औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Saturday, 12 March 2016

नई किताब : ज्योति खरे के कविता संग्रह पर वंदना गुप्ता



‘होना तो कुछ चाहिए‘ कवि ज्योति खरे जी का पहला कविता संग्रह है जो ब्लु बक पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित है. जैसा कि नाम है संग्रह का मानो वो खुद संवाद कर रहा हो अपने समय से, न केवल आकर्षित करता है बल्कि सोचने पर विवश भी कि आखिर कवि किस होने की बात कर रहा है ? कौन सी चिंताओं को समेटे है उसका अंतःकरण, कौन सी पीड़ा, कौन सी हताशा, कौन सी खरोंच है जिसने कवि को विवश किया ऐसा कहने पर और जब आप संग्रह में प्रवेश करेंगे तो पाएंगे कवि की ह्रदय स्थली में उपजी मर्मान्तक पीड़ा का दिग्दर्शन . अपने समय को रेखांकित करना इतना आसां नहीं होता उस पर कवि पिछले ४० साल से लिख रहा है तो उसमे तो पूरा एक कालचक्र समाया है . उस पर पहला कविता संग्रह इतने वर्षों बाद लाना ही कवि की चिंताओं को व्यक्त करता है मानो वो मजबूर हो गया तब जाकर उसने ये कदम उठाया |
कविता बांसुरी सी बजे तो कृष्ण याद आएगा और यदि उसमे देश काल समाज की विडम्बनाओं की आँख में आँख डालने का माद्दा हो तो कुरुक्षेत्र में उपस्थित गीता ज्ञान याद आएगा . यहाँ आपको दोनों ही स्वर सुनाई देंगे जहाँ कम शब्दों में गहरी बात कहने का कवि को हुनर पता है जो किसी भी पाठक की कसौटी पर खरा उतरता है .
शुरुआत करती हूँ संग्रह की पहली ही कविता से :
अन्तः स्थल में / रेगिस्तान सी /जलती हुई बालू/ रोम रोम झुलस रहा /मन दहाड़ रहा /आत्मसंतोष है /
फिर क्यों सूख रहा तालू ?/जीवन का दूसरा / पन्ना पलटना चाहता हूँ /
‘ अँधेरे में आया था ‘ कविता का ये टुकड़ा न केवल कवि मन की बल्कि हर ह्रदय का विलाप है . अँधेरे में आया था / अँधेरे में जा रहा हूँ / खून अपना / अमृत समझ का पी रहा हूँ ......मानवीय वेदना का ऐसा खाका पेश करती है जहाँ सत्य एक है कि नहीं जान पाए जीने का औचित्य , जैसे आये वैसे ही चले जायेंगे . जीवन असमानताओं , उलझनों , पीडाओं का समंदर है जहाँ कामनाओं से उपजती यातनाएं जब भी उद्वेलित करती हैं प्रश्न ही प्रश्न दस्तक देते हैं क्या सिर्फ पत्थर ही हैं और पत्थरों को ही जन्म देने तक है जीवन ? आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा ? कवि दूसरा पन्ना पलटना चाहता है अर्थात जीवन का औचित्य जानना चाहता है , आखिर हम यहाँ आये किसलिए हैं ? खाना पीना सोना बच्चे पैदा करना ही क्या जीवन है ? ये तो पशु भी जानता है तो फिर क्या फर्क है हममें और एक पशु में , मानो कविता के माध्यम से कवि मनुष्य होने को परिभाषित करना चाहता हो , बताना चाहता हो , कहना चाहता हो जरूरी है अपने होने के मकसद को पहचानना और यही है जीवन की सार्थकता अन्यथा अँधेरे से आकर अँधेरे में जाने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहेगी तो क्या फर्क रह जाएगा एक नाली के कीड़े और मनुष्य होने में .

सारे जीवन का मानो निचोड़ है ये कविता . पहली ही कविता दे देती दस्तक , करा जाती है अहसास चावल कितने पके हैं . यूँ ही नहीं जीवन का शाश्वत सत्य मुखर हुआ है , तमाम ज़िन्दगी का अनुभव यहाँ बावस्ता हुआ है तभी तो जाने माने साहित्यकार होते हुए भी तक़रीबन ४० वर्षों से लिखते रहने के बावजूद अब जाकर कवि ज्योति खरे का पहला कविता संग्रह ‘ होना तो कुछ चहिये ‘ पाठकों के हाथ में आया है . ज़िन्दगी भर की तपस्या और अनुभव का खजाना लेकर कवि मानवीयता के धर्म का हर जगह पालन करता नज़र आया है .

