Monday, 5 July 2021

कहानी - जामुन का पेड़ - कृश्न चंदर


कृश्न चंदर की कहानी में जामुन के पेड़ के नीचे दबे शख्स को निकालने पर कितनी राजनीति होती है, ये कहानी को पढ़कर ही समझ आएगा. पढ़ें, जामुन का पेड़....

 

रात को बड़े ज़ोर की आंधी चली. सेक्रेटेरियट के लॉन में जामुन का एक दरख़्त गिर पड़ा. सुबह जब माली ने देखा तो इसे मालूम पड़ा कि दरख़्त के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है.

माली दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया. चपरासी दौड़ा-दौड़ा क्लर्क के पास गया. क्लर्क दौड़ा-दौड़ा सुपरिटेंडेंट के पास गया. सुपरिटेंडेंट दौड़ा-दौड़ा बाहर लॉन में आया. मिनटों में गिरे हुए दरख़्त के नीचे दबे हुए आदमी के गिर्द मज़मा इकट्ठा हो गया.

बेचारा! जामुन का पेड़ कितना फलदार था.एक क्लर्क बोला.

इसकी जामुन कितनी रसीली होती थीं.दूसरा क्लर्क बोला.

मैं फलों के मौसम में झोली भर के ले जाता था. मेरे बच्चे इस की जामुनें कितनी ख़ुशी से खाते थे.तीसरे क्लर्क ने तक़रीबन आबदीदा (रुआंसे) होकर कहा.

मगर ये आदमी?’ माली ने दबे हुए आदमी की तरफ़ इशारा किया.

हां, यह आदमी!सुपरिटेंडेंट सोच में पड़ गया.

पता नहीं ज़िंदा है कि मर गया!एक चपरासी ने पूछा.

मर गया होगा. इतना भारी तना जिनकी पीठ पर गिरे, वह बच कैसे सकता है!दूसरा चपरासी बोला.

नहीं मैं ज़िंदा हूं!दबे हुए आदमी ने बमुश्क़िल कराहते हुए कहा.

ज़िंदा है!एक क्लर्क ने हैरत से कहा.

दरख़्त को हटाकर इसे निकाल लेना चाहिये.माली ने मशविरा दिया.

मुश्क़िल मालूम होता है.एक काहिल और मोटा चपरासी बोला. दरख़्त का तना बहुत भारी और वज़नी है.

क्या मुश्क़िल है?’ माली बोला. अगर सुपरिटेंडेंट साहब हुक़्म दे तो अभी पंद्रह-बीस माली, चपरासी और क्लर्क ज़ोर लगाकर दरख़्त के नीचे से दबे आदमी को निकाल सकते हैं.

माली ठीक कहता है.बहुत-से क्लर्क एक साथ बोल पड़े. लगाओ ज़ोर, हम तैयार हैं.

एकदम बहुत से लोग दरख़्त को काटने पर तैयार हो गए.

ठहरो!’, सुपरिटेंडेंट बोला, ‘मैं अंडर-सेक्रेटरी से मशविरा कर लूं .

सुपरिटेंडेंट अंडर-सेक्रेटरी के पास गया. अंडर-सेक्रेटरी डिप्टी सेक्रेटरी के पास गया. डिप्टी सेक्रेटरी जॉइन्ट सेक्रेटरी के पास गया. जॉइन्ट सेक्रेटरी चीफ सेक्रेटरी के पास गया.

चीफ सेक्रेटरी ने जॉइन्ट सेक्रेटरी से कुछ कहा. जॉइन्ट सेक्रेटरी ने डिप्टी सेक्रेटरी से कुछ कहा. डिप्टी सेक्रेटरी ने अंडर सेक्रेटरी से कुछ कहा. एक फाइल बन गयी.

फाइल चलने लगी. फाइल चलती रही. इसी में आधा दिन गुज़र गया. दोपहर को खाने पर दबे हुए आदमी के गिर्द बहुत भीड़ हो गयी थी. लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे. कुछ मनचले क्लर्कों ने मामले को अपने हाथ में लेना चाहा.

वह हुक़ूमत के फ़ैसले का इंतज़ार किए बग़ैर दरख़्त को ख़ुद से हटाने का तहैया कर रहे थे कि इतने में सुपरिटेंडेंट फाइल लिए भागा-भागा आया, बोला, ‘हम लोग ख़ुद से इस दरख़्त को यहां से हटा नहीं सकते. हम लोग महक़मा तिज़ारत (वाणिज्य विभाग) से मुताल्लिक़ (संबंधित) हैं और यह दरख़्त का मामला है जो महकमा-ए-ज़िराअत (कृषि विभाग) की तहवील (कब्ज़े) में है. इसलिए मैं इस फाइल को अर्जेन्ट मार्क करके महक़मा-ए-ज़िराअत में भेज रहा हूं . वहां से जवाब आते ही इस को हटवा दिया जाएगा.

दूसरे दिन महक़मा-ए-ज़िराअत से जवाब आया कि दरख्त हटवाने की ज़िम्मेदारी महकमा-ए-तिज़ारत पर आईद (लागू) होती है. यह जवाब पढ़कर महक़मा-ए-तिज़ारत को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने फ़ौरन लिखा कि पेड़ों को हटवाने या न हटवाने की ज़िम्मेदारी महक़मा-ए-ज़िराअत पर आईद होती है. महक़मा-ए-तिज़ारत का इस मामले से कोई ताल्लुक़ नहीं है.

दूसरे दिन भी फाइल चलती रही. शाम को जवाब भी आ गया. हम इस मामले को हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट के सुपुर्द कर रहे हैं क्योंकि यह एक फलदार दरख़्त का मामला है और एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट सिर्फ अनाज और खेतीबाड़ी के मामलों में फ़ैसला करने का मजाज़ (अधिकार) है. जामुन का पेड़ एक फलदार पेड़ है इसलिए पेड़ हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट के दाइरे-अख़्तियार (अधिकार क्षेत्र) में आता है.

