Sunday, 3 January 2021

चौकड़ी भरती कविता - प्रो. गोपाल शर्मा


यदि मैं आम-पाठक मात्र होता तो कवि की कविताओं का समय समय पर पाठ करकेआनंद और शिक्षाप्राप्त करके ही कृतार्थ हो जाता । कवि की सर्जनात्मकता , उसकी भाषिक कुशलता और विशेष तथा सामान्य घटनाओं को कविता के शिल्प में ढालने की कला के सहारे जीवन की व्याख्या करना  (लिटरेचर इज़ द क्रिटिसिज़्म ऑफ लाइफ) और अर्थ विस्तार करना कोई आसान काम नहीं। कविताएं आदि से अंत तक कविताएं हैं और रणजीत कवि ( इसलिए अपना नामरणजीतलिखता हूँ)   इसलिए मैंसहृदय पाठक अधिकऔरसमीक्षक कमकी भूमिका का निर्वहन करते हुए इन प्रतिनिधि कविताओं का पाठ करने बैठा हूँ । फिर भी समीक्षको के वक्तव्य से प्रारम्भ करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ क्योंकि मैंने रणजीत को अभी पढ़ा कहाँ है ? डॉ रामशंकर द्विवेदी के शब्द हैं -रणजीत की ये कविताएं उनके रक्तमांस से बनी हुई हैं। इन कविताओं में रणजीत का पूरा व्यक्तित्व आप देख सकते हैं।उसके कवि की आसक्ति,उसकी चाह, उसकी उत्कृष्टता, उसका औघडपन, उसकी दरियादिली, संघर्ष करने की क्षमता और प्यार करने की शिद्धत सभी इन कविताओं में विद्यमान है।राजस्थान साहित्य अकादमी  की ओर से डॉ रणजीत के कविता-कर्म पर मोनोग्राफ लिखने वाले डॉ रमाकान्त शर्मा पुरोवाक में लिखते हैं -‘डॉ रणजीत मनुष्य विमर्श के कवि हैं-जिसके स्वाभाविक हिस्से हैंदलित विमर्श और स्त्री विमर्श। मार्क्सवाद से अनुप्रेरित हिन्दी के प्रगतिशील- जनवादी कवि कहकर रणजीत को इस संकलन में डॉ रमाकान्त शर्मा ने पाठक को संकेत रूप में बहुत कुछ  कह दिया है। यही नहीं डॉ गणपति चंद्र गुप्त ने भीहिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’, (भाग दो) में लिख छोड़ा हैडॉ रणजीत का काव्य एक ईमानदार प्रगतिशील कवि की यात्रा के विभिन्न पड़ावों की सही तस्वीर प्रस्तुत करता है। ...

वस्तुतः पुरोवाक और ब्लर्ब पर दी गयी सभी जानकारी ही नहीं शीर्षक के साथप्रतिनिधिपद भी कविता के पाठक के अधिकार को सीमित कर रहा है। ये सब सूचनात्मक, प्रशंसात्मक, और सैद्धांतिक बातें कवि का एक प्रतिबिम्ब पाठक के मन-मस्तिष्क पर अंकित अवश्य करते हैं किन्तु पाठक क्या कवि में दिलचस्पी रखने के लिए इन कविताओं के पास जाता है ? मैं तो नहीं गया । किसी रचनाकार और वह भी बड़े रचनाकार को समझने में समय लगता है, कभी कभी तो शताब्दियाँ लग जाती हैं। पर मुझे अभिज्ञान के लिए समय सीमा का पालन करने के लिए बाध्य कर दिया गया है। समय सीमा के साथ ही अनेक दूसरी सीमाएं हैं, मेरी अनभिज्ञता तो है ही। इसलिए मैं चाहता हूँ कि कविता को देखूँ , कवि को नहीं ।

कवि कविता की प्रत्येक पंक्ति में विद्यमान प्रतीत होता है।  अनेक कविताओं में वह  मैंहै और या  हमहै। इन सौ से अधिक कविताओं के पाठ  के दौरान  एक प्रश्न बार बार आ खड़ा होता हैयह  मैंकौन हैं? इसमैंके पीछे कौन है?  हमकौन लोग हैं?  पाठक भी सम्मिलित  हैं क्या ? संज्ञा से अधिक सर्वनाम पर भरोसा करने वालों में गालिब ( तुम मेरे पास होते हो गोया, कोई दूसरा नहीं होता) से लेकर शमशेर ( वह अनायास मेरा पद गुनगुनाता हुआ बैठा रहा) तक रहें हैं । रणजीत में भीमैंहैपास मत आओ मेरे, मुझसे न पूछो बात कोई।मैंकी आप्लावित करती उपस्थिति-अनुपस्थिति को बाँचता एक दूसरामैंजब अंतिम पृष्ठ तक पहुंचता है तो वह खुद को कवि के  करीब पाता है और सोचने लगता है कि इस कवि से फोन करके बात की जाए । पाठक और रचनाकार का यह स्नेह बंधन कौन सी कविता/कविताओं की बदौलत है?

यह एक ऐसी साहित्यिक कृति(काव्य संग्रह)  है जो अनायास ही पाठक को उसके रचनाकार से बांधती है। वास्तव में यही तो किसी टैक्स्ट का लक्ष्य होता  है कि वह तादात्म्य की भावना को उत्पन्न करे। पाठक सोचने लगता है कि इन कविताओं से वह ठीक वही समझ रहा है जो कवि का मंतव्य है और कवि वही लिख रहा है जो उसका विचार रहा है। पर पाठक जानता है कि यह मित्रता एकतरफा है और कवि उससे दूर है । उसके समक्ष कविताएं हैं जो प्रतिनिधि के रूप में विद्यमान हैं । कवि जब बंगलोर में अपने बच्चों के साथ है, तब उसका एक पाठक दूर किसी देश में इन पंक्तियों के साथ उससे मुखातिब है। यह इकतरफा प्यार कुछ ऐसा है

तुम नहीं हो पर तुम्हारे शरीर की ऊष्मा

अब भी मेरे बिस्तर में बसी हुई है

अब भी बिछा हुआ है मेरी किताबों पर तुम्हारा स्पर्श

बिखरी हुई गुलाब की ताज़ा पंखुरियों की तरह

ये शब्द संस्कार और अनुभूति की वास्तविकता किसी प्रगतिवादी  कवि की नहीं हो सकती । इसके लिए अनुभूति की गहनता और शिल्प के प्रति जागरूकता के बीच संतुलन की जरूरत होती है।

दूसरे शब्दों में कवि रणजीत उतना वास्तविक रणजीत नहीं है, वह तोपाठककाकविता-पाठसे निर्मित रणजीत है। और यदि मैं  समकालीन समीक्षा की शब्दावली में कहूँ  तो वह पाठक /पाठकों कीपाठ-फेंटसीका अंग है। व्यक्ति रणजीत होते हुए भी नहीं है और रससिध्द कवि पाठक के समक्ष  कभीप्यार बेचताहै और कभी  विष-पुरुषहो जाता है। इस अर्धनारी या अर्धपुरुष शरीर को अशरीरी हो जाना पड़ा है । क्या इसी को पिछले पचास वर्षों से  डैथ ऑफ दी ओथरकहकर समझाया जाता रहा है? फ्रांसीसी उत्तरसंरचनावादी विचारक रोला बार्थ्स 1967 में रचनाकार के अधिनायकत्व को चुनौती देते हैं जिसे 1946 में विमसेट और ब्रेडले नेईंटेंशनल फैलसीकहकर अमेरिकी नव-समीक्षा का प्रमुख उपकरण माना था। ( ‘The design or intention of the author is neither available nor desirable as a standard for judging the success of a literary work’ (Wimsatt and Beardsley)जो कुछ है वहपाठहै,  टैक्स्टहै , ‘कविताहै। इस दृष्टि सेनयी साधनाकविता में कवि रणजीत जो कहते हैं , उससे पाठक भी यह कहने को उत्सुक होता है कि  हमने भी सोचा है, मनन किया है...’। जो कवि कह रहा है या जो उसके उद्वेलित मन-मस्तिष्क से एक अवसर पर शब्दबद्ध हुआ, कविता वह नहीं है। कविता वह है जो पाठक के मन में अंकित होती है और जो कविता-पाठ के बाद की अव्यक्त स्थिति है। जब कवि रणजीत अपनी बात कह चुकते हैं, तब पाठक उनके मर्म से मर्माहत होने के बावजूद भविष्य के सपने देखता है।

कवि का मंतव्यरहा है, रहता है, किन्तु जब हर कविता में वह कुछ भिन्न स्वर से उपस्थित हो जाता है और राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, आदि बाँचते हुए भू से लेकर ख तक को समाहित करकेभूखतक चला जाता है तो पाठक समझ जाता है कि कवि रणजीत किसी एकपवित्र अर्थकी ओर नहीं ले जा रहा । वहअनर्थको भी रेखांकित करते हुए उसमेंअर्थका संधान करता है

इतना पवित्र शब्द और होठ मेरे जूठे

कैसे कहूँ कि मैं

तुम्हें प्यार ....

