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Saturday, 5 December 2015

रामकिशोर दाहिया के नवगीत संग्रह पर राजेन्द्र सिंह गहलोत की समीक्षा

ग्रामीण विमर्शवादी कविताओं का संग्रह : अल्लाखोह मची 

राजेन्द्र सिंह गहलोत

ग्राम्य सौन्दर्यग्रामीण जगत की सादगी, सरलता के गुणगान करतीं कविताए, अब ग्रामों के वर्तमान हालात के मद्देनजर प्रासंगिक नहीं रह गईं हैं। ग्रामों के वर्तमान जो हालात हैं, ग्रामवासियों की जो पीड़ा है, अब जरूरत है, उसके विश्लेषण की। साहित्य जगत में सामान्तः स्त्री विमर्श एवं दलित विमर्श का ही बोल बाला है जबकि वर्तमान में सबसे जरूरी विमर्श है ग्रामीण विमर्श। यद्यपि वर्तमान साहित्य में ग्रामीण विमर्श के स्वर पूरी तरह से मुखरित नहीं हुये हैं, पर ग्राम की माटी में जन्में कवियों के स्वर में वे प्रभावशाली ढंग से उभर जरूर रहे हैं। सही मायनों में, ग्राम की माटी में जन्में, ग्राम की समस्याओं से जूझते ग्रामीण कवियों की कविताओं में ही ग्राम्य जगत की पीड़ा उभरकर सामने आ रही है। अतः मौलिक ग्रामीण जगत के शिक्षित विवेकशील कवि ही ग्रामीण विमर्शवादी कवि के रूप में पहचाने जायेगे।
    आलोच्य कविता संग्रह के सृजक रामकिशोर दाहिया म.प्र. के कटनी जनपद के एक छोटे से ग्राम लमकना के मूलतः निवासी हैं। वे ग्रामीण जगत की समस्याओं से जूझते हुये उन्होंने ग्राम्य जगत की पीड़ा को भलीभाति महसूस किया है, ग्रामीण समस्याओं से वे दिन-प्रति-दिन रूबरू होते रहे हैं। ऐसी स्थिति में दाहिया जी अपनी कविताओं में ग्राम्य जगत की यथार्थ झांकी आंचलिक ग्राम्यभाषा में प्रस्तुत करने से अपने आप को रोक नहीं पाए हैं। संभवतः इसी वजह से संग्रह की कविताए खड़ी बोली में होने के बावजूद अपने आपको अधिक से अधिक आंचलिक भाषा के देशज शब्दों में अभिव्यक्त करतीं नजर आतीं हैं। यहां तक की कविता संग्रह का शीर्षक ‘‘अल्ला खोह मची’’ यथावत आंचलिक ग्राम्य जगत से लिया गया शब्द है। जिसका भावार्थ ‘‘हाहाकार से है जैसा कि कवि ने अपनी कविता ‘‘छाती पर बुलडोजर’’ में इस शब्द का प्रयोग करते हुये लिखा है। जबकि वस्तुतः अल्लाखोह शब्द ’’अल्लाह के खौफ’’ का अपभ्रंश है। ग्रामीण जगत सदा से खड़ी बोली में, उर्दू, अंग्रेजी, फारसी सभी शब्दों को अपनी बोलचाल की भाषा में अपने अनुरूप ढाल लेता है। या कहूँ कि हर सम्प्रदाय का ग्रामीण व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के अपने बोलचाल में उसका उपयोग करता है।
    संग्रह की कविताए ग्राम्य जगत के चप्पे-चप्पे का हाल बया करती हैं। वर्ग संघर्ष, शोषण, निम्न दलित वर्ग की दयनीय दशा, औद्योगीकरण, शहरीकरण में बिखरता, टूटता गाव, मॅंहगाई, रिश्तों में लगती जंग, शासकीय कर्मचारी एवं अफसरों द्वारा शोषण, दूषित लतों से ग्रस्त ग्रामीण जगत, कृषक मजदूरों की दयनीय दशा, कृषि का पिछड़पन, शासकीय योजनाओं से ग्राम विकास की मृगमरीचिका, घर-घर का बंटवारा, कोर्ट कचहरी, भूमाफिया द्वारा जमीन हड़पने के षड़यंत्र आदि। ग्राम्य जगत की हर छोटी बड़ी समस्या के कहर को ‘‘अल्लाह का खौफ’’ मानकर हाहाकार करते ग्राम जगत के दृश्यों का चित्रण कविताओं में अत्यन्त संवेदना परख तथा बेवाक ढंग से अपने फलक पर चित्रित करतीं है। इतना ही नहीं संग्रह की कविताए कवि की आत्मव्यथा, स्वाभिमान, प्रकृति चित्रण, आधुनिकीकरण, एवं इलेक्ट्रानिकमीडिया (इन्टरनेट) का ग्रामों में पड़ता प्रभाव, हिंसा, घोटालों को भी अपने लहजे में बतियाती हैं।
