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Monday, 24 October 2016

हिंदी भाषा का समाजशास्त्र


हिंदी भाषा के सन्दर्भ में समाज, संस्कृति और भाषा तीनों को साथ लेकर चलने वाले सुप्रसिद्ध समाज भाषा वैज्ञानिक डॉ. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव का जन्म 1 जुलाई 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में हुआ था ।
      प्रस्तुत पुस्तक ‘हिन्दी भाषा का समाजशास्त्र’ में उनकी दृष्टि हिंदी भाषा के सामाजिक धर्म की ओर पहले गई । भाषा और धर्म पर विमर्श करनेवाला उस समय विश्व पटल पर अवस्थित दो दृष्टियाँ भाषा का समाजशास्त्र तथा समाजोन्मुख भाषा-विज्ञान की अध्यनरत प्रकृति एवं भाषागत अवधारणा पर भी उन्होंने भारत में संभवतः पहली बार दृष्टिपात किया ।
डॉ. श्रीवास्तव की यह दृष्टि उनकी पुस्तकों में साफ दिखती है जिसमें उन्होंने हिंदी को समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया हिया । वस्तुत: हिंदी भाषाई समाज की वास्तविकता यह है कि उसका हर सदस्य अपने घरेलू जीवन एवं व्यवहार के आत्मीय सन्दर्भ में अपनी बोलियों का प्रयोग करता है, तो शिक्षा एवं व्यवहार के औपचारिक सन्दर्भ में किसी न किसी अंश में खड़ीबोली का प्रयोग करता हैं । यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हिंदी साहित्य का मूलाधार भी उस हिंदी भाषाई समाज की सांस्कृतिक चेतना और काव्यात्मक संवेदना हैं जिसे हम बोली समुच्य की अंतरंग शक्ति के रूप में पाते हैं । अत: समाजभाषाविज्ञान के सन्दर्भ में डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव लिखते हैं, “इसके अध्ययन क्षेत्र के भीतर विभिन्न सामाजिक वर्गों की सामाजिक शैलियाँ, बहुभाषिकता का सामाजिक आधार, भाषा-नियोजन आदि भाषा अध्ययन के सभी सन्दर्भों में आ जाते हैं जिनका संबंध सामाजिक संस्थान से रहता है ।”
  इस पुस्तक के पहले खण्ड में भाषा और समाज का अन्तःसंबंध सैद्धानतिक परिप्रेक्ष्य्के रूप में बताया गया है । उन्होंने अपनी भाषा संबंधी विचारधारा को लांग (भाषा व्यवस्था) और पेरोल (भाषा व्यवहार) द्वारा प्रस्तुत किया है । आज व्यवस्था व्यक्ति की अपनी स्वेच्छा से परे जाकर समूहगत अनुबंधन के रूप में मिलती है तो भाषा-व्यवहार व्यक्तिजन्य प्रयोग होने के कारण विशामृपी है । इन्हीं दोनों के सदस्य एक दूसरे से बंधे हुए हैं और उनमें सम्प्रेषण भी हो पाता है । समाज भाषाविज्ञान के स्वरुप एवं प्रकृति को स्पस्ट रूप में प्रस्तुत करते हैं –जहाँ समाजविज्ञान समाज के समस्त व्यवहारों का निरिक्षण-परिक्षण करता है, वहीं भाषा भी एक प्रमुख सामाजिक व्यवहार है । इसलिए अन्य सामाजिक व्यवहारों की भांति ही वह भाषा- व्यवहार को भी नियंत्रित एवं सुविकसित करता है | अध्ययन क्षेत्र के भीतर विभिन्न सामाजिक आधार भाषा- नियोजन जैसे भाषा-अध्ययन के वे सारे सन्दर्भ आ जाती हैं जिनका संबंध संस्थान से रहता है ।
इसी प्रकार कैम्पवेल और वेल्स (1970) का मत है- “समाज भाषाविज्ञान की यह मान्यता है कि भाषा को इस सामाजिक बोध अथवा उसके सामाजिक प्रयोजन से अलग कर देखना असंगत है ।”
   शुद्ध भाषावैज्ञानिकों और समाज भाषावैज्ञानिकों के बीच का अंतर भाषा को भिन्न ढंग से देखने की दृष्टी का परिणाम कहा जा सकता है |  समाज और भाषा कभी एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते क्योंकि न ही भाषाविज्ञान का  अध्ययन सामाजिक परिप्रेक्ष्य के बिना संभव है आर न ही समाज भाषाविज्ञान को भाषा के सामाजिक पक्ष को जाने बिना समझा जा सकता है । अतः इस सन्दर्भ में भी आर.ए. हडसन का मानना है कि- “चाहे कोई भी भाषा पर कार्य कर रहा हो और चाहे किसी भी दृष्टिकोण से कर रहा हो । उसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह उस विषयवस्तु के सामाजिक पक्ष के बारे में पहले जाने ।”
  समाज भाषाविज्ञान हो या भाषाविज्ञान दोनों का संबंध भाषा और समाज से है । और किसी एक के अभाव में दूसरा कार्य नहीं कर सकता क्योंकि एक का अस्तित्व ही दूसरे में निहित है । आर.ए. हडसन का कथन है कि- “समाज भाषाविज्ञान से भाषाविज्ञान केवल इसलिए अलग है क्योंकि वह भाषिक संरचना का अध्ययन सामाजिक परिप्रेक्ष्य के बहार करता है ।” इस तरह उन्होंने भाषा को एक सामाजिक प्रक्रिया (social function) भी माना है क्योंकि समाज में सम्प्रेषण के माध्यम से और समूह को पहचानने के माध्यम से यह कई सामाजिक कार्य करती है ।
