औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Monday, 13 July 2015

महेश चन्द्र पुनेठा की ग्यारह कवितायेँ


पहली कोशिश

मैं न लिख पाऊँ एक अच्छी कविता
दुनिया एक इंच इधर से उधर नहीं होगी
गर मैं न जी पाऊँ कविता
दुनिया में अंधेरा कुछ और बढ़ जाएगा
इसलिए मेरी पहली कोशिश है
कि मरने न पाए मेरे भीतर की कविता।


फुंसी

जिसे उभरते देख
मसल कर
खत्म कर देना चाहते हो तुम
लेकिन
वह और अधिक विषा जाती है
तुम्हारी गलती
छोटी सी फुंसी को
दर्दनाक फोड़े में बदल देती है।


जीवन व्यर्थ गँवाया

भूखे का भोजन
प्यासे का पानी
ठिठुरते की आग
तपते को हवा
बेघर का घर
जरूरतमंद का धन
लुटे-पिटे का ढाॅढस
बिछुड़ते का राग
फगुवे का फाग
गर इतना भी बन न पाया
हाय! जीवन यॅू ही व्यर्थ गँवाया ।


किताबों के बीच पड़ा फूल

सूख चुकी हो भले
इसके भीतर की नमी
कड़कड़ी हो चुकी हों
इसकी पत्तियाँ
उड़ चुकी हो भले
इसमें बसी खुशबू
फीका पड़ चुका हो भले
इसका रंग
पर इतने वर्षों बाद अभी भी
बचा हुआ है इसमें
बहुत कुछ
बहुत कुछ
बहुत कुछ ऐसा
खोना नहीं चाहते हम
जिसे कभी ।


सीखना चाहता हूँ

नदी के पास
नहीं है कोई कलम
न ही कोई तूलिका
न ही हथौड़ा छीनी

फिर भी लिखती है
नई इबारत
बनाती है
नए-नए चित्र
गड़ती है
नई-नई आकृतियाँ
कठोर शिलाखंडों पर

हर लेती है उनका बेडौलपन

सीखना चाहता हूँ मैं भी नदी से
यह नायाब हुनर ।


कभी नहीं मर सकता

उनके
दृढ़ इरादे
और कठिन परिश्रम
कठोर से कठोर  काँठे को भी
बदल देते हैं
सुन्दर स्थापत्य में
रौखड़ में भी
लहलहा देते हैं हरियाली ।

फिर ये तो जीती -जागती
दुनिया है दोस्तो !
इसलिए
कभी भी  नहीं मर सकता
मेरी आँखों में
सुंदर दुनिया का सपना ।


एक नई दुनिया के निर्माण की तैयारी

मेरा तेरह वर्षीय बेटा
गूँथ रहा है आटा
पहली-पहली बार
पानी उड़ेल समेट रहा है आटे को
पर नन्हीं हथेलियों में
नहीं अटा पा रहा है आटा
कोशिश में है कि समेट लूँ एक बार में सारा
गीला हो आया है आटा

चिपका जा रहा है अंगुलियों के बीच भी
वह छुड़ा रहा है उसे
फिर से एक लगाने की कोशिश
अब पराद में चिपके आटे को छुड़ा रहा है
फिर पानी आवश्यकतानुसार
अब भींच ली हैं मुट्ठियाँ उसने
नन्हीं-नन्हीं मुट्ठियों के नीचे तैयार हो रहा है आटा
इस तरह उसका
समेटना
अलगाना
भींचना
बहुत मनमोहक लग रहा है

मेरे भीतर पकने लगा है एक सपना
जैसे रोटी नहीं
एक नई दुनिया के निर्माण की तैयारी कर रहा हो वह ।


संतोषम् परम् सुखम्

पहली-पहली बार
दुनिया बढ़ी होगी एक कदम आगे
जिसके कदमों पर
पहला अंसतोषी रहा होगा वह।

किसी असंतुष्ट ने ही देखा होगा
पहली बार संुदर दुनिया का सपना

पहिए का विचार आया होगा
पहली-पहली बार
किसी असंतोषी के ही मन में
आग को भी देखा होगा पहली बार गौर से
किसी असंतोषी ने ही ।

