Sunday, 21 December 2014

गणेश गनी की कवितायेँ



संसद के अहाते में नहीं उगती फसलें

आज द्वार के दोनों ओर दीये जले हैं
दीवाली खड़ी है घर की देहरी पर घूंघट उठाए
औरतों ने धो डाले
आँगन से अपने पैरों के निशान
और बिछा दी उस पर मूंज की महीन परत
सजा दी आँगन में रंगोली
लछ्मी के पैरों के चिन्ह
छापे गए दरवाजे तक .

बच्चों की चमकती आँखों
और दीयों की रोशनी में
पेट की आग बुझाने वाले
सरकारी कानून की घोषणा
साफ़ देखी जा सकती है
जर्जर चेहरों पर
इस उत्सव जैसे नज़ारे में भी
बच्चे हैरान हैं कि
उनके बीस बीघा ज़मीन से भी
कितने विशाल खेत होंगे सरकार के पास .

वे पूछते हैं पिता से
क्या फाकों में गुज़र –बसर करने वालों की
बेसुध सोयेंगी रातें भर –पेट खाकर
अब वह हलवाहा कैसे समझाए कि
संसद के अहाते में नहीं उगती फसलें ......

खेतों से रोटी तक का रास्ता
गुजरता है संसद भवन से केवल
वहीँ पर होता है फैसला
फाकामस्ती और खाऊ चक्कियों के बीच का .

वह हलवाहा कैसे समझाए कि
उनके हिस्से की रोटी के झगड़े –टंटे में
हर बार संसद भवन जीतता है
और किसान हार जाता है
वैसे बाज़ी में हार–जीत पर
अक्सर नहीं उठाए जा सकते सवाल
केवल आत्महत्या की जा सकती है आसानी से.

लालकिले के दस्तावेज़ों में
दर्ज़ नहीं हो सकतीं
भूखे बच्चों के माओं के संताप आहें
और पिता के आक्रोश का लेखा-जोखा .




पगडंडियाँ पीछे चलने लगती थीं 

सावन के बादलों ने
सर पे उठा रखा था
आकाश को सारी रात
पौ फटने से पहले बिजली ने
डाल दिये हथियार कर ली आत्महत्या
बादलों को चीरने की
नाकाम कोशिश के बाद .

उधर सूरज भोर का उजाला
लाने को था बेताब
तूफ़ान ने कई पेड़ उजाड़ दिये
पर एक कागज़ रख गया मेरे सामने
और बादल स्याही की दवात
एक शाख़ कलम और
भोर का तारा दे गया पता
उस स्त्री का
जिससे जुडी थी मेरी नाल

मैं अचम्भित था इतना
कि जैसे कच्छ के रन में
बदल गई हो नमक की परत बर्फ में
और फ़ैल गया हो ग्लेशियर
अरब सागर के तट तक
कि जैसे हिमालय
बदल रहा हो सैंड डयून में तेज़ी से

इस घटनाक्रम के बीच
यह कब बताता मैं कि
कोई हरकारे की ज़रूरत नहीं बची है
कि जल्दी पहुंचे मेरी चिट्ठी माँ तक
अब युग परिवर्तित हुआ है
हालाँकि कुछ बातें
जहाँ रखी थीं वहीँ बैठी हैं .

पिता की भूमिका में
बिच्छू का पिता होना बड़ी बात है
उसके डंक और ज़हर की तुलना में
उसके शरीर का बचा हुआ घेरा
इस बात की देता है गवाही कि
नहीं की उसने उफ्फ तक
पीठ पर बैठे बच्चे ही जब
चटकर गए धीरे –धीरे पूरी पीठ .

माँ इधर बदल गया बहुत कुछ इन दिनों
चिट्ठी ने चुना है हवाई रास्ता
धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक
पलों में पहुँचने के लिये
अब नहीं बदला करते मौसम
शहर से गाँव तक
चिट्ठी पहुँचने के दौरान
बदल जाते हैं चेहरे बेशक
मौसम बदलने से पहले ही

सांसों की ऊँची उड़ान में
रिश्तों के गर्माहट भरे गुब्बारे भी
खो गए हैं कहीं अन्तरिक्ष में
पीछे चलने वाली पगडंडियाँ
बेसुध पड़ी हैं पहाड़ की गोद में
क्योंकि पिता अब बूढ़े हो रहे हैं तेज़ी से
महीनों तक अब नहीं निकलते बाहर
मृगछौनों की धमाचौकड़ी देखना
कब का छूट गया
पर अपनी तुबुक को अब भी
चमकाते हैं कभी –कभी धूप में
और साधते हैं निशाना शून्य में .......

 
पार की धूप

इन दिनों कुछ अधिक ही
हबड़ – दबड़ कर रही है चनाब
‘रहु’ की टहनियों के गट्ठर
डुबो रखे हैं नाले के पानी में
कुछ और नर्म तथा लचीला होने के लिए
उस नाले ने अपनी तेज़ रफ़्तार से
भागना शुरू किया है
चनाब तक भी संदेशा पहुँच गया है यह
अब उसके दोनों किनारे मिलने वाले हैं
क्योंकि हो गई है आरम्भ शौर गाँव में
झूलापुल बनाने की प्रक्रिया तेज़ .

बर्फ की छाती चीर कर आई
इसी हरहराती उफनती चनाब ने ही तो
तोड़ा है झूलापुल
पुल के अस्थि-पंजर
तब से लटके अपने थूहों से
कर रहे हैं जल में अट्ठखेलियाँ
जिस मैदान जैसी समतल चट्टान पर
गूंथी जानी हैं लड़ियाँ
भीगी टहनियों से
आर-पार के नाप की
उस पर शैवाल ने
जमा दी है अपनी गृहस्थी की
एक मखमली नरम परत .

‘शौराल’ जानते हैं
नौ दिनों के बदले में
जीवन आर-पार होगा
पार जो पीली गुदगुदी धुप खिलती है
आएगी इस पार
पीठ पर लादे हरी घास के बोझे
सरसराएंगी घासनियाँ भरी दोपहर
और झींगुर छेड़ेंगे तान
जब घास काटते हुए आदिवासी औरतें
करेंगी प्रतियोगिता उस पार
‘सुगलियाँ’ गाकर .

कस्तूरी मृगों की धमाचौकड़ी के बीच
मोनाल और चकोर डालेंगे नाटी
इस पार बच्चे सांझ में
चैत की छत पर लगाएंगे मेले
इस बीच दराटियां छीलेंगी ...
घासनियों की पीठ
घास के बोझे छीलेंगे औरतों की पीठ
औरतों की पीठ की छीलन रोकने के लिए
छीली जाएगी भेड़ों की पीठ .

दादी कहती थी ...
दरिया के पार
ऊंची चट्टान पर बैठा वक़्त
जो कर रहा है इंतज़ार
उसे जल्दी है इस पार आने की
उसे मालूम हो चुका है
कि बैल उपवास पर हैं
और दीवार पर टंगा जुआ
बैलों के गले लगकर
खींचना चाहता है हल
और खेत की हथेली पर
किसान के किस्मत की लकीरें .

जिसे दादी वक़्त कहती है
दरअसल वे दादा के हाथ हैं
जो ऊन के धागे से बनी
रस्सी की बाट सुलझाने में
तकली को फुर-फुर
हवा में घुमाने में रहते हैं व्यस्त
और आँखें ...
फाट पर चरती भेड़ों पर ठहरी
वक़्त को झूले झुलाती हैं .

एक दिन पहाड़ से घुड़कते-लुढ़कते
कुछ शरारती पत्थर उतर आए नीचे
उनके चेहरे कुछ इस तरह लहके
कि धागे और श्वास की
टूटी एक साथ डोर
नीचे चट्टान की ओट में
देवदार के दो बूढ़े पेड़ बने गवाह इसके .

जब पुल बनेगा
उस पार ठहरा वक़्त आएगा इस पार
तो वह वक़्त होगा
खेतों के सुनहरी होने का
भुने भुट्टे और उबले कद्दू खाने का
कहीं बीत न जाए मौसम बेशकीमती
दादी को यह चिंता खाए जा रही है .

पुल पर चलने का हुनर
सास बता रही है नई बहू को
साथ ही बता रही है
पुल के रग-रग की कथा
पुल कहीं झूलने न लग जाए
इसलिए दबे पांव चलना है पुल पर
और यह भी कि कैसे
दबे पांव चलते हैं घर के भीतर .

आज हवा सांस रोके खड़ी है
विश्वकर्मा देख रहा है
चट्टान की मुंडेर पर
बच्चों संग बैठे हैं
नल और नील भी
वे दोनों हैरान हैं
कि सीख रहा है कैसे विश्वकर्मा
एक बूढ़े ‘शौराल’ से दस्तकारी
तीनों अचम्भित हैं
कि कैसे साठ आदिवासी बुनेंगे
पुल का ताना-बाना .

दरजों-दरारों के बीच
हैरान चींटियों का जमावड़ा
पेड़ के कोटर से
कठफोड़ों की दो जोड़ी आँखें
घने वन में थमी हुई मृग की गति
सब देख रहे हैं गौर से
चट्टान की साँसें
तेज़-तेज़ चल रही हैं आजकल
देखने की बात अब यह है
कि इस पुल को
वह बूढ़ा दस्तकार पार करता है पहले
या फिर वह पास खड़ा नन्हा बालक.
 
-

गणेश गनी



शिक्षा – एम.ए., एम.बी.ए., बी.एड, पी.जी. पत्रकारिता |
एक निजी पाठशाला मे प्रधानाचार्य । कविताएं, वसुधा, बया, वागर्थ, आकण्ठ, अकार, सेतु आदि मे प्रकाशित ।
ईमेल- gurukulngo@gmail.com

Sunday, 14 December 2014

डॉ गुणशेखर की कहानी 'स्विच ऑफ'


