Monday, 6 July 2020

कथा-समय : सुशांत सुप्रिय की कहानी - दो दूना पाँच

दो दूना पाँच
सुशांत सुप्रिय

कैसा समय है यह / जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं / सारी मशालें /
और हम निहत्थे खड़े हैं ...
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जैसे पहाड़ से एक बहुत बड़ा पत्थर तेज़ी से लुढ़कता हुआ सीधा उन्हीं की ओर  रहा था  जैसे समुद्र में उठी एक दैत्याकार सुनामी लहर बहुत तेज़ी से दौड़ती हुई सीधी उन्हीं की ओर  रही थी  प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप को उस पल ठीक ऐसा महसूस हुआ 
तमाम सबूतों और गवाहों के बयानों की रोशनी में मुल्ज़िम प्रकाश पर लगाए गए सारे इल्ज़ाम सही साबित हो गए हैं  मुल्ज़िम प्रकाश ने जो अपराध किया है वह जघन्य है  यह अदालत उसे दोषी क़रार देती है  मुल्ज़िम प्रकाश के इस कुकृत्य ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है  अदालत का मानना है कि यह अपराध
रेयरेस्ट ऑफ़  रेयर ' श्रेणी के अंतर्गत आता है  लिहाज़ा यह अदालत मुल्ज़िम प्रकाश वल्द कुँवर प्रताप को ताज़ीरात--हिंद की दफ़ा 302 के तहत फाँसी की सज़ा सुनाती है  ही इज़ टु बी हैंग्ड टिल ही इज़ डेड सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज
जस्टिस राममूर्ति की भारी आवाज़ अदालत में गूँज रही थी 
जैसे ख़राब मौसम में बीच मैदान में खड़े ऊँचे दरख़्त पर अचानक बिजली गिर
जाती है , प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप के लिए वह ठीक ऐसा ही पल था ...
बरसों पहले बहुत पूजा-पाठ , मन्नतों और डॉक्टरों के खूब चक्कर लगाने के बाद कुँवर प्रताप राय की पत्नी जानकी देवी ने एक लड़के को जन्म दिया था 
आख़िर हमें हमारे कुल का दीपक मिल ही गया कुँवर प्रताप ने शिशु को पहली बार गोद में उठाते हुए गर्व से कहा था 
कुँवर प्रताप राय ज़मींदार घराने से थे  उनके पिता कुँवर अखिलेश राय को अंग्रेज़ों ने ' राय साहब ' का ख़िताब दिया था  इलाक़े के दर्जनों गाँवों के बाशिंदे उनकी रियाया थे  दर्जनों कुएँ , तालाब , मंदिर और सैकड़ों बीघे ज़मीन उनकी सम्पत्ति थी  उनके दरवाज़े पर हाथी बँधे होते थे और उनके अस्तबल में ख़ास अरबी नस्ल के घोड़े थे  उनके लठैतों और बंदूकधारियों से पूरा इलाक़ा थर्राता था  कुँवर प्रताप राय को यह सब सामंती विरासत में मिला था  हालाँकि क़ानूनी तौर पर ज़मींदारी उनके पिता के समय में ही छिन चुकी थी लेकिन पुरानी ठसक अब भी मौजूद थी 
कुँवर प्रताप ने शिशु का नाम रखा -- प्रकाश 
कुँवर प्रकाश राय 
लेकिन जब प्रकाश नौवीं कक्षा में पढ़ता था तब एक बार शहर के किसी सहपाठी से झगड़ा हो जाने पर उसने अपने पिता का रिवाल्वर स्कूल में ले जा कर उस छात्र के सीने पर तान दिया था 
तूने ऐसा क्यों किया ? " अपने रसूख़ के बल पर मामला रफ़ा-दफ़ा करवा लेने के बाद बाप ने बेटे से पूछा था 
पापा , वह स्साला हम से बराबरी करना चाहता था  कुँवर प्रताप राय के बेटे से ! मास्टर की औलाद ! " प्रकाश ने घृणा और ग़ुस्से से कहा था 
जब प्रकाश दसवीं कक्षा में पहुँचा तो कुँवर प्रताप राय ने बेटे को हीरो-होंडा बाइक गिफ़्ट में दी  मोटरसाइकिल पा कर प्रकाश फूला नहीं समाया  एकाध साल के भीतर ही उसने अपना एक बाइक-गैंग बना लिया जिसमें इलाक़े के बाहुबली लोगों के लड़के शामिल थे  शहर की लड़कियों को छेड़ना और उन्हें आतंकित करना
इन लफ़ंगों का प्रिय शग़ल था  प्रकाश और उसके साथी कभी राह चलती किसी लड़की को छेड़कर सर्र से निकल जाते , कभी किसी बेख़बर लड़की की चुन्नी खींच कर उड़न-छू हो जाते  कभी-कभी ' हाइ ' फ़ील करने के लिए ये बिगड़े हुए लड़के राह चलती किसी महिला के गले से उसकी सोने की चेन भी खींच लेते  इस तरह धीरे-धीरे प्रकाश अपराध की दुनिया की ओर क़दम बढ़ाने लगा था  लेकिन यदि कभी बात बढ़ जाती और पुलिस-थाने की नौबत  जाती तो इन लड़कों के प्रभावशाली बाप मामले को रफ़ा-दफ़ा कराने में कोई कसर नहीं छोड़ते 
कॉलेज में दाख़िला लेने के बाद प्रकाश बेलगाम घोड़े-सा हो गया  कुँवर प्रताप राय ने अपना सारा पुश्तैनी धन शहर में बड़े-बड़े मॉल्स , मल्टीप्लेक्सेज़ और होटल ख़रीदने में लगा दिया था  वे अपने कारोबार में व्यस्त थे  घर पर भी कई बार बाप-बेटे की मुलाक़ात कई-कई दिनों तक नहीं होती  किसी दिन कुँवर साहब अपनी मर्सिडीज़ में रात में देर से घर लौटते , किसी दिन प्रकाश अपने दोस्तों के साथ पार्टियों या डिस्कोथेक में मस्त होता 
इस बीच एक नए ही क़िस्म के इंडिया की नींव रखी जा चुकी थी  चारो ओर विदेशी पूँजी की नायाब फ़सल उगी हुई थी ... चमचमाते मॉल्स थे  मल्टीप्लेक्सेज़
थे  बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ थीं  कॉल-सेंटर्स थे  शो-विंडोज़ में सजे-धजे मैनेक्विन्स थे  शीशे वाली लिफ़्ट्स थीं  बाज़ार की चकाचौंध थी  समूचे बाज़ार को ख़रीद कर अपनी अट्टालिकाओं में भर लेने को बेताब नव-धनाढ्य लोग थे और हर जायज़ -नाजायज़ तरीके अपना कर किसी तरह जीवन में करोड़पति और ' सफल ' बनने की ऐसे लोगों की तेज़ भूख थी 
एक ओर सेंसेक्स की भारी उछाल थी  दूसरी ओर भारत के करोड़ो भूखे-नंगे ग़रीब किसानों और मज़दूरों की झुग्गी-झोंपड़ियाँ थीं  इनके दुख-दर्द जीवन से बढ़ कर थे  इन्हें इन्हें दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं थी  इनके बच्चे कुपोषण और अकाल-मृत्यु के शिकार थे  इस नए क़िस्म के इंडिया में इनके लिए कोई जगह नहीं
थी 
प्रकाश इस नए क़िस्म के इंडिया का होनहार सपूत था  उसके पास लेटेस्ट
मोबाइल फ़ोन , लैप-टॉप , पॉम टॉप , आइ पॉड , आइ-पैड और  जाने क्या-क्या
गिज़्मोज़ थे  उसके पास रीड ऐंड टेलर के सूट थे  वैन ह्यूसेन और ज़ोडिएक की
क़मीज़ें थीं  बेनेटन और लेवीज़ की जीन्स थीं  रे-बैन के सन-गलासेज़ थे  वुडलैंड के जूते थे और टोयोटा लैंडक्रूज़र एसयूवीगाड़ी थी  उसके पास यह सब था लेकिन मूल्य नहीं थे , आदर्श नहीं थे , संवेदना नहीं थी , इंसानियत नहीं थी  यह वह युग था जब हर रात टीवीपर अधिकांश चैनल ' रियलिटी शोज़ ' के नाम पर दर्शकों के लिए धड़ल्ले से बेहूदगी परोस रहे थे  एक साथ कई पीढ़ियों के संस्कारों को नष्ट करने का कुत्सित खेल खेला जा रहा था  टीआरपीबढ़ाने की अंधी दौड़ में हर रात एक प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का गला रेता जा रहा था 
उन दिनों कॉलेज के महात्मा गाँधी सभागार में यूथ-फ़ेस्टिवल चल रहा था  उस शाम कविता-पाठ का आयोजन किया गया था  मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ कवि , रंगकर्मी और समाज-सेवक अकबर हाशमी जी मंच पर आसीन थे  उनके उदात्त और धर्म-निरपेक्ष विचारों से कौन नहीं अवगत था  कट्टरपंथी ताक़तें उनके विरुद्ध लामबंद हो रही थीं  बाद में माफ़िया और गुंडों ने उनकी निर्मम हत्या भी कर दी  किंतु उस शाम मंच पर आसीन अक़बर हाशमी एक व्यक्ति नहीं , संस्था लग रहे थे  रोशन विचारों के प्रखर सूर्य लग रहे थे :
" ... अब दिन
निर्जन द्वीप पर पड़ी
ख़ाली सीपियों-से
लगने लगे हैं
और रातें
एबोला वायरस के
रोगियों-सी