असंतुष्टों ने ही लाँघे पर्वत पार किए समुद्र
खोज डाली नई दुनिया

असंतोष से ही फूटी पहली कविता
असंतोष से एक नया धर्म

इतिहास के पेट में
मरोड़ उठी होगी असंतोष के चलते ही
इतिहास की धारा को मोड़ा
बार-बार असंतुष्टों ने ही

उन्हीं से गति है
उन्हीं से उष्मा
उन्हीं से यात्रा पृथ्वी से चाॅद
और
पहिए से जहाज तक की

असंतुष्टों के चलते ही
सुंदर हो पाई है यह दुनिया इतनी
असंतोष के गर्भ से ही
पैदा हुई संतोष करने की कुछ स्थितियाँ ।

फिर क्यों
सत्ता घबराती है असंतुष्टों से
सबसे अधिक

क्या इसी घबराहट का परिणाम तो नहीं
यह नीति-वाक्य
संतोषम् परम् सुखम् ।


दिल वालों की दिल्ली

एक लंबी सूची थी मेरे पास
कवि-कथाकार-संपादकों की
पढ़ता आ रहा था जिन्हें मुद्दतों से
कुछ के साथ कभी-कभार फोन पर बात भी हो जाती थी
दिल्ली आइए कभी
का आमंत्रण अक्सर मिल जाता था
बीमार पत्नी के  इलाज को जाना हुआ अबके
नोट कर लिए मैंने सभी के पते और फोन नंबर
बहुत मन था मिलने का उनसे
तड़प थी मिलन की गहरी

दिल्ली पहुँचकर सबसे पहले
एक बूढ़े कवि को फोन लगाया
चाँदनी चैक में खड़े होकर
बड़े ही मुश्किल से फोन लग पाया
शोर इतना कि पहले वह सुन नहीं पाए मेरी आवाज
आवाज गई तो पहचान नहीं पाए

फिर एक युवा कवि को फोन मिलाया
बताया उन्होंने -
मैं रूका हूँ जहाँ उसी सेक्टर के दूसरी ओर रहते हैं वह
और कहा-
ठीक है बहुत जल्दी मिलने आ रहा हूँ
मैं इंतजार में बैठा रहा उनके
पर मुलाकात नहीं हो पायी

लौटना था जिस रोज
एक नवोदित कवि से बात हुई फोन पर
लगभग पाँच किमी की दूरी पर था वह उस समय
पर बहुत व्यस्त था
मेरी मिलने की चाह चाह ही रह गई

सुना तो बहुत था लेकिन देख भी लिया
सचमुच दिल्ली बहुत बड़ी है
मेरे पहाड़ी शहर की तरह नहीं
कि फट से जाकर ले आएं किसी को साथ अपने          
दिल्ली बहुत व्यस्त है
मेरे जनपद की तरह निठल्ली नहीं।


तुम स्वतंत्र कहाँ

उठते-उठते
किसका मुँह देखना है , किसका नहीं
किस दिशा में जाना है और किसमें नहीं
कहीं दिशा शूल तो नहीं
दिन कौनसा है ,
मंगल-शनि तो नहीं
कौनसा रंग पहनना है आज के दिन कौनसा नहीं
दाड़ी-बाल-नाखून आज के दिन काटे जा सकते हैं कि नहीं

घर से निकलते ही
कहीं
छींक दिया किसी ने
नजर पड़ गयी गर खाली बर्तनों पर
या काट दिया बिल्ली ने रास्ता
अब जा नहीं सकते सीधे आगे
काटे बिना अरिष्ट को
करना है कुछ टोना-टुटका
फिर भी
जब तक काम पूरा न हो जाए
एक आशंका घेरे रखती है मन को

घर लौटते ही
मन कर रहा है लपकर अपने नन्हे को गोद में उठाने का
अग्नि को छूए बिना पास नहीं  फटक सकते उसके
पेट में बल रही हो जठराग्नि
दीया-बाती किए बिना खा नहीं सकते हो कुछ भी

और भी लंबी हो सकती है यह सूची
जकड़े है जो जंजीरों सी
फिर भी कैसे कहते हो तुम-
 मैं स्वतंत्र हूँ......निर्भय हूँ
अपने निर्णय खुद लेता हूँ।

क्या सचमुच ऐसा है?


