औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Sunday, 28 August 2016

गणेश गनी की कविताएँ

हिमाचल की वादियों से आने वाले युवा कवि गणेश गनी की कविताओं के विषय में यह कहना गलत नही होगा कि वह एक सुलझे हुए कवि मन के कवि हैं। वह अपनी कविताओं में भावभाषा के टेढ़े मेढ़े रास्तों के बजाय सीधी सरल व् स्वाभाविक राह बनाते हुए नज़र आते हैं। उनकी कविताओं के बिम्ब उलझे हुए नही लगते वे सीधे सीधे अपनी प्रकृति व परिवेश से उठाते हैं, लेकिन पूरी सावधानी और नवीनता के साथ। उनकी कविता में आपको पहाड़ और पहाड़ी पगडंडियां अक्सर दिख जायेंगीं। भाषा के स्तर पर भी वह काव्यनिकषों पर खरे उतरते हैं। अपनी कविताओं को उन्होंने यथासंभव दुरूह होने से बचाया है जिससे वे आसानी से पाठक तक संप्रेषित हो जातीं हैं। ये कवितायेँ पाठक को दोनों भाव तथा विचार के स्तर पर छूती हैं। ‘स्पर्श’ पर इस हफ्ते पेश हैं उनकी कुछ नयी कविताएँ :


गूगल पर खोजबीन

कई दिनों से
बच्चों ने चन्दा मामा नहीँ कहा 
पिता कविता सुनाना भूल गए 
और माँ लोरी गाना ।
कई दिनों से 
देवता के प्रवक्ता ने 
कोई घोषणा नहीँ की 
लोग डरना भूल गए 
और गूगल पर खोजबीन बढ़ गई ।
कई दिनों से 
बहुरूपिया इधर से नहीँ गुजरा 
भूल गए दोस्त 
मुखौटों की पड़ताल करना ।
कई दिनों से 
काली और सफेद टोपी वाले बेचैन हैं
धरना बन गए प्रार्थना सभाएं 
और नारे प्रार्थनाएँ लगने लगी हैं ।
कई दिनों से 
पुजारी परेशान है 
मंदिर के चौखट पर कोई मेमना नहीँ रोया
शहद चोरी होने पर भी 
मधुमक्खी ने नहीँ की आत्महत्या ।
कई दिनों से 
सपनें आते हैं मगर
बाढ़ और भूकम्प की खबर के साथ
जन्म और मृत्यु का डंका बजाते हुए 
जागते रहो की बुलंद बांग के साथ ।
कई दिनों से 
यह भी हो रहा है कि 
बादलों के मश्क छलछला रहे हैं 
बीज पेड़ बनने का सपना देख रहा है 
कोयल से रही है अंडे 
अपने ही घोंसले में 
कई दिनों से 
एक कवि जाग रहा है रातों में ।


मैं याद करना चाहता हूँ

याद करना चाहता हूँ 
उन अँधेरी रातों को जब छत पर सोते बेसुध
और टिमटिमाता तारा सुनाता परी कथा 
याद करना चाहता हूँ 
उन पगडंडियों की महक को
जब भेड़ें लादे पीठ पर अपनी
नमक और कणक लाती 
याद करना चाहता हूँ 
जब माँ सूरज देख 
समय बताया करती
मैं याद करना चाहता हूँ 
उन सुनहरे सवेरों को 
जब काम पर केवल
पुहाल निकलते थे
या फिर किसान 
याद करना चाहता हूँ 
उन सांवली शामों को भी
जब हर आदमी 
शाम ढलने से पहले घर लौट आता 
याद करना चाहता हूँ 
उन बच्चों को जी भर
जो पाठशाला गए बगैर भी
ज्यादा सभ्य लगते
याद करना चाहता हूँ 
उस अजीब लड़की को 
जो मुझे कभी पसंद न करती 
याद करना चाहता हूँ 
उस जंगल को जिसका मृत पेड़ 
मेरे घर को सुरक्षा देता 
याद करना चाहता हूँ 
कि कुछ बातें कतई न भूलूँ 
मसलन खेतों में टहलना 
पौधों को रोज पानी पिलाना 
नदी को बहलाना
पहाड़ के कंधे चढ़ 
गाँव की शाम को निहारना
बर्फ पर डक बैक पहन दबे पाँव चलना 
झूला पुल लाँघ चनाब के उस पार 
अखरोट और थांगी के जंगल में उतरना 
और अगर ये सब नहीँ भी रहा याद
तो कम से कम न भूलूं कविता लिखना ।


