Thursday, 11 July 2019

कविता में वर्चस्ववाद के ख़िलाफ / चंद्रेश्वर


एक वरिष्ठ कवि का मानना है कि 'कविता कभी-कभार संभव होती है | वह स्वयं लिख जाती है | वह लिखी नहीं जाती है | यानी कविता लिखना और कवि होना एक तरह से ईश्वरीय विधान है | जबकि मेरा मानना है कि 'दुनिया रोज़ बदलती' रहती है | इस रोज़ बदलती दुनिया में समय के साथ-साथ जीवन और समाज की स्थितियाँ उनकी सच्चाइयाँ भी बदलती रहती हैं | इन सारी चीज़ों और उनके बदलावों पर अगर आपकी पैनी नज़र है तो आप उसके प्रति तटस्थ या चुप नहीं रह सकते हैं | कविता अगर समय की दबंगियत का प्रतिकार है, अगर वह कमज़ोर की ज़ुबान है तो कोई कवि कविता के संभव होने की प्रतीक्षा में भला कबतक चुप्पी साधकर बैठा रह सकता है! ये तो वो ही बात हो गयी कि किसी बड़े ज़ुल्मी या आततायी के अंत के लिए लोगबाग स्वयं संगठित होकर प्रतिकार या प्रतिरोध के बदले किसी अवतार की प्रतीक्षा करें |

इस तरह मेरे विचार से कविता में शाश्वत मूल्यों जैसी कोई बात नहीं होती है | यह बात प्रगतिशील-जनवादी लेखकों द्वारा बार -बार दुहरायी जाती रही है कि कविता अपनी समसामयिकता या तात्कालिकता में ही महत्वपूर्ण और कालजयी होती है | वह  शब्दों के ज़रिए समय के पदचाप को चिन्हित,रेखांकित या दर्ज़ करने का काम करती है | वह 'समय सहचर' या 'कालयात्री' की तरह है| वह अपने समय में होकर भी अपने अतीत और भविष्य से पूरी तरह संपृक्त होती है | 

दूसरी बात कि अपना कुनबा बढ़ता देखकर हर किसी को प्रसन्नता होती होगी | कुछ ऐसे वरिष्ठ कवि जो अपनी उम्र और लेखन की वरिष्ठता के नाते लगभग शीर्ष पर पहुँचने की स्थिति में होते हैं, वे उसी अनुपात में नयी पीढ़ी से चिढ़ने या उनकी टाँग खिंचाई में क्यों लग जाते हैं ? उनकी अनुदारता क्यों बढ़ती जाती है ?  वे अपने इर्द-गिर्द मीडियाकर चापलूसों या प्रशंसकों की ही उपस्थिति क्यों चाहते हैं ? यह शीर्ष पर पहुँचने वालों की नियति होती है या कोई अभिशाप है यह ?

क्या ऐसे शीर्ष रचनाकारों के बारे में भी नहीं कहा जा सकता है कि वे वर्चस्ववादी या सामंती संस्कारों के व्यक्ति हैं ?  क्या यह एक क़िस्म की अहमन्यता ही नहीं है ? यह ऐसे ही हुआ कि आप अपनी फ़सल खेत से खलिहान तक,खलिहान से घर तक लाने में क़ामयाब होने के बाद किसी दूसरे किसान को सफल होते हुए नहीं देखना चाहते !

क्या ऐसा नहीं है कि हर नए बदलते समय में कविता अपने लिए नया रास्ता अन्वेषित कर लेती है! कविता अपना 'फॉर्मेट' बना लेती है | कथ्य-रूप की पुरानी बहस में अगर कलावादियों की बात न करें तो लगभग यह स्थापना सर्वविदित है कि कविता में कथ्य अपना शिल्प तलाश लेता है |  आदमी जब सफ़र पर निकलता है तो राह ख़ुद -ब-ख़ुद दिखती जाती है या राह बनती जाती है | पहले से राह जानी-पहचानी हो और मंज़िल दिखती हो, कोई ज़रूरी नहीं है | पहले से किसी बने -बनाए ढाँचे में कविता लिखना एक तरह का शास्त्रीयतावाद है | अगर ऐसा ही होता तो  कविता आदिकाल से अपने रूप या शिल्प-संरचना को लेकर स्थिर या जड़ होती | मगर दुनिया में किसी भाषा में ऐसा नहीं होता है | अगर ऐसा होता तो आज भी हमारी हिन्दी में दोहा -चौपाई या कवित्त ही की शैली या संरचना में कविगण लिख रहे होते | हिन्दी में आधुनिक काल के भीतर ही देखा जाय तो भारतेन्दु युग से आज तक कविता ने शिल्प-संरचना को लेकर एक लंबी यात्रा की है | उसमें कई तरह के बदलाव दिखते हैं | शास्त्रीयतावादी इस बदलाव के प्रति हमेशा अपनी नाक-भौंहें सिकोड़ते रहते हैं | अगर महावीर प्रसाद द्विवेदी युग में ही निराला जैसी शख़्शियत कविता में नयी प्रयोगशीलता के साथ सामने नहीं आती तो हिन्दी कविता बंद दरवाज़े के भीतर दम तोड़ रही होती या तोड़ चुकी होती | पर समय-समय पर निराला जैसी शख़्शियतें अपनी-अपनी भाषाओं में कविता के लिए नए रास्ते तलाशती रहती हैं |

