औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Sunday, 30 August 2015

नवनीत पाण्डेय की 5 कवितायेँ


जंतुआलय 
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अरे देखो देखो!
क्या गज़ब कौतुक है
चूहे,बिल्ली,कुत्ते
आपस में खेल-खा रहे हैं
चौकीदार हंसा
इस में कौतुक क्या है
मैं तो रोज ही देखता हूं
तुम  हमारे जंतुआलय 
शायद पहली बार आए हो!


पोर पोर दुखता है.....
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जब भी कोई पत्थर
दरक के
लुढकता है

ढलानो का
कलेजा
मुंह को आ जाता हैं
पोर पोर दुखता है.....


छोटी छोटी बातें
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घड़े का शीतल जल पीते हुए
क्या तुम्हें स्मरण आया कभी
घड़े के बनने की प्रक्रिया
उसे बनाने और 
तुम तक पहुंचाने वाले 
हाथों का

पेट भरते हुए कभी सोचा
कैसे, किसने 
क्या क्या सहा है
तब तुम्हारे मुंह में 
स्वाद से भरपूर
यह निवाला आया है

बरसों से रह रहे हो
जिस घर में तुम
कितना जानते हो
उस घर के इतिहास 
नींव की ईंटो के बारे में

तुम्हारी सारी 
बड़ी बड़ी बातें
मैं जान लूंगा
पर शर्त है
तुम्हें भी 
जाननी होंगी
मेरी ये 
छोटी छोटी बातें........


एक शानदार फ्लैट पाओ...
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तुमने सबसे पहले 
ललचाया ट्रेक्टर के लिए
मेरे खेत से हल हटवाया
मेरे सर कर दिया
पहला कर्ज़ा 
खेत को रेहन रखवाया

फिर तुमने 
मेरे बीजों पर वार किया
एक टोल फ्री नम्बर बताया
समय की नब्ज़ पहचानो!
इस पर बात करो!
अधिक उपज के नुस्खे जानों!

अब तुम कह रहे हो
क्यूं इतना मर रहे हो
सौ- पचास क्विंटल के लिए
परिवार सहित झुर रहे हो
तुम्हारी ज़मीन बहुत कीमती है
इतना पाओगे
ब्याज ब्याज में ही
निहाल हो जाओगे
करोड़ों पाओगे

इसे बेच निजात पाओ
झोंपड़ी की जगह
इसी ज़मीन पर 
बननेवाली शानदार 
बहुमंजिला रेजीडेंसी में
एक शानदार फ्लैट पाओ...


पारखी नज़र
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मुझे संदेह है
उनके परिंदे होने पर
क्योंकि नहीं दिखे
उनके कहीं पर
बावजूद इसके
देखा
नापते उन्हीं को
नित नई ऊंचाइयां
बिना किसी डर
हर कहीं पर
ये क्या है चक्कर...?

बहुत आसान है
एक परिंदे ने बताया
हंसकर
हर कोई उड़ सकता है
बाजार में उपलब्ध है
जादुई पर
जो छुआ देते हैं पल भर में
बड़े बड़े आसमां
बस होनी चाहिए
उन्हें परख लेनेवाली
पारखी नज़र
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नवनीत पाण्डे 
जन्मः 26 दिसंबर सादुलपुर (चुरु).शिक्षाः एम. ए.(हिन्दी), एम.कॉम.(व्यवसायिक प्रशासन), पत्रकारिता -जनसंचार में स्नातक। हिन्दी व राजस्थानी दोनो में पिछले पच्चीस बरसों से सृजन। प्रदेश- देश की सभी प्रतिनिधि पत्र- पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन।
प्रकाशनः हिन्दी- सच के आस-पास, छूटे हुए संदर्भ, जैसे जिनके धनुष (कविता संग्रह) यह मैं ही हूं, हमें तो मालूम न था (लघु नाटक) प्रकाशित व सुनो मुक्तिबोध!, जब भी देह होती हूं (कविता संग्रह) शीघ्र प्रकाश्य राजस्थानी: लुकमीचणी, लाडेसर (बाल कविताएं), माटीजूण (उपन्यास), हेत रा रंग (कहानी संग्रह), 1084वें री मा - महाश्वेता देवी के चर्चित बांग्ला उपन्यास का राजस्थानी  अनुवाद। पुरस्कार-सम्मानः लाडेसर (बाल कविताएं) को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का जवाहर लाल नेहरु पुरस्कारहिन्दी कविता संग्रह सच के आस-पासको राजस्थान साहित्य अकादमी का सुमनेश जोशी पुरस्कारलघु नाटक यह मैं ही हूंजवाहर कला केंद्र से पुरस्कृत होने के अलावा राव बीकाजी संस्थान-बीकानेरद्वारा प्रदत्त सालाना साहित्य सम्मान। संप्रतिः भारत संचार निगम लिमिटेड- बीकानेर कार्यालय में कार्यरत सम्पर्कः  ’प्रतीक्षा२ डी २, पटेल नगर, बीकानेर(राज)   call +919413265800 
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Friday, 21 August 2015