आप समझते हैं

आप समझते हैं
कि लालकिले के परकोटे से 
अपने सम्बोधन में 
मात्र मित्रों कहने भर से 
सदभावना का हो जाता है संचार 
सम्पूर्ण पृथ्वी पर ।
आपके तेज तेज चलने से ही
देश का विकास रफ़्तार पकड़ लेता है !
आप समझते हैं 
कि जहाज के दरवाजे पर खड़े हो कर
दाहिना हाथ ऊपर उठाकर 
जोर जोर से हिलाने भर से 
दरिद्रता के बादल छंट जाते हैं ।
सरकारी रेडियो स्टेशन से
आपके मन की बात कर देती है
सबके मन का बोझ हल्का !
आप जानते हैं यह भी 
कि जनता सब जानती है
दिल्ली के तख़्त का 
शहंशाह नहीं चौकीदार बनाकर 
जनता ने आपका सपना पूरा किया है 
आप याद नहीं करना चाहते 
543
आदर्श गांव बनाने का वादा ।
आपको मालूम है
अच्छे दिन आएँगे 
ऐसा सौ बार कहने मात्र से 
लोग मान लेंगे सच !
आपको मालूम है 
कि जीभ ही तो है यह 
इससे स्नेह का शहद टपका लो 
चाहे प्रत्यंचा बना कर 
जहर बुझे बाण बरसा लो ।


रिक्त स्थान

कितनी आसानी से 
भर देते हैं रिक्त स्थान बच्चे 
चुनकर सही विकल्प ।
हम कितनी ही बार 
चुनते हैं गलत विकल्प 
और भर देते हैं 
जीवन में रिक्त स्थानों को 
जो फिर खाली हो जाते हैं 
फिर भरे जाते हैं 
फिर खाली हो जाते हैं 
और हम फिर भरते हैं ।
विडम्बना यह भी है कि
सही सही भरे गए रिक्त स्थान भी 
हमारी ही गलतियों से 
अक्सर हो जाते हैं खाली ।
और फिर त्रासदी देखो कि
हम ही गलत विकल्प चुन लेते हैं 
उन रिक्तियों को भरने के लिए ।
अगर जीवन पाठशाला है अनुभवों की 
तो अब आप ही बताएं कि
कैसे चुन पाते हैं बच्चे 
रिक्त स्थानों के लिए सही विकल्प ।
                  

- गणेश गनी
कुल्लू में एक छोटे से निजी स्कूल का संचालन.
मूल रूप में पांगी घाटी से सम्बद्ध.
कविता वसुधा, बया, सदानीरा, आकंठ, सेतु, अकार, हिमतरुविपाशा आदि में प्रकाशित.

Monday, 22 August 2016

सुशांत सुप्रिय की कविताएँ



1. एक जलता हुआ दृश्य
                       
वह एक जलता हुआ दृश्य था
वह मध्य-काल था या 1947
1984 था या 1992
या वह 2002 था
यह ठीक से पता नहीं चलता था
शायद वह प्रागैतिहासिक काल से
अब तक के सभी
जलते हुए दृश्यों का निचोड़ था

उस दृश्य के भीतर
हर भाषा में निरीह लोगों की चीख़ें थीं
हर बोली में अभागे बच्चों का रुदन था
हर लिपि में बिलखती स्त्रियों की
असहाय प्रार्थनाएँ थीं
कुल मिला कर वहाँ
किसी नाज़ी यातना-शिविर की
यंत्रणा में ऐंठता हुआ
सहस्राब्दियों लम्बा हाहाकार था

उस जलते हुए दृश्य के बाहर
प्रगति के विराट् भ्रम का
चौंधिया देने वाला उजाला था
जहाँ गगनचुम्बी इमारतें थीं , वायु-यान थे
मेट्रो रेल-गाड़ियाँ थीं , शॉपिंग-माल्स थे
और सेंसेक्स की भारी उछाल थी

किंतु जलते हुए दृश्य के भीतर
शोषितों के जले हुए डैने थे
वंचितों के झुलसे हुए सपने थे
गुर्राते हुए जबड़ों में हड्डियाँ थीं
डर कर भागते हुए मसीहा थे

हर युग में टूटते हुए सितारों ने
अपने रुआँसे उजाले में
उस जलते हुए दृश्य को देखा था

असल में वह कोई जलता हुआ दृश्य नहीं था
असल में वह मानव-सभ्यता का
घुप्प अंधकार था

2. 'जो काल्पनिक नहीं है' की कथा
                      
किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं थी
कथा में मेमनों की खाल में भेड़िये थे
उपदेशकों के चोलों में अपराधी थे
दिखाई देने के पीछे छिपी
उनकी काली मुस्कराहटें थीं
सुनाई देने से दूर
उनकी बदबूदार गुर्राहटें थीं

