Sunday, 5 October 2014

तीन कवि : तीन कविताएँ - 8


तीन कवि : तीन कविताओं में इस हफ्ते प्रस्तुत हैं निर्मला पुतुल, आशा पाण्डेय और प्रियंका सिंह की कविताएँ :
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अगर तुम मेरी जगह होते / निर्मला पुतुल 

ज़रा सोचो, कि
तुम मेरी जगह होते
और मैं तुम्हारी
तो, कैसा लगता तुम्हें?

कैसा लगता
अगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी में
होता तुम्हारा गाँव
और रह रहे होते तुम
घास-फूस की झोपड़ियों में
गाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथ
और बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी में
देखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरा तो, कैसा लगता तुम्हें?

कैसा लगता
अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ता
कोस भर दूर से ढोकर झरनों से पानी
और घर का चूल्हा जलाने के लिए
तोड़ रहे होते पत्थर
या बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, या फिर
अपनी खटारा साइकिल पर
लकड़ियों का गट्टर लादे
भाग रहे होते बाज़ार की ओर सुबह-सुबह
नून-तेल के जोगाड़ में!

कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चे
गाय, बैल, बकरियों के पीछे भागते
बगाली कर रहे होते
और तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाए
किसी स्कूल जाते बच्चे को.

जरा सोचो न, कैसा लगता?
अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठी
चाय सुड़क रही होती चार लोगो के बीच
और तुम सामने हाथ बाँधे खड़े
अपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होते
किसी काम के लिए

बताओं न कैसा लगता ?
जब पीठ थपथपाते हाथ
अचानक माँपने लगते माँसलता की मात्रा
फोटो खींचते, कैमरों के फ़ोकस
होंठो की पपड़ियों से बेख़बर
केंद्रित होते छाती के उभारों पर ।

सोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,
कि अगर किसी पंक्ति में तुम
सबसे पीछे होते
और मैं सबसे आगे और तो और
कैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होते
और चिपटी होती तुम्हारी नाक
पाँवो में बिवाई होती ?
और इन सबके लिए कोई फब्ती कस
लगाता ज़ोरदार ठहाका
बताओ न कैसा लगता तुम्हे...?
कैसा लगता तुम्हें...?

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सम्पर्क पता: सचिव, जीवन रेखा, दुधनी कुरूवा, दुमका - 814101 झारखंड
ई-मेल: nirmalaputul@gmail.com
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वेदना / आशा पाण्डेय ‘ओझा’ 


इधर तुम्हे देखने की मेरी चाह
बच्चे सी ज़िद्द पर अड़ी है
उधर तुम्हारे ना आने की उम्मीद
ठूंठ सी खड़ी है
दोनों में से कोई भी ना माने मेरी बात
ये कैसी दुर्दर परीक्षा की घड़ी है  
किस बिध और किसको समझाऊं मैं
जब तेरी झलक की तलबगार आंखें
दूर अंधेरों में भटकती है
तब स्मृतियों की झोली से
बिखरते रौशनी के छोटे-छोटे कण ही
बचातें हैं टूट-टूट कर गिरती मिटती आस को
पर उस पीर का क्या करूं 
पूरी दुनिया जब रंग जाती है
अबीर और गुलाल के मौसम में
मेरी अंत वासिनी वेदना
मीरा सी जोगिन ही रहती है
कभी तो रंग तूं
इस वेदना को
अपनी मुहब्बत के चटक रंग में
क्षण भर ही सही

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बेबसी / प्रियंका सिंह 


वो
मजबूत हाथ
निर्भीकता से
कमज़ोर, मुलायम कलाई
को जकड़ता हुआ
दबाता रहा......मसलता रहा

जोर
भर बाजुओं में
मछली सा कसता रहा
समेटता रहा .....मसलता रहा

सिरहन, कराहट और
दर्द से बिलखती
कमज़ोर, मुलायम कलाई
मसमसाती रही
चंगुल से छुटने को
छटपटाती रही
नब्ज़ चलती और रूकती रही
दर्द बढ़ता और बढ़ता रहा
स्पर्श जलने लगा .....तेज़ और तीखा
मांस सा बद्बुदाने लगा
लहू नसों से
झाकने लगा झरझरा कर
पकड़ मजबूत और बेबसी का हाथ
गिरने लगा

लड़खड़ाते
पैरों को मसलती मर्दानगी
तन की लाज को उघाडती हैवानगी
विनती, रूदन, भीख, इंसानियत,
दया, अपमान, श्राप, कसम, वास्ता रस्मों का
सब निर्थक.....बेमायने....बेबुनियाद

भोग, हवस, प्यास, भूख, अकृत्य,
अप्रकर्तिक, कुंठित इच्छा, वीभत्स इरादे
सब घेरे खड़े है अपराध को .......
प्रेरित करते है ....व्यभिचार को

त्राहि-त्राहि का कृन्दन,
मदद का शोर, जुल्म की चीखें
घुटती आवाजें
कुछ पल बाद दम तोड़ देती है

अहंकार भरा व्यभिचारी
एक मर्द रूपी जानवर
हैवानियत के नाले में डुबकी लगा
मलीच पशु सा तृप्त
ठहाके लगाता है

बेबसी
आत्म गिलानी का
अपराधबोध लिए
तार-तार हुआ अपना जिस्म
समेट गहरे अंधकार से भरे
कुएं में आत्महत्या कर लेती है

जिस्म खुरचा, लहू से सना
भूख से खाया और बल से नोचा गया
दीवार से झड़ी सूखी रेत सा
बिखरा पड़ा है

सिसकियाँ भी हार गयी
करुणा के आगे ....हार गयी
आंसू खो गये
आंखे खुली है पर
नज़र कुछ नही आता
अँधेरा......सिर्फ अँधेरा है हर जगह
ताने, गालियाँ, उलाहने और
अपमान के गूंजते
साये से मंडराते है हर तरफ

पर ये क्या
ज़बां फिर चींखी, चिल्लाई
डर कर हाथों से मुंह में
खुद को छुपा लिया
भयभीत हो उठती है नज़रे जब
इन काले दूर तक फैले अंधकार में
चमकती है ....... भयंकर
भूखे भेड़ियों की आंखे
खुनी, प्यासी, हवस की आंखे
वेहशी....काटने को दौडती
हैवानियत भारी ये
मर्दाना जानवर की आंखे !

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संपर्क- 27 ऋषि पुरम कॉलोनी, सिकंदरा, आगरा-7
ईमेल- priyanka2008singh@gmail.com
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गाँधी होने का अर्थ

गांधी जयंती पर विशेष आज जब सांप्रदायिकता अनेक रूपों में अपना वीभत्स प्रदर्शन कर रही है , आतंकवाद पूरी दुनिया में निरर्थक हत्याएं कर रहा है...