रात को माली ने दबे हुए आदमी को दाल-भात खिलाया हालांकि लॉन के चारों तरफ पुलिस का पहरा था कि कहीं लोग क़ानून को अपने हाथ में ले के दरख़्त को ख़ुद से हटवाने की कोशिश न करें. मगर एक पुलिस कॉन्स्टेबल को रहम आ गया और इसने माली को दबे हुए आदमी को खाना खिलाने की इजाज़त दे दी.

माली ने दबे हुए आदमी से कहा, ‘तुम्हारी फाइल चल रही है. उम्मीद है कि कल तक फ़ैसला हो जाएगा.

दबा हुआ आदमी कुछ न बोला.

माली ने पेड़ के तने को ग़ौर से देखकर कहा, ‘हैरत गुज़री कि तना तुम्हारे कूल्हे पर गिरा. अगर कमर पर गिरता तो रीढ़ की हड्डी टूट जाती.

दबा हुआ आदमी फिर भी कुछ न बोला.

माली ने फिर कहा, ‘तुम्हारा यहां कोई वारिस हो तो मुझे उसका अता-पता बताओ. मैं उसे ख़बर देने की कोशिश करूंगा.

मैं लावारिस हूं.दबे हुए आदमी ने बड़ी मुश्क़िल से कहा.

माली अफ़सोस ज़ाहिर करता हुआ वहां से हट गया.

तीसरे दिन हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट से जवाब आ गया. बड़ा कड़ा जवाब था और तंज़आमेज़ (व्यंग्यपूर्ण). हॉर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी अदबी मिजाज़ का आदमी मालूम होता था.

इसने लिखा था, ‘हैरत है, इस समय जब दरख़्त उगाओस्कीम बड़े पैमाने पर चल रही हैं, हमारे मुल्क़ में ऐसे सरकारी अफ़सर मौज़ूद हैं जो दरख़्त काटने का मशवरा देते हैं, वह भी एक फलदार दरख़्त को! और फिर जामुन के दरख़्त को! जिस की फल अवाम बड़ी रग़बत (चाव) से खाते हैं! हमारा महक़मा किसी हालत में इस फलदार दरख़्त को काटने की इज़ाजत नहीं दे सकता.

अब क्या किया जाए?’ एक मनचले ने कहा. अगर दरख़्त काटा नहीं जा सकता तो इस आदमी को काटकर निकाल लिया जाए! यह देखिए, उसी आदमी ने इशारे से बताया. अगर इस आदमी को बीच में से यानी धड़ के मुकाम से काटा जाए तो आधा आदमी इधर से निकल आएगा और आधा आदमी उधर से बाहर आ जाएगा, और दरख्त वहीं का वहीं रहेगा.

मगर इस तरह से तो मैं मर जाऊंगा!दबे हुए आदमी ने एहतजाज़ किया.

यह भी ठीक कहता है!एक क्लर्क बोला.

आदमी को काटने वाली तजवीज़ (प्रस्ताव) पेश करने वाले ने पुरज़ोर-एहतजाज़ किया, ‘आप जानते नहीं हैं. आजकल प्लास्टिक सर्जरी के ज़रिये धड़ के मुकाम पर इस आदमी को फिर से जोड़ा जा सकता है.

अब फाइल को मेडिकल डिपार्टमेंट में भेज दिया गया. मेडिकल डिपार्टमेंट ने फ़ौरन इस पर एक्शन लिया और जिस दिन फाइल मिली उसने उसी दिन इस महक़मे का सबसे क़ाबिल प्लास्टिक सर्जन तहकीकात के लिए भेज दिया.

सर्जन ने दबे हुए आदमी को अच्छी तरह टटोलकर, उसकी सेहत देखकर, ख़ून का दबाव, सांस की आमदो-रफ़्त, दिल और फेफड़ों की जांचकर के रिपोर्ट भेज दी कि, ‘इस आदमी का प्लास्टिक सर्जरी का ऑपरेशन तो हो सकता है और ऑपरेशन कामयाब भी हो जाएगा, मगर आदमी मर जाएगा.

लिहाज़ा यह तज़वीज़ भी रद्द कर दी गयी.

रात को माली ने दबे हुए आदमी के मुंह में खिचड़ी के लुक़मे डालते हुए उसे बताया, ‘अब मामला ऊपर चला गया है. सुना है कि सेक्रेटेरियट के सारे सेक्रेटेरियों की मीटिंग होगी. इसमें तुम्हारा केस रखा जाएगा. उम्मीद है सब काम ठीक हो जाएगा.

दबा हुआ आदमी एक आह भरकर आहिस्ते से बोला, ‘हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन ख़ाक़ हो जाएंगे हम, तुमको ख़बर होने तक!

माली ने अचंभे से मुंह में उंगली दबायी. हैरत से बोला, ‘क्या तुम शायर हो?’

दबे हुए आदमी ने आहिस्ते से सिर हिला दिया.

दूसरे दिन माली ने चपरासी को बताया. चपरासी ने क्लर्क को और क्लर्क ने हेड-क्लर्क को. थोड़े ही अरसे में सेक्रेटेरियट में यह बात फैल गयी कि दबा हुआ आदमी शायर है.

बस फिर क्या था. लोग जोक-दर-जोक (झुंड बनाकर) शायर को देखने के लिए आने लगे. इसकी ख़बर शहर में फैल गयी. और शाम तक मुहल्ले-मुहल्ले से शायर जमा होना शुरू हो गए. सेक्रेटेरियट का लॉन भांत-भांत के शायरों से भर गया. सेक्रेटेरियट के कई क्लर्क और अंडर-सेक्रेटरी तक, जिन्हें अदब और शायर से लगाव था, रुक गए.

कुछ शायर दबे हुए आदमी को अपनी ग़ज़लें और नज़्में सुनाने लगे. कई क्लर्क इससे अपनी ग़ज़लों पर इस्लाह (सुधार) लेने के लिए मुसिर होने (ज़िद करने) लगे.