पुराने शिल्प को लेकर कविता में  यह प्रवृत्ति मध्यकालीन रीतिवादी कवियों में ज़्यादा दिखाई देती है | समकालीन कविता में भी ऐसी कोशिश एक तरह का रीतिवाद है| इस तरह की रीतियों या रूढ़ियों से आज की कविता को बचाए जाने की ज़रूरत है | हमारे बीच आज भी ऐसे कई कवि हैं जिनकी कविताओं में 'क्रॉफ्टिंग' पूर्व नियोजित होती है | यह भी एक क़िस्म का कलावाद ही है | इसी तरह आज कविता में छंद का अभ्यासपूर्ण प्रयास भी कविता में कथ्य की अबाध प्रस्तुति के लिए एक तरह की बाधा है |कोई वरिष्ठ कवि  यह क्यों चाहता है कि नयी पीढ़ी उनको ही फॉलो करे ! 

मेरे वरिष्ठ कवि  यह भी कहते हैं कि कविताएँ जो याद हो जाएँ,वे ही श्रेष्ठ होती हैं | मेरे लिहाज़ से आज के समय में  श्रेष्ठ कविताओं की यह कोई कसौटी नहीं है | आज छपाई की तकनीक ने हमें यह सुविधा दी है कि हम किसी कवि के काव्य- संग्रह को प्रकाशक से खरीदकर घर ला सकते हैं और उसे इच्छा हुयी तो बार -बार पढ़ सकते हैं | हम दुनिया भर के कई कवियों को पढ़ते रहते हैं, पर ज़रूरी नहीं कि उन सबको याद भी रखें | यह एक क़िस्म का ग़लत हठ है | हाँ,यह संभव है कि अपने प्रिय कवियों की कुछ कविताएँ हम कंठस्थ कर लें ,सहज -स्वाभाविक रूप से | पर इस स्मृति को लेकर हम कविता के लिए कोई मानक नहीं तय कर सकते हैं | मेरे वरिष्ठ कवि का यह कहना कि हम सच्चे काव्य प्रेमी हैं और कई कवियों की कविताओं को मौखिक सुना सकते हैं, इससे न तो कविता महत्वपूर्ण हो जाती है, न ही कविता को रचने वाला कवि | ऐसा कहना एक तरह के दंभ को ही सामने लाता है|  यह एक तरह की जुमलेबाजी है | यह मदारी की भाषा है| यह भी ज़रूरी नहीं कि कोई कविता को कंठस्थ कर उसे बेहतर समझता भी हो | इस तरह की बातों से सामान्य लोगों को भले भ्रमित किया जाए, कोई समझदार आदमी तो इस झाँसे में नहीं आ सकता है | ऐसे तो फ़िल्मी गीत ज़ल्द याद हो जाते हैं | वे संगीतात्मक भी होते हैं| मगर इससे वे स्तरीय काव्य में नहीं बदल जाते हैं | दूसरी तरफ कुछ फ़िल्मी गीत अपनी कथ्य -संवेदना की जीवंतता या मज़बूती के चलते महत्वपूर्ण या श्रेष्ठ कविता में बदल जाते हैं | मेरा यह भी मानना है कि कोई ज़रूरी नहीं कि  संगीत कविता को स्तरीय या महत्वपूर्ण बनाये | मेरी दृष्टि से कविता को प्रभावशाली बनाता है उसका कथ्य | यह बात दुहराते रहने या स्मरण रखने के लिए है | अगर कवि की बात में ही दम नहीं तो कविता प्रस्तुति के आधार पर प्रभावशाली नहीं हो सकती है| हाँ,कला-शिल्प और संरचना  के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है | इससे भाषा का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है | पर कला पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर कवि को अंततः कलावाद की तरफ़ ले जाता है | हिन्दी कवि रघुवीर सहाय यूँ ही नहीं कहते कि 'जहाँ कला ज़्यादा होगी, वहाँ कविता कम होगी|'अर्थात् सच्ची कविता की जान तो उसके कथ्य में होती है |  कविता में कथ्य -शिल्प का बेहतरीन परिपाक उसे बेशक श्रेष्ठता की ओर ले जाता है | इससे भला कौन इंकार करेगा !

