औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Monday, 1 August 2016

व्यंग्य में ज्ञान : स्पर्श विशेष

2 अगस्त...हमारे समय के महान व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी का 64वाँ जन्मदिन....और जैसा कि हमने अपने पाठकों को सूचित किया था कि इस अवसर पर हम अपने इस प्रिय लेखक को उनके जन्मदिवस की खूब ढेर सारी बधाई और असंख्य शुभकामनाएँ देते हुए वलेस (व्यंग्य लेखक समिति) और स्पर्श पर कर रहे हैं व्यंग्य में ज्ञान’ नामक दो दिवसीय यह आत्मीय रचनात्मक आयोजन | ज्ञान जी का लेखन एक प्रतिबद्ध, ईमानदार और प्रयोगशील व्यंग्य लेखन का आदर्श उदाहरण है | उनकी सृजनयात्रा इतनी विशाल और समग्र रचनाशीलता इतनी पठनीय और सरल-सहज है कि किसी भी पाठक के लिए उससे गुज़रना एक नए रचनात्मक अनुभव को पाना है | इनके विविधतापूर्ण व्यंग्य विषय व्यवस्था की विसंगतियों की गहरी पड़ताल भी करते हैं और इनके उपन्यासों के पात्र जरुरत पड़ने पर कठिन समय के खिलाफ मजबूत तरीके से मुठभेड़ भी करना जानते हैं | एक सघन और अपेक्षाकृत करुण व्यंग्य इनके व्यंग्यों की निहित विशेषता कही जा सकती है | नयी पीढ़ी के लिए अपने लेखन से वह एक ऐसा प्रतिमान स्थापित करते हैं जो वास्तव में एक बड़े लेखन की कालजयी लकीर की तरह बगैर किसी शोर के अपने समकालीनों के समक्ष मुस्कुराता हुआ विनम्र चुनौती पेश करता है इसके अलावा ज्ञान जी जैसे लेखक को अब किसी औपचारिक परिचय की जरुरत है, ऐसा मुझे नहीं लगता  इसलिए इस क्रम में बगैर किसी अतिरिक्त हस्तक्षेप के सीधे-सीधे हम युवा कथाकार एवं आलोचक प्रज्ञा रोहिणी का ज्ञान जी के पहले उपन्यास 'नरक-यात्रा' पर केन्द्रित यह आलोचनात्मक आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं -



गिद्ध, अस्पताल और कनछेदी : नरक-यात्रा


जब रचनाकार वह भी व्यंग्यकार, स्वर्ग-नर्क की कर्मफलवादी अवधारणाओं की बात करता है तब क्या वह यथास्थितिवादी रूढ़ मान्यताओं को सच मानता है? अथवा वह इन मान्यताओं की आड़ में चल रहे पाखंड और आडम्बरों का विरोध करता है। वास्तव में वह धर्म, सत्ता और उनसे नाभिनालबद्ध व्यवस्थाओें के शीशे के कवच को पत्थर मारकर चूर-चूर कर रहा होता है। ये शीशा वास्तव में इन व्यवस्थाओं का कवच भी है और दुनिया को देखने की पारदर्शी दीवार भी। जिसके पार हम देख तो सकते हैं पर बदल कुछ नहीं सकते। व्यंग्यकार शीशे के पार के द्विआयामी चित्र को तोड़कर, आपके आस-पास का दहकता, बजबजाता और गंधाता संसार दिखा देता है। इस संसार को चलाने वाली ताकतें, शोषण, अन्याय और असमानता की हर व्यवस्था अथवा व्यक्ति के लिए एक नकाब निर्मित कर देती हैं ताकि देखने वाला असली चेहरा न देख सकें। ये ताकतें इन नकाबों को बचाए रखने के लिए तमाम तरह के आदर्शों, सिद्धांतों और मूल्यों के रंग भी तैयार करती हैं जिससे आम आदमी उनके असली चेहरों को पहचान न सके। अब तक की हमारी जो सोच बनी है उसके अनुसार चिकित्सा का पेशा आदर्शों, सिद्धांतों, परोपकार, संवेदनशीलता, सहानुभूति, परदुःखकातरता, निस्वार्थ सेवा, यानी कुलमिलाकर मनुष्य की कल्पना का जो भी, सर्वाेत्तम मानवीय भाव हो सकता है वह इस पेशे के साथ जोड़ दिया जाता है। ये उच्च विचार हमेशा हर उस आम, गरीब मरीज़ के ज़ेहन में तैर रहे होते हैं जब वह अस्पताल के भीतर जा रहा होता है। और जब एक बार वह भीतर चला जाता है तो एक अदृश्य स्कैनर इन सभी उच्च विचारों को निकालकर कोने में पहले से लगे ढ़ेर पर सरका देता है। स्वागत है आपका, ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास नरक-यात्रामें। ये बात मैं पहले ही कह दूं कि इस उपन्यास के भीतर जाने से पहले आप भी इन तमाम उच्च विचारोंको झाड़ दीजिए और साफ कीजिए आंखों पर लगी ऐनक को, जो बहुत रंगीन है क्योंकि रंग हटेंगे तभी कुछ साफ दिखाई देगा। जिसे देखना निहायत ज़रूरी है।