इस तरह यह बातें स्पस्ट हो गई है कि शुद्ध भाषाविज्ञान अगर भाषा का अध्ययन भाषा के लिए करता है तो समाज भाषाविज्ञान समाज के माध्यम से भाषा अध्ययन करता है । अगर शुद्ध भाषाविज्ञान अपने अध्ययन का संदर्भ भाषा को मानता है तो समाज भाषाविज्ञान आपसी भाषिक व्यवहार को मानता है |
पुस्तक के खण्ड (ख) में श्रीवास्तव जी ने हिंदी भाषा की सामाजिक अस्मिता पर बात करते हुए हिंदी-उर्दू  के विवाद पर ज्यादा बल दिया है । उनके अनुसार हिंदी और उर्दू को अलग होने के लिए किसी प्रकार की सांप्रदायिक या जातीय आधार की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनकी चेतना एक है जो समाज के हर स्तर पर महसूस की जा सकती है ।
हिंदी और उर्दू का न तो कोई जातीय आधार है और न तो कोई सांप्रदायिक आधार । वास्तव में हिंदी और उर्दू एक ही भाषा है जो समाज के हर स्तर पर महसूस की जा सकती है । हिंदी उर्दू से कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है जबकि फारसी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ीबोली हिंदी का ही एक रूप है जिसने इन शब्दावलियों को और काव्य रुढ़ियों का किसी खास ऐतिहासिक परिस्थिति में अपना लिया था । अतः हिंदी और उर्दू की हस्ती एक है । पर जिन कारणों से इन दोनों में अलगाव को देखा गया है वह उर्दू काव्य का ही सामंतवादी आधार था जो आम जनता की भाषा से दूर था और सामंतों एवं शासक वर्ग की भाषा थी । पर यही उर्दू फिर जब देश की आजादी से जुड़ी आम जनता के दुःख-दर्द से बंधी तो अपने और हिंदी के बीच की दरार को पाटने लगी । आखिर में इस एक जवान को बोलने वालों में न कोई भेदभाव है और न सामाजिक अस्मिता के धरातल पर कोई दुराव।
हिंदी का जनपदीय, रास्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सन्दर्भ भी कुछ इस तरह है । हिंदी अपने जनपदीय सन्दर्भ में छह प्रादेशिक राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा तथा दो संघ राज्यों-दिल्ली और चंडीगढ़ की राजभाषा के रूप में स्वीकृत है । इस तरह राष्ट्रिय सन्दर्भों में प्रयुक्त होने वाली हिंदी जनभाषा और राजभाषा के दो निश्चित भाषारूप में उभरकर हमारे सामने आती है । जनभाषा के रूप में हिंदी अहिन्दी क्षेत्रों में प्लेटफोर्म, अंतरराष्ट्रीय बस अड्डे, सांस्कृतिक स्थलों पर प्रयोग होती दिखती है तथा फिल्मों के माध्यम से अहिन्दी भाषी लोगों के लिए संपर्क का कार्य करती हुई दिखती है । इस भारतवर्ष में बहुभाषिकता यहाँ की संचार-व्यवस्था की अपनी आवश्यकताओं के सहज और प्राकृतिक लक्षण के रूप में उभरी है । भारतवर्ष में पारिवारिक व्यवहार, सम्प्रेशानियता, दैनिक आचरण आदि के सन्दर्भ में एक से अधिक भाषाओं के प्रयोग होने के कारण यहाँ की बहुभाषिक स्थिति व्यक्तिपरक न रहकर समुदायपरक हो गई है । इस सन्दर्भ में डॉ. श्रीवास्तव ने बिहार के संथाली समाज का उदहारण देते हुए कहा है कि- “अपने जीवन के पारिवारिक सन्दर्भों में वे संथाली का प्रयोग करते हैं । पर अपने वैयक्तिक और पारिवारिक जीवन के दायरे से बहार आकर वे स्थानीय बोलियों (भोजपुरी, मैथिली, और मगही) को अपनाते हुए देखे जाते हैं ।”
इस समुदायपरक बहुभाषिकता की मुख्य विशेषता है लगभग प्रत्येक भारतीय का द्विभाषिक होना जबकि यह उसके व्यक्तित्व को बिना खण्डित किए और भी विकसित और पुष्ट बनाना है । इस सन्दर्भ में डॉ.श्रीवास्तव का मानना है कि- “ बहुभाषिकता की भाषाई स्थिति में उसका मानकीकृत रूप बहुमुखी हो सकता है और मानक हिंदी में लचीली स्थिरता रह सकती है ।”
आधुनिकीकरण की संकल्पना को स्पस्ट करते हुए उन्होंने मालोशिया के सुप्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक आलिसजबाना के विचारों की व्याख्या की । उनके अनुसार-“आधुनिकीकरण की परिभाषा है अभिव्यक्तिपरक संस्कृति का प्रगतिपरक संस्कृति में रूपांतरण ।”
बहुभाषिक और सामाजिक अस्मिता : व्यक्ति समाज से पनपने वाला प्राणी है और समाज में उसे अपने विचारों का आदान-प्रदान करना होता है । इसलिए वह उसी समाज की भाषा का प्रयोग भी करता है । व्यक्ति अपने विभिन्न प्रयोजनों के लिए एक ही समय में विभिन्न उपयुक्त भाषाओं का प्रयोग कर सकता है जिसे आम भाषा में व्यक्ति की बहुभाषिक स्थिति कहा जाता है । अर्थात् जब किसी भाषाई समाज में एक भाषा से इतर किसी अन्य भाषा का सम्प्रेषण के लिए प्रयोग होता है तो उसे बहुभाषिक स्थति कहा जाता है ।
इस सन्दर्भ में डॉ. कुसुम अग्रवाल का मानना है कि- “ अधुनातन समाज भाषावैज्ञानिक अध्ययन इस बात की ओर करते हैं कि भाषाई समाज का वास्तविक स्वरुप प्रयोक्ताओं के अस्मिता ऐक्य पर भी आधारित है । अर्थात् किसी भी भाषाई समाज में वे सब लीग सम्मिलित होंगे जो इस समाज में व्यक्त भाषा के प्रयोग द्वारा अपनी पहचान भी स्थापित करना चाहते हैं ।”