अगर आप अपनी कविताओं को बढ़िया तरीके से, नाटकीय अंदाज़ में सुना सकते हैं तो यह कविता को प्रस्तुत करने की कला हो सकती है | इससे भी यह ज़रूरी नहीं कि वह एक श्रेष्ठ कविता है | अगर आवाज़ का ही जादू सर्वोपरि होता तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें /नज़्में आज उनके मरणोपरांत महत्वपूर्ण नहीं होतीं | सच्ची कविता के लिए सिर्फ़ उक्ति वैचित्र्य का होना भी मायने नहीं रखता है | मेरा अब भी यक़ीन है कि सच्ची और प्रभावशाली कविता अभिधा की सादगी में ही महत्वपूर्ण होती है |  आज अगर मंचों पर अपने समय में गले और आवाज़ को लेकर बेकल उत्साही  'पॉपुलर' थे तो उनकी छपी शायरी बेजान क्यों लगती है ? इसी तरह दूसरी ओर रफीक सादानी और अदम गोण्डवी जैसे शायर जो लोक जीवन से गहरे जुड़े थे, उनकी कविताई में लोकचेतना से जुड़े प्रभावशाली कथ्य और उसके सादगीपूर्ण कहन का जादू लंबे समय तक आगे भी बना रहेगा | इनकी कविताई लोक की पीड़ा, उसके संघर्ष को लोक की ही कलात्मक ज़ुबान में सामने रख देती है | कुछ कवि शताब्दियाँ लाँघ जाते हैं अपनी कविताई के दम पर | कुछ कवि  अपनी मृत्यु के तत्काल बाद विस्मृत होने लगते हैं | अगर  निराला या मुक्तिबोध ,नागार्जुन या धूमिल या गोरख पांडेय या  वीरेन डंगवाल या अदम गोण्डवी की कविताएँ  महत्वपूर्ण बनी हुयी हैं तो अपने कथ्य और उसमें समाहित जन की या लोक की पीड़ा अथवा अाशा-आकांक्षाओं  को लेकर ही |

कवि के लिए लोक का अनुभव विशेष मायने रखता है | अगर कवि बड़े शहर में जनजीवन की हलचलों से दूर एकाकी और सुविधाभोगी जीवन जीने का अभ्यासी है तो वह अपनी कविता में उक्ति वैचित्र्य या जुमलेबाजी  के ज़रिए ऐसी कविताएँ रचेगा जो या तो दार्शनिकता का पुट लिए होंगी या कोरी वैचारिक या स्पंदनहीन | कविता में लोकजीवन या जनजीवन से अलग-थलग कवि 'क्राफ्ट्स' पर चाहे जितनी मेहनत करे और साल में किसी एक कविता की रचना करे, पर कविता में वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है तो वह असरदार नहीं हो सकती है| लोगबाग क्यों कहते हैं कि 'घी का लड्डू टेढ़ो भला' ! अगर लड्डू  देशी शुद्ध घी का है तो ढेढ़ा होने पर भी स्वाद में बेहतरीन होगा | अगर वह घटिया डालडा या तेल का होगा तो स्वाद में कमतर हो जायेगा |  यहाँ पर घी के टेढ़े लड्डू के लिए भी लोक की स्वीकृति दिखाई देती है | यह बात कविता के कथ्य-शिल्प पर भी लागू होती है | कथ्य दमदार हो तो कविता स्वीकार की जा सकती है, पर ख़ाली शिल्प के दम पर उसका लोक के आगे टिकना कठिन है |  वैसे भी घी के लड्डू का एकदम सुंदर और गोल होना बहुत मुश्किल होता है | ऐसे ही दमदार कथ्य वाली कविता शिल्प में तोड़-फोड़ करते हुए सामने आती है | इसका मतलब यह नहीं है कि कवि को अपनी कविता में शिल्प -संरचना या कलापक्ष के प्रति लापरवाह होना चाहिए | ऐसे मेरा मानना है कि कविता में कथ्य-शिल्प दोनों का उम्दा होना एक आदर्श और समुन्नत स्थिति है |

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