Friday, 15 August 2014

तीन कवि : तीन कवितायेँ - 3

‘स्पर्श’ पर इस महीने के आरम्भ में शुरू की गयी तीन कवि तीन कविताओं की इस नई श्रृंखला में तमाम कवियों का सहयोग हमें लगातार मिल रहा है साथ ही इन पर पाठकों की काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं भी मिल रही हैं | इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए इस बार प्रस्तुत हैं वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा, युवा कवि राकेश रोहित और एकदम नया युवतर स्वर करीम पठान की नवीनतम कवितायेँ :
--------------------------------------------------------------------

गोली दागो पोस्टर / आलोक धन्वा 


यह उन्नीस सौ बहत्तर की बीस अप्रैल है या
किसी पेशेवर हत्यारे का दायाँ हाथ या किसी जासूस
का चमडे का दस्ताना या किसी हमलावर की दूरबीन पर
टिका हुआ धब्बा है
जो भी हो-इसे मैं केवल एक दिन नहीं कह सकता !

जहाँ मैं लिख रहा हूँ
यह बहुत पुरानी जगह है
जहाँ आज भी शब्दों से अधिक तम्बाकू का
इस्तेमाल होता है

आकाश यहाँ एक सूअर की ऊँचाई भर है
यहाँ जीभ का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ आँख का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ कान का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ नाक का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

यहाँ सिर्फ दाँत और पेट हैं
मिट्टी में धँसे हुए हाथ हैं
आदमी कहीं नहीं है
केवल एक नीला खोखल है
जो केवल अनाज माँगता रहता है-

एक मूसलधार बारिश से
दूसरी मूसलाधार बारिश तक

यह औरत मेरी माँ है या
पाँच फ़ीट लोहे की एक छड़
जिस पर दो सूखी रोटियाँ लटक रही हैं-
मरी हुई चिड़ियों की तरह
अब मेरी बेटी और मेरी हड़ताल में
बाल भर भी फ़र्क़ नहीं रह गया है
जबकि संविधान अपनी शर्तों पर
मेरी हड़ताल और मेरी बेटी को
तोड़ता जा रहा है

क्या इस आकस्मिक चुनाव के बाद
मुझे बारूद के बारे में
सोचना बंद कर देना चाहिए?
क्या उन्नीस सौ बहत्तर की इस बीस अप्रैल को
मैं अपने बच्चे के साथ
एक पिता की तरह रह सकता हूँ?
स्याही से भरी दवात की तरह-
एक गेंद की तरह
क्या मैं अपने बच्चों के साथ
एक घास भरे मैदान की तरह रह सकता हूँ?

वे लोग अगर अपनी कविता में मुझे
कभी ले भी जाते हैं तो
मेरी आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर
मेरा इस्तेमाल करते हैं और फिर मुझे
सीमा से बाहर लाकर छोड़ देते हैं
वे मुझे राजधानी तक कभी नहीं पहुँचने देते हैं
मैं तो ज़िला-शहर तक आते-आते जकड़ लिया जाता हूँ !

सरकार ने नहीं-इस देश की सबसे
सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया

बहन के पैरों के आस-पास
पीले रेंड़ के पौधों की तरह
उगा था जो मेरा बचपन-
उसे दरोग़ा का भैंसा चर गया
आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर
एक दरोग़ा को गोली दागने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं ?

जिस ज़मीन पर
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और
जिस ज़मीन से अन्न निकालकर मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह कविता नहीं है
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलानेवालों को
तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है।
-



उन्माद भरे समय में कविता की हमसे है उम्मीद / राकेश रोहित 


बहुत कमजोर स्वर में पुकारती है कविता
उन्माद भरा समय नहीं सुनता उसकी आवाज
हिंसा के विरुद्ध हर बार हारता है मनुष्य
हर बार क्रूरता के ठहाकों से काला पड़ जाता है आकाश।

सभ्यता के हजार दावों के बावजूद
एक शैतान बचा रहता है हमारे अंदर, हमारे बीच
हमारी तरह हँसता-गाता
और समय के कठिन होने पर हमारी तरह चिंता में विलाप करता।

जब मनुष्य दिखता है
नहीं दिखती है उसके भीतर की क्रूरता
और हम उसी के कंधे पर रोते हैं, कह-
हाय यह कितना कठिन समय है!

