Sunday, 27 June 2021

शाहू जी महाराज के जन्मदिन पर : क्या हो बहुजनों का संकल्प! - एच एल दुसाध

कांशीराम के उदय के बाद से बहुजन जिन महानायकों का जन्मदिन जोर-शोर से मनाते हैं, उनमे से एक हैं कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहू जी महाराज. 26 जून 1874 को कोल्हापुर राजमहल में जन्मे शाहू जी छत्रपति शिवाजी के पौत्र तथा आपासाहब घाटगे कागलकर के पुत्र थे. उनके बचपन का नाम यशवंत राव था. तीन वर्ष की उम्र में अपनी माता को खोने वाले यशवंत राव को 17 मार्च 1884 को कोल्हापुर की रानी आनंदी बाई ने गोंद लिया तथा उन्हें छत्रपति की उपाधि से विभूषित किया गया. बाद में 2 जुलाई 1894 को उन्होंने कोल्हापुर का शासन सूत्र अपने हाथों में लिया और 28 साल तक वहां का शासन किये. 19-21 अप्रैल, 1919 को कानपुर में आयोजित अखिल भारतीय कुर्मी महासभा के 13 वें राष्ट्रीय सम्मलेन में राजर्षिके ख़िताब से नवाजे जाने वाले शाहू जी की शिक्षा विदेश में हुई तथा जून 1902  में उन्हें  कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एल.एल.डी. की मानद उपाधि प्राप्त हुई थी, जिसे पानेवाले वे पहले भारतीय थे. इसके अतिरिक्त उन्हें जी.सी.एस.आई., जी.सी.वी.ओ., एम्.आर.इ.एस. की उपाधियाँ भी मिलीं.एक तेंदुए को पलभर में ही खाली हाथ मार गिराने वाले शाहू जी असाधारण रूप से मजबूत थे. उन्हें रोजाना दो पहलवानों से लड़े बिना चैन नहीं आता था. 

     शाहू जी ने जब कोल्हापुर रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली उस समय एक तरफ ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो दूसरी तरफ ब्राह्मणशाही जोर - शोर से क्रियाशील थी. उस समय भारतीय नवजागरण के नायकों के समाज सुधार कार्य तथा अंग्रेजी कानूनों के बावजूद बहुजन समाज  वर्ण-व्यवस्था सृष्ट विषमता की चक्की में पिस रहा था. इनमें दलितों की स्थिति जानवरों से भी बदतर थी. शाहू जी ने उनकी दशा में बदलाव लाने के लिए चार स्तरों पर काम करने का मन बनाया. पहला, उनकी शिक्षा की व्यवस्था तथा दूसरा, उनसे सीधा संपर्क करना. तीसरा, प्रशासनिक पदों पर उन्हें नियुक्त करना एवं चौथा उनके हित में कानून बनाकर उनकी हिफाजत करना. अछूतों की शिक्षा के लिए एक ओर जहाँ उन्होंने ढेरों  पाठशालाएं खुलवायीं, वहीँ दूसरी ओर अपने प्रचार माध्यमों द्वारा घर-घर जाकर उनको शिक्षा का महत्व समझाया. उन्होंने उनमें  शिक्षा के प्रति लगाव पैदा करने के लिए एक ओर जहाँ उनकी फीस माफ़ कर दी, वहीँ दूसरी ओर स्कालरशिप देने की व्यवस्था कराया. उन्होंने राज्यादेश से अस्पृश्यों को सार्वजनिक स्थलों पर आने-जाने की छूट दी तथा इसका विरोध करने वालों को अपराधी घोषित कर डाला.

दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने दो ऐसी  विशेष प्रथाओं का अंत किया जो युगांतरकारी साबित हुईं. पहला,1917 में उन्होंने उस बलूतदारी-प्रथाका अंत किया,जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गाँव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थीं. इसी तरह 1918 में उन्होंने कानून बनाकर राज्य की एक और पुरानी प्रथा वतनदारीका अंत किया तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया. इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई. दलित हितैषी उसी कोल्हापुर नरेश ने 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था-मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हे तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है. मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे.उन्होंने दलितों के मुक्तिदाता की महज जुबानी प्रशंसा नहीं की बल्कि उनकी अधूरी पड़ी विदेशी शिक्षा पूरी  करने तथा दलित-मुक्ति के लिए राजनीति को हथियार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किया. काफी हद तक उन्होंने डॉ. आंबेडकर के लिए वही भूमिका अदा किया, जो फ्रेडरिक एंगेल ने कार्ल मार्क्स के लिए किया था. किन्तु वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों के हित में किये गए ढेरों कार्यों के बावजूद इतिहास में उन्हें जिस बात के लिए खासतौर से याद किया जाता है, वह है उनके द्वारा शुरू किया गया आरक्षण का प्रावधान.