स्वाति तिवारी के उपन्यास 'ब्रह्मकमल' पर चेतना भाटी की समीक्षा

प्राकृतिक और आँचलिकता के साथ-साथ गहरी संवेदना से भरा उपन्यास

      प्राकृतिक दृश्य और उसके सौंदर्य शास्त्र को इमैनुअल कैट ने १७८१ में विस्तृत अर्थों में परिभाषित करते हुए इसकी व्याख्या की और इस शब्द के सुंदर अर्थ “भावनात्मक समझ का दर्शन शास्त्र” कहा| स्वाति तिवारी का नवीनतम उपन्यास ब्रह्मकमल एक प्रेम कथा प्राकृतिक दृश्यों के सौंदर्य शास्त्र की इसी व्याख्या को स्पष्ट करता है| उपन्यास उत्तराखण्ड की पृष्ठभूमि पर रचा गया है जहाँ प्रकृति ने अपना खजाना बिखेर रखा है पूरे उपन्यास में प्रकृति मुखर है और कहा जा सकता है कि इसमें प्रकृति दृश्य की तरह नहीं बल्कि पात्र की तरह जीवंत बनी हुई है जो दृश्यों के माध्यम से पाठकों से बात करती है|
      प्राकृतिक दृश्य भूमि के किसी एक हिस्से की सुस्पष्ट विशेषताए लिए होता है, जिनमें प्राकृतिक स्वरूपों के भौतिक तत्त्व, जल निकाय, जैसे नदियाँ, झीलें, सागर, झरने, पहाड़, प्राकृतिक रूप से उगनेवाली वनस्पतियों सहित धरती पर रहनेवाले जीवन, मिट्टी, मौसम, अन्य तत्त्व और परिस्तिथियाँ शामिल होती हैं| उपन्यास एक प्रेम कहानी के माध्यम से एक प्राकृतिक यात्रा है एक ऐसी यात्रा जिसमें यात्रा जीवन है जीवन यात्रा है और जीवन के साथ चलनेवाले तत्त्व स्मृति और विस्मृति के बीच उभरते कथा का हिस्सा बनते और चले जाते| उपन्यास पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि प्रकृति और मनुष्य का अद्भुत रिश्ता है कभी प्रकृति हमारे साथ जीती जागती है तो कभी हमारे लिए शिक्षक है वह हमें हर पल कुछ ना कुछ सीखती है| मनुष्य की जीवन यात्रा में प्रकृति साथ होती है| उपन्यास इंगित करता है कि भौतिक स्त्रोत और मानवीय संस्कृति को एकाकार होकर किसी स्थान विशेष की पहचान बनने में हजारों साल लगते हैं और इस उपन्यास में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है| स्वाति तिवारी मूलतः कथाकार तो हैं ही पर वे प्रकृति प्रेमी और पर्यावरण से भी जुड़ी हैं| उन्होंने कथा को देह के नहीं बल्कि प्रकृति के सौंदर्य से जोड़ा है| उपन्यास इस बात का कई बार इशारा करता है कि अपने आसपास देखो समस्याओं के समाधान और जिज्ञासाओं के हल वहीँ मिलेंगे|
      उपन्यास की शुरुआत बद्रीनाथ यात्रा से होती है| यह यात्रा एक लम्बे अंतराल की यात्रा है जहाँ बाल मन से प्रौढ़ा अवस्था तक की जीवन यात्रा शामिल है| यह यात्रा विस्मृति से निकल कर स्मृति की यात्रा है जहाँ जगह-परिवेश विस्मृत प्रेम कथा को लौटा लाते हैं स्मृतियों में| यह यात्रा पहाड़ों से मैदानों के बीच के अंतर की यात्रा है| यह हिमालय से कन्याकुमारी के बीच की यात्रा है| कहानी को बहा ले जाती या कहें कथा को प्रवाह देती अलकनंदा की यात्रा है| पढ़ते हुए लगेगा कि आप यात्रावृत्तांत पढ़ रहे हैं वही रोचकता इसमें बनी रहती है पर ध्यान से पढ़ने पर यह समझ में आता है कि यह एक कथा और उपकथाओं का गीतमय आख्यान है जिसमें धर्म भी यात्रा पर है और आस्तिकता भी| जहाँ आनंद भी यात्रा पर है और रोमांच भी| जहाँ आध्यात्म भी यात्रा पर है और सांसारिकता भी| जहाँ प्रेम एक गहरी समझ बन कर राकेश में प्रगट होता है तो प्रेम एक अवसाद बनकर उभरता है अपर्णा में| जहाँ प्रेम एक समर्पण बन नंदा में समा जाता है तो अवसाद बन कमल में| कहानी में विस्तार देने के लिए कहीं-कहीं पौराणिक कथा को हिस्सा बनाया गया है तो कहीं-कहीं उत्तराखण्ड की लोक कथाओं को बड़ी सहजता से कहानी में शामिल करके उत्तराखण्ड के लोकगीत भी डाल दिए गए हैं जैसे काफल की किवदन्ती| बेड़ीपाको का पहाड़ी कुमाँऊ गीत भी है तो घुघुती की कविता भी है| उपन्यास में स्वाति समय और समाज को उसकी गत्यात्मकता में पकड़ने का और परखने का उपक्रम करती है| यहाँ भी एक विशेषता उन्हें अन्य उपन्यासकारों से अलग करती है वह यह है कि वह छोटी-छोटी बातों को पकड़ती हैं उन्हें रचती हैं और बड़ा अर्थ प्रदान करती हैं| उनके उपन्यास में कोई चीज़ अलग-थलग दिखाई नहीं देती वह रचना के विकास में सहजता से शामिल होकर प्रवाह में बहती है|
