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Saturday, 5 March 2016

मूल्यांकन 1 – विजेंद्र

‘स्पर्श’ पर शुरू हो रही ‘मूल्यांकन’ शीर्षक से इस नयी आलोचना श्रृंखला में हम हर महीने एक कवि पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित करेंगें | इस आयोजन में हमें आपके सहयोग की भी आवश्यकता है | आप में से जो भी मित्र लेखक अपने प्रिय कवि पर आलेख लिख सकें वे जरूर भेजें, उनका हमारे इस विशिष्ट आयोजन में हार्दिक स्वागत है | हमारी यह भी कोशिश रहेगी कि इस श्रृंखला में हम उन कवियों पर ज्यादा से ज्यादा बातचीत कर सकें जिन पर उतनी चर्चा नहीं हो सकी जितनी होनी चाहिए थी | इस क्रम में पहली प्रस्तुति वरिष्ठ लोकधर्मी कवि विजेंद्र पर केन्द्रित है जिसे आलोचक एवं संपादक अमीरचंद वैश्य ने लिखा है।



कौन है बड़ा कवि हिन्दी का आजकल
अमीर चन्द वैश्य

क युवा मित्र हैं मेरे। डा. पारस मिश्र। बीएएमएस। उनके पास जाता रहता हूँ चिकित्सा के लिए। संयोग से वह साहित्य अनुरागी भी हैं। खरीदकर पढ़ते हैं पुस्तकें। हिन्दी साहित्य पर उनसे चर्चा अक्सर हुआ करती है। वह अक्सर प्रश्न पूछते हैं। किसी कृति के बारे में। अथवा किसी कृतिकार के बारे में। किसी साहित्यिक पत्रिका के बारे में । और मैं यथामति उत्तर देता हूँ । एक दिन डा. पारस ने पूछा- आजकल हिन्दी साहित्य में बड़ा कवि कौन है। प्रश्न सुनकर मैं सोच में डूब गया। सोचने लगा कि क्या उत्तर दूँ । किसे बड़ा कवि बताऊँ । असमंजस में पड़ा रहा । उनकी बात मैंने टाल दी । लेकिन आज सोचता हूँ कि सम्प्रति हिन्दी कविता के संसार में बड़ा कवि कौन है। दो तीन नाम ज़ेहन में उभरते हैं। कुंवर नारायण, डा. केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी, चन्द्रकांत देवताले और लोकधर्मी वरिष्ठ कवि विजेन्द्र । विजेन्द्र के अलावा सभी कवि साहित्य अकादमी के पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं । कुंवर नारायण ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी अलंकृत हो चुके हैं । और अब कुछ माह पहले डा. केदारनाथ सिह को भी ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गई। पत्र-पत्रिकाओं में डा. सिंह के वैशिष्ट्य की चर्चा अचानक होने लगी । उनके विरोध में भी स्वर उठने लगे । 

सोचता हूँ क्या कुंवर नारायण को बड़ा कवि माना जाए अथवा डा. केदारनाथ सिंह को अथवा विनोद कुमार शुक्ल को या अशोक वाजपेयी को। ये सभी सम्मानित कवि है। और सत्तामुखी हैं। लेकिन लोकधर्मी कवि विजेन्द्र को साहित्य अकादमी ने आज की तारीख तक पुरस्कृत नही किया है। यद्यपि उनकी कई काव्य-कृतियां इस सम्मान के योग्य समझी जा सकती हैं- आधी रात के रंग, कठ फूलाबाँस, जनशक्ति, बनते मिटते पांव रेत में, बेघर का बना देश, मैंने देखा है पृथ्वी को रोते। वस्तुतः विजेन्द्र साधक कवि हैं। उन्होंने अपनी हर साँस से कविता को साधा है। लोकधर्मी कविता की रचना उनकी सिसृक्षा का प्रथम प्रयोजन है। बड़ा कवि कौन है। इस प्रश्न का उत्तर प्रस्तुत करने से पहले यह विचारणीय है कि हमारे देश की सुदीर्घ काव्य-परम्परा में बड़े कवि कौन-कौन हुए हैं। उत्तर है- आदि कवि वाल्माकि, कवि-कुल-गुरू कालिदास, करूणा-मूर्ति भवभूति, विद्यापति, कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, रहीम, रसखान, घनानन्द, भारतेन्दु, प्रसाद, निराला, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलेाचन, मुक्तिबोध। ये इसलिए बड़े कवि हैं कि इनके काव्य प्रयोजन बड़े हैं। ये लोकेान्मुखी हैं। इन्होंने जन-भाषा में जन-गण के लिए कविता रची है। कालिदास भले ही राज्याश्रय में रहे हों लेकिन उनके काव्य मेघदूत और नाटक अभिज्ञान शाकुन्तल में लोकजीवन के भावों की अभिव्यक्ति हुई है। हिन्दी में एक युग वह था जब साहित्य-समालोचक काव्यशास्त्र के आधार पर बिहारी को बड़ा कवि बताते थे अथवा देव को। डा. नगेन्द्र तो देव की कविता पर फिदा थे। लेकिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने लोकधर्मी प्रतिमानों से रीतिवादी आलोचना का ठाठबाट ध्वस्त कर दिया। उन्होंने लोकमंगल की दृष्टि से तुलसी को सबसे बड़ा कवि बताया। जायसी के प्रबंध काव्य पद्मावत की बेजोड़ आलोचना की। सूरदास के गीति-काव्य का मूल्यांकन परम्परा को ध्यान में रखते हुए किया। वह कबीर के प्रति कुछ कठोर रहे। लेकिन उन्होंने रहीम और रसखान दोनों का महत्व रेखांकित किया। रीति-मुक्त कवियों में प्रेम की साकार मूर्ति घनानन्द के काव्य की प्रशंसा दिल खोलकर की। उन्हें ब्रजभाषा का मर्मज्ञ कवि बताया। जायसी के बारहमासा की प्रशंसा मुक्त कंठ से की। और दरबारी कवि बिहारी के अलंकृत दोहों की तीखी आलोचना। आचार्य शुक्ल की आलोचना की परम्परा को डा. रामविलास शर्मा ने माक्र्सवादी जीवन-दृष्टि से आगे बढ़ाया। छायावादी युग में महाकवि निराला की घनघोर उपेक्षा हो रही थी। पन्त जी को प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी। प्रसाद जी दिवंगत हो चुके थे। लेकिन आजादी के बाद निराला जैसे बड़े कवि अभावों का बोझ लादे अपना जीवन चलाते रहे। आचार्य शुक्ल के समान डा. शर्मा ने निराला की साहित्य साधना (तीन खण्डों) में रचकर उनके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व का अभूतपूर्व मूल्यांकन किया। ऐसी आलोचना ने निराला को आधुनिक युग प्रर्वतक कवि के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। यद्यपि जीवन पर्यन्त उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला था। इससे सिद्ध होता है कि बड़े पुरस्कार इस बात के सबूत नहीं हैं कि कवि या लेखक महान है। आजकल पुरस्कारों के लिए बहुत जोड़-तोड़ की जाती है। ऐसी जोड़-तोड़ वरिष्ठ कवि विजेन्द्र आज तक नहीं कर सके हैं। दिल्ली दरबार के साहित्य-सामंत उनसे रूष्ट रहे हैं। कारण यह है कि उन्होंने डा. नामवर सिंह की बहुचर्चित आलोचनात्मक पुस्तक ‘कविता के नये प्रतिमान’ की तीखी आलोचना एक बार नहीं बार-बार की है। उन्होंने उनके चहेते कवियों रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, श्रीकांत वर्मा, कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह को आधुनिकतावादी कवि मानकर उनकी कविता का पुनः परीक्षण करवाया। डा. जीवन सिंह के आलेखो द्वारा। उनके आलेख ‘कृतिओर’ में प्रकाशित किए। उल्लेखनीय है विजेन्द्र के दूसरे संकलन ये आकृतियां तुम्हारी (1980) के प्रकाशन के बाद विरोध शुरू हो गया। लेकिन विजेन्द्र ने हिम्मत नहीं हारी और वे अपनी प्रतिकूल आलोचना का जबाव अपनी उत्कृष्ट कविताओं से निरंतर देते रहे।

भाषा और साहित्य के चलते-फिरते विश्वकोष त्रिलोचन के सान्निध्य में रहकर विजेन्द्र ने कविता रचने के अनेक मंत्र सीखे। बनारस में रहते हुए। उस समय वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बी.ए. के छात्र थे। बनारस के साहित्यिक परिवेश ने प्रगतिशील लेखक संघ से जोड़ दिया। उन्हें डा. रामदरश मिश्र, डा. शिवप्रसाद सिंह, डा. नामवर सिंह जैसे विद्वानों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। आज के चर्चित कवि केदारनाथ सिंह उस समय उनके समान विद्यार्थी थे। उन्होंने खुरजा मे रहकर हाईस्कूल पास किया था। संयोग से उन्हें ऐसे पज्ञाचक्षु गुरू मिले जो बी.एच.यू. में शिक्षित हुए थे। मार्क्सवाद से परिचित थे। उन्होंने ही अपने शिष्य विजेन्द्र पाल सिंह की चित्त-भूमि में मार्क्सवाद का बीज बो दिया। अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद विजेन्द्र पाल सिंह ने स्वयं को डी-क्लास करके विजेन्द्र के रूप में बदल दिया। यही कारण है कि कवि विजेन्द्र अपने गांव धरमपुर अपनी कर्मभूमि भरतपुर के अनेक श्रमजीवी और संधर्षशील जनों को चरित्र प्रधान लम्बी कविताओं में उपस्थापित करके अमर कर दिया। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के बाद सार्थक और लम्बी कविताएं विजेन्द्र ने विपुल संख्या में रची हैं। इन कविताओं के केन्द्र में वास्तविक चरित्र हैं। उनकी क्रियाशीलताएं हैं। उनका-जीवन संघर्ष है। उनका विषम सामाजिक परिवेश है जिसका वे प्रतिरोध करते हैं। साथ ही साथ उनका प्राकृतिक परिवेश है। विजेन्द्र की खास बात यह है कि वे उत्पादक वर्गों के प्रतिनिधि चरित्रों अर्थात् किसानों और मजदूरों के जीवन को आत्मसात कर चुके हैं और उन्हें प्राकृतिक परिवेश के मध्य उपस्थित करके उनकी क्रियाशीलता का वास्तविक वर्णन करते हैं। उनकी ऐसी कविताओं में देखना क्रिया का बार-बार प्रयोग हुआ है। उनकी एक छोटी सी चरित्र प्रधान कविता है गंगोली। गंगोली इस कविता के केन्द्र में उपस्थित है। कवि उसे देखकर कहता है- कटनी करते उसको देखा/सहज सलोना रंग भरा बदन /विस्फारित आंखें/ काली/ बहुत पास से देखा/ बात-बात में/ पूछा जाना/ नाम/ गंगोली/ पिता जोतता हल/ सीरदार का/ मां करती है चैका बासन/ पेट पालना दूभर/ झुके-झुके निकला है/ बंजर टीले सा ऊभर। (ये आकृतियां तुम्हारी पृष्ठ-88) कविता में वर्णन के साथ-साथ गंगोली का आत्मालाप भी चलता रहता है। वह अपनी मांग भरवाना चाहती है लेकिन- लांक पड़ा है बिखरा/ कहां धरा है समय मुझे/ तितली बनकर/ पंख-पंख उड़ जाने को/ बड़ी बिकट है जीवन धारा/ ऊपर लगता इन्द्रधनुष जल में/ अंदर से सिसियां दी कारा। (वही पृष्ठ-90-91)