कहानी
स्विच ऑफ़

डॉ. गुणशेखर

पना गाँव है बिलौली खुर्द. यहीं पर मुख्य बाज़ार के बीचोबीच सन पैंसठ की लड़ाई के शहीद राम बिलास पासी का स्मारक है. इन्होंने अकेले अम्बुश लगाकर पाकिस्तान की समूची बटालियन को ऐसा तहस-नहस किया था कि पाक सेना के बड़े-बड़े शूरमाओं के छक्के छूट गए थे. आगे-पीछे चल रही उनकी दो टुकड़ियों का तो इन्होंने बिल्कुल सिरे से ही इतनी सफ़ाई से सफ़ाया कर डाला था कि उसमें से कोई ख़बर देने वाला तक नहीं बचा था.उसी लड़ाई में इनके सीने में पाँच और दाएँ पैर में घुटने के ऊपर जाँघ में एक ही ठौर पर तीन गोलियाँ ऐसी लगी थीं कि जांघ से नीचे की पूरी टांग केवल तीन इंची खाल से जुड़ी थी फिर भी इन्होंने घिसटते-घिसटते भी तिरंगे को हाथ से नहीं छोड़ा था. उसे बराबर ऊपर उठाए रखा था.इसके लिए इन्हें परमवीर चक्र भी मिला था. शहादत के बाद इनके लड़के राम अधार को भी सेना में नौकरी मिल गई थी. उन्होंने भी सन इकहत्तर की लड़ाई लड़ी थी. वे डंडा टेकते हुए यहीं आकर चबूतरे पर बैठते हैं. न जाने क्यों उन्हें शंका है कि उनके पिता के स्मारक को कोई गिरा न दे. उनकी जांबाज़ी के किस्से-कहानियाँ सुनने के लिए बच्चे भी यहाँ इकट्ठे हो जाते हैं. राम अधार को बिल्कुल पसंद नहीं कि उनके शहीद पिता के आगे जाति लिखी जाए क्योंकि किसी भी शहीद की जाति केवल देशभक्ति होती है. उनके अनुसार नाम ही पर्याप्त था. अब पत्थर पर लिखे हुए को वो मिटा तो सकते नहीं पर  पछताते अवश्य हैं. उन्हें यह सब ऊँची जाति वालों की चाल लगती है. जो भी वहां जाता है, वे हर उस व्यक्ति को अपने पिता की शहादत का प्रमाण पत्र ज़रूर दिखाते हैं जिसमें नाम के आगे पासी का तो कहीं दूर-दूर तक उल्लेख नहीं है. नाम की ज़गह बस राम बिलास लिखा है.
          लांसनायक राम अवध की इकलौती बेटी है राधा. उन्होंने उसे बड़े नाज़ों से पाला है. पिछले सावन में जबसे उनकी पत्नी चल बसी हैं, कुछ ज्यादा ही टूट गए हैं. कोई अच्छा घर-वर देखकर उसके हाथ पीले करने में ही उनका सारा ध्यान लगा है. लड़की इंटर है तो लड़का बीए होना ही चाहिए. बूढ़े हैं चल-फिर पाते नहीं तो गाँव आने वाले हर रिश्तेदार के पास बैठकर उससे योग्य वर का पता लगाते हैं. वे और मामलों में तो प्रगतिशील हैं लेकिन रोटी-बेटी के मामले में अपनी जाति से बाहर नाहीना पाते. लड़की के प्रेम विवाह पर वे  भी गाँव के मुखिया की इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि इससे कुल-खानदान की नाक कटती है. अतः ऐसा करने वाले प्रेमी युगल को बदले समाज में भले सरे आम मौत के घाट न उतारा जाए लेकिन गाँव में प्रवेश की अनुमति बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए. अपने पिता के इसी मिलिटरी रुआब और डर के मारे जाति बिरादरी से बाहर जाकर परभू से प्रेम करने वाली राधा उनके सामने धोखे से भी परभू का नाम अपनी जुबान पर आने नहीं देती.         
            चुनाव सर पर हैं.पूरा का पूरा  गाँव तरह-तरह के झंडों-डंडों  से पटा पड़ा है. निर्वाचन सूची पर जगह-जगह चर्चा चल रही है. मौके के प्रधान ने जिला हेडक्वार्टर जाकर पिछले चुनाव वाली सूची के एक चौथाई नाम काट-छाँट के बराबर करवा दिए हैं. इस बार तो लांस नायक राम अवध  का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है. जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीएम साहब के नाम अप्लिकेशन लिखने वालों की चाँदी हो गई है. ब्लाक पर जहाँ नज़र डालो वहीं जगह-जगह कुर्सी-मेज़ डाले मेढकों की तरह मुंशी ही मुंशी खटर-पटर अप्लीकेश्नें टाइप कर रहे थे. हर सड़क चौराहे पर अपने-अपने मौज़ूदा परधानों की माँ-बहनों को संबोधित करते हुए भारत के सुसंस्कृत नागरिक उसी ब्लाक की चहारदीवारी पर जहाँ-तहाँ पान का पीक उड़ेल रहे थे. रामदीन इन पचड़ों से बाहर है. उसने  उस सूची में  अभी तक अपना नाम नहीं देखा-दिखवाया है. होगा तो वोट डाल देंगे नहीं होगा तो गरमी में ऐसी-तैसी कराने कहीं नहीं जाएंगे. 
            रामदीन अपने बेटे के साथ  पिछले दो-तीन चुनावों में जांघिया बनाने के लिए खूब फटे-पुराने बैनर बटोरते आए हैं. उन्हें अपना  बेटा परभू अब भी पांच साल पहले हुए पिछले चुनाव वाला बारह चौदह साल का छोरा लगता है. वह अब ग्रेजुएट होने जा रहा है. गरीबी में पला है तो क्या हुआ ? स्वाभिमान भी तो कोई चीज़ होती है. उसके पहनावे पर अब किसी और का नहीं केवल राधा का कहा चलता है लेकिन वह अपनी माँ को भी नाखुश नहीं करता. अबकी नरगा देवता के मेले से राधा अपनी पसंद के थान से एकदम चमाचम चमकते हुए पैंट-शर्ट कटवा लाई. इन कपड़ों को परभू को सौंपते हुए उसने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था, "इन कपड़ों के अंदर बैनर वाली जाँघिया मत लटका लेना. अगर कहीं मैंने ऐसा देख लिया तो दोनों फाड़ डालूँगी." राम अवध  जिन्हें वह बड़े आदर से ताऊ कहता है वे भी उसके बाप से इसीलिए नाराज़ रहते हैं कि वह ऐनर-बैनर बटोर कर दलितों की तौहीनी करवाता  है. उनके अनुसार परभू का बाप बेमतलब सवर्णों की खुशिया थामता घूमता है.
             इस चुनाव में भी प्रभुदेवा अपने बापू को दिखाने के लिए और लड़कों से ज़्यादा खुश दिखना तो चाहता है पर लाख कोशिशों के बाद भी मन में पिछले चुनाव जैसी उमंग नहीं आ पा  रही है. उसे लगता है कि कहीं राधा न देख रही हो. आते-जाते कहीं ताऊ राम अवध  की नज़र उस पर न पड़ जाए. किशोरावस्था और तरुणाई जितना पियर प्रेशर से चलती हैं उतना माँ-बाप की इच्छा से नहीं. साथी क्या सोचेंगे ? गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड क्या कहेगा ? हर एक किशोर-किशोरी को इसी मकड़जाल में उलझे उलटे लटके हुए देखा जा सकता है. इसी लिए जो भी बैनर लगाने आता है कहने-सुनने पर परभू उसके साथ हो तो लेता है लेकिन ऊंचे-ऊंचे खंभों पर चढ़ने को पिछली बार की तरह आसानी से राज़ी नहीं होता. अबकी पहले इधर-उधर देखता है फिर खूब आदर कराता है तब चढ़ता है और उनके बैनर लगाता है. अबकी बार पहले जैसा नहीं है कि कोई खुश हुआ तो दिन भर बैनर लगवाने के मेहनताने  के रूप में पूड़ी-सब्जी खिला दी और नहीं हुआ तो कोई बात नहीं. बड़ा और समझदार होकर भी परभू अबतक वह बात नहीं भूला है कि पिछले चुनाव में एक नेता ने उसे पूड़ी-सब्जी भी खिलाई थी और शाम को चलते समय दस रुपए भी दिए थे. उस नेता का वह उदार चेहरा आज तक उसे याद है. इन स्वार्थी नेताओं के बीच परभू को वह भगवान लगता था. राधा और उस नेता के दिए दस-दस मिलाकर कुल बीस रुपयों में  उसने पहली बार नई नोटबुक और एक पतला रजिस्टर ख़रीदा था. किसी नई नोटबुक पर लिखना कितना अच्छा लगा था उसे! खैर! राधा तो उसकी अपनी है पर एक गैर नेता ने उसके साथ जो उपकार किया था उसका वह सुखद अहसास अभी तक न भूला है, न भूलेगा. परभू ने उसे हर मेले-ठेले, हाट-बाज़ार कहाँ नहीं खोजा है पर वह नेता आजतक उसे लौट के नहीं मिला. अब इन बैनरों में बिल्कुल रुचि न होते हुए भी वह जांघिए के कपड़े से ज़्यादा उस नेता को उनमें  खोजता रहता है. वह न सही  कहीं उसका फोटो ही दिख जाए. इस बरस प्लास्टिक की माया है. इस माया के चलते इन बैनरों में उसे न तो पिछले चुनाव वाला वह उदार  नेता ही  दिखाई दे रहा है और न ही जाँघिया.
                ब्राह्मण महासभा के पंडित गयादीन, राजपूत सभा के स्वयंभू अध्यक्ष शिव नंदन सिंह राजपूत, जाटव समाज के मुखिया मास्टर रामधारी और मुरारी लाल आर्य, पासवान प्रगति संघ के बनवारी पासवान, शाक्य सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शोभाराम शाक्य और पाल जाति  उत्थान समिति के प्रांतीय महामंत्री दीनानाथ पाल इसी बिलौली खुर्द में अलग-अलग झंडा गाड़े कोई क्षेत्रीय तो कोई राष्ट्रीय पार्टियों के सिपह सालार हैं. सबको अपनी-अपनी पार्टियों से गाँव में उनकी जाति की वोट के अनुपात में अच्छी-खासी रकम मिली है, लेकिन सभी अपने-अपने तर्क देकर पैसे लेने की बात को सिरे से खारिज़ करते हैं. यहाँ लांस नायक राम अवध पासी और रामदीन की राजनीतिक गलियारे में कोई पूछ नहीं है. यद्यपि रामदीन धोबी समाज का प्रमुख है फिर भी नेतागण उससे कन्नी काटते हैं. कपड़े धोने के अलावा उसे किसी और तरीके से किसी से चवन्नी नसीब नहीं हुई है. इसका कारण रामदीन नहीं बल्कि एक तो बिलौली खुर्द में धोबियों की कमी दूसरे रामदीन का नैतिकतावादी होना है. इसी नैतिकता के चलते सब नेताओं के कुरते-पाजामे धोके झक्क-सफ़ेद करने के बावजूद पिछले चुनावों में उसका बेटा परभू और वह खुद मैली कुचैली जांघियों  में सारे गाँव में फिरकी-से नाचते रहे हैं. औरतों में सिर्फ़ जमना दाई ही मर्दों के साथ मैदान में दिखती हैं. लोग बताते हैं कि जमना दाई को भी मोटी रकम मिली है पर वे कसमें खाती हैं कि, "अगर, मैंने किसी का भी एक धेला भी अपने हाथ से छुआ हो तो इसी तरह सात जन्मों तक बिधवा और निपूती रहूं. "जमना दाई की इस बात पर चुटकी लेते हुए हाथी के साथी सकटू, कमल के दीनानाथ मिसिर, साइकिल के सोहन लाल यादव , झाडू के झवेरी लाल और पंजे के प्रज्ञान पांडे आदि सारे के सारे पुरुष एकमत हैं. वे सबके सब अन्य बातों में बिल्कुल अलग मत रखते हुए भी दाई के बारे में एक सुर से कहते हैं, "चोर,छिनार,जुआरी. इनसे गंगउ मैय्या हारी." इन सबकी इस टिप्पणी पर जमनादाई का दो टूक जवाब रहता है कि, "औरत को आगे आते देख इन मर्दों के पेट में मरोड़ उठने लगती है. छिनार होंगी इनकी अम्मा और चोर होंगे इनके बाप. राम कसम, अबकी अगर इन सबन को धूल न चटाई तो मैं जमना दाई नहीं."