             नरक में एक दिन

            ‘नरक- यात्राउपन्यास का समय एक पूरा दिन है। इस दिन की सुबह भी कोई उजली किरणों की वाली, शबनमी ओस की चादर ताने, मधुर हवा के झोंके सरीखी, सरसराते पेड़ों की पंक्ति और उस पर कूकती कोयल की आवाज़ वाली सुबह नहीं है। या कहें कि शमशेर कीउषाकविता की, ‘प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे’- रंग और रेखाओं की अनेक मोहक छवियां लिए कोई रोमेंटिक सुबह नहीं। ज्ञान चतुर्वेदी इस उपन्यास में प्रवेश करने से पहले जिस भोर को पाठकों को सौंपते हैं वह भोर एक बीमार भोरहै। उसका सूरज पका हुआ लाल फोड़ाहै, धूप कोई गाढ़ा मवाद’, हवा मानो कृत्रिम श्वास’, पेड़ जैसे बड़े डाॅक्टर की गलत डायग्नोसिस पर सिर हिलाते जूनियर डाॅक्टर। भोर का गान नहीं ये सुबह कराह रही है। ये बीमार भोरन सिर्फ उपन्यास की प्रवेशिका है बल्कि यही वह चाबी है जिससे नरक-यात्राके रहस्य की परतें खुलती दिखाई देती हैं। यथार्थ बहुत पारदर्शी रूप में दिखाई दे जाता है। दुनिया में भोर के आशावादी बिम्ब जो पैरों पर खड़े दिखाई देते हैं वह अस्पताल की भोर के जरिए सिर के बल खड़े दिखाई देने लगते हैं। कुल मिलाकर पाठक नरक-यात्रा के लिए अपना दिल कड़ा कर लेता है। यों भी लेखक हृदय-रोग विशेषज्ञ हैं इसलिए पाठकों के दिल को वज़नी झटका देने के लिए पहले से सचेत कर देना उन्हें ज़रूरी लगा होगा। 
            कहने को ये उपन्यास एक दिन की कहानी है पर लगता है जैसे कितनी शताब्दियों का सच इसमें झांक रहा है। यहाँ प्रेमचंद का लेख महाजनी सभ्यतायाद आए बिना नहीं रह सकता जिसमें प्रेमचंद इस सभ्यता के मूल-मंत्र बताते हुए जब टाइम इज़ मनीको समझाते हैं तो उन्हें वह डाॅक्टर याद आता है जो मरीज की नब्ज़ और मिलने वाले धन को साथ-साथ देख पाने की क्षमता से लैस है। उस ज़माने के सच को इस सच के साथ घुलाने में कहीं कोई दिक्कत नहीं आती ।  खासियत यही है कि उपन्यास का सच बेहद बारीकी से, सूक्ष्म से सूक्ष्म ब्यौरों के साथ इस पेशे के अनगिनत सचों को बेबाकी से व्यक्त कर देता है।

अस्पताल है या मुर्दाघर?

नरक- यात्राउपन्यास एक मुर्दे की कहानी से शुरू होता है। जीवन की दुश्वारियों में आत्महत्या कर बैठे इंसान की लाश को मिट्टी भी नसीब नहीं हो पाती। अस्पताल कहता है कि पोस्टमार्टम किया जाना अनिवार्य है, व्यवस्था कहती है कि रिश्वत खिलाना अनिवार्य है और मृतक के परिजन हैं जिनके पास पैसा नहीं, लाश है जिसकी नियति सड़ना है। सिपाही बलभद्दर रिश्वत का तंत्र समझाता है। दो हज़ार में सबका हिस्सा निर्धारित है। विडम्बना यह है कि चीरघर में किए जाने वाले पोस्टमार्टम में आत्महत्या को आत्महत्या ही साबित करना है और इसके लिए निर्धारित घूस के नियमों की उपेक्षा करने से यह मामला हत्या का बनाया जा सकता है। ऐसा होने से मृतक के घर के शेष जीवित लोगों का जीवन भर के लिए पांच लाख की जेल’1 निश्चित है। यानी जीते-जी सबकी मौत या फिर मृतक के घर भर की सामूहिक आत्महत्या की रूपरेखा तैयार की जाती है।
            उदारता जैसे शब्द यहां बेमानी हैं। दो हजार में तीन सौ रूपये कम होने पर बलभद्दर मृतक के भाई को तमाचा रसीद करते हुए समझा देता है कि गरीबी का विज्ञापन करने का यहां कोई फायदा नहीं। दाम नहीं तो काम नहीं। समय बढ़ने के साथ मुर्दा सड़ने को होता है इस पर भी सिपाही पूरी निर्ममता से उत्तर देता है-‘‘जलाना ही तो है मुर्दे को या सड़े मुर्दे को’’। अस्पताल में गरीब भरे पड़े हैं और इन्हें ठिकाने पर लाने का सीधा रास्ता है कि इनकी गरीबी की कतई परवाह न की जाए।  इलाज को तरसता कनछेदी भी मौत के पाले में बेरहमी से धकेला जाता है और नेता का भेजा बीमार हकीम सारी सेवाएं मुस्तैदी से पाता है। ( ये अलग बात है कि सारी मुस्तैदियों के बावजूद तकलीफ उसकी भी खत्म नहीं होती।) हकीम के कंट्रास्ट में कनछेदी की पीड़ा और उभरकर आती है। एक इलाज की राह खोजते-खोजते मारा जाता है वहां दूसरा मर्ज और इलाज के अनगिनत कयास लगाते चिकित्सकों से घिरा रहता है। उपन्यास के अंत में दो लाशें रिक्शे पर ठेल दी जाती हैं-पोस्टमार्टम वाले आदमी की और कनछेदी की। पर ये लाशें दो लोगों की होते हुए भी रोज़ मर रहे अनगिनत गुमनाम लोगों की लाशों में तब्दील हाने लगती हैं।
    उपन्यासकार ने अनेक स्थलों पर अस्पताल के वार्डबाॅय से डाॅक्टर तक सबके मन को हर तरह की दया, मोह-ममता से बेहद दूर दिखाया है क्योंकि यही वह मकड़जाल हैं जिनमें फंसकर कमाने की सभी कोशिशें नाकाम हो सकती हैं। अतः इनका जितना धन चूसा जा सकता है अंतिम बूंद तक पूरे मजे से चूसा जाए। यहां आए हर आदमी के साथ इसी समतावादी दृष्टि से काम लिया जाता है। माल खाने से लेकर मलाई खाने तक भी, गाली-गलौज से लेकर जूतम-पैजार तक भी सभी नुस्खे अपनाए जाते हैं।
            अस्पताल का चीरघर भी एक प्रतीक है। पूरे उपन्यास में जो मुर्दे के पोस्टमार्टम तक महदूद नहीं बल्कि अपनी पूरी निर्मम प्रक्रिया में वह जीवित की खाल उधेड़ता है और उसका रक्त चूसकर उसे भी मृतप्राय कर देता है। दरअसल यहां मुर्दे, बीमार और उनके रिश्तेदार सभी मृतकों की श्रेणी में ही आते हैं और जीवित मनुष्यों की भयानक त्रासदी सरीखा यह अस्पताल उनकी उम्मीदों, आशाओं की मुकम्मल कब्रगाह बन जाता है। इसीलिए डाॅ. चैबे इसे सल्तनत का फांसीघरया कालकोठरीजैसा मानते हैं। अस्पताल के भीतर ये कालकोठरी है और बाहरी दीवारों पर लाशों की प्रतीक्षा में बैठे गिद्ध हैं। मौत की कब्ज़ेदारी हर जगह है।