आज अन्धानुकरण किस दिशा की ओर ले जा रहा है उसको इंगित करती है कविता ‘ आवाजें सुननी पड़ेंगी ‘ . कंक्रीट का जंगल कैसे खा रहा है हरियाली की चादर को कि जो दस्तक हो रही है उसे सुनकर भी आज मानव अनजान बना हुआ है जिसका नतीजा पिछले दिनों केदार त्रासदी या कश्मीर में बाढ़  के रूप में दिखा मानो कवि उसी की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहता हो और कहना चाहता हो आज नहीं तो कल ये आवाजें सुननी ही पड़ेंगी अन्यथा दुष्परिणाम के लिए मानव खुद जिम्मेदार होगा .
धसकती जमीन पर जमे पहाड़ / गिट्टियों की शक्ल में / बिक रहे हैं / कोई नहीं सुनता / इनके टूटने की कराह
या फिर
जंगली जड़ी बूटियों पर / डाका पड़ने के बाद / जम गयी है / पेड़ों के घुटनों में मवाद
कवि चीख चीख कर ध्यान आकर्षित करना चाहता है कैसे धीरे धीरे ख़त्म हो रही है प्रकृति और उसका दोहन एक दिन उसके चीत्कार को जब जन्म देगा तो कोई उपाय नहीं होगा बचने का इसलिए जरूरी है मानव का समय से जागना और उचित कदम उठाना वर्ना बाद में सिवाय पछताने के कुछ हाथ नहीं रहेगा .

‘ आसमान तुम चुप क्यों हो ? ‘ कविता के माध्यम से मानो एक बार फिर कवि सोयी हुई आत्माओं को झिंझोड़कर जगाना चाहता है असलियत से वाकिफ करते हुए कि यदि आज नहीं जागे तो कल ऐसा वक्त आ जायेगा जब तुम्हारी सोच , तुम्हारी जमीन , और तुम्हारे क्रियाकलापों तक पर तकनीक और स्वार्थपरता इतनी हावी हो जायेगी कि जब तक तुम्हें अहसास होगा तब तक तो बचाने को कुछबचेगा ही नहीं , ऐसा संवेदनहीन समय आ जायेगा , न हरियाली बचेगी न ही साहित्य और न ही मानवीय संवेदनाएं यदि समय रहते इंसान जागृत नहीं हुआ उसकी अपनी नस्ल बचानी भी मुश्किल हो जायेगी , कैसा होगा फिर धरती का स्वरुप ? प्रश्न खड़ा करते हुए भविष्य दर्शन भी करा रहा है कवि मानो मनुष्यता को बचाने का अंतिम उपाय यही बचा है उसके पास कि उसे अपनी कविता के माध्यम से आईना दिखाते हुए जागृत करे और पूछे , आसमां तुम चुप क्यों हो ? और विचारने और समय रहते सही कदम उठाने को प्रेरित कर सके . कल कैसा निठल्ला वक्त आ जाएगा सब रोबोटिक हो जायेगा तो कहाँ ढूंढेंगे हम जल जंगल और जमीन और कहाँ मिलेंगे रिश्तों के पैकेज ?
‘ फिनाइल की गंध होगी वातावरण में ‘ के माध्यम से मानो कहना चाहता हो जिस गंध से तुम परहेज करते थे कल उसी में तुम्हें जीना होगा , ‘ मनुष्य के सामाजिक प्राणी है ‘ एक उक्ति भर रह जाएगा तब बौखलाओगे क्योंकि आदत है तुम्हें सामाजिकता की उसे विमुख होकर रहना नहीं है तुम्हारी फितरत लेकिन जब तुम खुद अपने ही हाथों अपनी कब्र खोद रहे हो तो उसमे दबना भी तुम्हें ही पड़ेगा इसलिए जागो करो उपाय मानवता और प्रकृति को बचाने को क्योंकि यही है मनुष्य को बचाने का सबसे उत्तम उपाय .