क्या आइनों में ही
कोई नुक़्स  गया है
कि समय की छवि
इतनी विकृत लगने लगी है ... "
काव्य-पाठ ज़ोरों पर था  अच्छी कविताओं को खूब सराहा जा रहा था 
" ... कैसा समय है यह
जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं
सारी मशालें और हम
निहत्थे खड़े हैं
कैसा समय है यह
जब भरी दुपहरी में
घुप्प अँधेरा है
जब भीतर भरा है
एक अकुलाया शोर
जब अयोध्या से बामियान तक
ईराक़ से अफ़ग़ानिस्तान तक
बौने लोग डाल रहे हैं
लम्बी परछाइयाँ ... "
तभी ऑडिटोरियम के बाहर नारेबाज़ी का शोर सुनाई दिया  देखते-ही-देखते
प्रकाश के नेतृत्व में पंद्रह-बीस गुंडा तत्व सभागार में दाख़िल हो गए  उनके हाथों में हॉकी-स्टिक्स , सरिये और साइकिल की चेनें थीं  वे कॉलेज द्वारा अकबर हाशमी जी को इस काव्य-संध्या का मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध कर रहे थे  कुछ ही पलों में वे गुंडे तोड़-फोड़ और मार-पीट पर उतारू हो गए  भगदड़ मच गई  कई छात्र-छात्राओं के सिर फूट गए  कइयों की बाँह टूट गई  कुछ छात्र-कार्यकर्ता बड़ी मुश्किल से मंच के पिछली ओर के दरवाज़े से अकबर हाशमी जी को बचा ले गए 
लेकिन इतनी बड़ी घटना के बाद भी प्रकाश और उसके गुंडा साथियों का बाल भी बाँका  हुआ  कॉलेज प्रशासन ने उन्हें केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया  यह आज़ाद भारत का दुर्भाग्य ही था कि गुंडा तत्वों के आका उच्च पदों पर आसीन थे  असामाजिक तत्वों को संरक्षण प्राप्त था  सच्ची बात कहने वाले को जान से मार दिया जाता था  सही बात कहने वाले लेखकों की किताबों पर पाबंदी लगा दी जाती थी  अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने वाले साहित्यकारों और कलाकारों को देश-निकाले का दर्द झेलना पड़ता था 
जल्दी ही प्रकाश कॉलेज का ' दादा ' बन गया  इस बार प्रकाश और उसके गैंग ने जूनियर्स की रैगिंग करते समय ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाए कि ' गुलाल ' फ़िल्म में दिखाए गए रैगिंग के हथकंडे भी उनके सामने फीके पड़ गए  मारे डर , अपमान , और पीड़ा के कई छात्र-छात्राओं ने कॉलेज छोड़ दिया  एक छात्र ने इस मानसिक यातना से पीड़ित हो कर आत्महत्या तक करने की कोशिश की  कॉलेज के शिक्षकों ने भी गुंडों के डर से चुप्पी साध ली 
हम सब घर-परिवार , बाल-बच्चे वाले हैं  इन गुंडों के मुँह कौन लगे  इनकी पहुँच ऊपर तक है  " लोग दबी ज़बान में एक-दूसरे से कहते 
कुछ पीड़ित छात्र-छात्राओं के अभिभावकों ने इन गुंडों के विरुद्ध शिकायत करने की भूल की  उन्हें शायद पता नहीं था कि कॉलेज की मैनेजिंग कमेटी के ज़्यादातर सदस्य प्रकाश और उसके गिरोह के अन्य लड़कों के प्रभावशाली पिता लोगों की जेब में थे  ज़ाहिर है , सभी मामले रफ़ा-दफ़ा कर दिए गए 
इस बीच प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप राय नगर-निगम के महापौर भी बन गए थे  उनका क़द कुछ और बढ़ गया था  उनकी नाक कुछ और खड़ी हो गई थी 
यह उन्हीं दिनों की बात थी  हुआ यह कि प्रकाश को कॉलेज में पढ़ने वाली एक लड़की निशा पर ' क्रश ' हो गया  अब यह तो कहीं लिखा नहीं था कि गुंडों को किसी लड़की को चाहने का अधिकार नहीं होता  लेकिन शरीफ़ घराने की कोई लड़की किसी गुंडे को लिफ़्ट दे , ऐसा भी नहीं सुना जाता 
लिहाज़ा प्रकाश को ग़ुस्सा  गया  ग़ुस्सा उसका ख़ानदानी हथियार था 
कहते हैं कि एक बार शिकार पर गए प्रकाश के परदादा के पालतू कुत्ते शेरा को किसी चीते ने मार डाला  चीते की इस धृष्टता से प्रकाश के परदादा इतने ख़फ़ा हुए थे कि उन्होंने एक हफ़्ते के भीतर सौ चीतों का सफ़ाया कर दिया था भारत में चीतों की प्रजाति के विलुप्त हो जाने के पीछे निसंदेह प्रकाश के परदादा की मुख्य भूमिका रही होगी 
प्रकाश के दादा का ग़ुस्सा भी किंवदंतियों का विषय बन गया था  हुआ यह था कि एक बार प्रकाश के दादा किसी काम से कोर्ट-कचहरी जाने के लिए निकले ही  कि एक कौए ने उनके सिर पर बीट कर दी  इस वाहियात हरकत से प्रकाश के दादा इतने नाराज़ हुए कि अपनी दुनाली ले कर वे कौओं के ख़ून के प्यासे हो गए  बताया जाता है कि उन्होंने अंजुलि में गंगा-जल ले कर यह शपथ ली कि वे पूरी पृथ्वी को सात बार काग-विहीन कर देंगे  पुराने लोग बताते हैं कि एक ही हफ़्ते में उन्होंने इलाक़े के तक़रीबन एक हज़ार कौए मार गिराए थे  कहते हैं कि इलाक़े का कोई भी ऐसा काग-परिवार नहीं बचा था जिसका कम-से-कम एक सदस्य इस काग-संहार में मारा  गया हो  कई काग-परिवारों की तो तीन-तीन पीढ़ियाँ प्रकाश के दादा के ग़ुस्से की बलि चढ़ गई थीं  पता नहीं इस बात में कितना दम है , किंतु लोक-कथाएँ ऐसे ही तो बनती हैं 
प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप राय का ग़ुस्सा भी जग-प्रसिद्ध था  बचपन में एक बार एक बंदर ने उनके हाथ से केला छीन लिया था  उन्होंने भी क़सम खाई कि वे उस इलाक़े से बंदरों को खदेड़ कर ही दम लेंगे  बड़े हो कर उन्होंने इलाक़े में काले मुँह वाले लंगूरों को बड़ी संख्या में ला कर छोड़ दिया  धीरे-धीरे इन लंगूरों ने बंदरों को उस इलाक़े से ही भगा दिया 
ऐसे ग़ुस्सैल ख़ानदान का चिराग़ था प्रकाश  इसलिए जब निशा ने उसे
'लिफ़्ट 'नहीं दी तो उसे ग़ुस्सा  गया  लेकिन यह क्रोध ऐसा भयावह रूप ले लेगा इसकी कल्पना तो प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप राय ने भी नहीं की थी 
एक दिन जब प्रकाश ने निशा से बदतमीज़ी करने की कोशिश की तो निशा ने उसे थप्पड़ जड़ दिया  प्रकाश आग-बबूला हो गया  उसी शाम जब निशा बाज़ार जा रही थी , प्रकाश अपने गिरोह के साथ बाइक पर आया और चलती मोटर-साइकिल से निशा के मुँह पर एसिड फेंक कर निकल भागा  ख़ुशक़िस्मती से प्रकाश का निशाना चूक गया  निशा ने अपने हाथ बचाव की मुद्रा में उठा लिए थे और अपना चेहरा पीछे झुका लिया था  इसलिए उसका चेहरा बच गया और एसिड का सारा वार उसके हाथों ने झेला  दर्द से तड़पती निशा को लोग अस्पताल ले
गए 
यह एक गम्भीर मामला था  लेकिन कुँवर प्रताप राय ने फ़ौरन बेटे को उसके ननिहाल भेज दिया  कई झूठे गवाह तैयार कर लिये गए जिन्होंने इस मामले में गवाही दी कि इस घटना वाले दिन प्रकाश शहर में था ही नहीं क्योंकि वह तो दो दिन पहले ही अपने ननिहाल चला गया था 
कुँवर प्रताप राय के पास रुतबा था , रसूख़ था , दौलत थी  लिहाज़ा प्रकाश एक बार फिर बच निकला  कुँवर प्रताप राय ने बेटे को सावधान रहने की सलाह
दी 
अगले कुछ महीने प्रकाश ने ' लो-प्रोफ़ाइल ' रहने की कोशिश की  लेकिन लम्पट जवानी के भड़कीले शोले को भला कौन रोक सकता है 
कुछ ही महीने बाद प्रकाश और उसके कुछ मित्र अपनी-अपनी गर्ल-फ़्रेंड्स के साथ ' सरिस्का ' में बाघ देखने के बहाने गए  लेकिन वहाँ उन्होंने दो ' ब्लैक बक '
हिरण की एक प्रजाति ) का अवैध रूप से शिकार करके उन्हें मार डाला  शहर के एक खोजी पत्रकार को इसकी भनक लग गई ब्लैक बक ' संरक्षित जीव थे  मामला तूल पकड़ने लगा  लेकिन लड़कों के बाप किस मर्ज़ की दवा थे  हर स्तर पर कुछ दे-दिला कर किसी तरह इस मामले को भी दबा दिया गया 
लेकिन यह सब तो केवल ' ट्रेलर ' था  ' हॉरर मूवी ' तो अभी बाक़ी थी 
एक बार देर रात अपने मित्रों के साथ किसी पार्टी में मौज-मस्ती करने के बाद प्रकाश अपनी टोयोटा-लैंडक्रूज़र में घर लौट रहा था  लोगों का कहना है कि नशे की हालत में उसने अंधाधुंध गाड़ी चलाते हुए फुटपाथ पर सो रहे कुछ ग़रीब मज़दूरों पर अपनी गाड़ी चढ़ा दी इस हादसे में छह-सात मज़दूर मौक़े पर ही दम तोड़ गए  प्रकाश अपनी गाड़ी घटना-स्थल से ले कर भाग खड़ा हुआ  कई घायल मज़दूर वहाँ ख़ून से लथपथ कराहते-छटपटाते रहे  उन में से कुछ और ने भी बाद में अस्पताल मेंअंतिम साँसें लीं 
पुलिस ने प्रकाश को गिरफ़्तार कर लिया  लेकिन कुछ दिन जेल में रहने के बाद ही प्रकाश ज़मानत पर रिहा हो गया  कुँवर प्रताप राय के पास दौलत थीरुतबा था  उनका मानना था कि हर कोई बिकाऊ होता है  लेकिन हर आदमी की क़ीमत अलग-अलग होती है  केवल सही बोली लगाने वाला होना चाहिए  लिहाज़ा उन्होंने अपनी तिजोरी का मुँह खोल कर गवाहों को ख़रीद लिया  दूसरी ओर उनके पास अच्छे वकीलों की एक पूरी फ़ौज तैयार थी जिन्होंने अदालत में यह साबित कर दिया कि दरअसल इस हादसे के समय प्रकाश गाड़ी चला ही नहीं रहा था  वह तो साथ वाली सीट पर बैठा मात्र था  जबकि उस समय गाड़ी तो प्रकाश का ड्राइवर चला रहा था  इस तरह प्रकाश को एक बार फिर बचा लिया गया  दौलतमंद और बाहुबली लोगों की बिगड़ी औलादों की रैश-ड्राइविंग से यदि कई ग़रीब मज़दूर मर भी जाते थे तो क्या हुआ ? आख़िर आज़ाद भारत में ग़रीब मज़दूरों की औक़ात ही क्या थी ? कीड़े-मकोड़ों से ज़्यादा थोड़े ही समझी जाती थी उनके जीवन की
क़ीमत !
प्रकाश बच गया लेकिन वह कहाँ सुधरने वाला था  जल्दी ही उसकी दोस्ती अंडरवर्ल्ड के कुछ लोगों से हो गई जो सुपारी ले कर हत्याएँ करते थे  उसने उनसे एक के. 47 राइफ़ल ख़रीद ली  लेकिन कुछ दिनों के बाद ही इस गैंग के कुछ बदमाश पुलिस के हत्थे चढ़ गए  पूछताछ में उन्होंने पुलिस के सामने यह बात भी उगल दी कि उन्होंने शहर के महापौर कुँवर प्रताप राय के बेटे प्रकाश को एक के. 47 राइफ़ल बेची थी  पुलिस ने ' आर्म्स एक्ट ' के तहत मामला दर्ज़ करके प्रकाश को गिरफ़्तार कर लिया  वैसे भी देश की सुरक्षा को आतंकवादियों से बड़ा ख़तरा था  कैलेशनिकोव राइफ़ल अपने पास रखना अवैध था  जुर्म था 
लोगों को लगा कि प्रकाश इस बार बुरी तरह फँस गया  लेकिन कुँवर प्रताप राय फिर हरकत में आए  प्रकाश उनका अपना ख़ून था  उनका मानना था कि जवानी में बच्चों से ग़लतियाँ हो ही जाती हैं  लिहाज़ा उन्होंने देश के सर्वश्रेष्ठ
क्रिमिनल लॉयर श्याम वंजानी की सेवा ली  नतीजा यह निकला कि कुछ महीने जेल में रहने के बाद प्रकाश एक बार फिर जेल से बाहर  गया 
श्याम वंजानी और वकीलों की उनकी टीम ने क़ानून की कमज़ोरियाँ का फ़ायदा उठाते हुए अदालत में उसकी ऐसी व्याख्या कर दी कि प्रकाश फिर से बच निकला  यह ख़बर अगले दिन अख़बारों के मुख-पृष्ठ पर छा गई  टीवीचैनलों में इस विषय पर ' टॉक-शो ' आयोजित करने की होड़ लग गई  कई टीवीचैनलों ने अपना पक्ष रखने के लिए प्रकाश को ' प्राइम-टाइम ' में अपने स्टूडियो में आमंत्रित किया  यह प्रसारण ' लाइव ' जा रहा था  इस पैनल में प्रकाश के वक़ील श्याम वंजानी के अलावा प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप राय और कुछ क्राइम-एक्सपर्ट्स भी बुलाए गए  कुछ चैनलों ने सेवानिवृत्त पुलिस-आयुक्तों को भी ऐसे कार्यक्रमों में बुलाया  इन सभी प्रोग्रामों में इस विषय पर मंथन का लम्बा दौर चला  हर चैनल ने प्रकाश के साथ ' एक्स्क्लूज़िव ' इंटरव्यू दिखाने का दावा किया  देखते-ही-देखते प्रकाश एक सेलेब्रेटी बन गया  दूसरी ओर इन खबरिया चैनलों का टीआर . पीभी बढ़ गया 
इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए प्रकाश के पिता कुँवर प्रताप राय ने कॉलेज के एक प्राध्यापक को प्रकाश के जेल के दिनों पर एक किताब लिखने के लिए
कहा  प्राध्यापक को इसके बदले एक मोटी रक़म दी गई  लेकिन यह किताब प्रकाश के नाम से छपी  शीर्षक था -- ' ऐन इनोसेंट मैन्स जेल-डायरी ' ( एक बेक़सूर आदमी की जेल-डायरी )  उप-शीर्षक था -- ' हाउ आइ वाज़ इल्लीगली डीटेंड ऐंड टार्चर्ड इन जेल फ़ॉर मंथ्स ' ( कैसे मुझे कुछ महीनों तक अवैध रूप से जेल में रख कर यातनाएँ दी गईं )  यह किताब प्रसिद्ध प्रकाशक लेंग्विन पब्लिशर्स ने छापी  देखते-ही-देखते यह किताब ' नेशनल बेस्टसेलर ' बन गई  कई भाषाओं में इस पुस्तक के अनुवाद भी प्रकाशित हो गए  कुछ ही महीनों में इस किताब की लाखों प्रतियाँ बिक गईं  प्रकाश को रॉयल्टी के रूप में एक मोटी रक़म मिली  मुंबई के एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक ने इस विषय पर फ़िल्म बनाने का अधिकार प्रकाश और उसके पिता से एक करोड़ रुपये में ख़रीद लिया  प्रकाश की दसों उँगलियाँ घी में थीं 
कुछ महीने बाद कुँवर प्रताप ने धूम-धाम से प्रकाश की शादी एक दौलतमंद और ऊँचे ख़ानदान की लड़की से कर दी  ब्याह में खूब सारा दहेज़ भी मिला जिसमें एक मर्सिडीज़ गाड़ी भी शामिल थी  कुँवर प्रताप राय ने सोचा कि शादी का खूँटा प्रकाश को बाँध कर रख सकेगा  वे चाहते थे कि प्रकाश अब उनके व्यवसाय में उनका हाथ बँटाए 
लेकिन कुँवर साहब का यह सोचना ग़लत साबित हुआ  प्रकाश की शादी के कुछ महीने बाद ही यह कांड हो गया ...
वही दाल-रोटी आदमी रोज़-रोज़ नहीं खा सकता  कभी-कभी उसे स्पेशल डिश की दरकार भी होती है  " एक दिन प्रकाश ने अपने गैंग के एक सदस्य से
कहा 
दरअसल प्रकाश अपराध के घोड़े पर चढ़ चुका था  उसके मुँह में जुर्म के ख़ून का स्वाद लग गया था  उसके भीतर से इंसानियत कब की पलायन कर चुकी थी  उसके भीतर अच्छाई की नदी का पानी तो बहुत पहले सूख गया था  अब वहाँ केवल बुराई की रेत बची हुई थी 
मदमस्त साँड़-सा प्रकाश अब अपने शिकार की तलाश में जुट गया और उसकी निगाह अपने ही घर पर तैनात एक गार्ड की सोलह वर्षीया बेटी पर पड़ी  एक दिन उस हैवान ने काले शीशे वाली गाड़ी में उस लड़की को उठा लिया  एक ख़ाली फ़्लैट में ले जा कर उस दरिंदे ने उस लड़की से कुकर्म किया  फ़्लैट के बाहर उसके गैंग के सदस्य पहरे पर रहे  उस राक्षस ने इस पूरे कांड का अश्लील एम.एमएसभी बना लिया ताकि बाद में उसे इंटरनेट पर अपलोड कर सके  फिर उस शैतान ने उस बेचारी लड़की का गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी  लड़की अपनी जान की भीख माँगती रही लेकिन प्रकाश ने उसकी एक नहीं सुनी  फिर अपने कुकर्मों को छिपाने के लिए उस वहशी जानवर ने लड़की की लाश के टुकड़े-टुकड़े किए और बाद में उन्हें अपने पिता के होटल के तंदूर में जला दिया ...

