औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Sunday, 29 November 2015

तीन कवि : तीन कविताएँ – 17

विष्णु नागर, नीलकमल और समीर पाण्डेय



मुंबई बम विस्फोट / विष्णु नागर
 

कोई उस दिन इसलिए मारा गया कि उसने तय किया था कि 
आज वह घर जल्‍दी पहुंचेगा 
कोई इसलिए कि आज उसने हांफते-दौड़ते इस ट्रेन को पकड़ लिया था 
कोई इसलिए कि किसी से मिलने जाने के लिए उसने वैस्‍टर्न लाइन की 
यह ट्रेन पकड़ी थी 

कोई पन्‍द्रह मिनट पहले की बोरीवली फास्‍ट में चढ़ा था 
मगर रास्‍ते में याद आया कि पिता से जरूरी बात पूछ नहीं सका 
वह उतरा, फिर इस ट्रेन में चढ़ गया 

कोई ऑफिस के बाद बेटी की शादी का निमंत्रण बांटने जा रहा था 
कोई किसी को फूट भेंट करके यह कहने वाला था 
कि सॉरी, वह जन्‍मदिन की आज रात की पार्टी में शामिल नहीं हो पाएगा 
कोई किसी से यह कहने जा रहा था कि अपन तुमसे शादी बनाएगा 
और तुम इनकार करेगा तो अभीच जहर खा लेगा 
देख पुडिया जेब में रखेला है 
कोई बचपन के किसी दोस्‍त की अंत्‍येष्टि में 
शामिल न हो पाने का अफसोस जताने जा रहा था 
किसी ने आज ही नई नौकरी ज्‍वाइन की थी, 
वह घर मिठाई का डिब्‍बा लेकर जा रहा था 
कोई बेटी का फ्राक, कोई नया थर्मामीटर खरीदकर 
घर जा रहा था 

कोई इसलिए आज जल्‍दी निकला था कि वह बुखार से बुरी तरह कांप रहा था 
किसी के मन में उस दिन लड्डू फूट रहे थे तो कोई गणेशजी को लड्डू 
चढ़ाने जा रहा था 
कोई बेटे के लिए पहली बार इतनी महंगी चाकलेट लेकर जा रहा था 

कोई मोबाइल पर बार-बार रिक्‍वेस्‍ट कर रहा था कि जॉनी समझो 
मैं पन्‍द्रह मिनट से पहले किसी भी हालत में वहां नहीं पहुंच सकता 

कोई खर्च का हिसाब बार-बार लगाते हुए बड़बड़ा रहा था 
कोई कह रहा था कि इस नौकरी से मैं कंटाल गया हूं 
इससे तो औरत की दलाली करना अच्‍छा, पन क्‍या करूं


कोई खांसते-खांसते बेदम हो रहा थ, कोई हंसते-हंसते 
कोई पास बैठे आदमी से कह रहा था कि आजकल

लड़के का बाप होने का कोई फायदा नहीं है 
बचपन में भी इनकी सेवा करो और बुढ़ापे में भी 
कोई कह रहा था कि मेरे नसीब से मुझको इतना अच्‍छा दामाद मिला है 
कि क्‍या किसी का बेटा भी ऐसा होता होयेंगा 

कोई उतरने के लिए अभी-अभी दरवाजे पर आया था 
और कोई अभी चढ़ा था और खड़े होने की जगह ढूंढ रहा था 
कोई बीवी की जिद पर फर्स्‍ट क्‍लास का पास बनवाकर आज पहली बार 
सफर कर रहा था 
कोई अपने को मन ही मन समझा रहा था कि इतना टेंशन काय को लेने का 
किस्‍मत में जो लिखा है वो होकेच रहेगा 
कोई सोच रहा था कि बुढिया के इलाज पर और कितना खर्च करूं

लगता है, ये डाकन मुझे मारकर ही मरेगी 

कोई सोच रहा था कि बस आज टैंटवाले से बात हो जाये तो लड़की की 
शादी की मेजर प्रॉब्‍लम साल्‍व

कोई सोच रहा था कि आज वाइफ की एक बात नहीं सुनूंगा 
उसे डिनर पर बाहर ले जाऊंगा 
किसी की किसी बात पर जोर से रूलाई फूट रही थी और वह अपने को 
रोके हुए था 
कोई सोच रहा था कि ऊपरवाला भी कमाल का है आखिर आग मूतने वाले 
को सबक सिखा ही दिया 
किसी का ट्रेन का पास एक्‍सपायर हो गया था और उसका डर के मारे 
बुरा हाल था 

कोई ख्‍वाब देख रहा था और जब विस्‍फोट हुआ तो उसने सोचा 
कि ये क्‍या बात है कि जब भी मैं कोई सपना देखता हूं

विस्‍फोट हो जाता है 
और इसके बाद उसके चिथड़े उड़ गए.



यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है / नीलकमल 

शाखों
सरक रहे हैं
पौरुषपूर्ण तनों के कंधों से
पीतवर्णी उत्तरीय 

ढुलक रही है
अलसाई टहनियों के माथे से
हरी ओढ़नी

एक थके पेड़ के उघड़े सीने पर
फूली नसों-सी शाखाएँ
पढ़ी जा सकती हैं, अक्षरों-सी

ये फागुन के चढ़ते हुए दिन हैं
बौराए आम के सिर पर
उग रही है कलँगी

उदास नीम पर आ गए हैं
गुच्छों में फ़ूल,
उजाड़ पेड़ पर कूकती है
बेफ़िक्र एक कोयल

यह पेड़ों के कपड़े बदलने का
समय है,
एक बीतता हुआ सम्वत
अब जल उठेगा, धरती के कैलेन्डर पर

ढोलक की थाप पर
साल का पहला चैता गाकर
लौटेंगे लोग गाँव की तरफ़
अब बदल जाएगा मौसम,
तैयार होंगे पेड़
जेठ के उदास दिनों की
लम्बी दुपहरिया के लिए....