कवि को प्रकृति से कितना प्रेम है ये उसकी लगभग हर तीसरी कविता में दृष्टिगोचर हो रहा है क्योंकि मानव है भी तो प्रकृति से ही निर्मित . भूमि जल वायु अग्नि और आकाश पंचतत्वों से बना है तो पंचतत्व उसको आकर्षित करेंगे ही तभी तो ‘ ओ मेरी सुबह ...’ में सुबह से बतियाता कवि सुबह की एक एक गिरह खोल रहा है जिसे पढ़कर पाठक मंत्रमुग्ध हो उठता है , आहा ! मैंने क्यों नहीं देखा या महसूस कभी सुबह को इस तरह .

‘ और एक दिन ..’ नदी और स्त्री जीवन की वेदना का वो चित्रण है जिससे हम में से कोई भी अछूता नहीं . स्त्री हो या नदी दोनों की दशा और दुर्दशा को एकीकृत कर दिया है कवि ने . कैसे दोनों ही दोहन का शिकार होते हुए भी तमाम उम्र खुद को विसर्जित करती रहती हैं लेकिन नहीं जानते वो कि इस दोहन का हश्र क्या होगा जब नहीं रहेगी नदी या स्त्री ? एक प्रश्न पर कविता का अंत करते हुए कवि सोचने को मजबूर करता है ये कैसा समय है और कैसा भविष्य होगा ?

‘ औरत पिस जाती है ...’ एक बार फिर स्त्री की दुर्दशा का ही चित्रण है . और औरत /पिस जाती है / चटनी की तरह / सिल बट्टे पर ...’ शायद यही है उसकी नियति , सारी ज़िन्दगी खुद को होम करते बिताती है , सबके लिए जीती और मरती है और फिर उसका जो हश्र होता है वो किस्से छुपा है , उसी का चित्रण है ये कविता .

‘नंगी प्रजातियों कि / जीभ भी नंगी / लपलपाती , थूक गटकती , देती है नंगे बयान ‘ आज के सच को उजागर करती है कविता ‘ काले मुंह के बन्दर ‘ . कैसे आज जनता का शोषण हो रहा है सभी जानते हैं और कवि ने उसी व्यवस्था पर प्रहार किया है . कवि का रोष चंद पंक्तियों में ही पूरा आकार ग्रहण कर लेता है , कितना व्यथित है कवि ह्रदय तभी कह देता है अंत में हर मानव के मन की बात क्योंकि आम जनता के पास नहीं है माध्यम कोई भी अपने मन की बात कहने का तो कवि की कलम उनकी आवाज़ बन उभरी है इस कविता में इस तरह :
‘ चचोरकर पी जाते हैं / सारी व्यवस्थाएं / सुखा देते हैं / खेत , खलिहान , बगान ... ‘

विभाजित खेमों में / विभाजित हंसी को / हालात का अंदाज़ा नहीं है / कि लोग / सफ़ेद चादरों पर बैठे हैं / दर्द की कराह सुनने ...’ एक बार फिर उसी व्यवस्था पर प्रहार है जिसने शायद सीखा ही नहीं हंसी सुनना , आदत है जिसे उनको पीड़ित देखने की क्योंकि उनका अंतिम उद्देश्य यही है खुद को बनाए रखने के लिए अपनाओ हर उपाय . जब सब खुशहाल होंगे तो कैसे सिंकेगी उनकी रोटी , तो दर्द और तकलीफों की उपज से ही बना करती हैं उनके महलों की मीनारें , वो जानते हैं , इसलिए ‘ लिखी जा रही हैं / संवेदनाओं की पीठ पर / टकराव की मनगढ़ंत कहानियां ‘ कहकर मानो कवि ने सारे चेहरे बेनकाब कर दिए हों कविता ‘ कि लोग ‘ में .

‘ किसी का क्या जाता है ‘ कविता आज का सच है , चारों तरफ क्या हो रहा है पता चलता है जो एक खबर भर ही होता है सबके लिए सिवाय उसके जिस पर वो घटित हुआ हो , ऐसे संवेदनहीन हो गए हैं आज हम , मानो उसी को परिभाषित किया ही कवि ने . जो आज का सबसे बड़ा सच है कि हम सिवाय अपने के और किसी के बारे में सोचना ही नहीं चाहते , कितने स्वार्थी हो गए हैं जो सिर्फ मैं और मेरा तक ही सिमट कर रह गए हैं जिस पर सोचना जरूरी है मानो कविता के माध्यम से इंसानियत को जिंदा करने की कवि की कोशिश है . काला दुःख , लाल कपट , सफ़ेद छल जैसे प्रतीक सोचने को विवश करते हैं कि कैसे इतने असंवेदनहीन हो गए हैं हम .

