Sunday, 20 November 2022

रमाकान्त दायमा की पाँच कविताएँ


रमाकान्त दायमा एक मँजे हुए अभिनेता हैं | मुंबई शहर की भीड़-भाड़ में तमाम व्यस्तताओं के बीच समय निकालकर वे कविताएँ भी लिखते रहे हैं | इन कविताओं को एक कवि हृदय अभिनेता की सहज-सरल अभिव्यक्ति कहा जा सकता है | आपकी कविताओं को लगातार बदलते हुए सिनेमा और साहित्य के बीच एक ऐसे पुल की तरह से भी देखा-पढ़ा जा सकता है जहाँ व्यक्त होने की सामर्थ्य अपना रास्ता किसी वेगवती नदी के प्रवाह की तरह अपनी विधा खुद तलाश लिया करती है | आत्म-संप्रेषण के लिए वे 'बच्चन' की तरह अंग्रेजी की तरफ नही बल्कि हिंदी की तरफ देखते हैं | पहली दफा 'अभिप्राय' पर आपका स्वागत करते हुए आपकी पाँच कविताएँ हम अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं-

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मुंबई

 

ये मुंबई शहर

तनहाइयों का शहर है

यहाँ रोज़ ट्रेनों से, बसों से

उतरते हैं सपने,

और उतरते ही

दौड़ पड़ते हैं वे

 

लड़खड़ाते हुए को

सम्भालने की फ़ुरसत नहीं है

किसी को

बस भागने लगते हैं,

अनजान मंज़िल की तरफ़

यहीं से साथ हो लेती है

तन्हाई

साया फिर भी रात में साथ छोड़ देता है,

ये रात में और गहरा जाती है

 

महफ़िलों में, पार्टियों में

कोशिश करते हैं लोग

उसे दूर भगाने की

मगर घर जाते समय

चुपके से फिर

चिपक जाती है तन्हाई

 

ये मुंबई शहर है बाबू

यहाँ भीड़ में रहकर,

किसी का हाथ पकड़कर भी

तनहा रहा जा सकता है

 

इसीलिए शायद

ये आपका घर नहीं है।

 

 

 

अभिनय

 

अभिनेता हूँ

किरदारों के हिसाब से

कपड़े और रंग बदलना आता है मुझे

पर हर बार किसी ना किसी  किरदार का

कोई ना कोई रंग रह जाता है

भीतर कहीं,

शूटिंग के बाद जब घर जाता हूँ

तो लगता है

मेरे साथ

मेरे अलावा

कुछ और भी लोग बैठे हैं

जिन्हें सिर्फ़ मैं ही

देख सुन सकता हूँ

घर पहुँच कर

दरवाज़े पर दस्तक देने से

अब डर लगने लगा है।

कल ही मेरी पत्नी कह रही थी

“अब आप पहले जैसे नहीं रहे।“

 

 

फ़िल्म-कास्टिंग

 

मैं केवल एक सम्भावना हूँ,

जो तुमने मेरे

कामों में देखी है

वह काम, जो तुमने देखा है मेरा

उसमें और भी लोगों का सहयोग है

किसी और के संवाद

किसी और की भावना

किसी और के आदेश

और

थोड़ी मेरी ईमानदार कोशिश

बस यही हूँ मैं,

फिर भी तुम चाहते हो मुझे

क्योंकि

मैं एक सम्भावना हूँ

तुम्हारी उम्मीदों पर

खरा उतरने की कोशिश करूँ

ये भी एक सम्भावना ही है।

 

 

आस्था

 

वह मील का पत्थर

जो सड़क के किनारे हुआ करता था

जब से सड़क के बीचों-बीच आ गया है

किसी ने उस पर फूल चढ़ा दिए

किसी ने दिया जला दिया

अब लोग जो

उस पर बैठ कर

सुस्ताया करते थे पल दो पल

उसकी प्रदक्षिणा कर आगे बढ़ने लगे हैं।      

 

 

एक सवाल

 

वो क्या है जो

मुझमें - तुझमें है

बराबर

फिर भी कुछ

अधूरा-अधूरा सा है

ये क्या है ?