          इस बार परभू अपने बापू रामदीन से थोड़ा कटा-कटा सा रहता है नहीं तो बाप-पूत दोनों साथ-साथ बैनर के ही जुगाड़ में नाचते मिलते .अपनी ओर से तो रामदीन ने अपने बेटे को अकेले इसी काम पर लगाया हुआ है और खुद भी  बराबर चलता रहता है.इस कार्यालय से उस कार्यालय,उस कार्यालय से इस कार्यालय.ऐसा लगता है कि जैसे उसके पाँव हांड़-मांस के हों ही न.उन  पांवों में लोहे के  पहिए लगे हों.शाम को बाप-बेटे हिसाब भी लगाते हैं कि पूरे चुनाव में किस पार्टी के कितने बैनर लगेंगे.कितने तीन बाई दस के होंगे और कितने दो बाई पांच के या फिर बीस बाई तीस जैसे बड़े .परभू के बहुत जोर डालने पर रामदीन ने नेताओं के सामने पहली बार बैनर लगाने के लिए पैसे की डिमांड रखी थी.इस अप्रत्याशित माँग से पहले तो नेताओं की नाक-भौं सिमटी-सिकुड़ी लेकिन जब परभू अपनी मांग पर अडिग रहा तो कसमसाकर ही सही पर बात माननी पड़ी .अंततः छोटे-बड़े हर बैनर की लगवाई दस रुपए फिक्स हुई.इस तरह से अबकी ये इसलिए विशेष खुश हैं कि बैनर का कपड़ा मिले चाहे न मिले प्रति बैनर के हिसाब से लगवाई तो ले ही  रहे हैं.पर,पुरानी आदत के मुताबिक़ सब जोड़ घटाके बार-बार वे इसी अनुमान  पर अटक जाते हैं कि कितने बैनर कपड़ों के होंगे और कितने प्लास्टिक के  यानि फ्लेक्सी बैनर.प्लास्टिक  की जन्घियाँ  तो बन नहीं सकतीं.इसी से इस बार इन दोनों की आपसी चर्चा में सबसे बड़ा मलाल भी  इसी बात का रहता है कि  ज़्यादातर पार्टियों के बैनर-पोस्टर प्लास्टिक के ही क्यों हैं?
                   बिलौली खुर्द का  पड़ोसी गाँव है साईँ खेड़ा .यहाँ  भी खूब चहल-पहल है.इस बार के चुनाव में पूरे गाँव की छतों पर साइकिलें  ही साइकिलें  लहरा रही हैं. कहते हैं कोई सौ साल पहले यह गोसाईं खेड़ा था.इस गाँव के एक युवक ने किसी मुसलमान लड़की से शादी क्या कर ली गाँव की किस्मत ही पलट गई. पहले तो केवल व्यक्ति का धर्म परिवर्तन होता था. जगत गोसाईं काण्ड से तो गाँव का भी हो गया था.धर्म परिवर्तन के साथ उसका नाम भी  बदल कर गोसाईं खेड़ा से साईँ खेड़ा हो गया था. ये गोसाईं लोग गेरुए वस्त्र पहनते थे.इनमें से कुछ संन्यासी थे तो कुछ गृहस्थ लेकिन वस्त्र सभी गेरुए ही पहनते थे .दल के दल दूर-दूर तक जाते-आते थे.पुरखे लोग बताते हैं, 'ये सब लँगोटी के पक्के होते थे. 'इसी लिए सभी कौमों में आदर-सम्मान की नज़र से देखे जाते थे. अपने गाँव बिलौली खुर्द और साईँ खेड़ा दोनों से कोई बीस कोस दूर नाक की सीध धुर पच्छिम में मोहान रोड पर  एक गाँव है रंगरेज़न पुरवा. उसी गाँव में एक रंगरेजन रहती थी.उसका नाम था नूर बानो. बुजुर्गों के अनुसार जैसा नाम वैसा रूप.क्या नूर था उसके चहरे पर.वह देसी  रंगरेजन क्या बिल्कुल बिलायती अंग्रेज़न थी. गाल कश्मीरी सेब-से एकदम लाल-सुर्ख.देह इतनी नाज़ुक कि कहीं भी दूब भी छुआ दो तो खून छलक आए. वह जैसे सूरत से बला की खूबसूरत थी वैसी ही सीरत की भी.जगत गोसाईं तो अपने साथियों के द्वारा चुटकी लिए जाने पर उनसे उसके बारे में बस इतना ही कह पाते थे, "का सरबरि तेहिं देउ मयंकूचाँद कलंकी वह निकलंकू."
          इलाके भर में नूरबानो  कपड़ों की रँगाई के काम में बहुत मशहूर थी.ये गोसाईं उसी से कपड़े रंगवाते थे.जब ये लोग जाते तो वह मस्तमौला रँगरेज़न इनसे कबीर का वह पद ज़रूर सुनाने के लिए कहती जो जोगियों के लिए बहुत चर्चित था,'मन न रंगायो ,रंगायो जोगी कपड़ा.' इन गोसाइयों में जगत गोसाईं का कंठ सबसे मधुर था.कपड़ा रंगाते-रंगाते जगत उससे अपना मन भी कब रँगा बैठे यह उन्हें होश ही न रहा.एक दिन दोनों लापता हो गए.जगत के  सारे के सारे नादान साथी  गोसाईं उसी गाँव में महीनों गोल-गोल घूमते और यह कहते हुए अपने साथी को ढूँढ़ते रहे कि रंगरेजिन कामरूप की मायावी स्त्री है. उसने उनके साथी को तोता बनाके पिंजड़े में बंद कर लिया है.दिन भर तोता बना के रखती है और रात में उसे इंसान बनाके अपने पास सुलाती है.अपने इसी अंध विश्वास के आधार पर उन्होंने गाँव में धरना तक दे दिया था .उधर रंगरेजिन के गाँव वालों ने जगत गोसाईं पर आरोप लगाया था कि  वे उसे ले उड़े हैं.जगत की यह बात केवल दो गाँवों तक ही सीमित न रही. वह सारे जगत में फैल गई. अब यह बात दो जनों या गाँवों की ही नहीं दो धर्मों की भी हो गई थी.धरने पर बैठे गोसाइयों को भी शंका की नज़रों से देखा जाने लगा था.शुक्रवार की शाम की नमाज़ में रंगरेज़न पुरवा की मस्ज़िद में कुछ ज़्यादा ही भीड़ दिखी.गोसाइयों को डर लगा.उन्होंने हवा का रुख जल्दी ही भांप लिया और उसे  उलटा बहते देख अँधेरे का लाभ उठाते हुए झोरी-झंडी समेटी और चलते बने.मुसलमानों की इस चहलकदमी से हिन्दुओं में भी हरकत बढ़ी.बजरंग दल ,हिन्दू सेना और आर एस एस वालों तक जब यह बात पहुँची तो सुबह की शाखा के बाद बैठक हुई.बैठक में विचार किया गया कि रंग्रेज़न  पुरवा  पूरा का पूरा मुसलामानों का गाँव है.वे तादाद में बिलौली खुर्द और गोसाईं खेड़ा दोनों से ज्यादा भी हैं.अपने पड़ोसी मियाँ पुरवा में उनकी ब्याहाधरी भी है.बीस कोस की दूरी आज के साधनों के ज़माने में कोई दूरी नहीं होती.किसी भी साधनसे वे अपनी लड़की को ढूँढ़ने के बहाने आकर और मियाँ पुरवा को मिलाकर रात-बिरात हिंदुओं पर आक्रमण कर सकते हैं.सुबह शाखा के बहाने लाठियाँ इकट्ठी हुईं.दूसरे कस्बों की शाखाओं से भी लोग आए.कहने के लिए बिलौली खुर्द में कुस्ती और लाठी चालन के कौशलों की प्रतियोगिताएँ हुईं लेकिन  मियाँ पुरवा के मुसलमानों को साफ़ लग रहा था कि यह कोई सामान्य प्रतियोगिता नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन है और यह सिर्फ़ उनके लिए ही किया गया है.
         पहले बात धर्म पर अटकी. दंगे तक की नौबत आ गई. मियाँ पुरवा, गोसाईं खेड़ा और बिलौली खुर्द इन तीनों गावों के सरकारी स्कूलों पर महीनोंपीएसी और आर ए एफ पड़ी रही. बच्चों की  पढ़ाई चौपट हो गई लेकिन मास्टरों की  बन आई.उन्होंने जमकर खेती-किसानी की. सूद खोरी और व्यापार से उठाए लाभ से चाँदी काटी.किसी तरह वह मामला शांत पड़ा तो उसके बाद  बात जाति पर आके टिक गई.जाति-बिरादरी वालों ने कहा कि जितने गोसाईं वहाँ जाते थे सबने उस मुसलमानिन  का छुआ खाया-पिया है.सबका धर्म भ्रष्ट हो गया है.पहले सब खाना दें तब गाँव  में प्रवेश करें.बिलौली खुर्द के मुखिया की ओर से बाज़ार में डुग्गी पिट गई कि अगर जात-बिरादरी को बिना खाना दिए जगत और उनके साथी कानी चिड़िया को भी गोसाईं खेड़ा में दिखे तो पूरे गाँव की लोटिया बंद कर दी  जाएगी.साल-दो साल वे गाँव  में दिखे भी नहीं.लेकिन इस  दौरान यहाँ के  गाँव-गाँव में जगत गोसाईं और रंगरेजिन के  प्यार के किस्से लैला-मजनूँ के किस्सों की तरह जन-जन की जुबान पर चढ़ चुके थे.एक तबके का तो यह मानना था कि ये दोनों राजा भरथरी और उनकी रानी के अवतार हैं.उन्हीं सबके मुखारबिंद  से फूटी किंबदंती के अनुसार महाराज भर्तृहरि जब जोगी बनके घर से निकलने लगे तो रानी उनके पैरों पर पड़ गई और कहने लगी कि, ' महाराज! पहले मैं जानती थी कि पुरुष की तरह स्त्री भी एक से अधिक से प्रेम कर सकती है.लेकिन अभी मेरा भ्रम दूर हो गया है.मुझे माफ़ कर दें राजन!' इस तरह एक युग तक बिना कुछ खाए-पिए वह पैरों में पड़ी रही तब जाके महाराज ने उसे माफ़ी देते हुए कहा था कि ,'कलयुग में एक गाँव ऐसा होगा जहाँ जोगी ही जोगी होंगे वहीं मैं अपने योगियों के साथ अवतार लूँगा और तुम वहाँ से बीस कोस दूर के एक गाँव में रंगरेजिन होगी.तुम्हारा यह प्रेमी वहाँ तुम्हारा पति होगा. यहाँ जैसे तुमने मुझे धोखा दिया है वैसे ही  वहाँ भी अपने इस प्रेमी यानी तबके पति रूपी रंगरेज़  को धोखा दोगी और तब मैं तुम्हें लेकर भाग जाऊँगा.इस तरह मैं अपना संन्यास त्याग दूँगा और  तुम भी  अपने पाप  से मुक्त हो जाओगी. '  यह बात और है कि पड़ोसी गाँव के हिंदुओं का ही इन योगियों  से चिढ़ने वाला एक तबका और था जिसने उस गाँव  को म्लेच्छों का गाँव सिद्ध करके उससे हर प्रकार के रिश्ते काटने के लिए समाज को उकसाना जारी रखा था.उनका लालच यही था कि जब ये लोग तंग आकर गाँव छोड़कर भाग जाएँगे तो उनकी जमीनें  हथिया लेंगे.इनकी युक्ति काम आई.परिणामतःवह गाँव हिदुओं के लिए वर्ज्य-सा  हो गया था.इस तरह उस गाँव ने  न केवल अपने  भीतर के जगत को खोया बल्कि बाहरी जगत से भी खुद को  खो लिया था.इसमें उनकी क्या गलती थी न तो यह किसी और ने उन्हें बताया और न उन्होंने ही उसकी तह में जाकर  पड़ताल की और लंबे अंतराल तक समाज से अपनाए जाने की चाह में अलग-थलग पड़े रहकर भी किसी और धरम की शरण में नहीं गए.
           धीरे-धीरे गोसाईं खेड़ा गाँव की ऎसी बदनामी  फैली या फैलाई गई कि यहाँ गाय कटती है.यहाँ चोरी-चोरी नमाज़ पढ़ी जाती है आदि ,आदि .इससे उनके शादी-ब्याह रुकने लगे. उनके रिश्तेदारों पर भी सामाजिक बहिष्कार के संकट के बादल गहराने  लगे. आखिर कब तक जवान लड़के-लड़कियाँ कुआँरे बैठाए रखे जा सकते थे.एक दिन तंग आकर जब  पूरे गाँव ने इस्लाम स्वीकार कर लिया तब पूरे देश में हाहाकार मच गया. हिन्दू धर्म के बड़े-बड़े नेता उनके पास आए. सनातन धर्म की खूब दुहाइयाँ दी गईं.किसी को अपना नाम न बताने की शर्त पर इन्हीं गोसाइयों में से कुछ लोग यह भी बताते हैं कि स्वामी अग्निवेश, सिंघल और बाबा राम दास ने आर्य समाजी तरीके से इन्हें सन नब्बे  के आस-पास हिदू बना भी लिया था. गाँव के पूरब पड़ी ग्राम समाज की ज़मीन पर जगत गोसाईँ और रंगरेज़न का मंदिर भी बना. इन दोनों की मूर्तियों की बगल में साईँ बाबा की भी मूर्ति लगी. कुल मिलाकर गोसाईँ और साईँ का ऐसा मिश्रण किया गया गया कि इस मंदिर का न हिंदू विरोध कर पाए न मुसलमान. वे गोसाईं से साईँ फिर साईँ से गोसाईं  बने और मंदिर में पूजा-अर्चना भी करने लगे.आस-पास के गाँवों की लड़कियाँ वर पाने की अभिलाषा में नूर बानो रंगरेजन  और जगत गोसाईं का व्रत रहने लगीं और हर सोमवार नियमित जल चढ़ाने आने लगीं. इनमें पूर्व सैनिक राम अवध की बेटी राधा भी थी. राधा तो मन ही मन परभू को जगत गोसाईं का अवतार ही मानने लगी थी. वह जगत गोसाईं की मूर्ति और परभू की मूरत में मन ही मन साम्य भी बैठाने लगी थी.
       