 शाहू जी महाराज ने चित्तपावन ब्राह्मणों के प्रबल विरोध के मध्य 26 जुलाई, 1902 को अपने राज्य कोल्हापुर की शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में दलित-पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. यह  आधुनिक भारत में जाति के आधार मिला पहला आरक्षण था. इस कारण शाहू जी आधुनिक आरक्षण के जनक कहलाये. ढेरों लोग मानते हैं कि परवर्तीकाल में बाबासाहेब डॉ.आंबेडकर ने शाहू जी द्वारा लागू किये गए आरक्षण का ही विस्तार भारतीय संविधान में किया. लेकिन भारी अफ़सोस की बात है कि जिस आरक्षण की शुरुआत शाहूजी जी ने किया एवं जिसे बाबा साहब में विस्तार दिया, वह आरक्षण आज वर्ग संघर्ष का शिकार होकर सुविधाभोगी वर्ग द्वारा लगभग कागजों की कागजों की शोभा बनाया जा चुका है और आरक्षण का लाभ उठाने के अपराध में आरक्षित वर्गों को  उस दशा में पहुँचाया जा चुका है, जिस दशा में पहुचने पर वंचितों को दुनिया में तमाम जगह शासकों के खिलाफ मुक्ति-संग्राम संगठित करना पड़ा.  इसे समझने के लिए लिए जरा मार्क्स के वर्ग संघर्ष का एक बार सिंहावलोकन कर लेना होगा. 

 

मार्क्स ने कहा है अब तक के विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है.एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात दूसरे शब्दों में जिसका शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता. नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है. प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है.’ 

 

मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या एक मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिससे कोई देश या समाज न तो अछूता रहा है और न आगे रहेगा. जबतक धरती पर मानव जाति का वजूद रहेगा, वर्ग-संघर्ष किसी न किसी रूप में कायम रहेगा. बहरहाल मार्क्स ने इतिहास में वर्ग-संघर्ष की जो व्याख्या की, उसका सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है. जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों(सामाजिक समूहों) के पेशे/कर्म तय रहे तथा इन तयशुदा पेशे/कर्मों की विचलनशीलता(professional mobility ) धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध (prohibited) रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली, जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है. वर्ण-व्यवस्था के विदेशागत प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन वर्ण-व्यवस्था में वर्ग-संघर्ष की विद्यमानता को देखते हुए ही 19 वीं सदी में महामना फुले ने वर्ण-व्यवस्था के वंचित शूद्र-अतिशूद्रों को बहुजन वर्गके रूप में जोड़ने की संकल्पना की, जिसे 20वीं सदी में मान्यवर कांशीराम ने बहुजन-समाज का एक स्वरूप प्रदान किया. बहरहाल प्राचीन काल में शुरू हुए देवासुर संग्रामसे लेकर आज तक बहुजनों की ओर से जो संग्राम चलाये गए हैं, उसका प्रधान लक्ष्य शक्ति के स्रोतों में वंचित बहुजनों की वाजिब हिस्सेदारी रही है. वर्ग संघर्ष में यही लक्ष्य दुनिया के दूसरे शोषित-वंचित समुदायों का भी रहा है. भारत के मध्य युग में जहां संत रैदास, कबीर, चोखामेला, तुकाराम इत्यादि संतों ने तो आधुनिक भारत में इस संघर्ष को नेतृत्व दिया फुले-शाहू जी-पेरियारनारायणा गुरु-संत गाडगे और सर्वोपरी उस आंबेडकर ने, जिनके प्रयासों से वर्णवादी-आरक्षण टूटा और संविधान में आधुनिक आरक्षण का प्रावधान संयोजित हुआ. इसके फलस्वरूप सदियों से बंद शक्ति के स्रोत सर्वस्वहांराओं(एससी/एसटी) के लिए खुल गए.

हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज: दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर. मंडलवादी आरक्षण ने परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित एवं राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया. मंडलवादी आरक्षण से हुई इस क्षति की भरपाई ही दरअसल मंडल उत्तरकाल में सुविधाभोगी वर्ग के संघर्ष का प्रधान लक्ष्य था. कहना न होगा 24 जुलाई ,1991 को गृहित नवउदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर भारत के शासक वर्ग ने, जो हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग से रहे, मंडल से हुई क्षति का भरपाई कर लिया. मंडलवादी आरक्षण लागू होते समय कोई कल्पना नहीं कर सकता था, पर यह अप्रिय सचाई है कि आज की तारीख में हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग का धन-दौलत सहित राज-सत्ता, धर्म-सत्ता, ज्ञान-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो गया है, सबसे बड़ी बात तो यह हुई है कि जो आरक्षण आरक्षित वर्गों, विशेषकर दलितों के धनार्जन का एकमात्र स्रोत था, वह मोदी राज में लगभग शेष कर दिया गया है, जिससे वे बड़ी तेजी से विशुद्ध गुलाम में तब्दील होने जा रहे हैं. आरक्षण पर संघर्ष के इतिहास में आज के लोकतांत्रिक युग में परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग की इससे बड़ी विजय और क्या हो सकती है!

