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Thursday, 14 January 2016

संजय कुमार शांडिल्य की कविताएँ


फाँक

गाँव ऊँचे और निचले में नहीं बँटा था
ऊपर से नीचे दो फाड़ था

यह तो गजब था ख़ुदा के नाम पर
जादू ईश्वर के करिश्मे का

एक हिस्से के भूखे-नंगे लोग
दूसरे हिस्से के भूखे-नंगे लोगों
के खिलाफ थे

यह पता नहीं चलता था
कि महलो-दोमहलो में
खु़दा का गजब
और ईश्वर का करिश्मा
कितना कायम था

कभी-कभी खिड़कियाँ खोलकर
वहाँ से इनदिनों लोग
बाहर झाँक लेते थे
दूसरे हिस्से में दरार और
चौड़ी हो जाती थी

फाँक जो पहले से बड़ा था
इन दिनों कुछ और बढ़ा था


जिस रात मैं कविता लिखता हूँ

हिलते-डुलते लोग दिखते हैं आंदोलित
मैं इस डबरे में उन्हें थिर
करना चाहता हूँ
इस काली रात जब जिस्म खुद
एक परछाई है

शब्दों के बाहर के पतछड़ में सारी ठोस चीजें
हल्की होकर उड़ती हैं
जिस रात मैं कविता लिखता हूँ

मेरी नींद पछुआ में चूल्हे की राख की तरह
फैल जाती है
जैसे फैल जाती है मसान में
अस्थियों को बिनकर सुरक्षित
रख लेने के बाद

तो क्या मैं कविताएँ शब्दों में पृथ्वी की लय
सुरक्षित रखने के लिए लिखता हूँ?

घर की दीवार उड़ती है और घर नग्न हो जाता है
मैं शब्दों में बारिश और ओले से बचने की
कोशिश करता हूँ
सारे खून के रिश्ते
इस समय के निर्बाध
सूनेपन में
गंगा में फूले हुए शव
की तरह बहते हैं

पानी के फूल की तरह सपने
आँखों की कोर तक ठोस रहते हैं
उनको पकड़ना चाहता हूँ
उनके ढलक कर भाप होने से पहले

यह मेरी कमीज उड़ रही है खिल और बताशों जैसे
और मेरा दोपहर का भोजन
और मेरी पढ़ी लिखी बातें
उसी क्रूर और भारी आवाज़ में
जैसे हवा में लोबान का धुआँ

हम उड़ रहे हैं साथी वायुमंडल विहीन इस अंतरीक्ष में
जैसे प्रेत उड़ते हैं भूख और ठण्ड को काटते
जवान होती पिता की बहनों की उम्र सी झरती
अंतहीन कथाओं में

जैसे खूब तेज हवा में टूटी हुई कमानी
पकड़ती है छतरी का कैनवास
मैं बार-बार अपनी कथरी पकड़ता हूँ
जिसपर कटती है पारे सी गर्म रात

दिन के छकड़े पर ढोया हुआ भारी जीवन
रात हल्का होकर खुली आँखों में गड़ता है
शब्दों के बाहर गुड़ के छोए सी
भारी नींद पसरी रहती है

मैं जिस रात कविता लिखता हूँ, उस रात बस
कविता लिखता हूँ

परिन्दे उड़ने की सही दिशा जानते हैं

उत्तर से दक्षिण की ओर उड़ रहे परिन्दे
उड़ने की सही दिशा जानते होंगे

हम-आप बिलखते-चिलकते रह जाते हैं
इस धूप में, इस असमय बारिश में
इस बेलगाम रफ़्तार में चित्र-लिखित

इस ध्वंस के बाद की सिसकती मायुसी में
धरती के इस या उस करवट में
समुद्र के फेनिल उद्वेलन में
हर विषाद में, हर यातना में
इस लहराते हुए समय की चिरंतन चेतना के
संगुफन में
इस प्रलय के घनान्धकार में
जो अनांदोलित हैं हमी हैं

