Friday, 11 March 2022

आशा भरी दृष्टि का दिग्दर्शन: बन्द गली से आगे

            मनुष्य का जन्म सामाजिक परिवेश में होता है। इस सामाजिक परिवेश के अपने कुछ विशिष्ट नियम और संस्कार होते हैं और मनुष्य इनमें बंधा होता है। इससे बाहर जाकर, इससे विलग होकर व्यक्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। अपने व्यक्तिगत जीवन को मनुष्य समष्टिगत दायित्वों के सामने सदैव पीछे रखकर चलता है। समष्टिगत मूल्य, व्यक्तिगत मूल्यों से सदैव अधिक महत्त्वपूर्ण और महत्तर स्थान रखते हैं। मनुष्य अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में एक प्रकार का सामंजस्य बिठाता है और अपने जीवनमार्ग को सुगम बनाता है। परंतु कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं कि व्यक्ति अपने बाह्य शारीरिक आवरण से आंतरिक शरीर को कुछ अलग-सा महसूस करता है। ऐसी विशेषताएँ और विरूपताएँ व्यक्ति को नर और नारी के रूप से अलग जाकर ‘ट्रांसजेंडर’ की उपाधि से अभिहित करती हैं। ट्रांसजेंडर उन्हें माना जाता है जो अपने प्राकृतिक लिंग के अनुसार आचरण न करके उससे विपरीतलिंगी आचरण करते हैं। ट्रांसजेंडर समाज में अनेक रूपों में पाये जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से हिजड़ा, किन्नर, गे, लेस्बियन, हेट्रोसेक्सुअल, बाईसेक्सुअल आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

 

प्रख्यात् पत्रकार जी. पी. वर्मा की पुस्तक ‘बंद गली से आगे’ थर्ड जेंडर विमर्श पर चिंतन के नये द्वार खोलती है। उल्लेखनीय यह भी है कि इनमें ट्रांसमैन और ट्रांसवूमैन– दोनों ही सम्मिलित हैं। अपनी बाहरी और आंतरिक संरचना की पहचान को निर्धारित करने के लिए इन ट्रांसजेंडर को बहुत सी जानी-अनजानी कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। पारिवारिक रूप से ये बहिष्कृत ही रहते हैं। अधिकांश के माता-पिता और सम्बंधी उन्हें अपनाने से कतराते हैं। इसके पीछे सामाजिक नियमों और बंधनों के दबाव हो सकते हैं। प्रसन्नता की बात यह भी है कि कुछ ट्रांसजेंडर को उनके अपने परिवारों का सराहनीय साथ और सहयोग भी मिलता है। ट्रांसजेंडर्स को तथाकथित सभ्य समाज की क्रूरता और शोषण का लगातार सामना करना पड़ता है। इनके जीवन के पन्नों को पलटने पर नकली सहानुभूतियों और झूठे दिखावों के सफेद-स्याह निशान आसानी से देखे जा सकते हैं। अपने अंदर के पुरुष और स्त्री के होने, छिपे रहने और उनके सामने आने के अंतर्द्वन्द्वों को ये ट्रांसजेंडर अक्सर ही महसूस करते हैं। सामाजिक जीवन की लंबी और अनवरत चलने वाली दौड़ में ट्रांसजेंडर अपने तन और मन को संभालते और साधते हुए, अपनी शारीरिक पहचान को छुपाते और दर्शाते रहते हैं। इस कार्य में इनकी मानसिक चेतनाशक्ति इनके जीवन को संवेदनापूर्ण और रससिक्त बनाती है।ट्रांसजेंडर का अपना शरीर कौन सा है, यह प्रश्न उनके जीवन के साथ-साथ सदैव चलता है। यह होने या न होने का भाव उससे कभी नहीं छूटता। इसी द्वंद्व में वह अपने दिल की आवाज़ सुनता है और उसे अपने जीने की राह का इशारा अनजाने में ही मिलता चला जाता है। ये ऐसे अनदेखे इशारे हैं, ऐसी अनसुनी आवाज़ें हैं, ऐसे अनछुए स्पर्श हैं; जो उन्हें दुनिया के किसी भी अवरोधों को पार कर अनचीन्हे रास्तों पर आगे बढ़ते जाने की शक्ति और प्रेरणा प्रदान करते हैं। ये रास्ते कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए ट्रांसजेंडर को उसके आत्म से परिचित करवाते हैं। उसे रूबरू करवाते हैं उन अंदरूनी आवाज़ों से जिन्हें सामाजिक नियमों के शोर-शराबे में सुना नहीं जा सकता, दुनियावी ताने-बाने में देखा नहीं जा सकता। इन्हीं का सहानुभूतियों से भरा हुआ सम्बल पाकर ट्रांसजेंडर ‘बंद गली से आगे’ की यात्रा भी करना चाहते हैं। जी.पी. वर्मा शायद तभी अपनी पुस्तक का नाम ‘बंद गली से आगे’ रखते हैं। ट्रांसजेंडर का भरी दुनिया की चकाचौंध से बचकर एक अकेली और आत्मनिर्वासित दुनिया की तरफ चलना भी एक मजबूरी ही है जो उनके विचारों और वैयक्तिकता के अन्तर्जाल से भी उन्हें दूर ले जाती है। पुस्तक के समर्पण में भी लेखक का कथन उल्लेखनीय है,“उनको जो फूलों से खिलते घर उपवन में बिखर जाते पर…तंग गलियों के सीलते कमरों में आसमाँ छूने के सतरंगी सपनों के हौसले लिए।”1

 

पुस्तक की भूमिका ‘न भूतो न भविष्यति’ में जी.पी. वर्मा लिखते हैं,“नैसर्गिक व संवैधानिक, दोनों प्रकार के अधिकारों से ट्रांसजेंडर अब तक वंचित रहे। मानवाधिकार के हिमायती भी इनके उन्नयन के लिए कुछ न कर पाए। कारण सरकारों की उदासीनता। समाज का इनके प्रति घृणा-भाव। इनकी अजूबी शारीरिक संरचना के प्रति दुराव। फिर भी वह जीवन डगर पर अडिग और अविराम है। देखा जाए तो इनका वजूद इस्पात से निर्मित उस विराट् जलपोत के समान है जो जीवन सागर की तूफानी तरंगों पर बढ़ता है। उनसे मोर्चा लेता है। कभी विजयी होता है, कभी हार जाता है। पर वह ठहरता तब तक नहीं जब तक वह डूब ही नहीं जाता है। यूँ तो ज़िन्दगी स्वयं गहरे सागर-सी शान्त और तूफानी है। वह बहुत पेचीदा भी है। कभी-कभी उसे जीने वाले पेचीदा बना देते हैं। कभी पेचीदगियों में गढ़े लोग ही जिन्दगी के समक्ष चुनौती बनकर उसे झकझोर देते हैं। इसी श्रेणी में आते हैं वे लोग जो सृष्टिकृत नर-मादा के विरूप हैं। इन्हें थर्डजेंडर या किन्नर के रूप में जाना जाता है।”2 पुस्तक की लंबी भूमिका में लेखक ने थर्ड जेंडर, किन्नर आदि को ऐतिहासिकता के दृष्टिकोण से भी देखा है। प्रस्तुत पुस्तक कुल पांच खंडों में विभाजित है। पहला खंड है ‘जीवन चरित’ जिसमें कुल सोलह ट्रांसजेंडर्स का जीवन दर्शाया गया है। उल्लेखनीय यह भी है कि ये जीवनचरित स्वयं इन ट्रांसजेंडर्स द्वारा अपनी ही भाषा-शैली में लिपिबद्ध किए गए हैं। ये आत्मकथात्मक शैली में रचे गए हैं जिनमें ट्रांसजेंडर के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की विडंबनाएँ, विवशताएँ, विद्रूपताएँ विविध रूपों में हमारे सामने आती हैं।

 