 बहरहाल बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुंचाकर भी हिन्दू आरक्षणवादी वर्ग संतुष्ट नहीं हुआ है, वह अपने वर्ग शत्रुओं को पूरी तरह फिनिश करने के लिए विनिवेशीकरण, निजीकरण, लैटरल इंट्री को हथियार बनाकर जोर-शोर से आगे बढ़ रहा है. ऐसे में बहुजन अगर वर्तमान में चल रहे वर्ग संघर्ष में हिन्दू आरक्षणवादियों को योग्य जवाब देना चाहते हैं तो आज आरक्षण के जनक के जन्मदिन पर निम्न क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने का संकल्प लें.

1-सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार नौकरियों एवं पौरोहित्य ; 2- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जाने वाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप; 3- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जाने वाली खरीदारी;  4 - सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन;  5 – सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जाने वाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी-व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के संचालन, प्रवेश व अध्यापन; 6 - सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों, उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जाने वाली धनराशि; 7- देश-विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं(एनजीओ ) को दी जाने वाली धनराशि; 8 - प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं फिल्म के सभी प्रभागों; 9 - रेल-राष्ट्रीय राजमार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की जमीन व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए एससी/एसटी के मध्य वितरित हो एवं 10- ग्राम पंचायत, शहरी निकाय, सांसद-विधानसभा, राज्यसभा की सीटों एवं केंद्र की कैबिनेटविभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों ,राष्ट्रपति- राज्यपाल, प्रधानमंत्री- मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल में...

उपरोक्त क्षेत्र क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने की लड़ाई जीत लेने पर बहुजन भारत में हजारों साल से जारी वर्ग संघर्ष में निर्णायक बढ़त बना लेंगे !



Saturday, 26 June 2021

सौ_साल_पहले_की_स्त्रियों_की_दशा


सीढ़ियों पर बैठी वह लड़की...

(अविश्वसनीय थी मां की यातना और सहनशीलता)

- मन्नू भंडारी

 

अपनी ज़िन्दगी के नब्बे साल पूरे करके 1981 में मेरी माँ ने इस दुनिया से विदा ली थी। आज अगर वे ज़िन्दा होतीं तो पूरे 120 साल की होतीं। आज से सौ-सवा सौ साल पहले की औरतों की ज़िन्दगी की कहानी थोड़े से हेर-फेर के साथ कमोबेश एक जैसी ही तो है। घर-परिवार ही उनकी दुनिया होती थी और उसी के लिए अपने को होम कर देना उनकी ज़िन्दगी की सार्थकता। इस घर-परिवार से यदि उन्हें सुख-सुविधाएँ मिलतीं तो वे निहालपर यदि यहाँ से दुख,असह्य कष्ट, तरह-तरह की यातनाएँ मिलतीं तो उसे भी अपनी नियति समझ कर वे सहज भाव से स्वीकार कर लेती थीं। बस, ऐसी ही थी मेरी माँ की ज़िन्दगी भी। पर उनकी यातनाओं का एक पक्ष ऐसा भी था जिसे जब मैंने जाना तब मैं भी उस पर विश्वास नहीं कर पाई थी और अब, जब कोई इसे पढ़ेगा तो उसे भी यह अविश्वसनीय ही लगेगा। कोई कैसे तो बिना किसी गुनाह के ऐसी सज़ा दे सकता है (वह भी कुल साढ़े चौदह-पन्द्रह साल की उम्र में) और कैसे कोई इस तरह की सज़ा भोग सकता है, वह भी दो-चार दिन नहीं , पूरे छः महीने के लिए ! पर माँ ने बिना कोई प्रतिवाद किए उस सज़ा को चुपचाप भोगा ही नहीं, बाद में कभी इसकी चर्चा तक नहीं की। बहुत बरसों बाद  जब मैंने इसके बारे में किसी और से सुना तो फिर खोद-खोद कर माँ से पूछना शुरू किया। उन्होंने बताया तो सही और विस्तार से ही बताया पर आश्चर्य कि उसमें दादी के प्रति शिकायत या आरोप का कोई पुट तक न था।  इस सज़ा की अविश्वसनीयता के चलते ही मैंने कभी इस पर क़लम नहीं चलाई पर सुधा का यह हाड़-तोड़ आग्रह -- जो न करवा ले सो थोड़ा!