      उपन्यास में प्रेम और प्रकृति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट झलकती है वे प्रेम को प्रकृति का हिस्सा मानती हैं| स्वाति ने उपन्यास में कई आध्यात्मिक एवं दार्शनिक प्रयोग किए हैं जैसे वे लिखती हैं “हाँ प्रसाद का थाल तो ईश्वर की कृपा से ही मिला है, सौंदर्य, सामर्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति का आशीर्वाद है| सुख-समृद्धि और सामर्थ्य सब प्रभु की ही माया है ईश्वर भी जानते हैं नैतिक और मानसिक शुद्धता बहुत ज़रूरी है जीवन में|”
      दार्शनिक मूड में वे लिखती हैं- “जब प्रेम, संवेदना और अनासक्ति का विस्तार होता है तो समझना चाहिए कि हमारे क़दम सही दिशा में बढ़ रहे हैं|”
      कहानी का आधार प्लेटोनिक लव है| मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसकी खूब विवेचना की गई है लेकिन अहसास के आधार पर इसकी अनुभूति को व्यक्त करना नामुमकिन कहा गया है| यह ऐसा प्रेम है जो जन्मों तक स्मृतियों में रचा बसा रहता है| इसमें दैहिक आकर्षण नहीं होता यह भावनात्मक होता है| उपन्यास में लेखिका ने गहरी संवेदना के साथ प्रेम और पारिवारिक रिश्तों की कथ्यात्मक विवेचना की है| उनकी भाषा और सांस्कृतिक जानकारी पर मजबूत पकड़ है| उनकी उपन्यास गाथा छोटे-छोटे ब्योरों के साथ सहजता से विकसित होती है वे परिकल्पना के पात्र नहीं गढ़ती बल्कि सामान्य चरित्र को निर्मित करती है| व्याख्या की जगह संवाद का इस्तेमाल करती है| स्मृति संवाद के माध्यम से वे अंतःक्रिया के रूप में अंतरंगता प्रकट करती है| कहानी के केंद्र में अपर्णा है| अपर्णा एक पारिवारिक अवकाश यात्रा पर है साथ है पति और किशोर उम्र बेटी| यात्रा से लौटते हुए एक अदृश्य पात्र जो स्मृति में साकार होता है वह भी साथ आता है| कहानी का ताना-बाना इस अदृश्य पात्र के साथ गुंथा गया है| यात्रा वृत्तांत की तमाम रोचकता इसमें शामिल मस्ती, दृश्य, खाना-पीना, सानिध्य, स्नेह सभी स्पष्ट है| अंतर कथाओं में कुछ पौराणिक प्रसंग और कुछ उत्तराखण्ड की लोककथाएं कशीदाकारी की तरह कहानी को सौंदर्य प्रदान करती है जैसे राजा सगर की कथा, गंगा के धरती पर अवतरण का प्रसंग या बुंरास और काफल की लोककथाए, पहाड़ी लोकगीत कहानी को ताल देते हैं और प्रकृति के गहने की तरह पक्षी राजहंस, देवहंस, बुलबुल की जानकारी दी गई है| यात्रा के छोटे-छोटे पड़ाव कहानी को आगे बढ़ाते हैं जैसे औली की यात्रा, अनुसुईया की यात्रा, सहस्त्रताल की कथा ये सब सुनी हुई सी कथाएँ ऐसी लगती हैं ऊँचे पर्वत से कोई आवाज़ का परावर्तन हो रहा हो विज्ञान इसे इको कहता है पर उपन्यास में यह प्रेम की अनुगूंज की तरह लगती है|
      उपन्यास डायरी विधा में शुरू होता है और यात्रा वर्णन से आगे बढ़ता है| उत्तराखण्ड त्रासदी की खबर से शुरू होता है जो यह समझाता है कि पृथ्वी-आकाश, नदी-पहाड़, समुद्र-क्षितिज, झीलें-कुण्ड, जीव-जन्तु, फल-फूल, सबसे मिलकर जीवन है पर मनुष्य ने इन चीजों को और इनसे आगे देखना बन्द कर दिया है जो विनाश का कारण है|
      कहानी का अंत यदि थोड़ा और क्लाइमेक्स रचता तो उपन्यास का अनूठापन दोगुना हो सकता था| एक लम्बे अंतराल के बाद प्राकृतिक और आंचलिकता का सम्मिश्रण किसी उपन्यास में देखने को मिला है |