‘मैं जिऊँगी’ विद्या राजपूत की आत्मकहानी है जिसमें विभिन्न अवरोधों और समस्याओं का सामना करते हुए जीवन और मृत्यु के खेल के बीच विद्या राजपूत अपनी पहचान की तलाश करती हैं। एक लड़के के शरीर में जन्म लेने के बाद ऑपरेशन द्वारा अपना लिंग परिवर्तित करवाकर वह स्त्री बनती हैं। ‘मितवा’ संगठन के माध्यम से विद्या राजपूत आज ट्रांसजेंडर समाज का भला कर रही हैं। रुद्रप्रयाग में जन्मे धनंजय चौहान ‘मैं अधूरी नहीं’ के माध्यम से अपनी बात रखते हैं। उल्लेखनीय है कि धनंजय चौहान विश्व के ट्रांसजेंडर समाज के रोल मॉडल हैं। गजब के आत्मविश्वास और समर्पण के कारण उनके कार्यों को दर्शाता ‘एडमिटेड’ नाम से एक वृत्तचित्र भी उनके ऊपर बनाया जा चुका है। वह पहले ट्रांसजेंडर हैं जिन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में बी.ए. ऑनर्स किया और विश्वविद्यालय में टॉप किया। अन्य अनेक विषयों में भी उन्होंने डिप्लोमा और डिग्रियां प्राप्त कीं। कानून की पढ़ाई करते के लिए लॉ कॉलेज में दाखिला तो मिला परंतु छात्रों के दुर्व्यवहार के कारण कानून की पढ़ाई वह पूरी नहीं कर पाए। धनंजय चौहान का जन्म एक लड़के के रूप में हुआ था परंतु तीन वर्ष की उम्र से ही उन्हें लगने लगा कि वह लड़का नहीं लड़की हैं। सन् 2009 में उन्होंने एक गैर सरकारी संगठन ‘सक्षम ट्रस्ट’ का गठन किया। राज कनौजिया एक ट्रांसमैन हैं। उनका जन्म मुंबई में हुआ था। आगे चलकर उनका ‘हमसफर ट्रस्ट’ से जुड़ाव हुआ। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने उन्हें मुंबई में चल रहे नौ टारगेट इंटरवेंशन केंद्रों को संचालित करने की जिम्मेदारी सौंपी। अपने कार्य को विस्तार देते हुए उन्होंने हमसफर ट्रस्ट के अंतर्गत ‘उमंग’ नामक ग्रुप बनाया। सिमरन बालिया का जन्म बिहार में एक लड़के के रूप में हुआ था। आर्यन एक ट्रांसमैन हैं जिन्होंने छोटी सी उम्र में शरीर सौष्ठव प्रतियोगिताओं में एशिया के पहले ट्रांसमैन बॉडीबिल्डर होने का खिताब प्राप्त किया। पप्पी देवनाथ त्रिपुरा के प्रथम ट्रांसमैन हैं। रुद्रांशी एक ट्रांसवूमैन हैं जिनका जन्म अजमेर में हुआ था। उन्होंने कविता लेखन में भी कई पुरस्कार जीत चुके हैं। अपनी आत्मव्यथा बताने के साथ-साथ उन्होंने अपनी तीन कविताएँ भी प्रस्तुत की हैं।

 

संजना सिंह चौहान बचपन से ही लड़कियों जैसा महसूस करती थीं। वे लिखती हैं,“ सामान्यतः बचपन और यौवन आशा-महत्त्वाकांक्षाओं के फूलों से महकता चमन होता है। लेकिन मैंने इस चमन में सैर नहीं की। मैंने तो नश्तर से भी तेज बबूल की झाड़ियों से घिरे सीमित मैदानों में ही काँटों से बचने के लिए भागदौड़ करते-करते जीवन के इस पड़ाव पर ठहराव पाया है। अब मैं भूत के पीड़ादायक क्षणों और काँटों को याद करके गुज़रे वक़्त से या उन लोगों से जिन्होंने मुझे तिरस्कार और अपमान दिया, कोई शिकवा या शिकायत नहीं करना चाहती। न ही मैं उस पर विलाप करना चाहती हूँ। मैंने तो जीवन में आने वाले हर अंधेरे में प्रकाश की मद्धिम किरण ढूँढने का प्रयास किया है ताकि मैं उस प्रकाश के सहारे जीवन की भावी राहों को देख सकूँ,उन पर बढ़ सकूँ।अपनी अज्ञात किंतु नियति द्वारा निर्धारित मंजिल को पा सकूँ।”3 उल्लेखनीय है कि संजना सिंह चौहान एशिया की पहली ट्रांसजेंडर हैं जिन्हें स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सम्मानित किया गया।अब्दुल रहीम अपने आलेख ‘सोशल डिस्टेंसिंग से मुक्ति कब’ के माध्यम से अपनी पीड़ा रखते हैं। उनका मानना है कि कोरोनावायरस सदियों में पहली बार आया है, पाबंदियाँ लाया है। सब जगह लॉकडाउन हुआ। सोशल डिस्टेंसिंग ने लोगों को दूर कर दिया है। कहीं कोरनटाइन में रहे लोग, पर यह कुछ दिन का मेहमान है,चला जाएगा। समाज पुराने ढर्रे पर चल पड़ेगा। लेकिन हम फिर भी इससे मुक्त नहीं होंगे। कोरोना तो हमारे जीवन में उस दिन से प्रवेश कर गया था जब हमने जन्म के बाद होश संभाला। हमने अपना आज तक का जीवन कोरनटाइन और सोशल डिस्टेंसिंग में गुजारा है।आज भी हम सबसे अलग-थलग हैं। लोग हमसे मिलने, हमसे बात करने और हमारे पास आने से हिचकते हैं, झिझकते हैं। प्रस्तुत आलेख में उन्होंने अपने दिल की बात चार-पांच छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से भी रखी है। उनकी पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं–

 

       खुदा ने जो बनाया

       बस वही हूँ मैं

       न ग़लत न सही

       जो कुछ भी है मेरे भीतर

       कुदरत ने रचा है

       मेरा वजूद

       कुछ भी नहीं 4

 

भैरवी अरमानी ने लंबे आत्मसंघर्ष के पश्चात् तंत्र-मंत्र और ज्योतिष विद्या में भी निपुणता प्राप्त की। उन्होंने अपनी शल्य चिकित्सा भी अपना जेंडर परिवर्तन के लिए नहीं करवाई है। अपनी माँ को याद करते हुए वे लिखते हैं–

 

      तू हमेशा रहना माँ

      मेरे बाद भी

      तेरा ही विस्तार हूँ मैं

      तेरी अभिव्यक्ति

      कुछ लोग कहते हैं माँ पर हूँ

      कुछ कहते हैं पिता पर

      मैं जानता हूँ माँ, मन मेरा तू है

      और तन है पिता

      इस आधे-आधे में तू ज्यादा है माँ

      तू हमेशा रहना माँ

      मेरे बाद भी 5

 

स्त्रिती चन्द्रन,माही,भावेश जैन प्रिया बाबू, दीपिका ठाकुर, अमृता जैसे ट्रांसजेंडर अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में आज पर्याप्त नाम अर्जित कर रहे हैं। प्रिया बाबू ने ‘अरवानिगल समूह वाराईवियल’ और ‘मूनरमपालिन मुगम’ जैसी पुस्तकें भी लिखी हैं। इन सभी आत्म जीवनचरितों को पढ़ते हुए एक बात स्पष्ट होती है कि लगभग सभी ट्रांसजेंडर को पारिवारिक और सामाजिक अवहेलनाओं का सामना करना पड़ा है। कुछ ने अपने गुणों को निखारा और समाज में अपना एक विशिष्ट मुकाम भी बनाया है।ये जीवनचरित यह भी दर्शाते हैं कि इन्हें भी सामान्य लोगों की तरह ही हमारे प्रेमपूर्ण व्यवहार और साहचर्य की आवश्यकता है। ये भी इंसान हैं जो एक सामान्य सामाजिक जीवन जीना चाहते हैं। इस खंड के आलेखों के शीर्षक भी इन ट्रांसजेंडर्स की व्यथाओं से भरी जीवनयात्रा को दर्शाते हैं। ‘मैं जिऊँगी’,‘मैं अधूरी नहीं’, ‘संघर्ष बहुत शेष है’, ‘अपने घरौंदे की तलाश’,‘पहचान के अँधेरों में’,‘हर दिन जीता, हर दिन मरता’, ‘ट्रांसमैन पहचान बनाएँ’, ‘हमें नर्क में न ढकेलो’, ‘खुशियाँ छोड़ दो परिवार नहीं’,‘अंधेरों से प्रकाश मिलता है’ जैसे शीर्षक अर्थपूर्ण व्यंजना प्रस्तुत करते हैं।