‘ कोई आएगा कविता ‘ बुजुर्गों खास तौर से बुजुर्ग माँ और बेटे के रिश्ते पर छायी बर्फ है जहाँ एक माँ अपने विश्वास के साथ जीती है वहीँ बेटे के लिए माँ सिर्फ उपयोगिता की वस्तु भर है जिसे जब जरूरत हो तो हांक ले जाएगा अपने बच्चों को लोरियां सुनवाने के लिए अर्थात एक आया ही बनाने के लिए सही कम से कम इसी बहाने बेटा आएगा तो सही उसे बुलाने और ले जाने , एक माँ का विश्वास और आस का अद्भुत चित्रण है कविता जो झकझोर जाती है .

‘ कोख में पलने लगी है धूप ‘ स्त्री पुरुष सम्बन्ध का जीता जागता उदाहरण है कैसे वो स्त्री का अपने मतलब के लिए हमेशा से इस्तेमाल करता रहा और करता रहेगा वहीँ स्त्री भी करती है अपनी नाकाम सी कोशिश कि हो कोई अपना जो अपनेपन से सहला दे उसे , सहेज ले उसे लेकिन हर बार जैसे हारती है मानो हारना ही उसकी नियति है लेकिन पुरुष जानता है कैसे अपने जीवन में उजास भर सकता है , कैसे उसका उपयोग कर सकता है और फिर करता है . मानो कवि कविता के माध्यम से स्त्री और पुरुष दोनों को चिन्हित कर रहा है कि कैसी है उनकी प्रकृति .
‘ चेहरा ‘ इन्सान का आईना होता है और फिर जब उम्रदराज होता है तो अनुभवों की पोटली का नुमाइंदा होता है जहाँ खुल जाते हैं हर चेहरे के भेद फिर कोई कितने ही चेहरे पर चेहरे लगाए घूमे .

‘ गुस्सा हैं अम्मा ‘ के माध्यम से कवि ने आज के समय की व्यथा को उकेरा है कि कैसा समय आ गया है जहाँ चारों तरफ सिर्फ हत्या , बलात्कार और आतंक ने ही अपने पाँव पसारे हुए हैं ऐसे समय में एक स्त्री मन कैसे बिलखता है या कैसा महसूसता है मानो उसी का दस्तावेज है कविता जो सोचने को मजबूर करती है जब कहती है :
गुस्से में रोते हुए / कह रही है अम्मा / यह मेरी त्रासदी है / कि , मैं पुरुष को जन्म दिया / और वह बन गया जानवर ...’

‘ नहीं देखना चाहती सपने ‘ एक बार फिर समय की त्रासदी का ही दस्तावेज है जहाँ आँखें सपने नहीं देखना चाहतीं तो सपने भी बेचैन हैं कि मिले कोई आँख जिन में सजकर लहलहा उठें हम .
और यही सच ‘ सपनों ने ‘ कविता में उकेरा गया है . दोनों ही कवितायें आज के भयावह समय का ही दिग्दर्शन कराती हैं .
‘ संभावनाओं के कैक्टस ‘ मानव का रेगिस्तान में पानी ढूँढने का उपक्रम है . चाहे कितनी ही अनंत पीडाएं हों , दुःख हों , त्रासदियाँ हों वो अपने विश्वास और आस का परचम लहराना नहीं छोड़ता और उसकी यही जीवन को सकारात्मक देखने का दृष्टिकोण सहायक होता है रेगिस्तान में भी दरिया खोजने में , उसे जीवन जीने में क्योंकि  संभावनाओं की नाव पर बैठकर ही जीवन रुपी नदी पार की जा सकती है , आशा का दामन न छोड़ना ही मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है जो उसे जीवन जीने को प्रेरित करती रहती है फिर चाहे समय कितना ही प्रतिकूल क्यों न हो .

‘ अभी बाकि है ‘ कविता में कवि एक बार फिर उम्मीद की किरण साथ लेकर चलता है क्योंकि जानता है सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है और उसे जगाये रखना है हर जीवन में आशा का दीप .