कविता फर्क नहीं कर पाती इनमें
इतने समभाव से मिलती है वह सबसे
इतनी उम्मीद बचाये रखती है कविता
मनुष्य के मनुष्य होने की!

आँखों में पानी बचाने की बात हम करते रहे
और आँसुओं में भींगती रही आधी आबादी की देह
धरती कभी इतना तेज नहीं घूम पाती कि
अँधेरे में ना डूबा रहे इसका आधा हिस्सा!

रोज शैतानी इच्छाएं नोच रही हैं धरती की देह
रोज हमारे बीच का आदमी कुटिल हँसी हँसता है
कविता कितना बचा सकती है यह प्रलयोन्मुख सृष्टि
जब तक हम रोज लड़ते न रहें अपने अंदर के दानव से!

समाज में अकेले पड़ते मनुष्य को ही
खड़ा होना होगा
अपने अकेलेपन के विरुद्ध
एक युद्ध रोज लड़ने को होना होगा तत्पर
अपने ही बीच छिपे राक्षसों से
इस सचमुच के कठिन समय में
कविता की यही हमसे आखिरी उम्मीद है।
-

संपर्क- एफ़०एफ़०, क्वार्टर नं 366,7 गरचा फर्स्ट लेन, गरिया हाट, कोलकाता 700019 (प. बंगाल)
ईमेल- rkshrohit@gmail.com
-

जेहाद / करीम पठान अनमोल 


क़ुरआन कहता है
लड़ो
लड़ो उनसे...जो अन्याय करते हैं
लड़ो उनसे...जो मज़लूमों पर अत्याचार करते हैं
लड़ो उनसे...जो दीन की मुख़ालफ़त करते हैं

लेकिन तुमने पढ़ा
सिर्फ़ 'लड़ो'
क्यों...कैसे...किससे
ये नहीं
और चल पड़े
जेहाद करने

अरे! क़ुरआन को अगर समझने की कोशिश करते
तो कुछ यूँ पढ़ते-
कि बिला वजह किसी चींटी तक को तक़लीफ न दो
तुम्हारा ख़ुदा तुमसे नाराज़ होगा
कि दो लोगों में सुलह कराओ
तुम्हारा ख़ुदा तुमसे राज़ी होगा
कि अपने पड़ौसी का हक़ अदा करो,
देखो तुम्हारे पड़ौस में कोई भूखा, परेशान हाल तो नहीं
वरना तुम्हें चैन से सोने का कोई हक़ नहीं

कितनी मोहब्बत और शफ़क़त है इस मज़हब में
ख़ुदाया!
ये मज़हब तुम्हें
अपने दुश्मन के लिये भी बद्दुआ करने की इज़ाज़त नहीं देता
फिर हथियार उठाने, ख़ून बहाने की इज़ाज़त क्या देगा?
मगर अफ़सोस
सद अफ़सोस
तुमने मज़हब और ज़ेहाद के नाम पर
सिर्फ़ ज़हर बोया...।
-

संपर्क- बहलिमों का वास, सांचोर, (जालोर) राज. 343041
- 

Sunday, 10 August 2014

तीन कवि : तीन कवितायेँ - 2

इस श्रृंखला को शुरू करने को लेकर हमारा कोई दावा नहीं है न ही हम एकदम से कुछ तय करने की कोशिश कर रहे हैं | वैसे भी किसी कवि की मात्र एक कविता को पढ़कर हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते | यह सिर्फ पीढ़ियों के मध्य चल रहे सृजन को विभिन्न कोणों से देखने/ परिचय करने की विनम्र कोशिश मात्र है | पिछले हफ्ते इस कोशिश की पहली कड़ी में आप तीन कवि और उनकी तीन कविताओं से रूबरू हुए I इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए इस बार प्रस्तुत है हमारे समय के एक महत्त्वपूर्ण वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले, बेहद सक्रिय और युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय और उदीयमान सशक्त युवतर स्वर अरुन श्री की नवीनतम तीन कवितायेँ :