जब यह पता चला कि दबा हुआ आदमी शायर है तो सेक्रेटेरियट की सब-कमेटी ने फ़ैसला किया कि चूंकि दबा हुआ आदमी एक शायर है लिहाज़ा इस फाइल का ताल्लुक़ न एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट से है, न हाॅर्टीकल्चरल डिपार्टमेंट से बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ कल्चरल डिपार्टमेंट से है.

कल्चरल डिपार्टमेंट से इसतदअ (गुज़ारिश) की गयी कि जल्द से जल्द इस मामले का फ़ैसला करके बदनसीब शायर को इस शजरे-सायादार (छांव देने वाला पेड़) से रिहाई दिलायी जाए.

फाइल कल्चरल डिपार्टमेंट के मुख़्तलिफ़ शुआबों (विभाग) से गुज़रती हुई अदबी अकादमी के सेक्रेटरी के पास पहुंची. बेचारा सेक्रेटरी इसी वक़्त अपनी गाड़ी में सवार हो कर सेक्रेटेरियट पहुंचा और दबे हुए आदमी से इंटरव्यू लेने लगा.

तुम शायर हो?’ इसने पूछा.

जी हां.दबे हुए आदमी ने जवाब दिया.

क्या तख़ल्लुस करते हो?’

अवस.

अवस!सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा. क्या तुम वही हो जिसका मजमुआ-ए-कलाम (शायरी संग्रह) अवस के फूल हाल ही में शाया (प्रकाशित) हुआ है?’

दबे हुए शायर ने इस बात में सिर हिलाया.

क्या तुम हमारी अकादमी के मेंबर हो?’ सेक्रेटरी ने पूछा.

नहीं!

हैरत है!सेक्रेटरी ज़ोर से चीखा. इतना बड़ा शायर! अवस के फूलका मुसन्निफ़ (लेखक) ! और हमारी अकादमी का मेंबर नहीं है! उफ़, उफ़ कैसी ग़लती हो गयी हमसे! कितना बड़ा शायर और कैसे गोशिया-ए-ग़ुमनामी (गुमनामी के कोने) में दबा पड़ा है!

गोशिया-ए-गुमनामी में नहीं बल्कि एक दरख़्त के नीचे दबा हुआबराहे-क़रम मुझे इस पेड़ के नीचे से निकालिए.

अभी बंदोबस्त करता हूं.सेक्रेटरी फ़ौरन बोला और फ़ौरन जाकर इसने अपने महकमे में रिपोर्ट पेश की.

दूसरे दिन सेक्रेटरी भागा-भागा शायर के पास आया और बोला, ‘मुबारक़ हो, मिठाई खिलाओ, हमारी सरकारी अकादमी ने तुम्हें अपनी मर्क़ज़ी कमेटी (केंद्रीय समिति) का मेंबर चुन लिया है. यह लो परवाना-ए-इन्तख़ाब!

मगर मुझे इस दरख़्त के नीचे से तो निकालो.दबे हुए आदमी ने कराहकर कहा. उसकी सांस बड़ी मुश्क़िल से चल रही थी और उसकी आंखों से मालूम होता था कि वह शदीद तशन्नुज और करब (काफ़ी तकलीफ़) में मुब्तला है.

यह हम नहीं कर सकते.सेक्रेटरी ने कहा. जो हम कर सकते थे वह हमने कर दिया है. बल्कि हम तो यहां तक कर सकते हैं कि अगर तुम मर जाओ तो तुम्हारी बीवी को वज़ीफा दिला सकते हैं. अगर तुम दरख़्वास्त दो तो हम यह भी कर सकते हैं.

मैं अभी ज़िंदा हूं.शायर रुक-रुककर बोला. मुझे ज़िंदा रखो.

मुसीबत यह है,’ सरकारी अकादमी का सेक्रेटरी हाथ मलते हुए बोला, ‘हमारा महक़मा सिर्फ़ कल्चर से मुताल्लुक़ है. इसके लिए हमने फॉरेस्ट डिपार्टमेंटको लिख दिया है. अर्जेंटलिखा है.

शाम को माली ने आकर दबे हुए आदमी को बताया कि कल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के आदमी आकर इस दरख़्त को काट देंगे और तुम्हारी जान बच जाएगी.

माली बहुत ख़ुश था कि गो दबे हुए आदमी की सेहत जवाब दे रही थी मगर वह किसी-न-किसी-तरह अपनी ज़िंदगी के लिए लड़े जा रहा है. कल तकसुबह तककिसी न किसी तरह इसे ज़िंदा रहना है.

दूसरे दिन जब फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के आदमी आरी-कुल्हाड़ी लेकर पहुंचे तो इनको दरख़्त काटने से रोक दिया गया. मालूम यह हुआ कि महकमा-ए-ख़ारज़ा (विदेश विभाग) से हुक़्म आया कि इस दरख़्त को न काटा जाए.

वजह यह थी कि इस दरख़्त को दस साल पहले हुकूमते पिटोनिया के वज़ीरे-आज़म (प्रधानमंत्री) ने सेक्रेटेरियट के लॉन में लगाया था. अब यह दरख़्त अगर काटा गया तो इस अम्र (बात) का शदीद अंदेशा था कि हुकूमते-पिटोनिया से हमारे ताल्लुक़ात हमेशा के लिए बिगड़ जाएंगे.

मगर एक आदमी की जान का सवाल है!एक क्लर्क ग़ुस्से से चिल्लाया.

दूसरी तरफ़ दो हुक़ूमतों के ताल्लुक़ात का सवाल है.दूसरे क्लर्क ने पहले क्लर्क को समझाया. और यह भी तो समझो कि हुकूमते-पिटोनिया हमारी हुकूमत को कितनी इमदाद (ग्रांट) देती है. क्या हम इन की दोस्ती की ख़ातिर एक आदमी की ज़िंदगी को भी कुर्बान नहीं कर सकते?’