समय की काली रेत पर ‘ आज़ादी की त्रासदी है , एक खूंखार वक्त से आँख मिला जिस आज़ादी को पाया आज वो ही अपने वजूद को खोज रही है लेकिन यहाँ कौन आज़ाद है ? एक प्रश्न खड़ा करती कविता मानो कह रही है क्या है आज आज़ादी का स्वरुप जहाँ बोलने कहने तक की स्वतंत्रता नहीं , जहाँ आज सिर्फ एक ढकोसला भर रह गया है आज़ादी का उत्सव मनाना जबकि अपनी मानसिक गुलामी से आज भी आज़ाद नहीं हैं हम और न ही आज़ाद है कोई भी शोषित और पीड़ित वर्ग सिवाय हुक्मरानों के तो कैसी आज़ादी है ये ? आज़ादी अपना अस्तित्व खोजती कर रही है मानव की सोच पर प्रहार मानो कह रही हो जानते भी आज़ादी का वास्तविक अर्थ .
‘ समय का पन्ना ‘ मानो जीवन का अंतिम पृष्ठ लिखा जा रहा हो साथ में एक प्रश्न खड़ा होता है कि जिसका खुलकर स्वागत किया जाना चाहिए उसी से इतनी दूरी क्यों रखी जाती है ? समस्त दुःख , दुश्चिंताओं , असहजताओं, जटिलताओं , अव्यवस्थाओं से मुक्ति देती हूँ फिर भी सर्वग्राह्य नहीं , आखिर क्यों ?
‘मेरा अस्तित्व अनिर्धारित टाइम बम है / जीवन की छाती में / हर घडी गड़ती हूँ / कसकती हूँ / जिजीविषा के तलुए में / कील की तरह
कवि ने कविता के माध्यम से एक ऐसी रूपरेखा खींची है जो सोच की कील को बहुत घुमाती है और जब अंतिम बंद पड़ती है कविता का तो सोच के सारे ताले खुल जाते हैं और रहस्य ऐसे उजागर होता है मानो तिलिस्म से कोई सुंदरी प्रकट हुई हो
‘ मैं अपने आप को मिटा देना चाहती हूँ / स्वाभाविक जीवन और / तयशुदा बिन्दुपथ पर से / नहीं अदना चाहती / किसी गाँठ की तरह / क्योंकि , मैं / समय का आखिरी पन्ना / मृत्यु हूँ ‘
यहाँ खोलता है कवि भेद . मृत्यु के मन की व्यथा को इस खूबसूरती से उकेरा है कि पाठक मंत्रमुग्ध सोचता रह जाता है .
सम्पूर्ण संग्रह यदि देखा जाए तो मानवीय चिंताओं का प्रस्तुतीकरण है . संग्रह की शुरुआत ज़िन्दगी की तरह होती है जहाँ समय के गर्भ से जन्मती है पहली कविता ‘अँधेरे से आया था’ अर्थात जीवन की शुरुआत और अंतिम कविता ‘ समय का पन्ना ‘ मृत्यु का उद्बोधन है तथा मध्य में सारे जीवन की दुश्चिंताएं हैं , जैसा कि आम इंसानी जीवन होता है या उसका आदि मध्य और अंत होता है वैसा ही संग्रह को स्वरुप दिया है कवि ने . आदि और अंत के मध्य तमाम जीवन की त्रासदियों के बीच कहीं कहीं प्रेम के फूल भी खिले हैं तो कहीं रिश्तों के अहसास भी कसमसाए हैं तो दूसरी तरफ प्रकृति के प्रति कवि की दीवानगी अपना अलग ही आकार लेती है . वहीँ पिछले ४० वर्षों का लेखा जोखा एक संग्रह में समेटना कितना मुश्किल होता है फिर भी कवि ने जिन कविताओं को संजोया है कहीं से लगता ही नहीं कि ४० वर्ष पहले लिखी गयी है क्योंकि आज के समय में भी वो उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उस समय रही होंगी जो सिद्ध करती हैं कि कविता कालजयी तभी होती है जब हर काल में प्रासंगिक हो .वहीँ थोडा सा कवि का अपनी कविताओं से मोह भी नज़र आता है जिस कारण कुछ वो कवितायें शामिल की हैं जो शायद न भी होतीं तो कोई फर्क नहीं पड़ता , कहीं कहीं कुछ कच्चापन कच्ची आम्बी सा नज़र आता है तो लगता है ये शुरूआती होंगी जिनका मोह कवि त्याग न पाया होगा मगर पूरा संग्रह एक परिपक्व कवि की सोच का आईना है जो पठनीय और संग्रहनीय है . कवि का लेखन अनवरत जारी रहे और पाठक को कवितायें पढने को अब लगातार मिलती रहे यही शुभकामनाएं कवि को देना चाहती हूँ .
जो भी पाठक संग्रह मंगवाना चाहे तो ब्लू बक पब्लिकेशन से मंगवा सकता है . संग्रह का मूल्य २४९ रूपये हैं .
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प्रकाशक - ब्लू बक पब्लिकेशन, प्लाट नंबर १३ , गली नंबर ९ , रौशनपुरा एक्सटेंशन, नज़फगढ़ , नयी दिल्ली –११०४३