हिन्दू बनने पर जब कोई मुसलमान यहाँ के गोसाइयों को अपनी  लड़की देने को तैयार नहीं हुआ तो इनकी आँखों के आगे अँधियारी छा गई. तथाकथित कुलीन ब्राह्मणों ने तो जगत गोसाईं के समय से ही अघोषित तौर पर इनके यहाँ अपनी बहिन-बेटी न देने का संकल्प ले ही रखा था अब अकुलीन भी बड़के कुलीन बनने  लगे थे लेकिन जिनके यहाँ कुल नीचा होने के कारण शादी के लिए कोई ब्राह्मण नहीं आता था
, उन्होंने इन पर एक उदारता ज़रूर दिखाई थी कि इन्हें ब्राह्मण माना था और इनकी लड़कियाँ स्वीकारते थे. पर, अंदर-अंदर उन अकुलीन ब्राह्मणों  ने  भी अपने को मान्य बताते हुए किसी भी कीमत पर अपनी बहन-बेटी को उस गाँव में न देने के पक्ष में संकल्प ले रखा था. ब्राह्मणों के अलावा अन्य जाति के हिन्दुओं ने भी जब इन्हें खुलकर नहीं अपनाया तो ये बेचैन हो उठे. आखिरकार तंग आकर 'पुनर्मूषको भव' की तर्ज़ पर फिर से इस्लाम की शरण में चले गए. कुछ दिनों तक तीर-तलवारों के साथ तनातनी चली उसके बाद सब सामान्य हो गया. जब किसी  तरह धर्म से पिंड छूटा तो पार्टियाँ गले पड़ गईं. जबसे दलों के दलदल में इस गाँव के पाँव पड़े हैं तबसे यह अभिशापित साईँ खेड़ा और भी बदहाल हो गया है. गाँव तक पहुँचने के लिए सही रास्ता तक नहीं है. कार तक नहीं जा सकती. चुनाव के वक्त सभी दलों के नेता आते हैं. कोई हाथी पर बैठकर आता है तो कोई साइकिल पर हाल-चाल लेते हैं और चले जाते हैं. यहाँ तक पहुँचते न पहुँचते किसी की साइकिल पंचर हो जाती है तो किसी का कमल-सा खिला चेहरा ही  मुरझा जाता है.बिलौली खुर्द की तरह इस गाँव में भी देशी शराब का ठेका तो खुल गया है लेकिन अस्पताल अब भी नहीं है. कुछ युवाओं ने यहाँ रवीश या अभिज्ञान जैसे पत्रकार को लाने की सोची तो किसी ने तरुण तेजपाल को. कोई अन्ना को लाने की सोचता रहा तो कोई अरविन्द को.साफ़-सुथरे लोग मनाने गए तो भी अन्ना ने राजनीति में आने से साफ़ मना कर दिया. तरुण तेजपाल जेल चले गए और केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए सो समय ही नहीं रहा उनके पास. रहे अभिज्ञान और रवीश वे भी अपने-अपने शो में लग गए. इन सबके अलावा भी मेधापाटकर जैसी कइयों हस्तियों को लाने की योजनाएं तो खूब बनीं लेकिन सब टांय-टांय फिस्स हो गईं.अब तो सड़क के किनारे औंधे पड़े ट्रक के फटे हुए टायर की तरह मुंह बाए पड़े साईँ खेड़ा का  कोई पुरसाहाल पूछने वाला नहीं है. गाँव वाले भी पूरी तरह से भरी  सड़क पर बिखरे पड़े फटे पैकेटों से असहाय झाँकते सामान की तरह  निराश-हताश  हैं.उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे यहाँ के विकास पर किसी ने झाडू ही फेर दी हो. चुनावों के दौरान प्रत्याशी चुनाव सभा क्षेत्र को स्वर्ग बनाने के वादे  करते हैं. बात-बात पर मिलने को दौड़ आते हैं.धोखे से भी नंबर लग जाए तो काटकर अपनी ओर से बात करते हैं और कहते हैं कि, "हमें अच्छा नहीं लगता है कि क्षेत्र की जनता का पैसा टूटे." और,जैसे वोट पड़ जाती है वही नेता कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सबकुछ भूल जाते हैं. यही नहीं चुनाव के बाद तो हारे-जीते हर नेता का फोन स्विच ऑफ़ ही रहता है.