विजेन्द्र की यह लघु चरित्र प्रधान कविता पढ़ते ही महाप्राण निराला की प्रसिद्द कविता वह तोड़ती पत्थर अनायास याद आने लगती है। विजेन्द्र ने निराला के समान ही देखना क्रिया का प्रयोग किया है। कल्पना के संस्पर्श से कन्या गंगोली का आकर्षक चित्र आंक दिया है। अपने आदर्श कवि निराला के समान। इस कविता में सामाजिक विषमता की ओर इंगित है कि जो श्रम करते हैं | उन्हें उसका पूरा फल नहीं प्राप्त होता है । व्यंजना यह है कि गरीबी-लाचारी भाग्य की देन नहीं है। सामाजिक विषमता के कारण जनमी है। ऐसी चरित्र प्रधान कविताएं साठोत्तरी कवियों में किसी कवि ने नहीं रची हैं। न अज्ञेय ने न कुंवर नारायण ने न केदारनाथ सिंह ने न अशोक वाजपेयी ने न विनोद कुमार शुक्ल ने। न धूमिल ने न लीलाधर जघूड़ी ने। और न अन्य किसी छुटभैए कवि ने। विजेन्द्र की ऐसी चरित्र प्रधान कविताएं अनेक हैं। यथा- तस्बीरन अब बड़ी हो चली मरूभूमि का लादू गड़रिया चुरू में मिनिस्टर गाड़ी खींचने वाले की बेटी मागो। अपनी जन्मभूमि धरमपुर का निवासी अल्लादी लुहार तांगा चलानेवाला साबिर। आगरे में अस्पताल के सामने मुर्दा सीने वाले अनाम व्यक्ति धरमपुर के ही बाबा रामदयाल उर्फ रमदिल्ला ढोंगी तांत्रिक की वास्तविकता। वायलिन वादक और हुनरमन्द माली नत्थी। श्रमशीला तेलिन नूरजहां। मध्यमवर्गीय सुशिक्षित महिला मिस मालती। बैनी बाबू। मिस उर्मिल। गली-मुहल्ला बुहारने वाली सांवली मीना। कालाहांडी से आई हुई भूखी-प्यासी रूक्मिनी। चैका बासन करने वाली लड़की लच्छमी। बुन्देलखण्ड से विस्थापित हुआ लाचार किसान करिया अहिरबार। भरतपुर का जुझारू कानसिंह। लकड़ी काटने वाली पारो। स्वाभिमानिनी दादी माई। एक था मानुख का जुझारू चरित्र मनोहर। ऐसे श्रमशील और संघर्षशील साधारण जनों को विशेषत्व प्रदान किया गया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएं कलात्मक ढंग से उभारी गई हैं। सामंती जीवन मूल्यों और क्रूर पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतिरोध किया गया है। मध्यमवर्गीय सुशिक्षित नारी पात्रों की विशेषताएं वर्गीय दृष्टि से आलोचित की गई हैं। एक अर्धविक्षिप्त स्त्री के एकालाप द्वारा यह विचार व्यक्त किया गया है कि शंकराचार्य के भाववादी दर्शन से जीवन के दुख दर्द दूर नहीं किए जा सकते हैं। सामाजिक अधिरचना का आधार बदलने के बाद ही शोषण मुक्त व्यवस्था की शुरूआत हो सकती है लेकिन इसके लिए जन-चेतना जगाना अनिवार्य है। यह कार्य डी-क्लास मध्यम वर्ग कर सकता है। विजेन्द्र के चिंतन का सार यह है कि अखिल भारतीय स्तर पर मजदूरों और किसानों को एकजुट होना चाहिए। यह वर्ग ही समाज में परिवर्तन ला सकते हैं। क्योंकि इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए सारा संसार है। इतिहास ऐसे परिवर्तनों का साक्षी है। पराधीन भारत में 1857 के संग्राम में हिन्दी प्रदेश के संघर्षशील लोगों ने ही अंग्रेजों से लोहा लिया था। उन्हें परास्त किया था।भरतपुर में भी जाटों ने अंग्रेजों को हराया था। वहां का किला वे जीत नहीं पाए थे। इस प्रकार विजेन्द्र ने जीवंत चरित्रों के माध्यम से उभरती हुई जनशक्ति रूपायित की है। कवि की आस्था है कि जनशक्ति जब अपने श्रम से चट्टानें तोड़ सकती है तब एकजुट होकर शोषकों को भी परास्त कर सकती है। कठफूला बास मलाह गांव के जुझारू किसानों की संघर्षपूर्ण रामकथा है। विजेन्द्र ने लम्बी कविता कटफूला बास में (1977 में प्रकाशित) भरतपुर के मलाह गांव के जुझारू किसानों की उनकी निर्धनता की उनकी भीषण गरीबी उनकी रोगग्रस्तता की विस्तृत चर्चा संवाद शैली में की है। वस्तुतः यह कविता मुक्ति के लिए भारतीय किसान का लोक-युद्ध है। कविता का एक पात्र चौधरी कहता है- पेड़-रूखों ने भी/ हमारी विपदा सही है/बड़े-बड़े जुलुम देखे हैं हमने/अन्याय अनाचार/ सबके सब उठे एक साथ/तोपखाने ठेले /किले जाय गिराये/ भीतें जाय खसांईं/ गुम्बदों को ढहा दिया। वस्तुतः यह कविता किसान-जीवन की रामकथा है। इसमें शोषक रावण है और शोषित दलित किसान राम के समान जुझारू। वे संगठित होते हैं। इस कविता का नायक विजेन्द्र का ही प्रतिरूप है। यह कविता पढ़ते समय पाठक को आभास होता है कि सामने मंच पर रामलीला चल रही है और कवि अपने पाठकों को उसके बारे में अपनी टिप्पणी कर रहा है। इस कविता में कवि विजेन्द्र ने अपनी लोकधर्मी काव्य-सैद्धान्तिकी इस प्रकार व्यक्त की है- द्रव्य का बीज वपन /जीवन की गतिकी का अजस्र प्रवाह स्रोत/ वाक् चमत्कृति नहीं /सच का दमकता अग्नि पुंज/ वही है मेरी कविता की सैद्धन्तिकी अंतर्निहित। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सैद्धान्तिकी मार्क्सवाद के भौतिक चिंतन से अनुप्राणित है। संपूर्ण कविता का पाठ करने के बाद पाठक समझने लगता है कि कवि देश के महानायक किसानों को क्रान्ति चेतना से लैस करने के लिए ग्रामीण जीवन से जुड़ रहा हैं। इस कविता की रचना की पृष्ठभूमि नक्सलवाड़ी आन्दोलन है जो किसानों ने शुरू किया था। विगत शताब्दी के सातवें दशक में। इसका पहला संस्करण 1974 में प्रकाशित हुआ था। इस कविता का पाठ करते हुए पाठक महसूसता है कि इसका वाचक कवि का ही प्रतिरूप है। वह अपने मध्वर्गीय चरित्र का रूपान्रण करना चाहता है इसलिए वह भरतपुर के समीप स्थित बयाना कस्वे सबाईमाधोपुर कोटा-बूंदी और मालवा के किसानों एवं खेत मजदूरों का जीवन निकट से देखता है। वहां की पठारी धरती के परिदृश्य भी अवलोकता है। पूरी कविता प्रत्यक्ष वर्णनों के आधार पर रची गई वाक्य-श्रृंखला है। इसमें अनेक चाक्षुष एवं ध्वनि बिम्ब हैं। रूपकात्मकता है। छोटे-छोटे प्रभावपूर्ण वाक्य हैं। भाषिक संरचना में तद्भवता की प्रधानता है। तत्समता की विरलता। स्थानीय शव्दों का प्रचुर प्रयोग भी है। संपूर्ण वर्गीय दृष्टि से रची गई है। कविता का प्रारम्भ काटना क्रिया से होता है। यह सार्थक और प्रेरक है। कवि कहता है- मैंनें वह आवाज सुनी/जो अंदर से कहती है/ तू ही हंसिया क्यों न ले/और काट.......उसी से ये आवाज उपजती है/इन कहने सुनने वाली बातों से /चट्टानें नहीं पिघलेंगीं/यह धातुओं से निर्मित हैं/ ऐसे ये धारें नहीं रखी जाऐंगीं/ दरअसल काटने वालों की शक्लें और हैं। (जनशक्ति पृष्ठ-31) काटने वालों की शक्लें निर्भीक श्रमीजनों की हैं। वे रात-दिन पसीना बहाते हैं। फिर भी उनका जीवन अभावग्रस्त है। कविता के इस प्रारम्भिक अंश की यह व्यंजना है कि काटना क्रिया कवि को प्रेरित करती है कि वह अपनी लेखनी की धार से सामंती मूल्यों, पूंजीवादी व्यवस्थाओं और साम्राज्यवादी चालों और शोषणों पर प्रखर प्रहार करे। जब तक व्यवस्था शोषक व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक किसानों और मजदूरों का जीवन खुशहाल नहीं हो सकता है। यह कविता बताती है कि विजेन्द्र सत्तामुखी कवि नहीं हैं। लोकोन्मुखी हैं। उन्होने अपने दार्शनिक ज्ञान के तीसरे नेत्र से समझ लिया है कि प्राकृतिक विकास के साथ-साथ मानव समाज का भी विकास हुआ है। वह जांगलिकता से मांगलिकता की ओर निरंतर बढ़ता रहा है। लेकिन राजसत्ता, धर्मसत्ता, पूंजीसत्ता ने मांगलिकता का राजपथ अवरूद्ध किया है। जनशक्ति ही यह राजपथ साफ-सुथरा कर सकती है। एक आवाज का आवाजों में बदलना जरूरी है। संगठित आवाजों से सत्ता दहलती है। उसका इन्द्रासन डोलता है। इतिहास साक्षी है कि रोटी के लिए सामूहिक समर निरंतर चलता रहा है। अतः कवि कहता है- मुझे जानना है इनका अदम्य बल/क्या है/चट्टानें मेरी आन्तरिक भू रचना/या कालदेव की वक्र महिमा/या जनशक्ति का अपार बल/ मुझे जानने दो/मैं यहीं से चुनुंगा अपने रूपक/यहीं से कथ्य/यहीं से शब्द और सृजनशील आदमी की क्रियाएं/यही हैं मेरे नायक/यही हैं मेरे भावों में उठे ज्वार। ((वही पृष्ठ-77) सारांश यह है कि इस कविता की अंतर्वस्तु वास्तविक है। इतिहास सम्मत है। सुगठित हैं। कविता का सार्थक निष्कर्ष यह है कि कविता एक चट्टानी संरचना है/और जनशक्ति उसका खनिज दल (वही पृष्ठ-81)

डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि यदि हमें भारत को समझना है तो हमें यहां के किसानों का जीवन समझना होगा। और उनका जीवन समझने के लिए प्रेमचन्द के उपन्यासों को पढ़ना होगा। समझना होगा। यही बात कवि विजेन्द्र के सन्दर्भ में कही जा सकती है। साठोत्तरी कविता में यदि किसान जीवन के गतिशील चित्र देखने हैं तो विजेन्द्र की जनशक्ति जैसी लम्बी कविताएं एवं अन्य कविताएँ अनिवार्य रूप से पढ़नी होगीं। इस दृष्टि से विजेन्द्र अद्वितीय कवि हैं। उनकी तुलना डा. केदारनाथ सिंह से भी नहीं की जा सकी। यद्यपि डा. सिंह की पृष्ठभूमि गांव की है तथापि उनके संपूर्ण काव्य में सक्रिय किसान के चित्र सघन नहीं हैं। और यदि कहीं हैं तो उनमें विसंगति है। उनकी इस विसंगति की ओर संकेत विजेन्द्र ने ही किया है पिछले दिनों फेस बुक पर। उन्होंने लिखा है कि बुर्जुआ और पूंजी केन्द्रित समाज में कुत्सित सौन्दर्यशास्त्र बराबर विकसित होता रहता है। इसका जन्म विज्ञापित चमत्कारी शैली से होता है। इसका एक अत्यन्त विकसित रूप टी.वी. के चैनलों पर नारी को नग्न या अर्धनग्न रूप में विज्ञापित करने में दिखाई देगा। सुख सम्पन्न वर्ग इसमें रस लेता है। और फिर डा0 केदारनाथ सिंह की एक कविता फसल की चर्चा की है। (वागर्थ, नबम्बर 2008 में प्रकाशित) इस पूरी कविता में किसान जीवन का चित्र है। डा. सिंह कहते हैं- मैं उसे (किसान) वर्षों से जानता हूं/एक अधेड़ किसान/ थोड़ा थका/थोड़ा झुका हुआ/ किसी बोझ से नहीं/सिर्फ धरती के गुरूत्वाकर्षण से/जिसे वो इतना प्यार करता है...... अब विजेन्द्र की तीखी टिप्पणी पढि़ए- यहां कुछ सवाल हैं। क्या सचमुच किसान की कमर जीवन के किसी बोझ से न झुककर धरती के गुरूत्वाकर्षण से झुकती है। यहां अभावग्रस्त किसान की ट्रैजिक पीड़ाएं न बताकर गुरूत्वाकर्षण शव्द से सिर्फ चमत्कार पैदा किया गया है। लाखों किसानों ने आत्महत्याएं कीं क्योंकि वे गुरूत्वाकर्षण के बोझ से दबे हुए थे। अगर कोई किसान इस कविता को पढ़ेगा तो कवि पर थूकेगा और कविता पर भी। अपने खेत में रात-दिन वो अपना खून पसीना बहाकर जो श्रम करता है उसका मार्मिक रूप चमत्कार से ढक दिया गया हैं। यही है कुत्सित सौन्दर्यशास्त्र जो हमें जीवन की कठिन स्थितियों से परिचित नहीं होने देता। वह आगे भी कहते है- मैं किसानो के बीच में लगभग तीन दशक तक रहा हूं। वह भी साफ सुन्दर रहने के लिए बेहद इच्छुक रहता है। मन से वह गन्दगी कतई पसन्द नहीं करता। यहां तक कि वह अपने पशुओं तक को गन्दगी में नहीं रहने देता। इस प्रकार पूरी कविता में किसान का कठिन जीवन उसका संघर्ष तथा उसके मन में क्रूर व्यवस्था के प्रति आक्रोश कहीं भी नहीं है। यह सब हुआ है चमत्कार की शैली में। उल्लेखनीय है कि आचार्य शुक्ल ने कविता में चमत्कारवाद का डटकर विरोध किया था। लेकिन खेद की बात यह है कि डा. सिंह जैसे मर्मज्ञ कवि भी चमत्कार का सहारा लेते हैं। यही कारण है कि उनके आलोचकों ने उन्हें भाषा का जादूगर कहा है। वह जादूगर के समान अपने पाठक को चमत्कृत करते हैं अपनी जादुई भाषा से। ऐसी भाषा का प्रभाव स्थाई नहीं होता है। क्षणिक होता है। इसके विपरीत विजेन्द्र अपने जनपद के किसान से पूरी तरह एकात्म हो चुके हैं। वे उसे अनेक रूपों में रूपायित करते हैं। उनकी एक कविता का शीर्षक है मेरे जनपद का कृषक। यह छोटी सी कविता हिन्दी के बहुत पुराने छन्द रोला की लय पर आधारित है। आप भी कविता पढि़ए- क्या करूं/ मैं इतनी किरणों का/ ओ उगते भगवान भास्कर/ बिना धुला/ मुंह लेकर/ बालक खड़ा हुआ/ रोता है/ पथ पर/ यह सारे दिन भरे धूप के/ बने बसन हैं/ जैसे मेरे/ करूं क्या इनका/ मेरे जनपद का कृषक/ भूखा सोता है/ थक कर। (कवि ने कहा पृष्ठ-49-50) इस छोटी सी कविता में कवि ने वास्तविक चित्र अंकित किया है। बिना किसी अलंकरण के। इस कविता का मूल भाव है करूणा जो कवि का मन खिन्न करती है। स्वभावोक्ति का अच्छा उदाहरण है। इसी प्रकार की अनेक कविताएं संस्कृत की लोकधर्मी काव्य-परंपरा में लक्षित होती हैं। वहां भूखे परिवारों के अनेक चित्र हैं। 

