Saturday, 6 August 2022

अनीता श्रीवास्तव का व्यंग्य 'बड़ा आदमी, आम और देशहित'

          जिसे देखो आम आदमी के पीछे पड़ा है l कवि आम आदमी पर कविता लिख रहा है, चित्रकार उस पर पेंटिंग बना रहा है, नेता के भाषण का वह केंद्र बिंदु है l और तो और, आम आदमी खुद सारा संकोच त्याग कर आम आदमी की ही तरफदारी में लगा है; जैसे कि उसे पता चल चुका है कि उसका आम होना ही उसकी खासियत है l आम फलों का राजा है और आम आदमी ही देश का राजा है l ये राज अब राज नहीं रहा इसीलिए हर कोई आम आदमी के स्तुति वाचन में लगा है l ऐसे में बड़े और खास आदमी की उपेक्षा हो रही है l अपनी उपेक्षा से दुखी बड़ा आदमी छोटे-छोटे काम करने लगता है l कभी वो छोटे आदमी की तरह प्याज़ से रोटी खाता है l उसके झोपड़े में जा कर खटिया पर सोता है तो कभी चाय बेचने लगता है l तिस पर भी लोग उसे बड़ा ही समझते  हैं l पहले वाले की उपेक्षा पहले की और कुछ समय की मोहलत के बाद दूसरे की भी करने लगते हैं l अपना  तो फर्ज़ बनता है, जिसके साथ कोई नहीं खड़ा उसीके साथ खड़े होने का

    ...इसीलिए मेरी सहानुभूति बड़े के साथ है , फिर चाहे वह पद, प्रतिष्ठा, योग्यता या संपन्नता में बड़ा हो; या केवल डील-डौल से ही बड़ा हो l बड़ा माने बड़ा इसके पर्याप्त कारण हैं l पहला तो यही कि उसे हर समय अभिनय करना पड़ता है, छोटा होने का l जो है वो न होने का और जो नहीं है वो होने का l उसे कैमरे के सामने रोना तक पड़ता है जबकि छोटा  आदमी स्माइल दे दे के फोटू खिंचाता है l वह आदतन झूठी हँसी हँसता है l उसे इसका इतना अभ्यास है कि कोशशि नहीं करनी पड़ती l ऐसी ही किसी फोटू पर सौ दोसौ लाइक मिलते हैं और वह भूल ही जाता है कि उसकी स्माइल झूठी है l बार-बार  की प्रशंसा ब्यूटीफुल ,औसम्, लवली पढ़- पढ़ कर उसे लगने लगता है कि वह सच में खुश है l बार- बार दोहराया गया झूठ सच होने का भ्रम देता है l उसकी स्माइल असली है ...उसे सचमुच का भ्रम हो जाता है l यदि आदमी पद प्रतिष्ठा में बड़ा है तब तो उसकी स्थिति और भी दयनीय है l उसे काग़ज़ों में वह सब करके दिखाना पड़ता है जो वह वास्तविकता के धरातल पर नहीं करता l ये काम बिना भीगे नहाने जैसा है l ये एक ऐसा काम है जिसकी उसे कहीं से ट्रेनिंग नहीं दी गई l लेकिन, करत- करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान l उसके भीतर ओरिजिनल हुनर विकसित हो जाते हैं जैसे तीन बनाना उसने सीखा स्कूल में ,किंतु समय के साथ उसने तीन का आठ बनाना भी सीख लिया l यह उसका ओरिजिनल हुनर है l स्वयम की इजाद l उसकी इसी योग्यता से इंप्रेस हो कर मैं उसके साथ हूँ l अब अगर इतना सब तामझाम न भी हो और आदमी केवल डील डौल से ही बड़ा हो तो भी उसका साथ आपको बॉडी गार्ड का सुख देगा l अतः इस मामले में भी औसत या मंझोले का साथ छोड़ बड़े का साथ देना ही फायदे का सौदा है l

 ऐसा नहीं है कि आदमी जन्म से ही बड़ा होता है या कर्म से ही बड़ा होता है l जन्म और कर्म दोनों ही कन्फुजियाने के लिए गढ़े गए कन्सेप्ट हैं l आप सावधानी बरतें! जन्म से बड़ा, छोटे छोटे काम कर के क्षैतिज रूप से पसर  कर जियोग्रैफ़िली बड़ा बन जाता है और अब बड़ा आदमी नामक कॉमन नाऊन के अंतर्गत आने लगता है l दूसरी तरफ, छोटा आदमी बिना पापड़ बेले, बिना लोहे के चने चबाए, केवल बड़े आदमी की पायलागी  करके या उसकी गाड़ी चला कर  भी बड़ा बन सकता है l तो जिसने जीवन में संघर्ष किया है आपको उसीका साथ देना चाहिए l न्याय की बात यही है l आप न्याय का साथ दें l न्याय बड़े आदमी के साथ है