और इस तरहशब्दों के पुलकभीअधरमें लटके रह जाते हैं और कभीअधरतक जा पहुँचते हैं। गत शताब्दी के भाषाशास्त्री  सस्यूर, पिंकर, और चोम्सकी यही तो कहते रहे कि कवि समझता है वह भाषा का प्रयोक्ता है ( देखेंशब्द सैनिकों से ) पर उसे पता ही नहीं चलता और भाषा उससेबिना सोचे समझेकुछ ऐसा लिखवा लेती हैमेरी हर लड़ाई निकलती है आखिर किसी किसी स्त्रीलिंग संज्ञा के लिए । और फिर कवि के मंतव्य को मनोविश्लेषक की दृष्टि से देखने की जरूरत हो जाती है। रणजीत की कविताओं में अभीरणजीतलिखने की एक आग सी है जो सर्वनामों से होकर विशेषणों तक जाती है किन्तु संज्ञा शून्य नहीं होती, ‘विवेक संगतरहती है। अज्ञेय के अनुसारकाव्य के जो भी गुण बताए जाते या बताए जा सकते   हैं अंततोगत्वा भाषा के ही गुण हैं।इस पंक्ति की दिशा में इन पंक्तियों के पाठकों ले जाते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि रणजीत की काव्य भाषा समकालीन हिन्दी काव्यभाषा का प्रसन्न प्रयोग है। इसमें एक ओर तो भवानी भाई की सीगीत फ़रोशीहै , दूसरी ओर रघुवीर सहाय कीमुहल्लेदारी वृत्ति। शहर के चौराहे पर  सुकरात और कबीर से खड़े कविप्रतिश्रुति का गीतगाते हैं और सावधान करते हैं।

देखने की जरूरत यह भी है कि  कवि रणजीत ( ओथर-पोएट) जो कविताई करता है या जो कहता है वह किस अधिकार (ओथरटी) से करता है । क्या वह कोई समाज सुधारक,  दार्शनिक,नेता, अभिनेता या अजेंडाधारी है ? कहीं वह तथाकथितअर्बन नक्सलतो नहीं? राधिका कन्हाई सुमिरन के बहाने कई भिखारीदास पहले भीनितांत ऐहिक कामनाओं से प्रेरित सौंदर्यवादी और शृंगारवादी नितांत भौतिक(फिजिकल) कविता से युक्त’ ( सुधीश पचौरी- रीतिकाल सेक्सुअलिटी का समारोह ) रीतिकाल में वर्चस्वशाली हुए हैं।कौन है वह? कोई नहीं कवि है। (Who is that? Nobody, he is the author.) ‘शेक्सपीयर इन लवफिल्म का यह कथन कवि, रचनाकार और लेखक को कोई खासभावनहीं देता किन्तुकोई नहींसेकविके बीच की दूरी तय करते हुए जब रणजीतबिना कुदाल उठाएकलम पर विश्वास करदीवारें गिरानेकी बात करता है तो वह वो सब हो जाता है जो वह नहीं है।  वहतुम नहीं होजो रूमानी रेशमी कविताओं कीएक नयी पुस्तककोएक ही बैठकमें अंत तक पढ़ डालता है औरएक अनिर्वचनीय सुख में निमग्नहो जाता है।

वाद नहीं संवाद

एक पाठ निरंतर पाठक के साथ चला है । मार्क्सवाद की बात नहीं।अस्ति- नास्तिसंवाद भी नहीं। यहाँ कविता अपने युगीन संदर्भों से तो जुड़ी ही है, पश्चिम के विविध युगों, मिथकों, कवि-उक्तियों द्वारा प्रदत्त सूचना और अध्ययन-मनन के बाद उकेरी गई पंक्तियों  में इस प्रकार प्रतिफलित है कि समग्रता का भाव दृष्टिगोचर होता है।प्रमथ्यु’, ‘फाउस्ट के कन्फ़ेंशन’, ‘ मेरेलिन मनरो का अंतिम पत्र’, ‘सखरोव के निर्वासन पर’ , ‘ आम्रकुंजों में उभरता वियतनाम’,’ पोलेंड के बारे में’, ‘गोदो का इंतजारआदि कविताओं का पाठ करने  पर यह अनुभव होता है कि कवि पूर्व संचित और नयी-समकालीन कथा सामग्री  को भी कविता के शिल्प में ढालकर इस  प्रकार प्रस्तुत करने में समर्थ है कि काव्य समीक्षक का बाना धारण करता पाठक इसे एक नए विधान की सृष्टि मान लेता है। अपनी उपर्युक्त वृत्तियों और विशेषताओं के कारण रणजीत इस अर्थ में प्रवर्तक कवि हैं। कवि की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-

बेचारा इतिहास

किस किस को माफ़ करेगा ? 

रणजीत के कवि-कर्म के बीच कई मुश्किलें (द्वंदात्मक स्थिति) हैंएक तो वाद विशेष है (मार्क्सवाद का रचनात्मक विकास/ जूझ रहा है मार्क्सवाद केवैज्ञानिक विकाससे ), दूसरेमेरे आसपास के लोग हैं जो  पानी को तो कई-कई बार छानते हैंपरजहरीली परम्पराओं को आँखें मीच कर पी जाते हैं।कवि का विद्रोह कभी शांत है ओर वह बसमाध्यमभर  है। कभी वह सविनय अवज्ञा पर उतर आता है।सिरफिरों के साथउठता बैठता है। कभी उग्र रूप धारण कर लेता है-

हाँ,मैं बाग़ी हूँ

मुझे अपने देश , अपने धर्म और अपनी सरकार से नफरत है।

किन्तु इन कथन भंगिमाओं में अंतर्निहित जो तत्व पाठक सहज ही ग्रहण कर लेता है वह है कवि की आम- जन के प्रति आसक्ति ।

मैं बाग़ी हूँ क्योंकि मुझे अपने लोगों से प्यार है

मैं इनके चेहरों पर बहार, इनके आँगनों में त्योहार देखना चाहता हूँ। 

कवि की कविता में  जनवादी, प्रगतिवादी और मार्क्सवादी लहर कभी इधर से और कभी उधर से आती दिखाई देती है ;अनुप्रेरित करती है किन्तु एक हद तक। समय के साथ उसमें परिवर्तन आया है। वह गांधी और भगत सिंह ही नहीं शंकराचार्य   और प्रमथ्यु तक भी हो आता है। मनुष्य और मनुष्यता को केंद्र में रखकर की गई कविताओं में इन्सानों की खोज करती कविताओं के साथ मार्क्सवाद से मोहभंग को रेखांकित करते चुभते चौपदे भी हैं

वृद्ध चेहरा, धँसी आँखें टिकी हैं अदृष्ट पर

औ पड़ी है थकी ऐनककैपिटलके पृष्ठ पर

अनगिनत बलिदानियों के लहू से लिक्खी किताबे-इंकलाब

आह ! सत्तर साल में ही आ गयी परिशिष्ट पर ।

मार्क्सवाद का प्रेतपुस्तक के लेखक उत्तरसंरचनावादी जाक देरिदा ने मार्क्स को नहीं उसके वाद को अपनाने वालों के अवसान पर क्षोभ व्यक्त किया था। रणजीत की कविताओं में वाद के स्थान पर व्यक्ति मार्क्स है। मनुष्य है जो जीवन की आपाधापी में पड़कर भी कभीक्रांतिकी बात करता है और कभी कभी उस वियतनाम की जो आम्र कुंजों में से उभरता है।

प्रकृति और पर्यावरण

शायद जब से कविता जन्मी है तब से प्रकृति और कविता में बहनापा रहा है। दोनों एक दूसरे का साथ कभी कभार ही छोड़ती हैं। कभी वह उपमा के रूप में साथ होती है और कभी रूपक हो जाती है। वाल्मीकि को कोहरे से ढका चंद्रमा निश्वासांध  दर्पण सा प्रतीत होता है। प्रसाद को उषा अंबर पनघट पर जल भरने वाली नागरी के समान दिखाई देती है।

इसलिए जब तक तुम्हारे स्पर्श में शिरीष के फूल खिले हुए हैं

तुम्हारे केशों में रातरानी की खुशबू है

तुम्हारी साँसों  में इंसानियत की गर्मी है

तब तक ठहरी रहो

इस परंपरा को साहित्य अध्ययन की नवीनतम विमर्शवादी दृष्टियों मेंहरित विमर्शने खंडित किया है । अब प्रकृति को युगीन सम्बन्धों के साथ जोड़कर देखने  के साथ ही नए  संदर्भों और शब्दावलियों के द्वारा प्रकृति चित्रण में यथार्थ के बिम्ब  उकेरे जाते हैं ।