    कविता संग्रह की कविताए जिन विषयों पर बतियाती हैं, हो सकता है उन विषयों पर काफी कुछ लिखा गया हो, और लिखा जा रहा हो, लेकिन कवि जिस अंदाज में उन विषयों पर हाल-ए-बयां करता है, वह सर्वथा अनूठा है। मसलनः- औद्योगीकरण के प्रदूषण से त्रस्त गाव का यह दृश्य कितना मार्मिक हैः- ‘‘बड़का देव....सिद्ध की धरती/भूखी पापड़ बेले। बोकारो स्टील उड़ाता। मस्ती-मौज अकेले।’’ (पृष्ठ140) रिश्तों के संवेदन शून्यता में खिसकती मा-‘‘महरी छोड़े/पोंछा बर्तन/मरथल मा/लकवे से जूझे। मारे घर/बातों के कोड़े। हाथ-पाव नौकर के जोड़े।’’ (पृष्ठ130) मॅंहगाईः-‘‘नून-तेल/हरदी औ मिरचा। घर में बचा/न एकौ किरचा।’’ (पृष्ठ120) (निरंतर) (पृष्ठ-2) निम्न वर्ग की दयनीय दशाः-‘‘झमर-झिमिर भी/बरसे पानी/हालत/सार-सरीखी घर की। कभी गुड़ौसे। कभी मुड़ौसे। अगल-बगल तक/खटिया-सरकी।’’ (पृष्ठ 99) घर का बॅटवाराः-‘‘कहा-सुनी में/काका-काकी/माझिल हैं/ चहकारे में। मूड़ फूट जायेगा लगता। हींसों के बॅटवारे में।’’ (पृष्ठ 84) ग्राम्य सौन्दर्यः-‘‘मेरे आंगन में/ चिडि़या है। दाना दुनका पानी है। घर के आगे/ बूढ़ा बरगद। पीछे खेत/ किसानी है।’’ (पृष्ठ 81) दुर्दिन में जी जीजिविषाः- ‘‘दुर्दिन का हूँ मैं आभारी। पाला बड़ा किया। मा की आखें। पाव पिता के। देकर खड़ा किया।’’ (पृष्ठ 51) दबंग सवर्णों द्वारा शोषणः-‘‘इनकी लाठी। पनही चप्पल/ सब कुछ। हमने झेला। मौका पाया। माफी क्या। फुटबाल-सरीखे खेला।’’ (पृष्ठ40) घर की जिम्मेदारियों के निर्वाह में टूटता आदमीः-‘‘भार उमर से/ अधिक धरे है। लफ-लफ कमरी/ कमर करे है। ततर-तितिर/ पावों को धरता। और भला/ बोलो क्या करता।’’ (पृष्ठ 27) अवर्षा (सूखा) का एक चित्रः-भादों सिर/ पर पढ़े धूप की। चिलचिलाती बानी। आसों/ बादल टागे पानी।’’ (पृष्ठ 21)
मुहावरे, कहावतों, अहानों का जनक सदा से लोक जगत रहा है, ऐसी स्थिति में आलोच्य कविता संग्रह जो कि लोक जगत को रेखांकित कर रहा है, अपनी बात मुहावरों, कहावतों में कहने से कैसे पीछे रह सकता है। यदा-कदा नहीं बल्कि संग्रह की कविताओं में जगह-जगह आंचलिक लोक जगत की कहावतों एवं मुहावरों की अदभुत छटा बिखरी हुई है। ऐसी कहावतें जो नगर, महानगर के पाठकों ने कभी सुनी ना होगी। हा! उसे समझने में उन्हें थोड़ा दिमाग पर जोर देना पड़ेगा तथा मुहावरों की भाषा को समझना पड़ेगा। मसलनः- धोये पांव चढ़ा अधिकारी। चाट-चाट कर खुद को गोरा करने वाली कला। खरा कहें मौंसी का काजर/ फदक रहा हडि़या भर लकचा। तिली समझकर पाथर पेरे। लाठी देख बंदरिया नांचे आदि।
भावों की सम्प्रेषणीयकता के मद्देनजर किसी भी रचना की भाषा सर्वबोधगम्य होना चाहिए। इस दृष्टि से दाहिया जी की कविताओं में आंचलिक बोली के देशज शब्दों की भरमार है। उनके क्षेत्र के बाहर के पाठकों के लिए अबोधगम्यता की संभावनाए अधिक हैं। बेहतर होता कि आंचलिक बोली के देशज शब्दों का मोह त्यागकर दाहिया जी कविता के कथ्य की सर्वबोधगम्यता एवं सम्प्रेषणीयता पर अधिक ध्यान देते। साथ ही गौरतलब है कि ‘‘साहित्य समाज का दर्पण’’ मात्र नहीं होता है, बल्कि प्रेरक क्रान्ति का आवाहक होता है। अतः शोषण, दमन, भृष्टाचार के खिलाफ आक्रोश के स्वर मुखरित करती हुईं, ये कविताए युग परिवर्तन हेतु क्रान्ति का परचम भी फहराती तो और बेहतर होता। कुल मिलाकर संग्रह की कविताए ग्रामों का कच्चा चिट्ठा बयां करतीं हैं। एक समाज रिपोर्टर की तरह रिर्पोताज पेश करतीं हैं। जागरूक पाठक उन्हें पढ़कर बार-बार नये सिरे से ग्रामों की दयनीय दशा हेतु चिंतन के लिए बाध्य होगा।   

समीक्ष्य कृति- अल्लाखोह मची (कविता संग्रह)
कवि- रामकिशोर दाहिया  
प्रकाशक- उद्भावना प्रकाशन, गाजियाबाद
संस्करण-2014, पृष्ठ संख्या – 144, सजिल्द मूल्य 300/- रूपये
     
                                                     
समीक्षकः-राजेन्द्र सिंह गहलोत     
सिंह प्रिंटिग प्रेस पो0 बुढ़ार 484110
जिला-शहडोल (म.प्र.)

मोबा- 9329562110

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