दुनिया का सबसे ग़रीब आदमी / चन्द्रकान्त देवताले 


दुनिया का सबसे ग़रीब आदमी 
दुनिया का सबसे गैब इन्सान
कौन होगा
सोच रहा हूँ उसकी माली हालत के बारे में 
नहीं! नहीं !! सोच नहीं 
कल्पना कर रहा हूँ

मुझे चक्कर आने लगे हैं 
ग़रीब दुनिया के गंदगी से पते 
विशाल दरिद्र मीना बाजार का सर्वे करते हुए 
देवियों और सज्जनों 
'चक्कर आने लगे हैं "
यह कविता की पंक्ति नहीं 
जीवनकंप है जिससे जूझ रहा इस वक़्त 
झनझना रही है रीढ़ की हड्डी 
टूट रहे हैं वाक्य
शब्दों के मलबे में दबी-फँसी मनुजता को 
बचा नहीं पा रहा 
और वह अभिशप्त, पथरी छायाओं की भीड़ में 
सबसे पीछे गुमसुम धब्बे-जैसा 
कौन-सा नंबर बताऊँ उसका 
मुझे तो विश्व जनसँख्या के आकड़े भी 
याद नही आ रहे फ़िलवक़्त 
फेहरिस्तसाजों को 
दुनिया के कम- से -कम एक लाख एक 
सबसे अन्तिम ग़रीबों की 
अपटुडेट सूची बनाना चाहिए 
नाम, उम्र, गांव, मुल्क और उनकी 
डूबी-गहरी कुछ नहीं-जैसी संपति के तमाम 
ब्यौरों सहित 


हमारे मुल्क के एक कवि के बेटे के पास
ग्यारह गाडियाँ जिसमें एक देसी भी
जिसके सिर्फ़ चारों पहियों के दाम दस लाख 
बताए थे उसके आश्वर्य-शानो-शौकत के एक शोधकर्ता ने 
तब भी विश्व के धन्नासेठों में शायद ही जगह मिले 
और दमड़िबाई को जानता हूँ मैं 
ग़रीबी के साम्राज्य के विरत रूप का दर्शन 
उसके पास कह नहीं पाऊंगा जुबान गल जाएगी
पर इतना तो कह सकता हूँ वह दुनिया की 
सबसे ग़रीब नहीं

दुनिया के सत्यापित सबसे धनी बिल गेट्स का फ़ोटो 
अख़बारों के पहले पन्ने पर 
उसी के बगल में जो होता 
दुनिया का सबसे ग़रीब का फ़ोटू 
तो सूरज टूट कर बरस पड़ता
भूमंडलीकरण की तुलनात्मक हकीकत पर
रोशनी डालने के लिए 

पर कौन खींचकर लाएगा
उस निर्धनतम आदमी का फोटू 
सातों समुन्दरों के कंकडों के बीच से 
सबसे छोटा-घिसा-पिटा-चपटा कंकड़ 
यानी वह जिसे बापू ने अंतिम आदमी कहा था 
हैरत होती है 
क्या सोचकर कहा होगा 
उसके आसूँ पोंछने के बारे में 
और वे आसूँ जो अदृश्य सूखने पर भी बहते ही रहते हैं 
क्या कोई देख सकेगा उन्हें 