शायर को मर जाना चाहिये.

बिलाशुबा.

अंडर-सेक्रेटरी ने सुपरिटेंडेंट को बताया. आज सुबह वज़ीरे-आज़म बाहर-मुल्कों के दौरे से वापस आ गए हैं. आज चार बजे महकमा-ए-ख़ारज़ा इस दरख़्त की फाइल उन के सामने पेश करेगा. जो वह फ़ैसला देंगे वही सबको मंज़ूर होगा.

शाम पांच बजे ख़ुद सुपरिटेंडेंट शायर की फाइल ले कर उसके पास आया. सुनते हो?’ आते ही ख़ुशी से फाइल हिलाते हुए चिल्लाया, ‘वज़ीरे-आज़म ने दरख़्त को काटने का हुक़्म दे दिया है और इस वाकये की सारी बैनुल-अक़्वामी (अंतरराष्ट्रीय) ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले ली है. कल वह दरख़्त काट दिया जाएगा और तुम इस मुसीबत से छुटकारा हासिल कर लोगे.

सुनते हो? आज तुम्हारी फाइल मुकम्मल हो गयी!सुपरिटेंडेंट ने शायर के बाजू को हिलाकर कहा. मगर शायर का हाथ सर्द था. आंखों की पुतलियां बेजान थीं और चींटियों की एक लंबी क़तार उसके मुंह में जा रही थी.

उसकी ज़िंदगी की फाइल भी मुकम्मल हो चुकी थी.

Saturday, 3 July 2021

कबीर की क्रान्ति चेतना

- के बी एल पाण्डेय

कबीर के अप्रतिम व्यक्तित्व और मूल्यप्रेरित काव्य का समग्र और सही विश्लेषण करने वाले विद्वान् हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि हिन्दी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक पैदा नहीं हुआ। यह असाधारणता उनके व्यक्तित्व और काव्य दोनों का गुण है। जैसा विलक्षण और प्रखर उनका व्यक्तित्व है वैसा ही सत्यान्वेषी उनका काव्य है। मुक्ति की भावनापूर्ण भूमि पर स्थित होते हुए भी वह विवेक और विचार से निरन्तर सचेत हैं। यह कबीर के जीवन की आश्चर्यजनक महत्ता है कि जहाँ जीवनोचित स्थितियों के निषेध और सामाजिक स्वीकृतियों की उपेक्षा से सामान्य मनुष्य कुंठित, असामान्य और हीनता बोध से ग्रस्त हो जाता है वहीं कबीर ने विषम परिस्थितियों में भी अदम्य आत्म विश्वास तथाकथित ज्ञानियों को भी निरूत्तर कर देने वाली अनुभूत ज्ञान और निर्भीकता अर्जित की। मसि, कागज और कलम के अवसरों से वंचित इस संत कवि की साधना में सत्य से  सीधा साक्षात्कार है। कबीर का सत्य दार्शनिकों के सत्य की तरह जटिल बुद्धि-विलास नहीं है बल्कि कथनी और करनी की एकता प्रतिपादित करने वाला जीवनानुभव है।

कबीर की क्रान्ति चेतना न तो व्यक्तिगत जीवन की प्रतिक्रिया है न मठ स्थापना की महत्त्वाकांक्षा। उसमें किसी युगान्तरकारी व्यक्ति की वह व्यापक कल्याण भावना है जिसके अंतर्गत वह वर्तमान की विसंगतियों से विक्षुब्ध होकर नये निर्माण की अनिवार्यता से प्रेरित होता है। कबीर अपने समय के सबसे बड़े समीक्षक थे। उन्होंने देखा कि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में बड़ी साधनाओं और उपासनाओं की परिणति बाह्याचार और पाखण्ड में हुई है। विभिन्न पक्षों, सम्प्रदायों और धर्मों के तथाकथित पण्डित, योगी, मौलवी, मिथ्याचार में रत दंभी और भ्रमित हैं। सत्य के मार्ग से स्वयं भटके हुए ये लोग दूसरों का मार्गदर्शन कैसे कर सकते हैं ? कबीर इन सभी विसंगतियों पर निर्भीकता के साथ प्रबल और अकाट्य तर्कों से प्रहार करते हैं। बाह्याचार और पाखण्ड का उपहास करने वाले उनके व्यंग्य आक्रामक होते हुए भी इतने सटीक और सच हैं कि उनका विरोधी पक्ष बनता ही नहीं है। उनकी उक्तियों में अहंकार नहीं है बल्कि गलत का विरोध करने का असाधारण साहस है। ऐसा साहस प्रायोजित नहीं होता। इस साहस के लिये अपना घर जलाकर लुकाठी लेकर निकल पड़ने और अपना सिर उतार कर रख देने का निःस्पृह फक्कड़पन आवश्यक है।

यह फक्कड़पन सत्य की पक्षधरता, अदम्य आत्म विश्वास और निर्भीक निर्ममता क्रान्तिकारी चेतना के अनिवार्य तत्त्व हैं। कबीर के व्यक्तित्व में इन सबका मिश्रण है। क्रान्ति न तो सुविधाजनक समझौता है न टूट फूट की आंशिक मरम्मत। क्रान्ति जड़ता और अनाचार के प्रति असह्यता की भावना से उत्पन्न नयी रचना की संकल्पना है। विसंगतियों के निवारण में कबीर इसीलिये समझौता नहीं करते। जब सुधार की संभावना नहीं रह जाती है तब बदलाव जरूरी हो जाता है। 

कबीर की क्रांति चेतना के विवेचन में प्रायः उनके उस पक्ष के ही उदाहरण दिये जाते है जो पाखण्ड और बाह्यचार विरोधी हैं, कबीर की क्रांति चेतना का यह रूप तो है ही और वह प्रबल भी है, किन्तु उनकी मौलिक वैचारिकता की क्रांतिधर्मिता यहीं तक सीमित नहीं है, उनके अधिकतर प्रस्थान नये आरंभ हैँ। 