 

ये अधूरापन भी दोनों तरफ़

कुछ बराबर सा है

न तू परिपूर्ण है

न मैं सम्पूर्ण हूँ,

तो फिर ये

तू-तू, मैं-मैं

क्या है ??

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रमाकान्त दायमा एक व्यावसायिक अभिनेता हैं।

आप पिछले लगभग तीस वर्षों से हिंदी फ़िल्म और टेलीविज़न इंडिस्ट्री में कार्यरत हैं। इन्होने लगभग 150 विज्ञापन फ़िल्में, कई धारावाहिक और अनेक वेब सिरीज़ में काम किया है।

‘चक दे इंडिया’, ‘बनारस’, ‘इंतक़ाम’, ‘बैंक चोर’ और  ‘राम सेतु’ जैसी लगभग 30 फ़िल्में कर चुके हैं।

‘स्कैम 92 हर्षद मेहता’, ‘मेड इन हैवन’ जैसी कई वेब सिरीज़ में काम किया है।

युवावस्था में दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो में युववाणी और युवदर्शन में तथा मुंबई के मंचीय कवि-सम्मेलनों में अपनी कविताएँ पढ़ते रहे हैं।

आपके अभिनय के साथ-साथ कविताओं का सिलसिला आज भी जारी हैं।

फेसबुक उपस्थिति- https://www.facebook.com/rammakant.daayama?mibextid=LQQJ4d

Saturday, 29 October 2022

विकास की अवधारणा में गाँव कहाँ हैं ?

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल विशुद्ध में ग्रामीण पृष्ठभूमियों में प्रचुर लेखन करने वाले कथाकार नहीं हैं। यद्यपि अमरकांत ग्रामीण इलाके से ही शहर में आए; जिस तरह हिंदी में अनेक रचनाकार आए हैं। प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, जगदीश चंद्र, फणीश्वर नाथ रेणु, राही मासूम रजा, मार्कंडेय, शिवमूर्ति और हरनोट आदि कथाकारों की तरह अमरकांत ग्रामीण लेखन के रचनाकार नहीं हैं, उन्हें हम प्रेमचंद की कहानी की परंपरा को अग्रसर करने वाले कहानीकार अवश्य मान सकते हैं।

 

1950 अथवा आज़ादी के बाद इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, आगरा, बलिया आदि उ.प्र. के शहर इस तरह के शहर थे कि उन्हें बड़ा गाँव, या मझोला शहर कहा जा सकता था। दो दशक पहले तक तो दिल्ली को भी बड़ा गाँव कहते थे, पढ़े-लिखे लोग। आज किन्हीं भी मध्यवर्गीय शहरों की तुलना में वे बेहद मंद, कछुआ चाल, कम जनसंख्या वाले, उद्योग विहीन, छोटे कार्यालयों वाले, उनींदे, वनस्पतियों से घिरे, पैदल और सायकिल प्रमुख शहर थे। शहरों के ऊपर ग्रामीण अक्स था, शहरों में बोलियों का पर्याप्त प्रचलन था । अमरकांत की यही राह थी, यही जगह थी। अमरकांत में जो अद्वितीय विनोद था वह ग्रामीण समाज और मनुष्य से आया था। उनकी कहानियों के विषयों में गाँव, कस्बे और शहर की मिली-जुली अवस्था है। सब एक-दूसरे को 'ओव्हर लैप' करते हुए। अपनी कहानियों, केवल कहानियों के बल पर वे हिंदी के थोड़े बहुत चेखव थे।

 