और मेरी स्थिति कितनी शर्मनाक 
न अमीरों की न गरीबों की गिनती में 
और मेरी स्थिति कितनी शर्मनाक 
न अमीरों की न गरीबों की गिनती में 
मैं धोबी का कुत्ता प्रगतिशील 
नीचे नहीं जा सका जिसके लिए 
लगातार संघर्षरत रहे मुक्तिबोध 
पांच रूपये महीने की ट्यूशन से चलकर
आज सत्तर की उमर में 
नौ हजार पाँच सौ वाली पेंशन तक 
ऊपर आ गया
फ़िर क्यों यह जीवनकंप 
क्यों यह अग्निकांड
की दुनिया का सबसे गरीब आदमी 
किस मुल्क में मिलेगा
क्या होगी उसकी देह-सम्पदा
उसकी रोशनी, उसकी आवाज-जुबान और 
हड्डियाँ उसकी
उसके कुचले सपनों की मुट्ठीभर राख 
किस हंडिया में होगी या अथवा 
और रोजमर्रा की चीजें 
लता होगा कितना जर्जर पारदर्शी शरीर पर
पेट में होंगे कितने दाने 
या घास-पत्तियां 
उसके इअर्द-गिर्द कितना घुप्प होगा 
कितना जंगल में छिपा हुआ जंगल 
मृत्यु से कितनी दुरी पर या नजदीक होगी 
उसकी पता नहीं कौन-सी सांस
किन-किन की फटी आंखों और 
बुझे चेहरों के बीच वह
बुदबुदा या चुगला रहा होगा 
पता नहीं कौन-सा दृश्य, किसका नाम 

कोई कैसे जान पाएगा कहाँ 
किस अक्षांश-देशांश पर
क्या सोच रहा है अभी इस वक्त 
क्या बेहोशी में लिख रहा होगा गूंगी वसीयत 
दुनिया का सबसे गरीब आदमी 
यानि बिल गेट्स की जात का नही 
उसके ठीक विपरीत छोर के 
अन्तिम बिन्दु पर खासता हुआ 
महाश्वेता दीदी के पास भी 
असंभव होगा उसका फोटू 
जिसे छपवा देते दुनिया के सबसे बड़े 
धन्नासेठ के साथ 
और उसका नाम 
मेरी क्या बिसात जे सोच पाऊं 
जो होते अपने निराला-प्रेमचंद-नागार्जुन-मुक्तिबोध 
या नेरुदा तो सम्भव है बता पाते 
उसका सटीक कोई काल्पनिक नाम
वैसे मुझे पता है आग का दरिया है ग़रीबी 
ज्वालामुखी है 
आँधियों की आंधी 
उसके झपट्टे-थपेडे और बवंडर 
ढहा सकते हैं 
नए- से -नए साम्राज्यवाद और पाखंड को 
बड़े- से- बड़े गढ़-शिखर 
उडा सकते पूंजी बाजार के 
सोने-चांदी-इस्पात के पुख्ता टीन-टप्पर 

पर इस वक़्त इतना उजाला 
इतनी आँख-फोड़ चकाचौंध
दुश्मनों के फ़रेबों में फँसी पत्थर भूख 
उन्हीं की जे-जयकार में शामिल 
धड़ंग जुबानें 
गाफ़िल गफ़लत में 
गुणगान-कीर्तन में गूंगी 
और मैं तरक्की की आकाशगंगा में 
जगमगाती इक्कीसवीं सदी की छाती पर
एक हास्यास्पद दृश्य 
हलकान दुनिया के सबसे ग़रीब आदमी के वास्ते

सम्पर्क : एफ़-2/7, शक्ति नगर (माधव नगर), उज्जैन-456010, मध्य प्रदेश
-------------


इस बस्ती का नाम मुआनजोदड़ो नहीं था / अशोक कुमार पाण्डेय 


वहाँ अमराइयों की छाया में बैठी एक चिड़चिड़ी कुतिया थी 
अमिया चूसती एक लड़की फ्राक के फटे झालर से नाक पोछती 
उधड़ी बधिया वाली खटिया पर ऊँघता बूढ़ा न मालिक लगता था न रखवाला 
कुंए में झाँकती औरत पता नहीं पानी के बारे में सोच रही थी या आत्महत्या के 

अधेड़ डाकिया था खिचड़ी बालों और घिसी वर्दी से भी अधिक घिसी साइकल पर सवार 
स्कूल के चबूतरे पर बैठी चिट्ठियाँ बांचती मास्टरनी लौटती बस के इंतज़ार में 
चिट्ठियों में बम्बई-कलकत्ता-ग्वालियर-भोपाल की बजबजाती गलियों की दुर्गन्ध भरी थी 
मनीआर्डर के नोटों पर पसीने से अधिक टीबी के उगले खून की बास 
बादलों से ख़ाली आसमान और चूल्हों से जूझती आग़ 