        एक बार मेरे पडौसी में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे l वे सदा की तरह देखते ही सायरन से बज उठने वाले व्यक्ति थे मगर अब खराब पड़ी स्ट्रीट लाइट की तरह किनारे खड़े रहते, मेरे वहाँ होने से अप्रभावितl....या खौफ बिखेरते एंबुलेंस की तरह बगल से गुज़र जाते l मैंने इसका कारण जानने के लिए अन्य  पडौसियों को टटोला तो पता चला कि अब वे पहले जैसे नहीं रहे... क्यों ...पहले वे एक मामूली अध्यापक थे... 

 -तो अब इस उम्र में क्या कलेक्टर हो गए... 

नहीं उनके लड़के की कम्पनी में नौकरी लग गई l ... बीस लाख का पैकेज है l बताने वाले की आँखें बड़ी हो गई l एक पडौसी बड़ा आदमी हुआ बाकियों की आँखें बड़ी हो गई

- अच्छा 

होने वाली बहू भी कम्पनी में है.... 

 -  तो इसका मास्टर साब के स्वभाव से क्या लेना देना . .. 

- है... लेना देना है... अब वे बड़े आदमी हो गए हैं l पहले जैसे ठिलठिला कर हँस नहीं सकते l कायदे में रहना पड़ता है

 मैं भावुक सी हो गई l उनके प्रति सहानुभूति की ताज़ा कोंपलें फूट पड़ीं l उन्हें इस उम्र में खामखाँ अतिरिक्त श्रम करना पड़ रहा है, बड़ा आदमी दिखने का अभिनय l वे जब तक छोटे और मामूली मास्टर थे, मुझे उनसे कभी सहानुभूति न हुई अपितु समानुभूति ही हुई

        मित्रो बड़ा आदमी, बड़ा अकेला होता है l कुछ तो डिप्रेसन के मरीज़ तक हो जाते हैं कुछ अपनी इहलीला  समाप्त कर लेते हैं आम आदमी इन सब ठटकर्मो  से ऑटोमेटीकेली बरी है l नून-  तेल के चक्कर से छूटे तब तो टेंशन-डिप्रेसन हो l कुछ भी होने के  लिए  लाइफ में थोड़ा  स्पेस चाहिए l मंहगाई, बेरोजगारी, महामारी... इन सबसे बचे तब तो डिप्रेशन का शिकार हो मंहगाई से निपटता है तो इच्छाएँ शिकार बना लेती हैं l बेरोजगारी से पिंड छूटता है तो  कम्पनी शोषण कर के तेल निकाल लेती है l महामारी से बच गया  तो महामारी के भय का शिकार... लहर के बाद लहर शिकार करने को तैयार है l आखिर एक शिकार को कितने चबाएंगे! इसी उधेड़बुन में वह बच निकलता है l ' मल्टीपल शिकार " नामक क्वालिटी का उसे लाभ मिलता है

     बड़े आदमी की स्थिति दयनीय है l वह इतने शिकारियों का टार्गेट नहीं है , इसलिए बचा रह जाता है ... डिप्रेशन के लिए l एक लेखक को इतना सहृदय तो होना ही चाहिए कि वह बड़े आदमी से सहानुभूति  रखे l

     मेरा  सुझाव है कि लेखक आम आदमी पर न लिखें l चित्रकार उस पर चित्र न बनाएं l वे लगातार लिखते है इससे आम आदमी बड़े आदमी के दिमाग पर 

 छा जाता है l उनकी रसना आम आदमी के आमपने को चखने के लिए  लपलपाने लगती है l वे इसके लिए योजनाएं बनाते हैं l घोषणा पत्र बनाते हैं जिसका नतीजा देश हित में नहीं होता l उल्टे आप बड़े आदमी पर लिखें l भले ही व्यंग्य लिखें l इससे बड़ा आदमी आम आदमी के राडार पर रहेगाl बड़ा आदमी जो कहेगा आम आदमी उसे उसके आचरण के आलोक में देखेगा और तय करेगा , उसे किसके झोले में जाना है l  ...और यही देश हित में होगा l

__________________



- अनीता श्रीवास्तव

(कवयित्री, कथाकार, व्यंग्यकार, मंच संचालक, पूर्व रेडियो एवम टीवी उद्घोषिका)  

शिक्षा- एम एस सी (वनस्पति शास्त्र) ( बुंदेलखण्ड वि वि, झाँसी) 

बी एड ( बरकतुल्लाह वि वि भोपाल  ) 