उल्लेखनीय है कि सन् 1965 से 1980 तक विजेन्द्र सार्थक लम्बी कविताएं निरन्तर रचते रहे। उनकी पहली महत्वपूर्ण लम्बी कविता ‘जनशक्ति’ है। इसका पहला संस्करण 1974 में छपा था। अब यह कविता जनशक्ति नामक संकलन में है। प्रकाशन वर्ष है 2011 इसमें जनशक्ति के अलावा चार और लम्बी कविताएं हैं लकड़हारा, काक नदी के उजाड़ तट पर, मैग्मा, खंडहरों का शोकगीत।
विजेन्द्र की जीवन-दृष्टि अपने जनपद तक सीमित नहीं है। वह प्रदेशव्यापी है। देशव्यापी है। विश्वव्यापी है। इसीलिए वह ओ एशिया नामक कविता में इतिहास-बोध के आधार पर एशिया महाद्वीप को संगठित महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं जिससे वह आज की एकध्रुवीय दुनिया का शक्तिशाली विकल्प बन सके। अमरीकी साम्रराज्यवाद का विरोध कर सके। विजेन्द्र ने अपने विश्वव्यापी विजन से प्रेरित होकर अमरीका के अश्वेत गायक पाल राब्सन को संबोधित करते हुए कहा है- कौन है /तुम्हारा वारिस/आज इस दुनिया में/ पूछते हैं तुम्हारे गूंजते स्वर/ उगते अंतरिक्ष से/अश्वेत आज भी पीडि़त हैं/तुम्हारे गान की ज्वाला/आज भी डराती है उत्पीड़कों को/ जो हैं शत्रु जन के/ काव्य के कला के शान्ति के/ सौन्दर्य प्रेम के/ वे एक दिन होंगे विस्मृत दुनिया से/ तुमने झेले हैं श्वेत सत्ता के हमले/ उनके कुचक्रों को/ खूनी उन्माद के बीच/ तोड़ा है तुमने/ ललकारा था हर बार/ श्वेत दमनकारियों को/शोषकों और नस्ल भेदियों को/ हेयर आई स्टेंड  की चुनौतियां/ सत्ता की चूल्हें हिलाती रहीं/तुमने रखा मस्तक ऊंचा अपनी जाति का/ श्वेत जालसाजों को किया था बेनकाब। (रचना समय जुलाई 2013) इस कविता के अन्त में विजेन्द्र ने पॅाल राब्सन से स्वयं को एकात्म कर दिया है। यह कहकर कि तुम अश्वेत हो तो मैं भी सांवला हूं। व्यंजना यह है कि कवि पाल राब्सन की तरह क्रूर व्यवस्था की चूलें हिलाना चाहता है। प्रसंगवश यहां उल्लेखनीय है कि शमशेर ने अपनी प्रसिद्ध कविता अम्न का राग में अश्वेत गायक पाल राब्सन के नाम का उल्लेख एक बार किया है- पाल राब्सन ने नई दिल्ली से नए अमरीका की/ एक विशाल सिम्फनी ब्राडकास्ट की है। (प्रतिनिधि कविताएं पृष्ठ-96) हम पहले भी लिख चुके हैं कि शमशेर की इस प्रसिद्ध कविता में प्रतिरोध के सौन्दर्य का अभाव है। यह इसकी बड़ी कमी है। लेकिन विजेन्द्र ने अपने अग्रज कवि शमशेर की कमी दूर कर दी है अपनी कविता पाल राब्सन रचकर। इसमें आदि से अन्त तक प्रतिरोध का सौन्दर्य झिलमिला रहा है। विजेन्द्र मानते हैं कि प्रतिरोध का सौन्दर्य रचकर ही कवि मुक्ति-संग्राम की अधूरी प्रक्रिया पूरी कर सकता है। हमारे विचार से पाल राब्सन में महाकवि निराला का ओजस्वी स्वर मुखरित हो रहा है। और साथ ही साथ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता अंधेरे में का ओज गुण भी। जो बेचैनी मुक्तिबोध में है वही विजेन्द्र में भी लक्षित होती है। यह कविता पढ़ते समय पाठक को महाप्राण निराला की प्रसिद्ध कविता जागों फिर एक बार याद आने लगती है।

प्रतिरोध-भाव से प्रेरित होकर विजेन्द्र दैत्य को पछाड़ो में कहते हैं-‘‘ दैत्य को पछाड़ो/ जो करता है दोहन उगते देशों का/ जो छीनता है हमारे खनिज स्रोत/ हमारे जल प्रपात/हमारे फल फूल/हमारी जड़ों पर करता है कुठाराघात/ उसे पछाड़ो/सबसे बड़ा शत्रु है वह/ शान्ति प्रिय दुनिया का/जो हमें करता है विभाजित/ थोपता है युद्ध अनचाहे/पैदा करता है तस्कर आयुधों के/ वह सर्वहारा के संगठन से डरता है/उस दैत्य को पछाड़ो/ वह बहुत ताकतवर है/ क्रूर कुचाली और महाकपटी/विश्व बैंक उसका घातक अस्त्र है/ अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष उसका कुचक्र/ वह किसी का मित्र नहीं है/जो भी उसके पंजे से दबा है/वह सबसे बड़ा शत्रु है /पूरी दुनिया के गरीबों का/ वह उसका रक्त पीता है/उसे पछाड़ो (बेघर का बना देश, पृष्ठ-63-64, रचना-समय अप्रैल 2013 फरीदाबाद) इस संबोधनात्मक ओजस्वी कविता में भी निराला और मुक्तिबोध का स्वर मुखरित हो रहा है। जो आज के अमरीकी साम्राज्यवाद की तीखी आलोचना कर रहा है। इस कविता की व्यंजना यह है कि जब तक अमरीकी साम्राज्य का वर्चस्व रहेगा तब तक दुनिया के गरीब देश लाचार बने रहेंगे। अशान्ति रहेगी। युद्ध होते रहेंगे। कुपोषण से लोग मरते रहेंगे।

प्रिय पाठक अब आप ही सोचिए और विचारिए कि ऐसा ओजस्वी स्वर कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी, चन्द्रकांत देवतालें, अरूण कमल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, ज्ञानेन्द्रपति, वीरेन्द्र डंगवाल, एकांत श्रीवास्तव, मदन कश्यप जैसे प्रतिष्ठित और सम्मानित कवियों में लक्षित होता है। यदि होता है तो शोध करके बताइए। ऐसे परिप्रेक्ष्य में विजेन्द्र बेमिसाल और संघर्षशील कवि के रूप में सामने आते हैं। वे बार-बार बेचैन होकर अपनी सरस्वती को जगाने की चेष्टा करते हैं। और समकालीन कवियों के चरित्र की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- ओ कविता की देवी/ तुम सोई हो कहीं/निविढ़ अँधेरी छांह में/ या कहीं धरती की कोख में/ तुम जागो /कवि छन्द खो चुका है/ भूखा है झूठे यश को/ मुट्ठी भर सिक्कों में/ ईमान को/ कहां थमा पृथ्वी का घूमना/सूर्य का उगना/ चन्द्रकलाओं में छिपी मेरे प्यार की अनुगूँजें/ ये धरती अन्न उगाने को/ जिन्होंने कमाई है अपने पसीने से/ वे ही है मुकुट के अधिकारी सच में । (वही संकलन पृष्ठ-15) यहां प्रश्न खड़ा होता है कि किसान मुकुट का अधिकारी कैसे बनेगा। कवि की ओर से उत्तर दिया जा सकता है कि जनशक्ति के संघर्ष द्वारा ऐसा संभव है। फिलहाल ऐसा कोई व्यापक आंदोलन नहीं हो रहा है। फिर भी कवि निराश नहीं है। उसे चिन्ता है कि कविता से आदमी गायब है/ पेड़ पौधे बन लताएं/ फूल घासं नदियां विषाक्त हैं। कविता के अन्त में कवि आशा भरे स्वर में कहता है ओ मां तुम जागो/ साहस से देखो जिस्म के सौन्दर्य को/ जिससे तुम उसका मुक्त आलिंगन कर सको/ धरती की पवित्र रक्षा को/ जिन क्षणों में बिंधी हैं मेरी गर्म सांसें/ उन्हें पिरो सकता कशिश के धागों में / मुझे परवाह नहीं/ रात हो या दिन/ मैदान हो या चट्टान सागर हो या मरूभूमि/ मुझे हर शब्द में सुनाई पड़ता है/ शुभागमन का उच्चार (वही पृष्ठ-18 रचना समय अक्टूबर 2013)

आदिकवि वाल्मीकि के राम लक्ष्मण से कहते हैं - अपि स्वर्णमयी लंका लक्ष्मण मे न रोचते /जननी -जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी। अर्थात् जननी और जन्मभूमि दोनो स्वर्ग से भी अधिक गरिमापूर्ण होते हैं। सूर के कृष्ण भी कहते हैं- ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं। कुछ ऐसी ही बात विजेन्द्र भी बार-बार कहते हैं कि धरमपुर मेरा गांव है। वह मेरे चित्त में सघन बन के समान बसा हुआ है। उल्लेखनीय है कि बदायूं जनपद की तहसील सहसवान के अंतर्गत दहगवां नामक कस्बा है। उसके निकट ही लगभग चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर विजेन्द्र का गांव धरमपुर आज भी स्थित है। पहले से बदल गया है। अब बाग-बगीचे नहीं हैं। उनके पिता की पुश्तैनी हवेली खंडहर हो चुकी है। गांव की निचाई पर स्थित कुंडा आज भी है। लेकिन उसमें  पानी अब कम रहता है। विजेन्द्र के अनुसार पहले वह जल से भरा रहता था। उसके किनारे बैठकर मछुआरे झख मारा करते थे। अर्थात् मछली पकड़ते थे। यहां मुझे विजेन्द्र की एक कविता याद जे़हन में कौंध रही है। यह उनके किसी संकलन में नहीं है। कविता अधोलिखित है- कैसे भूल पाऊँगा/ धरमपुर गांव अपना/जहां पैदा हुआ/घने सावन में/ कैसे भूल पाऊँगा/वह गंगा नदी/थोड़ी दूर/जो सटकर बहती मेरे गांव से/ पतली धुमैली चीर धारा की/ देखता हूं/ जेठ की तपती घाम में।/ फिर उमड़ती बरसात में/ फुफकारते सहस कण/ अंधेंरी रात मे।/डुबाती निचाट खेतों को/ वही गंगा/ खस जाते कच्चे घर/ गरीबों के/ देखता हूं/ कहो तुम सुन भी रहा हूं/ दुखी मन से/ अब नहीं अमन/ आदमी को हर घर वहाँ।/ चैन से सोता नहीं कोई।/ आतंक है कुलकों का/ फिर भी उभरती दिखती/ जनशक्ति गांव में/ संगठित होते दलित दल/ कर रहे प्रतिवार जालिमों पर/ खबर है/ एक दिन साहूकार को पीटा/हाथ-पाँव तोड़े/ गिरे दिखे दो दांत आगे के।/कहना है/सूद लेता मनमाना/बहीखाते गलत इंदराज करता है।/ कुछ कहो तो /बुरी गालियां देकर /पिटवाता अपने चहेतों से। (पश्यन्ती-अक्टूबर-दिसंबर, सन् 2001 पृष्ठ 117-118)) कविता आगे तक चलती है। वास्तविकता बताने के लिए । यह कविता पढ़कर और समझकर विजेन्द्र के कवि व्यक्तित्व की कई विशेषताएं समझी जा सकती हैं। पहली स्थानीयता से रागात्मक संबंध। वहां के परिवेश से लगाव। वहां के लोगों के प्रति अपनापन। दूसरी वर्गीय दृष्टि से गांव के समाज का वर्णन। तीसरी अन्याय का प्रतिरोध। चौथी उभरती हुई जनशक्ति के प्रति आस्था। पांचवीं स्थानीय शब्दों का कविता में रचाव। छठी वास्तविकता के आधार पर स्वभावोक्तियों का वर्णन।