 

‘समसामयिक परिवेश’ पुस्तक का दूसरा खंड है जिसमें तीन अध्यायों के अंतर्गत ट्रांसजेंडर की वर्तमान स्थितियों और परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है। प्रथम अध्याय है ‘ट्रांसजेंडर मुक्ति आंदोलन’ जिसमें लेखक ने इस आंदोलन को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा है। ट्रांसजेंडर मानव सभ्यता के आरंभ से ही अपना अस्तित्व रखते आए हैं। एक समय ऐसा था जब ये सामाजिक प्रताड़ना और अपमान के डर से समाज के सामने खुलकर नहीं आते थे। परंतु धीरे-धीरे ये जागरूक हुए और इन्होंने अपने अधिकारों की मांग करना आरंभ किया। एक लंबे समय तक ये अपुष्टलिंगी ‘जेंडर नॉट कंफर्मिंग’ कहलाते थे। इन पर अनेक प्राणघातक हमले किए जाते रहे। समाज इन्हें दुत्कारता रहा और इन्हें सामान्य नागरिक जीवन से अलग ही रखा गया। सरकार भी इन्हें शारीरिक रूप से किसी काम के उपयोग का नहीं मानती थी। परंतु धीरे-धीरे अपने अधिकारों को पाने के लिए उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया, आंदोलन किया और इनके ‘ट्रांसजेंडर’ नाम को भी मान्यता प्राप्त हुई। ट्रांसजेंडर नाम, पांच रंगों का प्राइड फ्लैग, यिन-यांग प्रतीक; इन सबके साथ मानो एक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीकीकरण की प्रस्तावना ट्रांसजेंडर के लिए रखी गई। नाम, ध्वजा, सामाजिक रखरखाव; इन सब बातों ने मिलकर ट्रांसजेंडर को समाज में धीरे-धीरे स्वीकारोक्ति प्रदान की।विद्वान लेखक ने ट्रांसजेंडर मुक्ति आंदोलन में इन सभी बातों को उनका औचित्य स्पष्ट करते हुए कालक्रमानुसार दर्शाया है। दूसरा अध्याय ‘चुनौतीपूर्ण जीवन’ है जिसमें लेखक ने ट्रांसजेंडर के जीवन यापन में आने वाली समस्याओं का विस्तार से उल्लेख किया है। लेखक के शब्द हैं,“सबसे दुखद बात यह है कि ये लोग जो भी हैं या जैसे भी हैं,अपनी स्वेच्छा से नहीं हैं। वे सृष्टि की रचना का ही एक अंश हैं या फिर सृष्टि की किसी भूल का परिणाम हैं। जो भी हो, सृष्टि के इस अनोखे प्रयोग या सृष्टि की भूल का खामियाजा इन तृतीय लिंगियों को जन्म से लेकर मृत्यु तक भुगतना पड़ता है। इसके अतिरिक्त इनमें एक वर्ग ऐसे लोगों का है जिन्हें शासकों, विशेषकर मध्यकालीन शासकों ने अपने स्वार्थसिद्धि हेतु उन्हें इस रूप में परिवर्तित कर दिया। सृष्टि की भूल अथवा उसके किसी प्रयोग के तहत तृतीयलिंगीय बच्चों का जन्म सामान्य बच्चों की भाँति ही होता है। उनके पैदा होने पर खुशियाँ मनाई जाती हैं, मिठाई बाँटी जाती हैं। उन्हें परिवार की शान माना जाता है। किंतु जिस दिन परिवार में यह बात पता चलती है कि जन्मा यह बच्चा असामान्य है, डिसऑर्डर्ड जेंडर है, उसका जेंडर भ्रामक है; बस फिर क्या! घर में मायूसी छा जाती है। बड़े-बूढ़ों के वैचारिक मंथन के दौर चलते हैं। उसे सुधारने के प्रयासों की झड़ी लग जाती है। उनमें पहला प्रयास होता है बच्चे को डरा-धमका और मारपीट कर उसके अंदर बसी विपरीत आत्मा को बाहर निकालने की कोशिश करना। उसे तांत्रिकों और साधुओं के पास ले जाकर उसका उपचार करना और न जाने कितने अनोखे उपचार कराना। हारकर जब उसे किसी मनोचिकित्सक अथवा चिकित्सक के पास ले जाया जाता है तो असलियत का पता चलता है। असलियत का पता लगने के बाद बहुत कम ही परिवार ऐसे होते हैं जो चिकित्सक द्वारा जेंडर परिवर्तन के लिए आगे आए। धीरे-धीरे घर के बाहर ऐसी परिस्थितियों का निर्माण हो जाता है कि वह बच्चा घर में घुटन महसूस करता है। अधिकांश अवसरों पर वह या तो स्वयं घर छोड़ देता है या उसे घर से चले जाने को कह दिया जाता है। कभी-कभी तो घर का माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि बच्चा न चाहकर भी घर छोड़ देता है।”6 लेखक ने यहाँ ट्रांसजेंडर के जीवन में आने वाली कुल सोलह चुनौतियों और परेशानियों का विस्तार से वर्णन किया है जिनमें बच्चे की परेशानी, स्वीकार्यता, किन्नर समाज का भय, शिक्षा की समस्या, निर्वासन, नौकरी, व्यवसाय, असहयोग, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, भावात्मक संकट, वृद्धावस्था, सार्वजनिक शौचालय, एकाकीपन, गरीबी, घर की समस्या और ट्रांसवूमैन की समस्याएँ दर्शाई गईं हैं। ये वे समस्याएँ हैं जो प्रत्येक ट्रांसजेंडर को निश्चित रूप से अपने जीवन में अलग-अलग रूपों में झेलनी ही पड़ती हैं। लेखक ने विभिन्न उदाहरणों और सत्य घटनाओं के द्वारा भी अपनी बात को स्पष्ट किया है। तृतीय अध्याय ‘प्रथम अचीवर्स’ है। प्रत्येक क्षेत्र में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो कुछ नया करता है और अपने नाम कोई रिकॉर्ड स्थापित करता है। ‘प्रथम अचीवर्स’ के अंतर्गत ट्रांस जेंडर समाज में इस प्रकार के काम करने वालों की सूची दी गई है। प्रथम ट्रांसजेंडर एम.एल.ए. शबनम मौसी, किन्नर अखाड़ा के महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी,ए. रेथी, कलकी सुब्रह्मण्यम, रोजी वेंकेटेशन, पद्मिनी प्रकाश, ज्योति मंडल, निष्ठा विश्वास, गंगा कुमारी, जिया दास,इस्थर भारती जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।

 

किसी भी देश का संविधान अपने नागरिकों को समानता,सुरक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार प्रदान करता है। भारत का संविधान भी अपने नागरिकों के प्रति सदैव संवेदनशील रहा है और उनके अधिकारों की न केवल रक्षा करता है बल्कि उनके लिए नये-नये कानूनों के निर्माण द्वारा सुविधापूर्वक जीवनयापन का मार्ग भी प्रशस्त करता है। पुस्तक का तृतीय खंड ‘वैधानिक स्थिति’ है जिसमें ट्रांसजेंडर से सम्बंधित विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों, अधिनियमों और राजपत्रों का संग्रह किया गया है। प्रथम अध्याय है ‘ट्रांसजेंडर: सर्वोच्च न्यायालय निर्णय 2014’। उल्लेखनीय है द नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (नालसा) ने ट्रांसजेंडर्स की सामाजिक मान्यता के लिए एक केस दाखिल किया था जिसका निर्णय 15 अप्रैल सन् 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के माननीय जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और जस्टिस ए.के. सीकरी के द्वारा दिया गया। यह पूरा निर्णय अंग्रेजी भाषा में यथावत इस अध्याय में रखा गया है। इसी क्रम में दूसरे अध्याय ‘ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण अधिनियम 2019’ में इस अधिनियम के सोलहवीं लोकसभा के खत्म होने के बाद नई लोकसभा में पास होने का विस्तृत वर्णन किया गया है।इस बिल का विश्लेषण भी जी.पी. वर्मा यहाँ प्रस्तुत करते हैं। तीसरा और चौथा अध्याय भारत का राजपत्र 2020 और उसके संशोधित रूप पर केंद्रित है। प्रथम राजपत्र 13 जुलाई सन् 2020 और इसका संशोधित रूप 29 सितंबर सन् 2020 को प्रकाशित किया गया। लेखक ने इन राजपत्रों को यहाँ उपलब्ध करवाकर पुस्तक की उपयोगिता में अभिवृद्धि ही की है।ट्रांसजेंडर को दिए गए विभिन्न प्रकार के अधिकार, सुविधाएँ और उनके प्रति किए जाने वाले अपराधों के दंडविधान आदि का यहाँ वर्णन मिलता है।

