औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Sunday, 1 May 2016

वंदना ग्रोवर की कविताएँ



1.

प्यार में गहरे तक डूबते हैं लोग
प्यार में अक्सर ऊबते हैं लोग
प्यार में डूबे हैं लोग
प्यार में ऊबे हैं लोग
प्यार में डूबे लोग इंक़लाब की बात करते हैं
प्यार में ऊबे  लोग सर झुकाकर काम करते हैं
प्यार में डूबे लोग बहुत लम्बी बातें  करते हैं
प्यार में ऊबे लोग बहुत गहरे चुप्पे  होते हैं
प्यार में डूबे लोग प्यार की व्याख्या करते हैं
प्यार में ऊबे लोग अनकही बात  समझते  हैं
प्यार में डूबे लोग धूम-धड़ाके से प्यार की बारात निकालते हैं
प्यार में ऊबे लोग ख़ामोशी से कांधे  पर उठा  दफ़न कर देते हैं
प्यार में डूबे लोग बहुत महान होते हैं
प्यार में ऊबे लोग सिर्फ इंसान  होते हैं
प्यार में डूबे लोग हर वक़्त इन्साफ की बात करते हैं
प्यार में ऊबे लोग हर अनकिया  जुर्म स्वीकार करते हैं
प्यार में डूबे लोग उड़ते हैं आसमानों में
और बांटते हैं ज्ञान
लिखते हैं प्यार
और जताते हैं प्यार
एक-दूसरे के लिए
प्यार में ऊबे लोग रहते हैं इसी धरती पर
बांटते हैं प्यार
समझते हैं प्यार
और जीते  हैं प्यार
सबके साथ
प्यार में डूबे लोग घृणा करते हैं
प्यार में ऊबे लोगों से

2.

एक कस्बे  में जीते हैं कई सपने रोज़
एक राजधानी में मरते हैं कई क़स्बे रोज़
कस्बे के अंदर से गुज़रती है राजधानी जब
हर दिन सवार हो जाते हैं कुछ टुकड़े राजधानी में कस्बे के
राजधानी पकड़ लेती है गिरेबां से
कस्बे की अधूरी इच्छाओं को
राजधानी की डुगडुगी पर
बन्दर की तरह आप अजीबोगरीब ढंग से
उछल-कूद करते हैं
सपनों की रोटी आईने में दिखा दिखा
नचाती है अपनी बेसुरी धुन पर राजधानी
जब से घुसी है राजधानी सपनों में
सपने दौड़ने लगे हैं राजधानी की गति से
राजधानी में एक अकेलापन है
एक भीड़ अकेली है राजधानी में 
जीने की तमाम कोशिशें
आपको मरने से नहीं रोक पाती
राजधानी में आप जीते हैं अपनी गति से
राजधानी आपको मारती है अपनी गति से
कस्बे तकते रहते हैं राह
वापसियों की.....
मातमपुर्सियों का सिलसिला जारी है ..

3.

मत लिखो
कोई कविता,कहानी या आलेख
मेरे लिए

मत छुओ मुझे
किसी कहानी
किसी कविता में
दुखता है पोर-पोर मेरा
चुभती है कलम की नोंक बहुत
शब्द गर्म सलाखों की तरह
भेद देते हैं मुझे

देना है तो दो
मुझे इक कोना
आवाजों से दूर
मत आओ मेरे पीछे
लेकर झंडे, मोमबत्तियां और भीड़

आज़ादी चाहिए मुझे
ढकोसलों और आडम्बरों से
नहीं है मेरी लड़ाई तुमसे
मुझे जूझना है खुद से

मुझे आना है बाहर
अपने भीतर से

4.

कहा था तूने
हाथ थाम ले चलेगा
नहीं छोड़ेगा कभी
देख !
सीने में धडकता है तू
दिखता तो है
पर नज़रों की हद से
बहुत दूर..
हाथों के खालीपन में
आँखों की वीरानी में
नहीं दिखता
तर्क की कसौटी पर .