इस कविता में विजेन्द्र ने देखना क्रिया का अनेक बार प्रयोग किया है जो उनकी रागात्मकता का प्रमाण है। उनकी गन्ध-चेतना भी जागरूक है। वह अपने गांव के महकते कटहल को याद करते हैं। और साथ ही साथ फलवान पेड़ों को भी - ओ मेरी फलवान शाखें/ कहां वो सब।/ मैं ही छोड़ आया तुझे/कैसे भूल पाउंगा/जो सब होता जा रहा बेमन/कैसे भूल पाऊँगा/ जहां मैं बना बीज से पौधा/ उगा चेतन। ((वही पत्रिका पृष्ठ 119) इस कविता में एक वाक्य बार-बार दुहराया गया है-कैसे भूल पाऊँगा इस वाक्य की आवृत्ति कवि के सघन देश-प्रेम की अभिव्यक्ति कर रही है। देश-प्रेम की शुरूआत स्थानीय प्रेम से ही होती है। अर्थात् अपने गांव से लगाव। अपने कस्बे से लगाव। अपने शहर से लगाव। शायद यही कारण है कि उर्दू के शायर अपने नाम के बाद अपने गांव या शहर का नाम अवश्य जोड़ देते हैं। जैसे मज़रूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, कैफ़ी आज़मी, दाग़ देहलवी आदि।
विजेन्द्र ने अपने नाम के आगे कोई उपनाम नहीं जोड़ा है। उन्होंने तो अपना नाम छोटा कर लिया । वह विजेन्द्र पाल सिंह को भूलकर मात्र विजेन्द्र के नाम से विख्यात हैं। उन्होंने लाभ-लोभ पद-पुरस्कार माइक-माला पर विजय प्राप्त करके अपना विजेन्द्र नाम सार्थक किया हैं। वह व्यवस्था की आलोचना करने के साथ-साथ आत्मसमीक्षा भी करते चलते है। उनके काव्य-गुरू त्रिलोचन ने समझाया था कि कविता कवि से उसका पूरा जीवन माँगती है। इसलिए विजेन्द्र अपने मन के भीतर छिपे एक और मन को टटोलते रहते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि उनका मन पूंजीवाद के पिशाच से समझौता कर रहा हैं। आजकल यह दूषित प्रवृत्ति मार्क्सवादियों में भी प्रचलित है। वे मार्क्सवाद का मुखौटा लगाकर लाभ-लोभ की राजनीति भी खूब किया करते हैं। एक-दो स्वनामधन्य मार्क्सवादी कवि ऐसे भी हैं जो मात्र दो संकलन प्रकाशित होने के बाद ही साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हो जाते हैं। इसके लिए वे नामवर साहित्यकारों को अपने पक्ष में करते हैं और सफल हो जाते हैं। लेकिन विजेन्द्र ने ऐसा नहीं किया। अपने एक सानेट में वे आत्मसमीक्षा करते हुए लिखते हैं-
कहता  है मेरे अंदर का पिशाच मुझसे जब
हतप्रभ होता हूं चाह रहा वह सदा रहूं
अनुगामी उसका देगा मुझको जो चाहूं
जब भी यही जाल है उसका फैलाया अब
मुझे फांसने को नये नये लालच देता है
हर दिन कहता खूब पटेगी हम दोनों की
लगा मुझे भूल हो गई भारी बौनों की
जमात में हर्षित होता हूं बिला वजह।
(पहले तुम्हारा खिलना,  पृष्ठ-61)

उद्धृत सानेट के अंश की व्यंजना यह है कि व्यक्ति का भीतरी मन द्वन्द्वग्रस्त रहता है। अच्छाई और बुराई का संघर्ष अंदर ही अंदर चलता रहता है। कवि विजेन्द्र आत्मसमीक्षा करके पूंजी के पिशाच से बचने का प्रयास निरंतर करते रहे हैं। अपने काव्य-गुरू के समान वह भी बहुत दिनों तक हिन्दी काव्य -जगत् में अलक्षित ही रहे। लेकिन हुआ कब सुरभि के लिए फूल बंधन। फूल की सुगन्ध के समान विजेन्द्र के काव्य की गन्ध भी हवा में व्याप्त हो चुकी है। गुण ग्राहक, आलोचक, पाठक, विद्वान, युवा कवि, कवितानुरागी उनकी कविता के मुरीद हो रहे हैं। इसका कारण क्या है। उत्तर है- उनके विपुल काव्य में लक्षित उनकी ईमानदारी। अपने प्रति और अपने जनपद के जन-जन के प्रति। प्रकृति के प्रति स्वाभाविक अनुराग जो उनके काव्य-चित्रों में अनेक रूपों में लक्षित होता है। उनका विश्वव्यापी विजन है। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ की वसुन्धरा कविता के समान उनकी वसुन्धरा कविता भी देश की सीमाओं से परिसीमित नहीं है। वह संपूर्ण पृथ्वी को रोते हुए देखते हैं। उसकी व्यथा महसूसते हैं और उसे अपनी कविताओं में रचते हैं। अपनी वसुन्धरा कविता में वह कहते हैं- बोझ धरा है सिर पै/ पांव लिये/हाथ सने कुहनी तक/ कितनी सुन्दर वसुन्धरा है। जो कहते धरती सुन्दर है/अलग खड़े हैं/ सने पुते हाथों ने ही /हीरक रत्न जड़े हैं। (धरती कामधेनु से प्यारी, पृष्ठ-46-47) ध्यान दीजिए इस वाक्य पर- सने पुते हाथों ने ही/हीरक रत्न जड़े हैं। क्या आशय है। आशय यह है कि संसार में जो कुछ सौन्दर्य हम देखते हैं उसकी रचना मेहनतकश लोगों ने अपने सने-पुते हाथों से की है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में। यही कारण है कि विजेन्द्र श्रमशील जनों को ही अपना काव्यनायक मानते हैं। यह बात उन्हें अन्य कवियो से अलग करती है। अन्य कवियों में तो आत्ममुग्धता अधिक दिखाई पड़ती है अथवा भाषाई चमत्कार। अथवा अमूर्तन। ऐसी कविता रचते हैं कि अर्थ पकड़ में ही नहीं आता। इस संदर्भ में कुंवर नारायण का काव्य वाजश्रवा के बहाने पढा जा सकता है। लेकिन विजेन्द्र की कविताएं अर्थबोध की दृष्टि से पारदर्शी होती हैं। प्रमाण के लिए अधोलिखित कविता पढि़ए। शीर्षक है लोकनायक।

अन्न ही में है बल, वीर्य/सूर्य के ताप का/हवा के वेग का/जल की लहर का/अग्नि के तेज का/अन्न ही ईश्वर है/कण प्रति कण में /बसी है गति /जो उगाता है खेत को कमाकर/वही है नायक लोक का। ((बनते मिटते पाँव रेत में पृष्ठ-16) मार्क्सवादी विचारधारा से अनुप्राणित यह लघुकविता लयात्मक है। अन्नदाता किसान की पक्षधर है। इसमें अन्न को ही ईश्वर बताया गया है। यह विचार भौतिकवादी दृष्टि से ठीक है। कहावत भी है भूखे भजन न होय गुपाला, जे लेव अपनी कंठी माला। वस्तुतः सारा अध्यात्म-चिन्तन भरे पेटवाले लोगों के लिए ही वरेण्य है। इस लघु कविता में छोटे-छोटे चार वाक्य हैं। कवि ने बढ़ी निपुणता से प्रकृति के पंच महातत्त्वों क्षिति-जल-पावक-पवन-गगन का समावेश कर दिया है। अन्तर्वस्तु और कथन-भंगिमा दोनों की दृष्टि से यह कविता उत्कृष्ट है। हिन्दी के तथाकथित बड़े कवियों के यहां ऐसी उत्कृष्ट कविताएं विरल हैं। विजेन्द्र इसलिए भी बड़े कवि है कि उन्होंने अपने देश की प्राचीन काव्य-परम्परा हिन्दी की काव्य-परम्परा, अंग्रेजी की काव्य-परम्परा के साथ-साथ उर्दूं शायरी का भी ज्ञान अर्जित किया है । लेकिन किसी बड़े कवि की नकल नहीं की है। उससे सीखा अवश्य है और अपने लिए अपना काव्य-पथ अलग निर्मित किया है। पथ शीर्षक कविता में वह कहते हैं- जीर्ण है रथ/घोड़े हैं सबल/खड़ा हूं चौराहे पर/ कहां जाऊं किधर /इनमें से कोई नहीं वो पथ/जिस पर आया हूं मैं चलकर/ उस पर क्या करूंगा जाकर/जिस पर बनी है पदछाप पहले की। ((वही संकलन पृष्ठ-16-17) कहने का आशय यह है कि कवि विजेन्द्र ने निराला, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध की काव्य-परम्परा अपने ढंग से विकसित की है। उनका अंदाजे बयां कुछ और है। पूर्वजों से अलग । अग्रजों से अलग और समकालीनों से भी अलग।

उनकी यह विशेषता उनके विपुल काव्य में लक्षित होती है। उसमें जितनी वस्तुपरकता है उतनी ही आत्मपरकता भी है। विजेन्द्र का मैं उन तक सीमित नहीं है। वह असीमित होकर हम का रूप धारण कर लेता है। हम को इसीलिए उत्तम पुरूष कहा जाता है कि वह अपने साथ सबको लेकर चलता है। उन्हें धरती के कोटि-कोटि अकिंचन धरती जोतनेवालों की चिन्ता सताती है। वे उनसे संवाद करते हुए कहते हैं- तुम दुनिया में असंख्य हो/खनिकों के साथी/सभ्यता के रचयिता/दोनो के संग से ही/ शक्ति होगी पैदा/जो करेगी मुक्त मुझे/ गहन पीड़ाओं से/दरिद्रता से/दासता से/यहां से वहां तक फैले पहाड़/अछूती धरती/आमों के बाग/ठिठुरते, तपते, भीगते/धुंध भरे गांव/ जाने कितने तरसते हैं साफ पानी को/ कोसों से भरकर लाती/जलकलश सिर पर धरे स्त्रियां/श्रम से हारी थकीं/ कितने रेत के ढूहों ने/ कर दिया है विभाजित गांवों को/ कहां तुम सोए हो। ओह छूटे हुए मेरे गांव/ मन से कोसों दूर/पर्वत श्रृंखलाओं से ओझल/सबसे अलग है/तेरे लिए जगह मेरे मन में/तेरा होना उन भूदृश्यों की तरह/जिन्हें रचता हूं चित्रों में/तेरे सपने/ओ हलधर/जरूर होंगे पूरे एक दिन। ((बेघर का बना देश पृष्ठ-40-41-42) ध्यान दीजिए कि इस कविता में विजेन्द्र ने अपनी कर्मभूमि राजस्थान और अपनी जन्म-भूमि धरमपुर दोनों के हलधरों को संबोधित किया है। इस कविता के मूल में करूणा की भावना है। और साथ ही साथ इस क्रूर व्यवस्था को बदलने की आकांक्षा भी। आज कितने ऐसे कवि हैं जो ऐसी आकांक्षा अपनी कविताओं में व्यक्त कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि जो कवि व्यवस्था का प्रतिरोध करता है, व्यवस्था उसका दमन करती है। इसलिए कायर कवि प्रतिरोध के सौन्दर्य से दूर भागते हैं। इस दृष्टि से विजेन्द्र योद्धा कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं। उन्हें दुख-दग्ध धरती बेचैन करती रहती है। अतः वह धरती दग्ध है कविता में कहते हैं- यह धरती दग्ध है/ वह अंदर से तप रही है/असंख्य दिल धड़क रहे हैं/उदास, प्रफुल्लित, बेचैन /मैं अपने सपनों को कह नहीं सकता/उनकी शक्लें जहां तहां बन रही है/बड़े-बड़े पहाड़, चट्टानें और कंकड़ अंदर पिघल रहे हैं/वे भले ही तुम्हें न दिखें/लेकिन उनकी दहल/पहियों की तेज रफ्तार के साथ/सुन सकते हैं। वह दग्ध है पोर-पोर/यह देखो/ठीक तुम्हारे पांव के पास/ताजा और गर्म खून गिरा/दिन रात मेरी धरती भीग रही है। (ऋतु का पहला फूल, पृष्ठ-87) इस कविता में कवि ने दुख से दग्ध धरती-पुत्रों की बेचैनी और उनके प्रतिरोध की ओर संकेत किया है। वास्तविकता यह है कि ऐसा प्रतिरोध न तो टी.वी. पर दिखाया जाता है और न ही समाचार पत्रों में प्रकाशित होता है। कारण यह है कि इलैक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया दोनों ही व्यवस्था के अधीन हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता सपने की बात हो गई है। अब गणेश शंकर विद्यार्थी जैसा निर्भीक पत्रकार दिखाई नहीं पड़ता है। सभी चैनल अपना-अपना स्वार्थ साध रहे हैं। किसानों और मजदूरों की वास्तविक दुर्दशा दिखाने में भय लगता है। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सत्यजीत रे पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे तो भारत की गरीबी ही दिखाते हैं। क्या वास्तविकता दिखाना कलाकार का धर्म नहीं है। है जरूर है। इसीलिए विजेन्द्र बार-बार ऐसे चित्र प्रस्तुत करते हैं, जिनमें अन्याय है, दमन है, शोषण है, बलात्कार है, अनाचार है, भ्रष्टाचार है। सत्ता की निरंकुशता है। वर्तमान भारत की शोषणमूलक व्यवस्था का समापन करने के प्रयोजन से विजेन्द्र ने सुराज शीर्षक लम्बी कविता रची है। जून 2013 में। इस कविता में चुनाव के माहौल का वर्णन है। विजेन्द्र ने इस कविता में एक ऐसा विकल्प तैयार किया है जो अपराध के राजनीतीकरण का प्रखर विरोध करता है। प्रतिपक्ष दबंग गुण्डे बाबू खां को परास्त करके विजय प्राप्त करता है। इससे पीडि़त जनता प्रसन्न होती है। इस कविता के अन्त में कवि निष्कर्ष रूप में कहता है- धीरे-धीरे बढ़ा सुराज का ढांचा/मिलते हैं जन जन से/ सुनते हैं उनके दुख सुख/नहीं बूझता अब कोई/गुण्डे बाबू खां को/ मां भी उसकी/लतियाती है उसको/ पूंछ दबाये घूमा करता है/ जैसे तैसे पेट भरा करता है/ न कोई डरता उससे/ न कोई भय माने उसका/ बड़े बड़े भी सुन्न पड़े हैं/ भीतर भीतर कतर व्यौंत चलती है/ आस्तीन में नागिन पलती है/ सत्ता भी डरती है/ अफसर, नेता, ठेकेदार, बोहरे/सभी मानते लोहा सुराज का/सपना कैसे पूरा हो/राष्ट्रपिता के रामराज का।