" ... यह अदालत मुल्ज़िम प्रकाश वल्द कुँवर प्रताप को ताज़ीरात--हिंद की दफ़ा 302 के तहत फाँसी की सज़ा सुनाती है  ही इज़ टु बी हैंग्ड टिल ही इज़ डेड  " सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस राममूर्ति की भारी आवाज़ अदालत में गूँज रही थी 
जैसे गर्म तवे पर पड़ गई पानी की बूँद छन्न से भाफ़ बन कर उड़ जाती है , कुँवर प्रताप राय को लगा कि अदालत के इस फ़ैसले से उनका अपना वजूद भी वैसे ही मिट गया हो  उन्हें चक्कर  गया  उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया लेकिन उनके ज़हन के उस अँधेरे में ही अचानक एक बहुत पुरानी स्मृति किसी उजली लकीर-सी कौंधी ...
सात साल का प्रकाश स्कूल से रोता हुआ घर आया है  उसके गाल पर थप्पड़ का निशान है 
क्या हुआ बेटा ? क्यों रो रहा है ? किसी ने मारा है क्या ? "
मास्टर ने  "
क्यों ? "
हमने दो दूना पाँच बताया था  मास्टर कहने लगा -- ग़लत है  "
फिर ? "
हमने कहा -- हम कुँवर प्रताप राय के बेटे हैं  हमने दो दूना पाँच कह दिया तो वही सही है  इस बात पर मास्टर ने हमें मारा  पापा , आपका नाम सुनने के बाद भी मारा "
दो दिन बाद उस मास्टर को नौकरी से निकाल दिया गया था ...