बी जे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल

200 से अधिक रचनाएँ विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित

भास्कर मधुरिमा, देशबंधु, पत्रिका, इंदौर समाचार,सम्पर्क क्रांति, विज्ञान पत्रिका, सत्य की मशाल, संगिनी (कहानी, कविता,व्यंग्य) बच्चों का देशनूतन कहानियाँसाहित्य संस्कृति, उजाला मासिक ( बाल कविताएं) एवम व्यंग्य की  राष्ट्रीय स्तर की अग्रणी पत्रिकाओं  व्यंग्य यात्रा, अट्ठहास, रंग चकल्लस,सहित विभिन्न अखबारों में लगातार  रचनाएँ प्रकाशित l

कनाडा से प्रकाशित पाक्षिक वेब पत्रिका साहित्य कुंज में नियमित लेखन l 

कहानी धरती की छाती में( भूजल संरक्षण पर आधारित) एवम पुरस्कार (नशामुक्ति पर आधारित)  आल इंडिया रेडियो से प्रकाशित l

काव्यपाठ का प्रसारण l वार्ता एवम रेडियो नाटक में प्रतिभाग

प्रकाशित कविता संग्रह जीवन वीणा (अंजुमन प्रकाशन, प्रयागराज) 

कहानी संग्रह तिड़क कर टूटना (सनातन प्रकाशन, जयपुर) 

बाल गीत संग्रह- बंदर संग सेल्फी 

सम्प्रति- शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मवई, टीकमगढ़, मध्यप्रदेश में उच्च माध्यमिक शिक्षक, जीवविज्ञान के पद पर  सेवारत साथ ही लगातार लेखन में सक्रिय l

 

Friday, 15 July 2022

शहर का नाम रोशन...

भले ही मैं टीवी न देखूं पर; आज भी अखबार देख लिया करता हूँ। क्योंकि मुझे देश की नहीं अपने शहर की खबरें जाननी होती हैं। देख लेता हूँ,खबरों के जरिये अखबार का चेहरा और उस चेहरे में अपने शहर का अक्स।


आज जो पहली खबर पर नजर गई,वह यह निकली; यूपीएससी में हुआ चयन, शहर का नाम किया रोशन...

मैं हीन भावना से भर उठा। सोचने लगा कि क्या कभी ऐसा मौका आया है, जो मैंने शहर का नाम रोशन किया हो! क्या मैं कलंक हूँ! या शहर पर कोई बदनुमा दाग! क्या मैं भी परीक्षा दूं! पर यहां तो जिंदगी ही रोज परीक्षा लिए जा रही है! अब तो मैं ओवर ऐज भी हो चला हूँ! इससे पहले मैं हीनता के रसातल से पाताल में जाता,मैंने फट से पन्ना पलट दिया।

एक खबर पर मेरी नजर टिक गई।

अर्ध रात्रि को सड़क पर पड़े एक घायल व्यक्ति को राहगीर ने पहुँचाया अस्पताल...
खबर में यह भी बताया गया है कि आपातकाल में उस राहगीर ने घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए अपना रक्त भी दान किया।
मगर मैं खबर में एक लाइन और ढूंढ रहा था,जो बहुत ढूंढने पर भी मुझे नहीं मिली। मैं सोच रहा था कि अखबार ऐसा जरूर लिखेगा कि ऐसा करने से राहगीर ने शहर का नाम किया रोशन। 

मैं निराश होकर फिर दूसरी खबर को पढ़ता हूँ। खबर यह है कि एक रिक्शेवाले ने माल-लत्ते से भरा बैग पुलिस चौकी में जमा करा दिया। बैग में जेवर और कुछ जरूरी कागजात निकले। कुछ देर बाद वह कीमती बैग उसके असली मालिक को खोजकर उसे सुपुर्द कर दिया गया। बैग मालिक ने रिक्शे वाले को इनाम देना चाहा, लेकिन रिक्शा वाले ने मना कर दिया। फिर दरोगा जी के काफी कहने पर उसने एक तुच्छ धनराशि बहुत हिचक के साथ स्वीकार कर ली। मैं सोच रहा हूँ कि अखबार वाले ने यह क्यों नहीं लिखा कि रिक्शे वाले ने बैग वापस करके किया शहर का नाम रोशन...
उसने सिर्फ यह लिखा है कि रिक्शा वाले ने बैग लौटा कर दिखाई ईमानदारी की मिसाल... मैं यह सोच रहा हूँ कि रिक्शेवाले ईमानदार नहीं होते! या गरीब से यह अखबार या कोई भी ईमानदारी की आशा नहीं करता!