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ब्रहमकमल : एक प्रेम कथा/ उपन्यास/ स्वाति तिवारी/ किताबघर प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली/ मूल्य-300 रुपये/ वर्ष- फरवरी 2015/ पृष्ठ 200
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                        -चेतना भाटी
जेलर्स बंगलो,  रेसीडेंसी एरिया
इन्दौर 

Monday, 17 August 2015

मायामृग की कविताओं पर राहुल देव



जमा हुआ हरापन : जीवन से साक्षात्कार करती हुई कवितायेँ
राहुल देव

मायामृग हिंदी साहित्य का एक जाना-पहचाना नाम है | वे एक रचनाकार होने के साथ साथ एक प्रतिष्ठित प्रकाशक भी हैं | एक प्रकाशक का एक कवि भी होना सुखद है और व्यावसायिकता भरे इस बाजारवादी दौर में एक आश्चर्य भी | इनकी कवितायेँ मैं अक्सर फेसबुक पर पढ़ता रहता था जो हमेशा से मुझे उनके रचनाकर्म को नजदीक से जानने- समझने के लिए आकर्षित करती रहती थी |

‘जमा हुआ हरापन’ शीर्षक उनके इस कविता संग्रह में संग्रहीत अट्ठासी कविताओं के माध्यम से इस कवि के सीधे सरल व्यक्तित्व-कृतित्व का परिचय सहज ही मिल जाता है | इन कविताओं पर कुछ लिखना मेरे लिए थोड़ा चुनौतीपूर्ण भी रहा क्योंकि वह अपनी कविताओं में अपने विशिष्ट दर्शन के साथ बहुत दूर की सोचते हैं | मायामृग समकालीन काव्यधारा में अपनी मौलिक चिंतन दृष्टि के साथ आगे आये हैं | ‘सपनों की डायरी में’ शीर्षक संग्रह की पहली ही कविता देखें तो, ‘सपनों की निजी डायरी में/ एक शब्द लिखा/ प्यार.../...अगली सुबह/ मोहब्बत के क़त्ल की खबर/ अख़बार की सुर्ख़ियों में थी |’ इसे पढ़कर कहा जा सकता है कि मायामृग की काव्ययात्रा कल्पना से यथार्थ की ओर की अनथक यात्रा है | उनकी कविताओं के अर्थ व्यापक हैं |