              रामदीन के पुरखे गोसाईं खेड़ा भी कमाते थे.लेकिन जगत गोसाईं के समय पर लगे प्रतिबंध के चलते उनसे एकबार छूटा तो फिर इनके हाथ नहीं आया.अभी चुनाव के दौरान रामदीन और परभू दोनों साईँ खेड़ा फिर से  आने-जाने लगे हैं.नेता तो वहाँ भी सफ़ेद कपड़े ही पहनते हैं.धूल-धक्कड़ में खूब दौड़ते-भागते भी  हैं.इससे वे  खूब गंदे भी होते है.लेकिन वहाँ तो इकबाल मुहम्मद के चलते रामदीन की दाल ही नहीं गलती.रामदीन को लगता है कि कम से कम हिन्दू नेता तो उसे अपने कपड़े धोने को देंगे ही. इसी आशा से वह बार-बार साईँ खेड़े  के चक्कर लगाता है.जिनसे भी वह कपड़े माँगता है वे यही बताते हैं कि उनके कपड़े लखनऊ के अमीनाबाद की मशहूर पेरिस लांड्री से धुलके आते हैं जबकि सच्चाई यह है कि उन सबके कपड़े इकबाल ही धोता है.केवल बहिन जी के छुटभैया नेता उसे एकाध जोड़ी कुर्ता-पायजामा जब-तब दे देते हैं.रामदीन को अच्छी तरह पता है कि उससे इकबाल के वोट ज्यादा हैं.उसके अकेले अपने ही घर के सत्तर वोट हैं.इसलिए सारे नेता चाहे हिदू हों या मुसलमान सके सब  उसी की ओर झुकते हैं. रामदीन को इसी बात से चिढ़ होती है कि  जो नेता हिंदू-मुस्लिम,अगड़े-पिछड़े और ऊँच-नीच के नाम पर जनता को बहला-फुसलाकर बाँटते हैं,वे ही  मौके-मौके पर रंग बदलते रहते हैं.लोगों को लड़ाते हैं  और वोट लेते हैं.जो पहले रामदीन को भैया-भैया करते हैं वही काम निकलने के बाद उसे लात मार कर अवसरवादी बनकर इकबाल को काम देते हैं और अपने पुराने भैया रामदीन को ठेंगा  दिखा देते हैं .यह नहीं कि उनके लिए जैसे इकबाल वैसे रामदीन  मान कर कुछ कपड़े उसकी ओर भी बढ़ा दें.इस सच्चाई को रामदीन भी अच्छी तरह जानता है कि कपड़े धोना और प्रेस करना छोटा-मोटा  काम है.बड़े नेताओं को तो  बस धुले कपड़े चाहिए.उनको इससे कोई लेना-देना नहीं कि उनके कपड़े कौन धोता है .न जाने क्यों फिर भी उसे लगता है कि बड़ों को छोटों का दर्द  समझना चाहिए .
आज जब उनकी गर्ज़ है अगर अब भी उन्हें हमारी जरूरतों का अहसास नहीं होगा तो कल जब वे एसी में बैठकर कब्ज़ के मारे भर्र-भर्र अपानवायु छोड़ते हुए प्राणहारी कानून बनाएंगे तब हमारा होश उन्हें कहाँ से रहेगा. वह हर बार सोचता है कि अमुक गद्दार है, झूठा है, मक्कार है, एक नंबर का स्वार्थी है इसे कत्तई वोट नहीं देंगे  फिर भी न जाने क्यों वोट डालते समय उसकी मति मारी जाती है और जिसको लाख बार न कहता है, अंततः उसी  पर मुहर मार के घर आ जाता है. उसके पड़ोसी अपने वोट बेचते हैं. महीनों दावतों में मुर्ग मुसल्लम उड़ाते हैं. ड्रमों बीयर, विदेशी वाइन और देशी ठर्रा पी  जाते हैं. कभी हज़ार,कभी दो हज़ार लहराते हुए घर लाते हैं. लेकिन रामदीन को कभी लालच नहीं आता. वह कमा के खाना पसंद करता है. हराम का नहीं. वह चाहे तो अन्य दलों से पैसे लेकर भी अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकता है. उसके गाँव के ही बहुत सारे लोग ऐसा करते भी हैं लेकिन वह ऐसा कभी नहीं करता. वह मानता है कि यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपमान है.पढ़ा-लिखा भले ही नहीं है लेकिन बड़ी अच्छी भाषा में वोट बेचने वालों को धिक्कारता है. पता चलने पर ऐसों को सामने से साफ़-साफ़ गरियाता है कि, "लोकतंत्र के दुश्मन ! वोट बेचने से अच्छा है कि जा अपनी अम्मा को किसी कोठे पर बिठा के पैसे कमा ले. "सिर्फ़ वोटर को  ही नहीं एक बार एक बाहुबली प्रत्याशी (मौज़ूदा विधायक) को भी उसने यह कहते हुए फटकारा था कि, " तुम जो पायल हमारी बेटी को पहना रहे हो क्या कभी अपनी बहिन ,बेटी या अम्मा को इतने प्यार से पहनाया है?" लोग बताते हैं कि उस समय उस विधायक का मुँह सूख गया था. उसके चमचे तुरंत पानी लेके आए थे. उसके एक आध चेले तो रामदीन को ठिकाने भी लगाना चाहते थे लेकिन विधायक ने ही यह कह कर  रोक दिया था कि, "होश में रहो होश में. अब बाहुबल का समय लद गया. अब समय है विवेक-बल का. अव्वल तो ऐसा कर नहीं पाओगे और अगर ऐसा करने में सफल भी हो गए तो बड़ी बदनामी हो जाएगी और उसके चलते  दो वोट नहीं मिलेंगे. हम सब जेल में सड़ेंगे ऊपर से."
            इधर कुछ दिनों से अपने नाम को लेकर परभू डरा-डरा -सा रहता है कि कहीं कोई उसका उलटा-सीधा नाम न पुकार दे .वैसे तो विद्यालय में उसका नाम प्रभुदेवा ही लिखा है.वहाँ के दो-एक घमंडी सवर्ण शिक्षकों को छोड़ सभी उसे इसी नाम से बड़े प्यार से बुलाते हैं  लेकिन गाँव-घर वाले उसे परभू ही कहते आ रहे हैं.अगर राधा के आगे कोई उसका नाम न बिगाड़े तो फिर और कहीं का उसे ज़रा भी बुरा नहीं लगता. उसके बापू का नाम बिगाड़ना तो उसे राधा के सामने भी बुरा नहीं लगता.कभी-कभी तो उसका पिता  रामदीन उसे परभुआ-परभुआ करके चिल्लाते हुए सारे  गाँव में  खोजता घूमता  है. जब कहीं ढूँढे नहीं मिलता है तो भाषा भी बदल देता है और भाव भी तथा और भी कठोर होकर कहता है, 'ओ परभुआ! हरामी सारे मरि गए का. अबकी जौ कहूँ ताश ख्यालति मिलि गएउ तउ डंडा डारि कइ उल्टा लटकउब.'  
        रामदीन को लगता है कि परभू अबकी बैनरों में ज़्यादा रुचि नहीं ले रहा है.सही भी है. परभू अब रामदीन से ज़्यादा राम अवध का हो गया है और अपनी अम्मा से भी ज़्यादा राधा का. रामदीन को भी समझना चाहिए कि अब उसका उतना आज्ञाकारी नहीं रह गया है परभू. उसकी राधा को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि उसका सुंदर-मुंदर प्रेमी बंदर-बिलार-सा खंभे-खंभे बिलंगता फिरे. अब से कुछेक महीनों पहले जब वह गाँव में कभी बैनर की जाँघिया पहन के निकलता था  तो राधा की सहेलियाँ जोर-जोर से उसे लल्लू कहके चिढ़ाती थीं .लोगों को लगता था  कि परभू को चिढ़ाया जा रहा है लेकिन राधा जानती थी  कि किसी परभू को  लल्लू कहकर नहीं चिढ़ाया जा रहा है बल्कि  केवल उसी को चिढ़ाया जा रहा है,जिसका मतलब था कि राधा का परभू लल्लू है.यही सत्य भी है.इसीलिए अबकी पहले से ही उसने परभू को  अल्टीमेटम दे दिया है.उसने एक दिन एकांत में परभू को बुलाकर साफ़-साफ़ कह दिया है ,'तुम्हें दो में से एक का चुनाव करना है बैनर की जांघिया या राधा .' बच्चू की जांघिया का नाड़ा उसी दिन से ढीला हुआ पड़ा है.बाप की सुनें तो राधा हाथ से जाए और राधा की मानें तो बाप की लातें खाएँ.इसी बात पर परभू का किशोर मन हिचकोले खाता रहता है.इन दिनों वह बाप से डर के  तो भागा-भागा घूमता ही है ,अपनी प्रिया राधा से भी कम डरा-डरा नहीं रहता.          
            इस चुनाव में भीतरी मन से परभू को  इस बात की बड़ी खुशी है कि किसी भी प्रत्याशी ने अपने बैनरों में कपड़े का इस्तेमाल नहीं किया है.रामदीन  किसी को कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं था कि आप कपड़े का ही इस्तेमाल करें .वह कहता भी तो गरीब की सुनता ही कौन है? गरीब और स्त्री को तो कान-आँख के इस्तेमाल की पूरी छूट है पर मुँह की नहीं.इसीलिए उसने देखा-सुना तो सब पर चुप रहना ही उचित समझा.प्लास्टिक के बैनरों के चलते अबकी रामदीन भले दुखी थे लेकिन परभू  निश्चिन्त था  कि चलो बैनर की जाँघियों से तो पिंड छूटा. इसी ख़ुशी में मगन स्याह निशा के प्रथम प्रहर में ही वह अपनी निशाभिसारिका राधा से अभिसार में रत था कि बापू की कर्कश आवाज़ उसके कानों में पड़ी.रात में बापू के द्वारा चिल्लाते हुए खोजे जाने के कारण वह बहुत डर गया.उसे लगा हो न हो कहीं  कोई कपड़े का बैनर भी लग गया हो.उसे पता है कि जहाँ भी लगा होगा पहले उसका बाप रामदीन उसे वहाँ तक बाँह पकडे-पकड़े ले जाएगा फिर निगरानी करने का निर्देश देगा.इसके बाद वोटिंग पड़ने के अगले दिन उसे भोर में ही उतार लेने की हिदायत के साथ किसी और बैनर की तलाश में दूसरे गाँव निकल जाएगा .रामदीन को यह भी अच्छी तरह पता है कि इन दिनों उसका बेटा इन बैनरों की जाँघियों को अपने घर के अलावा कहीं और पहन के नहीं जाता और न ही उसे अपने पिता (रामदीन) का ही इन बैनरों से बनी जांघिया पहन के कहीं जाना अच्छा लगता है. यह सब पता होने के बावजूद रामदीन बैनरों के पीछे बावला हुआ पड़ा  है. प्लास्टिक के बैनरों की भरमार देखकर लगता है इस बरस उसका बावलापन उतर जाएगा.इसी  से इस साल वह प्लास्टिक के खिलाफ़ आन्दोलन चलाने की सोच रहा है. हर प्रत्याशी से प्लास्टिक की कमियाँ बताता है. वह