महान चिकित्सकों की महागाथाएं

            उपन्यास एक दिन की कथा के भीतर अनेक दृश्य रचकर अस्पताल के जीवित ईश्वरों का वर्णन रोचक शैली में करता है। इस शैली का वैशिष्ट्य यह है कि एक तो यह पात्रों की भंगिमा को अचूक तरीके से प्रस्तुत करती है तो दूसरी ओर व्यंग्य की बारीक काट से यह जता देती है कि जैसे आम आदमी के लिए ईश्वर तक पहुंच पाना असंभव है वैसे ही इन चिकित्सकों की थाह पाना और वास्तव में इन तक पहुँच पाना भी असंभव है। संवाद और भंगिमाओं में पर्याप्त नाटकीयता है।
            उपन्यास में डा. अग्रवाल, डा. शर्मा, डा. गुलाटी, डा. चौबे, डा. भागवत- दरअसल ये  चिकित्सक होते हुए भी विविध मानसिकताएं हैं जिन्होंने चिकित्सा को शुद्ध व्यवसाय में रूपांतरित कर दिया है। कोई विशिष्ट सर्जन है तो उसे सर्जरी ही नहीं आती। कोई प्राध्यापक है तो पढ़ाने का शऊर नहीं, कोई हर मर्ज का इलाज अपने पूर्वाग्रहों के चलते मलेरिया में खोजता है तो कोई किसी और प्रिय बीमारी में। मरीज की बीमारी कोई हो पर डाक्टर है कि अपने तय मानकों और पसंदीदा दवाओं से ही रोग का इलाज करता है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए हरिशंकर परसाई का प्रसिद्ध व्यंग्य- होना बीमार और लगना पेनिसिलिनयाद आए बिना नहीं रहता। हालांकि वहां दवा बिकवाने के बाज़ार तंत्र पर व्यंग्य है। परसाई के लेख में डाक्टर कहता है- ‘‘दबावों के अनुसार रोग होते हैं। उत्पादन के अन्य क्षेत्रों में जो नियम लागू होते हैं, वही यहां भी होते हैं। वस्तु का उत्पादन अधिक करके फिर उसकी आवश्यकता पैदा की जाती है और उसे बेचा जाता है। हमारे पास दवा बनानेवाले कारखानों के एजेंट आते रहते हैं।’’2 
            ‘नरक यात्राका आलम देखिए किसी डाक्टर के मरीज का तुरंत आपरेशन होना है तो वह आपरेशन से भयभीत मरीज को आपरेशन के नुकसान बताता हुआ धमकाता-डराता है। इन चिकित्सकों में अनुशासनों के वैशिष्ट्य और वैचारिक मतभेदों के बावजूद एक गहरा साम्य है कि सब अतिरिक्त आयके सिद्धांत पर और अतिव्यस्त निष्क्रियताके सिद्धांत पर बिल्कुल एक से हैं। सभी भिन्न मानसिकताएं नदियों सरीखी इन सिद्धांतों के सागर में समा जाती है। सभी में चापलूसी दोतरफा औज़ार की तरह सक्रिय है। अपने वरिष्ठ चिकित्सकों की चापलूसी करना और कनिष्ठों के चापलूस होने को सराहना। जूनियर डाक्टर और सर्जन अग्रवाल के ऐसे कई प्रसंग उपन्यास में हैं जहां बेखौफ हास्य सैटायर के रंग में घुलकर आयरनी को प्रगाढ़ कर देता है- ‘‘ क्यों भई आपको क्या लगता है कि ये केस है क्या?
              ‘‘सर, मुझे तो वह..जैसा आप कहें।’’
        ‘‘ये अंपैंडिसाइटिस तो नहीं लगता?’’
             ‘‘हां सर ये अपैंडिसाइटिस तो नहीं हैं।’’
            ‘‘वैसे राइट आयलियिक फोसा में दर्द तथा टेंडरनेस होने के कारण अपैंडिसाइटिस भी      हो सकता है।’’
      ‘‘हां सर अपैंडिसाइटिस भी हो सकता है।’’
            ‘‘ये केस किसने रेफर किया था?’’
            ‘‘जी डा. चौबे ने।’’
      ‘‘चौबे गधा है।’’
     ‘‘ जी सर’’
      ......
     ‘‘ वेरी गुड तुमने देखा था उसका लिवर?’’
     ‘‘ जी सर, मैंने तो नहीं देखा पर आप देख रहे थे , तब मैंने आपको देखते हुए देखा।’’
     ‘‘गुड ऐसे ही देखना चाहिए।’’
     ‘‘जी सर’’ 3
छोटे-छोटे चुस्त संवाद नाटकीयता से भरे हैं जिनमें चापलूसी का आलम ठसाठस समाया है। सारी असलियत से वाकिफ जूनियर डाॅक्टर की जुबान सिर्फ सहमत होती है क्योंकि उसकी गर्दन सीनियर की टांगों में फंसी है। इस तरह मानसिक रूप से अनुकरण को तत्पर ये जूनियर पीढ़ी -दर - पीढ़ी बेजुबान जी -हजूरी करने वाली फसल ही तैयार करते हैं।