मायामृग गहरे अर्थों वाली सार्थक कवितायेँ रचते हैं | मसलन उनकी कविता ‘प्रेम को प्रेम कहना’ का यह अंश दृष्टव्य है, ‘यह कुछ होगा अलग सा/कुछ अनकहा सा/ कुछ हाथ में लेकर छिटक जाने सा/कि जैसे रेलगाड़ी का आख़िरी डिब्बा/ठीक उस क्षण निकल गया/ जब हाथ उसे लगभग छू पा रहे थे...|’ मायामृग अपनी कविता में प्रेम को जिस तरह परिभाषित करते हैं, अद्वितीय है | उनकी कवितारुपी यह भावाभिव्यक्तियाँ उनकी संवेदनाओं का मार्मिक और अनन्य शब्द चित्र प्रस्तुत करती हैं | उन्हें अपने समय का प्रेम भी याद आता है जो कवि की स्मृतियों में कहीं बचा रह गया है, ‘दिन बीतते...रात रीतते.../अपने से ऊबे, वक़्त से उकताए, संबंधों से चिढ़े हुए/ उम्र पर खीझते हैं और/ खालीपन में बतियाते हैं भरे गले से/ कभी वक़्त अपना था...|’ (अपने वक़्त में प्यार शीर्षक कविता) लेकिन आज लोगों के अंतर से सच्ची प्रेमभावना की ऊष्मा ख़त्म होती जा रही है | यह देखकर कवि चिंतित होता है |

प्रेम वही है जो कवि समझ रहा है या कुछ और ही है | इस बात पर कवि कविता में अपनी अनभिज्ञता भी जाहिर करता है, अपनी ‘मुझे नहीं पता’ शीर्षक कविता में वह कहता है, ‘छुपी-छुपी सी आपसदारियां/ छोटी छोटी सी साझेदारियां/ क्या इत्ती सी बात को प्रेम कहते हैं...मुझे नहीं पता’ (प्रेम जरूर किसी बड़ी चीज़ का नाम होगा...कोई तो होगा जो बता पाए) यों कहकर वह प्रेम के सच्चे स्वरुप को खोलकर सामने रख देता है | पाठक मन उद्वेलित होता है | ऐसा भी लगता है कि संबंधों के खोखलेपन को कवि ने गहरे से महसूस किया है | दुनियादारी की तमाम सारी बातें उसके अन्दर के कविमन को रास नहीं आतीं | उसे नहीं मालूम कि प्रेम के लिए बनाई गयीं हैं सीमायें, मापदंड और कुछ कायदे | उसका मासूम हृदय तब इस विषय पर कविता लिखने के लिए विवश हो जाता है | वह प्रेम के सच्चे स्वरुप को जानना चाहता है | इसके लिए वह अपने आप से पूछता है तो वहीँ बाह्यजगत के लोगों से भी पूछना चाहता है- ‘जो दिखकर भी नहीं दिखता/ वह/ कुछ तो होगा जरूर...वह जो/ जो गिरते को थामने जैसा है...’ (‘शायद तुम्हें पता हो’ शीर्षक कविता) | उसे प्रेम पहली छुअन की तरह लगता है |

संग्रह की ‘शब्दों की जरूरत’, ‘तुम्हारी किताब में मेरा हिसाब’, ‘सुई-धागा’, ’फूलों की चादर’ जैसी कवितायेँ संवेदना के स्तर पर गहरे तक छूती हैं | ‘सुई-धागा’ में वह कहते हैं, ‘तुमने/ जो सुई-धागा दिया था/ सितारे टांकने को.../ उससे मैंने अपनी उदासी की उधड़ी चादर/ टांक ली/ कोई क्योंकर जान पाए/ उदासियों के पीछे कौन रहता है...’ यहाँ कवि पाठक को साथ लेकर उसे अपनी कविता से जोड़ लेता है | ‘आज फिर एक कविता : प्रेम के किस्से’ शीर्षक में कवि ने कथात्मक शैली का प्रयोग अपनी कविता में किया है | इस कविता में कवि ने विवाहेत्तर प्रेम के कुछ किस्से बयां किये हैं साथ ही कई सामाजिक चित्रों को भी बखूबी कविता के सांचे में ढाला है | ताजमहल को प्रेम का ऐतिहासिक प्रतीक माना जाता है, इस परिप्रेक्ष्य में भी कवि ने कुछेक महत्त्वपूर्ण कविताएं लिखी हैं |