श्रीलाल शुक्ल नौकरशाह थे। निपुण, बुद्धिमान, शीनकाफ़, दुरुस्त, उच्च सामाजिक, प्रतिष्ठावान तो थे ही उनकी सामाजिक बुनावट भी ऐसी ही थी। अमरकांत शुरुआती दिनों से कम्युनिस्ट थे, 'कम्युनिस्ट' कहानी लिखी थी, छोटी-मोटी नौकरियाँ करते रहे, जीवन कठोर था पर उनमें गिला-शिकवा नहीं रहा। यह उनकी विचारधारा का आचरण था, जीवन भर यह बना रहा। श्रीलाल शुक्ल हिंदी में उस गुट के प्रिय रहे जो वामपंथ विरोधी रहा या जिसका अस्तित्व ही वामपंथ की खिलाफत से बना। वे 'परिमल' में अमूर्त रूप से सक्रिय रहे। उनका दोस्ताना वहीं था। उन्हें समाजवादियों का लाभ मिला। ब्राह्मण होने का भी । बहुत दिनों तक उनके नाम के साथ पंडित शब्द भी लोग लगाते रहे। पर श्रीलाल शुक्ल अपने दमखम, शराफत, हाज़िरजवाबी के बाद भी और 'राग दरबारी' जैसी चर्चित कृति के बाद भी 'बड़े' लेखक नहीं हैं। 'बड़े' शब्द पर मेरा दबाव है कि इसे सही अर्थ में समझा जाए। 'परिमल' के साथी होने के बावजूद 'परिमल' के दिग्गजों ने उन्हें 'बड़ा' लेखक नहीं माना । 'परिमल' के नियंता 'व्यंग्य' को उपहास से देखते थे और इसे ऊँचा दर्जा नहीं देते थे। इस पर कॉफी हाउस की अनेक बहसों का मैं युवा श्रोता भी इलाहाबाद में रहा हूँ।

 

श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में प्रहसन, मखौल, किस्सा और हास्य का झरना फूटता है। वे मज़ामत के उस्ताद हैं पर उनका सारा किया-कराया क्षणभंगुर है। अगर सूक्ष्मता से श्रीलाल शुक्ल जी की मीमांसा की जाए तो उनमें अर्बन लेखक की आधुनिक प्रवृत्तियाँ नहीं हैं। वे ओवरडेटेड लेखक हैं, परसाई जैसे श्रेष्ठ और देश के बड़े लेखक के साथ भी उन्हें खड़ा किया गया। खड़ा करने वाले का उद्देश्य केवल उन्हें खड़ा करना था, प्रगतिशील विचारधारा के परसाई को कम करने के लिए। श्रीलाल शुक्ल सदा जगमगाती दुनिया में रहे, जबकि अमरकांत के चारों तरफ एक गोबर से बनी कच्ची कोठरी का अँधेरा था। ढिबरियाँ जल रही हैं चारों तरफ और अमरकांत लिख रहे हैं। अमरकांत बड़े लेखक इसलिए भी हैं कि उन्हें कभी गिला-शिकवा नहीं रहा। उन्होंने जिस लेखकीय जीवन को और उत्तर भारतीय समाज को स्वीकार किया उससे उन्हें गहरा प्यार था। उनकी चाल साफ-सुथरी थी। वे खुश दिल रहे और एक बड़े रचनाकार की स्थिरता और तटस्थता उनमें है। अपने समकालीनों की वे गहरी इज्जत करते हैं और गुलगुले से अमरकांत में विचारों का पत्थर बिल्कुल ग्रेनाइट का है। उन्हें दूर किनार में, अपने चुने हुए एकांत में रहना पसंद था इसलिए बड़े-बड़े पराभवों और राजनैतिक शेयर बाज़ार के गिरने उठने बदलने के बावजूद वे अविचलित रहे। मुझे उनके चेहरे की आकृति ब्रेख्त के काफी करीब लगती है। इसलिए निष्कर्ष रूप में यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल के आतिशबाज लेखन और अमरकांत के अँधेरों को एक जगह रख कर पुरस्कृत करना अपमानजनक भी है, और एक हद तक कारिस्तानी भी किशन पटनायक की टिप्पणी सही है, सटीक है। मेरी समझ यह है कि श्रीलाल जी की गाँव के जीवन से क्या शहरवासियों से भी यारी नहीं है।

 

अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के पुरस्कार प्रसंग को और विस्तार से जानना हो तो ज्ञानपीठ की यात्रा की तरफ ध्यान देना होगा। ज्ञानपीठ की स्थापना में शोध, मीमांसा, क्लासिकी चेतना का प्रकाशन और आयोजन उसकी गतिविधि का प्रमुख हिस्सा था। 'ज्ञानोदय' में मांस मदिरा, लहसुन प्याज का उल्लेख कहानी, कविता में आने पर उसे संपादित कर दिया जाता था। यह धर्मवीर भारती और रमेश बक्षी जैसे संपादकों के जमाने में बचा हुआ था। फिर 2010 तक आते-आते स्त्रियों पर कुत्सित टिप्पणी भी छपने लगी। आप देखिए कि कैसे ज्ञानपीठ की यात्रा समसामयिक बाज़ार की तरफ रेंग रही है। आधुनिकता और लोकप्रियता और प्रिंट आर्डर की ललक, बाज़ार की तरफ उन्मुख होना, उसका तर्क देने लगना ज्ञानपीठ की महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा हो गया है। इसीलिए ज्ञानपीठ में देश के सबसे महँगे सेल्समैन और अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रवेश विचारणीय है। यह न तो अकारण है और नही बुद्धपना।

 

ज्ञानपीठ भी हिचकते-हिचकते विश्व के ताकतवर पुरस्कारों की राह में उठ रहा है। विश्व राजनीति में उसकी कोई जगह नहीं है, न विश्व बाज़ार में लेकिन उसकी ललक यही है। यह भी मुमकिन है कि सही खिलवाड़ का कूट खेल न कर सकने के कारण वह अधकचरे चपेटे में आ जाए, यह सब भविष्य के खेल हैं। अभी मेरी समझ यह है कि ज्ञानपीठ के निर्णयों में सहजता भोलापन और चातुर्य दोनों मिले-जुले हैं। कई बार उसके निर्णय भारतीय भाषाओं की ताकतवर प्रगतिशील परंपरा की पूरी-पूरी मुखालफत नहीं करते पर उसके चाल-चलन एक लोकप्रिय खुराफात ज़रूर है। जैसे शहरयार को पुरस्कृत में करना।

 

शहरयार उर्दू के 'बड़े' शायर नहीं हैं पर उनको पुरस्कृत करके एक प्रगतिशील मुखड़ा ज्ञानपीठ का बनता है। अंतर्विरोधी चीजें इसके पहले श्री हुई हैं- जब निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को ज्ञानपीठ दिया गया। यहाँ पर भी एक कम्युनिस्ट रचनाकार और एक कम्युनिस्ट विरोधी रचनाकार की कूटनीति स्पष्ट है। एक बात ध्यान दें कि ऐसा नामवर सिंह जैसे जूरी सदस्य के खेल से संभव हुआ। नामवर सिंह ज्ञानपीठ के लिए एक मुफीद वजीर हैं। जैसा मैं पहले एक बार अपने एक व्याख्यान में भी बाँदा में कह चुका हूँ कि असली खेल जूरी की नियुक्ति है। इसकी नियुक्ति के पहले ही सालों-साल यह क्रियाकलाप चलता रहता है। यही विभाजन फिर दोहराया गया-अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल के साथ। ज्ञानपीठ गुरदयाल सिंह और अमरकांत को स्वतंत्र ज्ञानपीठ देने की बेवकूफी कभी नहीं कर सकता। यह केवल बड़े लेखकों को विभाजित और कमतर करने की तकनीक हैं।

 

साम्राज्यवादी दुनिया के बड़े और शातिर तरह से संचालित पुरस्कारों का ज्ञानपीठ का थिंक टैंक अभ्यास कर रहा है। उसके अगले कदम भारतीय समाज और राजनीति की करवटों के आधार पर होंगे। सीधा हस्तक्षेप न भी हो पर जूरी का संगठन, बहुत दूर तक सोच-विचार की कारीगरी है। यह भी हास्यास्पद है कि पिछले कुछ सालों से हिंदी के ताकतवर पुरस्कार हिंदी में सर्वश्री राजेंद्र यादव, अशोक वाजपेयी, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्ण बलदेव वैद के हिस्से में गये हैं। इन्हें बार-बार पुरस्कार मिले। ये सब जूरी की कारस्तानियाँ हैं।

 