इसके अतिरिक्त इस पुस्तक के खण्ड (ग) में श्रीवास्तव जी ने हिंदी और मानकीकरण के विविध सन्दर्भों में साथ-साथ नियोजन और भाषा नियोजन हिंदी और आधुनिकीकरण पर अपने विचार व्यक्त किए हैं । किसी भी राष्ट्र या देश में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता रहती है जो विभिन्न व्यवहार-क्षेत्र में सम्प्रेषण साधन की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके । इसके लिए ज़रूरी है कि वह भाषा क्षेत्रीय तथा सामाजिक विविधताओं से उठकर सर्वग्राह्य तथा सामाजिक हो । ऐसे तो कोई भी समाज भाषा के सर्वमान्य रूप को ही अपनाता है पर इसके सम्यक विकास के लिए इसके नियोजिन की आवश्यकता होती है जो वास्तव में दो दिशाओं में किया जाता है-
1.  मानकीकरण
2.  आधुनिकीकरण
डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार- “मानकीकरण मान्य प्रयोगों को निर्धारित करने के लिए नियोमों का कोडीकरण है ।”
कृष्णकुमार गोस्वामी के अनुसार- “मानकीकरण रूपात्मक एकीकरण की प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्याकरणिक रूपों को अनेकता में एकता के आधार पर मानक बनाया जाता है ।”
       आधुनिकीकरण वास्तव में एक सतत प्रक्रिया है जिसमें दिशा, दृष्टि और मूल्य का बहुत महत्व होता है । भाषा के इसी आधुनिकीकरण के सन्दर्भ में डॉ.श्रीवास्तव का यह कथन है कि- “प्रसिद्ध भाषाविद अलिस हबाना ने पाश्चात्य देशों में प्रचलित आधुनिकीकरण की इन सभी संकल्पनाओं का विरोध करते हुए स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि पश्चिमीकरण की धारणा से यूरोप की संस्कृति में प्रभुता की गंध आती है ।... उनकी यह मान्यता रही है कि मूलतः हमें दो प्रकार की संस्कृति देखने को मिलती हैं - अभिव्यक्तिपरक संस्कृति (एक्स्प्रेसिक) और प्रगतिपरक (प्रोग्रेसिव) संस्कृति ।”
        अतः अंत में हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भाषा के आधुनिकीकरण और मानकीकरण के विषय में आलोचना और आत्मालोचना से समन्वित दृष्टि लेकर ही आगे बढ़ना चाहिए । कारण सरल और स्पस्ट भाषा रूपों को ही व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है । चुकि भारतीय समाज एक बहुभाषी समाज है । इसलिए हिंदी की मानकीकरण प्रक्रिया की कोई एक निशित दिशा नहीं बन पाई है ।
भाषा-नियोजन : नियोजन का  अर्थ है मानव-समस्या-समाधान या नीति निर्माण के क्षेत्र का क्रिया-कलाप । इस सन्दर्भ में डॉ. श्रीवास्तव का मानना है कि- “यह एक ऐसी गतिविधि है जिसमें लक्ष्य को निर्धारित किया जाता है, साधनों का चयन होता है और परिणामों का पूर्वानुमान व्यवस्थित तथा स्पस्ट ढंग से किया जाता है ।” डॉ. दिलीप सिंह का कथन है- “ सहज ढंग से कहें तो भाषा-नियोजन का कार्य और तात्पर्य है किसी देश और समाज की भाषा विषयक समस्याओं के लिए समुचित योजना बनाना तथा उसे क्रियान्वित करना ।”
विशेषताएँ : ‘हिंदी भाषा का समाजशास्त्र’ सन् 1994 में प्रकाशित हुई । उन्होंने हिंदी को समाजशास्त्रिय परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया है । भाषा के समाजशास्त्र से संबंध प्रमुख बिंदु हिंदी भाषा के मानकीकरण तथा आधुनिकीकरण द्वारा इस पुस्तक के प्रत्येक आलेख में प्रकट हुए हैं । श्रीवास्तव जी ने इस पुस्तक में समाज संदर्भित भाषा अध्ययन के महत्व को ही उजागर नहीं किया है बल्कि हिंदी भाषा की वास्तविकता पर भी बल दिया है । हिंदी जैसी भाषा का समाजशास्त्रिय व्यापक अध्ययन करना संभव नहीं होता है । इस पुस्तक के द्वारा श्रीवास्तव जी ने हिंदी भाषा के समाजशास्त्रिय अध्ययन को सहज संभव बनाया ।
निष्कर्ष : ‘हिंदी भाषा का समाजशास्त्र’ में भाषा अध्ययन के माध्यम से हम सामाजिक संरचना की तहों तक पहुँच सके हैं । अल्पसंख्यक भाषा समुदायों की भाषाओं का मिश्रण स्थिर बहुभाषिकता का विकास, भाषा का मानकीकरण और आधुनिकीकरण, भाषा-विकास में भाषा-नियोजन की भूमिका आदि इस पुस्तक में विश्लेषित किया गया है । हिंदी भाषा का समाजशास्त्रिय अध्ययन के अलावा भाषा के विविध सन्दर्भों एवं अनेक प्रयोजनों का स्पष्ट विश्लेषण डॉ. श्रीवास्तव ने किया है।
हमारा मत : डॉ. श्रीवास्तव ने बड़ी ही सटीक तरीके से हिंदी भाषा का समाजशास्त्रिय अध्ययन किया है | हमारे सामने हिंदी भाषा का मानकीकरण, आधुनिकीकरण के उनके विभिन्न प्रयोजन स्पष्ट होते हैं । डॉ. दिलीप सिंह की पुस्तक ‘भाषा का संसार’ में उन्होंने कई भाषाविदों के विचारों का आकलन किया है । उन्होंने सस्यूर का प्रतिक सिद्धांत से लेकर डेल हाइम्स के विचारों को भी प्रकट किया है ।