सड़क के मोड पर आ जाता है अचानक

शिरीष का एक खिला हुआ  पेड़

और सारा संदर्भ बदल देता है।

 वे प्रकृति को अपने भीतर समोए हैं इसलिए कोई बाहरी वस्तु प्रतीत नहीं होती। कई कविताओं में जब प्रकृति चित्रण लगाव से अलगाव की ओर बढ़ता है तो विलग दृष्टि से विचित्र रूप की प्रस्तुति होती है।पानी’, ‘पेड़’, ‘पृथ्वी’ ‘ आकाश’ , ‘भूकंपकी कवितायेंशिरीष का पेड़पर भारी पड़तीं हैं। पर्यावरण को बचाने की उत्कट आकांक्षा और ललक पाठक को तब आप्लावित करती है जब वहपृथ्वी के लिएका पाठ करते करते उद्विग्न हो जाता है, संज्ञा शून्य सा होकर गिलहरी, मछ्ली, खरगोश, पैंगविन की तरह  इस भू को धारण करना चाहता है। इसलिए ऐसी तमाम कविताओं में प्रकृतिसुकुमाररूप में न होकर कभी निरुपाय सी होती है और कभी चीख कर कहती हैबचाओ!

बचाओ इसे अपने आणविक और जैविक हथियारों से

युद्धों से,

और उनके जन्मदाता राष्ट्र-राज्यों से

जनसंख्या विस्फोट से ...

एनिमल स्टडीज़ या मानवेतर अध्ययन की दृष्टि से जबकाकरोचजैसी कविता एक गतिशील बिम्ब के साथ कुछ अलग सा अर्थ और अनुभव प्रस्तुत करती है तो पाठक की कल्पना ठहर जाती है, ठिठक जाती है। यह जो अनुभव अद्वितीय इन कविताओं में है और जो सरोकार हैं उनका शब्दांकन करना कठिन है । क्या एलियट बता सकते हैं कि निम्नलिखित पंक्तियों में अनुभव क्या है , औरओब्जेक्टिव कोरिलेटिवक्या है?क्याबिना-शीर्षकके काव्य-पंक्तियों  का मर्म उद्घाटित हो सकेगा ?

हमारी खानपान की सारी आदतें बदल कर रख दीं

तुम्हारे सहवास ने

इन कविताओं में मनुष्य और जीव जंतुओंप्रकृति का संश्लिस्ट रूप है,कविता के अर्थ की कई परतें हैं। आलोचक या समीक्षक द्वारा कोई विवेचन और पाठ पूर्ण नहीं हो  सकता ।

कि यह मेमना मैं ही हूँ

और यह बाघ ?

इस मासूम मेमने को निगलने वाला यह बाघ ?

मैं सही शब्द चुनना नहीं जानती ।

मर्लिन मनरो का अंतिम पत्रकविता की उपरोक्त पंक्तियों में कपड़े के दो खिलौने जिसघनीभूत पीड़ाकी ओर संकेत करते हैं वह कविता में चित्र-विचित्र का संगुंफन यासिंफनीहै।

परिवार और समाज

एक सूचना पाठक के कई बार काम आ जाती है ।  कवि को जीविका के कारण बहुत समय तक अपने परिवार से अलग रहना पड़ा है।’ ‘हाय हाय ये मजबूरीसे लेकरमा निषादतक की अनुभूति कराती कई कविताएं कभीदर्द की गांठको कसती हैं, कभीसपनेदिखाती हैं ।  पृष्ठभूमिमेंचाँद का मायूस चेहराहोता है । जिंदगी इतनी सपाट होती है कि

मेरे दिल पर अवसाद का इतना बोझ रख जाता है

कि मैं घंटों तक किसी से बात  भी नहीं कर पाता। ( संवेदनाओं के क्षितिज)

और फिरतुम नहीं होकी अंतिम पंक्तियाँ आ मिलती हैं

तुम नहीं हो पर तुम्हारे शरीर की ऊष्मा

अब भी मेरे बिस्तर में बसी हुई है

अब भी बिछा हुआ है मेरी किताबों पर तुम्हारा स्पर्श

बिखरी हुई गुलाब की ताजा पंखुरियों की तरह

ये पंक्तियाँ पाठक के मन में एक ऐसी मधुर अनुभूति जगाती हैं मानो वह स्पर्श उन्हे भी छू गया हो। प्रवासी का उत्साह प्रबल हो जाता है। पाठक अनुभव करता है कि कवि ने जो सिर्फ व्यंजित किया था वह उपस्थित हो गया । निराकार का  साकार होना कुछ ऐसा ही होता होगा। कुछ ऐसा ही कवि-कुल गुरु कालिदास ने भी तो कहा था- रम्यानि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य  शब्दान... । यह दर्शन तभी संभव है जबचक्षुहों।

तुम खुश रहो बेटी , मैं बिलकुल तटस्थ हूँ ।

सारी परस्थता छोड़ कर अब स्वस्थ हूँ।  ( प्रवासिनी बिटिया के प्रति )

गुड्डनजैसी कविताओं में कवि की मनस्थिति का अनुमान लगाना कठिन नहीं।यहाँवादनहींसंवादहै। लेखन, कविताई और जीवन एकाकार हो गया है। यहाँ जोड़ना होगा कि इन कविताओं में मानसिक अस्त-व्यस्तता की बीच भी रणजीत अपने समय को बाँच रहें हैं।

तुम्हें भूलने के लिए यह मकान ही छोड़ना होगा, बेटी !

विरह और वात्सल्य की मौन संयमित अभिव्यक्ति के द्वारा जीवन के जो चित्र दृष्टिगोचर होते हैं वे नायाब हैं।

सरोज स्मृतिका कवि अचानक आ धमकता है । बड़े रचनाकार को समझने में वक्त लगता है, जनाब ! कुछ रचनाओं से तो बसघूँघट की आड़से दीदार ही हो पाएगा। फिर भी इन कविताओं का एक प्रमुख स्वरघर परिवारसे आलोड़ित है। इसमें अनुकूल  पत्नी, पुत्री, और समूचा  गाँव है। एक लंबी कवितागाँवका व्यापक फ़लक और रिश्ते नाते , मित्र, न जाने क्या-क्या जब पाठक के सामने फिल्म की पटकथा सा रु- -रु होता है तो एकफुरहरी भरा दयाभावतन मन पर छा जाता है।  मीराका सुबह साढ़े तीन बजे उठकर मुंगोड़ों के लिए दाल पीसने से लेकर रात तक खटना , फिर भी पिटना , तो भी मुस्कराते रहना क्या किसी के कहने मात्र से दस दिन के लिए भी कहीं भाग सकती है ? यही नियति है।

वास्तव में हिन्दी साहित्य मेंउसने कहा थासे लेकर आज तक  संस्कृत साहित्य से प्राप्त इस करुण रस ने सहृदय पाठक को  सदा भाव विभोर किया है।नहाकर नेकर निचोड़ने लगा मैंजैसी पंक्ति में काव्यत्व कैसे अनायास ही आ गया,लिखना मेरे बस की बात नहीं। अभिभूत हूँ।अगाध  स्वाभाविकता, प्रगाढ़ परिचय, और निर्मल सहजता के बावजूद भी कवि की अनबूझ सजावट से कोई भी कह उठेगा कि ये सहज और सफल कविताएं हैं। अनुभूति के रस में  पगी हैं और काव्य गुण युक्त हैं। 

गद्य की लय

इन कविताओं में परंपरागत पद्यात्मकता के स्थान पर गद्यात्मकता है किन्तु इससे काव्यात्मकता का निर्वाह न हुआ हो, ऐसी बात नहीं है। कवितायें उन्ही भावों और विचारों को अभिव्यक्त कर रही हैं जो कवि की अनुभूति के माध्यम से आए हैं। इस दृष्टि से कवि शब्द के संस्कार से युक्त है। वह पुराने शब्दों को नये अर्थ देता है और नए शब्दों  में प्रयोगशील हो जाता । है। उदाहरण के लिएजूझती प्रतिमाकविता में विशेषण  विशेष्य के ऐसे युग्म आते हैं  - विकल स्वप्न, धधकते वर्तमान , पाषाणी बंध, अजन्मी दुनिया, आदि।भाषिक भृष्टाचारको रेखांकित करती कविता में संकेत स्वरूप ही सही किन्तु यह बता अवश्य दिया गया है कि विश्व भर में भाषा और शब्दों का अवमूल्यन लगातार बढ़ रहा है और अशोभन कार्यों को शोभन नाम देने की परिपाटी चल निकली है।उपमान मैलेहोने की प्रयोगवादी परंपरा से भी दो चार कदम आगे जाकर कवि रणजीतविवेक संगतकी तलाश में है; भाषा और व्यवहार दोनों में उसे असंगति दिखाई देती है।  अमल पताशासी भाषा और भाषिक व्यवहार अब ढूँढने से भी नहीं मिल रहा। इन पंक्तियों का कोई सानी नहीं