बाज़ार का साम्राज्य, चाहे संचार, मनोरंजन, प्रसाधन का हो या शिक्षा और गाड़ियों का, गाँव की तरफ मुड़ रहा है। कंपनियाँ उधर ही जा रही हैं। यहाँ लूट की बड़ी संभावनाएँ-तपे रास्ते हैं, नया विवेकहीन उपभोक्ता है, कमाऊ मंडियाँ हैं। संभवतः सांस्कृतिक अवचेतन में अमरकांत भी इसीलिए जूरी को खटखटा रहे हों। बाज़ार का, नये साम्राज्य का गाँवों में प्रवेश उनको खत्म कर देने के लिए है, उन्हें लूट कर बदल देने का है। गाँव बचेंगे नहीं, वे उलट जाएँगे। यह कैसे मुमकिन हैं भारत देश में कि शहर तो बदल जाएँ उनका कायाकल्प हो जाए, नगरीकरण तेज बना रहे और गाँव जस के तस बने रहें। बीसों साल तक अमरकांत की सुध नहीं ली गयी और आज जब पुरस्कृत

किया गया (कोन-अंतरे में जाकर) तो मैं इसे इसी पृष्ठभूमि में देख रहा हूँ। इसी तरह 'कौन बनेगा करोड़पति' में घुस घुस कर गाँव के लोगों को लाया जा रहा है और उन्हें दस-पचास लाख दिये जा रहे हैं। यह अचानक वंचित गाँवों से लोगों को लाकर, उनके कठिन जीवन दृश्यों की क्लिपिंग दिखा कर, उनको मार्मिक दिखा कर यही किया जा रहा है, जो ज्ञानपीठ ने किया है। सब तरफ गाँव के उद्धार का यह खेल शुरू हो गया है।

 

हमारे देश के दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों के विकराल अर्थशास्त्री भी अंततः गाँवों की ज़रूरत, उसकी जगह, उसकी अनिवार्यता के ऊपर गहरा प्रश्न चिह्न लगा चुके हैं। विकास की अवधारणा में गाँव कहाँ हैं? यह देखना एक दिलचस्प बात है।

 

उत्तर भारत में पारंपरिक गाँव के निशान तो तेजी से मिटे हैं। आने वाले समय में गाँव के बिंब और बदलने वाले हैं। इस देश में ऐसे इलाके भी हैं जहाँ बड़े किसान को ज़मीन का मुआवजा 5 से 15 तक भी मिला है। यह रकम रंग लाएगी। यह गिनती के लोगों का प्राप्य है पर इसका विनाश बड़ी ग्रामीण जनसंख्या पर होगा। अपराध, भुखमरी, भेद और रक्तपात का तीखा अनुभव देखने को मिलेगा। गाँव में बड़ी रकम फेंकी जा रही है जो अंततः बाज़ार का नियंत्रण उन्हीं इलाकों में बढ़ाएगी।

 -  ज्ञानरंजन

Saturday, 15 October 2022

भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर ले जाती एक रचना

सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जीवन भर मुक्त हंसी से विपन्न, शोषित और पीड़ित मानवता के लिए वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे और स्वयं अकिचन बने रहे, किंतु उनकी स्वयं की पीड़ा वैसी थी जिसमें साधारण मानव रोने बिलखने और कराहने लगे, पर उन्होंने पीड़ा से जूझते हुए उपफ तक नहीं किया। उनकी पीड़ा वस्तुतः संगीत का रूप धारण कर चुकी थी और इसी का परिणाम है- राम की शक्ति पूजा | बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित 1936 में 'भारत' नामक दैनिक पत्र में प्रकाशित 312 पंक्तियों की यह विराट कविता भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचती है। एक नजर डाल रही है निहारिका गौड़...