दोपहर का कोई वक़्त था जून का महीना प्यास से बेचैन गले 
और पानी मांगने की हिम्मत जुटाने में सूखते होठ 

न नौकर था उस वक़्त मैं न मालिक न बाहरी न गाँव का 
सवाल पूछते शर्म से थरथराती जबान दर्ज़ करती क़लम की तरह 
कितनी ज़मीन थी क्या-क्या बोया उसमें काटा क्या-क्या क्या क़ीमत घर की कितने ज़ेवर जानवर कितने? 
सवाल थे सरकार के और जवाब बिखरे हुए पूरे गाँव में सन्नाटे की तरह
उम्मीद मेरे आश्वासनों से निकल थककर बैठ जाती प्यास से बेहाल उनके बिवाइयों भरे पैरों के पास 
शब्द वहाँ बौने हो जाते हैं जहाँ छायाएं पसरने लगती हैं मृत्यु की.

दीवारों पर चमत्कारी महात्माओं के पोस्टर थे जो वही सबसे चमकदार उस इंसानी बस्ती में 
चमकते दांतों वाला एक विज्ञापन अश्लील उस मरती हुई सभ्यता के बीच 
फीके पड़ चुके चुनावी पोस्टर उनमें लिखे सपनीले शब्दों जैसे ही 
मुझे अचानक लगा कि कितने पोस्टर होने चाहिए थे यहाँ गुमशुदा लोगों के 
जहाँ इबारतें लिखीं सरकारी योजनाओं की वहाँ लिखे होने चाहिए थे उन लड़कों के नाम 
जो बारह साल बाद अब बूढ़े हो चुके होंगे दिल्ली की किसी गली में 

उम्मीद का एक गीत, सपनों का एक पता तो होना ही था वहाँ
जहाँ कुछ नहीं बचा सूखी धरती, खाली चूल्हों, मुन्तजिर औरतों, उदास बच्चों 
और मृत्यु से हारे बूढों के अलावा 
एक पोस्टर तुम्हारा भी तो होना था यहाँ कामरेड!

----------
संपर्क- 104, नवनीति अपार्टमेंट, प्लाट नंबर 51, आई पी एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
ईमेल- ashokk34@gmail.com


मेरी गवाहियाँ / अरुण श्री 


घड़ी के टिक-टिक सी एकरस नहीं होती समय की आवाज !
सभ्यता की सुरीली आदत के विरुद्ध विस्फोटित समय -
बिखरा रहता है देर तक कुछ सुलगती हुई जगहों पर !
शुक्र है -
कि सभ्यता के पास कान ढँकने के लिए अभ्यस्त हाथ हैं ,
समय को छोड़ , घड़ी के साथ चलने में सक्षम हैं पाँव ! 

एक विद्रोही लड़की है जो सरकार के कब्जे में है !
किसी सैनिक-कानून की बपौती हैं उसके पहाड़ों की आबरू !
नाक में जबरन घुसेड़ी गई नली कम दर्दनाक नहीं है -
किसी न साबित हुए बलात्कार से, पर न्यायिक प्रक्रिया है !
कोई नया फैशन होगा -
लड़कियों के नंगे जिस्म पर लिखा सेना के विरुद्ध नारा !

एक माननीय रोटी की गुणवत्ता पूछते हैं किसी रोज़ेदार से !
चर्चा बस इतनी होती है -
कि मुंह में ठूँसी रोटी हलक तक पहुंची या बच गया धर्म !
ये भूख से किए वादों का प्रतीकात्मक निर्वाह होगा शायद ! 

एक साहित्यकार अपनी पत्नी को पीटता है ! 
कुछ पालतू बताते हैं कि वो प्यार करता है कुत्तों तक से !
लतियाई जाती स्त्री की अपेक्षा -
हिंसा का पुख्ता प्रमाण है साहित्यकार की फटी बनियान !