प्रो. श्रीवास्तव ने हिंदी भाषा के सन्दर्भ में समाज, संस्कृति और भाषा तीनों को साथ लेकर चलने की कोशिश की है । इस दृष्टि से ‘हिंदी भाषा का समाजशास्त्र’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक सिद्ध होता है ।

संदर्भ-ग्रंथ सूचि :
1.  ‘हिंदी भाषा का समाजशास्त्र’ – प्रो. रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव (राधाकृष्ण प्रकाशन-1994)
2.  ‘भाषा का संसार’ (आधुनिक भाषाविज्ञान की सुगम भूमिका) – प्रो. दिलीप सिंह (वाणी प्रकाशन- 2008)
3.  ‘हिंदी भाषा की सामाजिक भूमिका’ – भोलानाथ तिवारी

4.  I shall refer throughout to ‘sociolinguistic’ and ‘linguistics’ as though they were separate individuals but these terms can simply be used to reflect the social side of the language without taking the distinction too seriously.” R.A.Hudson, Sociolinguistic Pg-3
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Wednesday, 5 October 2016

भगवत रावत की कविता पर भरत प्रसाद का आलेख


सीधी लकीर के साधक
भरत प्रसाद

कविवर ! जन समूह के साधुवाद से भ्रान्त न हो जाना
उनकी करतल ध्वनि की गूँजें शीघ्र विलीन हो जाएँगी
तब तुम बहुत से सिरफिरों की आलोचना सुनोगे
और जनता की चुभती मुस्कानें तुम्हारा रक्त जमा देंगी
अपनी उपलब्धियों की प्रशंसा के लिए किसी को मत पुकारो
प्रशंसा तो महसूस होती है स्वयं धमनियों में
स्वयं तुम ही निर्णायक हो
तुम्हारा अपना कठोर निर्णय ही सर्वोपरि होगा।
(पुश्किन: कवि के प्रति)

कविता का व्यक्तित्व और व्यक्तित्व की कविता:
ठीक भारतेन्दु बाबू की उम्र पाकर रूसी साहित्य की गहराई को अपने सृजन से भर देने वाले युवा महाकवि पुश्किन। वजह क्या रही होगी, यह कहने की- अपनी उपलब्धियों की प्रशंसा के लिए........।कितना खोजी मस्तिष्क का था एमर्सनजिसने विकल्पहीन लकीर ही खींच दी - केवल प्रतिभा ही लेखक नहीं बना सकती, कृति के पीछे एक व्यक्तित्व भी होना चाहिए।
            यह व्यक्तित्व सिर्फ किसी रचनाकार या कवि का ही नहीं, बल्कि कविता का भी होता है। यह अवश्य है कि कविता का व्यक्तित्व शत-प्रतिशत कवि के दृश्य-अदृश्य व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। किन्तु कवि का व्यक्तित्व सिर्फ कविता पर निर्भर नहीं रहता। कविता उसी कवि को मांजती, सुधारती, गढ़ती, संवारती और धारदार बनाती है, जो कविता को कला की जादूगरी और शब्दों का खेल मानकर नहीं चलते। कविता जिनकी शरीर में बहता हुआ दूसरा खून है, धड़कन के पीछे धड़कता हुआ एक और हृदय तथा आँखों को रोशनी देने वाली एक और आँख है। कविता जिसके लिए गाढ़ी कमाई है, जमीनी परिश्रम है, पसीना बहाऊ मजदूरी है, निश्चय ही ऐसे कवि के व्यक्तित्व का निर्माण करने में उसकी कविता की भूमिका केन्द्रीय होती है। अपने शब्द-दर-शब्द से नाभि-नाल बद्ध ऐसे कवि की पढ़ लीजिए कविताएँ, जान जाएंगे कविता में डूबी उसकी ऊँचाई को। कवि का असली पता, ठिकाना और पिन कोड उसकी श्रमिक त्वचा से फूटने, बहने, रिसने वाली कविताएँ ही होती हैं।
            समकालीन हिन्दी कविता की वरिष्ठ पीढ़ी में कम से कम भगवत रावत एक ऐसे उदाहरण हैं, जिनके व्यक्तित्व का नवनिर्माण, पुनर्निर्माण उनकी कविता ने किया। उछलती, मचलती, मन्द्र रौ में बहती, कभी अतिशयता में एक ही जगह उमड़-घुमड़ कर बरस पड़ती उनकी प्रखर भावुकता कविताओं के व्यक्तित्व का रूपक रचती है। भगवत रावत मूलतः भाव के शिल्पी हैं, हृदय के संगीतकार हैं, अनुभूतियों के मूर्तिकार हैं । प्रगतिशील चेतना में रमा हुआ, जगा हुआ उनका  स्वनिर्मित  विवेक कविताओं में  दृष्टि भरता है, विचार बुनता है, नया चिंतन रचता है और कविता को आँसू बहाने वाली कोरी भावुकता की विधा बनने से बचा लेता है, किन्तु कहना जरूरी है कि उनकी कविताओं में विचारमय अर्थ बाढ़ में डूबे पड़े वृक्ष की तरह हैं। टी. एस. इलियट ने कहा होगा तो कहा होगा कवि के लिए रचना से अनिवार्यतः दूरी बनाने को। भगवत रावत ठीक इसकी उलट के कवि बन गये। भगवत हिन्दी में ऐसे अकेले कवि नहीं हैं, जो अपनी कविता से बुने और बनाए गये हैं। घनानन्द जैसे विरह-पुजारी कवि लिखता है -मोहि तो मेरे कविŸा बनावत।