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इस घटना के ब्यौरे तक पहुंचने से पहले मैं उस माहौल की थोड़ी सी पृष्ठभूमि बताना चाहूँगी जहाँ बारह साल की उम्र में शादी करके माँ अपने गाँव पीपाड़ से ससुराल भानपुरा आईं थीं। यह तो मुझे बहुत-बहुत बाद में पता चला कि उम्र में माँ पिताजी से दस महीने बड़ी थीं। उस उम्र में लड़कियों को पति का अर्थ चाहे न समझ में आता हो पर ससुरालका अर्थ ठोंक-ठोंक कर समझा दिया जाता था। वे जब भानपुरा आईं तो पीपाड़ के अपने उस कच्चे, बेढंगे मकान कीतुलना में यहाँ की इस भव्य दुमंज़िला कोठी को भरी आंखों से निहारकर उन्होंने ज़रूर अपने को ख़ुशक़िस्मत समझा होगा।  उस हवेली का भारी दरवाज़ा जिसमें बाहर की ओर पीतल के बड़े-बड़े ख्शूबसूरत , नुकीले कुन्दे लगे हुए हैंजिसकी वजह से आज तो वे दरवाज़े एक एंटीक-पीस की हैसियत रखते हैं।  भारी तो इतने कि आज भी मैं शायद ही उन्हें  खोल बंद कर सकूं । अन्दर घुसते ही एक चौड़ा-सा लम्बा बरामदा, जिसके दाहिने सिरे पर कोई पाँच फ़ीट ऊँचा एक लम्बा-चौड़ा मंच, जिस पर सफ़ेद चादर में ढँका बड़ा-सा गद्दा और तीन तरफ़ गाव-तकिए लगे रहते हैं।  यह थी उस घर की मर्दाना बैठक, जो आज भी वैसी ही है। बरामदे के बायीं तरफ़ बीच में गोल आकार के बड़े दरवाज़े जितनी खुली जगह, जिसमें घर के अन्दर प्रवेश किया जाता है। अन्दर बीच में एक चौक जिसके बीचोबीच  एक गोल चबूतरे में नीम का पेड़ लगा है। कहते हैं पिताजी के जन्म के समय जब उनकी नाल यहाँ गाड़ी गई थी तो मिट्टी और खाद के साथ कुछ निम्बौलियाँ भी वहीं गाड़ दी गई थीं। उस समय वहाँ जो नीम उगा वह आज तीसरी मंज़िल की छत तक गया पिताजी की उम्र का एक भरा-पूरा लहलहाता नीम का पेड़ है।

     चौक के चारों तरफ़ कोई डेढ़ फ़ीट की ऊँचाई पर बने चौड़े-चौड़े बरामदे। बरामदों का कच्चा फ़र्श जिसे राती   (लाल) मिट्टी से मिले गोबर से लीपा जाता और कभी-कभीविशेषकर तीज-त्यौहारों पर उन पर बड़े-बड़े सफ़ेद माँडने माँडे जाते (जिसे आज हम अल्पना कहते हैं)। आज से कोई साठ साल पहले मैंने एक दीवाली भानपुरा में मनाई थी और तब माँडने के इस दृश्य की कला को देखा था। माँडने वाली औरत बिना पहले से कोई डिज़ाइन बनाए, हाथों में बालों का छोटा-सा गुच्छा लेकर उसे सफ़ेद घोल में डुबोती और शुरू हो जाती और देखते ही देखते उनका वह डिज़ाइन फैलते-फैलते एक बड़े से गोलाकार या चौकोर माँडने का रूप ले लेता। तीन बरामदों में तीन अलग-अलग डिज़ाइन। मैं चकित रह गई थी उनकी उंगलियों की इस महारत पर। पता नहीं आज भी वैसी कलाकार स्त्रियाँ भानपुरा में हैं या नहीं, क्योंकि अधिकतर लोगों ने अपने कच्चे फ़र्श तो अब पक्के करवा लिये हैं।

             बरामदे के दूसरे किनारे पर कमरों की क़तार। कच्चे फ़र्श और बिना एक भी खिड़की वाले इन कमरों को मेड़ी कहते हैं। एक ओर की मेड़ियों में दादा का साम्राज्य। एक मेड़ी थी उनका रोकड़ भंडार, जिसमें चाँदी के सिक्कों से भरी थैलियाँ या फिर खुले ढेर यों ही पड़े रहते थे। यहीं से लोगों को ब्याज पर रुपए दिए जाते थे और वापस मिलने पर उलट दिए जाते थे। उस समय शायद नोटों का इतना ज़्यादा प्रचलन नहीं था इसलिये सिक्कों में  ही सारा काम होता था । एक मेड़ी में उनके बही-खाते और गिरवी रखी गईं चीज़़ें रहती थीं। दो मेड़ियों में अलग- अलग तरह के अनाज की बोरियाँ रखी जाती थीं। दादा अपने नाना के यहाँ गोद आए थे। उन्हें इस मकान के साथ-साथ ब्याज पर रुपया देने का यह धन्धा भी विरासत में ही मिला था और सारी ज़िन्दगी वे यही करते भी रहे।