 

समाज में ट्रांसजेंडर को लेकर जब इतना अधिक मंथन हुआ है, मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा है, विभिन्न प्रकार के आदेश, राजपत्र और शासनादेश आदि जारी किए गए हैं; तब यह बात जरूरी हो जाती है कि इसके वैचारिक आयामों को भी समझा जाए। किसी भी समाज का कोई भी अंग बिना वैचारिक गतिशीलता के अपनी समृद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। पुस्तक का चौथा खंड ‘वैचारिक आयाम’ है जिसमें उच्चस्तरीय मंथन, कुछ चुने हुए राज्यों में अब की स्थिति और सामाजिक अवरोध जैसे विषयों पर प्रकाश डाला गया है। उच्चस्तरीय मंथन में लेखक लिखता है,“सरकारी स्तर पर ट्रांसजेंडर की विविध समस्याओं का समाधान खोजने और उनके निराकरण करने हेतु दिशा-निर्देश निर्धारित करने के लिए 22 अगस्त सन् 2013 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अनेक मंत्रालयों, एनजीओ तथा अन्य विशेषज्ञों के समूह के साथ शास्त्रीभवन में एक औपचारिक बैठक आयोजित की। मंत्रालय ने इसी बैठक में एक सोलह सदस्यीय विशेषज्ञ कमेटी के गठन का आदेश निर्गत कर दिया। इन सदस्यों में विधि और न्याय मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, एड्स नियंत्रण विभाग, गैर सरकारी संस्थाओं, ट्रांसजेंडर्स के प्रतिनिधि, प्रोफेसर तथा अनेक राज्यों के प्रतिनिधि शामिल थे।”7 भारत के दस राज्यों में ट्रांसजेंडर की स्थिति और उनके लिए लागू की जा रही योजनाओं का भी यहाँ विवरण मिलता है। इसी क्रम में राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश,पंजाब,महाराष्ट्र,कर्नाटक,तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों में ट्रांसजेंडर्स को दी गईं विभिन्न सुविधाओं और अधिकारों को यहाँ क्रमबद्ध रूप से दर्शाया गया है।

 

आज ट्रांसजेंडर्स के लिए विभिन्न प्रकार के कानून और अध्यादेश आदि लागू किए जा चुके हैं,उन पर अमल भी हो रहा है। सामाजिक-साहित्यिक-शैक्षिक-राजनीतिक क्षेत्र में भी वे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं परंतु फिर भी कहीं न कहीं कुछ सामाजिक अवरोध ऐसे हैं जो उनके जीवन की सुगम राहों पर काँटे बिछा रहे हैं। कोई भी प्राणी जगत में तभी उन्नति और विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है जब उसके सामने सामाजिक परिस्थितियां अवरोध पैदा न करें।लेखक दर्शाता है कि न्यायालय के निर्देशों को अमलीजामा पहनाने का कार्य सरकार, समाज और मनोवृत्ति परिवर्तन पर आधारित है। यदि इनमें से कोई भी घटक अपने दायित्व को भली-भाँति नहीं निभाएगा, ट्रांसजेंडर जीवन को समस्याओं का सामना करना ही पड़ेगा। परिवर्तन के सम्बंध में लेखक के विचार उल्लेखनीय हैं,“वैसे प्रयास यही होना चाहिए कि लोगों की मनोवृत्ति परिवर्तन के द्वारा नियमों का सफल अनुपालन सुनिश्चित किया जाए ताकि नियमों के अनुपालन को स्थायित्व मिल सके। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि किसी विषयवस्तु के संदर्भ में लोगों की भावनाओं और उनकी वृत्तियों को बदला जा सके तो उस विषयवस्तु से सम्बंधित किन्हीं भी निर्देशों को सरलता से सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है। वह स्थाई रूप से समाज का एक अंग बन जाता है। यही बात थर्ड जेंडर के सम्बंध में न्यायालय के निर्देशों के क्रियान्वयन पर लागू होती है। जब तक सरकारी तथा गैर सरकारी प्रयासों से समाज के लोगों की थर्ड जेंडर के प्रति मनोभावनाओं को नहीं बदला जाएगा, उनका शत-प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित नहीं हो सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी तथा गैर सरकारी स्तर पर सघन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। लोगों को थर्ड जेंडर के सम्बंध में सत्यता बताई जाए और उनके मनोभावों को उनके प्रति सहज बनाने का प्रयास किया जाए।”8

 

अंतिम भाग में ट्रांसजेंडर जनगणना भी दी गई है जो वर्ष 2011 में की गई जनगणना के अनुसार है। उल्लेखनीय है कि सन् 2011 में ही ट्रांसजेंडर्स की जनगणना पहली बार की गई थी जिसमें उनके व्यवसाय, शिक्षा तथा जाति का विवरण भी सुरक्षित रखा गया। इस जनगणना के अनुसार भारत में ट्रांसजेंडर्स की कुल जनसंख्या लगभग चार लाख अट्ठासी हजार  है।

 

‘बन्द गली से आगे’ थर्ड जेंडर विमर्श पर साहित्यिक और सामाजिक, दोनों ही आयामों पर खुली आँखों से देखने का सफलतम प्रयास है। जी.पी. वर्मा पत्रकारिता की जीवंत मिसाल रहे हैं। यही कारण है कि वह समाज और इसके नागरिकों की सोच तथा इसके स्पंदनों को भली-भाँति पकड़ना और महसूस करना जानते हैं। ‘बन्द गली से आगे’ पुस्तक नयी संभावनाओं के द्वार खोलती है, वैचारिकता के नये मार्गों की ओर ले जाती है और थर्डजेंडर की जीवनरेखा को सहजक्रम भी प्रदान करती है। ‘बन्द गली से आगे’ सोच के खुले मैदानों की ओर आशा भरी दृष्टि से देखने का दिग्दर्शन करवाती है। पुस्तक के व्यवस्थित रूप में सामने आने में हलीम मुस्लिम डिग्री कॉलेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. एम फ़ीरोज़ खान का सहयोग भी उल्लेखनीय है। विकास प्रकाशन, कानपुर थर्ड जेंडर विमर्श पर जो उल्लेखनीय कृतियाँ समय-समय पर लाता रहा है, उनमें यह पुस्तक एक बहुमूल्य रत्न की भाँति सदैव पठनीय और संग्रहणीय है।

 

पुस्तक: बन्द गली से आगे

लेखक: जी. पी. वर्मा

प्रकाशक: विकास प्रकाशन, कानपुर

मूल्य: ₹575

 पृष्ठ: 208

 

संदर्भ सूची:

1.    बन्द गली से आगे, जी. पी. वर्मा, (विकास प्रकाशन,कानपुर, प्रथम सं.2021),पृ.5

2.    पृ.8

3.    पृ.71

4.    पृ.82

5.    पृ.91

6.    पृ.137

7.    पृ.193

8.    पृ.204

 

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डॉ. नितिन सेठी

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Saturday, 11 December 2021

‘बहुत कुछ है पर दिखता नहीं है कुछ भी’