मैं कुछ और खबरें देखता हूँ। पन्ने पलटता हूँ। खबरें खोज रहा हूँ, पर विज्ञापन स्वतः दीख पड़ते हैं। वाकई देश बदल रहा हैं। यहाँ खबरें खोजनी पड़ती हैं और विज्ञापन दौड़े-दौड़े खुद आपके पास चले आते हैं। खोजते-खोजते एक खबर पर मेरी नजर रूकती है।

एक औरत कूड़े के ढेर से एक बच्ची को... नवजात बच्ची.. को अपने घर ले आई है। किसी ने उसे कूड़े के ढेर में फेंक दिया था। अखबार लिखता है कि उस औरत ने जो पहले से ही एक बच्चे की मां है,ऐसा करके इंसानियत की दी मिसाल। लेकिन मिसाल देकर भी इस औरत ने शहर का नाम रोशन नहीं किया।
मैं कई बार सोचता हूँ, यह शहर चाहता क्या है या शहर वाले शहर से चाहते क्या हैं ! बस अवसर ! या इसके अलावा भी कुछ!

मैं फिर कुछ अन्य खबरों को देखता हूँ।

एक खबर पर निगाह रुकती है। एक युवक एक युवती को बचाने के लिए चार गुंडों से अकेले ही भिड़ गया। अखबार लिखता है कि कानून व्यवस्था चौपट; सरेआम छेड़ी जाती हैं लड़कियां;युवक ने बीच में आकर बचाई इज्जत...
और इधर मैं सोचता हूँ कि क्या इस युवक ने शहर का नाम रोशन नहीं किया! क्या हैडिंग यह नहीं होनी चाहिए थी कि गुंडों से युवती को बचाकर एक युवक ने किया शहर का नाम रोशन...

मैं अक्सर देखता हूँ; छोटे लोग...आम लोग जिनकी खबरें एक कॉलम, दो कॉलम से ज्यादा नहीं होतीं; वह शहर का नाम भले ही रोशन न करें,लेकिन वह शहर को शहर बनाते हैं। शहर को रहने लायक शहर बनाते हैं। गण्यमान्य लोग तो शोभा बढ़ाते हैं, मगर ये नगण्य लोग ही शहर को जीवंत बनाते हैं। 

शहर का नाम रोशन करने के लिए अब ये यूपीएससी या पीसीएस की परीक्षा नहीं दे सकते। प्रशासनिक 'सेवा' में अपना करियर नहीं बना सकते। बना सकते,तो ये भी करते! मैं जानता हूँ,शहर का नाम रोशन करना इतना आसान नहीं है, जितना आसान किसी की जिंदगी बचा लेना या किसी की जिंदगी में तब्दीली ला देना हैं। सो, ये आसान काम ये आम लोग रोज कर रहे हैं।

मेरे प्यारे शहर! बस इतनी इल्तिजा है तुझसे! मुझे चाहे न क्षमा करना तुम्हारा नाम रोशन न कर पाने के लिए,मगर इन्हें कर देना! प्लीज!


- अनूप मणि त्रिपाठी

Sunday, 10 July 2022

स्वर की शहनाई से निकले पद्मश्री शरद जोशी के जीवन-स्वर


द्मश्री शरद जोशी व्यंग्यकार से पहले एक सहज-सरल, स्नेह-संवलित, आत्मीय व्यक्तित्व की पराकाष्ठा थे। अस्सी के दशक में उन्हे पहली बार मुंबई; तब के बम्बई के पेडर रोड स्थित सोफिया महाविद्यालय के सभागार के काव्य-मंच पर देखा और सुना। मंच कवियों का था- भवानीप्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती जैसे दिग्गज कवियों के मंच पर एक मात्र गद्यकार थे - शरद जोशी। शरद जी के गद्य श्रवण का यह पहला मौका था जहॉं मैने साक्षात देखा, सुना और महसूस किया कि कवियों के मंच पर गद्यकार छा गया था। हंसते-हॅंसते लोगो के गाल दुखने लगे और तालियॉ पीटते पीटते हाथ। इसी से शरद जी के संदर्भ मे एक कहावत ये भी बनी कि ‘मंच कवियों का बाजी-गद्यकार की।‘

            शरद जी से संपर्क करने का दूसरा मौका इसी महाविद्यालय में सन् 1985 में तब मिला जब साहित्यिक आयोजन की चर्चा के दौरान एक छात्रा ने शरद जोशी को बुलाने के आग्रह किया। उन दिनों दूरदर्शन पर शरद जी के ये जो है जिन्दगी, वाह जनाब जैसे धारावाहिक आ रहे थे। विभागाध्यक्ष जी का मानना था कि महाविद्यालयीन विभागों की सीमित धनराशि के लिये शरद जी अपना समय नहीं देंगं। छात्राओं के अनुरोध ने मन को सम्बल दिया था, प्राध्यापकीय जिम्मेदारी महसूस करते हुए मैने प्रयत्न करने की अनुमति मांगी। प्राध्यपकीय पहल करते हुए शरद जी को फोन पर अपना परिचय दिया, सशंकित मन से छात्राओं का अनुरोध सुनाया। मन इन्कार सुनने को तैयार था , किन्तु यह क्या ? शरद जोशी ने तो यह कहते हुए संभावित तारीख दे दी कि मैं दो दिन पहले उन्हे याद दिला दूं। ये थे विश्व पटल के विख्यात रचनाकार, फिल्मकार, धारावाहिकों के लेखक- शरद जोशी।