आंवले के अचार  के साथ खाये गए

भुने हुए होलों में

और न जाने कितनी-कितनी चीजों में

मेरे देश मैं तुम्हें पीता हूँ खाता हूँ

जीवित जागृत भरा पूरा पाता हूँ ।

दिशा और द्वंद

शायद कवि का  सोचना’ ‘एक बेहतर दुनिया के बारे में सोचनादुनिया को बेहतर बनाने के लिए है। कहना न होगा कि इन कविताओं में कथ्य और शैली दोनों के  द्वारा एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत है जो भयावह नहीं । इस दृष्टि से कवि उत्तर आधुनिक ,उत्तर संरचनावादी और उत्तर मानवतावादी सोच से परे जाकरदो हजार पच्चीस मेंसंसार को एक परिवार के रूप में हिलमिल कर देखता है। यहाँ यह वर्ष प्रतीक मात्र है, भविष्य का, उस भविष्य का जिसका भूत और वर्तमान एक ही पंक्ति में अभिव्यक्ति पा गया हैअरे यह कौन सी दुनिया है भाई !

पाठ के माध्यम से पाठक कविता के मर्म तक जा पहुंचता है । कविता के माध्यम से कवि की ओर पहुंचता पाठक अपने आप कवि को जान जाता है। इस आलेख में प्रस्तुत कुछ उदाहरण या उद्धरण बड़े प्रयास से ढूंढकर प्रस्तुत नहीं किए गए  हैं।  इस प्रकार के सहज भावों से युक्त शतशः उदाहरण प्रस्तुत करना कोई कठिन कार्य नहीं। कवि ने जीवन के व्यापक  विस्तृत क्षेत्र में वर्षों निरंतर अवगाहन किया है। गहराइयों में उतरकर जीवन-कमल पर दृष्टिपात किया है। उसकी दृष्टि दसों दिशाओं में गयी है और जो भी वस्तु, व्यक्ति, स्थान, और अनुभूति उसकी सूक्ष्म अनी से बिंधी है, उसे उसने कविता के शिल्प में पिरोया है। यह कह देना भी जरूरी है किवादकी कुंजी से कविता का ताला न तो खोलना चाहिए और न यहाँ खोलने की कोशिश की गयी है। क्योंकि जो कुंजी, बक़ौल देरिदा, ताला खोलती है वही कुंजी उसे बंद भी करती है। कविता मानव मी अक्षय जिजीविषा में से प्रस्फुटित होती है। जीवन की समग्रता में पनपती है। असीम उड़ती है । फिर भीसूरज का ध्यानरखे जाने को कहती है।

 

- प्रोफेसर, अँग्रेजी विभाग

अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथियोपिया ( अफ्रीका) 

prof.gopalsharma@gmail.com

Sunday, 13 December 2020

व्यंग्य परिक्रमा 2020


लेखा-जोखा

 राहुल देव

 

आमतौर पर व्यंग्य को अगम्भीर किस्म का गंभीर साहित्य माना जाता रहा है। अपने मूल में व्यंग्य साहित्य विसंगतियों का चरित्र चित्रण है। व्यंग्य जीवन और समाज की आलोचना का सशक्त भाषिक अस्त्र है। यह एक सरोकारसम्पन्न गंभीर उपविधा है। व्यंग्यकार खुद व्यवस्था का सबसे बड़ा आलोचक है। इसलिए इसकी लोकप्रियता गुणवत्ता में ह्रास के बावजूद आज भी कम नही हुई है | कोरोना संकट के बावजूद अपनी तमाम कमियों और गुणों के साथ हर साल की तरह इस वर्ष भी व्यंग्य की तमाम किताबें आई हैं जिनका संक्षिप्त उल्लेख इस आलेख में किया गया है |

 

'व्यंग्य का ब्लैकहोल' शीर्षक से व्यंग्यकार आभा संजीव सिंह का रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से संग्रह इसी साल आया। चर्चित व्यंग्यकार पीयूष पाण्डेय का व्यंग्य संग्रह 'कबीरा बैठा डिबेट में' प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से साल के शुरुआती दिनों में आया था। परसाई नगरी जबलपुर के व्यंग्यलेखक जयप्रकाश पाण्डेय का रवीना प्रकाशन से 'डांस इंडिया डांस' नामक संग्रह आया। शिवना पेपरबैक्स, सीहोर ने भी व्यंग्य की कुछ अच्छी पुस्तकें प्रकाशित कीं जिनमे प्रेम जनमेजय और लालित्य ललित की 'मेरी दस रचनाएं' सिरिज की किताबें रहीं। वहीं दिव्यांश पब्लिकेशन्स से प्रकाशित सुधीर मिश्र की किताब 'हाइब्रिड नेता चुनिंदा लखनवी तंज' थोड़ा अलग मिज़ाज़ की पुस्तक रही। यह किताब पिछले वर्ष प्रकाशित हुई थी | इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इस वर्ष इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है | अलग मिजाज़ की बात करें तो एक किताब ने और मेरा ध्यान खींचा जिसका शीर्षक है ‘साहित्यिक पंडानामा’ और इसके लेखक हैं सीतापुर निवासी भूपेंद्र दीक्षित इसे लोकमित्र प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है |

 


युवा व्यंग्यकारों में इंदौर के व्यंग्यकार सौरभ जैन का पहला व्यंग्य संग्रह 'डेमोक्रेसी स्वाहा' भावना प्रकाशन, नयी दिल्ली से छपा। इसी प्रकाशन हाउस से नोएडा (उ.प्र.) के युवा व्यंग्यकार अभिषेक अवस्थी का प्रथम व्यंग्य संग्रह 'मृगया' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस विधा में अन्य युवाओं की प्रमुख किताबों की बात करें तो उनमें लखनऊ के प्रसिद्ध कवि और व्यंग्य लेखक पंकज प्रसून की 'हँसी का पासवर्ड' व मांडवी प्रकाशन, गाज़ियाबाद से प्रकाशित मुकेश राठौर की किताब 'मुआवजे का मौसम' का नाम लिया जा सकता है।

 

इस वर्ष प्रकाशित अपेक्षाकृत वरिष्ठ रचनाकारों की प्रमुख पुस्तकों का जिक्र करूँ तो उनमें किताबवाले, नई दिल्ली से गिरीश पंकज का 'जादुई चिराग', नीरज बुक सेंटर से प्रकाशित हुई विनोद साव की किताब 'धराशायी होने का सिलसिला', अश्विनी कुमार दुबे का संग्रह 'महान बनने की कला', अमन प्रकाशन कानपुर से प्रेम जनमेजय का संग्रह 'हँसो हँसो यार हँसो', वनिका प्रकाशन बिजनौर से आलोक पुराणिक का व्यंग्य संग्रह 'व्हात्सप्प के पढ़े-लिखे' काफी समय बाद देखने को मिला। इसी क्रम में उज्जैन के सशक्त व्यंग्यकार शांतिलाल जैन का चौथा व्यंग्य संग्रह 'वे रचनाकुमारी को नही जानते', राजस्थान से बुलाकी शर्मा का व्यंग्य संग्रह 'पांचवां कबीर', अमन प्रकाशन कानपुर से चतुर्थ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्राप्त राजस्थानी व्यंग्यकार अतुल चतुर्वेदी का संग्रह 'बेशर्म समय में', कलमकार प्रकाशन से सेवाराम त्रिपाठी का संग्रह ‘हाँ, हम राजनीति नही कर रहे’, मुम्बई के डॉ प्रमोद पाण्डेय के संपादन में 'बता दूं क्या' शीर्षक से निकला 15 व्यंग्यकारों का संयुक्त संकलन और वर्षांत में सरोकार प्रकाशन भोपाल से कुमार सुरेश का व्यंग्य संग्रह 'व्यंग्य-राग' का नाम लिया जा सकता है।

 


महिला व्यंग्यकारों की बात करें तो उनमें नीरज बुक सेंटर से प्रकाशित स्नेहलता पाठक का संग्रह 'एक दीवार सौ अफ़साने', अर्चना चतुर्वेदी के संग्रह 'घूरो मगर प्यार से' 'लालित्य ललित के श्रेष्ठ व्यंग्य' संपादक- सुनीता शानू प्रमुख रहे।

 