- अनूप कुमार

      पिछले छह-सात दशकों की हिन्दी कविता में डा. रणजीत अपने वैचारिक तेवर और प्रयोगधर्मिता के चलते एक अलग स्थान बनाये हुए हैं। मूलतः मार्क्सवादी होने के बावजूद वे अपने आप को कभी विचारधारा के बने बनाये खाचों में फिट नहीं कर पाये। मार्क्सवादी क्रान्तियाँ निस्संदेह उनके लिए प्रेरणा का स्रोत रहीं परन्तु उन जनसंघर्षों के फलस्वरूप स्थापित हुई सर्वहारा की तानाशाहियों के साये तले पलते अन्याय और अत्याचार का भी उन्होंने अपनी कविताओं और शुरूआती दौर में लिखी गई कहानियों में जमकर विरोध किया। इस विरोध के चलते उन्हें पर्याप्त आलोचना और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का शिकार भी होना पड़ा। कुछ व्यक्तिगत कारणों से और कुछ समझ में न आने वाली बात का त्वरित विरोध करने की अपनी प्रवृत्ति के कारण वे कभी वामपंथी लेखन की राजनीति की मूलधारा में सम्मिलित नहीं रह सके। इस सब के बावजूद वे जीवन के नवें दशक में भी सक्रिय और सचेत हैं। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से वे अपने बच्चों के साथ बंगलुरू में रह रहे हैं। लेखन कार्य आयुजनित समस्याओं के चलते कुछ मन्द अवश्य हुआ है परन्तु बन्द नहीं हुआ। इधर उनका एक नया कविता संकलन प्रकाशित होकर आया है - ‘बिगड़ती हुई आबोहवा’। इस संकलन में उनकी पिछले दो दशकों की कविताएँ संकलित हैं। यद्यपि कुछ ऐसी कविताएँ भी हैं, जो पिछले संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

संकलन का आगाज़ ‘उल्टे रस्ते’ शीर्षक कविता से होता है, जिसमें रणजीत ने उदारीकरण और वैश्वीकरण जैसे आकर्षक शब्दों के पीछे की सच्चाई को छह दोहों में बयान करने की कोशिश की है। विश्व व्यापार संगठन और दूसरे तमाम अन्तर्राष्ट्रीय इदारों की भूमिका पर एक दोहा बड़ा सारगर्भित बन पड़ा है - विषम खेल है, नियम उन्हीं के, वे निर्णायक/वे ही प्रतियोगी हैं, वे ही भाग्य विधायक।

इसके अतिरिक्त ‘स्वागत में’ और ‘दो षट्पदियाँ’ भी इसी मौजूं पर लिखी गई कविताएँ हैं। ‘काला कुआँ (ब्लैक होल)’ शीर्षक कविता ब्लैक होल के वैज्ञानिक सिद्धान्त पर लिखी गई उल्लेखनीय कविता है जो अस्तित्व और अनस्तित्व की गुत्थी को समझने का प्रयास करती है - बहुत कुछ है पर दिखता नहीं है कुछ भी/वास्तव में कुछ भी नहीं है/पर निगल जाता है सब कुछ को/डुबो देता है/एक अस्तित्वहीनता के अंधे कुएँ में/ नहीं, न पानी, न पृथ्वी, न हवा/ कुछ भी तो नहीं है/ पर सारे पदार्थों को बना देता है अपदार्थ।                                           

(पृष्ठ-5)

पर्यावरण डा. रणजीत के चिन्तन का एक महत्वपूर्ण बिन्दु रहा है। उन्होंने काफी पहले पर्यावरण विषयक हिन्दी कविताओं का एक संकलन ‘खतरे के कगार तक’ भी सम्पादित किया था। पर्यावरण प्रदूषण और परमाणु युद्ध के सन्दर्भ में उनकी कविताएँ प्रभावशाली बिम्ब प्रस्तुत करती हैं। इस संकलन में भी उनकी एक कविता ‘परेशान मत करो, बच्चों!’ उनके पर्यावरण चिन्तन को प्रतिबिम्बित करती है-

मात्र मिट्टी, बालू, पत्थरों का ढूह नहीं है यह/जीवित, जागृत, जंगम है यह पृथ्वी/एक अरब जीव-प्रजातियों का/हलचल-भरा वैश्विक मधुछत्ता/यह साँस लेती है, धड़कती है/सोती है, जागती है/करूणा और क्रोध करती है।                                                                           

(पृष्ठ-20)

कुछ वर्षों पहले उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में किन्नरों की राजनैतिक सफलता ने सबको अचंभित कर दिया था। कई स्थानों पर किन्नरों ने स्थानीय निकाय के चुनावों में जीत हासिल की थी। इसके अनेक राजनैतिक निहितार्थ निकाले गए। किसी ने इसे वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था से मतदाताओं का मोहभंग बताया, तो कुछ लोगों ने दूसरे कारण बताये। ‘किन्नरों की जीत’ उसी दौर में लिखी गई कविता है, जिसमें कवि इससे अचंभित तो दिखता है, इसमें कुछ व्यवस्थागत संदेश भी देखता है परन्तु किसी परिवर्तनकामी प्रवृत्ति से नहीं जोड़ता। अंततः हुआ भी यही, धीरे-धीरे वह प्रवृत्ति समाप्त हो गई और राजनीति फिर उसी ढर्रे पर चलने लगी -

पर गोरखपुर की जनता ने/किसी स्थापित राजनीतिक दल की गोद में जाने के बजाय/एक हिजड़े की बंजर गोद पसंद की/क्या यह जनता की मसखरी थी/आशादेवी के साथ?/या मतदाता यह देखना चाहते थे देखें/हिजड़े क्या करते हैं राजनेता चुने जाने के बाद?

‘मिल्कियत’ शीर्षक कविता आरक्षण और विभिन्न कानूनों के ज़रिए सामाजिक समानता और न्याय प्राप्त करने की मृगमरीचिका और उसकी परिणति को प्रदर्शित करती है - तुम चाहे जितने कानून बनवा लो नये नये/मिल्कियत तो हमारे ही पास रहेगी/तुम प्रधान की सीट आरक्षित कर दो/औरतों के नाम/हम अपनी ठकुरानी या बहू को लड़वा देंगे/ सीट पिछड़ी जाति की हुई तो/हम अपने दूधिये को खड़ा कर देंगे/ तुम सीट अनुसूचित जाति की घोषित करो/हम अपने धोबी या नाई को लड़वा देंगे                                                          

                                                                           (पृष्ठ-6)

इस क्रम में ‘असली क्रान्ति’ शीर्षक कविता भी सामाजिक समानता और न्याय के संघर्ष तथा उसके उद्देश्य पर एक सार्थक टिप्पणी करती प्रतीत होती है -

घोड़े पर सवार एक चमार/चाबुक बरसा रहा है/घोड़े से उतार दिये गये एक ठाकुर साहब पर/सचमुच एक क्रांति आ गई है/पैदल सवार हो गये हैं/और सवार पैदल/उन्होंने अपनी जगहें बदल ली हैं/पर घोड़े और चाबुक?/ वे ज्यों के त्यों हैं/असली क्रांति तो वह होगी जिसमें/न घोड़े रहेंगे, न चाबुक/सब पैदल होंगे अपने ही पांवों पर चलते हुए।                                                           

(पृष्ठ-30)

इसी विचार बिन्दु के आस-पास घूमती कविता ‘हो सारा संसार बराबर’ भी अच्छी बन पड़ी है, जो विचार के साथ साथ शिल्प को भी साधे रखने की कवि की कुशलता को अभिव्यक्त करती है -

मालिक और मजूर बराबर/बाम्हन और चमार बराबर।/एक एक को दस दस बंगले/यह अन्याय अपार बराबर।/रोटी, कपड़ा, घर इलाज पर/सबका हो अधिकार बराबर।                                               

(पृष्ठ-70)

‘बचा रहूंगा मैं’ भी एक अदभुत कविता है जो इस विचार के इर्द गिर्द घूमती है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति किस तरह से उन तमाम लोगों की स्मृतियों में जीवित रहता है, जिन से उसका कभी न कभी कोई सम्पर्क रहा हो या उसके नाम अनाम पाठक भी उसको जीवित रखते हैं अपनी स्मृतियों में -

मैं भी रहूंगा/रहूँगा अपने बच्चों की स्मृतियों/ अपनी किताबों में/-अगर उनमें से कोई बची रही/ किसी घर, किसी पुस्तकालय में। रहूंगा अपने अनगिनत विद्यार्थियों, श्रोताओं/ सामाजिकों की स्मृति में/दूकानदारों, सब्जीवालों,/बिजली ठीक करने /वाले मिस्त्रियों /राजगीरों, बढ़इयों, घरेलू नौकरानियों, रिक्शेवालों/ और स्कूटर मैकेनिकों की स्मृतियों में/ जिन जिन से मेरा साबका पड़ा है इस जीवन में/ वनस्थली विद्यापीठ और बांदा और बीकानेर की/उन छात्र-छात्राओं की स्मृतियों में                                                                            

