औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Monday, 26 October 2015

डॉ दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’ की 5 ग़ज़लें



पांच गज़लें :
डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’
क्यों उपेक्षित हैं हमारी प्रार्थनाएं ,
देवता इस प्रश्न का उत्तर बताएँ.
आपको उनसे निराशा ही मिलेगी ,
मत तलाशें इस कदर संभावनाएँ .
लग गयी हैं स्वार्थ के झोकों से हिलने ,
सिर्फ खूंटी पर टंगी हैं आस्थाएँ .
कुछ हमारे मौन का भी अर्थ समझें ,
हो नहीं पाती मुखर कुछ भावनाएँ .
अब हमारे देश में है लोकशाही ,
आइये इस चुटकुले पर मुस्कुराएँ.
जब किया है प्यार का बेशर्त सौदा ,
फिर नफ़ा नुकसान क्या जोड़े-घटाएँ.

++++++++++

दूरियां इस कदर बड़ी मत कर ,
बीच अपने अना खड़ी मत कर .
पल दो पल को ज़रा ठहर भी जा ,
खुद को इस तरह से घड़ी मत कर .
ख्वाहिशों का सिरा नहीं कोई ,
 बेसबब ख्वाहिशें बड़ी मत कर .
तू जले और सबके सब खुश हों ,
इस तरह खुद को फुलझड़ी मत कर .
प्यार में शर्त तो गवारा है ,
शर्त को यार हथकड़ी मत कर .

++++++++ 

सूखते ज़ख्म को हरा मत कर ,
देखकर मुझको यूँ हँसा मत कर .
बेवजह मुश्किलें खड़ी होंगी ,  
फ्रेम तस्वीर से बड़ा मत कर .
जोगियों का भला ठिकाना क्या ,
मेरे बारे में कुछ पता मत कर .
एक ही चोट ने है तोड़ दिया ,
वार दिल पर यूँ बारहा मत कर .
सिर्फ महसूस कर मुहब्बत को ,
कुछ न सुन और कुछ कहा मत कर .
कुछ तो रिश्ते का भरम रहने दे ,
क़र्ज़ दिल का अभी अदा मत कर 
 
++++++++++

बताऊँ कैसे तुम्हें क्या है अपना हाल मियाँ ,
यहाँ तो जिंदगी ही बन गयी सवाल मियाँ .
बड़ा है शोर तरक्की का हर तरफ लेकिन ,
हमें नसीब नहीं अब भी रोटी-दाल मियाँ .
हमारे दौर का अहसास मर गया शायद ,
किसी भी अश्क को मिलता नहीं रुमाल मियाँ .
भरोसा करके जिन्हें रहनुमा चुना हमनें ,
हमारे हक का वही काट रहे माल मियाँ .
समझ गयी है तुम्हारा फरेब हर मछली ,
चलो समेट लो अब तुम भी अपना जाल मियाँ .
हैं कौन लोग लुटेरे हमारी खुशियों के ,
हमारे मन में भी अब उठते हैं सवाल मियाँ ..

+++++++++

ये विषय है नहीं सिर्फ उपहास का ,
कुछ तो उपचार हो युग के संत्रास का .
वृक्ष अब बाँटने लग गए धूप हैं ,
आजकल घोर संकट है विश्वास का .
मैं हूँ तपती दुपहरी का नायक मुझे ,
व्यर्थ लालच न दें अपने मधुमास का .
तृप्ति की याचना कैसे कर लूँ भला ,
मैं समर्थक रहा हूँ सदा प्यास का .
डूबने लग गई वक़्त की नब्ज़ है ,
छोड़िये सिलसिला हास-परिहास का .
आपने सिर्फ काटे मेरे पंख हैं ,
आँख में है अभी स्वप्न आकाश का .
लेखनी कवि की सोई नहीं है अभी ,
दीप अब भी बुझा है नहीं आस का .
डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’
वरिष्ठ प्रवक्ता: जवाहर नवोदय विद्यालय
ग्राम – घुघुलपुर , पोस्ट-देवरिया ,
जनपद- बलरामपुर , उ.प्र. -२७१२०१
मोबाइल-०९५५९३०४१३१
ईमेल–yogishams@yahoo.com

Wednesday, 21 October 2015

तीन कवि : तीन कविताएँ – 14


तीन कवि : तीन कविताएँ – 14 के इस अंक में प्रस्तुत हैं श्रीप्रकाश शुक्ल, आत्मारंजन और ज्ञानप्रकाश चौबे की कविताएँ :
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एक स्त्री घर से निकलते हुए / श्रीप्रकाश शुक्ल 

एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती
वह जब भी घर से निकलती है
अपने साथ घर की पूरी खतौनी लेकर निकलती है

अचानक उसे याद आता है
गैस का जलना
दरवाज़े का खुला रहना
नल का टपकना और दूध का दहकना

एक-एक कर वह पूछती है
प्रेस तो बंद कर दिया था  !
आँगन का दरवाज़ा तो लगा दिया था न !
किचेन का सीधा वाला नल बंद करना तो नहीं भूली !

अरे ! हाँ ! वो सब्ज़ी
वह मँहगी हरी पत्तियों वाली सब्ज़ी
जो अभी कल ही तो लाई थी सटटी से
प्लास्टिक से निकाल दिया था न !