'राम की शक्ति पूजा'

कालजयी रचना की यह विशेषता होती है कि समय के प्रवाह में उसमें नए अर्थ भरते चले जाएं। सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जीवन भर मुक्त हंसी से विपत्र, शोषित और पीड़ित मानवता के लिए वे अपना सर्वस्व लुटाते रहे और स्वयं अकिंचन बने रहे... किंतु उनकी स्वयं की पीड़ा वैसी थी जिसमें साधारण मानव रोने, बिलखने और कराहने लगे, पर उन्होंने पीड़ा से जूझते हुए उफ्फ तक नहीं किया। उनकी पीड़ा वस्तुतः संगीत का रूप धारण कर चुकी थी और इसी का परिणाम है राम की शक्ति पूजा।

बांग्ला के कृतिवास रामायण पर आधारित 1936 में 'भारत' नामक दैनिक पत्र में प्रकाशित 312 पक्तियों की यह विराट कविता भाव और भाषा के उत्कृष्ट स्तर पर पहुंचती है। स्मृति संचारी के माध्यम से गहरी प्रबन्धात्मक योजना के साथ मौलिक छंद में रची गई इस तत्सम प्रधान कविता में घटना के तीन पड़ाव है जिसमें कल लड़े गए युद्ध का पूरा वर्णन आगे की व्यूह रचना एवं आठ दिनों तक निरंतर चलने वाली शक्ति पूजा और उसको अंतिम परिणीति का अनुपम दृश्य है।

पहले अनुच्छेद की अट्ठारह पंक्तियों में राम-रावण युद्ध का वर्णन है। दूसरे अनुच्छेद की बारह पंक्तियों में राम और रावण दोनों पक्ष की सेनाओं के लौटने की सूचना है। तीसरे अनुच्छेद में शिविर में बैठकर सेनापति एवं अन्य सभी योद्धा मिलकर अगले दिन के रण की योजना बनाने की तैयारी में हैं। चौथे अनुच्छेद में राम के सैन्य शिविर के परिवेश का वर्णन करते हुए राम के मन में चलने वाले उथल- पुथल के साथ पूर्वदीप्ति शैली के माध्यम से जानकी वाटिका में राम सीता मिलन की स्मृति और फिर आज के युद्ध मिली असफलता तथा उससे उत्पन्न आशंका व्याकुलता का वर्णन है। पांचवें अनुच्छेद में राम के आसुंओं को देखकर शक्ति के प्रति हनुमान के क्रोध को उजागर किया है |

छठे अनुच्छेद में विभीषण संवाद है। स्थिति की विडंबना यह है कि राम का पक्ष कमज़ोर होते ही विभीषण व्याकुल हो उठते हैं, क्योंकि उनका राज्याभिषेक पहले ही किया जा चुका है। अगले अनुच्छेद में राम और विभीषण के चरित्र में अंतर की व्याख्या है, साथ ही राम की विवशता और उनकी आँखों से पुनः गिरते आसुंओं का अलग-अलग योद्धाओं पर उसकी अलग- अलग प्रतिक्रिया का पता चलता है। आठवें अनुच्छेद में जामवन्त श्रीराम को शक्ति आराधना का परामर्श देते हुए आश्वस्त करते हैं कि उनकी अनुपस्थिति में भी सुनियोजित ढंग से युद्ध चलता रहेगा। नौवें अनुच्छेद में शक्ति की मौलिक कल्पना और पूजन की तैयारी का वर्णन है। दसवां अनुच्छेद दो खंडों में विभक्त है, जिसमें प्रथम खंड में शक्ति पूजा और परीक्षा की व्याख्या है, वहीं दूसरे खंड में महाशक्ति के प्रकट होकर राम में शक्ति के लीन होने का दृश्य है।

निराला जी ने रामकथा का वह हिस्सा चुना, जहां संघर्ष एवं अंतर्द्वद्व सर्वाधिक हैं, दुःख कैसा रघुवर ? मुखर है। कविता का पहला ही वाक्यांश- 'रवि हुआ अस्त' अर्थात संध्या हो गई है, यूँ तो युद्ध कई दिनों आरंभ है, परंतु आज यह क्या हुआ कि राम के सारे शर निष्प्रभ सिद्ध हो रहे हैं। रावण की विध्वंसक अजेयता के आगे राम निरूपाय से हो रहे हैं और असली संघर्ष की शुरुआत यहीं से होती है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों अपनी संक्षितता की दृष्टि से कविता की आदर्श पूर्वपीठिका सिद्ध हुई है।