(पृष्ठ-47)

‘शान्ति से मरूंगा मैं’ इस संकलन की मूल्यवान कविताओं में से एक है। इस रचना में तमाम सफलताओं-असफलताओं और जय-पराजय के बावजूद जीवन को सार्थक ढंग से जीने का संतोष दिखता है - शान्ति से मरूंगा मैं/बिना किसी कष्ट के/मैंने जीवन को भरपूर जिया है/भर भर कर पिया है प्याला/और छलकाया है उसे चारों ओर/संघर्ष किया है मैंने उदग्रीव, उर्ध्वबाहु जुल्म से जबर से/यह नहीं कि सफल ही रहा हूँ/उसमें हारा भी हूँ/हुआ हूँ हताश भी अनेक बार/पर गम नहीं पाला उस हार का/टूटा नहीं हूँ कभी।

इसी रचना की अगली पंक्तियों में मृत्योपरांत अंगदान और शरीरदान के जरिए भी जीवन को सार्थक बनाने का अद्भुत उल्लास दिखता है - मेरी आँखें/अंधेरे में टटोल रहे/किसी दलित, अल्पसंख्यक/शोषित-पीड़ित स्त्री को, बच्चे को/देंगी नवजीवन का प्रकाश --/गुर्दे भी काम आ जाएँ शायद/किन्हीं जरूरतमंदों के/नष्ट नहीं करूंगा लेकिन/शेष बचे तन को भी जलाकर या दफना कर/पढ़ें इसे एक पाठ्यपुस्तक की तरह छात्र/चिकित्सा विज्ञान की प्रयोगशाला में।                                        

(पृष्ठ-47)

हर युग में साहित्य की दो समानांतर धाराएँ अस्तित्व में रही हैं। एक ओर जनपक्षधर विद्रोही धारा रही है तो दूसरी ओर दरबारी, मठवादी और सत्ता के करीब रहने वाली धारा भी समानांतर चलती रही है। दूसरी धारा कई बार सृजनात्मक रूप से कमजोर होने के बावजूद भी साहित्यिक चर्चा परिचर्चा का हिस्सा बनी रहती है, तो पहली धारा जनजीवन से जुड़कर भी साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा से दूर रहती है। ‘अशोक वाजपेयी की एक कविता सुनकर’ साहित्य और कला क्षेत्र में व्याप्त तमाम तरीके के जोड़-तोड़ और गोलबन्दी पर बेहतरीन टिप्पणी है-

      कुछ लोग जो मुझसे ज्यादा सफल हुए/ज्यादा मान्य, ज्यादा प्रसिद्ध/ज्यादा ऊँचे पदों तक पहुंचे/ज्यादा सम्मानित किये गये/नज़दीक पहुंचे कुछ ज्यादा बड़े लोगों के/ज्यादा बार छपे स्तरीय पत्रिकाओं में/ज्यादा भाषाओं में अनूदित किये गये/उन पर तरस आया आज पहली बार/विचारों से कुछ ज्यादा ही कीमत/ वसूल कर ली इन उपलब्धियों ने।  मुझसे कम ही कर पाये अपने जीवन से प्राप्त।/नहीं तो क्यों करनी पड़ती उन्हें अपने आखिरी दौर में यह प्रार्थना:/‘एक जीवन ऐसा भी दें प्रभु!/तन कर खड़े रह सकें जिसमें/बिना घुटने टेके।’                                                   

(पृष्ठ-64)

डा. रणजीत ने प्रेम कविताएँ भी लिखी हैं परन्तु उनका प्रेम-कविताएँ सामान्य प्रेम कविताओं से अलग हैं। उनकी कुुछ कविताएँ स्त्री-पुरूष के मध्य समानता पर आधारित सम्बन्धों की वकालत करती हैं तो कुछ कविताएँ दैहिक अनुभूतियों को भी एक अलग अंदाज में प्रस्तुत करती है। निस्संदेह इन कविताओं में सेक्स को लेकर भी एक अलग दृष्टिकोण है क्योंकि वह स्त्री-पुरूष सम्बन्धों का एक अनिवार्य भाग है -

जब तुम मेरे शरीर को सहलाती हो/मेरी आँखें बंद क्यों हो जाती हैं?/क्योंकि त्वचा सबसे प्राचीन इन्द्रिय है/ और आँखें सबसे बाद की/विकास के क्रम में।                             

(प्राक्जान्त्विक आस्वाद, पृष्ठ-45)

इसी प्रकार ‘तुम्हें चूम कर’, ‘परीक्षा और प्यार’ ‘दर्पण व्यक्तित्व’ ‘कभी-कभी’ ‘चूमा कर’,‘अच्छी लगती है’ और ‘प्रिये’ भी उल्लेखनीय प्रेम कविताएँ हैं।

      डा. रणजीत की कविताओं से गुजरना अनुभव और अनूभूतियों के एक अदभुत संसार से गुजरने जैसा है। जीवन के विशाल कैनवास में फैली उनकी रचनाओं में विज्ञान के अदभुत रहस्यों को जानकर उत्पन्न आश्चर्य है, तो औद्योगिक सभ्यता के द्वारा नष्ट की जा रही प्रकृति की चिन्ता भी; सामाजिक मसले हैं, तो स्त्री-पुरूष प्रेम की नितान्त व्यक्तिगत अनुभूतियाँ भी। इस काव्य-संकलन की कुछ कविताएँ नितान्त साधारण हैं और कविता कम, सपाट बयानी ज्यादा लगती हैं। कुल मिला कर ‘बिगड़ती हुई आबोहवा’ डा. रणजीत के रचना-संसार के विभिन्न आयामों को दिखाता एक पठनीय काव्य संकलन है।

- अनूप कुमार

200, नरोत्तम नगर, सिधौली, सीतापुर-261303    

 

Thursday, 18 November 2021

लेखा-जोखा


व्यंग्य परिक्रमा 2021

-    राहुल देव

 

रचनात्मक रूप से लगातार अच्छा लिखने की छटपटाहट बहुत अच्छी चीज हैं लेकिन मेरा मानना है कि यह एक जेनुइन लेखक का स्वाभाविक गुण है। खुद को बेहतर करने की प्रक्रिया कोई कौंध के रूप में नही बल्कि निरंतर चलती रहती है बहुत ही धीमी आंच की तरह। जिसकी गवाह उसकी समग्र रचनायात्रा होती है। ऐसे में लेखक या कवि को चाहिए कि बस अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए रचने का आनंद/ पीड़ा महसूस करते हुए देखे कि क्या वह अपनी रचना में वह कह सका जो वह सोचते हुए कहना चाहता था। अगर आप खुद के लिखे हुए से संतुष्ट हैं, अपने शब्दों पर अपनी भाषा पर आपको विश्वास है तो कोई बड़ी चिंता की बात नही। आज चुनौतियां निश्चित रूप से बड़ी हैं लेकिन उन्हें अपने ऊपर हावी नही होने देना चाहिए। सब छोड़ दीजिए बस स्वतंत्र रूप से रचिये। बाज़ार ने लोगों का टेस्ट बदलकर रख दिया है, लेखक/कवि भी उससे अछूते नही। हमें उसके झांसे में नही आना चाहिए। समकालीन व्यंग्य को लेकर बहुत सारी चिंताएं हैं । व्यंग्य जगत में संवाद से ज्यादा विवाद चलते रहते हैं। कविता, कहानी में इतनी उखाड़-पछाड़ देखने को नही मिलती | मुझे लगता है कि इसका एक कारण यह भी है कि व्यंग्य लेखन को लोग बहुत हल्के में लेते हैं जबकि यह अपने आपमे अत्यंत कठिन व गंभीर साहित्यिक विधा है। अलेखकों और मीडियाकरों के अंकुशहीन प्रवेश से माहौल दूषित हुआ है इन दिनों। सार्थक आलोचना के अभाव में पाठक के समक्ष भी भ्रम की स्थिति हो गयी है। बाजार की आवश्यकता और सोशल मीडिया की इसमें बड़ी भूमिका है। सार्थक और चिंतनशील रचनाशीलता को बचाना एक चुनौती है फिलहाल। हर साल की तरह इस साल भी हिंदी व्यंग्य साहित्य की तमाम किताबें इस साल प्रकाशित हुईं जिनका वार्षिक लेखा-लोखा यहाँ पाठकों के सुलभ सन्दर्भ हेतु प्रस्तुत किया जा रहा है |