 मर्ज़ -ए-लाइलाज

            उपन्यास में मरीज़ कई हैं पर इलाज नहीं है, वार्ड हैं पर आदमी सारा दिन भटकता है, चिकित्सक हैं पर चिकित्सा नहीं, विशेषज्ञता है पर बदले में मिलती है मौत, मर्ज़ कुछ है इलाज कुछ और। मुझे लगता है कि इस उपन्यास का यदि बड़ा रूपक देखा जाए तो यह केवल अस्पताल की चैहद्दी तक सीमित नहीं। हर इंसान बहुत कुछ सुनता है, बहुत कुछ भोगता है तब जाकर ये अनुभव उसे मिलता है। अनेक बार सुनी-सुनाई बातों से और अनेक बार खुद की आपबीती से वो अस्पताल का मज़ाचखता है इसलिए यदि ज्ञान चतुर्वेदी के इस उपन्यास को एक बीमार अस्पताल के तौर पर देखा जाए तो संभवतः यह आकलन अधूरा होगा। दरअसल अस्पताल इस पूरी व्यवस्था का विराट रूपक है जिसमें हम जीते हैं। जिसे हम भोगते हैं। व्यवस्था के प्रति हमारी आस्थाएं इतनी गहरी हैं कि हम अनेक बार उसके उस कुरूप चेहरे को नहीं देख पाते जोकि इस व्यवस्था को हमारे खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। सवाल यह भी है कि व्यवस्था कोई इकहरा शब्द नहीं है। व्यवस्था एक बहुस्तरीय, बहुआयामी संरचना है। व्यवस्था अनेकपर्ती है। इसलिए एक सरसरी निगाह में यह उपन्यास एक अस्पताल की बदहाली का दृश्य लगता है पर अस्पताल ही वो व्यवस्था है जिसमें हमारा समाज, हमारा राजनीतिक तंत्र, हमारी व्यवस्थापिका और न्याय -व्यवस्था शामिल है। तो ये बात जाहिर है कि जब व्यवस्था बहुआयामी, बहुस्तरीय और बहुपर्ती हो तो उसके शोषण, दमन, उत्पीड़न और यातना के स्तर, रूप और तरीके भी एक नहीं हो सकते। आज़ादी के साथ भारतीय जनता ने जो लगभग दो सौ साल की गुलामी से बीमार थी, उसने अपनी रोगमुक्ति का रास्ता संभवतः इसी व्यवस्था में देखा होगा। साल- दर- साल राजनीतिक सत्ताओं ने एक नये इलाज के साथ, एक नये अंदाजे के साथ, नयी दवाओं के साथ रोगमुक्ति का वादा किया। व्यवस्था द्वारा दी गई दवाएं और इलाज के तरीके कितने कामयाब हुए यह सभी जानते हैं। हालत यह है आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी देश की बहुसंख्या गरीबी- रेखा के नीचे है, बीमार है, बेरोज़गार है। देश में हो रहे भ्रष्टाचार और घोटालों की संख्या देश की जनसंख्या से कहीं अधिक बड़ी है। यह ठीक है कि देश के कुछ मर्ज़ व्यवस्था की रीतियों-नीतियों के प्लैसिबो इफैक्टके कारण ठीक हुए हैं पर सच्चाई यह भी है कि अस्पताल के कर्णधार डाक्टरों की तरह देश और व्यवस्था के कर्णधार भी देश के मर्ज़, इलाज और दवाओं को लेकर कयास ही लगा रहे हैं।