और घिरते अँधेरे के बीच अदालत के कमरे में बैठे कुँवर प्रताप को लगा --
शुरुआत ही ग़लत हो गई थी  नींव में ही गड़बड़ी  गई थी तभी तो आज पूरी इमारत असमय ही भड़भड़ा कर गिर पड़ी  यदि उस दिन उन्होंने प्रकाश को बता दिया होता कि उसके मास्टरजी सही थे -- कि चाहे कोई भी कहे , दो दूना पाँच कभी सही नहीं होता -- तो आज उन दोनों को यह दिन नहीं देखना पड़ता 

जिस नए क़िस्म के इंडिया की नींव रखी जा चुकी थी उसमें भ्रष्ट , अवसरवादी , बेईमान , दग़ाबाज़ , फ़रेबी , जालसाज़ , दोगले और अपराधी क़िस्म के लोगों की चाँदी थी  दो दूना पाँच को सही बताने वाले  जाने कितने ऐसे लोग सीना ताने आज़ाद घूम रहे थे  )

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प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
A-5001,
गौड़ ग्रीन सिटी ,
वैभव खंड ,
इंदिरापुरम ,
ग़ाज़ियाबाद -201014
प्र . )
मो: 8512070086
-मेलsushant1968@gmail.com

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Tuesday, 23 June 2020

विद्रोह, पर्यावरण एवं नारी संचेतना की कविताएँ

 : डॉ रणजीत के तीन सम्पादित संकलन

-    राहुल देव

वरिष्ठ प्रगतिशील कवि एवं लेखक डॉ रणजीत ने विद्रोह, पर्यावरण एवं नारी संचेतना जैसे प्रमुख विषयों को लेकर बीसवीं सदी के नवें दशक में लगातार तीन कविता संकलन सम्पादित किये जिनके नाम क्रमशः विश्व काव्य के विद्रोही स्वर, ख़ामोशी भयानक है तथा आधी दुनिया का उद्वेग थे | प्रस्तुत आलेख में हम इन तीनों संकलनों पर एक-एक कर बात करेगें |



आपके सम्पादित संकलनों में सर्वप्रथम नाम आता है ‘ख़ामोशी भयानक है’ का जिसमें 22 कवियों की पर्यावरण चिंता की 33 प्रतिनिधि कविताएँ संकलित की गयी हैं | यह 58 पृष्ठीय कविताओं की एक पतली सी किताब है जिसका मूल्य मात्र दस रुपये है | सम्पादकीय आमुख से पता चलता है वर्ष 1990 में डॉ भारतेंदु प्रकाश ने ‘पर्यावरण संतुलन की रक्षा करते हुए बुंदेलखंड के औद्योगिक विकास की संभावनाएं’ विषय पर एक संगोष्ठी बाँदा में आयोजित की गयी थी उसकी तैयारी के क्रम में ही और उनकी प्रेरणा से ही डॉ रणजीत जोकि उस समय बाँदा के जवाहर लाल नेहरु महाविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष थे ने हिंदी की प्रतिनिधि पर्यावरण चिंता सम्बन्धी कविताओं का एक छोटा सा संकलन तैयार कर दिया, जो उन्हीं के प्रयासों से संगोष्ठी के समय वितरण के लिए प्रकाशित हुआ | इस संकलन की अधिकांश प्रतियाँ मित्रो और पर्यावरण पर कार्य करने वाली संस्थाओं को भेंट स्वरुप ही बंट गयीं | उस समय यह संकलन पाठकों में बेहद लोकप्रिय हुआ और फिर भारत ज्ञान विज्ञान जत्थे के आग्रह पर प्रकाशन के दो वर्ष बाद इसका दूसरा संस्करण विज्ञान शिक्षा केंद्र बाँदा ने प्रकाशित किया |

इस संकलन में आपको आलोचक के रूप में प्रसिद्द आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ‘कछार की सैर’ शीर्षक दिलचस्प कविता भी पढ़ने को मिलेगी | संकलन के उल्लेखनीय कवि और उनकी कविताओं की अगर बात की जाय तो उनमे भवानी प्रसाद मिश्र की चर्चित कविता ‘सतपुड़ा के जंगल’, गोपालदास नीरज की ‘अब युद्ध नही होगा’, बाढ़ की विभीषिका को दर्शाती डॉ केदारनाथ सिंह की मार्मिक कविता ‘पानी में घिरे हुए लोग’, स्वयं सम्पादक-कवि की ‘पेड़’, ‘संसार-हत्या का षड्यंत्र’ व ‘पृथ्वी के लिए’ शीर्षक तीन कविताएँ, डॉ जितेन्द्रनाथ पाठक की कविता ‘जंगल’, चंद्रकांत देवताले की कविता ‘पेड़’, डॉ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविता ‘आरा मशीन’, अशोक बाजपेयी की कविता ‘क्या हासिल’ और गद्यकाव्य ‘विकल्प’, उदयप्रकाश की दो अच्छी कविताएँ ‘दो हाथियों की लड़ाई’ और ‘बचाओ’, कुमार रवीन्द्र का नवगीत ‘मरी झीलों के शहर में’ का नाम लिया जा सकता है | संकलन की अकेली स्त्रीस्वर ज्योत्स्ना मिलन की एक छोटी कविता ‘इस तरह होने के बारे में’ से इस संकलन के मूलभाव को समझा जा सकता है जोकि इस प्रकार है- “पहले/ पेड़ और मैं/ साथ साथ थे/ हमने सोचा ही नही कभी/ अपने,/ इस तरह होने के बारे में/ हम इसी तरह थे/ शुरू से/ हमारे इस तरह होने में/ हमारी कोई भूमिका नही थी/ मगर इससे पहले/ कभी पता नही चला/ कि हमारा यों साथ-साथ होना/ हमारे हो सकने की शर्त है |”



    आपके द्वितीय संपादित संकलन की बात करें तो यह वर्ष 1993 में नई दिल्ली के समकालीन प्रकाशन से प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था ‘विश्व काव्य के विद्रोही स्वर’ जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है इसमें 7 प्रमुख विदेशी कवियों की अनुदित कविताएँ शामिल की गयी हैं डॉ रणजीत ने स्वयं इन कविताओं का अनुवाद व सम्पादन किया है | अपनी काव्य रचना के प्रारंभिक काल में जिन विदेशी कवियों ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया था या जो आपको सर्वाधिक प्रिय लगे थे उनकी कुछ कविताएँ आपने अपने आनंद के लिए हिंदी में रूपांतरित कर दी थीं | इनमें खलील जिब्रान और नाजिम हिकमत मुख्य थे | इन दोनों कवियों की भाषाई सरलता और स्वच्छता ने और उनके गहरे मानववाद ने कवि रणजीत को बहुत प्रभावित किया | खलील जिब्रान के अनुवाद तो पांडुलिपियों के रूप में पड़े रहे पर नाजिम हिकमत की कुछ कविताएँ ‘जेल से लिखे पत्र’ शीर्षक से साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित भी हुईं | मायकोवस्की और पाब्लो नेरुदा से यद्यपि आप काव्य रचना के स्तर पर लगभग प्रभावित नही हुए, किन्तु कवियों के रूप में वे आपको अलग-अलग ढंग से महत्वपूर्ण लगे और फिर आपने उनकी कुछ पसंदीदा कविताओं के हिंदी रूपांतरण में काफी मेहनत की | मायकोवस्की के अनुवादो में वनस्थली विद्यापीठ के आपके प्रवासकाल के मित्र रहे और वहाँ रूसी भाषा के शिक्षक नरेश कुमार ने काफी मदद की और ‘आलोचना’ में इनमे से कुछ अनुवाद आप दोनों के संयुक्त नाम से छपे | जब यह किताब प्रकाशन के शुरूआती दौर में थी तब पता चला कि इसमें प्रिय कवि नाजिम हिकमत की ‘जेल से लिखे गये पत्र’ शीर्षक से जो बारह छोटी-बड़ी कविताएँ उन्होंने पाण्डुलिपि में शामिल करने के लिए रखी थीं उनमे से एक ही कविता मिली बाकी कहीं मिस हो गयीं | डॉ रणजीत ने जब उन्हें अपनी लाइब्रेरी में ढूंढा तो नाजिम हिकमत का वह अंग्रेजी संकलन भी नदारद था जिसके आधार पर उन्होंने दो दशक पहले अनुवाद किये थे | फिर आपने अपनी फाइलों में साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित उनकी कुछ कविताओं की कतरन भी ढूंढने की कोशिश की पर नाकामयाब रहे | अंततः मन मारकर नाजिम हिकमत के उतने ही अंशों से संतोष करना पड़ा पर पांडुलिपियों में से नाजिम हिकमत की ग्यारह छोटी-छोटी कविताओं के कहीं खो जाने का खालीपन मन में लम्बे समय तक बना रहा |