इस संपूर्ण कविता में विजेन्द्र ने वर्णनात्मक एवं कथात्मक शैली अपनाई है। नागार्जुन की लम्बी कविता हरिजन गाथा की तरह। कविता में एक ओर शोषक पक्ष है दूसरी ओर शोषित पक्ष। दूसरा पक्ष एकजुट होकर पहले पक्ष का प्रखर प्रतिरोध करता है। चुनाव का परिणाम उसके पक्ष में जाता है। कवि ने इस विकल्प से यह विचार व्यक्त किया है कि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपराध के राजनीतीकरण की प्रवृत्ति से बचाना है। और जनता के सच्चे और खरे प्रतिनिधियों को चुनाव में वोट देकर विजेता बनाना है। जब बहुमत ईमानदार विजेताओं का होगा, तब राजनीति में बदलाव आएगा। लेकिन आजकल ईमानदारी बहुत कम दिखाई पड़ती है। दुष्यन्त ने ऐसी बेईमान लोकतांत्रिक व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा था-  
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है/ हर किसी का पांव घुटनों तक सना है।
मत  कहो  आकाश में  कोहरा  घना है/ यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
उस समय आपातकाल था। बोलने की स्वतंत्रता छीन ली गई थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। हां क्रूर व्यवस्था आज भी बरकरार है। अतः इसके खिलाफ बोलना प्रत्येक लोकधर्मी कवि का धर्म है। विजेन्द्र की कविताओं में बोलना क्रिया का प्रयोग अनेक बार हुआ है। विजेन्द्र कहते हैं कि बोलने से सन्नाटा टूटता है। व्यवस्था दहलती है। अतः जनशक्ति को एकजुट होकर बोलना चाहिए। सुराज कविता में यही विचार लयात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है। इस कविता में आदि से अन्त तक पुराने छन्द रोला की लय मुक्त रूप में है। जन कवि नागार्जुन ने भी क्रूर सत्ता का विरोध करते हुए कई दोहे रचे थे। उनमें से यहां दो दोहे उल्लेखनीय हैं।
खडी हो गई चांप पर, कंगालों की हूक ।
नभ में विपुल विराट सी, शासन की बन्दूक ।।
जली ठूंठ पर बैठकर,  गई कोकिला कूक ।
बाल न बांका कर सकी, शासन की बन्दूक ।।

पहले दोहे में क्रूर सत्ता का आतंक है। कवि ने असंख्य बन्दूकों को एक विराट् बन्दूक के रूप में प्रस्तुत किया है, जो आकाश में स्थित है। नीचे खड़ा है कोटि-कोटि कंगालों का समूह। बन्दूक ने उसे चांप लिया है चारों ओर से। लेकिन कवि जनता के प्रतिरोध की भी अभिव्यक्ति करता है। दूसरा दोहा इसका प्रमाण है। जनता की विजय का गीत गाकर कोकिला कूकती है। और यह घोषणा करती है कि बाल न बांका कर सकी शासन की बन्दूक। विजेन्द्र ने अग्रज कवि नागार्जुन से प्रतिरोध करना सीखा है। फिर सवाल खड़ा होता है कि आज जो बड़े कवि माने जाते हैं और जिन्हें बड़े-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, वे क्या जनता के पक्षधर हैं। क्या उनकी कविता में प्रतिरोध का सौन्दर्य झलकता है। नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में विजेन्द्र अद्वितीय कवि के रूप में सामने आते हैं। 

विजय गुप्त ने साम्य 27 में विजेन्द्र की पांच कविताएं अपनी टिप्पणी सहित छापी हैं। विजेन्द्र का वैशिष्ट्य बताते हुए उन्होंने लिखा है- बाहर और भीतर के लगातार चढ़ते और जलते तापक्रम में दिन-रात जलना और उस आग को जतन से बचाए रखना ही एक साहित्यकार का पहला और आखिरी कर्तव्य है। साहित्य के इसी असाधारण काम और सच को मुक्तिबोध ने अंधकार की सियाह आग और भुतही दहनशीलता कहा है। वर्तमान हिन्दी कविता-संसार में इसी आग और दहनशीलता के बड़े कवि हैं विजेन्द्र। उनका काव्य-सत्य जीवन के कठोर और क्रूर यथार्थ का आत्मिक भावांकन और ध्वन्यात्मक आलेखन है। (पृष्ठ संख्या-21) विजय गुप्त के इस कथन की व्याख्या अपेक्षित है। विजेन्द्र वर्तमान जीवन की वास्तविकता के कवि है। वे मार्क्सवादी जीवन-दृष्टि से अपने वर्तमान को देखते-परखते हैं। समाज में उभरने वाली जनशक्ति को पहचानते हैं। उसके दुख-दर्द का संवेदनात्मक निरूपण करते हैं। साथ ही साथ जनशक्ति के प्रतिरोध का भी। वे मुक्ति-संग्राम की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए इतिहास से संघर्षशील नायकों जैसे बिरसा मुण्डा, तिलका मांझी के संघर्ष पर कविताएं रचते हैं। पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों को वर्तमान के संदर्भ में अपनी जीवन-दृष्टि से पुनः रचते हैं। कौन नहीं जानता है कि आजकल दुनिया के कोटि-कोटि लोग भूखे और नंगे हैं। दूसरी ओर क्रूर पूंजी अपनी सुख-सुविधाओं पर पानी की तरह पैसा बहाती है। विजेन्द्र इस विसंगति को देखकर भूख का भूगोल रचते हैं। और आत्मपरक ढंग से समष्टि के मनोभावों की अभिव्यक्ति ओजस्वी भाषा में इस प्रकार करते हैं- भूख मेरी मजबूरी है/पराजय नहीं/तुम मुझे डराके दास बनाना चाहते हो/मैं तुम्हारे तलवे चाटूं/ यह मुमकिन नही/ मेरे पसीने से ही/खड़ी हुई हैं भव्य इमारतें/पकते हैं धान/ धड़धड़ाती मशीनों में/ कसे जाते हैं बोल्ट/ अपनी आत्मा को बचाने के लिए ही/भूख को पचाया है/सुर्ख लोहा होने तक/ तुमसे लड़ता रहूं अन्त तक/तोंड़ता रहूं कठघरे/पत्थर की बेरहम दीवारें/ तुम्हारे सुनहरे जाल/ चक्रव्यूह .....लौह श्रृंखलाएं/ भूख का ही पवित्र नाम है अग्नि। (साम्य 27 पृष्ठ-23) इस कवितांश का अर्थ पारदर्शी है। कवि व्यवस्था को ललकार रहा है। श्रम के पक्ष में बोल रहा है। प्रतिरोध व्यक्त कर रहा है। और भूख को अग्नि की संज्ञा दे रहा है। आशय यह है कि कोटि-कोटि भूखे-नंगे ही जब एकजुट होंगे, तब भारत मां प्रसन्न होगी। भारत मां का अर्थ कोई कल्पित मूर्ति नहीं है। वस्तुतः वह सम्पूर्ण भारत के जन-गणों एवं उसके प्राकृतिक परिवेश का समन्वित नाम है। विजेंन्द्र बार-बार जन-गण-मन को आंदोलित करते है कि गाओ गान। क्योंकि तुम्हारे प्रतिरोध के गान से ही व्यवस्था दहलेगी- गाओ तुम अपने गान /खेतों में जैसे उगते धान/ऐसे गाओ/जिससे पुष्पित हो/धरती का मान/देखो सूर्योदय की अरूणिम आभा/ बनी रहे आगे बढ़ने की थान/ झंकृत होगा रिक्त हृदय भी/ध्वनि में बोलेगी आन/चट्टानों से निःसृत निर्झर/ दोआबी धरती है उर्वर/मिलकर खोजेंगे मणियों की खान। ((वही पत्रिका पृष्ठ-25) ध्यान दीजिए इस कविता के कथ्य और कथन की भंगिमा पर। न वर्ण की आवृत्ति से ध्वनि सौन्दर्य झलक रहा है। कवि आशावादी है, इसलिए मांगलिक भविष्य का सपना देखता है और कहता है कि मिलकर खोजेंगे मणियों की खान। क्या आशय है कवि का। यह है कि कोटि-कोटि किसान और मजदूर मिलकर देश का सड़ा हुआ ठट्टर तोड़ेंगे। शोषित व्यवस्था के स्थान पर समतामूलक समाज की स्थापना करेंगे। जीवन की मणियों की खान तलाश करेंगे। यहां रूपकात्मक भाषा है। खनिक ही खान खोदते हैं और बहुमूल्य पदार्थ निकालकर लाते हैं। इसी प्रकार दलित-शोषित जन नवीन जीवन-मूल्यों की स्थापना करेंगे। ऐसे मूल्य जो सभी प्रकार के भेद-भाव समाप्त करेंगे। काले-गोरे का भेद। अमीर-गरीब का भेद। ब्राह्यण-शूद्र का भेद। नर-नारी की असमानता का भेद। पुत्र-पुत्री की असमानता का भेद। हिन्दू-मुसलमान का भेद। ऊँच-नीच का भेद। देशी-विदेशी का भेद।

ऐसे समाज का सपना देखने वाले विजेन्द्र अपनी कविताओं में साम्प्रदायिकता के दानव का विरोध उठे गूमड़े नीले संकलन में करते हैं। उनकी एक लम्बी कविता है जुम्मन मियां। वह कवि के समान धरमपुर के ही निवासी हैं। उनकी एक टाँग खौलते कोलतार से जल चुकी है। इस कविता में उनकी जली टांग प्रतीक के रूप में हमारे सामने आती है। और अपने अर्थ की व्यापकता बताती हुई साम्प्रदायिक दंगों की ओर सकेत करती है। आजादी के बाद हुए सांप्रदायिक दंगे। उसके बाद बार-बार हुए दंगे। गुजरात के दंगे। इस कविता में कवि ने अल्पसंख्यक समुदाय के विस्थापन की ओर भी संकेत किया है और यह विचार व्यक्त किया है जली टांग को विस्थापित नहीं किया जाए। उसे वहीं लगाया जाए जहां से उसका सम्बन्ध है- जुम्मन, सब हुए अलग-अलग/लोगों ने रास्ते बदल दिए/ पहचानें खो दीं/ खड़े दिखे अफसोस की शक्ल में/ मुंह बिसूरे हुए/ कहां खोदकर लगाएं इस जली टांग को/ आगे बन सके वृक्ष फलदार/सभी बोले चहककर / इसी दोमट में/ इसी खादर में/ इसी भूड़ा में/इसी निचाट में/ इन गूंजती सुनसान घाटियों में/राजधानी के गमलों में मत लगाओ इसे/ जड़ें मिलती नहीं कहीं/जो हो सके पहचान उपजाऊ जमीन की। कवि आगे भी कहता है। जुम्मन फिक्र मत करो/देश बहुत बड़ा है/अच्छे आदमी हैं समाज में/ हर राज्य नहीं है गुजरात/डरो मत /देह में पचन-पाचन जारी है/ फल पकने में समय लगता है/ पहले बीज तो बोने दो। (शीघ्र ही प्रकाश्य संकलन में शामिल होने वाली) इसी प्रकार विजेन्द्र की नारी चरित्र तसबीरन सांप्रदायिक दुर्भाव पर टिप्पणी करती हुई कहती है- सोच-सोच में समय गया इतना /फूलों से गुजर कहां/ लगा लगा कलमें /इत्ते सारे बाग लगाए/अनगिन अब तक /दुल्हा-दुल्हन को/गजरे पोए/ हार बनाए/फिर भी हम पर शक करते हैं/अहमद भैया को कटुआ कहते/अब्बा से बेगार कराते/कहां जाएं/ ये मुलुक हमारा भी है /क्या। (उठे गूमड़े नीले पृष्ठ-61-62)। सांप्रदायिकता का विरोध करने के लिए हिन्दू-मुसलिम सौहार्द अनिवार्य है। भारत मां की ये दोनों आंखें हैं। यदि एक आंख दुखेगी तो दूसरी रोएगी। इसलिए देश की आन्तरिक एकता के लिए हिन्दू राष्ट्र का नारा बहुत खतरनाक है। हमें हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर हिन्दी राष्ट्र का सपना देखना चाहिए। उसे साकार करना चाहिए। हिन्द देश के निवासी सभी जन एक हैं/रंग रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं। हिन्द में रहनेवाला प्रत्येक नागरिक हिन्दी है। हिन्दुस्तानी है। भारत के नाते भारतीय है। विदेशों में हमारी पहचान हिन्दू-मुसलमान के रूप में नहीं होती है। हिन्दुस्तानी के रूप में होती है। अथवा भारतीय के रूप में। इसलिए संविधान का सम्मान अनिवार्य है जिससे धर्म निरपेक्षता की रक्षा हो सके। इसका मतलब यह नहीं है कि हम धर्म का त्याग कर दें। यह है कि हम राजनीति से धर्म का गठबंधन न करें। धर्म के जो नैतिक मूल्य हैं, उन्हें स्वीकारें।