जहाँ उनकी कविता ‘भविष्य की चर्चा’ को पढ़कर भवितव्य की रूहानी कविता का आस्वाद मिलता है | वहीँ कविता शीर्षक ‘इस सुहाने मौसम में’ शाइर एहतराम इस्लाम के कुछ अशआर स्मरण हो आते हैं कि, ‘अग्नि-वर्षा है तो है, हाँ ! बर्फ़बारी है तो है | मौसमों के दरमियाँ इक जंग जारी है तो है |’ इस संग्रह की बहुत सी कवितायेँ अपने कथ्य की मजबूती के कारण काफी सशक्त बन पड़ी हैं | ‘रात को देखे सपने से’ शीर्षक कविता में कवि लिखता है, ‘रात को देखे सपने से/ सुबह तक लड़ता रहा...’ या फिर ‘बिना धार के चाकू से’ शीर्षक कविता को ही ले लें | दरअसल इनके यहाँ प्रेम के साथ प्रेम का प्रतिपक्ष भी कविता का स्याह लेकिन महत्त्वपूर्ण पहलू के रूप में शामिल होता है | जिसके बगैर प्रेम की व्याख्या एकांगी ही मानी जाएगी | इस प्रतिपक्ष के पीछे की व्यथा-कथा भी कई कविताओं में अपने नियंत्रित स्वरुप में मुखर हुई है | वह अपनी कविता में यत्र-तत्र प्रश्न भी खड़े करते चलते हैं जैसे की ‘सूरज’ शीर्षक एक कविता की अंतिम दो पंक्तियों को ही देखें, ‘सवाल उतने ही जलते थे जितनी सूरज में आग.../सूरज जले तो जले.../तुम्हें रोशनी से मतलब...’

मायामृग ने पारिवारिक संबंधों पर भी काफी अच्छी कवितायेँ रची हैं | अपनी इन कविताओं में उन्होंने मानवीय अंतर्संबंधों की गहन पड़ताल करते हुए पाठक को सोचविचार करने पर विवश कर देते हैं | अपनी ‘पिता चुप रहते हैं’ शीर्षक कविता में वह इन सब बातों को क्रमवार रखते हैं कि हम क्या से क्या होते जा रहे हैं | आज परिवार नामक संस्था बिखर रही है | पहले घर-परिवार में पिता का अनुशासन होता था | पारिवारिक वातावरण में आत्मीयता झलकती थी | आज उन्हीं पिता का चुप रहना कवि को अखरता है | घरों की जीवन्तता न जाने कहाँ चली गयी है | हर कोई यंत्रवत जी रहा है बस | इस कविता में वह लिखते हैं, ‘घर के सबसे छोटे सदस्य आके मांगते हैं उनसे/ टाफियां और चाकलेट/ वे चुपचाप थमा देते हैं/ नहीं देते एक शब्द भी साथ/ जैसे शब्द तभी देंगें, जब मांगें जायेंगें...’ या इसके तुरंत बाद आने वाली कविता ‘बड़ा होता बेटा’ जहाँ वह कहते हैं, ‘स्वतंत्रता के लिए लड़ा नहीं जो कभी/ जानता है स्वतंत्रता से जीना अपने में/ नहीं जानता वे गुलाम दिन/ जिनमें पिता ने काता एक एक सूत/ इस दिन को बुनने के लिए...’ इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद जन्मी पीढ़ी स्वतंत्रता के पहले की पीढ़ी की भावनाओं को क्या समझेगी | इसीलिए कहा भी गया है कि जब बेटे की लम्बाई पिता के बराबर हो जाए तो उससे मित्रवत व्यवहार करना चाहिए | आज आधुनिकता की चकाचौंध में सब अंधे हो चले हैं | अपनी ‘जिद बनाये रखने की जिद’ शीर्षक कविता में कवि कहता है, ‘जीना, होने और दिखने के बीच/ सच और सच की लड़ाई नहीं.../ अपने-अपने हिस्से को/ जी लेने की ज़िद है...’ इस कविता में कवि ने कुछ नवीन और गर्भित बिम्ब लिए हैं जैसे- ‘रोशनी की रस्सियों पर लटकते हुए/ अँधेरे से गुज़रना’ इससे कविताओं का अर्थवत्ता विस्तार में ध्वनित होती है | या ‘बस दस्तखत’ शीर्षक कविता में, ‘आग्रह आदेश की तरह आए और/ बात शिकायत की तरह/ निलंबित संबंधों में धीरे-धीरे/ संवाद सूली चढ़ गए...’ इस तरह कविताओं में अन्तर्निहित विचार बहुत परिपक्व हैं और पाठक के मन-मस्तिष्क को आंदोलित करते हैं और हमें रूककर सोचने पर विवश करते हैं |