 ‘मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों -ज्यों दवा की

नरक -यात्राचूँकि अस्पताल की कथा है; इसलिए मरीज़ हैं, मरीज हैं तो डाक्टर हैं, डाक्टर हैं तो उनके सुपरिटेंडेंट हैं, सुपरिटेंडेंट हैं तो उनके चहेते नेता और तमाम जासूस भी हैं। कहने का आशय यह है कि पूरी हैरारकी या सत्ता-संतुलन एक के ऊपर एक टिका हुआ है। एक दूसरे को कंधा देता हुआ। एक- दूसरे पर टिका हुआ है। इस पूरे अस्पताल में सत्ता के संतुलन को बचाए और बनाए रखने का खेल चलता है। कथा में डाक्टरों की खेमाबंदी का बड़ा रसपूर्ण वर्णन है। एक खेमा है वर्तमान सुपरिटेंडेंट डा. कपूर का जो डा. अग्रवाल को अपने बाद कुर्सी सौंपना चाहता है ताकि उसके किए अपराध ढके रहें और अग्रवाल के रूप में उसका सिक्का रिटायर होने के बाद भी चलता रहे। पर अग्रवाल की भीरूता उसे डा गुलाटी के नज़दीक ले जाती है। गुलाटी-कपूर गठबंधन को कपूर क्षेत्रीयता के समीकरण पर भी खरा मानता है और उसकी जुझारू क्षमता के आधार पर अधिक ठोस भी। इधर दूसरा खेमा है डा. चैबे का जो हिंसक प्रवृत्ति वाले डा. पांडे को उस पद पर बैठते देखना चाहता है। खास बात यह भी कि उसके ऊपर नेता इंद्रमणि का वरदहस्त है। डा. अग्रवाल की चूक से एक मरीज के मरते ही बाज़ी पलट जाती है। नेता के गुंडे अग्रवाल के आपरेशन से मर गए नौजवान की लाश को कब्ज़े में लेकर अस्पताल को दंगे और आतंक की स्थली में बदल देते हैं। यह दंगा देश के किसी हिंसक दंगे से कम नहीं है जिसे नेता देशभक्ति से जोड़कर देश के नाम पर मांगा गया बलिदानऔर नौजवानों से भारत की तकदीर बनाने का आह्वान करता है। दंगे का निष्कर्ष कुछ यों निकाला जाता है-‘‘ नेता सबकी फजीहत करते हैं।’’ दूसरे ने कहा।
‘‘ लाश की’’ तीसरे ने कहा।
‘‘ज़िदा आदमी की,’’ चौथे ने कहा।
‘‘ देश की’’ एक ने कहा।’’ 4
कुर्सी और लड़ाई में कुर्सी का गुणधर्म है बार-बार गिराना और महत्त्वाकांक्षी जमात का गुणधर्म है गिर-गिरकर कुर्सी की ओर लपकने की सारी साजिशों में शामिल रहना।
            मेरा सवाल है क्या ऐसा आपको लगभग हर व्यवस्था में नहीं दिखाई देता? अस्पताल के जरिए देश के सत्ता समीकरणों के ग्राफ को पूरी तरह उपन्यासकार ने दिखाया है। जहां एक अयोग्य अपने उत्तराधिकारी के लिए एक सुयोग्य -अयोग्य की खोज करता है ताकि व्यवस्था का संतुलन न डिगे। ये सुयोग्य अयोग्यता इस व्यवस्था का सर्वाधिक संक्रामक जानलेवा और पीड़ादायक रोग है। पीढ़ी- दर- पीढ़ी यह सुयोग्य अयोग्यता चली आ रही है। इस व्यवस्था से उम्मीद लगाए मरीज़ और असहाय लोग पीड़ादायक मौत की ओर धकेले जा रहे हैं। नेता , सुपरिटेंडेंट और कुर्सी का यह प्रसंग उपन्यास में बहुत कुछ बयां करता है-‘‘ चलती कार से इंद्रमणिजी ने एक ही बात कही जो वे पहले भी कह चुके थे-‘‘मौका खोजो और टूट पड़ो। धैर्य से मौका देखो और राजा को मारो। पर धैर्य रखो। गिद्ध बनो।
            डा. चौबे, कुर्सी पर ऊंघते हुए यही सब सोच रहे थे। वे सोचते रहे और ऊंघते-ऊंघते सपना देखने लगे। सपने में उन्होंने देखा कि वे गिद्ध बन गए हैं। वे अस्पताल की रणनीति के आकाश में मंडरा रहे हैं। नीचे श्मशान के मैदान-सा अस्पताल है।...वे मंडराते हुए नीचे आए। वे सुपरिंटेंडेंट की कुर्सी पर मंडराते रहे।...कुर्सी पर झपट्टा मारने ही वाले थे कि उन्होंने देखा कि कुर्सी पर डा. अग्रवाल बैठे हैं और उनकी तरफ कुटिल मुस्कान से देख रहे हैं। पास ही डा. कपूर भी खड़े थे। यह देखकर उनका दिल धक्क हो गया कि वे दोनों भी गिद्ध बन चुके थे।’’ 5
            उपन्यास में रसोई से आती हुई सडंध, उसकी बदइंतजामी, उसकी दुर्दशा इस देश की खाद्य- व्यवस्था का चित्र है। हिंदुस्तान में खाद्यान्न के वितरण की जो व्यवस्था है दरअसल यह उसीका चित्र है। किसानों के देश और सोना उगलती धरती वाले देश की जनता भूखी है। गर खाना है भी तो इंसानों के खाने लायक नहीं। ‘‘रामलंगोटजी ने भुनभुनाते ने हुए ट्राली पर एक नजर डाली। सारी चीजें यथास्थान थीं। दाल की बाल्टियों में पानी था, सब्जी की बाल्टी में भी पानी था और दही की बाल्टी में भी पानी ही था। सभी बाल्टियों से अजीब-सी गंध आ रही थी।...रामलंगोटजी की लंगोट तथा बनियान की अपनी गंध तो खैर थी ही, साथ ही अस्पताल के बरामदों की गंध, आलू-बैंगन आदि के सड़ते छिलकों की गंध, भिनकते हुए झूठे बरतनों की गंध भी इन गंधों में मिल गई थी। इस प्रकार ट्राली पर दुर्गंध का हिमालय खड़ा हो गया था।’’ 6 एक तरफ उपन्यास पूरी वीभत्सता के साथ मरीजों के खाने के ब्यौरे पेश करता है तो दूसरी तरफ उपन्यासकार सड़े खाने को तंगहाल मरीजों से जोड़कर उस ऐतिहासिक बदबू का उल्लेख करता है जो देश की तंगहाल जनता के हिस्से में कबसे पड़ी है। आम जनता की ऐसी बेक़दरी और खास जनता पूरे उपन्यास में अंडो पर अंडे खा रही हैं। उन पर अंडों की बरसात का यह आलम है कि उसके प्रतीक, रूपक भी अंडामय हो रहे हैं। खास जनता जिसमें डाक्टर और प्रमुख पदाधिकारी शामिल हैं वे रसोई का सबसे पौष्टिक माल बेरोकटोक और मज़े से भकोस रहे है। आम जनता बदबूदार और खराब भोजन खाने पाने के लिए भी मशक्कत कर रही है। दोनों के बीच के कंट्रास्ट से उपन्यास में दो भिन्न दुनियाओं के चेहरों को रचा गया है। देश के संदर्भ में यह भोजन की लूट-खसोट और बर्बादी के प्रतिपक्ष में भूखी और सड़ा भोजन खाने को अभिशप्त जनता या कहें सड़ी हालत के अनुरूप सड़ा भोजन पाने वाली जनता की हालत का प्रतीक बनकर सामने आता है।