व्यंग्य लेखकों में इस साल अरविन्द तिवारी और अश्विनी कुमार दुबे ने जमकर लिखा और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं | इंडिया नेटबुक्स से अरविन्द तिवारी का व्यंग्य संग्रह ‘पुरस्कार की उठावनी’ प्रकाशित हुआ जिसमे लॉकडाउन समय में लिखे गये उनके चालीस व्यंग्य शामिल हैं | साहित्य और कोविड इस संग्रह के प्रमुख व्यंग्य विषय रहे | वहीँ दूसरी ओर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से एक साफ़-सुथरे और विषयगत विविधता को समेटे हुए ‘अरविन्द तिवारी के संकलित व्यंग्य’ शीर्षक व्यंग्य संग्रह का प्रकाशन भी हुआ | अश्विनी कुमार दुबे की बात करूँ तो उनके एक के बाद एक लगातार चार व्यंग्य संग्रह आए पहला ‘इधर होना एक महापुरुष’ प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता से, दूसरा ‘माया महा ठगनी हम जानी’ शिवना प्रकाशन, सीहोर से, तीसरा ‘बरसात ने दिल तोड़ दिया’ इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल से और चौथा ‘करतब जमूरों के’ इंक पब्लिकेशन, इलाहाबाद से | इन तीनों पुस्तकों को मिला लें तो इस साल उन्होंने ढाई सौ से अधिक व्यंग्य लिखे | दुबे जी की विसंगतियों का सौन्दर्यबोध कलात्मक चिंतन की भंगिमा लिए हुए रहता है इसलिए अधिक मात्रा में लिखने के बावजूद वे अपनी व्यंग्य रचनाओं की पठनीयता बचा ले जाते हैं | उनकी रचनात्मक सक्रियता चकित करती है | हालांकि प्रकाशक उनकी पुस्तकों के मूल्य इतने अधिक रखते हैं कि वे आम पाठक की पहुँच से बाहर ही प्रतीत होती हैं |

 


अपने आपको व्यंग्य का उदण्ड विद्यार्थी कहने वाले सुनील जैन राही की दो किताबें इस साल आयीं | बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित व्यंग्य विमर्श की पुस्तक 'व्यंग्य का केवाईसी' तथा व्यंग्य संग्रह 'साहब की फुंसी' | व्यंग्य विमर्श की इस जरूरी पुस्तक में आपने लगभग सभी चर्चित विद्वानों के आलेख एक जगह संकलित कर महत्वपूर्ण कार्य किया है। होता यह है कि व्हाट्सएप व फेसबुक पर होने वाली चर्चाओं पर आने वाले विचार एक साथ किसी पुस्तक के रूप में न आ पाने के कारण उनकी भविष्य की उपादेयता समाप्त हो जाती है।  व्यंग्य में आलोचना की वैसे ही बड़ी कमी है जिसे आप की यह पुस्तक पूरा करने का विनम्र प्रयास करती है। 'साहब की फुंसी' राही जी का चौथा व्यंग्य संग्रह है | उनके इस संग्रह के व्यंग्य पढ़कर पता चलता है कि आपके भीतर नैसर्गिक व्यंग्य प्रतिभा है। आपने समय के साथ अपनी व्यंग्य शैली को बहुत विकसित कर लिया है। इस पुस्तक में शामिल आपके चुनिंदा 46 व्यंग्यलेख व्यंग्य प्रदेश में आपकी सतर्क व सशक्त उपस्थिति का परिचय देने में पूर्णता समर्थ हैं। आपने बहुत ही सरल-सहज, आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग कर अपनी वाग्विदग्धता से समकालीन सामाजिक- राजनीतिक विसंगतियों की जमकर खबर ली है। इन व्यंग्य लेखों में प्रवृत्तियों को लेकर लेखक की समझ और पक्षधरता सराहनीय है। संग्रह में बीच-बीच में आने वाले सूक्तिपरक वाक्य लेखकीय कलम की धार प्रकट करते हैं और बताते हैं कि व्यंग्यकार की पैनी नजर से बच पाना बहुत मुश्किल है।

 


बिहारी बाबू विनोद कुमार विक्की खूब सक्रिय रहने वाले व्यंग्यकार हैं | दीक्षा प्रकाशन से उनके सम्पादन में 23 व्यंग्यकारों का साझा व्यंग्य संग्रह ‘खरी-खरी’ प्रकाशित हुआ | साझा व्यंग्य संकलनों के क्रम में चक्रवर्ती व्यंग्य लेखक लालित्य ललित के सम्पादन में हम 3 हमारे 30 साझा संग्रह इसी वर्ष शाया हुआ | डॉ लालित्य ललित, हरीश कुमार सिंह के संयुक्त सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से 75 श्रेष्ठ व्यंग्यकारों की रचनाओं का संचयन ‘अब तक 75’ शीर्षक से छपा | इस साल नॉएडा के प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स ने व्यंग्य विधा की सर्वाधिक किताबें प्रकाशित कीं | अन्य प्रकाशित संकलनों की बात की जाय तो उनमे राजस्थान के सक्रिय व्यंग्य लेखक फारूख आफरीदी और कविता मुखर के सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ‘चटपटे शरारे’ शीर्षक व्यंग्य संकलन प्रकाशित हुआ | लालित्य ललित और राजेश कुमार के सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ‘इक्कीसवीं सदी के 251 अंतर्राष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार’ नामक व्यंग्य संकलन निकला |

व्यक्तिगत व्यंग्य संग्रहों की बात करें तो उनमे भावना प्रकाशन नयी दिल्ली ने लालित्य ललित का 25वाँ व्यंग्य संग्रह ‘मुर्गे बेहद खुश हैं’, रश्मि प्रकाशन लखनऊ से डॉ राकेश ऋषभ का व्यंग्य संग्रह ‘जादू की छड़ी’, राजमंगल प्रकाशन से डॉ जवाहर धीर का व्यंग्य संग्रह ‘टेढ़ी गर्दन वाला शहर’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से डॉ पिलकेंद्र अरोड़ा का व्यंग्य संग्रह ‘श्री गूगलाय नमः’,  राजपाल एंड संस नयी दिल्ली से वरिष्ठ व्यंग्यशिल्पी डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का नया व्यंग्य संग्रह ‘नेपथ्य लीला’, सर्वप्रिय प्रकाशन दिल्ली से डॉ प्रदीप उपाध्याय का व्यंग्य संग्रह ‘ये दुनिया वाले पूछेंगें’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से दीनदयाल शर्मा का संग्रह ‘एक ही उल्लू काफी है’, बोधि प्रकाशन जयपुर से जसविंदर शर्मा का नया संग्रह ‘उलझा हुआ यक्ष प्रश्न’ नाम से आया, वंश पब्लिकेशन भोपाल से राजशेखर चौबे का व्यंग्य संग्रह ‘निठल्लों का औजार’, भावना प्रकाशन नयी दिल्ली ने युवा लेखक राकेश सोहम का व्यंग्य संग्रह ‘टांग अड़ाने के मज़े’, अक्षरा पब्लिशर्स दिल्ली से वरिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज का व्यंग्य संग्रह ‘पत्नी पीड़ित संघ’, सुदर्शन सोनी का हास्य-व्यंग्य संग्रह ‘पतियों का एक्सचेंज ऑफर’, ‘बाथरूम में हाथी’ सुदर्शन वशिष्ठ का व्यंग्य संग्रह इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से, बोधि प्रकाशन जयपुर से इंदौर के वरिष्ठ व्यंग्य लेखक ब्रजेश कानूनगो का संग्रह ‘पाषाणपुष्प का किस्सा’ नाम से छपा, किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर ने वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल का व्यंग्य संग्रह ‘गांधीजी का चश्मा’ नाम से प्रकाशित किया, इनके अतिरिक्त इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से रामस्वरूप दीक्षित का व्यंग्य संग्रह ‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ही प्रभात गोस्वामी का संग्रह ‘चुगली की गुगली’, इंडिया नेटबुक्स से ही अशोक गौतम का व्यंग्य संग्रह ‘अतिथि करोनो भवः’, अद्विक पब्लिकेशन से सूरज प्रकाश का व्यंग्य संग्रह ‘डॉक्टर साहिबा के डोगिज बीमार हैं’, इंडिया नेटबुक्स से वीरेंद्र नारायण झा का व्यंग्य संग्रह ‘राईट टू गाली’, इंडिया नेटबुक्स नॉएडा से ही देवकिशन राजपुरोहित का संग्रह ‘मेरा गधा गधों का लीडर’, संस्मय प्रकाशन से लालित्य ललित के संग्रह ‘पाण्डेय जी छज्जे पर’ तथा इंक पब्लिकेशन से युवा व्यंग्यकार अलंकार रस्तोगी के व्यंग्य संग्रह ‘जूते की अभिलाषा’ आदि उल्लेखनीय रहे |