क्या कहेंगे ऐसे कवि के बारे में ? अपनी कविता से गढ़े, तराशे और शोधित किए गये कवि की सबसे दुर्लभ खासियत यह होती है कि वह दुहरे नहीं, एकहरे व्यक्तित्व का स्तम्भ होता है और कई बार ऐसा कवि अपने कविता से ज्यादा अपने सुदृढ़ व्यक्तित्व के कारण सृजन की ओर शेष समाज को आकर्षित करता है। भगवत रावत की श्रेष्ठ कवि के रूप में चतुर्दिक स्वीकार्यता बनी है, तो उसका एक जादुई रहस्य कविताओं के दमखम के साथ-साथ व्यक्तित्व का निखरा हुआ एकहरापन भी है। भगवत जिस जमीन से उठे, जिन धूप-छांही दिशाओं को निरख कर अपनी आँखें  कृतार्थ की, जिस जनपदी आकाश की छाया तले अपने इंसान का मस्तक सीधा किया, उसके प्रति अथाह ऋण का कर्तव्य कभी नहीं भूले। गौर से देखें तो आपको क्या एक ही माँ नजर आएगी ? क्या इस प्रकृति में पिता के कद का और कोई नहीं मिलेगा ? नदियों, फसलों, छाया भरे जंगलों, दरख्तों और जीवन भर आशीर्वाद की तरह सिर पर झुके हुए क्षितिज से आपका कौन सा रिश्ता बनता है ? जाने-अनजाने, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जो अथाह, अव्याख्येय, अपरिभाषेय रिश्ता इस ममतामयी जड़ प्रकृति से कायम होता है, वह मनुष्य की दुनिया से क्या कायम होगा। भगवत के व्यक्तित्व को संस्कार देने में सीधा-सरल व्यवहार रचने में और सबको अपनी नजदीकी से पानी के माफिक सुख देने में दूसरी बड़ी भूमिका इस रूप, रस, गंध, स्वाद और दर्शन से भरी प्रकृति की रही है। अपने समकालीन कवियों में भगवत रावत को लोकसत्ता का गायक कवि कहा गया। किन्तु वह लोकसत्ता क्या शहरों या महानगरों में बसती है ? यह लोक गाँवों की आत्मा है, बस्तियों-अंचलों की परिभाषा है, सीमांत पर बसे हुए पुरवा, टोला, पट्टी का धूसर-मटमैला किन्तु सच्चा यथार्थ है।
            सर्जक के भीतर सृजन की प्रतिभा ही नैसर्गिक होती है, बाकी उसके विकास और विस्तार के सहयोगी तत्व शुद्ध रूप से बाहरी और परिस्थितिजन्य होते हैं। बचपन से लेकर चरम युवावस्था तक कवि जिस माहौल में पला-बढ़ा है, जिन संसकारों में रचा-बसा है, जिस हालात में दिन-प्रतिदिन साँस लिया है, अनिवार्यतः वही संस्कार और वही हालात उसकी सर्जक क्षमता के मौलिक रंग बनते हैं। क्षण-क्षण कवि या लेखक को अपने अदृश्य किन्तु लौह-साँचे में ढालते ये तत्व कवि को परिभाषित करने वाले मूल कारण बन जाते हैं। मुक्तिबोध, धूमिल, गोरखपाण्डे के विलक्षण सर्जक से साक्षात्कार करना हो, तो उनकी परिस्थितियों, आर्थिक-सामाजिक दशाओं और स्थानीय वातावरण का बारीकी से पता लगाइए। भगवत रावत की कविताओं में जीवन का साधारणपन, मनुष्य का बहुरंगी, बहुरूपिया चेहरा और गुमनाम चेहरों का पराजित संघर्ष बार-बार चमकता है। अपने साक्षात्कारों में भगवत रावत ने अनुराग से भरे कृतज्ञ हृदय के साथ बचपन के सामाजिक और पारिवारिक वातारण का अथाह ऋण स्वीकार किया है । लगभग उस भाव के साथ कि  भगवतभगवत हैं, क्योंकि आरंभिक जीवन के संस्कारों ने उन्हें इस स्तर तक उठने के लिए निर्मित किया।
            यह दरसत्य है कि अपनी पीढ़ी में एक मात्र भगवत रावत ही हैं, जिन्हें समकालीन लोक का प्रतिनिधि कवि कहा जा सकता है। वजह सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने लोक जीवन के विषम यथार्थ को अपनी कविताओं में व्यापक सम्मान दिया, बल्कि वजह यह है कि लोक जीवन का सत्य अपने वास्तविक स्वरूप में उद्भासित होता प्रतीत होता है। एक तो संकल्प और समर्पण के साथ उस लोक को आत्मसात करने की मानस-साधना और दूसरे जीवन के हर मोड़ पर लोक सत्ता की निकटतम मौजूदगी ने भगवत रावत के सर्जक व्यक्तित्व को अपने साँचे में ढाल डाला। अभिव्यक्ति के किसी विशेष साँचे में ढलना एक तरह से कन्डीशनिंगहै, जो युवावस्था से लेकर जीवन के सन्ध्याकाल तक कवि में लगातार सक्रिय रहती है। अभिव्यक्ति के इस विशेष साँचे में तब्दील हो उठना ही कवि के धारा-प्रवर्तक व्यक्तित्व का मूल कारण है। निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन का उदाहरण इस गूढ़ सत्य को समझने के लिए काफी है। भगवत रावत का कवि-मानस उस प्रगतिशील विचारधारा की भी निर्मिति है, जिसे उन्होंने जमीन प्रेमी हृदय के व्यापक अनुभवों से हासिल किया। भगवत रावत की प्रगतिशीलता माक्र्सवाद से कहीं ज्यादा फैले-बिखरे, मरते-हारते जीवन के हूबहू साक्षात्कार का परिणाम है। जिस सहज अभिव्यक्ति की शैली से कलावादी कवियों का छत्तीस का आंकड़ा रहा है, भगवत रावत ने उसे ही अपने सृजन की सबसे बड़ी ताकत बना लिया और उसी सहज अभिव्यक्ति के बूते समूची काव्य-यात्रा के दौरान एक ऐसा प्रति-संसार रच डाला, जो अपने समय के यथार्थ का प्रामाणिक चेहरा कहा जा सकता है।
भगवत कला की जमीन:
            यह सहजता उतनी सहज नहीं है, जितना सामान्य तौर पर मान लिया जाता है। सहज तो कबीर और नागार्जुन भी हैं, मगर क्या इतने आसान नजर आते हैं ? सहजता वह प्रशस्त मार्ग है जो कविता को आमजन तक ले जाता है। ऐसी असाधारण कला जो अपनी साधारणता में अचूक होती है, जो पानी की तरह दिखती है सरल और तरल किन्तु जिसमें छिपी उर्जा का अंदाजा पीकर, प्यास बुझाकर ही लगाया जा सकता है। मार्मिक सहजता कठिन सिद्धि है, जो कवि के दुर्लभ सहज व्यक्तित्व से ही संभव होती है। नायाब सहजता में जीवन-दर्शन लहलहाता है, मौलिक सत्य आँखें खोलता है, नये विचारों का प्राण धड़कता है। यह सहजता अपने शिखरत्व पर कालजयी प्रकाश का रूपक रचती है। क्लासिक सहजता सधी हुई दृष्टि का प्राकृतिक मार्ग है। जिस कवि ने समर्पण भरे परिश्रम के साथ अपने समय को साधा है, अपनी अन्तश्चेतना को जमीन का स्वभाव दिया है, अपनी भावनाओं को पानी बनाया है और अपनी साँस-दर-साँस को आम जीवन के दुख-दर्द से एकाकार कर डाला है वही कवि वही लेखक सहज रचनात्मकता को प्रज्ज्वलित कर सकता है। सहज अभिव्यक्ति का मार्ग अपनाना सृजन में रिस्कहै। यह खतरा वही ले सकता है, जिसे अपनी दूरदर्शी अन्तर्दृष्टि पर अटूट भरोसा है, जिसे अपने शब्दों के अचूक असर पर अथाह आत्मविश्वास है, जो इसमें यकीन रखता है कि सीधा, प्रशस्त पथ ही आम जनता को सर्वाधिक हित पहुँचाने वाला मार्ग होता है। एक तो भगवत का मूल स्वभाव, दूसरे उनके व्यक्तित्व की जमीनी संरचना और तीसरे उनका खुद का निर्णय, ये तीनों कारण उन्हें सहज अभिव्यक्ति के संस्कार में ढाल देने वाले कारण सिद्ध हुए। फिर क्यों न घोषत कर दिया जाय- भगवत रावत को सीधी लकीर का साधक ? भगवत रावत अपने विषयों को दुलारते हैं, सहलाते हैं, मरहम-पट्टी करते हैं और व्यक्ति के गहरे जख्मों को दवा से नहीं, अपने आँसुओं से ठीक करते हैं। भेद, दूरी, फासला भगवत रावत पर रत्ती भर भी लागू नहीं होता। यहाँ तक कि अपने दुश्मनों, विरोधियों से भी सटकर, आँख से आँख मिलाकर संवाद करते हैं, बहस खड़ी करते हैं। इसकी तनिक परवाह किए बगैर कि इंच भर के फासले पर खड़ा विरोधी उनकी तरह सहृदय नहीं होता। कोई कलाकार अपने विषयों से अन्तरविहीन निकटता तभी बना सकता है, जब वह उसके मूल्य को रेशा-रेशा समझ जाय, जब उसने विषय की अर्थवत्ता का साक्षात्कार कर लिया हो, या फिर उसने विषय के भीतर छिपी हुई दार्शनिकता का अन्तज्र्ञान कर लिया हो। भगवत रावत अपने समय के उन विरत कवियों में हैं, जिन्होंने समय से सीखने के लिए नहीं, बल्कि समय को सिखाने के लिए सृजन का रास्ता चुना। वे समय के रंग और उसकी चाल-ढाल का ज्ञान नहीं देते, बल्कि उसके प्रति सचेत करते हैं, मोर्चाबद्ध करते हैं, खड़ा होने की शक्ति भरते हैं और दृष्टि सम्पन्न् बनाते हैं। महसूस कीजिए इन पंक्तियों में धड़कते हुए दर्द को -
अम्मा, वह था अपना दुख/कुँजड़े, दर्जी, नाई का दुख
धोबी का दुख/बेवा हस्सन की माँ का दुख
मिट्टी के बरतन वालों का/ खपरैलों की छत वालों का
गोबर लिए घरों का/ अपना दुख था
उस दुख की तस्वीर खींचने की/ हिम्मत किसमें थी ?
(हुआ कुछ इस तरह , पृ. सं. 46-47)
अलग-अलग साक्षात्कारों में भगवत रावत ने मुक्तिबोध को अपने काव्यगुरु का दर्जा दिया। किन्तु आश्चर्य यह कि उनकी कविताएँ मुक्तिबोधीय ढाँचे से शत-प्रतिशत मुक्त हैं, बल्कि अभिव्यक्ति की शैली में दोनों कवि नितान्त विपरीत रास्तों केफकीर नजर आते हैं। एक कवि आपस में गुत्थमगुत्था मानव चरित्र को फैंटेसी जैसे रहस्यमय शिल्प के बूते प्रकट करता है और दूसरा कवि मानव-चरित्र की रहस्यपूर्ण जटिलताओं को सरलतम जज्बात के अंदाज में। एक कवि की भाषा व्यवहार से परे बेलीक संस्कृतनिष्ठता की गूँज पैदा करती है और दूसरे कवि की भाषा जुबान के स्वाद से सराबोर अपनी जैसी बोली का सुकून देती हुई। एक कवि औघड़ साधक की तरह मनोजगत के जटिल अंधकार का पर्दाफाश करने पर जिदपूर्वक अड़ा हुआ, और दूसरा कवि कविता के चैराहे पर खड़ा चैकीदार की शैली में धोखेबाज और कातिल समय के प्रति सबको सावधान करता हुआ। एक कवि शिल्पकार है, तो दूसरा व्याख्याकार। एक कवि निर्माता है, तो दूसरा रखवाला। एक कवि युग का वैज्ञानिक है, तो दूसरा शोधकर्ता। मुक्तिबोध के कद के आगे नतमस्तक भगवत रावत की यह असाधारण सफलता कही जाएगी कि अपने समय के अग्रधावक के पीछे-पीछे दौड़ने के बजाय, अकेले धीरे-धीरे मंजिल तय करने का रास्ता चुना और मुक्तिबोध की तरह किसी सशक्त परम्परा का शिल्पी न होने के बावजूद अपनी सहजता की श्रेष्ठता को निर्विवाद रूप से स्थापित कर लिया।