            शरद जोशी निर्धारित तिथि को निर्धारित समय पर महाविद्यालय पहुचे। नियमतः मुझे शरद जी का सम्मान करने हेतु महाविद्यालय के द्वार पर होना चाहिए था किन्तु विभागाध्यक्ष जी ने मुझे सभागार के अनुशाषन की जिम्मेदारी सौंपी थी। समय के पाबन्द शरद जी ने स्वयं महाविद्यालय की रिसेप्शनिष्ट से हिन्दी कार्यक्रम के स्थल की जानकारी प्राप्त की और कक्ष तक आ पहुंचे। इतना सरल इतना सहज इतना नेक इतना महान था शरद जी का व्यक्तित्व ! उनका व्यक्ति-पक्ष। पारखी-नजर इतनी तेज कि कार्यक्रम के उपरान्त अल्पाहार के समय तीन प्राध्यापिकाओं मे उन्होने सहज ही मुझे पहचानते हुए पूछा- फोन पर आप ही ने मुझे धमकाया था ना ! यह थे शारदीय व्यक्तित्व के धनी शरद जोशी। वापसी में उन्हे वर्ली के किसी दफ्तर जाना था। हमारी एक वरिष्ठ सहयोगिनी श्रीमती अरुणा दुआ जी के पास वाहन की सुविधा थी, सो हम साथ हो लिये। संयोग से मेरा घर शरद जी के गन्तव्य स्थल के समीप ही था सो हम साथ ही उतरे। वहॉं खड़े-खड़े शरद जोशी जी ने जो जानकारी दी, उसे हम पेशेवर गुरुओं की बेशर्मी ही कह सकते है। हुआ यह था कि जिस दिन शरद जी ने मेरे फोन के आग्रह को स्वीकार किया था, उसी शाम विभागाध्यक्ष महोदय ने उन्हे यह कहते हुए रोकने की कोशिश की कि मामूली से पत्रं पुष्पं के लिए वे मुम्बई के गोरेगॉव से पेडर रोड तक; लगभग 40 किमी की दूरी तय कर आने का कष्ट क्यों उठा रहें है। शरद जी का जवाब था- यह तो मेरा मामला है, आप दुखी क्यों हो रहे हैं।

            शरद जी अपने घर से हमारे महाविद्यालय तक स्वयं आये। न कोई राह-खर्च न किसी पत्रं पुष्पं की अपेक्षा। यह था एक व्यंग्यकार का शारदीय व्यक्तित्व !

            संभवत: उनके लेखन और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही मैने अपने शोध का विषय – स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी व्यंग्य निबंध चुना। प्रमुख व्यंग्यकारों में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रविन्द्रनाथ त्यागी तथा नरेन्द्र कोहली जी रहे। शरद जोशी जी मुम्बई महानगर में उपलब्ध व्यंग्यकार थे |

परिचय भी हो ही गया था सो एक दिन समय लेकर उनके आवास पहुँच गयी। शरद जोशी जी स्नान, भोजन की चिन्ता किये बिना लगभग तीन घंटे तक व्यंग्य पर चर्चा करते रहे। मुझे छोड़ने मुख्य द्वार तक आये ही नही बल्कि सामने से बोले- कभी अपने घर भी बुलाइये।