इसी साल प्रकाशित देश के कुछ अन्य व्यंग्यकारों के संग्रहों की बात की जाय तो उनमें इंडिया नेटबुक्स, नॉएडा से हरीश कुमार सिंह का व्यंग्य संग्रह 'आप कैमरे की नज़र में हैं', रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से दीपक गिरकर का व्यंग्य संग्रह 'बंटी, बबली और बाबूजी का बटुआ', वैभव प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित सुनील जैन राहीका संग्रह 'झम्मन बारात के रिश्तेदार', रवीना प्रकाशन से विवेक रंजन श्रीवास्तव का संग्रह 'खटर-पटर', राजशेखर चौबे का व्यंग्य संग्रह 'स्ट्राइक 2.0', इंडिया नेटबुक्स से प्रकाशित अरुण अर्णव खरे का संग्रह 'उफ ये ऐप के झमेले' तथा विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य संग्रह 'समस्या का पंजीकरण व अन्य व्यंग्य' उल्लेखनीय रहे।

 


व्यंग्य विधा पर आलोचनात्मक दृष्टि से बात करती सुरेश कान्त की पुस्तक 'व्यंग्य एक नई दृष्टि' अमन प्रकाशन, कानपुर ने इसी साल प्रकाशित की जो अपने आप मे उपयोगी पुस्तक रही। यह वर्ष व्यंग्य उपन्यास की दृष्टि से उतना उर्वर नही रहा। राजीव तनेजा के व्यंग्य उपन्यास 'काग-भुसन्ड' को छोड़ दें तो कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यंग्य औपन्यासिक कृति मेरी नज़र में नही आई। हाँ बहुपठित उपन्यासकार-व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी का छठा उपन्यास 'स्वांग' इस साल राजकमल से आना संभावित था लेकिन नही आ सका शायद अब वह 2021 के पुस्तक मेले में आयेगा।

 

पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो कई पत्रिकाओं जैसे 'इण्डिया टुडे' के व्यंग्य वार्षिकांक ने काफी अच्छी सामग्री प्रस्तुत की। व्यंग्य की सदाबहार पत्रिका 'व्यंग्य यात्रा' तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने व्यंग्यप्रेमी संपादक प्रेम जनमेजय की वजह से संयुक्तांक निकालते हुए इस वर्ष को हँसते-हँसते विदा दी।

 

व्यंग्य साहित्य की दृष्टि से यह वर्ष काफी भरा-पूरा रहा। गुणवत्ता व परिमाण दोनों दृष्टियों से पिछले वर्ष की अपेक्षा व्यंग्यलेखकों ने आश्वस्त किया। ख़ासतौर से युवा रचनाकारों की वैचारिक जमीन, ऊर्जा और तैयारी देखकर खुशी हुई। अब इसका कारण लॉकडाउन के कारण इफ़रात में मिला काफी खाली समय रहा या कुछ और यह निश्चित रूप से नही कह सकता। लेकिन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक मुद्दों पर इस साल सबने जी भर कलम चलाई और क्या खूब चलाई। ऐसा नही है कि जितनी किताबें आईं सभी बेहतरीन रहीं लेकिन इस लेखे में वे ही किताबें शामिल की गयीं हैं जिनमे कुछ सार्थक लेखन देखने को मिला और जिन्हें पाठकों ने भी अपना भरपूर प्यार दिया | कुछेक संग्रहों ने मुझे काफी निराश भी किया | उनके नाम न लेते हुए बस यही सलाह कि किताब केवल अपने संग्रहों की संख्या बढ़ाने भर के लिए न निकालें बल्कि किताब ऐसी हो जो अपनी समृद्ध व्यंग्य परम्परा में कुछ न कुछ जोड़ती चले तभी आपका लिखना सार्थक साबित होगा | कुल मिलाकर कोविडग्रस्त निराशाजनक माहौल में 2020 व्यंग्य की दृष्टि से राहत भरा रहा। अब यह उम्मीदें कहाँ तक अपना असर छोड़ पाएंगीं यह तो आने वाला समय बताएगा। मुक्तिबोध की पंक्तियाँ हमेशा स्मरण रहे 'जो है उससे बेहतर चाहिए'। बेहतरी की यह तलाश अनवरत जारी रहे | आमीन |

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9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) सीतापुर 261203 (उ.प्र.)

Thursday, 3 December 2020

व्यंग्य में कैलाश मण्डलेकर - विनोद साव



‘बाबाओं के देश में’ यह व्यंग्यकार कैलाश मण्डलेकर के नए व्यंग्य संग्रह का नाम है। इसे बोधि प्रकाशन, जयपुर ने छापा है। कैलाश जी मध्यप्रदेश में खंडवा के निवासी हैं। वहॉ बी.एस.एन.एल. की संचार सेवा में अधिकारी रहे हैं लेकिन उससे भी बढ़कर वे हिंदी व्यंग्य के अधिकारी हैं और यहॉ भी वे पूरी तन्मयता और जिम्मेदारी के साथ खड़े हैं। वैसे भी अविभाजित मध्यप्रदेश को व्यंग्य की खूब उर्जावान धरती माना गया है जहां परसाई, शरद जोशी से लेकर आज तक साहित्य की कुछ बंजर धरती पर अपने पैने हल चलाने में जुटे हुए हैं। इनमें कैलाश मण्डलेकर हैं जिनकी व्यंग्य-विनोद से भरी रचनाओं की फसल ऐसे समय में लहलहा रही है जब व्यंग्य साहित्य जगत को सूखे से बचाने के लिए किसी हरेली सहेली योजना की जरुरत हो.

यह लेखक का चौथा संग्रह है। उनका पहला संग्रह ‘सर्किट हाउस में लटका चॉद’ ही उनकी संभावित विकास यात्रा की उम्मीदें जगा गया था। बहुत पहले मैंने व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी को नए लेखकों के बारे में पूछा था तब उन्होंने धीरे से कैलाश मण्डलेकर का नाम लिया था.. और यह धारणा कैलाश जी को मिले प्रथम ज्ञान चतुर्वेदी सम्मान से और भी पुख्ता हो जाती है. यह सही है आज कैलाश मण्डलेकर की रचनाएँ साहित्य की सभी प्रतिष्ठित बड़ी पत्रिकाओं में छप रही हैं और बिना किसी समीकरणों के अपनी रचनात्मक प्रतिभा के बल पर छप रही हैं।

व्यंग्य लेखन में कैलाश की मुद्रा एक विनम्र प्रहारक की मुद्रा है। स्थितियों पर वे बड़ी विनम्रता से व्यंग्य करते हैं। हौले हौले प्यार से सहलाते हुए वे कब आक्रमण कर दें कहा नहीं जा सकता। उनकी अपनी एक भाषा है कहने की जिसमें वे पूरी तरह मौलिक और अलहदा हैं। शब्दों की सघनता है। विद्रूपताओं के आसपास अपने सघन और कलात्मक भाषायी संसार से वे अपना व्यूह रच लेने में समर्थ हैं और वह भी अपने सरस लेखन के जरिये जिसका आज के अधिकांश लेखकों में अभाव दिखता है। उनकी भाषा में आध्यात्मिकता का आस्वाद है. उन्हें मिथों का भी अच्छा ज्ञान है जिनका समुचित प्रयोग वे वर्तमान सन्दर्भ में कर लेते हैं. जिस तरह मुक्तिबोध की कविता में अनहदनाद गूंजता है कुछ ऐसा अनहदनाद अपनी भाषा साधना से कैलाश जी अपने व्यंग्यों में जन्मा लेते हैं और वह भी विनोदप्रियता के साथ. ऐसे विलक्षण प्रयोग उनकी रचनाओं में पसरे पड़े हैं.

संग्रह की शीर्षक रचना ‘बाबाओं के देश में’ उनका यह अध्यात्मिक स्वर व्यंग्य में और विशेषकर हास्य में देखें “हम जैसे निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों का बचपन तो इस शाश्वत धमकी को बालघुट्टी में पीते हुए ही गुजरा है कि ज्यादा शैतानी की तो बाबा पकड़ ले जाएंगे. इस देश की नौजवान पीढ़ी अपनी पैदाइश से ही बाबाओं से डरी हुई है. अतीत के बालमनोविज्ञान में बाबा की उपस्थिति या तो भयभीत करने वाली रही है या बंधी हुई मुट्ठी से रूपया गायब करने वाली. आज भी बाबा का नाम सुनकर स्मृति में एक ऐसी आकृति उभरती है जो भय और भीख के बीच झोली फैलाए, आंखें तरेरती हुई खड़ी है... कहते हैं पौराणिक काल में ऐसी रक्ताभ आंखें अपने तप के बल पर सैकड़ों मासूमों को भून चुकी हैं.”

प्राचीन कवि केशवदास तो बाबा संबोधन से चिढने लगे थे. उनके बाल क्या सफ़ेद हुए सुघड़ नायिकाएँ उनको बाबा कहने लगीं. ‘चन्द्र बदन मृग लोचनी बाबा कही कही जाय.’ जबकि देखा जाए तो कवि के सौन्दर्य बोध को वार्धक्य ने छुआ तक नहीं था. क्या पता दैहिक तौर पर भी तब पर्याप्त समर्थ रहे हों. कवि लोग वैसे भी कहाँ बूढ़े होते हैं. बाज दफे, बालों की सफेदी आदमी को व्यर्थ बाबा बना देती है.