प्लास्टिक को कलयुग का भस्मासुर बताकर उनसे उसके प्रयोग को रोकने की अपील भी करता है लेकिन सबके सब यह कहके पल्ला झाड़ लेते हैं कि अगली बार  देखेंगे अबकी तो उनके बैनर  पहले ही छपवाए जा चुके हैं.
            'परभुआ, परभुआ' की बाप की आवाज़ कान में पड़ते ही परभू राधा के घर के पीछे वाली अँधेरी गली में जल्दी-जल्दी में  चूमाचाटी अधबीच छोड़-छाड़ पिछवाड़े की तरफ भाग खड़ा हुआ. जोर लगाकर बाँह छुड़ाते हुए परभू को 'बड़े डरपोक हो 'कहकर राधा खिलखिलाई भी थी लेकिन वह तो बस वहाँ से निकलने की फिराक़ में था. लंबे-लंबे  डग भरके वह जल्दी से घर पहुँच कर पिता को चकमा देने में कामयाब हो गया था. रामदीन क्रोध में भरे  नाग की तरह फनफनाता हुआ घर पहुँचा तो उसे घर पर पाके थोड़ा ठंडा पड़ गया फिर भी पूछा ज़रूर कि,"कहाँ थे ?"परभू को उसके  बापू कहीं मार न बैठें इस डर से माँ फ़ौरन बाहर आ गई. बोलने लगी ,"इसने गलती की है तो डांट-फटकार लो यह सब कुछ तो ठीक है पर आज तीज-त्योहार के दिन हाथ न उठाना. अगर हाथ उठाया तो मुझसे बुरा कोई न होगा, समझे !"
           क्रोध के मारे  रामदीन ने अपने नंगे पाँव ज़मीन पर पटकते हुए कहा ,"तुम तो इसे शुरू से बिगाड़ती आ रही हो. मैं इसे मारने के लिए नहीं ढूँढ़ रहा था.नेताओं से बैनरों का हिसाब करने के लिए खोज रहा था.इससे कहो कि सभी नेताओं को फोन लगाकर कहे कि हमारे भी मुँह-पेट है कि नहीं .हमें भुगतान करें ,बस .हम और कुछ नहीं जानते ." रामदीन के मुँह से फूटे इन्सुरों से माँ और बेटे दोनों ने एक साथ लंबी साँस ली .परभू सब नेताओं को बारी-बारी से फोन लगाने लगा.आँगन  में चारपाई पर बैठे-बैठे फोन लगाता देख रामदीन ने चिल्लाकर कहा , " हुवां से का घंटा लागी ?जब टावरु पकरी तब न.हियाँ आवउ कोनेम पकरी ." परभू ने कोने में आकर लगाना चालू किया तो किसी एक को फोन लग गया .उसने पूछा ,"कौन?''तो इधर से जवाब गया,"प्रभु देवा." उधर से फिर नया सवाल  आया ,"हैलो!कौन,डांसर?" इधर से ,"नहीं."के उत्तर के साथ उधर का फोन स्विच ऑफ़ बताने लगा.उसके बाद उसने जिस भी नेता को फोन लगाया सबके सब यही बक रहे थे कि ,"आप जिस उपभोक्ता को फोन लगा रहे हैं उससे संपर्क नहीं हो पा रहा है.उपभोक्ता का मोबाइल या तो स्विच ऑफ़ है या कवरेज़ एरिया से बाहर है."घंटों वह फोन में ही लगा रहा.कोई परिणाम मिलता न देख थक कर वह चारपाई पर लेट गया.रामदीन भी देहरी पर खड़े-खड़े-कान लगाए सब सुन रहा था.निराश और उद्विग्न हो,"गरज निकल जाने पर सभी के फोन स्विच ऑफ़ हो जाते हैं. ऐसे ही करते रहे तो जल्दी ही  तुम भी स्विच ऑफ़ हो जाओगे मादर..."कहते बड़बड़ाते मतलबी नेताओं को गालियाँ बकते हुए घर से बाहर निकल गया.
            बाहर-भीतर  हर तरफ़ गज़ब की गर्मी की गर्मी थी.कहीं पत्ती तक नहीं हिल रही थी.परभू को पसीना-पसीना  देख माँ ने चारपाई के पास आकर अपने आँचल से उसके माथे का पसीना पोंछा .खुद के बुने पंखे से खूब हवा की.जब उसे नींद आने लगी तो माँ उठकर रोटी सेंकने चली गई.थोड़ी ही देर में परभू को  गहरी नींद आ गई थी .उसने सपना देखा कि वह और राधा किसी दूर शहर में भाग गए हैं .टीवी पर ख़बर आ रही है जिसमें उसकी माँ खूब रो रही है और कह रही है कि," लौट आओ बेटा !मैं और तुम्हारे बापू तुम दोनों को कुछ नहीं कहेंगे .गाँव वालों से छिपाकर तुम्हें अपने करेजे में रख लेंगे.पहले भी नौ महीने रखा नहीं है क्या?"
          थोड़ी देर बाद माँ को सुनाई पड़ा कि उसका बेटा कुछ बड़बड़ा रहा है.जब तक वह दौड़ के पास आई परभू हड़बड़ा के उठ बैठा था .माँ को पाके वह लिपटकर फूट-फूट के रोने लगा था पर कह नहीं पा  रहा था कि उसका वह सपना टूट गया था जिसे माँ-बापू मान भी जाएंगे तो उसका निर्दयी गाँव   कभी सच होने ही नहीं देगा.उसे भी दो में से एक रास्ता चुनना है पहला या तो जगत गोसाईं और नूर बानो की तरह अपना दर यानी गाँव-घर  छोड़े या दूसरा यह कि राधा का  सपना ही छोड़ दे.
          राधा को मिले एक हफ़्ता हो गया है.परभू ने भी उड़ते-उड़ते सुना है कि उसकी शादी तय हो रही है.शायद इसी विषय पर बात करने के लिए वह तीन दिनों से परभू को मिलने के लिए मेसेज पर मेसेज कर रही है.छोटे भाई को भी बराबर उसके पास भेज रही है लेकिन न तो अब तक परभू उसके पास खुद चलकर आया है और न ही उसका कोई संदेश.परभू को यह चुनाव करना कठिन हो रहा है कि माँ के पास रहे या राधा को लेकर शहर निकल  ले. राधा ने छोटे भाई के हाथ में दस रुपए का नोट और एक छोटी-सी पर्ची रखते हुए लाला हरदयाल के यहाँ से कुछ लेकर खा लेने के बाद परभू के पास इस अंतिम सन्देश के साथ जाने को कहा कि," आज के बाद मैं कोई फैसला करने लायक नहीं रहूँगी.आज ही हमारे लिए पक्की की जा चुकी ससुराल से देखने के लिए लोग आ रहे हैं ." राधा का भाई इतने बड़े इनाम से आज बहुत खुश था.इसलिए वह पहले काम को अंजाम देकर ही इनाम लेना चाहता था. फटाफट परभू के पास पहुँच गया.पहुँचते ही वह पर्ची परभू को थमा दी और उसके मुंह की ओर ताकने लगा.पहले तो परभू  राधा के भाई को यह कहकर टालता रहा कि चलो हम अभी पांच मिनट में आते हैं लेकिन बला टलती न देख उसने उसी के सामने यह सन्देश लिखा कि, ''अभी तुम जीवन के ऐसे मोड़ पर हो जहाँ बोल्ड स्टेप लेने की ज़रूरत है. अभी पढ़ो. घरवालों को शादी के लिए साफ़ मना कर दो और उनसे  बोल्डली कह दो कि पहले हम अपने पैरों पर खड़ी होंगी तब शादी की सोचेंगी."
          राधा का भाई घर लौट गया. लौटते हुए उसने आइसक्रीम ली और चटखारे ले-लेकर खाते हुए आकर बहन से मेसेज मिलने की बात भी पक्की की लेकिन उस नादान को राधा के किशोर दिल के उस दर्द का क्या पता जो मेसेज के बाद से वह लगातार परभू से बात करने की नाकाम कोशिश से पा  रही थी. जिसने एक कोमल ह्रदय किशोरी को बोल्ड स्टेप लेने का संदेश भेजा था उसी परभू का मोबाइल लगातार स्विच ऑफ़ बता रहा था.                                              

पता-
प्रोफ़ेसर (हिंदी),
इंडियन स्टडीज़ विभाग,
गुआंगदोंग भाषा विश्वविद्यालय ,
बायून दादाओबेई,गान्ग्ज़ाऊ,चीन

पेंटिंग- विज्ञानव्रत

Sunday, 7 December 2014

वंदना गुप्ता की कहानी 'वो होती तो'

यूँ तो मूलत: कविता का निर्झर ही बहता रहा मगर लगता अब भी कुछ बाकी है जो कहना है और जब ये बेचैनी जब चरम को पहुंची तो कहानियाँ खुद-ब-खुद आकार लेने लगीं ।
कहानी लेखन सिर्फ़ कहानी लिखने के लिए नहीं करती बल्कि समाज में फ़ैली विसंगति पर प्रहार कर सकूँ , गलत और सही का फ़र्क दिखा सकूँ और बदलाव की बयार बहा सकूँ सिर्फ़ इतनी कामना है । कोई सिर्फ़ प्रसिद्धि के शिखर को छूना मेरा मकसद  नहीं बस आम पाठक के मन की गिरहों को खोलना ही मेरा कहानी लेखन का मकसद है ।
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कहानी

 वो होती तो....
वंदना गुप्ता

स्त्री, शब्द ही काफी है खुद को व्यक्त करने को, पीड़ा और सहनशीलता की मिसाल सामने आ जाती है और हम ढूंढने लगते हैं उसमे असीम सम्भावनाएं बिना जाने वो क्या चाहती है ? उसकी चाहतों से परे एक देश सिमटा होता है उसके जीवन के आँगन में, हाँ, उसका देश जो उसके घर से शुरू होता है, रिश्तों के सम्बन्ध बनते हैं जिसकी सीमाएं और जिसे संजोने को वो एक कर्मठ सैनिक की भांति चारों दिशाओं पर निगाह रखते हुए अपने कर्तव्य को अंजाम देती है और खुद की आहुति देती रहती है फिर चाहे कितनी ही वर्षा हो, ताप हो या शीत हो क्योंकि यही तो स्त्री की सम्पूर्ण पहचान मानी गयी है फिर कहाँ कौन सी कमी रही गयी जो ये तीन शब्द मेरी ज़िन्दगी पर ग्रहण बन कर बैठ गए और मैं ताउम्र उस ग्रहण की कालिख से मुक्त नहीं हो पायी जबकि सुना है ग्रहण तो सिर्फ कुछ समय के लिए हुआ करता है मगर मेरी ज़िन्दगी में तो उम्र भर ही ठहरा रहा, आखिर क्यों, सोचते सोचते सरला अपने विगत में पहुँच गयी.........

देश में चारों तरफ इक आग फैली हुयी थी, बंटवारे ने जाने क्या - क्या बाँट दिया था सिर्फ धर्म ही नहीं खून भी बँट चुका था। सारे देश में त्राहि-त्राहि मची थी। कहीं कोई खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता था और उसमे औरतें और बच्चियों पर तो जैसे एक गाज़ ही गिर पड़ी थी इसलिए सब अपनी बहन बेटियों की हिफाज़त में लगे होते थे।  ये वो ही वक्त था जब मैंने छठी कक्षा अच्छे नंबरों से पास की थी। पढ़ने लिखने में शुरू से ही बेहद होशियार थी। बेशक गाँव में रहती थी मगर तब भी पढाई करने दी गयी थी ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी मगर तभी दंगों की इस आग ने सारे देश को अपने आगोश में लपेट लिया था और उन्ही दिनों जब दिल्ली में रहने वाले एक सरकारी कर्मचारी के रिश्ते की आमद हुयी। मेरे स्कूल की टीचर ने मेरे भाई को बहुत समझाया कि अभी जल्दी मत करो सिर्फ एक साल रुक जाओ मैं इसे एक साल में दो क्लास की पढाई करा दूँगी और ये आठवीं पास हो जायेगी मगर मेरे भाई नहीं माने क्योंकि एक तरफ देश में फैला बवाल और दूसरी तरफ एक अच्छा रिश्ता वो हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे फिर चाहे वो लड़का विधुर ही क्यों न हो और उसके अपनी पहली पत्नी से एक बच्चा ही क्यों ना हो, सबकी अनदेखी कर दी गयी। बस ब्याह करना जरूरी था, सो कर दिया गया मेरी उम्र से नौ साल बड़े से।  

मैं, जिसे उसकी माँ ने यही सीख दी थी कि पति ही परमेश्वर होता है , पति की इच्छा ही औरत का जीवन होती है और मेरी कच्ची उम्र , दुनियादारी से अनजान , सिर्फ पंद्रह वर्ष की उम्र में क्या जान सकती थी क्या होती है शादी और उसका महत्त्व ? जैसी शिक्षा मिली उसे ही सही माना और उसका ही अनुसरण किया ता - उम्र। 

ब्याह के बाद जो मिला सब पहली की उतरन स्वरुप ही मिला यहाँ तक कि उसके गहने , कपडे और पति सब।  कोई लाड चाव नहीं हुआ आखिर क्यों होता मैं दूसरी जो थी।  बेशक भरा पूरा परिवार था , बेशक मेरे पति के तीन भाई और दो बहनें और थे मगर सबके लिए मैं कोई नयी नवेली दुल्हन नहीं थी बल्कि उनकी पत्नी थी जिसका पहले भी ब्याह हो चुका था मगर मैं तो इन बातों से भी अंजान थी जिसने जो कहा , जैसा कहा बस करती गयी।  ससुराल में कैसे रहा जाता है नहीं जानती थी बस इतना पता था कि सब मुझसे बड़े हैं और मुझे उन सबसे पहले उठना है और घर का सारा काम करना है और मैं इसी तरह जीवन यापन करने लगी।  किसी के मन चढ़ी या नहीं कभी सोचा ही नहीं बस ये करना मेरा धर्म है यही सोच काम करती रहती।

जब काफी दिन हो गए तब मैंने उनसे पूछा
आपका बेटा कहाँ है ?
उसे उसकी नानी के पास छोड़ा हुआ है । यहाँ तो कोई था नहीं जो उसकी देखभाल करता इसलिए वहीं पल बढ रहा है ।
आपको उसकी याद तो आती होगी न
हाँ मगर क्या करूँ सारा दिन तो ऑफ़िस में गुजरता है यहाँ इतना छोटा बच्चा कैसे रहता ।
मैं चाहती हूँ कि उसे यहाँ ले आऊँ । अब तो मैं आ गयी हूँ ।
सुन तुम्हारे चेहरे पर उतरी हल्की सी मुस्कान और तसल्ली ने मेरा हौसला बढा दिया समझ गयी कि चाहते तो तुम भी हो मगर कह नही पाये अब तक ।