मायामृग अपनी कविताओं के विषय की खोज़ में जीवन के भीतर बहुत दूर तक चले जाते हैं | उनके भीतर का कविमन अंतर्जगत में रूककर ठहरता भी है वहीँ बाह्यजगत की विसंगतियों को देखकर बाहर आकर विचलित भी होता है, चीखता भी है | इन कविताओं में कवि की मौलिक चिंतनधारा के दर्शन सहज ही हो जाते हैं | संग्रह की कई कवितायेँ अपने कथात्मक विस्तार को आगे लेकर बढ़ती दिखाई देती हैं | इसमें आपको जीवन के कई सारे विमर्श देखने को मिलेंगें | ‘खुश रहो स्त्री’ शीर्षक कविता में एक स्त्री के जीवन की विडंबना चित्रित की गयी है | कविता सामाजिक विसंगतियों पर भी भरसक प्रहार करती है | स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर कवि ने कई अच्छी कवितायेँ लिखी हैं | मायामृग अपनी कविताओं में उन स्त्रियों की बात करते हैं जो अभी भी तमाम रूढ़ियों की जकड़न में जकड़ी हुई हैं | वे अपने घर की चारदीवारी की ओट से बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से अपने कल को देखना चाहती हैं | कवि भी उनके जीवन के इस बदलाव के प्रति आशान्वित है | उनकी ‘लकड़ियाँ बीनती लड़की’ शीर्षक एक छोटी सी कविता को देखें तो, ‘उम्र भर लकड़ियाँ बीनती लड़की/ धीरे-धीरे कब/ खुद लकड़ी हो गयी/ पता नहीं चला | / पहचान भी न पाता/ अगर/ सब लकड़ियाँ जलकर बुझने के बाद/ एक सुलगती ना रह जाती...|’ इस प्रकार वे अपनी कविता में कई बार स्थितियों के शब्दचित्र खींचते हैं और जहाँ जरूरी लगता है वहां प्रश्न भी खड़े करते हैं |

संग्रह की कुछ कविताओं में कवि कहीं-कहीं पर सपाटबयानी का शिकार हो गया है जहाँ पर कविता की आंतरिक लय खंडित होती सी दिखती है और प्रवाह बाधित होता है | हालांकि यह उनकी निजी शैली भी हो सकती है | फिर भी भाव, विचार व कथ्य का सधापन इन रचनाओं में कविता को बचा ले जाता है | ‘मां की आदत’ या फिर ‘भाई की कहानी’ शीर्षक कविता को देखें तो यह मां और भाई जैसे रिश्तों कवि की उदात्त भावनाएं व्यक्त हुई हैं इन दोनों कविताओं के माध्यम से | ‘छोटी-छोटी बातें’ शीर्षक कविता का भाव और विचार पक्ष सबल है | कवि मानवीय संवेदनाओ का पक्षधर है | अक्सर हम बड़ी-बड़ी खुशियों की खातिर छोटी-छोटी खुशियाँ छोड़ देते हैं | जीवन में छोटी- छोटी बातें भी कितनी महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं इसको इस कविता में दिखाया गया है | संग्रह की कुछेक छोटी कविताओं में कहीं-कहीं कुछ वाक्य सूक्तियों की तरह भी आते हैं जैसे ‘यादें’ शीर्षक कविता में, ‘यादें तरतीब से नहीं आतीं...बेतरतीबी कितनी गहरी है...’ मानो ये सूक्तियां यथार्थ व विशद जीवनदृष्टि से संपृक्त होने के कारण अनायास ही प्रतिफलित हुई हों | या फिर ‘तुम लिखो’ जैसी छोटी सी कविता पढ़कर एकदम स्पष्ट हो जाता है कि इस कवि के लिए कवितायेँ लिखना जीवन से साक्षी होना है |

‘जब भी मिलेंगें’ शीर्षक कविता हो या फिर ‘सीढ़ियाँ उतरते हुए’ शीर्षक कविता या फिर इस तरह की उनकी कई कविताओं को पढ़ते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में मायामृग की कवितायेँ अपना एक अलग मुहावरा रचती हैं | अपने टेस्ट और विशिष्ट शिल्प के कारण उनकी पहचान भीड़ से अलग है | प्रकाशन सम्बन्धी तथा अपनी अन्यान्य व्यस्तताओं के बीच आज भी वे लगातार कवितायेँ लिख रहे हैं | वह अपनी कविता में साधारण से लगने वाले सरल शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्यों का ऐसा क्रम देते हैं कि कविता में जान आ जाती है | यह उनकी कविताओं का सशक्त पहलू है जिससे पाठक उनकी कविता की ओर आकर्षित होता है |
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संपर्क- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) सीतापुर (उ.प्र.) 261203
ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

Sunday, 9 August 2015

सुशांत सुप्रिय : 5 कवितायेँ


हे राम !