मैं मनुष्यता के दुर्दिनों का साक्षी मात्र हूँ ! 
अदालतें बंद हैं इन दिनों !
थाने की दीवार पर लिखा है कि शांति बनाए रखें कृपया !
मुझे “वर्ना” समझ आता है सरकारी “कृपया” का अर्थ !
मैं अपनी गवाहियाँ चौराहे के कूड़ेदान में फेंक कर लौटा हूँ ! 

-------------
निवास- मुगलसराय, चन्दौली- 232101
ईमेल – arunsri4ever@gmail.com
-

Sunday, 3 August 2014

तीन कवि : तीन कवितायेँ - 1

हिंदी कविता समय में एक वरिष्ठ, युवा और युवतर स्वर...एक साथ...एक तरह से हिंदी कविता की तीन पीढ़ियों व उनकी रचनाशीलता को काफी हद तक देखा-समझा जा सकता है...इन तीन कवियों की तीन कविताओं के बहाने...बगैर किसी नाम, वाद व स्कूल से बंधे हुए देखें- कहें तो ’स्पर्श’ के पाठकों के लिए इस हफ्ते की विशिष्ट प्रस्तुति...
----------------------------------------------------------------------------------------------------

तीन कवि : तीन कविताओं की श्रृंखला में इस हफ्ते-
1-        ज्ञानेंद्रपति
2-        सुशांत सुप्रिय
3-        संजय शेफर्ड
---------------------------------------------------------------------------------------------------------


भूकम्पों के बीच / ज्ञानेन्द्रपति

आता है एक भूकम्प ऐसा, कभी-कभी
तरंगशाली, उच्च क्षमतावान
बढ़ा देता है जो धरती के अपनी धुरी पर
                           घूमने की गति
कि छोटा हो जाता है दिन, क्षणांश को

कभी आता है एक भूकम्प ऐसा भी, जैसा कि अभी
इंसानी ज़मीन पर
कि दशाब्दियों से जमी-पथराई हुई
तानाशाही की परतें दरकने लगती हैं
और अचानक छोटी हो आती है
बेअन्त लगने वाली तानाशाहियों की उम्र
                           एक के बाद एक

इन भूकम्पों में
ढहते हैं रहवास
लहूलुहान इंसानी ज़िंदगियाँ गुज़रती हैं बेवक़्त
अपने ही ख़ून का नमक चख़ते हैं हम
कभी सिर झुकाए
कहीं सिर उठाए ।
-----------------

सम्पर्क :
बी-3/12, पो-अन्नपूर्णानगर, विद्यापीठ मार्ग,
वाराणसी-221002




बौड़म दास / सुशांत सुप्रिय

(बौड़म दास का असली नाम कोई नहीं जानता)


किसी स्कूल के पाठ्य-पुस्तक में
नहीं पढ़ाई जाती है जीवनी बौड़म दास की
किसी नगर के चौराहे पर
नहीं लगाई गई है प्रतिमा बौड़म दास की

वे 'शाखा' में नहीं जाते थे
इसलिए प्रधानमंत्री उन्हें नहीं जानते हैं
वे वाद के खूँटे से नहीं बँधे थे
इसलिए किसी भी पंथ के समर्थक
उन्हें नहीं जानते हैं

उन्होंने मुंबइया फ़िल्मों में
कभी कोई भूमिका नहीं की
जिम में जा कर ' सिक्स-पैक ' नहीं बनाया
न वे औरकुट या फ़ेसबुक पर थे
न व्हाट्स-ऐप या ट्विटर पर
यहाँ तक कि ढूँढ़ने पर भी उनका
कोई ई-मेल अकाउंट नहीं मिलता
इसलिए आज का युवा वर्ग भी
उन्हें नहीं जानता है

किंतु जो उन्हें जानते थे
वे बताते हैं कि बौड़म दास ने
राशन-कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए
कभी रिश्वत नहीं दी
इसलिए न उनके पास लाइसेंस था  न राशन कार्ड
बस या रेलगाड़ी में चढ़ने के लिए
उन्होंने कभी धक्का-मुक्की नहीं की
वे हमेशा क़तार में खड़े रहते थे
इसलिए सबसे पीछे छूट जाते थे