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार

            ‘नरक- यात्रामें बीमारों की तीमारदारी के आलम की न पूछिए, जो है मरीज की तकदीर है। बचना उसकी किस्मत और मौत उसकी नियति। इस उपन्यास में मनुष्य बिरादरी के पात्रों के अतिरिक्त पशु और पक्षी बिरादरी के दो मुख्य पात्र भी शामिल हैं। एक है हास्टल की तरफ रहने वाला कुत्ता जो भूले-भटके अस्पताल के मुख्य इलाकों में घूमता फिरता है। कई जगहों पर यह बड़ा निरीह दिखाई देता है तो कई जगहों पर खतरनाक। चीरघर की लाशों  के इर्द-गिर्द अक्सर मंडराया करता है। यहां जीवित मरीज़ों की तीमारदारी ही संभव नहीं लाशों को कौन देखे? ये कुत्ता कई स्थलों पर पिटाई खाता है-एक तरह से कई बार ये आदमी का कुत्ते की मौत मरने के मुहावरे को चरितार्थ करता है तो कई बार लगता है कि यह एक सामान्य आदमी का प्रतीक है जो अक्सर आशंकित दुर्घटना- स्थल पर खुद- ब -खुद पहुंच जाता है जैसे अस्पताल में मरीज़। अस्पताल में दंगा और लूट-पाट के दौरान- ‘‘कुत्ते को देखते ही पूरी टोली की बांछें खिल गई्र। आगे-आगे चल रहे एक दुबले से युवा ने एक लात कुत्ते को जमाई। कुत्ता कराहकर पलटा। इसके बाद तो जैसे लातों के बांध का फाटक खुल गया। एक के बाद एक लातें पड़ती गईं। शायद हर लौंडे ने एक या अधिक लात मारी। लात मारकर युवा नेता हंसते-खेलते अस्पताल के परिसर में प्रवेश कर गए। आज निश्चय ही कोई आम आदमी भी उसी तरह लातें खानेवाला है, अस्पताल में कुत्ते ने भागते हुए सोचा।’’7 ‘आदमी के अलावा कुत्ते भी परेशान हैंनामक एक अन्य व्यंग्य में ज्ञान चतुर्वेदी वी. आई. पी. के कारण अपनी सामान्य कुत्ता ज़िंदगी (जो दरअसल वी. आई. पी. के समक्ष आदमी होकर आदमी तक न माने जाने की व्यथा है, कुत्ते-सी हो गई ज़िंदगी की कहानी) को तरसते कुत्ता परिवार की त्रासद कथा कहते हैं। 8
            दूसरे, इस अस्पताल की इमारत पर दो गिद्ध भी बैठे हैं। वे वहां से जग का मुजरा देखते हैं और घात लगाए हैं किसी मौके की। उपन्यास में वह गिद्ध, नेता इंद्रमणि के बिठाए गए गिद्ध हैं जो डा. चौबे को डा. अग्रवाल का पत्ता काटने की दृष्टि से बिठाए जाते हैं। पुरानी कहावत के अनुसार- गिद्ध जहां बैठते हैं वहां मनहूसियत होती है। इसे लोक में प्रचलित अंधविश्वास भी कह लीजिए कि गिद्ध जहां बैठते हैं वहां मृत्यु का घर होता है। गिद्ध के गुणों में मुख्य बात यह है कि जो मृत है वह उसका भी मांस नहीं छोड़ते। गिद्ध की खासियत ही यही कि वह जीवित को नहीं मृत और मृतप्राय को खाता है। उपन्यास में कनछेदी की लाश वही मौका है और इस लाश को दंगे का कारण बनाना-मृत्यु के बाद उसका इस्तेमाल ही है। अस्पताल के चीरघर की दीवार पर बैठे ये गिद्ध वास्तव में लोकतंत्र की गिरती हुई दीवार पर बैठे हैं। यह ढहती दीवार किन पर गिरने वाली है ज़रा इसका खुलासा देखिए- ‘‘किससे पूछें? कौन है तारनहार? कौन है इन भेड़ों का गड़रिया? कौन है इन अनपढ़ों और बेजुबानों को इन बड़े अस्पतालों में रास्ता बतानेवाला, भरती कराने वाला, सही डाक्टर तक पहुँचानेवाला? कौन है इनके मरने पर रोने वाला? या कौन है जो इनके मरने पर कम से कम हंसे तो न? कनछेदी बेहोश है। कनछेदी को पता ही नहीं कि वह मर रहा है। कनछेदी को यदि पता होता तो वह जानता कि वह कसाईबाड़े में पहुँच गया है। यहां उसे किसी न किसी के हाथों मारा जाना था,क्योंकि न तो उसके पास पैसा था, न सिफारिश और न तिकड़म और इनके बिना इतने बड़े सरकारी अस्पताल में कनछेदी को कौन पूछता?’’9 यहां फिर याद आता है ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य लोकतंत्र में जंगल। जहां कनछेदियों के समझदार होने की साफ मनाही है। जहां शक्ति द्वारा आम आदमी के पीसे जाने का नियम बदसतूर जारी हैं। ‘‘ जंगल को जंगल जैसा रहना चाहिए-ऐसा मानना है शेर का। जंगल जो शेर को शेर की तरह रहने में मदद करे। निरंकुश शेर।...शेर और गीदड़ को ऐसा ही जंगल चाहिए-प्रजातंत्र के पंचतंत्र का अलिखित नियम है यह।
            ‘रोको यार...कुछ करो। जंगल को समझदार मत होने दो।...कुछ करो।...शेर ने गीदड़ से कहा है। दोनों मंत्रणा में लगे हैं। ’’10
            विडम्बनाओं, विसंगतियों और विद्रूपताओं को उभारने वाली व्यंग्य की बहुपरतों के नीचे करूणा की जो नदी बह रही है वह नरक- यात्राकी राह के अनेक लाचार, उपेक्षित और जिंदा होते हुए मौत के खाने में सरका दिए गए लोगों के संदर्भ में बहती दीखती है। ये नदी उपन्यासकार की पक्षधरता को सामने लाती है। ऊपर से देखने में वह भले ही असंगतियों के बीच हास्य का रास्ता बना दे पर अंतस्थल में यह करुणा न हो तो इस व्यंग्य उपन्यास की सार्थकता क्या है? मुक्तिबोध के शब्द हैं- ‘‘करूणा क्रांति की मां है।’’ यहां एक बड़े परिवर्तन के रूप में क्रांति को देखा जाए तो कनछेदियों से प्यार करना सिखाना और उनकी आवाज़ को स्वर देना ही वह करूणा है जो लोकतंत्र को सही मायनों में प्रस्तावित करने की राह बनाती है।

