रयास का तोड़ निकाल लेते हैं।

 

भारत में और खास तौर पर हिंदी समाज में यह भी कहा जाता है कि किताब को हाथ में लेकर पढ़ने का जो सुख है वह उसके डिजिटल संस्करण में नहीं मिलता है। वैसे तो यह अभ्यास की बात है, लेकिन अब जबकि डिजिटल संस्करण तैयार करने वाले लोग किताब के साथ अन्य बहुत सारी सुविधाएं जोड़ते चले जा रहे हैं, देर-सबेर अधिक लोग इनकी तरफ खिंचेंगे, इसमें संदेह नहीं किया जा सकता। इधर इंग्लैण्ड की एक कम्पनी ने टी एस एलियट को प्रख्यात कविता वेस्टलैण्ड का जो डिजिटल संस्करण निकाला है उसमें स्वयं कवि की हस्तलिपि में कविता का वह मूल ड्राफ्ट तो है ही जिसमें एजरापाठण्ड ने अपने हाथों से संशोधन किया था, कविता को एक वीडियो प्रस्तुति और अन्य कवियों, थिएटर निर्देशकों और विद्वानों से इस कविता के बारे में संवाद व चर्चा भी है। कल्पना की जा सकती है कि जब हम गोदान का डिजिटल संस्करण पढ़ें तो उसे पढ़ने के साथ-साथ देख और सुन भी सकें। लेकिन जब ये सारी सुविधाएं हमें मिलेंगी तब इनके अनधिकृत उपयोग से होने वाली चुनौतियां भी हमारे सामने होंगी, जैसे आज अमरीका में है। भारत में और विशेष रूप से हिंदी में किताबों के पीडीएफ रूपों और विभिन्न ई पुस्तकालयों की उपादेयता का एक और आयाम है, जिसकी अनदेखी नहीं को जानी चाहिए। भारत में और खास तौर पर हिंदी में प्राय: किताबों के दूसरे संस्करण नहीं निकलते हैं, जबकि कई कारणों से उन किताबों की जरूरत महसूस की जाती है। ऐसे में उन अप्राप्य किताबों के पीड़ीफ संस्करण सहायक बनते हैं। खुद मैंने ई पुस्तकालय से न जाने कितनी बार इस तरह की मदद ली है। गौरतलब यह भी है कि जो किताब उपलब्ध ही नहीं है, उसके ई संस्करण से किसी को कोई हानि नहीं हो रही है। इसके विपरीत उसकी अप्राप्यता का आंशिक निवारण भी हो रहा है। मुझे लगता है कि कॉपीराइट के जो भी कानून बने हैं वे बहुत पहले के हैं। इस बीच तकनीक ने बहुत भारी बदलाव कर दिए हैं। उन कानूनों पर नए बदलावों के आलोक में विचार ही और कोई व्यावहारिक राह खोजी जाए, जो जितनी इस सामग्री के उपयोगकर्ता के लिए लाभप्रद हो, उतनी ही इस सामग्री के सर्जक के हितों की रक्षक भी हो।

  

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल (शिक्षाविद और साहित्यकार)


1 comment:

  1. जानकारीपरख आलेख। आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

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