द्विवेदी जी ने लिखा है कि जो दुनियादार किये कराये का लेखा जोखा दुरूस्त रखता है वह मस्त नहीं हो सकता। जो अतीत का चिट्ठा खोले रहता है वह भविष्य का क्रान्तदर्शी नहीं बन सकता। अतीत गुज़रा हुआ निरपेक्ष कालखण्ड नहीं है। रूढ़ियों के रूप में निरर्थक हो जाने के बाद भी यदि वह हमारी चेतना में सम्माननीय  रहकर हमारे जीवन को परिचालित करता रहता है तो वह अतीत न होकर निरन्तर वर्तमान बना रहता है। अतीत मुक्ति क्रांति की देहरी है। कबीर न अतीत से मुग्ध हैं न आतंकित। परीक्षण और अनुभव को आधार मानने वाला व्यक्ति अतीत का अन्धानुसरण कर भी नहीं सकता। उनका ब्रह्म निराकार, निर्गुण है किन्तु प्रेमपूर्ण भक्ति से वह अनुभव गम्य है। पूर्व प्रचलित साधना पद्धतियों की जटिलता और शुष्कता की जगह उन्होंने भावना पूर्ण भक्ति को अवलम्ब माना। भावनात्मकता के इस निक्षेप से हृदय की निर्मलता, सरलता और शुचिता का स्वाभाविक आसंग हो गया। हार्दिकता और बौद्धिकता के संयोग से परिपूर्णता आ जाती है। इसलिये कबीर ज्ञान और प्रेम का अद्भुत संयोग करते है। 

कबीर ने प्रचलित मान्यताओं से प्रस्थान करते हुए यह भी सिद्ध किया कि परमात्मा की प्राप्ति के लिये वैराग्य धारण आवश्यक नहीं है। गृहस्थ के रूप में व्यक्ति का सांसारिक कर्तव्य है, यह भी उसका धर्म है । कबीर गृहस्थ रहे, जीवन यापन के लिये कपड़ा बुनते और बेचते रहे तथा गंभीर आध्यात्मिक तत्त्वज्ञान की काव्यात्मक अभिव्यक्ति करते रहे। कोई आध्यात्मिकता या कोई पारलौकिकता ऐसी नहीं होती जिसमें लौकिकता से सर्वथा विच्छिन्नता हो। संसार हमारे साथ हमेशा रहता है। मुक्ति भी संसार में ही होती है संसार से नहीं। घर में जोग भोग घर ही में घर तज वन नहिं जावें, घर में जुक्त युक्त घर ही में जो गुरू अलख लखावें।

कबीर ने ऐसी ही समसाधना की थी। यही उनकी सहज-साधना थी। ऐवलिन अंडरहिल ने कबीर की सार्थक समीक्षा करते हुए लिखा है कि वे उस आत्मविस्मृतिकारी परम उल्लासमय साक्षात्कार के समय भी दैनन्दिन व्यवहार की दुनिया को छोड़ नहीं जाते और साधारण मानव जीवन को भुला नहीं देते। उनके पैर मजबूती के साथ धरती पर जमे रहते हैं । कबीर की मूल प्रतिबद्धता इसी जगत् और उसके जीवन से है। निर्गुण की साधना इसी जीवन को निश्छल और उच्चतर बनाने के लिये एक उदात्त साधन है।

कबीर का विश्वास आंखों देखे सत्य पर है, कागज पर लिखे हुए की अंधभक्ति पर नहीं ‘‘मैं कहता हूँ आंखिन देखी तू कहता कागज की लेखी।’’ शास्त्रों के प्रति कबीर की यह अस्वीकृति इसलिये नहीं है कि निरक्षर होने के कारण उन्हें शास्त्र पढ़ने का अवसर नहीं मिला था। यदि मिला होता तो वह संभवतः शास्त्रों की आलोचना उदाहरणों के साथ और अधिक करते। वेद और शास्त्रों के प्रति कबीर का अस्वीकार इसलिये था क्योंकि शास्त्र मार्ग का आशय है एक बंधी बंधायी ऐसी अपरिवर्तित परिपाटी जिसके बारे में कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता जिसकी समीक्षा नहीं की जा सकती। शास्त्र यथास्थिति का आदेश देते हैं। प्रचलित रूढ़ मूल्यों को चुनौती देने वाले क्रान्ति चेता कबीर इसलिये शास्त्रों के आलोचक हैँ। पण्डित्य का कबीर पर आतंक नहीं है क्योंकि वह जानते हैं कि वास्तविक पाण्डित्य प्रेम के ढाई अक्षरों की अनुभूति में है, पोथियों को पढ़ लेने में नहीं। वह कहते हैं-

गगन गरजे तहां सदा पावस झरे होत झनकार नित बजत तूरा

वेद कत्तेब की गम्म नाहीं तहां कहे कब्बीर कोइ रमै सूरा

कबीर की क्रान्ति चेतना पूरे आक्रोश के साथ धार्मिक आडम्बर और निरर्थक बाह्याचार के प्रत्याख्यान में व्यक्त हुई है। यहां उनकी सामाजिक भूमिका अधिक स्पष्ट और प्रत्यक्ष है। कबीर ने देखा कि विभिन्न सम्प्रदाओं और धर्मों  के लोग कर्मकाण्ड में ही लिप्त हैं, जबकि कर्मकाण्ड तो भावना रहित जड़ क्रिया है। यही नहीं विभिन्न धर्मों के लोगों ने पूरे जगत में व्याप्त एक ब्रह्म को अलग-अलग नाम रूपों में विभाजित कर लिया है। इससे सामाजिक स्तर के भेद उत्पन्न हो गये हैं। मूर्ति पूजा, तीर्थ, व्रत, स्नान, जप, माला, वेष सभी व्यर्थ हैं, भक्ति में इन प्रसाधनों की आवश्यकता ही नहीं है। 