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सामने वाले बरामदे की मेड़ियों में काम करने वाली औरतें रहती थीं। इसी बरामदे के एक सिरे पर बाहर जाने का   रास्ता, जहाँ दो लैट्रिन बनी हैं और बाक़ी जगह खुली पड़ी है। दूसरे सिरे पर क़रीब एक-एक फ़ीट ऊँची सीढ़ियाँ हैंजिन्हें चढ़कर पहली मंज़िल पर पहुँचा जाता है। ऊपर फिर वैसे ही बरामदे और मेड़ियाँ। एक ओर केवल बड़ा- सा   रसोई घर और उससे जुड़ा भंडार-घर। दो ओर की मेड़ियाँ रहने के काम की....इन मेड़ियों के नाम भी हैं जैसे पेटी  वाली मेड़ी’ (यहाँ घर-भर के बक्से रखे हैं) चूने वाली मेड़ी’ (इसमें एक खिड़की भी है और इसका फ़र्श भी पक्का है। नाल (सीढ़ी) वाली मेड़ी (यह छत पर जाने वाली  सीढ़ियों की बग़ल में है) बरतन वाली मेड़ी (यहाँ घर के बरतन माँजे जाते हैं और उन दिनों लालटेनों की हंडिया भी चमकाई जाती थी।) केलूड़ी मेड़ी’ (इसकी छत पर लाल रंग केकेलू लगे हुए थे) यह एक तरह से घर का ज़च्चा घर था जहाँ केवल बच्चे पैदा किए जाते थे... मेरा जन्म-स्थान भी यही है। इसी तरह बिस्तरवाली मेड़ी , लकड़ी वाली मेड़ी आदि-आदि।

धन-धान्य और नौकर-चाकरों से भरी इस कोठी में अपने को ख़ुशक़िस्मत समझने वाली माँ की ज़िन्दगी के कौन से पन्ने यहाँ लिखे गए थे, यह तो माँ उस समय जान ही नहीं पाईं। दादी बेहद दबंग और रोबीले स्वभाव की महिला थीं और उन्होंने कभी कोई काम अपने हाथ से किया ही नहीं। काम करने वालियों की भी कोई कमी नहीं थी।   कहते हैं कि कभी एक महिला (नाम मैं भूल रही हूँ) अपनी दो बाल-विधवा बेटियों को लेकर दादी की शरण में आई थी। बड़ी बेटी सीता बाई शायद माँ की उम्र की ही थी और छोटी बेटी मन्नी बाई कुछ छोटी थी । दादी ने उन्हें रख लिया था और खाने और कपड़े के एवज़़ में वे घर का सारा काम करती थीं। एक थी गेंदी बाई। उनकी भी अपनी एक अलग कहानी। छप्पन्या के काल (संवत् 1956 का भयंकर अकाल) में हड्डियों का ढाँचा रह गए एक पति-पत्नी दादा के पास आए और अपनी कोई आठ-दस साल की लड़की को पाँच मन ज्वार में बेच कर चले गए। दादी ने गेंदीनाम की इस लड़की के गले में जब तुलसी माला देखी तो लड़की के बाप ने बताया कि लड़की का ब्याह (विवाह) तोकर दिया था- पर अब पता नहीं कि उसके सासरे के लोग और उसका आदमी हैं कहाँ...ज़िन्दा भी हैं या मर-खप गए। आप तो बस इसे रख लो। आश्चर्य है कि स्थिति सामान्य होने पर भी उस बच्ची को वापस लेने आना तो दूर कभी कोई देखने तक नहीं आया न माँ-बाप , न ससुराल वाले। वे सारी ज़िन्दगी हमारे घर ही रहीं। जिस पति से उसका कोई परिचय नहीं , जिसका उन्हें चेहरा तक याद नहीं , उसकी याद में भी वे ताउम्र विधवा बनकर ही रहीं। दादा-दादी की मृत्यु के बाद - पिताजी ने गेंदी बाई से बहुत आग्रह किया कि वे दूसरा विवाह कर लें पर वे नहीं मानीं।