तब एक दिन मैं उन लोगों से मिलने गयी और देखा वहाँ उनके बेटे का बुरा हाल था, ठीक से देखभाल नहीं की जाती थी वहाँ जो मुझसे देखा नहीं गया और मैं उन सबके मना करने पर भी जिद करके उसे अपने साथ ले आयी।  

उस लड़के को अपने बच्चे की तरह प्यार देता देख घर के लोग मन ही मन कुढ़ने लगे क्योंकि उस ज़माने में कौन पहली पत्नी के बच्चे को इतना प्यार देती थी और ऐसे में मैंने संसार की रीत से अलग कुछ किया तो कैसे किसी के गले से नीचे उतरता आखिर औरत जात ठहरीं और उस पर अनपढ़ कहाँ समझ पातीं कि बच्चे तो बच्चे होते हैं फिर किसी के भी हों मगर मेरे लिए तो वो जैसे मेरा ही बेटा था , क्या हुआ जो जन्म नहीं दिया मगर यशोदा बन कर उसे पाल रही थी मगर घरवालों को चैन कहाँ आता है।


दो साल का मासूम था जब उसे अपने साथ ले आयी थी उसके लिए तो मैं ही उसकी माँ थी उसे क्या पता दूसरी माँ क्या होती है । कोई भी काम होता मेरे आगे पीछे डोलता , मुझसे कहता और मेरी ही सुनता । इस तरह वो बडा होने लगा । अपनी हर बात हर दुख तकलीफ़ मुझसे कहता मगर साथ साथ थोडा बहुत समझता कि कौन सी बात माँ नहीं मानेगी और कैसे मनवानी है क्योंकि घर का माहौल ऐसा था कि यदि किसी बात को मना करती जो उसके लिए उचित न होती तो सासु माँ और अन्य लोग ताना उलाहना देते कि ‘दूसरी है न इसलिए मना कर दिया आज बेचारे की अपनी माँ होती तो क्या मना करती’ तो ये बातें उसके मन में बैठने लगीं और समझने लगा कि कैसे बात मनवानी है फिर चाहे मैं उसकी सेहत आदि को देखकर ही कुछ खाने पीने को कभी कभार बीमारी में मना कर देती मगर घरवाले वो ही काम जबरदस्ती करवाते और ये बात उसके अबोध मन में घर करने लगी बिना ये सच जाने कि जब एक माँ को बच्चे को प्यार करने का हक़ है तो उसकी गलती पर उसे डाँटने का भी अधिकार होता है ताकि उसे अच्छी शिक्षा मिल सके और वो एक अच्छा इंसान बन सके मगर ये बात उन्हें कहाँ अच्छी लगती , जब भी वो जरा सा कुछ गलत करता और मैं यदि डाँट भी देती तो मेरे पति से एक की चार लगाकर शिकायत कर दी जाती ।
देख रामलाल आज श्याम ने कुल्फ़ी खानी चाही और सरला ने मना कर दिया अब बच्चा किसे कहे अपनी माँ से न कहे तो और जब जिद करने लगा तो उसे मारने को दौडी बेटा मुझे बूढी से तो ये सब नहीं देखा जाता । छोरा अनाथ की तरह पल रहा है ।
गुस्से से आग बबूला होते तुम बोल उठे , बडा प्यार जता रही थी लाने के लिए , क्या यही प्यार है तेरा ? इससे तो अच्छा वहीं पलता बढता कम से कम मेरा बेटा तो चैन से रहता मन का खाता पीता ।
इस तरह हमेशा बिना मेरी सुने जब वो सबके सामने मुझे बुरा भला कहते तो सब बहुत खुश होते।एक दोगले संसार मे फँसी थी मैं मगर अभी तक पति की शायद विश्वासपात्र नहीं बनी थी तभी तो वो और सबकी बात का विश्वास कर लेते मगर मेरी ही नहीं।  

इस बीच मेरे भी एक बेटी हो गयी थी और मैं नहीं चाहती थी कि अब और कोई बच्चा हो क्योंकि मेरी सोच यही थी कि एक बेटा और एक बेटी हो गए अब और क्या चाहिए। मेरे जीवन की बगिया में ये दो फूल खिले रहे बस।  दोनों बच्चों में चार साल का महज अंतर था। 

अपनी बेटी से ज्यादा लाड प्यार करती, उसे राजकुमार सा बना कर रखती मानो मेरे जीवन का ही अंश हो क्योंकि जब पति को अपना लिया , उसे चाह लिया तो उसकी हर चीज़ मेरी ही तो हुयी फिर कैसा परायापन । कभी ख्वाबो ख्याल में भी नहीं आता परायेपन का अहसास । यशोदा सी अपने कृष्ण को पाल पोसकर बडा कर रही थी । इस बीच ईश्वर की देन ही कह सकती हूँ दो और बेटियों को जन्म दिया वरना मेरे लिए तो मेरे दो बच्चे ही काफ़ी थे ।

जब श्याम बडा होने लगा थोडा बहुत समझने लगा तो जेठानियाँ ननदें सब ताने उलाहनों में बात करतीं , उसके सामने उसकी पहली माँ के बारे में बात करतीं  - “वो होती तो कैसा राजकुमार सा रखती, कितने लाड चाव करती बेचारा दूसरी माँ की छाँव में है जैसा चाहे व्यवहार करे हम कौन होते हैं कुछ कहने वाले” और वो सुनता सब कुछ और मैं चाहकर भी कुछ न बोल पाती , बडों की इज़्ज़त करने के सिवा और कुछ सीखा ही नहीं था, कभी उनके आगे बोलती ही नहीं थी वैसे भी पन्द्रह साल की उम्र होती ही क्या है जो कोई दुनियादारी सीख सके तब तक तो बचपन भी पूरी तरह अलविदा कहकर नहीं गया होता, ऐसे में ब्याह की आग में जिसे झोंक दिया गया हो उसकी सोच उसके विचार कितने परिपक्व हो सकते हैं, उसे तो जो भी आईना दिखाया जायेगा वो ही उसका सत्य होगा, जिस पानी की धार पर चलने को कहा जायेगा चलता जायेगा फिर पाँव के नीचे जमीन हो या नहीं , वो डूबे या तरे किसी को क्या फ़र्क पडता है । भरा पूरा परिवार, दिल्ली जैसे शहर में रहना ही गाँव वालों की सोच को कुंठित कर देता है , उसके आगे सोचने की ज़हमत कौन उठाना चाहता है तो फिर मैं तो गुड्डे गुडियों के खेल का जैसे एक मोहरा बन ब्याह दी गयी थी फिर कैसे दुनियादारी के पके हुए आँवे की ताप को महसूस कर सकती थी ।

मुझे आज भी याद है वो दिन जब घर का गुजारा बहुत मुश्किल से चला करता था इसलिए मैं घर में ही सिलाई कढाई और बुनाई के काम करती थी ताकि कुछ बचत हो सके और बच्चों का भविष्य सुधर सके थोडा बहुत पैसा हाथ में आता तो बच्चों पर ही खर्च किया करती थी ऐसे ही एक बार श्याम के जन्मदिन पर मै नया कपडा बाज़ार से लेकर आयी और घर में बनाया और जब उसे पहनाया तो सारे घर में दिखाता फ़िरा सबकोदेखो, माँ ने कितनी सुन्दर कमीज़ बनायी हैऔर फिर एक दिन मेरी छोटी बेटी ने वो कमीज़ शौक में पहन ली तो उसी पर घरवालों ने श्याम के कान भरने शुरु कर दिए, “देखा श्याम बडा कह रहा था माँ ने कमीज़ बनायी है वो तो सिर्फ़ दिखावे को थी वास्तव में तो छोटी के लिए बनायी थी देख कैसे पहने डोल रही है अब क्या तू उसकी उतरन पहनेगा ? आज तेरी माँ होती तो ऐसा करती क्या ?”
माँ जी ऐसी बातें श्याम के आगे मत कहिए बच्चा है जाने क्या बात उसके मन में बैठ जाए अभी कच्ची उम्र है जब मैने हिम्मत कर कहा तो बोलीं
ये दिखावा हमारे आगे मत किया कर सरला हम सब जानती हैं तेरे मन में क्या है बस अपने पति को रिझाने को जो चाहे उसके आगे ढकोसला कर मगर हमें पता है तू कितना चाहती है और कितना नहीं श्याम को माँ जी मैं कैसे यकीन दिलाऊँ आप सबको कि श्याम मेरे लिए मेरा बेटा है कोई पराया नहीं

बस बस रहने दे …… देखा है तेरा प्यार, कैसे एक मिनट मे पलट गया जहाँ अपनी बेटी की बात आयी अरे हमने दुनिया देखी है और ये नौटंकी भी, कैसे खसम को अंटे में करने के लिए दोगला चेहरा लगाए घूमती हैं तेरी जैसी औरतें, जब कैकेयी जैसी त्रेता में राम जैसे पुत्र को वो प्यार नहीं दे सकी तो तुझ जैसी से कोई क्या उम्मीद कर सकता है ।
और मैं कभी श्याम के चेहरे को और कभी सासु माँ और बाकी सबको देखती रह गयी बिना किसी गुनाह के गुनाहगार बना दी गयी।

श्याम गुमसुम सा कुछ कुछ समझने की कोशिश करने लगा ऐसी जाने कितनी ही घटनायें उसके मासूम मन पर दूसरी माँ की छाप छोडने लगीं जिन्हें मैं चाह कर भी नहीं निकाल पा रही थी फिर चाहे उसके लिए कितना भी कुछ करती हर बात में कोई कोई कमी निकालना और दूसरी माँ का ताना उसके आगे देना उनका परम धर्म था जिसमें उसकी मासूमियत खोने लगी थी।

श्याम बचपन के उस मुहाने पर था जिसे जिस रंग में ढाल दो उसी में ढल सकता था , जैसा चाहे आकार दिया जा सकता था, एक नाज़ुक उम्र का दौर जहाँ जो सामने दिखता है वो ही उनका सत्य होता है, अभी सोच की ग्रंथि इतनी परिपक्व नहीं होती कि सही गलत को समझ सके और उसके अनुसार फ़ैसले ले सके । ऐसे में उसके आगे उसकी पहली माँ की बातें उसके मन में उथल पुथल मचाने लगी थीं वो समझ नहीं पा रहा था कि कौन क्या कह रहा है , क्या सच है क्या झूठ उसके लिए तो बस मैं ही उसकी माँ थी लेकिन उसका गुमसुम रहना मेरी छटी इंद्रिय को सचेत कर रहा था कि कहीं कुछ गडबड है, इस मासूम के मन पर कोई गलत छाप बैठे उससे पहले मुझे कोई कदम उठाना होगा सोच उनके आने की प्रतीक्षा करने लगी ।


जहाँ कदम कदम पर रुसवाइयाँ आपकी कदमबोशी करती हों ,हर दिन काँटों की चुभन से शुरु होता हो वहाँ कैसे संभव था संभावना तलाशना और अपने लिए थोडी सी जगह अपने बेटे के दिल में ।