सिर्फ एक या दो नहीं, बल्कि दर्जनों लम्बी कविताएँ भगवत जी काव्य यात्रा में फैली-चमकती दिखती हैं। लम्बी कविता के मानक कवि के रूप में मुक्तिबोध से बड़ा भला कौन है ? मगर भगवत रावत भी लम्बी कविताओं के काबिल शिल्पकार के रूप में माने जा सकते हैं। लम्बी कविता को साधना एक मूल्यवान जोखिम है, उल्टा पड़ जाने वाला एक दाँव- अगर उसके तनाव को सह पाने का अकूत धैर्य कवि के भीतर नहीं है तो। लम्बी कविता अनिवार्यतः अथक कल्पनाप्रवणता की माँग करती है। उसके लिए चाहिए विषय के व्यक्तित्व का रेशा-रेशा उद्घाटित करने वाली उर्वर अन्तर्दृष्टि, मौलिक-दर-मौलिक अर्थों की आग पैदा करने वाली जज्बाती भावुकता। लम्बी कविता एक अभियान, यात्रा, युद्धाभ्यास, योग और साहसिक प्रयोग है, जिसका श्रेष्ठ निर्वाह वही कवि कर सकता है, जो विषयों के शेष-अशेष सत्य से बारीक शिल्पकार की तरह जूझना जानता हो। जो भाषा से बहुमूल्य खेल खेलने की कला में दक्ष हो और इससे भी जरूरी तथ्य यह कि वह कवि विषय से निकलकर बहती हुई अर्थों की धारा को पीने वाली प्रतिभा और आत्मविश्वास से लबरेज हो। चूँकि श्रेष्ठ लम्बी कविता के लिए शर्त की तरह अनिवार्य ये क्षमताएँ हर कवि में मोजूद नहीं होतीं, इसीलिए लम्बी कविताओं पर दाँव खेलने वाले अधिकांश कवि असफलता को गले लगा बैठते हैं। यह एक ऐसा लौह-धनुष है, जिसे उठाकर चढ़ा देना विरले लक्ष्य-साधकों के द्वारा ही सम्भव होता है। भगवत रावत के एक संग्रह का शीर्षक ही है-अम्मा से बातें और अन्य लम्बी कविताएँप्रकाशित हुआ - 2008 ई. में। अन्य लम्बी कविताओं में उल्लेखनीय हैं - देश एक राग है’, ‘बम्बई नहीं मुम्बई-रेसकोर्स’, कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आबोहवा और, जे. अल्फ्रेड प्रूफ्राक से एक बातचीत, ‘सुनो हीरामन’, और रूपकुमार कथा। इनमें - कहते हैं दिल्ली की है कुछ आबोहवा औरकविता न सिर्फ भगवत रावत के सृजन में बल्कि समकालीन हिन्दी कविता की चन्द प्रतिनिधि कविताओं में ऊँचा स्थान पाने की हैसियत रखती है। गहरी नदी के मन्द्र आवेग की तरह बहती इस कविता की श्रेष्ठता का रहस्य क्या है ? चलिए देखते हंै। इस कविता के बहाने भगवत रावत दिल्ली के खुले और छिपे व्यक्तित्व में प्रखर खेाजकर्ता की भाँति धंसे हैं। दिल्ली के मौजूदा रूपाकार से सीधे-सीधे टकराए हैं भगवत रावत। यह कविता उस साधक मनोदशा का विस्फोट है, जब किसी परिपक्व दृष्टिसम्पन्न कवि को अपने जटिल से जटिल विषय के एक एक सत्य के प्रति रत्ती भर भी संदेह नहीं रह जाता। और ऐसी आवेशित मनोदशा में कवि विषय के घातक-विषैले सत्य का उद्घाटन फक्कड़ाना आत्मविश्वास के साथ करता है। यह कविता दिल्ली की पारदर्शी आलोचना के साथ-साथ दिल्ली से सावधान रहने की भी कविता है। आज दिल्ली मात्र एक राजधानी नहीं, स्वार्थपरता, मौकापरस्ती, दंभ और आत्ममुग्धता की विकट संस्कृति है। एक ऐसा असहज चेहरा, जिसकी मुस्कान पर शत-प्रतिशत यकीन किया ही नहीं जा सकता। आत्मीयता का मायाजाल रचती है यह राजधानी। कविता पर्याप्त लम्बी है, किन्तु अर्थपूर्ण गद्य की लय कुछ इस कदर आकर्षक कि एक साँस में पढ़ लिए जाने की योग्यता हासिल करती हुई। ध्वनित मर्म, दूरगामी व्यंजना, बहुमुखी लक्ष्य और पैंतरा बदलते अर्थों की कसौटी पर यह कविता समकालीन कविता की उपलब्धि कही जा सकती है। खुद भगवत रावत की माने तो दिल्ली एक प्रकार की मानसिकता है। जे. अल्फ्रेड प्रूफ्राकसे एक बातचीतशीर्षक कविता का धुरी व्यक्तित्व प्रूफ्राक साम्राज्यवादी संस्कृति का समर्थक है । उसके रोम-रोम से तानाशाही आतंक की बू उड़ती है। जमीनी भारतीयता को हर कीमत पर बचाने की जिद इस कविता की मूल ताकत बनकर उभरी है। अपने ठेठ देसीपन से आत्मवत् अभिन्न्ा रहने का संकल्प इस कविता को असाधारण महत्व का सिद्ध करता है। इन दोनों लम्बी कविताओं के समानान्तर एक तीसरी प्रदीर्घ कविता है - देश एक राग है।’ ‘देशबनाम राष्ट्रकी अनुभूतिपरक, मार्मिक व्याख्या करती यह कविता देश के प्रति आकंठ अनुराग का स्वर बुलंद करती है। देशऔर राष्ट्रदो मानसिकता के प्रतीक हैं। देशस्वाभाविक शब्द है। नयानाभिराम आकाश, ताल-तलैया, पोखर, नदियाँ और धरती की दीवानगी में उछलते हुए समुद्र और इंच-दर-इंच दीवार बनकर खड़ा क्षितिज देश है। गेहूँ भी देश है, दूध भी देश है और माटी की ममता पाकर उगा हुआ एक-एक अन्न भारत देश है। देश तो वह अथाह एहसास है कल्पना पर राज करने वाली वह असीम मनोभूमि है, जिसको वाणी से, शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता। सŸाा ने हमारे ऊपर राष्ट्रशब्द थोप दिया है, वरना कौन पसन्द करता है देश की जगह राष्ट्रकहना। देश कहते ही गहराईयों से भावनाओं की तरंगें बेलगाम उठने लगती हैं, जबकि राष्ट्रअंग-अंग में सख्त चेतावनी भर देता है। भगवत रावत ने सच्चे देश अनुरागी की तरह दोनों शब्दों के गूढ़ भावों को परत-दर-परत खोलकर फैला दिया है। क्यों न कुछ पंक्तियाँमें डुबकी लगा दी जाय -