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माँ की शादी और मुकलावा (गौना) एक साथ ही हो गया था क्योंकि उस ज़माने के हिसाब से माँ की शादी थोड़ी   बड़ी उम्र में हुई थी। एक महीने तक तो दादी ने नई बहू का लाड़-कोड़ किया और फिर रसोई की सारी ज़िम्मेदारी उनके कन्धे पर डाल दी। चार प्राणी घर के और चार करने वाले...दोनों समय आठ प्राणियों का खाना बनाना पड़ता।दादी सिर्फ़ आदेश देती और बीच में एक-दो बार रसोई में झाँक जाती कि सब ठीक हो रहा है या नहीं। यों माँ उस उम्र में भी खाना बनाना सीखकर तो आई थी पर दादी के डर से वे थरथराती रहतीं क्योंकि ज़रा सी कमी रहने पर  दादी वो फटकार लगाती कि बस ! हाँ, चटनी पीसने, आटा गूँधने जैसे कामों के लिए एक न एक औरत उनके साथ रहती ज़रूर थी पर आठ प्राणियों की रोटियाँ बेलना, चार सब्ज़ि़याँ बनाने का काम तो उनके ही ज़िम्मे था। ख़ैर, यह सब तो वे जैसे-तैसे निभा ले गईं। यह तो उस ज़माने की हर औरत की नियति ही होती थी। पर शादी के कोई ग्यारह महीने बाद दादी ने अपने दूसरे बेटे को जन्म दिया। मेरे पिताजी और बड़े काकासाहब की उम्र में कोई तेरह  साल का अन्तर था। जिसने सुना-देखा उसने यही कहा कि बहू का पग अच्छा पड़ा , परिवार फिर हरा-भरा तो हुआ। पर दादी के मुँह से उन्हें ऐसा श्रेय कभी नहीं मिला। उस ज़माने में बहू की कमियों को बढ़ा-चढ़ा कर कहने और उसे दण्डित करने का प्रचलन तो ख़ूब था पर उसकी ख़ूबियों को सिरे से नज़र-अन्दाज़़़ कर देना भी आम बात थी। बहू और ख़ूबी -- जैसे ये दो विरोधी बातें हों। माँ की परेशानी तो तब बढ़ी जब उन्हें ज़चगी का खाना, जैसे-गोंद के लड्डू, सोंठ के लड्डू, गुड़-अजवायन की राब आदि बनाने को कहा गया। यह सब बनाना तो वे जानती नहीं थीं और दादी का आदेश कि ये सब तुम ख़ुद बनाओगी और सबकी नज़रों से बचाकर मुझे खिला जाया करोगी। माँ ने डरते- डरते दादी से ही पूछा । दादी ने बताया तो , पर मुँह से बताने और हाथ से बताने में बहुत फ़र्क़ होता है। डरते-डरते माँ ने यह सब बनाया और उनके कहे अनुसार सबसे छिपाकर उन्हें खिलाया भी। ख़ैर, काम को लेकर बात-बात पर डाँट-फटकार -- ये सब तो बड़ी सामान्य सी बातें हुईं , जो उस ज़माने की सभी औरतों ने किसी न किसी रूप में अपने ससुराल में झेली होंगी पर असली यातना या कहूँ कि सज़ा, जिसके लिए मैंने अविश्वसनीय शब्द का प्रयोग किया,वह तो उन्हें आगे भोगनी थी। मैं ख़ुद महसूस कर रही हूँ कि पृष्ठभूमि कुछ अनावश्यक रूप से लम्बी हो गई। पर शुरू किया तो बस , लिखती ही चली गई ! अब असली बात।

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दादी दबंग ही नहीं बहुत वहमीले स्वभाव की भी थीं। सबसे बड़ा वहम उन्हें कुत्ते को लेकर था...अगर किसी ने कुत्ते को छू लिया या कुत्ते ने किसी को छू लिया तो वह तो गया काम से। दादी ने माँ को किसी शादी की दावत में भेजा। साथ में दो औरतें तो रहती ही थीं। लम्बा घूँघट और सब तरफ़ से अपने को ख़ूब ढाँप-ढूँप कर जाना पड़ता था। वे गईं पर जब लौटीं तो दादी की नज़र उनके ओढ़ने के पल्ले पर गई...पास बुलाया और पूछा-यो काँई...यो पल्लो तो कुत्ता ने मुँह में लियो दिखे।माँ सिर हिला-हिला कर (वे दादी से बोलकर बात नहीं करती थीं) और साथ गई औरतें बोल-बोल कर मना करती रहीं कि कुत्ता तो वहाँ दूर-दूर तक नहीं था...पर दादी मानने को तैयार ही नहीं -- क्यूँ म्यारी आख्याँ में धूल झोंको   मैं काँई जाणू नी !’  और माथा ठोक-ठाक कर उन्होंने विलाप करना शुरू कर दिया-अरे अब काँई करूँ ई पापां से? म्हाराई घर में पलनो थो यो पाप।’’ विलाप से ज़्यादा वे क्रोध से थरथरा रही थीं। किसी काम करने वाली के साथ यह घटा होता तो उसे निकाल कर सीधे सड़क पर खड़ा कर देतीं। पर घर की बहू को तो न निकालते बन रहा था , न रखते। आखि़र उन्होंने इस पाप (?) के प्रायश्चित के तौर पर माँ की सज़ा का ऐलान कर दिया। गोटा-किनारी के कपड़े उतरवा कर एक ओर रखवा दिए , मेहतरानी के ले जाने के लिए...गहने उतरवा कर ख़ूब गरम पानी से धुलवाए और माँ को पुराने कपड़े पहना कर छत पर जाने वाली सीढ़ी पर बैठा दिया औरबता दिया कि अब यहीं बैठना है... ज़रा भी हिलना-डुलना नहीं है यहाँ से। एक सीढ़ी पर उन्हें बैठना था , नीचे वालीसीढ़ी पर पैर रखने थे और रात को ऊपर वाली सीढ़ी पर सिर रख कर सोना था। और यह सज़ा केवल एक-दो दिन के लिए नहीं , पूरे छः महीने तक के लिए दी गई थी , बग़ल में एक घड़ा रख दिया गया था , जिसमें रोज़ सवेरे आठ-दस लोटा पानी डाल दिया जाता। एक थाली, कटोरी और गिलास -- बस ये तीन बरतन पकड़ा दिए गए , जिसमें दोनों समय ऊपर से रोटी-सब्ज़ी पटक दी जाती। असली संकट था लैट्रिन का क्योंकि वह नीचे की मंज़िल में थी सो सवेरे चूने या राख से नीचे तक दो समान्तर लकीरें खींच दी जातीं , जिनके बीच से चलकर वे नीचे लैट्रिन तक जातीं। सवेरे के काम से फ़ारिग़ होकर वहीं वे राख से तीनों बरतनों के साथ-साथ अपने दाँत भी माँज लेतीं और घूँघट हटाकर अपना मुँह भी धो लेतीं। ऊपर आने के बाद लकीरों के बीच की ज़मीन को लीप दिया जाता। शाम को फिर वही प्रक्रिया। छः महीने तक माँ को नहाने को नहीं मिला। बाल धोने तो दूर , कंघा तक करने को नहीं मिला। चौबीस घंटे (सीढ़ियों पर सोने के कारण जहां वह रात को भी घूँघट काढ़कर सोती थीं ) घूँघट के कारण उनके बाल उलझ-उलझ कर गुच्छे बन गए थे...जुएँ तो पड़ी ही होंगी। माँ ने बताया कि और सब की तो उन्हें धीरे-धीरे आदत  हो गई पर पानी का घड़ा धुलता तो नहीं था सो उसके बाहर मोटी-मोटी काई जम गई थी..बस, वही देखकर उन्हें घिन आती थी, पर करतीं क्या...पानी तो पीना ही पड़ता था।