अरे इन दोउन राह न पाईवाले प्रसिद्ध पद में कबीर हिन्दू और मुसलमान दोनों को उनके अज्ञान के कारण खुल कर धिक्कारते हैं। ऐसी तटस्थता से बुराई की आलोचना वही कर सकता है जिसकी दृष्टि मानवतावादी है। मनुष्य के लिये सबसे जरूरी भाव है करूणा।

 हिन्दू की दया मेहर तुरूकन की दोनों घट सो त्यागी

 

 दिल में खोज दिलहि मैं खौजो रहे करीमारामा

      सिर मुंडाने से  पत्थर पूजने से, माला फेरने से ऊँची आवाज में परमात्मा को पुकारने से ही यदि उसकी उपलब्धि हो जाती तो यह बहुत सरल उपाय है। इसलिये कबीर ने योगियों को भी उनके बाह्याचार के लिये फटकारा है--

 मन न रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा

 

इस पाखण्ड की निन्दा करते समय कबीर की चिन्ता केवल आध्यात्मिक नहीं है बल्कि वह समाज के लौकिक जीवन के भ्रष्टाचार से भी चिन्तित हैं, उसके विखण्डित होते स्वरूप से भी दुखी हैं। जाति और जन्म संयोग से मनुष्य का निर्धारण और विभाजन किसी भी तर्क से उचित नहीं है, फिर कबीर तो अपनी अक्खड़ता में सीधे जैविक जनन का ही तर्क रख देते हैं। 

 क्रांतिचेता कबीर की मूल्य दृष्टि का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। उन्होंने कविता को कलागत मूल्यपरकता और प्रशस्ति से निकालकर उसे मानवीय प्रतिबद्धता से जोड़ा। अपने देशकाल के संदर्भों में कबीर ने कविता के प्रयोजन को व्यापक बनाया। भक्ति का विषय भले ही वैयक्तिक हो और उसका फलक आत्मिक हो किन्तु इस भक्ति के स्वरूप में जाति, वर्ण, कुल ऊँच नीच के भेदों के ऊपर एक समान समाज के मनुष्य की कल्पना है। इस मनुष्य के कल्याण की चिन्ता ही कबीर की प्रतिबद्धता है। कविता करना कबीर का उद्देश्य नहीं था। जब तुलसीदास जैसा शास्त्रज्ञ भी व्यापक लक्ष्य के सामने कवित्व को गौण मानता है तो कबीर तो कविता के शास्त्र से वैसे भी अनभिज्ञ थे, कबीर खुद कहते हैं-

 ‘तुम जिन जानौ गीत है यह निज ब्रह्म विचार।

      फिर भी कबीर की कविता में काव्य का प्रभावपूर्ण, मार्मिक, व्यंजनापूर्ण और सशक्त रूप दिखायी देता है।

 भाषा के प्रयोग में भी कबीर परम्परामुक्त हैं। उन्होंने भाषा ग्रंथों से नहीं सीखी थी। व्यापक समाज जिस भाषा को समझता है, जिसका प्रयोग करता है, कबीर ने उसी भाषा का उपयोग किया था। कबीर की कविता में भाषा का प्रवहमान और अन्तर्क्षेत्रीय रूप अपनी पूरी शक्ति के साथ उपस्थित है। कबीर सत्य की अभिव्यक्ति के लिये जिस भाषा का प्रयोग करते हैं उसमें आवश्यकतानुसार उनका ही अनुशासन चलता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है-कि भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था वे वाणी के डिक्टेटर थे जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा है उसे उसी रूप में भाषा से कहलवा लिया---भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार सी नजर आती है।

 इस प्रकार कबीर उन सभी स्थापित मूल्यों का विरोध करते हैं जिनकी अर्थवत्ता सभी के िलये न होकर वर्ग विशेष के लिये हैं। उनका विरोध सभी प्रकार की रूढिपरकता से है क्योंकि वह परिवर्तन की सभी सम्भावनाओं और आवश्यकताओं के दरवाजे बन्द कर देती है।

 कबीर का कथ्य बौद्धिक व्यक्ति का अनुभूतिशूण्य तर्कजाल नहीं है। वह यदि जाति भेद, ऊँच नीच छूआछूत या साम्प्रदायिक वैषम्य पर चोट करते हैं तो वह उनका अपना स्वयं का अनुभव होता है। कबीर को ही साम्प्रदायिक एकता की अवधारणा का पुरोधा माना जायेगा। यहां भी कबीर की अपनी क्रान्तिकारी थीसिस है। वह समझते हैं कि साम्प्रदायिक रूढ़ियों और उन्हें श्रेष्ठ मानना ही कट्टरता को जन्म देता है। यह सत्य है कि सबकी विशेषताओं को रख कर मानव मिलन की साधारण भूमिका नहीं तैयार की जा सकती। जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि की अधिकतर विशेषताओं को छिन्न करके ही वह आसन बनाया जा सकता है जहां एक मनुष्य दूसरे से मनुष्य की हैसियत से मिल सके। 

 कबीर सचमुच महान् मानववादी विचारक और कवि थे और वह भी बेहद विषम परिस्थितियों में।



Friday, 2 July 2021

हिन्दी लेखन : ब्लैक होल बनता बाजार

        अभी कुछ ही दिन पहले ही आये एक वरिष्ठ लेखक के इस कथन को पढ़कर या सुनकर कि "हिन्दी में नब्बे प्रतिशत कवि वास्तव में कवि हैं ही नहीं।" लोगों ने अपने आस पास जरूर एक नजर दौड़ाई होगी। और साहित्य के जानकारों ने कविता के इतर भी उंगली काटकर घायलों शामिल हुये योद्धाओं की निशानदेही भी कर ली होगी। परंतु कविता के फार्मूले में देखे सुने पढ़े आंकड़ों को फिट कर कगज रंगने वालों को सच का दर्पण दिखाने की हिम्मत कम ही जुटा पाते हैं। परिणाम स्वरूप बहुत से व्यवसायिक समीकरण बिगड़ सकते है। फिर भी ऐसे बयान यदाकदा सुनने को मिल ही जाते हैं। ये एक धमाके की तरह होते हैं जो सोतों को जगा देते हैं,भले ही वे फिर सो जायें।