हाँ, हाँ अरे सब तो ठीक है
आपको ध्यान है आलमारी लाक करना तो नहीं भूली
अभी कल की ही तो बात है महीनों को बचाए पैसे से नाक की कील ख़रीदी थी ।

इस तरह वह बार-बार याद करती और परेशान होती है
कि दूध वाले को मना करना भूल गई
कि बरतन वाली से कहना भूल गई कि उसे कल नहीं आना था
कि पड़ोसिन को बता ही देना था कि कभी कभी मेरे घर को भी झाँक लिया करतीं ।

इस तरह एक स्त्री निकलती है घर से
जैसे निकलना ही उसका होना है घर में ।


रास्ते / आत्मारंजन

डिगे भी हैं 
लड़खड़ाए भी
चोटें भी खाई कितनी ही 

पगड़ंडियां गवाह हैं 
कुदालियों, गैंतियों
खुदाई मशीनों ने नहीं 
कदमों ने ही बनाए हैं -
रास्ते !


नदी बोलेगी / ज्ञानप्रकाश चौबे 

मेरी चुप्पी
नदी की चुप्पी नहीं है
जंगलों में पेड़ों की तादाद
धूप की गर्मी से कम है
मेरे हिस्से की हवा
माँ के बुने स्वेटर की साँस से कम है

बादल छुपे हैं
यहीं कहीं सेमल के पीछे
मेरे हिस्से की धूप लेकर
फूल हँस रहे हैं
वो सब जानते हैं
ज़िन्दगी की एक-एक परत

टूटती उबासी
रेत के साथ गाते हुए
गई है अभी शहर से बाहर
सड़क से उतरकर पगडंडियों के साथ
कितनी तेज़ धूप है
और मेरी छाया उसके साथ है
जंगल की मुर्गाबियाँ
निकली हैं नदी की तलाश में
उनके पैरों के निशान
गुज़रें हैं उस पहाड़ से होकर
हवा से पता पूछते हुए

नदी की चुप्पी
मेरे अन्दर छिपी है पलकों के पीछे
बरबस मैं उसे ढूँढ़ लूँगा
जंगल के पीछे कहीं
कहूंगा झाँ
नदी खिलखिलाकर हँसेगी
पेड़ों के साथ झूमते हुए
निकल आएगी बादलो के पीछे से
धूप के साथ गलबहियाँ डाले हुए

Monday, 12 October 2015

तीन कवि : तीन कविताएँ – 13

तीन कवि : तीन कविताएँ – 13 के इस अंक में प्रस्तुत हैं सविता सिंह, सुधा उपाध्याय और रूचि बागड़देव की कविताएँ :
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सच्ची कविता के लिए / सविता सिंह 


वह जो अपने ही माँस की टोकरी
सिर पर उठाए जा रही है
और वह जो पिटने के बाद ही
खुल पाती है अन्धकार की तरफ़
एक दरवाज़े-सी
जैसे वह जो ले जाती है मेरी रातों से चुराकर
मेरे ही बिम्ब गिरती रात की तरह

सब अपनी अपनी राहों पर चलती हुर्इ
कहाँ पहुँचती हैं
किन हदों तक
कविता की किन गलियों में गुम होने
या निकलने वैसे मैदानों की तरफ़
जिधर हवा बहती है जैसी और कहीं नहीं

देखना है आज के बाद
खुद मैं कहाँ ठहरती हूँ
एक वेग-सी
छोड़ती हुर्इ सारे पड़ाव यातना और प्रेम के
किस जगह टिकती हूँ
एक पताका-सी

इतिहास कहता है
स्त्री ने नहीं लिखे
अपनी आत्मा की यात्रा के वृत्तांत
उन्हें सिर्फ़ जिया महादुख की तरह
जी कर ही अब तक घटित किया
दिन और रात का होना
तारों का सपनों में बदलना
सभ्यताओं का टिके रहना

उत्सर्ग की चटटानें बनकर
देखूँगी उन्हें जिन्होंने
उठाए अपने दुख जैसे हों वे दूसरों के
जो पिटीं ताकि खुल सके अन्धकार का रहस्य
और वे जो ले गईं मेरी रातों से उठाकर थोड़ी रात
ताकि कविता संभव कर सकें

कब और कैसे लौटती हैं अपनी देहों में
एक र्इमानदार सामना के लिए
अपनी आत्मा को कैसे शांत करती हैं वे
तड़पती रही हैं जो पवित्र स्वीकार के लिए अब तक
कि सच्ची कविता के सिवा कोर्इ दूसरी लिप्सा
विचलित न कर सकी उन्हें


चिल्लर / सुधा उपाध्याय

समेट रही हूं
लंबे अरसे से
उन बड़ी-बड़ी बातों को
जिन्हें मेरे आत्मीयजनों
ठुकरा दिया छोटा कहकर।
डाल रही हूं गुल्लक में
इसी उम्मीद से
क्या पता एक दिन
यही छोटी-छोटी बातें
बड़ा साथ दे जाए
गाहे बगाहे चोरी चुपके
उन्हें खनखनाकर तसल्ली कर लेती हूं कि
जब कोई नहीं होगा आसपास
तब यही चिल्लर काम आएंगे।


अद्भुत संगीत/ रूचि बागड़देव 


कभी सुना है आपने
एक अद्भूत संगीत?
नदी जब गाती है
तो कल-कल करता पानी
ताल मिलाता है
तट सुर मिलाते हैं
नदी खुल कर गाती है
जब अल्हड़ हो जाती है
कभी सुना है आपने
एक अद्भूत संगीत?
माँ का चूल्हा हँसता है
भरभरा कर जब
मेहमान घर आता है
कौआ मुंडेर पर अपनी टेर लगाता है
कभी सुना है आपने
घर में बजते बर्तनों का संगीत?
कितनी मीठी होती है
कटर-पटर की ध्वनियाँ
जब भाई-बहन लड़ते हैं
घर में नन्हा युद्ध भी
प्रेम का नगाड़ा हो जाता है|

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