भंगिमाओं और मुद्राओं के जरिये अपनी धौंस जमाने वाले साहित्य में उपस्थित प्रदर्शन कलाओं पर उनका व्यंग्य है “साहित्य में जब आटे और नमक के सन्दर्भ आने लगें तब घाघ किस्म के लेखक डिनर के बारे में सोचने लगते हैं तथा साहित्य की तरफ पीठ कर के चेलों की ओर मुखातिब हो जाते हैं, ताकि पता चल सके कि डिनर में क्या है. ऐसी नाजुक घड़ी में सबके साथ डिनर नहीं लेना है, क्योंकि आपकी व्यवस्था कमरा नंबर पांच में है. फिर पक्का गुरु एकादशी का बहाना कर के चुपचाप बताए गए कमरे में घुस जाता है. गुरु और शिष्यों के ऐसे अटूट गठबंधन ही समारोहों की जान होते हैं बाकी लोग सिर्फ विद्वान श्रोता की तरह कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हैं.’ (साहित्य में बाजार एक दिलचस्प खुलासा).

इन सबके साथ लेखक की कलम में कहानी कला है। कहन की कला उनमें उनके समकालीन रचनाकारों से भिन्न इसलिए भी है कि वे रंगमंचों में अभिनय भी कर चुके है। उनके वृत्तांतों में कथा रस है क्योंकि वे एक कथाकार भी हैं. वे अपने व्यंग्यों को भाषा के स्तर पर भले ही अलगा लेते हैं पर घटना वृत्तांत में कथारस की परंपरा को बनाए रखते हैं. इस वृत्तांत कथा में उनकी व्यंग्य की भाषा कुछ और भी चमक पैदा कर लेती है. ‘अगस्त में मरने वाले बच्चों के नाम’ रचना में वे हादसे की रामकथा सुनाते हैं “यूपी में भगवान से भी ज्यादा ताकतवर वह गैस वाला है जो अस्पतालों को ऑक्सीजन सप्लाई करता है. वह जिस दिन चाहे सप्लाई रोक कर किसी की भी जान ले सकता है. यह नया दौर है अब जीवन मरण की फिलोसोफी भी बदलनी चाहिए. यूपी में अब भगवान के हाथ कुछ नहीं रहा सब कुछ ठेकेदार और बिचौलियों के हाथ चला गया है. वहां आम आदमी के सांसों की गारंटी कुछ लोगों के कमिशन पर निर्भर है. सरकार कह रही है कि वह इन्सेफेलाटिस से वर्षों से लड़ रही है. ठीक है, लेकिन दिक्कत यह है कि इस लड़ाई में न सरकार हार रही है न इन्सेफेलाइटिस; हार रहा है गाँधी का वह अंतिम आदमी जो फ़िलहाल अस्पताल के गलियारे में अपने बच्चों के शवों के साथ निहत्था बैठा है.”

संस्कृति को लेकर अनावश्यक गौरव गान से हम अभिभूत हैं बजाय यह देखने के कि दूसरों की संस्कृति को जड़ बताकर आरोप लगाना आसान है और अपने जड़ संस्कारों से मुक्त होना कितना कठिन है। अपनी रचनाओं में लेखक आम आदमी के दैनिक जीवन के क्रम में उठे अनेक विरोधाभासों का निरंतर खुलासा करते हुए अपने नागरिक बोध का निरंतर परिचय देते चलते हैं. संस्कृति को लेकर हल्ला करने वाली सरकारें इन नागरिकों के प्रति दायित्व से कैसे मुकर कर किस तरह के ढकोसले करती हैं इन शब्दों में देखें “उनके मन में एक पापी विचार आया ‘सीनियर सिटीजन्स का प्रेम’ – यह वाक्य उन्हें उस वक्त भी सूझा था जब वे बजट भाषण सुन रहे थे, जबकि बजट में सीनियर सिटीजन्स के प्रेम की कोई चर्चा नहीं थी. क्या कोई सरकार इस दिशा में सोचेगी. सरकारें किस कदर शुष्क और प्रेम विरोधी हैं बगैर प्रेम के ही स्मार्ट सिटी बनाने की कल्पना कर लेती हैं. जबकि प्रेम के बिना तो पूरी बस्ती ही रुखी होगी. क्या रुखा होना ही स्मार्ट होना है.” (सीनियर सिटीजन्स का प्रेम).

संग्रह में ४६ रचनाएँ हैं जो अपनी सीमाबद्धता में एक ही आकार की हैं. क्योंकि यह अखबारी व्यंग्य लेखन है अपनी कैफ़ियत में लेखक ने यह खुलासा भी किया है इनकी संख्या अब तक १५० हो चुकी है और लेखन जारी है. इन व्यंग्य लेखों की प्रासंगिकता पर स्वयं लेखक को तो संदेह है ही नहीं बल्कि आलोचक व्यंग्यकार गौतम सान्याल ने भी इनकी दीर्घकालिकता पर इन शब्दों में मुहर भी लगा दी है कि “सार्थक स्तम्भ लेखन क्षण को चिरंतन में बदल देता है, दैनिक को दिनों में, अवसर को अवधि में, अब को पूर्वापर में, क्षणभंगुरता को टिकाऊ में तथा तत्पुरुष को कालपुरुष में. कॉलम लेखन को काल की कालबद्धता से मुक्ति दिलाते हुए कालातीत के उन्मुख परिसर में ले जाना होता है. एक सार्थक स्तम्भ लेखन में रोज की तारीख को तवारिक्ष (इतिहास) में ढालना होता है और स्तम्भ लेखक नियमित प्रतिदिन ऐसा करता है.”

जिन्हें अखबारी लेखन कहकर उड़ाया टरकाया जाता रहा है उन्हीं अखबारी व्यंग्यों ने हिन्दी व्यंग्य के दो दिग्गजों परसाई और शरद जोशी को साहित्य जगत में स्थापित कर दिया... और इनकी देखा देखी में अखबारों में स्तम्भ लिखने की होड़ मच गई. रचना केवल रचना के स्तर पर ही देखी जाए तो उनके निज वैशिष्ट्य के और भी रास्ते खुलते हैं. कैलाश मण्डलेकर ने अपने स्तम्भ लेखन के जरिए कुछ ऐसे ही प्रमाण इन रचनाओं में पुख्ता तौर पर दिए हैं.

यद्यपि अधिकांश व्यंग्यकारों की तरह वे भी समकालीन संदर्भां से अपनी रचनाओं का प्लाट तैयार करते हैं पर उन्हें घोर सामयिक होने से बचाकर रचना को दीर्घकालिक बनाने का कौशल वे दिखला जाते हैं। उनकी लेखन क्षमता में रवीन्द्रनाथ त्यागी, के.पी.सक्सेना और लतीफ़ घोंघी की तरह ‘विट भरपूर है.

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मुक्तनगर, दुर्ग 491001, मो. 9009884014

Saturday, 7 November 2020

सरोज सिंह के कविता संग्रह पर कुसुमलता पाण्डेय की समीक्षा

शब्दों की क्यारी में/अनायास ही छींट दे/कोई उदास मन/भावनाओं के बीज/तो बिखर जाती हैं/कविता की नर्म महक।ऐसा मेरा मानना है और कदाचित कवियत्री सरोज सिंह भी मेरी इन पंक्तियों से पूर्णतया इत्तेफाक रखती है क्योंकि उनके नवीनतम कविता संग्रह "तुम तो आकाश हो" मे इन पंक्तियों की परछाई स्पष्ट परिलक्षित हुई हैं। युवा कवियित्री के इस संग्रह की कविताएं घोषणा करती हो मानों कि मेरा जन्म अन्तर्द्वन्द्व की कोख से हुआ है। बदलाव की गंध लिए संग्रह इस तथ्य का स्वमेव प्रमाण बन पडा हैं कि कवि अमूर्त कल्पनाओं की विथियों मे उपजे मनोसुख का शिकार नहीं है।यह परिस्थितियों से संघर्ष या यथार्थ के सरोकारों की टकराहट से व्युत्पन्न हुई हैं और ये जीवन मे फैले पडे अथाह धूसर सन्नाटे की ओर झांकने का मौका दे जाती हैं। कविताओं में नए बिम्ब गढने मे कवियित्री ने काबिलेतारीफ श्रम किया है। "मैं बांट जोहू सूर्य का" कविता से दृष्टव्य हैं-: निराशा के मसान मे/चिंता चिताओं सी जल रही/जिजीविषा हाथ मल रही/अंधियारा जो छंटता नही/मैं बाट जोहू सूर्य का/आशा के नव विहान मे।"