नरक: हिंदी व्यंग्यकारों का प्रिय विषय

            हिंदी में अनेक व्यंग्यकारों का प्रिय विषय नरक रहा। दोज़ख या नरक एक ऐसी फैंटेसी है जिसका प्रयोग इस संसार को बुरे कर्म के भयानक परिणाम भोगने के कर्मफल सिद्धांत के तौर पर किया गया है। मानवीय दुनिया के समानान्तर यह एक अमानवीय प्रतिसंसार है। एक अनजाना भय बिठाने के लिए और स्वर्ग की मनोरम कल्पनाओं को जीवित रखने के लिए। एक ऐसा संसार जहां मानवेतर कार्यव्यापारों का क्रूरतम चेहरा है। जहां सदाशयता, इंसानियत, भाईचारे के आदर्श हैलोजन के प्रकाश में भी दीठ के दायरे से बाहर हैं। जहां मक्कारी, बेईमानी, निष्क्रियता, चालाकी, हिंसा, अपराध, साजिशों की अंतहीन शृंखला है। पाप-पुण्य के बही-खातों के अनुसार बहिश्त-दोजख, स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं के संसार रचे गए पर जैसे जीना यहां मरना यहांहै वैसे ही जीवन भी एक है और स्वर्ग और नरक भी यहीं हैं। जीवन जीने के धवल रास्तों को स्वर्ग कह लीजिए और अंधकार भरी खोहों-खंदकों को नरक। और अनेक व्यंग्यकारों ने नरक की मिथकीय कल्पना को समकालीन सन्दर्भों में वास्तव बनाकर रच दिया है। व्यंग्य का टारगेट हमेशा मनुष्य और समाज के भीतर का दोहरे चरित्र रहा है। वे सब बातें जिन्हें हम जानते हुए भी आंखें मूंदे रहते हैं व्यंग्य का काम उन्हीं को दिखाना है। हिंदी के अनेक व्यंग्यकारों ने नरक-स्वर्ग की फैंटेसी को साकार किया है। हरिशंकर परसाई जैसे सशक्त व्यंग्यकार- भोलाराम का जीवके नारद के जरिए जहां स्वर्ग की दुनिया को साकार करते हैं वहां भोलाराम के जीव को तलाशते नारद के जरिए फैंटेसी को आधार बनाकर धरती का नरक दिखाते हैं। इंस्पैक्टर मातादीन चांद परभी एक फैनटेसी है जहां धरती का इंस्पैक्टर स्वर्ग में नरक रच आता है। इसके अतिरिक्त मैं नर्क से बोल रहा हूं’,‘ स्वर्ग से नरक’, ‘ स्वर्ग में नर्क’ 11 जैसे कई व्यंग्यों में परसाई नरक गाथाओं को आधार बनाते हैं। वे लिखते हैं-‘‘ हे पत्थर पूजनेवालो! तुम्हें जिंदा आदमी की बात सुनने का अभ्यास नहीं, इसलिए मैं मरकर बोल रहा हूं।’’12 परसाई के यहां नरक रचने वाला शिल्प अधिकांश फैंटेसी ही है। वास्तव में ‘‘फैंटेसी कुछ ऐसी चीजें पैदा करती है जो बिल्कुल नयी होती हैं, जैसे नये बिंब, नये विचार, नयी रचनाएं, नयी खोजें आदि। उदाहरण के लिए डुगास और बेरिंग्स फैंटेसी को अनुपस्थित चीजों को उपस्थित कर दिखाने की क्षमता मानते हैं।जो ऐसी चीजों को भी सामने ला सकती हैं, जिनका अस्तित्व नहीं है और कहीं हो भी नहीं सकता।’’ 13 परसाई अनेक बार भाववादी शिल्प या फैंटेसी के सहारे नरक दिखाते हैं तो श्रीलाल शुक्ल रागदरबारीके जरिए विभाववादी शिल्प या यथार्थवादी शिल्प में ही धरती के नरक-क्रेंद्रों को साक्षात दिखा देते हैं। नरक-यात्राउपन्यास में गिद्ध संवादों, माहौल में बार-बार दमघोंटू धु्रंआ , तमाम अव्यवस्था में पोस्टमार्टम की लाश का उठ खड़ा होना, कुत्ते की आदमियों जैसी ज़िंदगी- जैसे अनेक प्रसंगों  में फैनटेसी आकार लेती है। कहीं बेतरतीब बिंबावलियों से तो कहीं संभाव्य असंभावनाओं (अरस्तु ने काव्यशास्त्र में जैसे कवि को परामर्श दिया) के साथ। हालांकि पूरा उपन्यास इस शिल्प का उपन्यास निश्चित तौर पर नहीं है पर उपन्यास के यथार्थवादी शिल्प में कहीं-कहीं सृजनात्मक कल्पना लिए यह फैंटेसी झांक पड़ती है।
             जहां तक व्यंग्य में नरक के और चित्रों की बात है तो व्यंग्यकारों में गिरीश पंकज अपने व्यंग्य एक नेता की नरक यात्रा’ 14 में नेताजी को यमलोक में दिखाते हैं। नेता, यमदूत का विरोध करता है कि उसे स्वर्ग मिलना चाहिए। यमदूत चकराता है कि उससे कोई भूल तो नहीं हुई। बाद में नेता की करतूतों का खुलासा यमराज और चित्रगुप्त करते हैं। विष्णु नागर का हाल ही में नया ज्ञानोदयपत्रिका में प्रकाशित व्यंग्य है- मुझे नरक ही जाना चाहिए। उन्होंने लिखा- ‘‘मुझे सुविज्ञ सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि नरक में बहुत से प्लाट खाली हैं, बल्कि सुना है कि नरक तो आजकल बिल्कुल ही खाली पड़ा हुआ है, वहां अब कोई जा ही नहीं रहा, सब स्वर्ग की ओर दौड़ लगा रहे हैं...स्वर्ग पुण्यात्माओं से खचाखच भरता जा रहा है...इसलिए मुझे ग्रेट आइडिया आया है कि सब उधर जा रहे हैं तो क्यों न हम इधर जाएं यानी नरक जाएं।’’ 15 इस तरह नरक पर तमाम व्यंग्यकारों ने कलम चलाई है। व्यंग्य की धार को उपन्यास की शक्ल में लाकर नरक का बखान ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने उपन्यास नरक यात्रामें किया है। ये यात्रा नरक की रहस्यमय दुनिया की सैर को नहीं ले चलती इसलिए यात्रा शब्द से भ्रमित न होइए ये कोई यात्रा-संस्मरण या यात्रा वृत्तांत नहीं है। दूसरे, ये फैंटेसी शैली में भी नहीं रचा गया है कि आपको यमलोक के द्वार पर लाकर नरक की पीड़ाओं का साक्षात्कार कराए। जिंदगी के नरक की यात्रा यहां मौजूद है।
             हिंदी व्यंग्य को हरिशंकर परसाई और श्रीलाल शुक्ल ने जिस ऊंचाई पर पहुँचाया था उसी को ज्ञान चतुर्वेदी ने आगे बढ़ाया है। उनका यह उपन्यास एक क्षेत्र के नरक के माध्यम से व्यवस्था के अनेक नरकों का दर्शन कराता है। सोचने पर मजबूर कराता है कि कब तक अपने समाज के और अपने भीतर के नरकों से नज़रें चुराते रहेंगे? समस्या यह है कि आप आंख मूँदकर इन नरकों की भयंकर स्थितियों से कुछ पल के लिए खुद को शुतुर्मुर्ग की तरह बचा तो सकते हैं पर उस सडंाध का क्या करेंगे जो इनसे उठ रही है। ये नरक हमारे समाज के लगभग हर क्षेत्र में बन रहे हैं चाहे वह शिक्षा हो, राजनीति हो, प्रशासन हो, पुलिस हो और स्वास्थ्य तो है ही। ये सडांध-जातिवाद की है, भयंकर प्रशासनिक उपेक्षाओं की है, अमानवीयता की है, अक्षम्य जनविरोधी नीतियों की है, रिश्वतखोर भ्रष्टतंत्र की है । और जब तक यह सडांध मौजूद है तब तक नरक रहेगा। विडम्बना यह है कि ये नरक और ये सडांध के हिमालय हमने बनाए हैं और हम खुश हैं कीचड़ और गंदगी से भरे गढ्डों में पसरे सुअरों की तरह। नरक-यात्रानरक को खत्म करने की अपील है। इंसान के भीतर छिपे हुए स्वर्ग को खोजने और उसे बचाए रखने का आह्वान है। ये हमारा देश, ये हमारी दुनिया और दुनिया भर के समाज तभी बच सकेंगें जब नरक के बरक्स स्वर्ग होगा । जब इंसान , इंसान की तरह और गिद्ध ,गिद्धों की तरह देखे जाएंगे।