           कहने को साहित्य समाज का दर्पण होता है। हम यही पढ़ते और सुनते आये हैं। दर्पण होता भी है मगर उस समय का जिसमें वह रचा जाता है । दर्पण में बदलते चेहरे की तरह ही व्यक्ति के साथ लेखन भी बदल जाता है । इस अस्थाई बिम्ब में भविष्य के लिए कुछ संजोना तभी संभव है जब उसमें समाये गहरे व चटक वैचारिक रंग वर्तमान के कागज पर, समय की गर्मी से सूखकर तश्वीर का रूप न ले लें। और ये तभी संभब है जब लिखने वाला समय के लिए लिखे... बाजार के लिए नहीं, क्योंकि बाजार में खरीदने और बेचने की सोच दर्पण में उभरे बिम्ब की तरह ही अस्थाई होती है। और यदि बिकना ही सफलता का मानक है तो साहित्य में समाज की तश्वीर बिकनी चाहिए जिसमें भविष्य अपने अतीत को समझ सके । कुछ सीख सके।

        जिंदगी उन अनुभवों पर खड़ी होती है जो समय कराता है। हम लोगों की समझ पर प्रश्नचिन्ह तो नहीं लगा सकते मगर अपना पक्ष तो रख ही सकते है और इसी से दुनिया का कारोबार चलता है। सभी के अपने अपने दृष्टिकोण है और जरूरतें भी , फिर भी हम मजबूरियों का बास्ता देकर वास्तविकता और अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकते।

        लेखन साहस और बेबाकी से लिखे गये उन विचिरों और आधारों का समावेश है जहां उद्देश्य समाज में सड़ती मानसिकताओं की बदबू को उजागर करना है और उसमें संस्कारों की महक भी है और वो रोशनी भी जिसमें सब स्पष्ट नजर आता है।

        आज की अधिकांश कृतियां और रचनाएं ये साफ दर्शातीं हैं कि आज लेखन महज बेचने की वस्तु रह गई है या फिर भ्रामक शोहरतों को  प्राप्त करने का साधन। वहीं बाजार में जमे, नये और बेहतर लेखन को उपेक्षित कर वही पुरानी लकीर पीटने वाले और यूज एंड थ्रो वाले लेखन की पैरवी करने वाले प्रकाशक हों या फिर बाजार की चकचोंध से खिंचे नये या पुराने लेखक, जो उसी चकचौंध से भरी रोशनी में  अर्थहीन दिये से जलकर एकदिनी बनकर रह जाते है। जबकि वो ये भूल जाते हैं कि साहित्य तो वो जगह है जहां उम्र की कमी संख्या से पूरी नहीं की जा सकती है। कलम खोखले आदर्शो और झूठे संस्कारों का लबादा ओढ़े और कर ही क्या सकती है ?

            ...अब वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी लेखन और साहित्यिक बाजार में केवल और केवल पैसे वालों का मानसिक उत्सर्जन देखने को मिले तो ताज्जुब नहीं होगा क्योंकि वास्तविक लेखन दोनों ही स्थितियों में खत्म ही हो जायेगा, यदि बाजार के समानांतर खड़ा होकर लेखक स्वयं के लिखे को प्रकाशित कर बेचता है तब भी और उसका शिकार होता है तब भी।

         कुछ दिन पहले किसी एक पत्रिका में पढ़ा था कि अब भारतीय हिन्दी लेखन विश्व स्तरीय नहीं रहा, शायद उसने ये राय तथाकथित बड़े प्रकाशनों की पुस्तकें पढ़कर बनाई हो । वह, यदि जगह जगह उगे प्रकाशनों की पुस्तकें पढ़कर बनाता तो क्या कहता ? कारण जो भी हो परंतु स्थिति चिंता जनक जरूर है। सामने जटिल प्रश्न है ? और उत्तर उससे भी कहीं अधिक निराश करने वाले ।

अगर हम आशा भरी नजरों से आलोचकों को देखते हैं तो वो जगह जगह विज्ञापन करते और संभावनाएं तलाशते नजर आते हैं या फिर पुराने को टटोलकर एक नई किताब लिखते। ये आलोचक इतनी ऊंचाई पर बैठे होते हैं कि आम लेखक के बेहतरीन लेखन इनकी पहुंच से हमेशा दूर ही रह जाते हैं और जो इन तक पहुंचते हैं वो स्थापित होते हैं या समर्थ।

          लेखकों कवियों की भीड़ जिस गति से बढ़ रही है प्रकाशन भी उतनी ही संख्या में परंतु सिवाय संख्या बढ़ाने के कहीं कुछ नहीं दिखता। कलमकार बनना अब लोगों का शौक हो गया है जो सेवानिवृत्ति के बाद अचानक से उभर आता है। पद, संपर्क और पैसा उन्हें मौकों के साथ साथ कुछ सम्मान और पुरस्कार भी जुटा देता है । इसी तरह उनकी साहित्यकारी चल पड़ती है। उन पर शोध ग्रंथ भी बिखरे पड़े हैं । वास्तविक लेखन हर जगह उपेक्षित है । भीड़ भी उन्हीं के यहाँ जुटती है जो तमाशा करते हैं।

      "हिन्दी वाले तो मरों को पूजना जानते हैं  जब मैं मर जाऊंगा तब मेरे ठाट देखना। " रांगेय राघव के ये शब्द अब भी उतने ही प्रसांगिक है जितने की उस वक्त थे जब उनहोंने कहे थे।

         ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो बड़े बड़े वट वृक्षों के तनों को चीरकर बढ़े । छाया में नीचे कोई पनपने ही नहीं देता।