इसके बाद जो कथा थी , वह असल में केवल व्यथा थी
इस में दुर्दांत हत्यारे थे , मुखौटे थे
छल-कपट था और पीड़ित बेचारे थे
जालसाज़ियाँ थीं , मक्कारियाँ थीं
दोगलापन था , अत्याचार था
और अपराध करके साफ़
बच निकलने का सफल जुगाड़ था

इसके बाद कुछ निंदा-प्रस्ताव थे ,
मानव-श्रृंखलाएँ थीं , मौन-व्रत था
और मोमबत्तियाँ जला कर
किए गए विरोध-प्रदर्शन थे
लेकिन यह सब बेहद श्लथ था

कहानी के कथानक से
मूल्य और आदर्श ग़ायब थे
कहीं-कहीं विस्मय-बोधक चिह्न
और बाक़ी जगहों पर
अनगिनत प्रश्न-वाचक चिह्न थे
पात्र थे जिनके चेहरे ग़ायब थे
पोशाकें थीं जो असलियत को छिपाती थीं

यह जो ' काल्पनिक कहानी नहीं थी '
इसके अंत में
सब कुछ ठीक हो जाने का
एक विराट् भ्रम था
यही इस समूची कथा को
वह निरर्थक अर्थ देता था
जो इस युग का अपार श्रम था

कथा में एक भ्रष्ट से समय की
भयावह गूँज थी
जो इसे समकालीन बनाती थी

जो भी इस डरावनी गूँज को सुनकर
अपने कान बंद करने की कोशिश करता था
वही पत्थर बन जाता था ...

3. माँ

इस धरती पर
अपने शहर में मैं
एक उपेक्षित उपन्यास के बीच में
एक छोटे-से शब्द-सा आया

वह उपन्यास
एक ऊँचा पहाड़ था
मैं जिसकी तलहटी में बसा
एक छोटा-सा गाँव था

वह उपन्यास
एक लम्बी नदी था
मैं जिसके बीच में स्थित
एक सिमटा हुआ द्वीप था

वह उपन्यास
पूजा के समय बजता हुआ
एक ओजस्वी शंख था
मैं जिसकी गूँजती ध्वनि-तरंग का
हज़ारवाँ हिस्सा था

वह उपन्यास
एक रोशन सितारा था
मैं जिसकी कक्षा में घूमता हुआ
एक नन्हा-सा ग्रह था

हालाँकि वह उपन्यास
विधाता की लेखनी से उपजी
एक सशक्त रचना थी
आलोचकों ने उसे
कभी नहीं सराहा
जीवन के इतिहास में
उसका उल्लेख तक नहीं हुआ

आख़िर क्या वजह है कि
हम और आप
जिन उपन्यासों के
शब्द बन कर
इस धरती पर आए
उन उपन्यासों को
कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला ?

4. थोड़ा साथ, थोड़ा हट कर

ओ प्रिये
अपनी निजता में भी
मैं होता हूँ
तुम्हारे थोड़ा साथ
और थोड़ा तुमसे हट कर

जैसे ढलते सूरज की इस वेला में
खड़ी है मेरी परछाईं
थोड़ी मेरे साथ
और थोड़ी मुझसे हट कर

जैसे अपनी आकाशगंगा में
है हमारी पृथ्वी
थोड़ी अपने सूर्य के साथ
और थोड़ी उससे हट कर

हाँ प्रिये
कभी-कभी
मैं होता हूँ तुम्हारे थोड़ा साथ
और थोड़ा तुमसे हट कर
जैसे स्वर्ग से निष्कासन
के बाद आदम था
थोड़ा हव्वा के साथ
और थोड़ा उससे हट कर

5. स्टिल-बॉर्न बेबी
                      
वह जैसे
रात के आईने में
हल्का-सा चमक कर
हमेशा के लिए बुझ गया
एक जुगनू थी

वह जैसे
सूरज के चेहरे से
लिपटी हुई
धुँध थी

वह जैसे
उँगलियों के बीच में से
फिसल कर झरती हुई रेत थी

वह जैसे
सितारों को थामने वाली
आकाश-गंगा थी

वह जैसे
ख़ज़ाने से लदा हुआ
एक डूब गया
समुद्री-जहाज़ थी
जिसकी चाहत में
समुद्री-डाकू
पागल हो जाते थे

वह जैसे
कीचड़ में मुरझा गया
अधखिला नीला कमल थी ...

--
सुशांत सुप्रिय, A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद - 201014
मो : 8512070086
ईमेल : sushant1968@gmail.com