विजेन्द्र पूर्ण कवि हैं, क्योंकि वह श्रमशील मानव के साथ उसके प्राकृतिक परिवेश का पर्यवेक्षण करके उसका सौन्दर्य निरूपित करते हैं। उनकी कविताओं में वर्षा और बादलों के अनेक बिम्ब हैं। शरद् ऋतु के आकर्षक चित्र हैं। शीत की कंपकपाती ठंड है। कुहासे से ढका वातावरण है। पतझर के परिदृश्य हैं। वसन्त का आगमन उन्हें प्रसन्न करता है। भीषण ग्रीष्म के भी चित्र उन्होंने बड़ी शिद्दत से अंकित किए हैं। उन्हें ऋतु का पहला फूल बहुत आकृष्ट करता है। किसी भी फूल का पहले पहल खिलना उनके लिए नयन-महोत्सब है। वे प्राकृतिक परिवेश में फूलों के साथ कांटे भी देखते हैं। महाप्राण निराला की प्रसिद्ध कविता कुकुरमुत्ता के समान कुकुर भाँगरा पर लम्बी कविता खड़ा मेड़ पर कुकुरभांगरा रचते हैं। कुकुर भांगरा को चिरचिटा भी कहा जाता है। यह उपेक्षित खरपतवार है। स्वयं उगती है। कवि ने इसे अपने कवि के प्रतीक-रूप में ढाला है। निराला की कविता कुकुरमुत्ता के अन्त में कुकुरमुत्ता खा लिया जाता है। उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। लेकिन विजेन्द्र की कविता खड़ा मेड़ पर कुकुरभांगरा में कुकुरभाँगरा अपना अस्तित्व बनाए रखता है। इसी प्रकार करील के कुंजों को उन्होंने चैत की लाल टहनी कहा है। कुछ दुर्मुख आलोचकों ने इसे चैत की उदास लालटेन कहा। कुछ ने चैत की उदास टहनी कहा। ईष्र्या के वशीभूत होकर। कवि को नीचा दिखाने के लिए। लेकिन इतिहास विधाता ने अब चैत की लाल टहनी को वागर्थ की सुषमा बना दिया है। इस संकलन में उनकी प्रेम कविताएं हैं, जो अपने आस-पास के संपूर्ण जन-जीवन और उसके परिवेश को भी शामिल करती हैं। चैत की लाल टहनी शीर्षक कविता में कवि ने निर्भीक भाव से नेहरू युग की मिश्रित अर्थव्यवस्था की तीखी आलोचना की है- एक आदमी खरीदता है काले धन से/सारे फलों का रस /एक आदमी पीता है/मिश्रित अर्थवयवस्था की छूट से। (कवि ने कहा, पृष्ठ संख्या-33-34)। उल्लेखनीय है कि नेहरू के युग में हमारे देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था थी। राष्ट्रीय महत्त्व के उद्योग सरकारी सैक्टर में रहते थे और अन्य निजी सैक्टर में। लेकिन आजकल ऐसा नहीं है। सरकार धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण समाप्त कर रही है। और निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। इसके परिणामस्वरूप आम लोगों की दिक्कतें बढ़ती चली जा रहीं हैं। मंहगाई बढ़ने का एक कारण उदारीकरण और निजीकरण की दुर्नीति है।  

कृषि कार्य वर्षा पर निर्भर है। समय पर वर्षा होना अनिवार्य है। नही तो धान की फसल सूख जाती है। अतः कवि कहता है- मेरे घर /सूख रहे हैं धान/बुला रही तुझको धरती/सुना, सुना /ओ श्याम पपीहा/अपने बादर गान/लगता सावन अभी न आया/लता उदास/सूखी काया/यक्ष गान मैंने ही गाया/ टूटा मेरा मान/ओ रे बादर /टूट रही है आन। (घना के पाँखी, पृष्ठ-71)। इस कविता में यक्ष संज्ञा पद द्वारा कालिदास के मेघदूत के नायक यक्ष की ओर संकेत किया गया है, जो मेघ को दूत बनाकर अपना संदेश अपनी प्रिया तक पहुंचाता है।

आजकल हमारे समाज में पर्यावरण निरंतर प्रदूषित हो रहा है। यमुना तो पहले से ही गंदले नीर के रूप में परिवर्तित हो गई थी। और अब गंगा भी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। हरिद्वार से गंगासागर तक। आजकल हमारी सरकार गंगा को निर्मल बनाने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन सर्वोच्च नयायालय ने कहा है कि ऐसी गति से गंगा निर्मल नहीं हो पाएगी। विजेन्द्र पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक कवि हैं। नदियों का प्रदूषण उन्हें चिंतित करता है। उन्होंने एक लम्बी कविता रची है। गंदला नीर यमुना का । इसमें कवि ने गंदली यमुना के वास्तविक चित्र अंकित किए हैं। एक चित्र देखिए- गंदा किनारा यमुना का/ मटमैला/ कीचड़ भरा गंदला/घूमते अधनंगे भिखारी बने अपराधी/ भूख से बेदम/आए बंग से भागे/उतारने बोझ बुरे कर्मों का। और आगे देखिए- गए अधजली लाशें छोड़ जो/बहा दीं डोम ने /ले लिया कफ्-फन /बुझा ली लकड़ी/ छेक कर कोयले कच्चे/ किया ध्ंधा अपना। (ऋतु का पहला फूल पृष्ट-198)। यह कविता इकहरी नहीं है। इसमें दिखाया गया है कि यमुना के नीर के समान ही हमारे सामाजिक जीवन की धारा भी गंदली हो गई है। इसी प्रकार उन्होंने एक और कविता गंगा पर भी लिखी है। क्या गंगा भी होगी लुप्त। इस शीर्षक की ध्वनि यह है कि जिस प्रकार जल से भरी हुई सरस्वती युगों पहले सूख गई थी, क्या उसी प्रकार गंगा भी विलुप्त हो जाएगी। कवि अफसोस भरे स्वर में कहता है- ओ गंगा, कौन बचाएगा/उन क्रूर हाथों में फंसी तुझे/ सदानीरा प्रवाहित होना ही/ जीवन है नदी का/ मैं जानता हूं क्रूर और स्वार्थी/ करेंगे विषाक्त तुझे भी विवश/ लुप्त होने को यहीं कहीं/ तेरी तरंगों से ही/ दोआबा हुआ है उर्वर/ जीवित हैं तेरी रगों से अनेक/ जलधाराएं, नदसर, छोटी सरिताएं/ ओ गंगा मेरी मां/ सागर में मिलने से पहले। आगे कवि कहता है, मैंने रोका है तेरी धारा को/ बांधों से कसी हैं तेरी भुजाएं/ गंदलाते हैं तेरे पवित्र जल को/जहरीले रसायन से/बनती जाती है तू/लावारिस लाशों की वाहिका/मेरे अनाड़ीपन से हुआ है/तेरा पवित्र जल दूषित/ कहां खोजूंगा तुझे भविष्य में। इस कविता की विशेषता यह है कि कवि गंगा प्रदूषण का उत्तरदायी स्वयं को मानता है। ध्वनि यह है कि गंगा-भक्तों ने भी गंगा को मैला किया है। उसके किनारे शव जलाकर बड़े-बड़ उद्योगपतियों ने अपने-अपने करखाने का मलजल गंगा की धारा की ओर बहा दिया है। इसी प्रकार हरिद्वार जैसे पवित्र नगर में शहर भर की गंदगी गंगा की धारा में आकर गिरती है। काशी में तो गंगा का रूप-रंग और भी अधिक गंदला है। गंगाजल का आचमन भी अब वर्जित माना जाने लगा है। गंगा तभी निर्मल होगी, जब गंगा के किनारे बसनेवाले सभी जन एकजुट होकर सफाई अभियान में जुटेंगे। सरकारी स्तर पर जो काम होते हैं, उनमें ढीलमढाल बहुत होती है। विजेन्द्र की पर्यावरण विषयक चिन्ता उनकी एक और लम्बी कविता मैंने देखा है पृथ्वी को रोते में भी व्यक्त हुई है। यह कविता कवि के गम्भीर अध्ययन-चिंतन-मनन का कलात्मक निदर्शन है। अपनी लोकधर्मिता के कारण विजेन्द्र को संपूर्ण पृथ्वी की चिन्ता सताती है। इस कविता में कवि ने धरती मां से आत्मीय संवाद किया है। उसकी चिन्ता यह है कि पृथ्वी की रक्षा कैसे हो। आजकल पूंजीवादी व्यवस्था पृथ्वी रूपी गाय का अंधाधुंध विदोहन कर रही है। उसके जंगल काटे जा रहे हैं। खनिज संपदाएं लूटी जा रही हैं। सदानीरा सरिताएँ धीरे-धीरे सूखती जा रही है। जल और वायु दोनों प्रदूषित हो गए हैं। ऐसी परिस्थतियों में यह पृथ्वी कवि को रोती हुई दिखाई पड़ती है। शिवेतरक्षतये काव्य-प्रयोजन से प्रेरित होकर विजेन्द्र अपनी सात्विक चिन्ता प्रश्नात्मक शैली में व्यक्त करते हैं- कैसे कर पाऊंगा उसका बखान/ देखता हूं उसे कांपते/ सिसकते, रोयों से सांस लेते/किया है जिसे तुमने रौंदकर गारा/ वह चुप है/ खूंदा है जिसे तुमने/विषैले खुरों से/ देखे हें मैंने ओस-कण/ सूखते हरे तिनकों की नौकों पर/ बिना बताए अपनी गाथाएं/ कैसे कर पाऊंगा उसका बखान/ कुत्तों, सियारों, भेडि़यों, लकड़बग्घों के लिए/ वह जैसे मरे डाँगर की देह है/ उनको, जो तरसते हैं रोटी को/ एक गरीब रिरियाती मां /(मांगती ) अधसिकी रोटी का टुकड़ा /खोद के उसकी सतह/उड़ाया गया पहाड़ों को डायनामाइट से/वह चुप रही/देखा उसे सिसकते, कराहते, बिलखते/ मन्द मन्द हवा की लहरों में। ((मैंने देखा है पृथ्वी को रोते पृष्ठ-41-42)। विजेन्द्र ने इस कविता का प्रारम्भ ट्रेजिक टोन से किया है। समापन दायित्व बोध से। कविता का प्रश्नात्मक समापन पाठक को पर्यावरण की रक्षा के प्रति सचेत करता है। विजेन्द्र ने अपने संश्लिष्ट अंतर्वस्तु और कथन-भंगिमा से युक्त ऐसी उत्कृष्ट कृति की रचना की है, जिससे समकालीन कविता समृद्ध हुई है।