प्रकाशन के क्षेत्र में इसी साल कदम रखने वाले प्रयागराज के रुद्रादित्य प्रकाशन से वरिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज सामाजिक विसंगतियों के व्यंग्यात्मक आख्यानों की पुस्तक ‘एक था रावण’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ | वरिष्ठ व्यंग्य लेखक डॉ प्रेम जन्मेजय की व्यंग्य कहानियों का संग्रह ‘तीसरी प्रेमिका’ प्रलेक प्रकाशन मुंबई ने प्रकाशित किया, वरिष्ठ व्यंग्य लेखिका सूर्यबाला के व्यंग्य संग्रह ‘भगवान ने कहा था’ का नया संस्करण प्रभात प्रकाशन नयी दिल्ली से इसी साल प्रकाशित हुआ | लम्बे समय से लिख रहे व्यंग्यकार श्रीकांत चौधरी का व्यंग्य संग्रह ‘गिद्धों का प्रजातंत्र’ इंडिया नेटबुक्स से छपा | 5 विशिष्ट व्यंग्यकारों ज्ञान चतुर्वेदी, आलोक पुराणिक, सूर्यबाला, प्रेम जन्मेजय, हरीश नवल के साक्षात्कारों को लेकर डॉ पिलकेंद्र अरोरा के सम्पादन में वनिका पब्लिकेशन बिजनौर से ‘साक्षात व्यंग्यकार’ शीर्षक पुस्तक आयी |

व्यंग्य उपन्यासों में वर्तमान व्यंग्य के शीर्ष व्यक्तित्व डॉ ज्ञान चतुर्वेदी का छठा व्यंग्य उपन्यास ‘स्वांग’ राजमकल प्रकाशन नयी दिल्ली ने प्रकाशित किया जोकि पाठकों के मध्य अपनी विषयवस्तु, पठनीयता और समग्र व्यंग्य दृष्टि के कारण काफी सराहा गया | हिंदी कवि सम्मेलनों के यथार्थ को लेकर लिखा गया अरविन्द जी का चौथा व्यंग्य उपन्यास ‘लिफाफे में कविता’ का प्रकाशन इसी वर्ष प्रतिभा प्रतिष्ठान नयी दिल्ली से हुआ | जयपुर के लेखक डॉ अजय अनुरागी का पहला व्यंग्य उपन्यास ‘जयपुर तमाशा’ किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर से प्रकाशित हुआ | व्यंग्य लेखिका मीना अरोड़ा का हास्य-व्यंग्य उपन्यास ‘पुत्तल का पुष्पवटुक’ शब्दाहुति प्रकाशन दिल्ली से और पेनमेन इन्फोटेक गाज़ियाबाद से यशवंत कोठारी के ‘तीन लघु व्यंग्य उपन्यास’ शीर्षक से एक ही जिल्द में प्रकाशित हुआ |

गद्य व्यंग्य की तुलना में पद्य व्यंग्य के क्षेत्र में कम ही किताबें इस साल आयीं | वनिका पब्लिकेशन बिजनौर से लखनऊ के व्यंग्यकार सूर्यकुमार पाण्डेय की व्यंग्य विनोद कविताओं का संग्रह ‘खरी-मसखरी’ शीर्षक से आया | इसके अतिरिक्त मेरी नज़र में व्यंग्य कवि जयशंकर सोनोलिया का व्यंग्य काव्य संग्रह ‘झंडा-डंडा-प्रजातंत्र’ राजमंगल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ |



समग्र और आलोचना के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण किताबें प्रकाश में आयीं जिसका जिक्र करना जरुरी है | इसमे पहली पुस्तक साठोत्तरी हिंदी व्यंग्य लेखन के चर्चित हस्ताक्षर ‘प्रो. अशोक शुक्ल समग्र’ रहा जिसका सम्पादन डॉ राहुल शुक्ल ने किया है | यह समग्र संकल्प प्रकाशन कानपुर से प्रकाशित हुआ | दूसरी किताब डॉ सुरेश माहेश्वरी की ‘व्यंग्यालोचन का इतिहास’ रही जिसे विकास प्रकाशन कानपुर ने प्रकाशित किया | मेरे स्वयं के संयोजन एवं सम्पादन में इंडिया नेटबुक्स ने भी साक्षात्कार के फॉर्म में एक व्यंग्य विमर्श की पुस्तक ‘आधुनिक व्यंग्य का यथार्थ’ शीर्षक से प्रकाशित की |

‘व्यंग्य यात्रा’ के कई महत्वपूर्ण अंक तो आए ही साथ ही ‘अनवरत’ पत्रिका का व्यंग्य यात्रा के यशस्वी संपादक प्रेम जन्मेजय पर केन्द्रित विशेषांक भी निकाला | वाराणसी से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘सोच विचार’ ने भी वरिष्ठ लेखिका सूर्यबाला पर अपना अंक केन्द्रित किया | कोलकाता से प्रकाशित ‘मुक्तांचल’ त्रैमासिकी का डॉ पंकज साहा के अतिथि सम्पादन में व्यंग्य विशेषांक भी इसी साल आया जिन्हें काफी सराहा गया |

इन सभी किताबों में कुछ को पाठकों का प्यार मिला तो कुछ को पाठकों ने सिरे से खारिज़ कर दिया | कुछ पुस्तकालयीय खरीद की भेंट चढ़ गयी तो कुछ ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर धूम मचाई | कुछ मिलाकर लेखकों को यह समझ लेना चाहिए है कि सार्वजनीन लेखन के क्षेत्र में पाठक हमारा पार्टनर है। रचना में हम उससे झूठ नही बोल सकते। हमारा काम रचना में जवाब देते रहना नही होना चाहिए बल्कि हम सवाल का आईना रखते जाएं, जवाब उसे खुद खोजने दें। कला अपने सामाजिक अर्थ में यथार्थ का सामना ऐसे ही करती है। रचना जीवन को अलग अलग कोणों से देखती है, उसके भीतर झांकती है। कला कोई तत्व नही बल्कि एक दबाव है। रचना कला के उस दबाव की परिणति है। हम भाषा मे व्यंग्य का कारोबार न चलाएं जो वास्तव में व्यंग्य है ही नही। असली व्यंग्य क्या होता है यह हमारी परंपरा हमें बताती है जिसे पढ़कर, गुनकर आत्मसात कर ही समझा जा सकता है। लिखने से पहले आप सोचिये कि क्या व्यंग्य आपके लिए पैशन है। आप जिस चीज़ के बारे में पैशनेट होते हैं, उसके बारे में लगातार बातें करते रहते हैं। मेरे लिए आलोचनात्मक अर्थों में व्यंग्य के बारे में लगातार बातें करते रहना यही है। व्यंग्य की सर्वस्वीकृति के लिए साहित्यिकता और मनोरंजन की प्रवृत्ति के बीच के अंतर को समझना होगा | मेरा मानना है कि हँसने वाला व्यक्ति अपनी मौलिकता में ज्यादा गंभीर होता है | व्यवस्था की खामियों को व्यंजना में ढालकर प्रस्तुत करना ही व्यंग्य की खूबसूरती है | यह खूबसूरती आने वाले साल दर साल कायम रहेगी ऐसी उम्मीद हम इस विधा में काम करने वाले हर एक लेखक से करते हैं |

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9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर उ.प्र. 261203

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...