समीक्षक : वंदना गुप्ता, डी – 19 , राणा प्रताप रोड, आदर्श नगर दिल्ली – 110033, मोबाइल : 09868077896

11 comments:

  1. वंदना जी की बहुत पारदर्शी समीक्षा हेतु साधुवाद
    सार्थक संयोजन हेतु
    राहुल भाई का बहुत बहुत आभार
    सादर

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  2. वंदना जी की बहुत पारदर्शी समीक्षा हेतु साधुवाद
    सार्थक संयोजन हेतु
    राहुल भाई का बहुत बहुत आभार
    सादर

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  3. वंदना गुप्त जी ने यह समीक्षा वड़े परिश्रम से लिखी है. किंतु इस समीक्षा में कहीं व्याख्या स्पष्ट नहीं हो सकी है. वहाँ भ्रम और कौतूहल आ खड़े होते हैं. जैसे संग्रह की आरंभिक पंक्तियों की व्याख्या. पंक्तियाँ हैं- अंतस्थल में/रेगिस्तान सी/जलती हुई बालू. यहाँ रेगिस्सतान क्या कोई वस्तु ,है जिसके जलने से बालू के जलने की तुलना की गई है, स्पष्ट नहीं होता. रेगिस्तान की बालू का ही जलना तो रेगिस्तान का जलना कहलाता है. दूसरे कवि का- "रोम रोंम झुलस रहा/मन दहाड़
    रहा." फिर भी कवि को- "/आत्मसंतोष है/" पर कैसे यह समीक्षक ने स्पष्ट नहीं किया. "फिर क्यों सूख रहा तालू" कवि का यह पूछना एकदम असंगत लगता है. यहाँ तो तालू को सुखाने की सारी सामग्री मौजूद है. और बिना इस प्रश्न को सुलझाए वह जीवन का दूसरा पन्ना पलटना चाहता है. आत्मसंतोष के कारण ही पन्ना पलता है तो ऐसा कर वह पाठकों को उसमें क्यों लपेटता है. आत्मसंतोष कोई बहुत क्रांतिकारी बात तो नहीं ही है.

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    1. यदि पूरा ही लिख दूँगी तो कविता पढने का रस जाता रहेगा इसलिए कुछ बातों को परदे में रखा है ताकि कम से कम पाठक मन में एक उत्कंठा तो बनी रहे आखिर कवि ने ऐसा कहा क्यों ? और वो ही प्रश्न आपके मन में उठा . इसलिए तो आपको कविता पढनी ही पड़ेगी न :)

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    2. वैसे जवाब पूरा है उसमे यदि आप ध्यान से पढ़ें तो , वैसे भी एक टुकड़े से पूरी कविता क्या कहना चाहती है कोई नहीं समझ सकता , टुकड़ा सिर्फ इसलिए लगाया जाता है जिससे पाठक तक उसकी पहुँच हो सके .



      ‘ अँधेरे में आया था ‘ कविता का ये टुकड़ा न केवल कवि मन की बल्कि हर ह्रदय का विलाप है . अँधेरे में आया था / अँधेरे में जा रहा हूँ / खून अपना / अमृत समझ का पी रहा हूँ ......मानवीय वेदना का ऐसा खाका पेश करती है जहाँ सत्य एक है कि नहीं जान पाए जीने का औचित्य , जैसे आये वैसे ही चले जायेंगे . जीवन असमानताओं , उलझनों , पीडाओं का समंदर है जहाँ कामनाओं से उपजती यातनाएं जब भी उद्वेलित करती हैं प्रश्न ही प्रश्न दस्तक देते हैं क्या सिर्फ पत्थर ही हैं और पत्थरों को ही जन्म देने तक है जीवन ? आखिर कब तक ऐसा होता रहेगा ? कवि दूसरा पन्ना पलटना चाहता है अर्थात जीवन का औचित्य जानना चाहता है , आखिर हम यहाँ आये किसलिए हैं ? खाना पीना सोना बच्चे पैदा करना ही क्या जीवन है ? ये तो पशु भी जानता है तो फिर क्या फर्क है हममें और एक पशु में , मानो कविता के माध्यम से कवि मनुष्य होने को परिभाषित करना चाहता हो , बताना चाहता हो , कहना चाहता हो जरूरी है अपने होने के मकसद को पहचानना और यही है जीवन की सार्थकता अन्यथा अँधेरे से आकर अँधेरे में जाने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहेगी तो क्या फर्क रह जाएगा एक नाली के कीड़े और मनुष्य होने में .