            विश्वास नहीं कर पा रही थी कि इतना बड़ा व्यंग्यकार, इतने गहरे, इतने निर्मल व्यक्तित्व का धनी है। खैर उनकी सुविधा-अनुसार मेरे घर आने की तारीख तय हुई। उस दिन शरद जी को वर्ली के दफ्तर में शाम के 4 बजे आना था सो उन्होंने मुझे 6 बजे का समय दिया। वहॉं पहुँचकर देखती हूँ कि शरद जी पत्रिकाओं को पलटते हुए मेरी प्रतीक्षा में समय बिता रहें है। अधिकारी के साथ तय उनकी मुलाकात टल गयी थी वे चाहते तो किसी कर्मचारी को सूचना देकर निकल जा सकते थे। किन्तु शाम के 4 बजे से 2 घंटे वहीं रुके रहे। यह थे अपने नाम को सार्थक करने वाले, व्यंग्य की विसंगतियों को महसूस करने वाले शरद जोशी। मुझ जैसी अदना शोधार्थी के लिये दो घंटे दफ्तर में इन्तजार करने के बाद मेरे घर आये और रात के लगभग 11 बजे तक अनेकानेक सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक मुद्दों पर बातें करते रहे। रात के 11 बजे गाड़ी उन्हे छोड़ने जा रही थी तो यह सोचकर मै भी साथ हो ली कि शरद जी का कुछ और सानिध्य- आनन्द ले लूं। पूरे रास्ते वे इस शोधार्थी को जानकारी देते रहे और लगभग एक घण्टे बाद जब उनके निवास पर पहुंचे तो मकान के नीचे खड़े-खड़े विषय पूरा किया। उनका एक वाक्य आज भी जेहन मे धॅसा हुआ है- आपके सामने समुद्र है! तय आपको करना है कि आप मात्र एक लोटा भरना चाहती है या उससे कहीं अधिक।

            शरद जी के शारदीय बड़प्पन से मन इतना अभिभूत रहता कि अक्सर अपनी मित्र-मण्डली, अपने अन्य सहयोगी-प्राध्यापकों से मै अपनी अनुभूतियॉं बॉंटती। सोफिया कॉलेज की नौकरी जा चुकी थी और अब मैं माटुंगा के महाविद्यालय में कार्यरत थी। यहॉं के विभागाध्यक्ष जी से अक्सर अपने विषय की चर्चा करते हुए शरद जी का प्रसंग आ ही जाता। एक बार विभागाध्यक्ष जी ने इच्छा जाहिर की कि मैं शरद जी से मुलाकात का समय मॉगू ताकि वे भी उनसे बात कर सकें। मैने सहज ही शरद जी को फोन पर अध्यक्ष जी की इच्छा बतायी ! मेरे भावुक मन के भोलेपन को पितृव्रत समझाते हुए शरद जी ने जानकारी दी कि मेंरे अध्यक्ष महोदय उनसे भलीभॉंति परिचित हैं, उन्हे स्वयं मुझसे बात करनी चाहिए।ष् शरद जी ने मुझे समझाया कि मै ऐसे अध्यक्षों के फेर में न पड़ू। यह थे शरद जोशी एक अनुभवी साहित्यकार, जिन्होने मेरी भावनाओं को चिन्तन का आधार दिया, सूझ-बूझ और लोगों को परखने की दृष्टि दी। याद आ रहा है रमेश दवे जी का वाक्य- श्शरद जी की उपस्थिति समाज के नैतिक साहस और लेखक के लोकदायित्व की उपस्थिति थी।श् कुछ मुलाकातों के बाद शरद जी मुझे अपनी जीवनी लिखवाने लगे और मेरे संकोच को दूर करते हुए उन्होने कहा था मै उन्हे फोन कर लिया करु, वे जब जितना बता पायेंगे मै लिखती जाऊॅं। मैने उत्साह भरे स्वर में कहा आप प्रतिदिन लिखते है मैं प्रतिदिन फोन कर लिया करुंगी। काश यह संकोची मन प्रतिदिन फोन कर लेता तो पद्म श्री शरद जोशी के जीवन के अनेकानेक बातों के धनी हो पाते हम ! करीब तीन-चार बार ही उनसे बात हो पायी और 5 सितम्बर 1991 को वे अकस्मात हम सब को छोड़कर चले गये। शरद जोशी जी की अंतरंग मुलाकातों को शब्द देना इसलिए जरूरी लगा कि हिन्दी जगत के एक धीर-गम्भीर व्यंग्यकार, चिन्तक के सहज-सरल मानवीय पक्ष से भी हम सब परिचित हो सकें।