संदर्भ-
1 नरक यात्रा, ज्ञान चतुर्वेदी राजकमल प्रकाशन, पृ. 5
2 परसाई रचनावली, भाग-2, राजकमल प्रकाशन, पृ. 41
3 नरक यात्रा, ज्ञान चतुर्वेदी राजकमल प्रकाशनपृ. 10-11
4 वहीपृ. 227
5 वही ,पृ. 98
6 वही, पृ. 125
7 वही, पृ 223
8 ‘अलग’, व्यंग्य संग्रह, ज्ञान चतुर्वेदी, राजकमल प्रकाशन, पृ. 41
9 नरक यात्रा, ज्ञान चतुर्वेदी राजकमल प्रकाशन, पृ 162- 63
10 अलग’, व्यंग्य संग्रह, ज्ञान चतुर्वेदी, राजकमल प्रकाशन, पृ. 111
11 परसाई रचनावली, भाग-2
12 वही, पृ. 238
13 आई रोजेतः द साइक्लोजी आफ फैटेसी, पृ 13-22
14. गिरीश पंकज, पुरवाई पत्रिका, (संपा. तेजेंद्र शर्मा) 24 दिसम्बर,2006
15नया ज्ञानोदय, मार्च 2016, पृ. 32
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प्रज्ञा
शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में पी-एच.डी।
प्रकाशित किताबें -
कहानी संग्रह- तक़्सीम
नाट्यालोचना- नुक्कड़ नाटक: रचना और प्रस्तुतिराष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से 2006 में प्रकाशित। वाणी प्रकाशन से नुक्कड़ नाटक-संग्रह जनता के बीच जनता की बात, नाटक से संवाद अनामिका प्रकाशन
बाल-साहित्य- तारा की अलवर यात्रा एन. सी. ई. आर. टी से
सामाजिक सरोकारों को उजागर करती पुस्तक- आईने के सामने
अन्य- कथादेश, वागर्थ, पाखी, परिकथा, जनसत्ता, बनासजन, वर्तमान साहित्य, पक्षधर, निकट, हिंदी चेतना, जनसत्ता साहित्य वार्षिकी, सम्प्रेषण, हिंदी चेतना, अनुक्षण आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।
पुरस्कार - सूचना और प्रकाशन विभाग, भारत सरकार की ओर से पुस्तक तारा की अलवर यात्रा को वर्ष 2008 का भारतेंदु हरिश्च्ंद पुरस्कार। प्रतिलिपि डाट काम कथा सम्मान 2015 कहानी ‘तक़्सीम’ को प्रथम पुरस्कार।
सम्प्रति- एसोसिएट प्रोफेसर, किरोड़ीमल कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।
संपर्क - ई-112, सेक्टर-18, आस्था कुंज, रोहिणी, दिल्ली-89
मो 9811585399

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