उपर्युक्त उद्धृत कवितांश में कुत्तों, सियारों, भेडि़यों, लकड़बग्घों संज्ञा पदो के बहुवचन रूप समाज के शोषकों के लिए प्रयुक्त किए गए हैं। बहुबचन के रूप में प्रयुक्त सभी प्रतीक इस तथ्य के सूचक हैं कि वर्तमान क्रूर समाज में पृथ्वी को नोचने-खाने वाले दुष्ट लोग असंख्य हैं। इनकी दुष्टता का प्रतिरोध होना चाहिए। सवाल उठता है प्रतिरोध कैसे सम्भव होगा। विजेन्द्र जी का उत्तर है।संगठित जनशक्ति के बल पर। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काव्य में लोकमंगल की स्थापना के लिए दो भाव अनिवार्य ठहराए हैं- करूणा और प्रेम। उनका कथन है कि करूणा की गति रक्षा की ओर होती है। और प्रेम की रंजन की ओर। सर्वप्रथम करूणा अनिवार्य है। आचार्य शुक्ल के अनुसार करूणा से प्रेरित कवि अपना सम्बन्ध सात्विक क्रोध से जोडता है और फिर अन्याय का प्रतिरोध डटकर करता है। रामायण में बताया गया है कि राम का सात्विक क्रोध कालाग्नि के समान है। राम भुजा उठाकर प्रण करते हैं कि मैं धरती निशिचर विहीन करूंगा।विजेन्द्र ने अपने विपुल काव्य में करूणा और प्रेम दोनों मनोभावों की अभिव्यक्ति की है। करूणा से प्रेरित होकर वह अपने जनपद के अपने प्रदेश के अपने संपूर्ण देश के शोषित जनों के पक्षधर के रूप में सामने आते हैं। और उन्हें उद्बोधित करते हैं कि संगठित होकर बोलो। बोलने से सत्ता दहलती हैं। हमने ऊपर बताया है कि विजेन्द्र ने कोटि-कोटि भूखे-नंगो के प्रति करूणा व्यक्त करते हुए कविताएं रची हैं। अपने इसी भाव को व्यापक रूप देने के लिए उन्होंने अग्नि पुरूष नामक काव्य नाटक भी रचा है। (सन् 2006 में प्रकाशित) इस काव्य नाटक का कथाक्रम महाभारत से उत्खनित किया गया है। कहा जाता है कि किसी समय कृष्ण अर्जुन के साथ यमुना विहार को गए। जब वे वहां उपस्थित थे, तब एक तेजस्वी पुरूष आकर बोला मुझे अन्न दो। मैं भूखा अग्नि हूं । कवि ने खांडव-वन-दहन के प्रसंग पर उपर्युक्त काव्य नाटक रचकर समकालीन अमरीकी साम्राज्यवाद का प्रबल विरोध किया है। सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया एक ध्रुवीय हो गई है। अर्थात् पूरी दुनिया में अमरीका का वर्चस्व व्याप्त है। आजादी से पहले भारत व्रिटेन का उपनिवेश था। लेकिन अब भारत जैसे विकाशसील राष्ट्र अमरीकी दबाव में आकर जन-विरोधी नीतियां अपना रहे हैं। उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण ने भारत को आर्थिक रूप से अमरीका का उपनिवेश बना दिया है। किसानों की आत्महत्याएं अप्रत्यक्ष रूप से इसी का दुष्पिरणाम हैं। इस काव्य नाटक में अग्नि कोटि-कोटि भूखे लोगों का प्रतीक है। कृष्ण और अर्जुन उसके सहायक हैं। देवराज इन्द्र साम्राज्यवादी अमरीका का प्रतीक है। खांडव वन इन्द्र का उपनिवेश है। इन्द्र की उर्वशी उसके विलास का प्रतीक है। अग्नि संगठित जनशक्ति के बल पर इन्द्र पर विजय प्राप्त करता है। खांडव वन जलने लगता है। अग्निपुरूष की बुभुक्षा शान्त होती है। सभी श्रमजीवी जन प्रसन्न होते हैं और सामहिक रूप से आजादी का गीत गाते हैं- होता दहन........होता दहन.......होने दो/अग्नि हमारा अपना है/जिसने किया दहन खांडव वन/कृष्ण और अर्जुन अपने हैं/ उन्हें मिलेगा यश/वे लड़े हैं हमारे पक्ष में/धरती होती है मुक्त। ध्यान दीजिए यहां कवि ने क्रान्ति की संक्षिप्त रूपरेखा और उसका शुभ परिणाम प्रस्तुत कर दिया है। यहां धरती संज्ञा पद संपूर्ण शोषित धरती के लिए प्रयुक्त हुआ है। संगठित जन-बल के आधार पर वह मुक्त हुई है। वर्तमान भारत में भी ऐसे ही मुक्ति- संग्राम की आवश्यक्ता है। वर्तमान क्रूर पूंँजीवादी व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने के अलावा और कोई  दूसरा रास्ता  नहीं है। समतामूलक समाज में ही कोटि-कोंटि भूखे-नंगे खुशहाल जीवन बिता सकते हैं। इस काव्य नाटक में कवि ने मार्क्सवादी चिन्तन का समावेश निपुणता से किया है। कृष्ण कहते हैं- बीज नष्ट होकर ही/होता है द्विपत्र/ फोड़कर धरती/होता है अंकुर उदित/पदार्थ का स्वभाव है। नाटक के अन्त में व्यास का स्वगत कथन है। वस्तुतः इस कथन में कवि का चिन्तन व्यक्त हुआ है। कवि ने अपने इतिहास से जुड़कर मुक्ति के लिए रास्ता खोजा है। और वह यह भी कहता है- खोदता उर्वर धरती, आकाश और जल/रोपने को नया युग बीज/देखता हूं प्रवाहित अजस्र स्त्रोत नये-नये। (अग्नि पुरूष, पृष्ठ-103) यहां रोपने को नया युग बीज में रूपकात्मक भाषा है। कवि क्रूर व्यवस्था का समापन करने के उपरान्त नये युग के लिए नये जीवन-मूल्यों के बीज बोना चाहता है।

इसी प्रकार विजेन्द्र लम्बी कविता मैंने देखा है पृथ्वी को रोते में दुख-दर्द से दग्ध धरती के प्रति अपनी करूणा व्यक्त करते हैं। और दायित्व बोध का स्मरण करते हुए यह चिन्ता व्यक्त करते हैं- मल और मलवा ले जाती हैं नदियां/क्यो नहीं रूक पाता प्रदूषण समुद्र का/नदियों का/जीवन का/क्यों रोती है धरती मां/क्यों होता जाता हूं हिंस्र पशु बेलगाम/रात दिन तुम्हारे कर्मों से/होकर विक्षुव्ध। (पृष्ठ-89-90) कहने का आशय यह है कि कवि करूणा से प्रेरित होकर धरती के अन्ध विदोहक पूँजीपतियों के प्रति अपना अमर्ष व्यक्त करता हैं। उसका कहना है कि पूंजी के लाभ-लोभ के कारण ही अन्य लोग भी धरती के प्रति हिंसक पशु बन गए हैं। यह पशुता बंद होनी चाहिए अन्यथा धरती का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि पर्यावरण के संतुलन से धरती का अस्तित्व बचाया जा सकता हैं। ठिठुराती रात लम्बी कविता के माध्यम से कवि ने कोटि-कोटि बेघरबार लोगों के प्रति चिन्ता व्यक्त की है। ठिठुराती रात में असंख्य जन मौत का शिकार हो जाते हैं। क्यों। उत्तर है।वर्तमान व्यवस्था की अव्यवस्था, जिसमें सर्वत्र असमान वितरण है। सारांश यह कि ठिठुराती रात शीर्षक लम्बी कविता केवल बारह घंटे अथवा  चैबीस घंटे की रात नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि यह वर्तमान क्रूर व्यवस्था के शीतकाल की ऐसी लम्बी रात है जिसका समापन अभी तक नहीं हुआ है। लेकिन अब समय आ गया है कि अब इसे समाप्त किया जाए। उभरती हुई जनशक्ति के बल पर। क्योंकि रोजी-रोटी के लिए आदमी हमेशा लड़ता रहा है। इतिहास इसका साक्षी है। इसी प्रकार पूस का पहला पहर नामक लम्बी कविता में भी मानवीय करूणा की व्यापक अभिव्यक्ति हुई है। कविता का प्रारम्भ जयपुर महानगर के कुहरीले दृश्य से होता है। कवि वर्तमान के अनेक कारूणिक दृश्य रूपायित करता आगे बढ़ता है। बात जब निकलेगी तब दूर तलक जाएगी। इसका अनुसरण करते हुए कवि ने अपनी अंतर्वस्तु का विस्तार किया है। और दिखाया है कि पूँजीवादी समाज में भोगवाद है। अपसंस्कृति का वर्चस्व है। अमीरों की संवेदनशून्यता है। शोषित समाज का गहन विषाद है। साथ ही साथ उसका प्रतिरोध भी। पूंजीवादी समाज की अनेक विकृतियां पाठक के मानस में घृणा की तरंगे जगाती हैं। यह कवि की सफलता है। प्रत्येक वर्णन दूसरे वर्णन से जुड़कर श्रृंखला बनाता है। और यह श्रृंखला समापन बिन्दु पर पहुँचती है। कवि ने समाज के शोषित जनों को जाग्रत किया है। ऐसा ही विचार कवि ने एक और लम्बी कविता लोकतंत्र का तपता लोहा में भी व्यक्त किया है। इस कविता में भी जीवन के अनेक चित्र हैं। कवि की सहानुभूति खिन्न जनों के प्रति है। इसलिए वह कहता है- ओ भगवान भास्कर/ तू उनके बारे में भी सोच/जो छावन और पाटौर बिना/मेह में इधर-उधर भागते हैं/उस समय उन्हें/सघन पेड़ भी/चुचाती बूंदों से भिगोते हैं। (वसन्त के पार, पृष्ठ-122) इस कविता में भी मानवीय करूणा की व्यापक अभिव्यक्ति लक्षित होती है।

विजेन्द्र ने अपने जीवन-संघर्ष पर आधी सदी नामक लम्बी कविता रची है। यह आत्मपरक है। इसमें कवि ने अपने परिवार के लोगों के सामने सामन्ती जीवन मूल्यों का विरोध किया है। छात्र जीवन में ही उनका विवाह हो गया था। श्रीमती ऊषा उनकी पत्नी का नाम है। उन्होंने पति की  उच्च शिक्षा के लिए अपने गहने त्याग दिए। लेकिन शादी के तेरह बरस बाद तक जब उनके जीवन में कोई फूल नहीं खिला, तब उनकी सास ने उन्हें अपने पक्ष में करके पुत्र से कहा कि तुम दूसरी शादी करो। लेकिन पुत्र ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और कहा- शादी तो मैं अब /नहीं करूंगा मां चाहे जो हो/क्यों चिन्ता है तुम्हें वंश की/वंश तुम्हारा चलता है मेरे होने से/चिन्ता हो मुझे वंश अपने की/मुझे चलाना नहीं वंश इन शर्तों पर/ऊषा ही मेरी पत्नी वरेण्य है/रहेगी आगे भी वो ही। (मैंने देखा है पृथ्वी को रोते, पृष्ठ-35-36) और विजेन्द्र ने अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह आज तक किया है। उनके विपुल काव्य में दाम्पत्य प्रेम की अनेक उत्कृष्ट कविताएं हैं। पत्नी को संबेाधित। उनके प्रेम में क्रियाशीलता का विशेष महत्त्व है और साथ-साथ रहने का भी। उनके दाम्पत्य प्रेम की कविताएं उन तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि उनमें स्थानीय जन-जीवन के अनेक चित्र भी हैं। और प्राकृतिक परिवेश के भीं। विजेन्द्र ने प्यार को एक जिन्दा नाम कहा है। वह अपने प्यार का व्यापक रूप समझाते हुए कहते है- प्यार /जिसे मैंने बार बार कविता में पुकारा है/वह चिडि़या का पंख है/जो हवा काटता है और गति पैदा होती है।/वह हिलती पत्ती है/जो निर्जन में आदमी का अहसास कराती है।/वह एक एक भागती औरत/जो अपने खेत से/ वन्य पशुओं को हांक रही है। (ये आकृतियां तुम्हारी, पृष्ठ-92) उनके दाम्पत्य प्रेम में चैत की लाल टहनी शामिल है। उर्वर भूमि है, झरवेरी के कांटे हैं, कनवा घूंघट है, मुक्ति की आग है, अमोला है, अन्न भरी पृथ्वी है। वे कहते हैं- तुम्हें छूते ही लगता है/अन्न भरी पृथ्वी को छुआ है/गन्ध को फूल से कैसे अलग करूं/पत्तियों की उभरी भूरी नसों में/ छिपी हरीतिमा/मेरी सांसों का भी हिस्सा है। (आंच में तपा कुंदन, पृष्ठ-106-107)

आधी सदी पढ़ते हुए पाठक को निराला की प्रसिद्ध कारूणिक कविता सरोज स्मृति अनायास याद आती है। जिस प्रकार महाप्राण निराला दहेज के लोभी कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को कोसते हुए कहते हैं- ये कान्यकुब्ज कुल कुलांगार/ खाकर पत्तल में करें छेद, उसी प्रकार विजेन्द्र को भी अपनी कन्याओं के विवाह के लिए दहेज की चिन्ता सताती है।वे भी निराला के समान अपनी बिरादरी के ठाकुरों की पोल खोलकर सामंती मूल्यों का विरोध करते है। इस कविता में विजेन्द्र ऐसे नायक के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जो विरोधियों के आघात सहता रहता है। लेकिन परास्त नहीं होता है। और अधिक मजबूत होता है। मार्क्सवादी जीवन पथ से विचलित नहीं होता है। कविता के अन्त में वे कहते हैं- कविता ही अब मेरा जीवन है/ उत्पादक श्रम का सबसे सुन्दर प्रतिफल है/ नहीं सुहाता कुछ भी मुझको/ रचता रहूं हर सांस राग को/ कौन जानता/कवि जीता जीवन के महात्याग को (मैंने देखा है पृथ्वी को रोते, पृष्ठ-40)