संकलन के कवियों की अगर हम बात करें तो उनमे लेबनानी-अमरीकी कवि खलील जिब्रान, रूसी क्रांतिकारी कवि मायकोवस्की, जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त, तुर्की कवि नाजिम हिकमत, चिली के कवि पाब्लो नेरुदा, फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवीश और दक्षिण अफ़्रीकी कवि ए.एन.सी. कुमाली को शामिल किया गया है | यह सभी विद्रोही कवि विश्वकाव्य में अपना प्रमुख स्थान रखते हैं | इन्हें विद्रोही या परिवर्तनकामी कवि इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इनकी अधिकांश कविताएँ वर्ग भेद और आर्थिक-सामाजिक असमानता के विरुद्ध आवाज़ और अकाल, युद्ध, निर्वासन-शरणार्थी आदि की विभीषिकाओं के बीच क्रान्तिकारी विचारों का भी वाहक बनीं | ऐसे कवियों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी | संकलन की ‘हम और तुम’ शीर्षक कविता में खलील जिब्रान कहते हैं, “...हम दुःख के बेटे हैं और तुम प्रसन्नता के/ और हमारे दुःख और तुम्हारी प्रसन्नता के बीच/ एक संकरी पगडण्डी है/ जिस पर तुम्हारे शाही रथ नही चल सकते |” या फिर ‘अपने देशवासियों से’ व ‘कब्र खोदने वाला’ शीर्षक कविता में व्यक्त हुई उसकी वेदनामय आक्रोश | ‘मृत हैं मेरे लोग’ शीर्षक कविता की निम्नांकित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं, “...एक मात्र भला काम/ जो तुम्हे दिन के उजाले और रात की शांति के योग्य बनाता है/ वह करुणा है/ जो तुम्हे अपने जीवन का एक अंश/ किसी दूसरे इन्सान को देने के लिए प्रेरित करती है |” संकलन के दूसरे कवि मायकोवस्की की ‘टैक्स इंस्पेक्टर से कविता के बारे में बातचीत’ का नैरेटर कविता की शक्ति बयां करते हुए कहता है, “...अपनी शब्दावली में कहूँ/ तो एक तुक एक कनस्तर है-/ डायनामाइट से भरा हुआ/ और एक पंक्ति एक पलीता/ जब वह सुलगती हुई पंक्ति अंत तक पहुंचती है-/ विस्फोट होता है !/ और सिर्फ एक छन्द/ एक पूरे शहर को उड़ा सकता है !” मायकोवस्की की ‘रुचियों की भिन्नता’ शीर्षक और और छोटी कविता के अनुवाद की सहज प्रतीकात्मकता देखें, “घोड़े ने देखा ऊंट को/ और हिनहिनाया/ कैसा दैत्याकार दोगला घोड़ा है/ ऊंट बिलबिलाया/ तुम ? घोड़े?- बिल्कुल नही/ तुम महज एक अविकसित ऊंट हो/ सिर्फ सफ़ेद दाढ़ी वाला ईश्वर ही जानता था/ कि वे दोनों अलग-अलग नस्लों के जानवर हैं |” यह कवि अपनी कविताओं में पाठक से लगातार सवाल उठाते हुए एक ऐसी बहस आमंत्रित करते हैं जिनके जवाब देना सत्तापक्ष के लिए हमेशा से असुविधाजनक रहा है | आने वाली पीढ़ियों को सचेत करते हुए ब्रेख्त अपनी ‘आने वाली पीढ़ियों के नाम’ शीर्षक कविता में कहता है, “सचमुच मैं अँधेरे युग में रहता हूँ/ निष्कपटता जहाँ मूर्खता है/ शांत मस्तिष्क उसी का हो सकता है/ जिसका दिल पत्थर का हो/ जिसके चेहरे पर हँसी है/ वह अभी खौफनाक ख़बरों से अनजान है |”



डॉ रणजीत के तीसरे संपादित कविता संकलन का नाम है ‘आधी दुनिया का उद्वेग’ जिसका केंद्रबिंदु वर्तमान में नारी स्थिति, संघर्ष और संचेतना की कविताएँ प्रस्तुत करना रहा है | इस संकलन की योजना भी पर्यावरण वाले पहले संकलन के साथ ही बन गयी थी लेकिन इसे पुस्तक का रूप लेते-लेते दो वर्ष लग गये | शीर्षक भी पहले ‘आधी दुनिया का दर्द’ सोचा गया जिसे विचारोपरांत ‘आधी दुनिया का उद्वेग’ कर दिया गया | तब तुरत-फुरत वाला ईमेल का जमाना तो था नही इसलिए काव्यरचना में संलग्न मित्र कवियों से पत्र लिखकर प्रासंगिक रचनाएँ मंगवाई गयीं और प्रतिष्ठित कवियों की कविताएँ उनके संकलनों में से चुनी गईं | सम्पादक को चयन की प्रक्रिया में यह देखकर आश्चर्य हुआ कि दिनकर, बच्चन, अज्ञेय, केदार आदि प्रतिष्ठित कवियों के विस्तृत काव्य सृजन में नारी स्थिति, संघर्ष और संचेतना की कविताएँ ढूंढने पर भी मुश्किल से ही मिलती हैं | हाँ प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन इस दृष्टि से संपन्न हैं, उनके बाद नारी संचेतना की मर्मस्पर्शी कविताएँ समकालीन कवियों ने ही लिखी हैं | इस संकलन में कुल 32 कवियों की 35 कविताएँ संकलित हैं | उल्लेखनीय कवि और कविताओं की अगर बात करें तो उनमें गोपाल शरण सिंह की ‘बालिका’, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘विधवा’ व ‘तोड़ती पत्थर’, सुभद्रा कुमारी चौहान की चर्चित कविता ‘झाँसी की रानी’, महादेवी वर्मा की ‘दुःख की बदली’, नागार्जुन की ‘जया’ व ‘तालाब की मछलियाँ’, रामइकबाल सिंह ‘राकेश’ की ‘युगारंभ की वे सुंदरियाँ’, नीलकंठ तिवारी की ‘कवि और वेश्या’, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की ‘ह्न्जूरी’, केदारनाथ सिंह की ‘सुई और तागे के बीच में’, धूमिल की ‘आतिश के अनार सी वह लड़की’, चंद्रकांत देवताले की ‘औरत’ जैसी सशक्त कविताएँ इसमें शामिल हुई हैं | हालांकि कुछेक बड़े नाम वाले कवियों की बेहद सामान्य सी कविताएँ भी इसमें जगह बना पाने में कामयाब हो गयी हैं जिनसे बचने पर यह संग्रह और अधिक मूल्यवान बन सकता था |

अंत में साहिर लुधियानवी के ‘मर्दों ने उसे बाज़ार दिया’ शीर्षक इस गीत की पंक्तियाँ वर्तमान सन्दर्भों में सर्वथा प्रासंगिक हो जाती हैं, “औरत ने जनम दिया मर्दों को/ मर्दों ने उसे बाज़ार दिया/ जब भी चाहा कुचला मसला/ जब भी चाहा दुत्कार दिया |” यह संकलन वर्तमान स्त्रीविमर्श के तमाम मुद्दों को कविता के जरिये उठाने की हिमायत करता है | प्रस्तुत संकलन पाठक के मनःस्थल पर, उसकी एकांगी मानवीय संवेदनाओं पर प्रश्न खड़े करते हुए विचार करने पर विवश करता है इसमें संशय नही है |

उपरोक्त तीनों संकलनों की कविताओं से गुज़रते हुए हिंदी कविता के विकासक्रम को सहज ही लक्षित किया जा सकता है | जनमानस में पर्यावरण चेतना की आज महती आवश्यकता है | जहाँ आज स्त्री विमर्श कविता से निकलकर गद्यसाहित्य की केन्द्रीयता ग्रहण कर चुका है वहीँ उसके समक्ष कुछ और नए विमर्शों का सूत्रपात हुआ है | विश्व के विद्रोही कवि और उनकी कविताओं के ताप का प्रभाव अपने यहाँ भी स्पष्ट दिखता है | मुक्तिबोध, धूमिल, कुमार विकल, गोरख पाण्डेय, पाश, रघुवीर सहाय जैसे तमाम कवियों की एक समृद्ध परम्परा ही चल पड़ी जिनकी कविता विश्व कविता के इन स्वरों से टक्कर लेने का पूरा माद्दा रखती है | इक्कीसवी सदी में कविता की धार तमाम कारणों की वजह से कुछ कमज़ोर जरुर पड़ी है लेकिन पाठकों के ज़ेहन में लम्बे समय तक हिंदी कविता की पैठ जरुर बनी रहेगी यह विश्वास है क्योंकि हमारे ऐसे कवि और उनकी कविता की अक्षय परम्परा की ताकत उसका आधार जो है |



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Tuesday, 14 January 2020

हिन्दी : भारतीय अस्मिता की पहचान



किसी भी देश के निवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना के विकास और पारस्परिक सम्पर्क को बनाये रखने के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है, जिसका व्यवहार राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकेl भारतीय जनमानस को जोड़कर रखने के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में देश को जिस  भाषा की आवश्यकता है, वह गुण हिन्दी में विद्यमान हैl इसलिए कि हिन्दी किसी क्षेत्र, जाति-धर्म एवं सम्प्रदाय की भाषा न होकर भारतीय संरचना में व्याप्त राष्ट्रीय एकता की अद्भुत कड़ी के रूप में जानी जाती हैl

सौभाग्य की बात है कि हिन्दी के लिए देवनागरी लिपि के रूप में एक वैज्ञानिक एवं ध्वनि प्रधान लिपि मिली है, जिसका उद्भव ब्राह्मी लिपि से हुआ है, जिससे भारत की प्रायः सभी भाषाओं की लिपियाँ विकसित हुई हैंl प्राचीन भारत में ब्राह्मी और खरोष्ठी नामक दो लिपियाँ प्रचलित थींl ब्राह्मी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर तथा खरोष्ठी (गधे के होंठवाली) लिपि फ़ारसी लिपि की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थीl