            बात शरद जी के व्यंग्य और व्यंग्यकार की। एक ऐसे व्यंग्य, गद्य-व्यंग्यकार की जिसने अपनी भाषा का शिल्प स्वयं रचा। आपसी संवाद और बोलचाल का शिल्प। संवाद की कहन शैली में वैचारिक चिंतन और मंथन का शिल्प ! वाचन और श्रवण का लोकरंजक शिल्प। संवेदन-सिक्त समालोचन का सहभागी शिल्प। यह था समय का यथासंभव व्यंग्य। प्रतिदिन व्यंग्य, व्यंग्य ही व्यंग्य। निरन्तर अपनी जॉंच करते रहने की लेखकीय मजबूरी का व्यंग्य-ष्हर लिखना श्रेष्ठ लिखने का प्रयत्न सिर्फ इसलिए कि रचना का मकसद पूरा हो। अपनी बात समझाते हुए शरद जोशी लिखते हैं- ष्समस्या है लेखन की इस दौड़ -धूप में संगत-असंगत, न्याय-अन्याय, सही-गलत को लगातार हर लम्हा समझना और लिखते वक्त अपनी निजी विशिष्ट धारणा  को कटु यथार्थ भोगने वाले सामान्य जन की भावना की ऊॅंचाई तक पहुॅंचाने की कोशिश।ष् आगे शरद जोशी जी कहते हैं -ष्जिस देश के लोग हजारों वर्षों से आक्रमण, अत्याचार, अन्याय, भूख, गरीबी, बिमारी,निराशा सहन करते हुए अपने कतिपय मूल्यों, विश्वासों और आस्थाओं से जुड़े रहें हैं। उनमें जिन्दा रहने के लिए कोर्इ्र श्सेंस ऑफ ह्यूमरश्, कोई मस्ती जरूर रही होगी। हैं।............. उसंके बिना इन बर्षों तक जिंदगी का यह संघर्ष संभव हीं नहीं था.......... व्यंग पहचान है कि साहित्य कष्ट सहती जिंदगी के करीब है या जुड़ा हुआ है।.......... हिंदी जब सामान्य जन के भाषाई रंग और मस्ती में रहेगी व्यंग अधिक लिखा जायेगा। ष्

            शरद जी ने सामान्य जन के इस भाषाई रंग और मस्ती को इस गहरार्इ्र से पकड़ा कि वे व्यंग्य के पद्मश्री आसन पर प्रतिष्ठत हुए। ष्बाढ़ की चिन्ताष् शरद जी की लेखनी तक आते आते ष्चिन्ता की बाढ़ष् बन जाती है। ष्चाराष् शब्द मात्र पशुओं के आहार तक सीमित न रह भाईचारा तक पहुच जाता हैं। जनता दल से उनकी लेखनी पूंछती है- आखिर इसमें जनता कितनी है और दल कितना ? वह क्या श्जनताश् और क्या श्दलताश् है? हाल यह है कि स्वार्थ को समर्पित जनता उनकी लेखनी तक आते आते ष्अजनताष् बन जाती है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अंतुले से शरद जोशी प्रश्न करते है- तुले तुम अनतुले ही आए और अनतुले ही चले गये। तुम अंततः  तुलोगे, पर कब ? शरद जोशी का समग्र लेखन जन-पीड़ा के इसी रसात्मक संप्रेषण का लेखन है। लोक-जीवन के आंतरिक सौन्दर्य और उसके कल्पनाशील माया लोक का सम्प्रेषण है। वर्तमान जीवन शैली- हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे का साहित्यांकन है। खेल-खेल में चिन्तन और चिन्तन में खेल की अद्भुत जिंदादिली है। मनुष्य सरल, सहज, खराखरा होने के साथ ही जटिल, गम्भीर, दुरूह और त्रासद भी है। मनुष्य को उसके मूल रूप में पकड़ते हुए शरद जोशी का व्यंग्य मानव-पीड़ा का सहयात्री है। एक ऐसा सहयात्री जो कहीं कोंचते हुए छीलता है तो कहीं छीलते हुए कोंचता है। कहीं वह विशुद्ध खेलम-खेल है तो कहीं मखौल का अनावरण। इसमें लाखों निजी स्वर हैं। शर्मनाक जीवन-स्थितियाँ, शानदार राजनीतिक उपलब्धियाँ, अनमोल जीवन का अनमेलस्वरूप, भ्रष्ट अफसर, सत्ताधारी राजनीतिज्ञ, शर्मनाक जीवन - स्थितियाँ सभी कुछ की जिंदादिल परिक्रमा, जीवन के जितने भी पहलू हैं, हो सकते हैं, सभी का सम्पूर्ण आकलन, श्वेत-श्याम स्वरूप की प्रस्तुति है शरद जोशी के व्यंग्य। जहाँ-जहाँ डोलत सोई परिक्रमाका पक्षधर। जो जो करत सो सेवा“, “पुनि पुनि चन्दन पुनि पुनि पानी का वह जीवन जो समाज में यत्र-तत्र सर्वत्र

शरद जोशी जी के व्यंग्य पर व्यंग्यकार एवं व्यंग्य-समीक्षक- प्रेमजनमेजय जी कहते हैं कि शरद जोशी होने के अनेक अर्थ हैं पर सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है - जीवन भर अनर्थ के विरूद्ध लड़ते रहना

