औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Monday, 14 September 2015

4 कवितायेँ : मीनू विश्वास


(१)

अभिव्यक्ति

बिखर जाता है
मेरे शब्दों का घोंसला
तिनका तिनका
उड़ने लगता है
हवा के झोंकों के साथ,

बारिश की बूंदों में
भीगते मेरे पंखों के एक एक रोम
उड़ने नहीं देते है

उठती रूह में सिहरन सी
बांधूं  कैसे शब्दों के जाल
फड़फड़ाते पंख 
समेटने की कोशिश में
चिपक जाती है
अंतस की गहराईओं में उतरती नीरवता


(२)

रिश्तों का ताना बाना

रिश्तों की गहराईयों को नापते हुए
लगा जैसे एक सुरंग में घुसती जा रही हूँ
जहाँ उलझी हुई नुकीली तारों के सिवा कुछ नही
जिन्हें जितना ही सुलझाने की कोशिश करूं
उसकी तेज नुकीली परतों से
अन्तरात्मा लहूलुहान होती जाती
कोई अंतिम सिरा नज़र नही आता
इन खोखले रिश्तों का ताना बाना
उधड़े हुए ऊन की तरह
जिन्हें सीधा करने में लग जाती है सारी उम्र
रख छोड़ा है पलंग के गद्दे के नीचे
कि शायद ये सीधी हो जाए
फिर बना सकूं 
एक खूबसूरत सा रंगीन मफलर
जिसकी गरमाहट में
मिले एक शीतलता का एह्साह
जिसे भेंट में दे सकूं
अपनी आने वाली पीढ़ियों को




(३)

धुंधले एहसास

लम्हों के बिखरते तार
टूटती समय की जर-जर ये दीवार
बहती हुई ख़ामोश सी जलधारा
टूटा हुआ पिंजरे का ताला
उड़ा ले गया है
कैद थी जो तेरी चाहत से
घेरे मेरी आशियाने के,

कुछ सूखी पगडण्डियाँ
खाली है ये सीढ़ियाँ
बैठ जहाँ
बुने थे कुछ सपने
बंद आखों में,

फिसल गया है
मेरा हाथ से तेरे हाथ
बाकी है बस कुछ सिलवटें
उस रेशमी चादर पे
और कुछ रातें, 
मेरी स्मृति में
धुंधले होते सारे एहसास




(४)

मीरा की आस्था

) पत्थरों की ढेली में खोंजने चले हीरा
पर हाथ लगे सिर्फ और सिर्फ़ कंकड़
क्या कभी देख पाऊँगी
चीर कर तेरे सीने में छिपी वो तस्वीर
कानों में बजती तेरे आवाज का ज़हर
धीरे-धीरे मेरे नसों में फैलता जा रहा हैं
पर नहीं चाहती,
ज़िन्दगी कि कड़वी सच्चाई को
तमाचे कि तरह सहना

आसां तो नहीं,
जला सकूं हर एक दस्तावेज
वो यकीं जो ना कभी मेरा हो पाया
तुझे मौका ही क्यों दूं उसे रौंदने का



) तूने जो दिखाए थे सपने
वो घटते-बढ़ते चाँद के क्रम के साथ मिट गए
पंद्रह सौ किलोमीटर की दूरी
और पचास हज़ार सालों क लम्बा अन्तराल
कैसे पूरा करूँ ?
तूने तो मुझे उम्र भी छोटी ही दी
और चाहते हो तुम्हें हरपल याद करूँ
बहुत निष्ठुर हो तुम


) लो फिर टपकने लगे आंसूं
काट कर फेकने कि हिम्मत कहाँ से लाऊं 
जो फंसा है मन के अंदरूनी कोने में कहीं
इक टीस कि तरह
हर बार तुम्हे कहीं दूर छोड़ आना चाहती हूँ
पर बंधी हूँ तुम्हारे अटूट प्रेम की डोर से


) वो घुटन विक्षोभ भरी
कराहती नसों की उलझी तारें
तड़पती हैं मस्तिष्क की लकीरें
आत्मा को लहूलुहान करती
जी करता है तेज धार चाक़ू से
काट कर तुम्हें फेंक डालूं ,
तुम्हारी मुरली कि धुन मुझे जीने नहीं देती

बंद कर लूं  कानों के पर्दों को
या खुद को कैद कर लूं कालकोठरी में
देखने में असमर्थ है मेरी आँखे
तुम्हारी बेरुखी और मुस्कान छल भरी
इस घुटन में दम तोड़ती है
मीरा की आस्था
--


मीनू विश्वास
जन्म- १९७८ में भोपाल में
शिक्षा- एम. कॉम. (एकाउंट्स), जनसंचार और कंप्यूटर में डिप्लोमा।
कार्यक्षेत्र- संयुक्त अरब इमारात के दुबई शहर में आठ वर्षों तक ऑफिस मैनेजर के रूप में कार्यरत रहने के बाद संप्रति स्वतंत्र लेखन।
प्रकाशित कृतियाँ - पत्र पत्रिकाओं और वेब पर रचनाएँ प्रकाशित
ईमेल minubiswas@gmail.com

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