वक्त ने आखिर करव ले ही ली और उसके दिल पर दूसरी माँ की छाप ऐसे चस्पाँ हो गयी जैसे कोई अदालती मोहर और उम्र भर सिर्फ़ उसके लिए जीती रही, उसका ब्याह किया, उसकी पत्नी को कितना ही लाड प्यार किया, उसके बच्चे होने पर उसका सारा कार्यभार संभाला भले ही उसकी उपेक्षा से मुझे दिल का रोग लग गया, भले ही मेरा ब्लड प्रैशर बढा हुआ रहने लगा , भले ही मेरे दिमाग में क्लॉट हो गया, 2-3 बार फ़ालिज़ पड पड गया मगर मैं कभी उसके लिए फिर सगी माँ न रह सकी । ज़िन्दगी की सारी रुसवाइयाँ मेरे हिस्से आ चुकी थीं और वक्त अपनी चाल चल चुका था क्योंकि तुम्हें ज़िद थी कि नहीं मेरे घरवाले ऐसा कुछ नहीं कर सकते या कह सकते, तुम्हारे विश्वास की कीमत मैने तमाम उम्र अपनी सेहत की आहुति देकर चुकायी बेशक बाद में तुम्हें भी ये अहसास हो गया जब उसी बेटे ने तुम्हें नकार दिया ।

याद है वो दिन जब उसकी पत्नी जिसे मैने कभी पानी का गिलास नही उठाने दिया , उसे एक दिन मेरी बीमारी में उसकी बेध्यानी पर तुमने जरा सा यही तो कहा था , बेटी , माँ की दवाई ज़रा वक्त पर दे दिया करो नहीं तो इसका ठीक होना मुश्किल हो जाएगा तो कैसे तुम्हें जवाब देने लगी और उल्टा सीधा बोलने लगी थी और फिर जब मैने तुम्हें चुप कराया कि कुछ मत कहो हो जाता है ऐसा तो उसकी पत्नी ने ये कहते हुए जैसे तमाचा सा ही जड दिया था क्योंकि उसे भी आते ही श्याम और घरवालों ने अपने रंग में रंग लिया था और मेरे और श्याम के संबंध में इतना सिखा दिया था कि वो कह उठी :

“जिन बच्चों की माँ दूसरी होती हैं उनके बाप तो तीसरे हो जाया करते हैं “

मानो सारे समाज के आगे वस्त्रहीन कर दिया हो, मानो जलती लकडी पर पांव रखा गया हो और उठाने के लिये बस उसमें दम ही न बचा हो, सब जान लिया तुमने भी, समझ लिया तुमने भी, अपनी बहनों की शादी तक में जो न कभी आया कि कहीं पैसे न अपनी तरफ़ से लगाने पड जाएं, रोक दिया था उसकी पत्नी ने समझ आने लगा था तुम्हें मगर तब तक तो बात हाथ से निकल चुकी थी ।

ये वो ही बेटा था जिसकी पढाई के लिए तुम बेचैन हो गये थे जब गलत संगत में पड गया था तब मेरी बहन के यहाँ रहा एक साल तब जाकर संभला बेशक खर्चा तुम देते थे मगर एक अह्सान तो हमारे माथे चढ ही चुका था जिस कारण कभी हम सिर उठा कर नहीं जी सके । यहाँ तक कि याद है एक बार सबके कहने पर किरायेदार से झगडे में उसकी भी जेल तक जाने की नौबत आ गयी थी और तब तुमने कितनी भागदौड की थी , याद है न , तुम्हारा दस किलो वजन कम हो गया था इतने चिन्तित हो गये थे ये सोच कि यदि जेल का ठप्पा लग गया तो उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी और उसी बेटे के बेटे ने जब तुम्हें गालियाँ दीं और वो चुप रहा , मुस्कुराता रहा तब जाकर तुमने वो निर्णय लिया जो लेते हुए जाने कितने ज्वालामुखी तुम्हारे अन्दर फ़टे होंगे , जाने किन बीहडों से तुम गुजरे होंगे ये मैं समझ सकती हूँ  --  तुमने न केवल अपनी जायदाद से बल्कि अपने दाह संस्कार करने के अधिकार से भी उसे बेदखल कर दिया था क्योंकि अब तक तुम्हारी हर उम्मीद दम तोड चुकी थी और तुम अपनी तरफ़ से हर संभव कोशिश कर चुके थे और जब देख लिया और समझ लिया कि अब ये मेरा नहीं रहा तब जाकर तुमने ये निर्णय लिया ।  जानती हूँ अंत समय में भी तुमने बेशक कुछ नहीं कहा कोमा में जो थे मगर कोमा में भी तुम्हारी चेतना को उसका इंतज़ार था इसलिए हमने उसे कहा कि एक बार आ जा कम से कम तुम्हारे पिता तो तुम्हारे ही थे तब जाकर दुनियादारी निभाने आया था वो और उसकी आवाज़ तुम्हारे अन्तर्मन तक पहुँची थी तभी शांत हो पाये थे तुम ।

हमारी छोटी बेटी जब महज सात - आठ बरस की होगी और श्याम की शादी हो चुकी थी और उसके भी बच्चा था उस वक्त तक यही बात घर में हुआ करती थी जिसका असर मेरी बच्ची पर ऐसा हुआ कि वो भी मुझे अपनी दूसरी माँ समझने लगी और श्याम के कमरे में लगी उसकी माँ की तस्वीर को अपनी माँ समझने लगी याद है न तुम्हें जब उसने कहा था ,
तुम मेरी माँ नहीं हो
तो फिर कौन है ?
वो ही जो भाई के कमरे में फ़ोटो लगी है मैं छज्जे में से उसे देखा करती हूँ ।
ये रहस्योदघाट्न हम सबके पाँव के नीचे से जमीन को धकेलने को काफ़ी था और फिर तुमने उसे किस तरह प्यार से समझाया था और बताया था उम्र का गणित और कहा कि यही तुम्हारी माँ है । सिखावट और बातों का असर एक अबोध मन पर किस हद तक हो सकता है ये तुम्हें उस वक्त समझ आया था मगर तब तक तो बात हाथ से निकल चुकी थी और रिश्ते में दरार पड चुकी थी ।

वो शाम आज भी याद है मुझे जब तुम्हारे ऑफ़िस से आने पर मैने तुमसे श्याम के बारे में बात की थी जब वो उम्र की उस पगडंडी पर पैर रख रहा था जहाँ से वो किसी भी दिशा में मुड सकता था ।

शाम को एकांत में तुमसे कहा, सुनिये, एक जरूरी बात करनी है श्याम के बारे में । देखिये अभी उसकी कच्ची उम्र है, इस उम्र में जो सुनेगा , जो जानेगा उसे ही सत्य मानेगा और आजकल घर का माहौल सही नहीं चल रहा , इतने दिन से आप से कुछ नहीं कहा मगर काफ़ी दिनों से देख रही हूँ श्याम खोया खोया रहता है, एक उधेडबुन सी उसके मन में चलती रहती है , कभी कभी मुझसे भी खिंचा खिंचा रहता है इससे पहले कि उसकी ज़िन्दगी में ज़हर घुले और हम अपने श्याम से हाथ धो बैठें क्या ऐसा नहीं हो सकता आप सरकारी क्वाटर ले लो और हम वहाँ जाकर रहें क्योंकि यहाँ सब मुझे दूसरी माँ कहकर उलाहने देते हैं तो श्याम को समझ नहीं आता कि वो ऐसा क्यों कह रहे हैं और वो हतप्रभ सा मुझे देखता रहता है मगर है तो मासूम मन ही न, कहीं कोई गलत ग्रंथि न पाल बैठे और फिर हमारे हाथ कुछ न रहे । इस माहौल से दूर रहेगा तो कभी नहीं जान पायेगा मैं उसकी दूसरी माँ हूँ । कच्ची उम्र निकल जायेगी एक परिपक्वता आ जायेगी उसके बाद यदि पता भी चलेगा तो वो जानता होगा कि मैने कभी एक पल के लिए भी उसे पराया नहीं माना बल्कि अपनी बेटियों से ज्यादा उसे चाहा है तो तब उस पर कोई फ़र्क नहीं पडेगा इतना भरोसा है मुझे अपनी परवरिश पर मगर यहाँ रहे तो एक दिन जरूर सबकी बातों में आ जायेगा क्योंकि जब एक ही झूठ को सौ लोग बोलें तो सुनने वाले को वो ही सत्य लगने लगता है फिर इसकी तो उम्र ही क्या है । अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए क्या इतना नहीं कर सकते ?

और फिर आपके जवाब ने मुझे निशब्द कर दिया और वो फ़ाँस सा उम्र भर छाती में गडा रहा फिर चाहे मेरे हाथ से श्याम निकल गया और शायद मेरा मन जानता था कि एक दिन ऐसा ही आयेगा जब अपनेपन के सारे फ़ूल उसकी झोली से तिरोहित हो जायेंगे बचेगा तो बस कलुषता का विष, सिखावट के काँटे जिससे वो उम्र भर लहुलुहान होता रहेगा मगर कभी उससे बाहर नहीं आ पायेगा , यदि तुमने समय रहते एक निर्णय ले लिया होता मेरे कहने पर तो आज ये दिन न देखना पडता और मैं तुम्हारी यादों से यूँ बतिया न रही होती अकेली इतने बडे घर में जहाँ बोलने को मेरे सिवा कोई नहीं , जहाँ सुनने को मेरे सिवा कोई नहीं , जहाँ रहने को मेरे सिवा कोई नहीं । शायद तुम्हें भी नहीं पता था कि एक ऐसा दिन भी ज़िन्दगी में आ सकता है लेकिन ये आज का सच है कि आज मैं दिन के चौबीस घंटों में एक एक पल में जाने कितनी मौत मरती हूँ, कोई इंतज़ार नहीं, कोई आस नहीं, कोई बोलने वाला नहीं, अपनी आवाज़ सुने ही लगता है जैसे बरसों हो गए ।यूँ लगता है जैसे अपने एकान्त में चिनी अनारकली हूँ जिसके इंतज़ार, अकेलेपन को सिर्फ़ अब मौत ही सहलायेगी । हर घडी वक्त की बेरहमी मुझमें से जैसे मुझे छीलती है, मेरी बर्दाश्त करने की क्षमता का मानो इम्तिहान लेती है मानो किसी निर्जन टापू पर मैं अकेली विचर रही होउँ । तुम कह सकते हो बेटियाँ हैं लेकिन उन संस्कारों का क्या करूँ जो बचपन से मुझमें रोपें गए कि बेटी के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए अब चाहूँ तो भी उनसे बाहर नहीं आ पाती, खुद की कहूँ या संस्कारों की बेडियों में जकडी आज अकेलेपन की जलती वो चिता हूँ जो राख होती ही नहीं ।बेटियाँ तो पराई होती हैं सब अपने अपने घर को संभाल रही हैं तुम्हें पता ही है ।

साँसों की डोर से बँधी अभिशप्त सा जीवन जीने को विवश हूँ मगर जाने क्यों आज तक समझ नहीं पायी आखिर क्यों मैं तुम्हें पूरी तरह नहीं पा सकी ? आखिर क्या कमी थी मेरे त्याग , मेरा समर्पण , मेरी तपस्या में ? आखिर कौन सी शाख ऐसी थी तुम्हारे मन की जिसे मैं छू न सकी जो तुमने मेरा कहा न माना और मेरे प्रश्न का जवाब इस तरह दिया ………हाँ , ले लेता मैं सरकारी क्वार्टर भी यदि “वो होती तो ……………”


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गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...