जब नई पीढ़ी पुरानी के खत्म होने का इंतजार करने लगे तो सभी को समझ लेना चाहिए कि कहीं कुछ बहुत गलत हो रहा है ।

     साहित्य की दुकानों में अब पैसा बोलता है । लिखा हुआ, यूं ही बिना पढ़े छपता है। कमीशन पर खपता है मगर पढ़ता कोई नहीं क्योंकि जो पढ़ने वाला वर्ग है उनमें उनके लिए कुछ है ही नहीं । वह अब भी सूर ,तुलसी ,कबीर को तलाशता है और प्रेमचन्द, रेणु को पढ़ता है या फिर विदेशी अनुदित पुस्तकें। समय और बाजार के मुताबिक लेखन क्या दे रहा है ? सभी जानते हैं। या यूं कहें कि मुरे मुराये को तरह तरह मसालों के साथ इतना चबाया गया कि उसने अपना अस्तित्व ही खो दिया और स्वाद हीन हो गया।

         बढ़ते हुये बाजारवाद ने साहित्य में अपरिचय और उपेक्षा का एक ऐसा माहौल को पैदा कर दिया है जहाँ निजी हित सर्वोपरि और अवसरवाद हाबी है। लेखक खांचों मे फिट होकर .....प्रकाशक और संपादकों के लाभदायी समीकरणों से संचालित होने लगे हैं। चिंतन और जनकल्यांण जैसे शब्द अर्थहीन से लगने लगे। सोच ही बदल गई तो साहित्य शब्द के मायने भी बदलने लगे।

       वहीं आज लेखन जस को तस लिखने की प्रवृत्ति और लोकरुचि के नाम पर उथले से उथला होता रहा, न लेखक ने लिखने में चिंतन की जरूरत समझी न पढ़कर पाठक को सोचने के लिए कुछ मिला। फिर भी लेखक रचना से गुम होकर बजार में बिकने को जगह तलाशता रहा । बाजार ने लेखन के मानदंड तै कर दिये। परिणाम सामने है।

         बाज़ार ने कहीं न कहीं एक ऐसी नकारात्मक प्रतियोगिता को जन्म दे दिया जहाँ बड़े को छांटते छांटते खुद ही विश्व पटल पर बौने होकर रह गए। इधर लेखन में उम्र की कमी को संख्या से पूरी करते करते हिन्दी साहित्य में किताबों की एक बाढ़ सी आ गई जहाँ बेहतर को तलाशना भी एक समस्या प्रतीत होने लगी है।

        भारत में ऐसे लेखकों कवियों की भरमार है जिन्होंने किताबें छपवाकर अपने घर भर लिए। उन्हें अब यही चिन्ता रहती है कि उनके बाद इन किताबों का क्या होगा ? और मुफ्त में बांटी किताबों को कौन पढ़ता है ? वो भी ये भली भांति जानते हैं।

        मंचों, कविसम्मेलनों का तो और भी बुरा हाल है। यहां सारी व्यवस्था ठेकेदारों और जगह जगह उगी संस्थाओं की गिरफ्त में हैं और सब काम जुगाड़ों और तुम मुझे बुलाओगे तो हम तुम्हें वाली संस्कृति प्रचलित है। यहाँ श्रोता अधपचे और जल्दी में उलट दिये गये मानसिक उत्सर्जन पर मख्खियों की तरह भिनभिनाते हैं और बुद्धिजीवी वर्ग बदबू से परेशान हो किनारा कर गया। निराला, बच्चन वाली परंपरा गई और कविता बाजार की वस्तु बन गई । एक दुकान चली तो उसे बेचने के लिए सैकड़ों और खुल गईं।

        इस बाज़ारू सोच से साहित्य का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा कई पत्रिकाओं ने अपने मूल साहित्यिक रूप को छोड़ कर व्यवसायिक जामा पहन लिया तो कुछ महज वहाँ व्यवसाय तलाशने लगी जहाँ औरत की जांघों से ऊपर कुछ सोचा ही नहीं जाता या यूं कहें कि ये दौर साहित्य का व्यवसायिक काल होकर रह गया, जहाँ हर कोई थोड़ा बहुत बौद्धिक और आर्थिक निवेश कर नाम, शोहरत और पैसा चाहता है। साहित्यिक सामाजिक सरोकारों की परवाह अपवाद स्वरूप ही नजर आती है ।

        समाधान के अभाव में अधिकतर कथन एक नये विवाद और समस्याओं के जनक बन जाते हैं। जब वैचारिक सम्पन्नता के लिए बहुत पीछे लौटकर पन्ने पलटने पड़ें तो वर्तमान गरीब दिखने लगता और हमारे वैचारिक विकास पर प्रश्न चिन्ह अपने आप ही लग जाता है या कोई भी लगा जाता है।

          किताबों के ढ़ेर से बेहतर चुनना एक दुश्कर कार्य प्रतीत होता जा रहा है। पाठक के पास विकल्प है परंतु अधिकांशतः वह भी बड़े  नामों और बाजारू प्रलोभनों में उलझा दिखाई पड़ता है परंतु समय हमेशा ही वर्तमान और भविष्य के लिए बेहतर और उपयोगी साहित्य चाहता रहा है क्योंकि यही वो राह है जो मशीन बनते आदमी को संवेनाओं से जोड़े रख सकता है।

       कारण कुछ भी हो या दोशी कोई भी हो परिणाम भविष्य और भावी पीढ़ी ही भुगतती है। हम सोचते हैं या सोचने के लिए कुछ छोड़ जाते है या कभी कह भी जाते हैं-

चिंतन पर भारी हुये रिस्ते पद औ नाम ।

सब स्वारथ के खेल हैं परिपाटी बदनाम।।

 


-भुवनेश्वर उपाध्याय

डबल गंज सेवढ़ा  जिला दतिया (म. प्र.) – 475682

मो. 7509621374

ईमेल-    bhubneshwarupadhyay@gmail.com

गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...