औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Tuesday, 15 December 2015

राजकिशोर राजन की तीन कविताएँ


उनका दुख, उनके बारे में किस्से

उनको दुख था कि इन दिनों पत्नी
उदास, अनमनी-सी रहती क्यों है
और साझा किया था अपने दुख को
अपने निकटतम मित्र से
जिसे बाकी कहते व्यंग्य में
उनका लँगोटिया यार

इसके बाद जुड़ गया, यह किस्सा उनके साथ
कि नहीं रहे चंदेसर बाबू पूरा मर्दाना
हो गई है उनमें किसिम-किसिम की मिलावट
अब आँख में धूल झोंकते हैं
पत्नी के सँग पर्यटक बन
कभी दिल्ली तो कभी बनारस
कभी चारों धाम घूमते हैं

उनको दुख था कि बेटा पढ़ाई में होशियार कम नहीं
है दुनियादारी की समझ भी
पर पता नहीं, क्यों हो गया घर-घुसना
दोस्ती-यारी कुछ नहीं
बोलता भी है तो जैसे मुँह में जुबान नहीं
ऐसे में कैसे जियेगा संसार में

इसके बाद उनके बारे में यह किस्सा भी जुड़ गया
कि बेटा भी गया बाप पर
जैसे कि माँ गुने बछडू़, पिता गुने घोड़
ना गुने तो थोड़ो-थोड़

उनको दुख था कि जिस नौकरी में पिसते रहे
जवानी से शुरू कर बुढ़ापे तक चैंतीस साल
उस नौकरी में भी जहाँ से शुरू किये
वहीं हो गयी यात्रा खत्म
अब रिटायरमेंट के बाद खोलेंगे
एक छोटी-मोटी मिठाई की दुकान
चूँकि मिठाइयाँ उन्हें लड़कपन से प्रिय थीं


इसके बाद उनके बारे में
हास-परिहास से भरपूर यह किस्सा भी जुड़ गया
कि रिटायरमेंट के बाद
जलेबी छानेंगे चंदेसर बाबू

उनको दुख था
उनके मित्र ही उनसे करते रहे छल
कदम-कदम पर घात
और इससे उन पर होता रहा दारूण आघात
इस उमर में जा कर
उन्हें हुआ बोध
कि इस शातिर और धूर्त दुनिया में
वे रह गये अबोध

इसके बाद उनके बारे में यह किस्सा भी जुड़ गया
कि चंदेसर बाबू, आजीवन रहे
नंबरी स्वार्थी, लालची और मौकापरस्त
और ऐसा आदमी नहीं हो सकता
कभी किसी का मित्र

ऐसे कई-कई दुख हैं चंदेसर बाबू को
ऐसे कई-कई किस्से हैं उनके बारे में ।



यात्रा

हम जो पीते है सुबह-सुबह गरमागरम चाय
एक दिन स्थगित कर दें पीना
हो जाएं चाय के बागानों में चलने को तैयार
छँटते, चुनते, तैयार होते देखें
चाय की पत्तियों को बारिश में भीगते
धूप में चमकते

देखें तो सही
कि खेतों में कैसे पकते हैं धान
गेहूँ की बालियाँ
कैसे पहुँचती हैं खलिहान
गन्ने के अंदर बूँद-बूँद
कैसे उतरता है रस

सुबह से रात तक
हजारों चीजें हैं जिनका हम करते हैं उपयोग
जो जीवन में होती जा रहीं
एकरस, मामूली, बेस्वाद
आज नही तो कल हम पहुँचें उनके पास

स्वाद तक पहुँचने के लिए, इन दिनों
जरूरी है, बेहद जरूरी, यात्रा ।


भगदड़ में छुटी हुई चप्पलें

भगदड़ में छुटी हुई चप्पलें
कैसी होती हैं अभागिन
उब चप्पलों से पूछे कोई !

किसी बच्चे की मासूम, तुतलाती चप्पल
किसी तरूणी की मोहक, चमचमाती चप्पल
किसी बूढ़े की थकी, उदास चप्पल
सबकी अपनी कथा सबकी अपनी व्यथा
सभी को अपने पैर की तलाश
मगर मिलता है कौन, भगदड़ के बाद
निरीह, मूक, लाचार ये चप्पलें, मिल नहीं पातीं
कभी अपनी ही जोड़ीदार चप्पलों से

बेसहारा इन चप्पलों में अब नहीं होगी कभी पालिस
न पोंछा ही जायेगा कभी कपड़े या ब्रश से
न उन्हें नसीब होगी किसी की चौखट
और न किसी का पैर

बेकाम, बेवजह की इन चप्पलों को
सड़ना और गलना ही होगा किसी सड़क किनारे
कूड़ा बन किसी कूड़े के ढ़ेर में
अब मरना ही होगा

माताएं रोएंगी पुत्र के लिए
पुत्र, पिता के लिए
प्रेमिकाएं, प्रेमियों के लिए
और पत्नियाँ, पतियों के लिए

पर कोई नहीं रोयेगा

भगदड़ में छुटी हुई चप्पलों के लिए |
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2 comments:

  1. Bahut hi sunder jijaji.
    Manoj singh

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  2. राजकिशाेर राजन हिन्दी के उन थाेडे़ कवियाें में से हैं जाे अच्छा लिखने में विश्वास करते हैं शाेर करने में नहीं ... बहुत अच्छी कविताएँ हैं . प्रिय कवि काे सलाम व शुभकामनाएँ !!
    -कमल जीत चाैधरी .

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