उनके चेहरों पर लिखी थी
' भूख '
उनकी आँखों में लिखे थे
' आँसू '
उनके मन में लिखा था
' अभाव '
उनकी काया पर दिखता था
' कुप्रभाव '

मदारी बोला --
' यह सूर्योदय है '
हालाँकि वहाँ कोई सवेरा नहीं था
मदारी बोला --
' यह भरी दुपहरी है '
हालाँकि वहाँ घुप्प अँधेरा भरा था

सम्मोहन मुदित भीड़ के साथ
यही करता है
ऐसी हालत में
हर नृशंस हत्या-कांड
भीड़ के लिए
उत्सव की शक्ल में झरता है


स्त्रियाँ और वृक्ष

श्श्श
कि स्त्रियाँ बाँध रही हैं धागे
इस वृक्ष के तने से
ये विश्वास के धागे हैं
जो जोड़ते हैं स्त्रियों को
ईश्वर से

केवल स्त्रियों में है वह ताक़त
जो वृक्ष को ईश्वर में बदल दे

श्श्श
कि गीत गा रही हैं स्त्रियाँ
पूजा करते हुए इस वृक्ष की
ये विश्वास के गीत हैं
जो जोड़ते हैं स्त्रियों को
ईश्वर से

केवल स्त्रियों में है वह भक्ति
जो गीत को प्रार्थना में बदल दे

आश्वस्त हैं स्त्रियाँ अपनी आस्था में
कि वृक्ष के तने से बँधे धागे
उनकी प्रार्थना को जोड़ रहे हैं
उनके आदिम ईश्वर से


एक, दो, तीन और पाँच पैसे के सिक्के

मेरे बालपन की
यादों की गुल्लक में
अब भी बचे हैं
एक , दो , तीन
और पाँच पैसे के
बेशक़ीमती सिक्के

उन पैसों में बसी है
उन्नीस सौ सत्तर के
शुरुआती दशक
की गंध
उन सिक्कों में बसा है
माँ का लाड़-दुलार
पिता का प्यार
हमारे चेहरों पर
मुस्कान लाने का
चमत्कार

अतीत के कई लेमनचूस
और चाकलेट
बंद हैं इन पैसों में
तब पैसे भी
चीज़ों से बड़े
हुआ करते थे

एक दिन
न जाने क्या तो
कैसे तो हो गया
माँ धरती में समा गई
पिता आकाश में समा गए
मेरा वह बचपन
कहाँ तो खो गया

अब केवल
बालपन की यादों
की गुल्लक है
और उस में बचे
एक, दो , तीन
और पाँच पैसे के
बेशक़ीमती सिक्के हैं ...

हज़ार-हज़ार रुपये के
नोटों के लिए नहीं
इन बेशक़ीमती पुराने
सिक्कों के लिए
अब अक्सर
बिक जाने का
मन करता है


काम पर बच्चे

सुबह के मटमैले उजाले में
दस-ग्यारह बरस के
कुम्हलाए बच्चे
काम पर जा रहे हैं

बुझी हुई हैं उनकी आँखें
थके हुए हैं उनके चेहरे

नहीं गा रहे वे
कोई नर्सरी-राइम

नहीं देख रहे वे स्वप्न
देव-दूतों या परियों के

जब उन्हें खेलना था
साथियों संग
जब उन्हें हँसना था
तितलियों संग
जब उन्हें घूमना था
तारों संग
वे काम पर जा रहे हैं

पूरा खिलने से पहले ही
झड़ गई हैं
उनके फूलों की
कोमल पंखुड़ियाँ
पूर्णिमा से पहले ही
हो गई है अमावस
उनके चाँद की
वसंत से पहले ही
आ गया है पतझर
उनके ऋतु -चक्र में

हर रोज़
सुबह के मटमैले उजाले में
यही होता है
हमारा अभागा देश
इसी तरह
अपना भविष्य खोता है


नट बच्चा

शहर के गंदे नाले के
एक किनारे
डेरा लगाया है नटों ने
उन्हीं नटों में
एक बच्चा भी है

उसकी बाज़ीगरी ही उसकी
बाल -सुलभ लीलाएँ हैं
ऊँची रस्सियों पर
सँभल-सँभल कर चलना ही
उसके बचपन का खेल है

सुदूर ग्रह-नक्षत्रों जैसे
दूर हैं हम-आप उससे
उसके दुखों से
उसकी चिंताओं से

सारी पंच-वर्षीय योजनाएँ
उससे बहुत दूर हैं
बहुत दूर है
दिल्ली उससे

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