जिस प्रकार संस्कृत ने आस्ट्रिक, द्रविड़, ग्रीक, लैटिन, चीनी, तुर्की, अरबी आदि  भाषाओं के अनेक शब्द आत्मसात कर अपने शब्द भण्डार को समृद्ध किया हैl उसी प्रकार हिन्दी ने भी अरबी, फारसी और अंग्रेजी से शब्द ग्रहणकर अपनी शब्द सम्पदा को बढ़ाया हैl क्योंकि कोई भी जीवंत भाषा अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहणकर अपने शब्द भण्डार को समृद्ध करती हैl हिन्दी, हिन्दीभाषी प्रदेशों की 24 भाषाओं एवं अनेक बोलियों से मिलकर बनी हैl बोलियों के विकास एवं परिमार्जन से ही भाषा समृद्ध होती हैl

भाषा सामाजिकता एवं समस्त ज्ञान-विज्ञानं का आधार होती हैl भारत बहुभाषी देश हैl इसकी प्रादेशिक भाषाएँ हर दृष्टि से समर्थ हैंl हिन्दी समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ने में संयोजक की भूमिका निभा रही हैl बोलियाँ उसकी ताकत हैंl कहा भी गया है कि किसी भी जीवंत भाषा के प्राण उसकी बोलियों में ही बसते हैंl हिन्दी की बोलियों में रचा बसा साहित्य हिन्दी के लिए अजस्र स्रोत की भाँति हैl हिन्दी के आँचल में 18 बोलियाँ (खड़ी बोली, ब्रजभाषा, बांगरू, बुन्देली, कन्नौजी, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, मैथिली, मगही, भोजपुरी, सेवाती, मालवी, अहीरवाटी, जयपुरी-हड़ौती, मेवाड़ी, मारवाड़ी, पहाड़ी (पश्चिमी,मध्य एवं पूर्वी) पली-बढ़ी एवं विकसित हुई हैंl

हिन्दी एक जीवंत भाषा हैl हम हिन्दी का एक शब्द बोलते हैं तो उस शब्द की प्रकृति एवं संस्कृति का समन्वयात्मक रूप मन की आँखों के सामने साकार हो उठता हैl वह शब्द अकेला नहीं अपितु अपनी अर्थ संस्कृति के समस्त अलंकरणों के साथ उपस्थित होता हैl ‘गाँव’ शब्द को ही लीजिएl इसका अर्थ केवल उस जगह से तो नहीं है, जहाँ के अधिकांश लोग अशिक्षित और अभाव से भरा जीवन जी रहे होते हैंl बल्कि गाँव जीवन की ज़रूरतों के लिए ईमानदारी के साथ संघर्ष करने के ज़ज्बे का नाम भी हैl घर-आँगन, खेत-खलिहान एवं घर के आसपास स्थित पेड़ की शाखाओं पर घोसले बनाकर रहनेवाले पक्षियों के कलरव ‘गाँव’ शब्द के अर्थ की ही अभिव्यक्तियाँ हैंl        

भारत की तरह चीन भी बहुभाषी देश है, परन्तु उसने राष्ट्रीय भाषा का दर्जा अपने देश की सर्वमान्य भाषा मंदारिन (चीनी) को दी हैl चीन में पढ़ाई-लिखाई का माध्यम भी यही भाषा है, जबकि चीनी चित्रलिपि से विकसित विश्व की सबसे कठिन लिपियों में एक हैl एक लाख करोड़ रुपए की लागतवाली जापान की बुलेट ट्रेन की तकनीक जापानी भाषा के द्वारा ही खोजी गई हैl 12 करोड़ की आबादीवाले जापान में 13 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हैंl रूस, चीन, जापान, अमेरिका, जर्मनी, फ़्रांस और इजराइल जैसे दुनिया के सभी विकसित देश ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा अपनी भाषा में ही  देते हैंl   

भारत को अंग्रेजों से आजाद हुए 72 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, किन्तु देश की सर्वमान्य भाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मान अब तक नहीं प्राप्त हो सका हैl अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त एवं पाश्चात्य जीवन शैली से प्रभावित कुछ लोग हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की सामर्थ्य पर सवाल उठाते रहते हैं, जबकि हमने अपनी  भाषा में शिक्षा प्राप्त कर विश्व को बुद्ध और महावीर दिएl चरक जैसे शरीर वैज्ञानिक और शुश्रुत जैसे शल्य चिकित्सक दिएl पाणिनि जैसा वैयाकरण, आर्यभट्ट जैसा खगोलविद,पातंजलि जैसा योग गुरु और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिएl तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय भारतवर्ष में ही थे, जहाँ संसार के अन्य देशों के विद्यार्थी ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने आया करते थेl

भारतीय संविधान ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए उसके विकास सम्बन्धी अनुच्छेद 351 में कहा है, “संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक और वांछनीय हो, वहाँ उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करेl”

परन्तु अंग्रेजी, अंग्रेजों के शासन काल से अब तक देश के शासन की भाषा के रूप में भारतीय जनमानस पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है, जबकि जनता के बोलचाल एवं व्यवहार की भाषाएँ भारतीय हैंl उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय की बहसें आज भी अंग्रेजी में होती हैंl फ़ैसले भी अंग्रेजी में ही लिए जाते हैंl एक ऐसा देश जहाँ की बहुसंख्य जनता को न्यायालय के निर्णय को जानने -समझने के लिए वकीलों की शरण में जाना पड़ता है, जिसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती हैl 

राजनीतिक लाभ के लिए भाषा को लेकर भड़काऊ बातें करना तमिलनाडु के नेताओं की प्रकृति रही हैl इस अहिन्दीभाषी प्रदेश में पहले से हिन्दी विरोधी आवाज़ें उठती रही हैंl विरोध करनेवालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम और करुणानिधि भी रहे हैंl 26 जनवरी, सन् 1965 को तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्त वत्सलम ने हिन्दी विरोध में शोक दिवस मनाया थाl हिन्दी विरोध के नाम पर यहाँ संविधान की प्रतियाँ भी जलाई गई थींl आगे चलकर एक समय ऐसा भी आया जब सन् 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि ने विधानसभा के कामकाज से अंग्रेजी हटाने की घोषणा कर दी, जिसका देश भर में ज़ोरदार स्वागत किया गयाl बताते चलें कि तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपालाचार्य ने सन् 1936 में तमिलनाडु में हिन्दी पढ़ना अनिवार्य कर दिया थाl

 इन दिनों भारत में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति पर आधारित अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई हैl इन विद्यालयों की भूमिका के प्रति गहरा आक्रोश प्रकट करते हुए साहित्यकार निर्मल वर्मा जी ने कहा है,“ क्या हम अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा पद्धति में ढले विद्यालयों को भंग करने का साहस रखते हैं ताकि अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मनीषा के अनुरूप भारत की युवा पीढ़ी को नये सिरे से दीक्षित किया जा सके?” वर्मा जी ने राजनेताओं के द्वारा जाति और धर्म के नाम पर की जा रही सौदेबाजी से बचने के लिए जनता को सावधान भी किया हैl उन्होंने धर्म को आस्था के स्तर पर भारतीयता की अवधारणा से जोड़ने की अपील की है, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सकेl गुलामी के दिनों का स्मरण करते हुए वर्मा जी कहते हैं-,“ गुलामी में जीते हुए भी हमारे भीतर वे सभी शक्तियाँ विद्यमान थीं, जो हमें अतीत के प्रति आदर और भविष्य के प्रति आस्था से भर सकेंl’’

अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद प्राथमिक शिक्षा को लेकर राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग एवं अन्य राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक महत्त्व की संस्थाओं ने सर्वसम्मति से यह सिफारिश की थी कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जानी चाहिएl मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा के माध्यम से जो भी सीखते हैं, उनके मन-मस्तिष्क पर उसका गहरा प्रभाव पड़ता हैl शोध से यह ज्ञात हुआ है कि किसी विद्यार्थी को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाए जाने पर विषय को समझने के बजाय रटकर याद करना पड़ता हैl  मौलिक चिंतन तभी सम्भव है जब शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होl

 इंडियन एक्सप्रेस के अक्टूबर, सन् 2017 के अंक में छपी ख़बर के अनुसार भारत सरकार ने दिल्ली कार्पोरेशन के अन्तर्गत आनेवाले सभी 1700 से अधिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम से चलाने का निर्णय लिया हैl इसी तरह का अलोकतांत्रिक निर्णय उत्तराखण्ड की सरकार ने अपने यहाँ के 18000 से भी अधिक विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम का बनाने की घोषणा करके लिया हैl इन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार भी प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अंग्रेजीकरण में लगी हैl सरकारों के ऐसे फ़ैसले संविधान की मूल भावना के विरूद्ध तो हैं ही, देश के 80 प्रतिशत प्रतिभावान विद्यार्थियों के मौलिक अधिकारों को छीनने जैसे हैंl देश के मुट्ठीभर लोग सत्ता पर अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए अंग्रेजी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते आ रहे हैंl  हमें जब तक भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा नहीं दी जाएगी, तब तक गाँवों की दबी प्रतिभाओं के उभरने और विकास की मुख्य धारा में आने का अवसर उपलब्ध ही नहीं हो सकेगाl        

आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी सरकारी कार्यालयों में हिन्दी में कार्य करने की संस्कृति का अपेक्षित विकास नहीं हो सका हैl स्थिति यह है कि अंग्रेजी आज भी जन-सामान्य के मन-मस्तिष्क पर बोझ के रूप में विराजमान हैl महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को हमारी बौद्धिक चेतना के विकास में बाधक बताया थाl उन्होंने हिन्दू स्वराज में लिखा था, “अंग्रेजी शिक्षा से द्वेष और अत्याचार बढ़े हैंl अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी हैl भारत को गुलाम बनानेवाले तो हम अंग्रेजी जाननेवाले लोग ही हैंl” 5 फ़रवरी, सन् 1916 को नागरी प्रचारिणी सभा में भाषण देते हुए गाँधीजी ने अपने 36 समर्थकों के साथ जीवनपर्यंत हिन्दी के व्यवहार की शपथ ली थीl उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन और हिन्दी के प्रचार–प्रसार को एक-दूसरे का पूरक बना दिया थाl

गाँधीजी ने 27 दिसम्बर, सन् 1917 को कोलकाता में भाषा को जीवन से जोड़ने और जनता के निकटस्थ रहनेवाली चीज बताते हुए कहा था, “यदि हम अंग्रेजी के आदी नहीं हो गये होते तो यह समझने में देर नहीं लगती कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने से हमारी बौद्धिक चेतना जीवन से कटकर दूर हो गई हैl” गाँधीजी ने युवकों को हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ भी सीखने की सलाह दी थीl एक जगह उन्होंने कहा था, “मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को राष्ट्रीय और अपनी प्रान्तीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक स्वराज की सब बातें निरर्थक हैंl प्रत्येक प्रान्त में उसी प्रान्त की भाषा तथा सारे देश के पारस्परिक व्यवहार के लिए हिन्दी और अन्तर्राष्ट्रीय उपयोग के लिए अंग्रेजी का व्यवहार होना चाहिएl’’

गाँधीजी ने देश के आम आदमी की समझ में आनेवाली भाषा को अपनाने पर बल दिया और आम आदमी की समझ में आनेवाली उस भाषा को उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी’ नाम से संबोधित कियाl  इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने हिन्दीतर प्रदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया और सन् 1918 में उन्होंने अपने 18 वर्षीय पुत्र देवदास गाँधी और स्वामी सत्यदेव को हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए मद्रास भेज दियाl हिन्दी के प्रचार के लिए एक कमेटी भी गठित की गयी थी, जिसके सभापति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी थेl गाँधीजी ने सन् 1930 में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वर्धा में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना की थीl उन्होंने भाषा के सवाल को बड़ी ही गंभीरता से लिया थाl भाषा को लेकर हिन्दीभाषी प्रदेश के निवासियों की उदासीनता पर उन्होंने  क्षुब्ध होकर कहा था,“ मुझे खेद है कि जिन प्रान्तों की मातृभाषा हिन्दी है, वहाँ पर भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखलाई देता हैl”

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन मानसिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता को स्वाधीनता से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थेl यह भी मानते थे कि मनुष्य की मानसिक वृत्तियों का विकास मातृभाषा के द्वारा ही सम्भव हैl टंडन जी चाहते थे कि विधायिका और कार्यपालिका ही नहीं, अपितु समस्त विश्वविद्यालय एवं देश की न्यायपालिका के कामकाज भी हिन्दी में होंl हिन्दी-हिन्दुस्तानी एकता के पक्षधर जमनालाल बजाज ने मद्रास हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा था, “हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी ईमान की भाषा है, प्रेम की भाषा है, राष्ट्रीय एकता की भाषा है और आज़ादी की भाषा हैl” हिन्दी और उर्दू भाषा की एकता के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था, “हमें इस देश की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को एक करना है तो उसके लिए हिन्दी और उर्दू का ऐक्य होना चाहिएl इसलिए एक राष्ट्रभाषा का होना ज़रूरी हैl” पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए. पी. जे.अब्दुल कलाम ने देश की एकता के लिए हिन्दी की आवश्यकता को इन शब्दों में प्रकट किया है, “मेरी राय है कि सभी राज्यों में बारहवीं कक्षा तक हिन्दी बोलना अनिवार्य कर दिया जाए, ताकि सारे लोग हिन्दी पढ़ना-लिखना सीख सकेंl”

राष्ट्रीय एकता के लिए डॉ राममनोहर लोहिया का हिन्दी को अपनाने पर विशेष बल थाl लोहियाजी कहा करते थे, “हम समझते हैं कि अंग्रेजी के होते यहाँ ईमानदारी का आना असम्भव हैl’’ समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने अंग्रेजी का खुलकर विरोध करते हुए राजनेताओ से अपील की थी कि जिस भाषा में वोट माँगते हो, उसी भाषा में प्रशासनिक काम-काज भी करोl कवि ‘अज्ञेय’ ने बड़े दुःख के साथ कहा था,- “जब हम राजनीतिक दृष्टि से पराधीन थे तब तो हमारे पास स्वाधीन भाषा थीl अब जब हम स्वाधीन हो गये तो हमारी भाषा पराधीन हो गईl” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जो सरकार जनता से उसकी भाषा में संवाद नहीं करती, वह सरकार अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन में अक्षम मानी जाती हैl  

आपको ज्ञात होगा कि संविधान लागू होने के मात्र 15 वर्षों तक देश का कामकाज अंग्रेजी में किए जाने का प्रावधान थाl उसके बाद हिन्दी को राजभाषा के रूप में पूरे देश में लागू होना था, पर तमिलनाडु के हिन्दी विरोधियों के उग्र एवं अराजक रवैये के आगे झुककर सरकार ने सन् 1963 में ही राजभाषा विधेयक पारित कर दिया, जिससे सन् 1965 के बाद भी देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बना ही रह गयाl
          
संवैधानिक दृष्टि से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है किन्तु अंग्रेजी के वर्चस्व ने उसे उसके ही घर में परमुखापेक्षी बना दिया हैl केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दो राजभाषा अधिनियम बनाये थेl अधिनियम की धारा 3/1 के अधीन हिन्दी के साथ अंग्रेजी को सहभाषा के रूप में अपनाने का निश्चय किया गया था l इसके चलते यह स्थिति बन गई कि पहले हिन्दी के साथ अंग्रेजी को जारी रखने की अवधि 15 वर्ष निश्चित की गई, किन्तु सहभाषा के रूप में इसके प्रयोग की अवधि अनिश्चितकालीन कर अंग्रेजी को अनंत काल तक बने रहने की खुली छूट दे दी गईl राजभाषा अधिनियम की धारा 3/2 के अन्तर्गत यह शर्त रख दी गई कि जब तक भारत के किसी एक भी राज्य की सरकार हिन्दी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाने से इनकार कर देती है, तब तक हिन्दी संघ की राजभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकतीl राजभाषा अधिनियम 1963 के अनुसार केन्द्रीय सरकार का कामकाज अंग्रेजी में किया जा सकता हैl राजभाषा नियम 1976 बनने से ‘क’ क्षेत्र के केन्द्रीय कार्यालयों में कामकाज केवल हिन्दी में, ‘ख’ क्षेत्र में हिन्दी और अंग्रेजी में तथा ‘ग’ क्षेत्र के राज्यों की सरकारों को पत्रादि अंग्रेजी में लिखने का प्रावधान हैl

संविधान लागू होने के समय अष्टम अनुसूची में हिन्दी, संस्कृत, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, बंगाली, उड़िया, मलयालम, पंजाबी, असमिया, उर्दू एवं कश्मीरी सहित कुल 14 भाषाएँ थीं। सन् 1967 में सिंधी, सन् 1992 में कोंकणी, मणिपुरी एवं  नेपाली सहित 18 हो गईं। सन् 2004 में मैथिली, बोडो, संथाली व डोगरी के सम्मिलित हो जाने से अष्टम अनुसूची में अब कुल 22 भाषाएँ हो गई हैं। राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए देश के कुछ राजनेता हिन्दी की बोलियों को संविधान की अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने की कोशिश में लगे हैंl जबकि हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की अष्टम अनुसूची में सम्मिलित करवाने की कोशिश या हिन्दी को बचाने के लिए देवनागरी लिपि के बजाय उसे रोमन लिपि में लिखने की क़वायद अनुचित, अव्यावहारिक एवं हिन्दी को ही कमजोर करने जैसी हैl भाषा और बोली के बीच के भेद को शब्दावली से नहीं, बल्कि लिपि के आधार पर समझा जा सकता हैl हिन्दी भाषा की इन बोलियों की लिपि भी देवनागरी है और बोलियों को भाषा मान लेने पर नुकसान हिन्दी का ही होना हैl

हिन्दी की किसी बोली का अष्टम अनुसूची में सम्मिलित होने के पश्चात् उसका स्वतंत्र अस्तित्व बन जाता हैl वह मूल भाषा से अलग  समझी जाने लगती हैl हिन्दी की बोलियाँ जब तक हिन्दी के साथ हैं, तब तक उसके बोलनेवालों की गणना हिन्दी के अन्तर्गत होगीl  जिस दिन कोई बोली संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल हो जाएगी, उस दिन से उसे अपनी मातृभाषा लिखनेवाले संवैधानिक रूप से हिन्दीभाषी नहीं गिने जाएंगेl आज तक अपने बोलनेवालों की संख्या के बल पर ही हिन्दी राजभाषा के पद पर आरूढ़ हैl भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की अष्टम अनुसूची शामिल करने की माँग एक दशक से उठ रही हैl हिन्दी की कई बोलियों के संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल हो जाने से हिन्दी का संख्या बल घट रहा हैl यदि यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो संख्या बल की कमी के चलते एक दिन हिन्दी को देश की राजभाषा के पद से पद्च्युत होना भी पड़ सकता हैl ये अंग्रेजीवाले ‘बाँटो और राज करो’ की आदत से बाज आनेवाले नहीं हैंl    

भारतीय संविधान ने भाषा से संबंधित विषयों को संविधान के अनुच्छेद 120 210 तथा अनुच्छेद 343 से 351 तक में वर्णित किया है। इसमें भाषा से संबंधित कुल 11 अनुच्छेद हैं। अनुच्छेद 344(1) 351 अष्टम अनुसूची की भाषाओं की मान्यता को दर्शाते हैं। यह सुनकर हिन्दी प्रेमी आहत होंगे कि अष्टम अनुसूची में जिन 38 भाषाओं को सम्मिलित किए जाने की बात इन दिनों ज़ोरों पर चल रही है, उसमे एक भाषा अंग्रेजी भी है और जिस दिन अंग्रेजी अष्टम अनुसूची में जगह पा गई, उस दिन संविधान के अनुच्छेद 344(1)351 के अनुसार भारत सरकार का संवैधानिक उत्तरदायित्व होगा कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह वह अंग्रेजी का भी ध्यान रखेl क्या अंग्रेजी को अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगानेवालों को नहीं मालूम कि अंग्रेजी को संवैधानिक मान्यता दिलाना दासता की मानसिकता को दृढ़ करने जैसा है?