उन्होंने कभी किसी का हक़ नहीं मारा
कभी किसी की जड़ नहीं काटी
कभी किसी की चमचागिरी नहीं की
कभी किसी को ' गिफ़्ट्स ' नहीं दिए
उनका न कोई ' जुगाड़ ' था न ' जैक '
इसलिए वे कभी तरक़्क़ी नहीं कर सके
नौकरी में आजीवन उसी पोस्ट पर
सड़ते रहे बौड़म दास

उनके किसी राजनीतिक दल से
सम्बन्ध नहीं थे
उनकी किसी माफ़िया डाॅन से
वाकफ़ियत नहीं थी
चूँकि वे अनाथालय में पले-बढ़े थे
उन्हें न अपना धर्म पता था
न अपनी जाति
प्रगति की राह में
ये गम्भीर ख़ामियाँ थीं

जीवन में उन्होंने कभी
मुखौटा नहीं लगाया
इसलिए इस समाज में
आज के युग में
सदा ' मिसफ़िट ' बने रहे
बौड़म दास

उनके पास एक चश्मा था
वृद्धावस्था में उन्होंने
एक लाठी भी ले ली थी
वे बकरी के दूध को
स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम बताते थे
और अक्सर इलाक़े में
इधर-उधर पड़ा कूड़ा-कचरा बीन कर
कूड़ेदान में फेंकते हुए देखे जाते थे
इसलिए इक्कीसवीं सदी में
जानने वालों के लिये
उपहास का पात्र बन गए थे
बौड़म दास

उनके जन्म-तिथि की तरह ही
उनकी मृत्यु की तिथि भी
किसी को याद नहीं है
दरअसल इस युग के
अस्तित्व के राडार पर
एक ' ब्लिप ' भी नहीं थे
बौड़म दास

मोहल्ले वालों के अनुसार
बुढ़ापे में अकसर राजघाट पर
गाँधीजी की समाधि पर जा कर
घंटों रोया करते थे
बौड़म दास
क्या आप बता सकते हैं कि
ऐसा क्यों करते थे बौड़म दास ?
-------------------------------

संपर्क : 5174, श्यामलाल बिल्डिंग ,
      बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,
     नई दिल्ली - 110055
ई-मेल: sushant1968@gmail.com


टुकड़ा- टुकड़ा धूप/  संजय शेफर्ड


टुकड़ा- टुकड़ा धूप
आसमान से टूट- टूट कर गिरती
इकट्ठा होती रहती है
घुरहू की काली पीठ पर
और बन जाती है
 कभी- कभी उसके माथे का दर्द
महज टुकड़ों- टुकड़ों में ही
यही कतरा- कतरा दर्द
रघ्घू की निरीह आंखों में भी है
 इस महिने भी बारिश नहीं हुई
फिर भी वह बहा देना चाहता है
 परिस्थियों के सारे कचरे को
 अपनी मेहनत और जांगर के जोर पर
आंसूओं के साथ दूर कहीं
धनिया जानती है
 आंसुओं के टूटने से बारिश नहीं होगी
ना ही बच्चों के काल कलिया खेलने से
 निर्मोही बादलों की आंख रिसेगी
 फिर भी इकट्ठा कर लाई है
 गांव के दर्जन भर बच्चों को
अपने ही दुयारे पर तपती धरती में
 अंजुरी भर पानी डाल बना रही है
 कलई बच्चे लोट- पोट हो रहे हैं
उसी अंजुरी भर पानी
उसी अंजुरी भर सूखी धरती
 उसी अंजुरी भर आंसूओं
उसी अंजुरी भर जलती पीठ की खातिर
 शाम के निवाले से बेखबर
 खेल रहे हैं काल कलिया
अपने आंसूओं से सनी गीली मिट्टी में
महज नन्ही- नन्ही बारिश की बूंदों की खातिर।

----------------------
सम्प्रति – बीबीसी गैलेरी इंडिया में शोधकर्ता एवं लिंक राइटर
ईमेल- sanjayshepherd@outlook.com
दूरभाष संख्या : 8 3 7 3 9 3 7 3 8 8 / 88826 11166
-

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...