उनका क्रौंच वध नामक काव्य नाटक अद्वितीय काव्य-कृति है जिसमें रामायण के रचनाकार आदि कवि वाल्मीकि के बहुआयामी त्रासद द्वन्द्व का निरूपण किया गया है। राजाओं के आखेट की आलोचना की गई है। बनवासियो, लकड़हारों, आदिवासियों, मछेरों, बुनकरों, लुहारों के क्रियाशील जीवन के बिम्ब हैं। इस काव्य में कवि ने मार्क्सवादी चिन्तन की यथास्थान अभिव्यक्ति की है। भौतिवादी चिन्तन के अनुसार पदार्थ से गतिशील विश्व की रचना हुई है। वह कभी नष्ट नहीं होता है। वाल्मीकि का दृष्टिकोण पूरी तरह भौतिकवादी है। वे कहते हैं- नहीं होता कभी कुछ भी नष्ट/पदार्थ का स्वभाव है, क्षण भुगंर/जो होता है भिन्न-भिन्न/हर क्षण /नष्ट नहीं/रूपान्तरित होते हैं द्विपत्र ही/नष्ट नहीं होता कुछ /वस्तु लेती है रूप नया|

विजेन्द्र का अनूठा कविता संकलन आधी रात के रंग भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसमें चित्रमय कविताएं हैं अर्थात् दांईं ओर अमूर्त चित्र है। उसके सामने उस पर आधारित कविता। हिन्दी और अंग्रेजी देानों में। ऐसा अन्य संकलन समकालीन कविता के संसार में है ही नहीं। इस दृष्टि से यह संकलन भी अद्वितीय है।

सारांश यह कि विजेन्द्र के विपुल काव्य में समकालीन लोकजीवन के संघर्ष की व्यापक अभिव्यक्ति लक्षित होती है, जो अन्य तथाकथित बड़े कवियों के काव्य में है ही नही। इसी प्रकार उनके काव्य-रूप भी अनेक हैं। प्रभावपूर्ण दोहे, बरवै, सानेट, छोटी कविताएं, गीतात्मक कविताएं, मझोली कविताएं, अनतिदीर्घ चरित्र प्रधान कविताएं, क्रिया प्रधान प्रदीर्घ कविताएं, विज्ञान प्रधान लम्बी कविताएं, काव्य नाटक। क्या ऐसी विविधता केदारनाथ सिंह के काव्य में है, कुंवर नारायण के काव्य में है, विनोद कुमार शुक्ल के काव्य में है, अशोक वाजपेयी के काव्य में है, चन्द्रकान्त देवताले के काव्य में है | नामवर आलोचकों से अनुरोध है कि बताने की कृपा करें । अन्तर्वस्तु के अनुरूप वाक्य रचनाओं की अनेक संरचनाएं हैं। लयात्मक वाक्य हैं। लयवान गद्यात्मक वाक्य हैं। बिम्ब-रहित गद्यात्मक वाक्य हैं। बिम्ब-सहित असंख्य वाक्य हैं। रूपकात्मक वाक्य भी अनेक हैं। वाक्यों में समासोक्तियां हैं। स्वभावोंक्तियां हैं। कथन शैलियां भी अनेक हैं। प्रमुख शैली है वर्णनात्मक, जो सर्वत्र लक्षित होती हैं। विजेन्द्र आदि कवि वाल्मीकि के समान वर्णन करने में निपुण हैं। चरित्र प्रधान कविताओं में आत्मालाप शैली है। संवादात्मक शैली है। नाटकीय कविताओं में अन्तद्र्वन्द्व से युक्त शैली है। विजेन्द्र ने परंपरागत अनेक छन्दों का मुक्त छन्द के रूप में प्रयोग किया है। ऐसे छन्द हैं- रोला, चैपाई, हरिगीतिका, कवित्त, आल्हा का छन्द। आल्हा के छन्द में कवि ने नया प्रयोग यह किया है कि तुकान्तों का निषेध कर दिया है। इस प्रकार परंपरा को एक नया रूप दिया है। निराला ओर मुक्तिबोध के बाद विजेन्द्र ने भी मुक्त छन्द को बड़ी सावधानी से साधा है। उल्लेखनीय है कि उनके हमउम्र कवियों ने निराला के मुक्त छन्द का प्रयोग ही नहीं किया है। इस प्रकार उन्होंने अपना सम्बन्ध परम्परा से नहीं जोड़ा है। कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह की कविताओं में मुक्त छन्द का प्रयोग कहीं भी नहीं हुआ है।  

विजेन्द्र की काव्य-भाषा भी अन्य कवियों से भिन्न है। वे अपनी काव्य-भाषा के लिए शव्दों का चयन अपने गांव धरमपुर की बोली-बानी से करते हैं। भरतपुर में रहते हुए ब्रजभाषा से करते हैं। जयपुर में रहते हुए राजस्थानी से करते हैं। तद्भव शव्दों का प्रयोग प्रचुर रूप से करते हैं। अन्तर्वस्तु के अनुरूप तत्सम् शव्दों का भी। उर्दू के शब्दों से उन्हें विशेष लगाव है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनकी काव्य-भाषा की पहचान उर्दू, ब्रजी, तद्भव और बोधगम्य तत्सम शब्दों से होती है। उन्होंने बोलियों के ऐसे शव्दों का प्रयोग किया है, जिनके अर्थ आलोचक समझ ही नहीं पाते हैं। जैसे एक शव्द है चैतुआ। इसका अर्थ है चैत में फसल काटनेवाला मजदूर। वे रबी की फसल को रब्बी की फसल कहते हैं। उनके गांव में ऐसा ही बोला जाता है। यद्यपि उन्होंने अप्रचलित अनेक स्थानीय शब्दों का प्रयोग किया है, तथापि उनकी काव्य-भाषा बहुत दुरूह नहीं हुई है। उन्होंने अपने कई संकलनों में ऐसे शब्दों के अर्थ भी संकलित कर दिए हैं। वस्तुतः उनकी काव्य-भाषा में निरंतर निखार आता गया है। और दुरूहता दूर होती गई है।  

तो भाई पारस जी, लोकतंत्र में हम बड़ा कवि उसीको मानते हैं, जो अपने समय के लोक रूपी राम के साथ खड़ा है। उससे एकात्म होकर। और वह साथ ही साथ तंत्र रूपी रावण का प्रतिरोध करता है। अपने युग की नई रामायण रचता है। विजेन्द्र ऐसे ही योद्धा कवि हैं। उनके काव्य में वस्तपुरकता के साथ-साथ आत्मपरकता भी है। इसलिए लोक का दर्द उनका अपना दर्द बन गया है। उन्होंने लोक के अन्धविश्वासों का समर्थन नहीं किया है, अपितु विरोध किया है। इस संदर्भ में यक्ष शीर्षक कविता पढ़ी जा सकती है, जिसमें लोक के अन्धविश्वास की आलोचना की गई है। वह इतिहासबोध के आधार पर मुक्ति-संग्राम की अधूरी प्रक्रिया पूरी करते रहते हैं। इतिहास-पुरूष को नायक बनाकर। जैसे बिरसा मुण्डा पर उनकी एक कविता है। उसमें बिरसा मुण्डा मुक्ति-संग्राम के लिए अंग्रेजों का प्रतिरोध करता है।

विजेन्द्र ने मुक्तिबोध के बाद सर्वाधिक सार्थक लम्बी कविताएं रचकर अपनी अलग पहचान स्थापित की है। समय की शिला पर यह पहचान हमेशा हमेशा अंकित रहेगी। मैग्मा और प्लाज्मा जैसी विज्ञान प्रधान लम्बी कविताएं रचकर उनहोंने नया प्रयोग किया है। कौतूहल शीर्षक अनतिदीर्घ कविता में पदार्थ का महत्व कलात्मक ढंग से समझाया गया है, जो समकालीन हिन्दी कविता में अद्वितीय है। विजेन्द्र जनशक्ति की विजय के प्रति हमेशा आशावान् रहे हैं। इस संदर्भ में उनकी आशा शीर्षक कविता पढ़ी जा सकती है। लम्बी कविताओं के संदर्भ में वह समकालीन कवियों में अग्रगण्य हैं। उन्होंने अपनी लम्बी कविताओं की सर्जना से अज्ञेय, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, भारती, साही, सर्वेश्वर, राजकमल चौधरी, श्रीकांत वर्मा, धूमिल, विनोद कुमार शुक्ल, आलोकधन्वा आदि को पीछे छोड़ दिया है। उनकी इन कविताओं में एक कमी खटकती है। वह यह है कि आपात्काल का प्रतिरोध कहीं नहीं किया गया है।

उनके संपूर्ण काव्य को दृष्टिगत रखते हुए कहा जा सकता है कि उन्होंने अपनी सर्जना से सघन सुन्दर फलदार बृक्ष उपस्थापित कर दिया है। उसे करूणा की धारा, भौतिकवादी विचारधारा संस्कृत की लोकधर्मी कविता की धारा और हिन्दी की लोकधर्मी काव्य-धारा से सींचा गया है। लम्बी कविताएं इस बृक्ष की छोटी-बड़ी शाखाएं हैं। उपमा-उत्प्रेक्षा-रूपक-मानवीकरण-समासोक्ति-स्वभावोक्ति के असंख्य मनोरम पत्ते हैं। सचित्र कविताएं आलिंगित लताएं हैं। दूब के तिनके इसके चारो ओर सुशोभित हैं। यह हर एक ऋतु का स्वागत दिल खोलकर करता है। इसकी शाखाओं पर घना के पाखी कलरव करते रहते हैं। यह सत्ता की सीकरी की ओर देखता तक नहीं। इसकी छाया में थके हुए किसान और मजदूर विश्राम करते हैं। इसके चारो ओर सरसों लहराती है। पके अन्न की बालियां झुकी हुई दिखाई पड़ती हैं।

जाने-माने प्रसिद्ध कवि भगवत रावत ने अपनी एक लम्बी कविता के भाग बारह में अपने पाठकों से सवाल पूछा है- क्या आप किसी ऐसे आदमी को जानते हैं/जो कभी न गया हो दिल्ली/जान पर बन आई हो लेकिन उसने कभी/दिल्ली-दिल्ली की गुहार न लगाई हो/ फिर भी वह आदमी दिल्ली से बड़ा हो/जानते हो तो बताएं। (कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आवो हवा और) हम इस प्रश्न के उत्तर में कह सकते हैं कि ऐसे व्यक्ति लोकधर्मी कवि विजेन्द्र हैं। उन्होंने पद-पुस्कार-प्रतिष्ठा के लिए दिल्ली की ओर मुंह तक नहीं किया। वे धरमपुर से खुर्जा होते हुए बनारस पहुंचे और बनारस से भरतपुर। वहां से जयपुर। दिल्ली उनकी मंजिल कभी नहीं रही। इसलिए वे हिन्दी के बड़े कवि हैं आजकल। उनके काव्य के सरोकार भी बड़े हैं। वह अपने जीवन में अपने उदात्त काव्यादर्शों से आज तक विचलित नहीं हुए हैं, जबकि सोवियत संघ के विघटन के बाद अनेक मार्क्सवादी कवि और आलोचक अपने जीवन-पथ से विचलित हो गए। विजेन्द्र ने दिल्ली की सत्ता से समझौता आज तक नहीं किया है। उन्होंने निराला के समान अपने जीवन में निरन्तर विरोध का ही सामना किया है।
दिनांक-10 दिसंबर, 2014

पुनश्च: 2014 में लिखित इस लम्बे आलेख का और अधिक महत्त्व वागर्थ पत्रिका के अंक अगस्त 2015 ने उजागर कर दिया है। उल्लेखनीय है कि यह अंक कवि विजेन्द्र पर केन्द्रित है। पत्रिका के संपादक एकान्त श्रीवास्तव ने लिखा है कि लोक के दुर्लभ, सृजनात्मक और बोल-चाल के अनेक शब्दों को विजेन्द्र हिन्दी में पहली बार प्रवेश देते हैं। हिन्दी कविता ही नहीं बल्कि हिन्दी भाषा के पाट को चौड़ा करने में उनका महत योगदान है। इस तरह उनकी भाषा फिर-फिर नवीन होती है। इस भाषा के चलते उनकी कविता जो डेल्टा बनाती है, वह आकर्षक और सर्वथा नूतन प्रतीत होता है। एकान्त श्रीवास्तव ने इस बात की ओर भी संकेत किया है कि विजेन्द्र की लम्बी काव्य-यात्रा के मद्देनजर कविता की परिभाषा तैयार की जाए तो वह इस प्रकार होगी कि अपने भूगोल, लोक तथा उसके संघर्ष-शोषण, उत्पीड़न और अन्याय को रचनात्मक भाषा में सिरजना ही काव्य है।
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डा. अमीरचन्द वैश्य

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