            संग्रह की एक लम्बी कविता "गृहस्थी की कांवर मे" कवियित्री की चाह समय की जायज मांग है। हमनें अब तक पुरूष के पुरुषत्व से स्त्रीत्व मिलते देखा है। कविता का गणित देखे-: तुम अपने भीतर के छिपे स्त्रीत्व क़ो/मेरे भीतर के छिपे पुरूषत्व से मिला दो/क्योंकि,, शिवालय मे बैठे उस अद्धनारीश्वर को/यह जलाभिषेक, तभी पूर्ण एवं सफल होगा। "प्रतिध्वनित स्वर" कविता में लिखा गया है "मैं अब भी अबोध सी/खडी हूँ उसी शिला पर/कि कभी तो/प्रतिध्वनित स्वर/मेरे मौन को/मुखरित करने/पुनः आवेगे।"चिरप्रतीक्षा को बिषय वस्तु बनाकर आधुनिक खांचे मे नाप के अनुरूप फिट बैठते मनोरम बिम्ब का प्रयोग हुआ है। "इक ख्वाब संजोया हैं मैंने" मे कवियित्री अपने प्रणय साथी को सुख और बेहतर देने को संकल्पित हैं:- "हालात से मिले दो सिक्कों से दो ही रुत मुझे मोल मिले/इक पतझड़ मै रख लूगी,दूजा बसंत वो तुम चुन लेना। "इसी भाव को दोहराती"कह देते मुझसे एक बार"कविता संग्रह मे संकलित हैं।सम्बन्धों को सहेज लेने की परवाह दृष्टव्य और प्रशंसनीय है।"सम्बन्धों को सहेज लेने की परवाह दृष्टव्य और प्रशंसनीय हैं।"सम्बन्धों के मंथन मे/सदा अमृत ही चाहा तुम्हारे लिए/किंतु अमृत पान कहाँ सरल है गरल के बिना/कह देते मुझसे एक बार, मै उपलब्ध थी आचमन के लिए।

            "इंतजार"कविता में शब्दों की तूलिका के स्पर्श ने दिलकश चित्रात्मकता उडेली है।"अक्सर इंतज़ार की दहलीज पर/अपनों के लौट आने का/होने लगता है एतबार/जैसे कि जाती हुई नदी/आती हूँ कहकर/पर्वत, घाटियों से होती हुई/फिर लौट आती हैं सावन मे।प्रकृति के यथार्थ परक बिम्ब कविताई सलीके से कविता "बूदें"मे देखने को मिला है।:-किन्तु हमारा मौन/मेरे सम्मुख रच देता है/इस नेह को निहारता सूरज/समेट लेता है/अपनी तीक्ष्ण किरणें।प्रकृति से सम्बद्ध कोमल बिम्बों की प्रचुरता से रसासिक्त कविता"तसब्बुर तेरा"मुग्ध कर जाती हैं:-मगर जेहन के /किसी तंग सी गर्त से/रूह की सतह पर/टप..टप..टप/रिसता रहता हैं/अब भी/तसव्वुर तेरह।"हे शव्द शिल्पी"कविता में देखे तो कवियित्री की चिंता जायज कही जाएगी कि कही संवेदनशील कवि मन नायिका के भाव के प्रति अगम्भीरता वश न्याय नहीं कर सके।सच ही तो हैं प्रेम मन का वह कोमल भाव है जिसकी अभिव्यक्ति भी उतनी ही संवेदनशील  ता मांगती है।

             "तलाश" व "रामस्पर्श"मे जीवन जितना दिखाई दे रहा है उससे कहीं ज्यादा अव्यक्त है।स्त्री जीवन से सम्वद्ध बारीक व सुकोमल तन्तुओं की नब्ज कोकविता"मेरी मुक्ति का दिवस"सधे शव्दों मे छू जाती हैं।:-इस जीवनधारा मे/एक क्षण ऐसा आएगा/जब,तुम्हें मेरा स्मरण होगा/तब तुम, मेरे संजोए/किसी एक स्वप्न को/याद कर लेना!"प्रिय"एक लम्बी कविता है जो स्त्री जीवन की तल्ख और भयावह विडंबना उजागर करती हैं।:-"उन रंगों ने उसे, लड़की से/ज्यामिति बना दिया/जिसे केवल/जांचा,नापा,परखा जा सकता है/उसे अब लडकी बनने नहीं देता/उस भयावह घटना को/वो वक्त की खिडक़ी से/परे ढकेल देना चाहती है/पर समाज और हालात।ब्लात्कार औरत के जीवन की वह पीड़ा है जिसे सिर्फ उसे इसलिए भोगना पड़ता हैं कि वह औरत है।जिसके बाद प्रतिकूलता से लड़ने का साहस चुकता जाता हैं औरबंदरंग,उदास, निराश जीवन उसे पल-पल मुंह चिढाता हो जैसे।न्याय व्यवस्था की मंथर गति को कविता की बुनावट मे अपने बिषय की गम्भीरता से चिंतित करती कविता है।

             मां अब घरों में चौखट नहीं होती/इसलिए अब वे मजे से लांघ जाती हैं एवरेस्ट भी।"चौखट कविता में कवियित्री मां की चिंता(बेटी को ठोकर लगने की)चौखट न होने का हवाला देते हुए निराधार ठहरा देती हैं।"अल्कॉहलिक"कविता शराब की गिरफ्त में जकड़न का हाल सुनाती हैं।"मन के फागुन से लाइव 1":-खांटी गंवई फागुन कवियित्री के मन में जीवित प्रकृति चित्रों के माध्यम से कविता में जीवन्त कर दिया।वहीं"मन के फागुन से लाइव-2":-इससे अछूता हैं।यह बसंत और फागुन को गांवों तक सीमित रख छोड़ती है क्योंकि शहर की आबोहवा ऊंची इमारतों के कारण फगुनाहट की मदिर छुअन से अस्पर्शित रह जाती है और हम औपचारिक फागुन के होकर रह जाते है।कविता में कवियित्री की संवेदना फागुन के साथ हो ली।-:वो उठकर/हमारी जानिब भी आती हैं/देने संदेशा फाग का/मगर शहर की/ऊंची मीनारों से टकराकर/मायूस लौट जाती हैं।"ऐ ताज,तुझे कुछ इस नजर से देखा है मैंने":-मे कवियित्री ने ताज को वाकई अलहदा और काविलेतारीफ निगाहों से देखा।"अब जो देखा तो/उसकी मरमरी दीवारों को सहलाकर/उनके रुखसारो मे उभरी/खराशो का एहसास किया है मैंने।"कविता में वर्णित रुखसार दरअसल उन महबूबाओं के हैं, जिनके प्रेमियों(संगसाज)के हाथ ताज को बनाने में खुरदुरे हो गए।अपने खुरदुरे हाथों से प्रेमिका के गालों को छुआ तो वो खुरदुरे हो गए।ताज के रूप मे अपनी प्रियतमा को अनमोल भेंट देने की चाह ने कितनों की प्रिया के गालों मे खुरदुराहट भर दी।

            सरहद(बाडमेर)मे कवियित्री ने सुनहरी जमीं की लाली की वजह टटोली हैं चूंकि कवियित्री के अनुभव में निजी कारणों से सैन्य जीवन सम्मलित हैं अत:कुछ एक कविताएं देश की बात करती हैं।इसमें "सरहद की बाड़"।"करवां चौथ"व "केयर टेकर"को प्रमुखताके साथ सम्मलित किया गया है।"इज्ज़त का पैमाना'संग्रह में स्त्री जीवन की घिनौनी और तल्ख सच्चाई को बयां करती हैं।वही" दूब हूं मैं"में दूब जैसी छोटी चीज को बिम्ब के रूप में रखते हुए औरत की उपेक्षा की कहानी कहती हैं।"समानांतर फैलना भाता है सभी को"/किन्तु ऊपर उठना नहीं सुहाता किसी को।"फलसफा जिन्दगी का"जीवन से स्वतंत्रता व स्पेस मांगती है।"जिन्दगी वो गुल है जो गुलदस्ते मे नहीं खिलता मन बावरा वो पंक्षी हैं जो पिंजरे में नहीं मिलता।"कुचलों या कुचले जाओगे"-:मैं बेशुमार इन्सानी भीड़ के मध्य निष्ठुर प्रतियोगिता का निर्मम व दारूण दृश्य अभिव्यक्त हुआ हैं।"जरा देखो तो/किसको कुचल रहे हो/नजरें ज्यों ही झुकाई/तो देखा,हम जिस्मों पर चल रहे है/सर-ए-राह को मकतूल कर रहे है।आलिम इन्सानों के बनाए इस फलसफे पर तीक्ष्ण व्यंग्य हुआ है।"भीड़ तो चीटियों की भी होती हैं/पर वो कतार बांध चलती है/कुचलो या कुचले जाओगे/ये फलसफा आलिम इन्सानों ने बनाए है।