हिन्दी भारतीय अस्मिता की पहचान हैl राजभाषा के रूप में देश के शासकीय प्रयोजनों को सिद्ध करने के साथ राष्ट्रभाषा के रूप में देश की एकता और अखण्डता को मजबूत बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी इसके कन्धों पर हैl इसमें देश की परम्परा, विश्वास, धर्म, संस्कृति एवं लोकनीति के स्वर समाहित हैंl हिन्दी भारतीय जनमानस के हृदय की भाषा हैl भारत का सर्वांगीण विकास  हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति के द्वारा ही सम्भव हैl
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बलवन्त
ग्राम- जूड़ी, पोस्ट- तेन्दू , तहसील- राबर्ट्सगंज
जनपद- सोनभद्र- 231216 (उत्तर प्रदेश)
मो. : 7337810240   Email-  balwant.acharya@gmail.com
(पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी, कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीस बेंगलूर-560053 (कर्नाटक)

Thursday, 19 December 2019

लेखा-जोखा 2019 / साहित्य में व्यंग्य


व्यंग्य यथार्थ में शामिल विसंगतियों की सुरुचिपूर्ण आलोचना है | एक लोकप्रिय विधा होने के कारण कम प्रतिभा वाले लेखक भी इसकी ओर आकर्षित होते हैं | हिंदी में व्यंग्य लेखन जितना सरल लोगों ने बना रखा है उतना आसान है नही | अन्य विधाओं के बनिस्पत व्यंग्य लिखना अपेक्षाकृत कठिन विधा मानी जाती है लेकिन जिस रफ़्तार से आज व्यंग्य के नाम पर व्यंग्य लिखा जा रहा है उनमे बहुत कम ही रचनाकार पाठकों के दिल में जगह बना पाते हैं | जाहिर है पूर्ववर्ती व्यंग्य लेखन की अपेक्षा वर्तमान व्यंग्य में वह गुणवत्ता मौजूद नही है | इसके और भी तमाम कारण हो सकते हैं जिनका विश्लेषण यहाँ अभीष्ट नही है वह फिर कभी | इधर पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य की स्वीकार्यता बढ़ी है और सोशल मीडिया पर भी उसका स्पेस बढ़ा है | वर्षांत में व्यंग्य साहित्य की जो भी प्रमुख किताबें प्रकाशित हुईं उनका लेखा-जोखा पाठकों के सुलभ सन्दर्भ हेतु इस आलेख में प्रस्तुत किया जा रहा है | 


वर्ष 2019 व्यंग्य साहित्य की दृष्टि से काफी भरापूरा कहा जा सकता है | इसी साल राजकमल प्रकाशन ने हरिशंकर परसाई की चर्चित किताब ‘निठल्ले की डायरी’ और शरद जोशी की अनुपलब्ध पुस्तक ‘वोट ले दरिया में डाल’ के नए संस्करण छापे | किताबघर प्रकाशन से स्मृतिशेष व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ के अंतिम व्यंग्य संग्रह ‘आखेट’ प्रकाशित हुआ | जिसमे उनके द्वारा समय- समय पर लिखित व्यंग्य रचनाओं को शामिल किया गया है | संग्रह की रचनाओं में एक अलग ही भाषाई तासीर और शैलीगत ताजगी है | व्यंग्य के स्त्री स्वरों में जहाँ वरिष्ठ लेखिका स्नेहलता पाठक का व्यंग्य संग्रह ‘सच बोले कौवा काटे’ प्रकाशित हुआ वहीँ दूसरी ओर रुझान पब्लिकेशन से आया उभरती व्यंग्य लेखिका इन्द्रजीत कौर का नया संग्रह ‘पंचरतंत्र की कथाएं’ चर्चा में रहा | व्यंग्य की एकदम युवा लेखिकाओं में ही अंशु प्रधान, समीक्षा तैलंग और अनीता यादव के पहले संग्रह क्रमशः ‘हुक्काम को क्या काम’ (बोधि प्रकाशन), ‘जीभ अनशन पर है’ (भावना प्रकाशन) और ‘बस इतना सा ख्वाब है’ (दिल्ली पुस्तक सदन) से प्रकाशित हुए |


वरिष्ठ व्यंग्यकारों के नए व्यंग्य संग्रहों की बात करें तो उनमे जवाहर चौधरी का 'बाज़ार में नंगे', अरविन्द तिवारी का व्यंग्य संग्रह ‘डोनाल्ड ट्रम्प की नाक’, सुरेश कान्त का व्यंग्य संग्रह ‘मुल्ला तीन प्याजा’, बुलाकी शर्मा के दो संग्रह ‘प्रतिनिधि व्यंग्य’‘टिकाऊ सीढ़ियाँ उठाऊ सीढ़ियाँ’, गिरीश पंकज के दो व्यंग्य संग्रह ‘आन्दोलन की खुजली’ और ‘पूंजीवादी सेल्फी’, कैलाश मंडलेकर का व्यंग्य संग्रह ‘बाबाओं के देश में’, श्रवण कुमार उर्मिलिया का व्यंग्य संग्रह ‘चुगलखोरी का अमृत चापलूसी का चूर्ण’ और पूरन सरमा के व्यंग्य संग्रह ‘श्री घोड़ीवाला का चुनाव अभियान’, राजेन्द्र वर्मा का व्यंग्य संग्रह ‘लक्ष्मी से अनबन’ और हरिशंकर राठी का ‘युधिष्ठिर का कुत्ता’ मुख्य रहे | व्यंग्य उपन्यास की दृष्टि से यह वर्ष उल्लेखनीय नही रहा | कुमार सुरेश का लोकोदय प्रकाशन से आया व्यंग्य उपन्यास ‘तंत्रकथा’ एक अच्छा उपन्यास बन सकता था लेकिन वह अपनी कथावस्तु की सपाटबयानी और चरित्रों के इकहरेपन का शिकार होकर फ्लॉप रहा |


नई पीढ़ी के व्यंग्यकारों में संतोष त्रिवेदी का व्यंग्य संग्रह ‘नकटों के शहर में’, अशोक व्यास का ‘विचारों का टैंकर’, प्रभाशंकर उपाध्याय का ‘प्रतिनिधि व्यंग्य’, संतराम पाण्डेय का ‘अगले जनम मोहे व्यंग्यकार ही कीजो’, विजी श्रीवास्तव का ‘इत्ती सी बात’, अनूपमणि त्रिपाठी का ‘अस मानुष की जात’, सुदर्शन सोनी का ‘अगले जनम मोहे कुत्ता ही कीजो’, सुधीर कुमार चौधरी का ‘विषपायी होता आदमी’, अलंकार रस्तोगी के दो व्यंग्य संग्रह ‘दो टूक’‘डंके की चोट पर’, संजीव निगम का ‘अंगुलिमाल का अहिंसा का नया फंडा’, अमित शर्मा का ‘लानत की होम डिलीवरी’, अजय अनुरागी का ‘एक गधे की उदासी’ और पंकज प्रसून की व्यंग्य कहानियों का संग्रह ‘द लम्पटगंज’ प्रमुख रहे |


युवा लेखक भुवनेश्वर उपाध्याय के सम्पादन में ‘व्यंग्य व्यंग्यकार और जो जरुरी है’ संकलन वनिका पब्लिकेशन से इसी वर्ष आया | उनका खुद का भी एक व्यंग्य संग्रह ‘बस फुंकारते रहिये’ शीर्षक से छपा | विवेक रंजन श्रीवास्तव के सम्पादन में ‘मिलीभगत’ नाम से समकालीन व्यंग्यकारों के व्यंग्यों का एक संकलन भी निकला | व्यंग्य की एकदम प्रारंभिक पीढ़ी को लेकर उनके चुनिन्दा व्यंग्यों का संग्रह राजेन्द्र शर्मा के सम्पादन में ‘हिंदी हास्य-व्यंग्य’ शीर्षक से आया | 300 से 700 शब्दों के मध्य छपने वाले दैनिक पत्रों के व्यंग्य कॉलम्स और स्तंभों में वह धार नज़र नही आयी | छिटपुट को छोड़ दें तो उनमे औसत व्यंग्यों का बोलबाला रहा | पत्रिकाओं में भी ‘व्यंग्य यात्रा’ को छोड़कर बाकियों का ट्रैक अलग ही दिशा में भटकता दिखा | उनमे एक सजग सम्पादन और गंभीर व्यंग्य दृष्टि का अभाव दिखा | नए वर्ष में उम्मीद की जानी चाहिए की लेखक अपनी किताबों को लाते हुए जल्दबाजी न दिखाएँ व उनमे रचनाओं का चयन करते हुए गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दें | व्यंग्यकार अपनी आलोचना को सकारात्मक भाव से ग्रहण करें तभी व्यंग्य विधा साहित्य में अपना सही मुकाम हासिल कर सकेगी |



गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...