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  4. वैसे भी कविता की मूल ध्वनि को ही पकड़ा जाता है और उसी पर कहा जाता है , जो मैंने कहा है . बाकि अपनी अपनी समझ है . मुझे जो समझ आया मैंने अपना दृष्टिकोण रखा .

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  5. मुझे लगता है आपने अपने को आलोचना का खुदा मान ळिया है, जैसा आप अपनी टिप्पणी में कहती हैंं. आप यह मानती लगती हैं कि आलोचना की आपकी जो समझ है वही अंतिम है. आप कहती हैं कि आलोचना में कुछ ही बातें कही जाती हैं कुछ परदे में छोड़ दी जाती हैं. मुझे मालूम था कि जिन बातों को छोड़ा जाता है उसके मंतव्य की ओर ईशारा तो किया ही जाता है. आलोचना के समीक्षा (review) रूप में यह सतर्कता से किया ताता है. समीक्षक का ध्यान इस बात पर रहता है कि समीक्षा ऐसी लिखी जाए जिसे पढकर पाठक कृति के प्रति आकर्षित हो. पर आपकी समीक्षा कृति के प्रति विकर्षण ही पैदा करती है. जब पुस्तक को पढ़े बिना कुछ नहीं समझा जा सकता तब आपकी समीक्षा किस काम की. आप कहती हैं आलोचना में केवल मूल ध्वनि को पकड़ा जाता है. आपने समीक्ष्य पुस्तक में उसकी कौन सी मूल ध्वनि पकड़ी है कुछ साफ नहीं. मैंने समीक्षक से समझना चाहा था कि "रेगिस्तान सी/ जलती हुई बालू" में जो उपमा का प्रयोग है, क्या उपयुक्त है. कवि का रोम रोम झुलस रहा है तो गला तो सूखेगा ही. फिर वह क्यों प्शनाकुल है कि उसका गला सूख रहा है. यह तो समीक्षक को बताना ही प़़ड़ेगा कि कवि किस विशेष अर्थ की ओर ईशारा कर रहा है. इतनी सी बात को समझने के लिए पूरी किताब पढ़ने की क्या आवश्यकता है. क्योंकि यह संकलन कवि की फुटकर कविताओं का संकलन है. फुटकल कविताएँ अपने आप में ही पूर्ण होती है. कवि की ऐसी ही अनुभूतियों से मेरी समझ में उनकी पूरी पुस्तक भरी पड़ी होगी जो यथार्थ कल्पना से कोसों दूर हैं. और समीक्षक ने इन असंगतियों पर ध्यान न देकर उसपर पर्दा डालने का काम किया है जैसा आप स्वीकार भी करती हैं.

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    1. शेषनाथ जी अब मैं पूरी कविता तो टाइप करके आपको पढवा नहीं सकती . बाकि आपको पसंद नहीं आई तो वो भी मुझे स्वीकार्य है . मैं कोई समीक्षक नहीं .......एक पाठक हूँ और पाठकीय दृष्टिकोण से जो समझती हूँ कहती हूँ . आपको समय नहीं आई तो आप पूरी किताब को ही खराब कैसे कह सकते हैं मेरी समझ से परे है. आप बिना पढ़े किसी संकलन के बारे में राय बना लेते हैं तो ये आपका निर्णय है . मैं किसी पर न आक्षेप करती हूँ न कोई राय बनाती हूँ . हाँ , जिस संकलन को पढ़कर जो महसूसती हूँ अवश्य लिखती हूँ . वृहद् समीक्षा जब की जाती है तब एक एक शब्द या पंक्ति पर प्रतिक्रिया लिखी जाती है . छोटी समीक्षा में तो जो पाठकीय मन को प्रभावित करता है उसे ही उद्धृत किया जाता है . आपने जिस हिसाब से पहली पंक्ति लिखी है उससे तो यही लग रहा है जैसे आप पहले से ही मन बनाये बैठे हैं मुझे या कवी को गलत कहने का वर्ना 'आलोचना का खुदा' शब्द का प्रयोग न करते .जहाँ तक मंतव्य की और इशारे की बात है मैंने कह दी आपको समझ नहीं आई ये या तो आपकी कमी है या मेरी , इसका निर्णय जो आप को अच्छा लगे ले लें . कोई कभी किसी भी चीज का खुदा नहीं हो सकता और मैं तो एक अदना सी इंसान हूँ . मेरी क्या औकात और हैसियत .