       विश्वास ही नहीं होता कि बिना नहाए-धोए , एक मिनट को भी कमर सीधी किए बिना , किसी से एक शब्द भी बोले बिना , रात-दिन लम्बा घूँघट काढ़े , सीढ़ियों पर बैठकर एक साढे़-चौदह-पन्द्रह साल की लड़की , पूरे छः महीने गुज़ार सकती है। पर मेरी माँ ने गुज़ारे । कारण मेरी माँ का किसी तरह का कोई गुनाह नहीं, बस, सिर्फ़ दादी का  वहम। पूरे छः महीने बाद उन्हें सीढ़ी से उतारकर नहान-घर में भेजा जहाँ पहले से ही सिर धोने के लिए मुल्तानी मिट्टी, साबुन और एक जोड़ी कपड़े रख दिए गए थे। पहले एक औरत ने दो बाल्टी पानी उनके ऊपर उलट दिया और कहा कि ये गीले कपड़े एक ओर सरका देना , मेहतरानी ले जाएगी। जब वे सिर धोने बैठीं तो बालों के गुच्छे-के-गुच्छे उनके हाथ में आ गए। उनके बाल बेहद लम्बे और घने थे। उस दिन ज़रूर उन्हें रोना आ गया और वे घुटनों में  सिर देकर फूट-फूट कर रोईं तो जैसे रोती ही रहीं। अपने पीहर जब गईं तो उनकी माँ ने पूछा, तेरे बाल क्या हुए ? तो माँ ने कहा-वहाँ के पानी में ही पता नहीं क्या है कि बाल गिर जाते हैं और यह घटना नहीं बताई। जबकि इस घटना के दो महीने बाद माँ को उनके पीहर भेजा गया था पर आश्चर्य कि उन्होंने वहाँ किसी से इसका  ज़िक्र तक नहीं किया। वहाँ जो उस समय चाहे भानपुरा में नहीं थे पर बाद में तो मालूम हुआ ही होगा-उन्होंने भी इसका ज़िक्र नहीं किया। आश्चर्य तो मुझे इस बात पर होता है कि मैंने पिताजी और तीनों काकासाहब के मुँह से  अपने माँ-बाप का कभी कोई ज़िक्र तक नहीं सुना। कौन जाने दादी सा के आतंक ने उन सबकी जीभ हमेशा के लिए कुन्द ही कर दी हो।