उत्तर से मृत्यु की एक लहर आती है
और दक्षिण जीवन की दिशा है

जिन्हें एक पक्ष चुनना है-सुविधा का श्वेत पक्ष
फिर किसी और पेड़ पर
मिट्टी और रेशों से
नया घोंसला बनाते हैं
उनकी नींद में सपने हरे रहते हैं

इस विलाप के समय की अनथक
अनिद्रा में
हमारा चुना हुआ उजाड़ है
हमें यहीं रहना है
सँवलाए हुए सपनों को
सुबह-शाम जल देते

अभी सिर्फ एक आँख जगी है

आजकल मुझे उस बर्फ के पहाड़ की
टूटकर गिरने की हवा बहा ले जाती है
जिसके ऊपर एक ग्लैशियर फिसलता है
नीचे हजारों फीट घाटी में लुढ़कने से पहले

उसका गिरना उसके साथ बहता है
बस दिखता है कभी-कभी
गोशा-गोशा इस मेरी देह में
कच्चा बर्फ लगा है
एक बड़े राष्ट्रीय आरे से काटा
जा रहा हूँ
मेरी सिर्फ एक आँख बची हुई है
स्वयं को काटे जाते हुए
देखने के लिए

चारों तरफ सिर्फ रक्त-मांस के टीले हैं
जीवन के मृदुभांड से भरा
खूब भयानक जंगल है चारों तरफ
सिर्फ उदासियाँ रह सकती हैं
इतने विरानेपन में
यहीं श्रम से हल्की मेरी देह
लुढ़की है नींद की मृत्यु में
बस हृदय की मांसपेशियों में
गर्म रक्त की आवाजाही ही
हरकत है
और ऐन दिल के ऊपर
फन फैलाए बैठा है विषधर

हम दूर निकल आए हैं
इस अलक्षित जीवनखंड की रेकी में
किसी युद्धरत देश में
बासिन्दों से भरे
सिर्फ एक पल पूर्व के किसी शहर में
पहुँचने की सारी जगहें
जैसे मानचित्र में गलत अंकित हों
और शत्रुओं के भूक्षेत्र में
बम की तरह पौ फटे
उस रोज़ धमाके से निकल आए
सूरज

कितनी अजीब बात है कि इस शहर में
मेरी आत्मा ही मेरा बख्तर है
अठारह किलो का
मेरे विचार मेरा हेलमेट आठ किलो का
और मेरी साँसें वही आठ किलो
भारी असलहे

एक खूब भरी हुई नदी में मैं उतर रहा हूँ
और अचेत हूँ
इस नदी की पृथ्वी से टकराकर
बस एक क्षण पहले लौटी है मेरी चेतना
चारों तरफ रेत ही रेत है
चारों तरफ साँप ही साँप है
चारों तरफ बर्फ ही बर्फ है
चारों तरफ पानी ही पानी है

सिर्फ मेरी एक आँख जगी है
स्वयं को जीवित देखने के लिए

इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है

याक की तरह सर्दी खुर बजा रही है
जिनके जिस्म ओढ़े नहीं जा सकते
वो मिट्टी ओढ़ रहे हैं

ग्लैशियर सी रात फिसलती हुई बह रही है
हिंसा है इन रातों की नींद हिंसा है

दुख आँच देकर जल रहा है दान का अलाव
साँसों से हथेलियाँ गर्मा रही है रूह
पत्तों पर ठोस हवा ठहरी है
सूखी हुई लकङियाँ सब हरी हैं

यह रात जैसे हङताल में अस्पताल
इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है
देह तानकर ओढ़ रहे हैं लोग
इस ठंडे की आग लगे यह रोग

--
संजय कुमार शांडिल्य
सहायक अध्यापक, सैनिक स्कूल गोपालगंज, पत्रालय-हथुआ
जिला-गोपालगंज, (बिहार) 841436
Mob-9431453709

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