5.

वो देर तक बतिया रहे थे हम
और फिर मेरा ध्यान गया
तुम सभी तो मर्द थे
बहुत बतियाना चाहती थी

धुएं के बादल देखकर
लगी थी कसमसाने उंगलियाँ
जेब में हाथ डाला
निकाल लिया
पकड़ ढीली हो गई थी

जाती हुई सड़क पर आते हुए
नन्ही सी हसरत जागी थी
सामने पान की दुकान  थी
चबा लिया उस हसरत को

सुरूर उतर रहा था आँखों में
नशा तारी था
देखी जो चंद निगाहें
नशा काफूर हो गया
एक और हसरत को पी लिया

बाल्कनी में पैर लटका कर बैठ जाना
रात को बेलाग बाहर निकल जाना
एक आँख बंद कर हंस देना
पिच्च से थूक देना
दो-दो सीढ़ी फलांग कर चढ़ जाना
धौल-धप्पा कर लेना
इससे उससे हाथ मिलाना

हसरतें तो बड़ी नहीं थी
वो औरत होना आड़े आ गया

6.

तार तार कर दो
उधेड़ दो
मेरा क्या

ज़िन्दगी भी तुम्हारी बखिए भी

7.

हिंसा होती   है   तोपों से, बमों से
हिंसा होती है बंदूकों से,तलवारों से
हिंसा होती है लाठियों से, डंडों से
हिंसा होती है  लातों सेघूंसों से
हिंसा होती है  नारों से, इशारों से      
हिंसा होती है वादों से,आश्वासनों से
हिंसा होती है ख़बरों से,अफवाहों से
हिंसा होती है आवाजों से,धमाकों से 
हिंसा होती है खामोशी से भी ..

8.

खंजर लो
उतार दो
मेरे सीने में

मुझे जीने दो
9 .
हंसी के दायरे सिमट कर
खामोशी की एक सीधी  रेखा में
तब्दील हो चुके थे
लिबास से बाहर झांकता
एक ज़र्द चेहरा
अन्दर की ओर मुड़े दो हाथ
सिमटे पैरों के पंजे थे
कोशिश करने पर बमुश्किल
सुनी जा सकने वाली आवाज़ थी
घर और बाज़ार के बीच रास्ते में
दहशतें साथ चलने लगी थी
अजनबियों में दोस्त ढूँढने की कला
अब दोस्तों में अजनबी ढूँढने की
आदत बन गई थी
बंद दरवाजों की झिर्रियों से
आसमान के अन्दर आने की
गुस्ताखी नागवार थी
चौखट से एक कदम बाहर
और सदियों की दहशत
यही कमाई थी आज की
आजकल उसे
शिद्दत से महसूस होने लगा था
वो जो जिस्म लिए फिरती है
औरत का है
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वंदना ग्रोवर
शिक्षा : पीएचडी
जन्मस्थान : हाथरस
वर्तमान निवास : गाज़ियाबाद
सम्प्रति : लोक सभा सचिवालय में राजपत्रित अधिकारी
कविता-संग्रह : मेरे पास पंख नहीं हैं (2013)
अन्यस्त्री होकर सवाल करती है (बोधि प्रकाशन), सुनो समय जो कहता है (आरोही प्रकाशन), अपनी अपनी धरती (मांडवी प्रकाशन), शतदल (बोधि प्रकाशन) कविता संग्रहों में रचनाओं का प्रकाशन
ईमेल : groverv12@gmail.com

4 comments:

  1. उम्दा कवितायेँ

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  2. सुंदर अभिव्यक्ति....जयचन्द प्रजापति कक्कू इलाहाबाद

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  3. Bahut see uljhano ko jiti rahi kavitaye aur bah aayi kagaz tak

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  4. Bahut see uljhano ko jiti rahi kavitaye aur bah aayi kagaz tak

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