     हमें तो इस घटना के बारे में मालूम पड़ा गेंदी बाई से। छुट्टियों में हम जब कभी भानपुरा जाते तो मैं गेंदी बाई से कुरेद-कुरेद कर उनके बचपन के बारे में पूछती। एक बार उन्होंने बताया कि इस घर में आने के कोई तीन-चार साल बाद दादी ने उन्हें अपनी माँ के यहाँ भेज दिया था। इस घर में उन्होंने डाँट-फटकार तो बहुत सुनी-सही पर मार कभी नहीं खाई। लेकिन नानी तो ज़रा सी ग़लती होने पर उन्हें पीट भी देती थी। और चूमटिये तो (खाना बनाने में प्रयोग किया जानेवाला) बहुत मारती थीं। उस ज़माने में लुगाइयाँ (औरतें) पगरखी (स्लीपर या चप्पल) नहीं पहनती थीं। हम यहाँ भी नहीं पहनते थे और हाट-बाज़ार नंगे पैर ही जाते थे पर भयंकर गर्मी के दिनों में नानी जब उन्हें  बकरियाँ चराने के लिए जंगल की तरफ़ भेजतीं तो आग जैसी तपती ज़मीन पर चलने में उनके पैरों में छाले पड़ जाते। डरते-डरते उन्होंने नानी से पगरखी के लिए कहा तो उन्होंने ऐसा फटकारा कि बस। तब वे छिपकर, घर से कोई  डोरी ले जातीं और वहाँ पेड़ों से पत्ते तोड़-तोड़ कर पैरों में बाँध लेतीं। नानी के घर बिताए बेहद कष्टप्रद एक साल की और भी कई बातें उन्होंने बताईं तो मेरे मुँह से निकला, ‘कैसी ज़िन्दगी जी है गेंदी बाई आपने..इतने कष्ट, इतनी तक़लीफ़ें ! इस पर वे बोलीं-अरे , तुम्हारी माँ ने जो सहा उसके आगे हमरा क्या सहना? तुम्हें का बताया नहीं माँ ने कि कैसे छः महीने उन्होंने नाल (सीढ़ी) पर बैठकर काटे थे?’’ और तब उन्होंने यह सारा क़िस्सा विस्तार से बताया..इस टिप्पणी के साथ कि मेरा और सीता-मन्नी का बड़ा मन करता कि हम कुछ मदद ही कर दें और कुछ भी तो दो बात ही कर लें पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी। सुनकर ही मैं तो भन्ना गई। मुझसे दो साल बड़ी बहिन सुशीला शुरू से ही ज़रा शान्त स्वभाव की थी तो वह हैरान और दुखी होकर रह गई , मेरी तरह भन्नाई नहीं !

     अजमेर लौटते ही मैंने माँ से पूछा -‘‘दादी साहब ने आपको छः महीनों तक सीढ़ी पर बिठा कर रखा था और आपने यह बात हम लोगों को कभी बताई तक नहीं।’’ माँ मेरा चेहरा ऐसे देखने लगीं जैसे कोई भूली-बिसरीबात याद कर रही हो।

     ‘‘भानपुरा में सुनकर आई दिखे या बात। बड़ी पुरानी बात हुई या तो और क्या बताती...बताने जैसा इसमें है ही क्या?’’

    ‘‘पर आप बैठी ही क्यों? क्यों नहीं मना कर दिया आपने कि मैं नहीं बैठ सकती छः महीने के लिए सीढ़ियों पर। ऐसी सज़ा भी कोई दे सकता है भला?’’ मेरा ग़ुस्सा फिर भड़क उठा। माँ हँसकर बोली-

    ‘‘अरे, जिसने सहा उसे तो कोई ग़ुस्सा नहीं और तु सुनकर ही लाल-पीली हो रही है। तू नी समझेगी...वो ज़माना ही ऐसा था। सासूजी थीं वो मेरी । उन्होंने जो किया वो हक़ था उनका और जो मैंने सहा , फ़र्ज़ था मेरा। और सहा क्या बस, यों समझो कि फ़रज़ पूरा किया अपना।’’

सुना तो मैं हैरान। माँ के लिए यह सब कुछ शायद इतना सहज-सामान्य था कि इसके लिए वे सहनाशब्द का प्रयोग भी नहीं करना चाहती। नहीं जानती केवल माँ या उस ज़माने की सभी औरतों की हक़ीक़त थी ये-बस सहना और उसे सहज भाव से लेना।

‘‘और पिताजी क्या करते रहे? -वे तो बेटे थे, वे तो कम से कम बोल सकते थे।’’

   ‘‘वे तो वहाँ थे ही नहीं। शादी के एक साल बाद वे दादा साहब से छिपकर दो लोगों की मदद से आगे पढ़ने के लिए जोधपुर भाग गए थे। भानपुरा में तो चार क्लास तक का स्कूल था ,बस ! सो दादा साहब तो चाहते थे कि उसके बाद वे भी उनके धन्धे में लगें पर तेरे पिताजी तो पढ़ने के पीछे पागल, सो भाग लिए। पहले तो दादा साहब, दादी साहब ख़ूब ग़ुस्सा हुए पर फिर सन्तोष कर लिया। रुपया पैसा भेजने लगे। सन्तोष था कि चलो , पढ़ ही तो रहा है। कोई ग़लत काम तो नहीं कर रहा है।’’

   ‘‘भाग कर गए, आपको भी नहीं बताया?’’

    माँ हँस कर बोलीं-‘‘ये आजकल की लड़कियाँ ऊ ज़माना री बाताँ न जानो न समझो। उस ज़माने में शादी के बाद पति-पत्नी का बोलना तो दूर...चेहरा भी नहीं देखते थे। ब्याह कर आई तब से मेरी कोई बातचीत ही नहीं थी उनसे उस उमर में धणी-लुगाई (पति-पत्नी) कोई बात करते थे क्या? उन्होंने तो तब तक मेरा मुँह भी नहीं देखा था।’  ……

(शुक्रवार पत्रिका के वार्षिक अंक 2013 में प्रकाशित)

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...