              जो किसान अपने खेतों में पसीना बहाते रहे अलाभकारी हो चुकी खेती अतिक्रमण की भेंट चढ़ गई तो अपने ही खेतों में मजदूर बन गए खेतिहर के पक्ष में खड़ी कविता"उनके माथे का अरक कहती है।"उनके हाथों में/ बीज और खाद नहीं/रेता बजरी के तसले होते है/नहीं कुछ बदला तो ये कि/अब भी उनके माथे का अरक/ढलता हैं टकसालों मे।" "चीख कविता में कवियित्री की दिलीख्वाहिश है कि वह गरीब उपेक्षित, लाचार, दबे कुचले, शोषित लोगों की पीड़ा नज्म से बनी मिट्टी की गुल्लक मे भरकर बस्ती के चौबारे पर फोड़े ताकि "यकीनन इन बेसुध जिस्मों में/कुछ हरकत तो होगी/कुछ हरारत तो होगी।"हादसे की रिपोर्ट"प्रकृति के कोमल बिम्ब मे गुंथी कविता इन्सान के सुख-दुख में आत्मकेन्द्रिता व स्वार्थ प्रियता को रेखांकित करती हैं।अपनों से दूर हटकर जैसे उसके सारे सरोकार दम तोड़ चुके है।"मैं झट सहमकर/खिडक़ी को परदे से ढक देती हूँ/और जेहन से यही आवाज आती हैं/"थैंक गॉड"उनमे मैं नहीं।मेरा अपना कोई नहीं था।"बिवाइयां"व महाभारत को अच्छी कविता की फेहरिस्त में शामिल करेंगे।"केयर टेकर"में उस घिनौने यथार्थ को चिन्हित किया गया है कि जिन हाथों में देश की बागडोर हैं वो स्थिति की प्रतिकूलता का फायदा, किस प्रकार से खुद की जडों को मजबूत करने के लिए कर रहे हैं।उन्हें देश की खोखली हो रही जड़ों से कोई सरोकार नहीं है।अलवत्ता केयर टेकर इस मौके को भुनाना बाखूबी आता है।

           इन्सान ने प्रकृति को अपने रवैये से खुद के ही प्रतिकूल खड़ा कर लिया है।कुल मिलाकर कहेगें हम मूर्ख कालीदास बन गए है,जो जिस डाल पर खड़ा है उसी को काट रहा है।"आदम की आमद से पहले"कविता कहती हैं।"जमीं धूप मांगती है/तो वो,बारिश देता है/आंसमां सब्जा मांगता है/तो जमीं सहरा दिखाती है।"खिलौने"में कवि मन बुजुर्ग के उस मासूम बचपन की ओंर अनायास ही बढ़ चला है जहां पर उसे वर्तमान दौर के खिलौने से बढती हिंसात्मक वृत्ति की वनास्पति ज्यादा मासूमियत और निश्छलता देखने को मिली।"मांजी के सहेजे खिलौनों को/वक्त, अपनी दुकान पर/मरम्मत कर/रंग रोगन कर/वर्क लगाकर/चाहे जितना दिलकश बनाकर पेश करें/आज इलेक्ट्रॉनिक्स के बाजार में/उसकी कोई कीमत नहीं लगती।"कविता में मांजी के माध्यम से वृद्दों की उपेक्षा के अर्थ की नई पर्त भी खुलती है।"औरत देह और जोर-जबरदस्ती"कविता में शहरीकरण के बढ़ते प्रभाववश छोटे घरों में दादी नानी की कहानियों से वंचित रहकर, वह संस्कार और सम्बन्धों से अनभिज्ञ रहे।परन्तु एक प्रकार के जबरिया अंतरंग पलों को देखते हुए समय से पहले बडें हुए बच्चे"स्त्री उपभोग की वस्तु है"जैसी कुत्सित धारणा बना बैठते हैं कविता नपे तुले शब्दों में कहती है:-"उनका बचपना जवान नहीं हो पाता।पर बचपन में वो जवान हो जाते है/अब वो कुछ बातें/गलत तरीके से बहुत सही समझते है/औरत देह और जोर-जबरदस्ती।" "पतंग हूँ मैं"उस स्त्री को केन्द्र में रखकर बुनी कविता हैं जिसके जीवन मे सतही खुशी तो शुमार है पर आन्तरिक तहों मे अवसाद के सैकड़ों रेशे व्याप्त है।इस कविता में स्त्री अंतर्यात्रा पर निकल पड़ी हो मानो।पांव नंगे चप्पल हैं सिर पर मे उम्र भर जिस औरत ने नंगे पांव बोझ ढोते काट दी हो।कमाऊ बेटे की लाई चप्पल भी उन पांवों मे बोझ बन जाती हैं।जिसे वह बेटे का दिल रखने के लिए पांवो मे डाल तो लेती है।किन्तु:-रोज घर से निकलती हैं चप्पल पहनकर/कुछ दूर चलकर चप्पलों को धर लेती है सिर पर।

          कवियित्री की संवेदना मे इन्सान के साथ साथ बेजुबान पशु को भी उसी शिद्दत से स्थान मिला है।"विसुखी गइयां"में गायों की दुर्दशा का मार्मिक चित्र देखने को मिला है।जिस देश मे गायों को मां का दर्जा मिला है, वर्तमान में उन्हें किस रुप मे उपयोग किया जाता हैं।कवियित्री कहती हैं:-वर्तमान उसे/देह व्यापार के लिए?कत्लगाह का रास्ता दिखाता है।" "हे सीते"कविता में कवियित्री जायज प्रश्न उठाती हैं:-"फिर दोनो की संप्रभुता में/इतना अंतर क्यों हुआ?प्रभु ने स्पर्श किया/तो "अहिल्या त्राण"हुआ।फिर तुम छू गई तो/क्यों अग्नि स्नान हुआ।"सम्बन्धों का विश्लेषण"ईमानदार आत्मस्वीकृति से पगी सम्बन्धों पर केन्द्रित अच्छी कविता है।कविता प्रश्न करती हैं कि अपने अपने विशेषण से चिपके रहकर उपयुक्त संज्ञा की तलाश कैसे हो सकेगी।"रिपोर्टर"कविता कहती हैं कि जिस तत्परता के साथ परिस्थितियों की भयावहता को नजरअंदाज करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करता है।:-"उसने रिपोर्टर होने का फर्ज निभाया/बाकियों को/आदमी होने का फर्ज निभाना था।"

         " बड़ा आदमी", "मन के आंगन में", "सूरज", "तर्जुबा नीम का"संग्रह में संकलित इन कविताओं में जेहन में बर्षों तक ठहरने का आकर्षण और क्षमता दोनो हैं।एक और लम्बी कविता"न्याय की देवी"न्याय व्यवस्था में व्याप्त घनघोर भष्टाचार व मंथर गति का बड़े ही सशक्त अंदाज में प्रभावकारी चित्र खींचती है।"करवाचौथ"कर्तव्य को सर्वोपरि ठहराती हैं।जो देश के प्रति उसकी रक्षा मे खड़ा फौजी है। "रिश्ते व प्रेम" में एकरसता भरे माहौल से निकलकर रिश्ते घुटन से मुक्ति पा सकेंगे और तभी घुट-घुटकर जीते प्रेम में रवानगी आनी हैं। "एक चाक के माटी हम सब" चाक की माटी के बहाने कवियित्री ने लड़की की नियति को कविता में स्थान दिया है।:- एक चाक की माटी हम सब /कुछ गढी कुछ टूट गई।" "वही मेरा गांव"कविता के माध्यम से कवियित्री पाठक के मानस तक अपने प्रिय गांव को पहुचाने मे कामयाब रही है।

           कुल मिलाकर देखे तो "तुम तो आकाश हो" संग्रह में संकलित कविताओं से गुजरना सचमुच एक सुखद अनुभव की तरह है। जो विभिन्न भावभूमि को केंद्र में रखकर लिखी गई हैं परन्तु इनमें प्रतिबिंबित हुआ मूलस्वर एक ही है। बड़े वितान को उठाती कविताएं कुछ सपने जो राख होने से बचे रह गए, अपनी धूप छांही से हमें निराशाबोध से बचा लेती है। सहज अंदाज में गहरे व सधे हुए तथ्य इन कविताओं में दर्ज हुए हैं । इसलिए यदि कहे कि साहित्य की इमारत के भीतर नये सूरज की रोशनी बनकर इस संग्रह का आगाज़ हुआ है तो शायद यह अतिशयोक्ति न होगी।

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कविता संग्रह- तुम तो आकाश हो

कवयित्री - सरोज सिंह

प्रकाशक - हिन्द युग्म, नई दिल्ली

प्रकाशन वर्ष - 2015

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...