औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Thursday, 4 February 2016

गायत्री प्रियदर्शिनी की कविताएँ


आसमान

बारिश के बाद
धुला निखरा आसमान

नहाई खिली संवरी हरियाली पर
झुका आसमान
सांवले तैरते उजले बादलों की
टुकड़ियाँ रहा आसमान
आकर्षक कितना है ऐसा आसमान
इन्द्रधनुषी रंगों जैसे खिले
जाते हुए अपने-अपने स्कूल
बच्चों की उजली मुस्कानों में
धूप जैसा घुल गया आसमान |

सौदागर

बना रहे हैं वे लोगों को
लखपति करोड़पति
लुटा रहे हैं वे सोना

जीवनदायिनी पावन नदियों को
बदलकर विषैले गंदले नालों में
बदलकर बेच रहे हैं वे
गंगा की पवित्रता
साबुन और मिनरल वाटर में

ब्रह्माण्ड सुंदरियों
विश्व सुंदरियों की
इंच-दर-इंच
नाप-जोख के लिए
फंसा रहे हैं वे
तीसरी दुनिया को
रोटी के लिए
घिनौने समझौतों से आधी आबादी को
साबुन क्रीम तेल के मायाजाल में

वे हैं कुटिल सौदागर
इस सदी के
कर रहे हैं सराबोर बचपन की मासूमियत को
चकाचौंध और छल-छद्म से भरे
चाकलेट कोल्डड्रिंक्स
फास्टफूड की विज्ञापनी महक में

नंगी टांगों का कोरस

जारी है चैनलों पर
नंगी टांगों का कोरस
खुले-अधखुले शरीरों का
उत्तेजक मादक उन्माद

दूसरी ओर आस्थाओं संस्कारों परम्पराओं नैतिकता
का जय-नद

एक ही समय में एक ही साथ
टूटती वर्जनाओं और मूल्यों की रस्साकस्सी में
खिंचता तनता मन टूट रहा है
इस भयंकर समय के घोर शोर में
डूब रहा है जबरन वेश्या बनाई गयी
लड़कियों-बच्चियों का करुण चीत्कार
विज्ञापनी स्त्रियों की तिलिस्मी मुस्कानों में
सुनाई नहीं देता
दंगों युद्धों की विभीषिकाओं में जलती और
बलात्कृत स्त्रियों का हाहाकार

चुप्पी साध लेते हैं
संस्कृति के ठेकेदारों के हथियार
इन अनाचारों-दुराचारों से की गयी
जिंदा गोश्त की तस्करी के ख़िलाफ़ |

हमारे समय में

हमारे समय में
ओस के फूल
नहीं खिलाती हैं
दूधिया मुस्कानें

अब तो बच्चों के परियों वाले सपने
बदल चुके हैं बंदूकों में
रिश्तों की गुनगुनी हथेलियाँ
स्पर्शों की आत्मीय गरमाहट छोड़
बदल चुकी है
‘यूज़’ एंड ‘थ्रो’ की अपसंस्कृति में

फूलों की नाजुक छुअन
बदल चुकी है
कैक्टसों की
कंटीली खेती में |

विदाई की रीत

एक विदाई ऐसी
जिसमें आँखें रोएं
होंठ हँसें

एक विदाई ऐसी
जिसमें बस शब्दों की गूँज उठे
एक विदाई ऐसी
जिसमें हो
दिल में दुःख
ओंठों पर चुप

एक विदाई ऐसी
जिसमें उमड़े दुःख का सागर

है वही विदा की रीत भली
जब कहें : मिलते रहना
अच्छा sss
और फिर दूसरे का कहना ख़ुशी से
अच्छा....अच्छा !

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श्रीमती गायत्री प्रियदर्शिनी
जन्म – 30/06/1973, बदायूं (उ.प्र.)
शिक्षा- एम.ए., पी.एच.डी.
शोधकार्य – भीष्म साहनी के साहित्य में जन-जीवन की अभिव्यक्ति
प्रकाशन – कल के लिए, कथ्यरूप, गोलकोंडा दर्पण, उत्तरार्ध, अभिनव कदम, कथन, राष्ट्रीय सहारा, वागर्थ, अलाव, अभिनव प्रसंग, जनपथ, कृतिओर आदि पत्रिकाओं में |
संपर्क – द्वारा श्री मनोज कुमार गुप्त, अधिवक्ता (आयकर-बिक्रीकर), रघुवीर नगर, बदायूं (उ.प्र.) 243601
चलभाष – 08923591758

1 comments:

  1. गायत्री की कवितायें सरल सपाट ढंग से जीवन और समाज के कठिन और टेढ़े मेढ़े सच का मुकम्मल बयान हैं |

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