बोले रघुमणि 'मित्रवर, विजय होगी न समर, अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।' कहते कुछ कर न सके और ये दुखांत जीवन....। छल छल हो गये नयन, कुछ बूंद पुनः ढलके दूगजल अपनी अंतरंग सभा में वे सुग्रीव से कह रहे हैं, ये कहां का न्याय है कि महाशक्ति रावण के पक्ष में चली गई। संकट के समय प्रियजन याद आते है और राम की स्मृति जानकी वाटिका में पहुंच जाती है, जहां पहले-पहल उन्हें सीता के दर्शन हुए थे। इस मिलन प्रक्रिया का एहसास कर उनमें दैवीय शक्ति का संचार होता है। परन्तु फिर महाशक्ति की गोद में बैठे हुए रावण को अट्टहास करता देख राम भावाकुल हो जाते हैं। ये सब देखकर और सारा संवाद सुनने के बाद जामवन्त कहते हैं, दुःख कैसा रघुवर ?

हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो पुरुषोत्तम नवीन।' धारण, आराधन का दृढ़ आराधना से दो उत्तर... ।' महाशक्ति को रावण ने प्रसन्न कर लिया, जो कि अधर्म के पक्ष में है। आप तो धर्म के पक्ष में हैं, आप दोगुनी शक्ति से साधना कर महाशक्ति को अपने पक्ष में कीजिये | इसी सापेक्षता के सिद्धान्त को अपनाकर राम नवरात्र के समय आठ दिन का पूरा विधान बनाकर हनुमान को 108 नील कमल लाने का आदेश दिया। 'चाहिए हमें एक सौ आठ कपि, इन्दीवर' सूर्योदय के साथ शक्ति पूजा आरम्भ होती है।

आठ दिन की पूरी साधना यौगिक साधना है, जिसमें कुंडली उत्थापन की पूरी प्रक्रिया चलती है समाधिस्थ होकर एक जाप पूरा होते ही श्रीराम महाशक्ति के चरणों में एक इंदीवर अर्पित कर देते हैं। इसी तरह क्रमवार 107 नील पद्म महाशक्ति के चरणों में अर्पित किए जा चुके हैं। दुर्गाष्टमी की अर्धरात्रि का समय है। महाशक्ति ये सारी लीला देख रही हैं। ये साधना त्याग की भावना से परिपूर्ण है या स्वार्थवश इस हेतु महाशक्ति सूक्ष्म रूप में आकर राम के पार्श्व में रखे एक सौ आठवें कमल को लेकर अंतर्ध्यान हो जाती है। राम ध्यानस्थ अवस्था में 108वां जाप करने के बाद जैसे ही नीलपद्म उठाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, स्थान रिक्त पाते हैं। उनका मन व्याकुल और नयन सजल हो उठते हैं...।' अपनी प्राणप्रिया जानकी के लिए, कुछ न कर सके और ये दुखांत जीवन...|

'धिक जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध' फिर राम बुद्धि के चरम स्तर पर जाकर समाधान खोजते हैं। उनकी स्मृति बाल्यवस्था में लौटती है और उन्हें याद आता है कि माँ उन्हें राजीवनयन कहा करती थी। अर्थात मेरे पास दो कमल है। प्रतिज्ञा कर वे महाशक्ति का ध्यान करते हुए अस्त्र से अपनी दाहिनी आंख को समर्पित करने के लिए जिस क्षण हाथ उठाते हैं, उसी क्षण देवी प्रकट होती हैं और राम का हाथ थाम लेती हैं। श्रीराम के धैर्य और त्याग प्रसन्न हो महाशक्ति राम के बदन में लोन हो जाती हैं। 'होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन |’

कह महाशक्ति राम के वंदन में हुई लीन। और इसी ज्योतिर्मय चरमोत्कर्ष पर कविता समाप्त होती है। शक्ति का स्रोत मनुष्य के भीतर है, उसे जागृत करने से ही बाहरी विश्व पर विजय प्राप्त होती है |

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...