आज भी बड़े-बड़े शहरों से मेहनत-मजदूरी करके जब
अपने-अपने घर-गाँव लौटते हैं लोग तो एक दूसरे से
यही कहते हैं कि वे अपने देस जा रहे हैं
वे अपने पशुओं-पक्षियों, खेतों-खलिहानों
नदियों-तालाबों, कुओं-बावड़ियों, पहाड़ों-जंगलों
मैदानों-रेगिस्तानों,
बोली-बानियों, पहनावों-पोशाकों, खान-पान
रीति-रिवाज और नाच-गानों से इतना प्यार करते हैं।
(देश एक राग है ; पृ. सं. 11)

समकालीन कविता के भगवत रावत:
समकालीन हिन्दी कविता चालीस की उम्र पार कर चुकी है। आधुनिक हिन्दी कविता में सबसे लम्बी उम्र जीने वाली। सैकड़ों कवि उभरे हैं इस धारा में। धूमिल, कुमार विकल, विजेन्द्र, नरेश सक्सेना, विष्णु खरे, ऋतुराज, अरुण कमल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, कात्यायनी, आलोकधन्वा, उदय प्रकाश, ज्ञानेन्द्रपति, अष्टभुजा शुक्ल जैसे अनेक स्वर, अनेक रंग, अनेक मोड़, अनेक क्षितिज, अनेक अध्याय चमकते दिखते हैं। भगवत रावत भी इन्हीं में से एक स्तम्भ, एक वृक्ष, एक राह, एक अध्याय। सवाल है कि इस भावमूर्ति को कहाँ प्रतिष्ठित किया जाय ? किसके साथ स्थापित कर दिया जाय ? चालीस पार की उम्र वाली इस धारा के यदि एक शिखर धूमिल है तो दूसरे शिखर भगवत रावत। धूमिल ने अपने अल्प जीवन काल में आगधर्मी कविताओं से माहौल में चेतना की चिंगारियाँ भर दीं। व्यक्ति से, चरित्र से, व्यवस्था से बगावत और विद्रोह की भाषा में टकरा जाने वाली धूमिल की कविताएँ समकालीन कविता का साँचा गढ़ती हैं । भगवत रावत ने ऐसे किसी नये साँचे में समकालीन कविता को नहीं ढाला, मगर................., उन्होंने आज के और आने वाले कल के शिक्षित, प्रबुद्ध, प्रतिबद्ध और साहित्यप्रेमी पाठकों के लिए कविता का विस्तृत मैदान जरूर सौंपा। जहाँ आम पाठक दौड़ सकता है, घण्टों विचरण कर सकता है, अपने स्वास्थ्य के लिए मन लगाकर व्यायाम कर सकता है। भगवत की कविताए फेफड़ों की साँसें हैं जो आती हैं तो पता नहीं चलता, किन्तु निकलती हैं तो तकलीफ होती है। लगभग पचास वर्षों की उनकी काव्य यात्रा समकालीन कविता की उम्र का रूपक रचती है। समुद्र के बारे में’, ‘दी हुई दुनिया’, हुआ कुछ इस तरह, सुनो हिरामन, अथ रूपकुमार कथा, सच पूछो तो, ऐसी कैसी नींद, ‘देश एक राग हैइनमें से कोई संग्रह उठा लीजिए, कोई कविता छू दीजिए। लगभग सबमें एक राग, एक मर्म, एक मौलिक तथ्य और अर्थ की ताजगी दिखेगी। और इन सबमें जो सबसे खास है वह उद्दाम भावुकता की अटूट अन्तर्धारा। भगवत रावत शब्द के नहीं, शिल्प के नहीं, कला के नहीं, चमत्कार के नहीं, बल्कि अर्थ के, दृष्टि के, भाव के, रस के, और अनुभूति के कवि हैं। सहजता के दुर्लभ शिल्पकार हैं। हृदयस्पर्शी सहजता और अपना बना लेने वाली भावप्रवणता लबालब भरी हुई है भगवत रावत की कविताओं में। उनकी कविताएँ आलोचकों के लिए नहीं हैं, खेमेबाज कवियों के लिए नहीं हैं, न ही सिर्फ हिन्दी साहित्य के लिए हैं, बल्कि उनकी कविताओं का पहला और अन्तिम लक्ष्य पाठक है, जीता-जागता, रोता-हँसता, जी-जीकर मरता, लड़ता, हारता, संघर्ष करता हुआ पाठक। वह पाठक जो साहित्य के गौरव की रक्षा करता है, जो कविता को अपने संस्कार के विस्तार का मूलभूत तत्व मानता है। ऐसे देशज पाठकों के शिल्पी हैं भगवत रावत। युगान्तकारी मोड़ लाने की शर्त पर ही जिन्हें किसी कवि को श्रेष्ठ सिद्ध करने की आदत पड़ चुकी हो, उन्हें भगवत रावत निराश ही करेंगे। किन्तु जो भगवत रावत में, आलोचकों से चार कदम आगे आम पाठकों तक पहुँचने की कूबत का असाधारण मूल्य समझना चाहेगा, उसे निश्चय ही भगवत रावत समकालीन कविता के प्रतिमान नजर आएंगे। पुनः कहना जरूरी है कि आलोचकों के प्रतिमान कवि नहीं आम पाठकों के प्रतिमान कवि हैं भगवत रावत। सुनिए इन पंक्तियों की ध्वनियाँ और निकालिए निष्कर्ष भगवत रावत के बारे में -
मैं तो सारी की सारी माँओं का बेटा होना चाहता था
सारी की सारी बेटियों का पिता होना चाहता था
सारी की सारी भाषाओं में
बोलना-बतियाना चाहता था
ताल और लय के सारे के सारे वाद्यों की धुन पर
थिरकना-नाचना चाहता था।
(‘हलफनामा’: देश एक राग है)





-भरत प्रसाद
सहायक प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
नेहू, शिलांग, मेघालय
मो. 9863076138