जिन्हें पेड़ कहते थे हम
वे तने हुए हाथ थे, धरती के।

ईमानदार कवि / समीर कुमार पाण्डेय
 

कवि
सुरक्षित नही हो सकता
वह सच को
झूठ की तरह नही
फेंकी गई गूंज को भी
सच की तरह ही ईमान कहता है.....
शब्दों से हुए
बलात्कार के बाद
अपने कपड़े संभालता है
कभी चीखता है
और कभी चुप हो आगे बढ़ता है.....
वह इंतज़ार नही करता
जहाँ खड़ा है वही से
अँधेरे में भटक रहे
लाखों-करोड़ों पैर को सँभालने की कोशिश में
लड़खड़ाती हुई हिम्मत के साथ
देश के सम्मुख खड़े होने की कोशिश में लगा है...
ताज्जुब यह कि
मारे जाने पर भी
और देर तक जिन्दा रहता है
मृत्यु की चेतना में
वह अकेले विश्व हो जाना चाहता है...।

Friday, 20 November 2015

तीन कवि : तीन कवितायेँ – 16


गगन गिल, आकाँक्षा पारे और शहनाज़ इमरानी
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एक उम्र के बाद माँएँ / गगन गिल

एक उम्र के बाद माँएँ
खुला छोड़ देती हैं लड़कियों को
उदास होने के लिए...

माँएँ सोचती हैं
इस तरह करने से
लड़कियाँ उदास नहीं रहेंगी,
कम-से-कम उन बातो के लिए तो नहीं
जिनके लिए रही थीं वे
या उनकी माँ
या उनकी माँ की माँ

मसलन माँएँ ले जाती हैं उन्हें
अपनी छाया में छुपाकर
उनके मनचाहे आदमी के पास,

मसलन माँएँ पूछ लेती हैं कभी-कभार
उन स्याह कोनों की बाबत
जिनसे डर लगता है
हर उम्र की लड़कियों को,
लेकिन अंदेशा हो अगर
कि कुरेदने-भर से बढ़ जाएगा बेटियों का वहम
छोड़ भी देती हैं वे उन्हें अकेला
अपने हाल पर !

अक्सर उन्हें हिम्म्त देतीं
कहती हैं माँएँ,
बीत जाएँगे, जैसे भी होंगे
स्याह काले दिन
हम हैं न तुम्हारे साथ !

कहती हैं माएँ
और बुदबुदाती हैं ख़ुद से
कैसे बीतेंगे ये दिन, हे ईश्वर!

बुदबुदाती हैं माँएँ
और डरती हैं
सुन न लें कहीं लड़कियाँ
उदास न हो जाएँ कहीं लड़कियाँ

माँएँ खुला छोड़ देती हैं उन्हें
एक उम्र के बाद...
और लड़कियाँ
डरती-झिझकती आ खड़ी होती हैं
अपने फ़ैसलों के रू-ब-रू

अपने फ़ैसलों के रू-ब-रू लड़कियाँ
भरती हैं संशय से
डरती हैं सुख से

पूछती हैं अपने फ़ैसलों से,
तुम्हीं सुख हो
और घबराकर उतर आती हैं
सुख की सीढियाँ
बदहवास भागती हैं लड़कियाँ
बड़ी मुश्किल लगती है उन्हें
सुख की ज़िंदगी

बदहवास ढूँढ़ती हैं माँ को
ख़ुशी के अँधेरे में
जो कहीं नहीं है

बदहवास पकड़ना चाहती हैं वे माँ को
जो नहीं रहेगी उनके साथ
सुख के किसी भी क्षण में !

माँएँ क्या जानती थीं?
जहाँ छोड़ा था उन्होंने
उन्हें बचाने को,
वहीं हो जाएँगी उदास लड़कियाँ
एकाएक
अचानक
बिल्कुल नए सिरे से...

लाँघ जाती हैं वह उम्र भी
उदास होकर लड़कियाँ
जहाँ खुला छोड़ देती थीं माँएँ.
उदास होने के लिए


चिंता / आकाँक्षा पारे

किसी भी आने-जाने वाले के हाथ
माँ भेजती रहती है कुछ न कुछ
आज भी घर से आई हैं ढेर सौगात

प्यार में पगे शकरपारे
लाड़ की झिड़की जैसी नमकीन मठरियाँ
भेज दी हैं कुछ किताबें भी
जो छूट गई थीं पिछली दफ़ा

काग़ज़ के छोटे टुकड़े पर 
पिता ने लिख भेजी हैं कुछ नसीहतें
जल्दबाज़ी में जो बताना भूल गए थे वे
लिख दिया है उन्होंने
बड़े शहर में रहने का सलीका

शब्दों के बीच
करीने से छुपाई गई चिंता भी 
उभर आई है बार-बार।


 मेरा शहर / शहनाज़ इमरानी

शहर में भीड़ है 
शहर में शोर है 
शहर को ख़ूबसूरत बनाया जा रहा है 

सरों पर धूप है 
खुरदरी, पथरीली, नुकीली,
बदहवास, हताश
परछाइयाँ.....

तमाम जुर्म, क़त्ल, ख़ुदकशी 
सवाल लगा रहे हैं ठहाके 
क़ानून उड़ने लगा है वर्कों से 
घुल रही हैं कड़वाहट हवाओं में 
एक बेआवाज़ ग़ाली जुबाँ पर है 
मर चुकी सम्वेदनाओं के साथ जी रहा है शहर 
अब बहुत तेज़ भाग रहा है मेरा शहर !