मैनें अक्सर ही श्रेष्ठ व्यंग लिखा हैंकहते हुए शरद जी स्वीकार करते हैं कि हर रचना पहली रचना लिखनी की कोशिश, उत्साह और भय के साथ लिखना पड़ती है ..... हर लिखना श्रेष्ठ लिखने का प्रयत्न सिर्फ इसलिए कि रचना का मकसद पूरा हो।आगे वे लिखते हैं - व्यंग पहचान है कि साहित्य कष्ट सहती सामान्य जिन्दगी के करीब है या जुड़ा हुआ है। शरद जी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक हर प्रकार की समस्याओं की गहरी समझ के साथ हल्के ढंग से व्यंग्य करते हैं - भूतपूर्व प्रेमिकाओं को पत्र लिखते हुए शरद जोशी लिखते हैं - उन दिनों हिंदी साहित्य छायावाद छोड़ चुका था और मायावाद में फंस चुका था। ... जिन होंठों के अचुम्बित रहने का रिकार्ड बंदे ने पहली बार तोड़ा था, उन पर तुम्हारें पातिव्रत्य की आज ऐसी लिपस्टिक लगी है, जैसे मेरी कविता की कॉपी पर धुल की तहें।

शरद जोशी की व्यंग्य रचनाओं से गुजरना केवल विसंगतियों और घोर स्खलनों की गलियों से भटकना भर नहीं, अपितु भाषा और शिल्प की एक चमत्कारी प्रदर्शनी की यात्रा भी है।  उनके व्यंग्य में कहीं परिवेश के अंतर्विरोध नजर आते हैं, कहीं कहावतें भरी लोकभाषा । परिक्रमा, किसी बहाने, जीप पर सवार इल्लियाँ,

रहा किनारे बैठ, तिलस्म, दूसरी सतह, पिछले दिनों, मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें, यथा - सम्भव, हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, मुद्रिका रहस्य, यथासमय, नदीं में खड़ा आदमी, घाव करें गम्भीर आदि रचनाओं में शरद जी की व्यंग्य-सम्पदा एकत्र हैं। इन सब में न जाने कितने विषयों पर कितनी भंगिमाओं में शरद जोशी का व्यंग्य संकलित हैं। कम- से - कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ की प्रस्तुति ही उनके व्यंग्य का केन्द्रीय वैशिष्ट्य है। विसंगितियों के शिकार बने शरद जोशी ने अपने अनुभवों की प्रमाणिकता के माध्यम से विसंगितियों के मूल की तलाश की और उन पर प्रहार किये। डॉ0 भगीरथ बड़ोले निर्मलजी के शब्दों में उनका प्रखर लेखन मानव जीवन को कुरूप बनाने वालों के विरूद्ध किसी स्वाभिमानी मनुष्य का ऐसा लेखन है, जिसके अपने सपने तथा तमाम संघर्ष जीवन के सौन्दर्य से सम्पन्न करने की साधना से सम्बद्ध है।

रमेश दवे जी के शब्दों में शरद जोशी व्यंग्य में अपनी आत्मा के अक्षर उकेरते थे। वे व्यंग्य में मनुष्य के प्रति आस्था जीते थे, एक संवेदनशील मनुष्य - चरित्र जीते थे और वह नैतिकता जीते थे।

व्यंग्य - अध्येताओं की जानकारी के लिए साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित रमेश दवे जी की पुस्तक- शरद जोशीष् का परिचय प्रस्तुत करते हुए अपनी बात को विराम देती हँू - शरद जोशी हिन्दी के एक ऐसे व्यंग्यकार हैं, जिनके सृजन ने हिन्दी साहित्य में अपना ही व्यंग्य-समय रचा और व्यंग्य को एक स्वायत्त, स्वतंत्र और लोकप्रिय विधा के रूम में स्थापित किया। शरद जोशी का व्यंग्य मनुष्य के जीवनगत अनुभवों का व्यंग्य है, धरती का व्यंग्य है, मनुष्य के दुःख-सुख की धड़कनों का व्यंग्य है। उनके व्यंग्य आहत करने के बजाय राहत देते हैं, शब्द-हिंसा की अपेक्षा शब्द -करुणा और शब्द- रंजना देते हैं। वे आंतरिक क्षोभ की अभिव्यक्ति भी हैं और बाह्य जगत के छद्मों के विरूद्ध अनासक्ति भी। शरद जोशी के व्यंग्यों में कविता का-सा रस, कहानी का सा कसाव और निबंधो की-सी बौद्धिकता का सहज समन्वय है। उनका व्यंग्य चेतना का व्यंग्य है, अंतश्चेतना का भी और बाह्य चेतना का भी। उनका व्यंग्य राज का भी व्यंग्य है, समाज का भी व्यंग्य है। वन और जीवन, गति और दुर्गति, नीति और अनीति, क्षोभ और क्षेम, विरह और प्रेम, व्यवस्था और अवस्था और समय एवं अवकाश सब कुछ उनमें व्यंग्य बनकर प्रकट होते हैं।

- डॉ0 शशि मिश्रा

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...