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  6. आपने अपनी एक टिप्पणी में खुद लिखा है की आज के आलोचक अपने को खुदा मानते हैं.
    मैंने तो उसी हिसाब से पहली पंक्ति लिखी है जिस हिसाब से आपने दी है.मैं आपकी की ही पंक्ति को कापी कर देता हूँ-
    अन्तः स्थल में / रेगिस्तान सी /जलती हुई बालू/ रोम रोम झुलस रहा /मन दहाड़ रहा /आत्मसंतोष है / फिर क्यों सूख रहा तालू ?/जीवन का दूसरा / पन्ना पलटना चाहता हूँ /
    वास्तव में रेगिस्तान सी जलती हुई बालू का क्या अर्थ है. मुझे समझ में नहीं आया. रेगिस्तान तो जलता नहीं, जलती या गर्म होती है बालू. उसे ही रेगिस्तान का जलना कहा जाता है.फिर रेगिस्तान सी जलती बालू? और आप कितनी चतुर हैं कि मेरे प्रश्न से साफ बच कर निकल गईं. फिर मुझे यह भी समझ नहीं आया कि ह्रदय में जलती हुई बालू की जलन है जो कवि के रोम रोम को झुलसा रहा है, मन को तडपा रहा है, तो गला तो सूखेगा ही. फिर क्यों वह बेचैन है कि गला क्यों सूख रहा है.और विडम्बना देखिये उसे इससे आत्मसंतोष भी है. बेचैनी और आत्मसंतोष एक साथ? कोई गूढ़ बात होगी. मान लीजिए मुझे कविता की समझ नहीं है तो इधर उधर की बातें न कर मैंने जो शंका जाहिर की है उसे दूर कर दीजिए ना.
    Miss/Mrs Gupta, अपने ग्रुप के लोगों से परामर्श कर लीजिए, आपको स्पष्ट हो जाएगा मैं कितना गलत हूँ. समीक्षा के क्षेत्र में उतरी हैं तो धीरज रखिये. मैंने जिन बातों की तरफ ईशारा किया है, उसपर ध्यान दें, मनन करें. समीक्षा निर्मम होनी चाहिए. मेरा इतना ही कहना है कि संकलन की पहली ही कविता की व्याख्या ठीक से नहीं हो सकी है तो पाठक के मन में उठे प्रश्न उसे व्याकुल करेंगे ही.

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    1. मैंने तो खुद को खुदा नहीं माना न ......मुझे जो लगा जो समझ आया जो मेरी छोटी सी बुद्धि में आया वो कह दिया . यदि आप ज्यादा समझना चाहते हैं तो कृपया बुक पढ़िए और फिर कवि से पूछिए उसने ऐसा क्यों लिखा . मैं तो एक पाठकीय दृष्टिकोण से लिखती हूँ . आप उसे किस दृष्टि से देखते हैं वो आपका दृष्टिकोण है .

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  7. आलोचक बनने के सन्दर्भ में पहली बात आत्मालोचन करना सीखिए. प्रश्न सामने आ पड़ने पर विदकिए मत, उसका सामना कीजिए. "मुझे जो लगा, जो समझा", कहकर पल्ला झाड़ लेना समीक्षक का सबसे बड़ा अवगुण है. कविता की जिन पंक्तियों का अर्थ आपको स्पष्ट नहीं उन पंक्तियों को उद्धृत न करें. असली बात तो यह है कि इन पंक्तियों का अर्थ समझने की आपने चेष्टा ही नहीं की है. इन पंक्तियों का अर्थ आपने क्या समझा है, इस समीक्षा में आपने दिया ही नहीं. मेरी टिप्पणी को आप अन्यथा न लें. समीक्षा के क्षेत्र में पदार्पण किया है तो सीखने की मंशा रखिए, ऊल जुलूल तर्क देने की नहीं.

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