ग्लोबल युग का बाजीगर

वह शब्दों से अधिक
अपनी चेष्टाओं में बोलता है
आप लाख कहते रहें कि
नहीं होता उसकी चेष्टाओं का असर आप पर

उसके साथ खड़े होकर
आप खुले आसमान को नहीं देख सकते हो
न किसी                                                       
पेड़ में बैठी चिडि़या से बतिया सकते हो
न किसी पसंदीदा गीत की धुन गुनगुना सकते हो
उसके करतब 
आपको अवकाश ही नहीं देते हंै

उसके करतबों को देख भर कर
नहीं लौट सकते हो आप
आप घर लौटकर आ जाओ
वह आपको घर से ही बुलाकर ले जाएगा
पड़ोसी के घर से होते हुए
आपके घर में घुस आएगा
बच्चे की किताब में छुपकर चला आएगा
आपकी ही बोली-बानी और लय में बतियायेगा
लोकगीत की धुन गुनगुनाएगा
आपके शब्दों के मतलब बदल देगा
और
उसी के बीच अपनी भाषा के बीज बो जाएगा
जैसे साठ के दशक में
अमेरिकी गेंहू के साथ खरपतवार

जन्म से लेकर मृत्यु तक के
हर संस्कार में शामिल हो जाएगा
पत्र-पुष्प-दुर्वा-नैवेद्य
पूजा की थाल में सजा देगा
जहाँ जिस चीज की आवश्यकता महसूस करोगे
पैकेटबंद कर प्रस्तुत कर देगा
जहाँ आवश्यकता नहीं भी होगी बगल में खड़ा रहेगा
जो नहीं भी माँगोगे
मुफ्त में थमा देगा
मुुफ्त की उंगुली थामें तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाएगा
झकड़ा जड़ की तरह फैल जाएगा
वर्षों से दमित इच्छाओं को जगा देगा

जब भी अपनों को याद करोगे
चुपके से आपके कंधे पर हाथ धर देगा
आपका ध्यान अपनी जेब की ओर जाएगा
आपको अपने आसपास की दुनिया भीड़ लगने लगेगी

देखने का कुछ नहीं लेता वह
देखते रहिए ....देखते रहिए
आप जितना चाहें उतना देखते रहिए
वह आपको बार-बार देखने के लिए उकसाएगा
उसे पता है कि
देखने से ही प्रेम की शुरूआत होती है
वह नजरों से चलकर
दिल में उतरने की राह जानता है
वह तो आपके दिल पर हाथ धरता है
जेब में तो आपका हाथ खुद चला जाता है
सरेआम जेब कट जाएगी
आप काटने वाले को नहीं अपनी जेब को दोष दोगे

वह यह भी जानता है कि
आप किसकी बात मान सकते हैं
आपको कैसे मनाया जा सकता है
आपके महानायक को
अपने रिंग में लाकर महाझूठ बुलवा देगा
आपके प्रेम और आस्था को
अपना ऐजेंट बनाकर आपके पास भेज देगा
पता ही नहीं चलेगा
कि आप कब उसके हो गए

कभी कला-धर्म-संस्कृति
तो कभी प्रेम की दुहाई देगा
प्रेम की सौगंध खिलाएगा
आपके भीतर
कुछ खास होने का अहसास जगाएगा
जरूरत पड़ी तो
आपके रंग-रूप को टारगेट करेगा
आप गहरी लालसा से कह उठेंगे-काश!
एक कशिश भरी आवाज में

तब आप कुछ सोचेंगे नहीं
बस उसके जमूरे बन जाएंगे
और खुद को धन्य समझने लगंेगे
जैसा-जैसा वह कहेगा
बिल्कुल वैसा-वैसा करते जाएंगे

वह आपको  बोतलबंद पानी पिलाएगा
पैकेटबंद खाना खिलाएगा
सुगंधित साबुन से नहलाएगा
आपकी त्वचा की चिंता करेगा
आपकी सफेदी पर नहीं लगने देगा कोई दाग
जो छुपाना चाहोगे छुपा देगा
अंग तो अंग
कृत्रिम भावनाओं तक का प्रत्यारोपण कर देगा
खुद भी खुद को पहचान नहीं पाओगे

आप नहीं भी कहोगे
तब भी
बार-बार पूछने लगेगा
आपकी इच्छाओं के बारे में
आप गदगद होकर
उसकी प्रसंशा करने से खुद को रोक नहीं पाओगे
चार लोगों को और बताओगे

वह तो दुश्मन से भी
सगे की तरह मिलता है
जिसको न हो भूख-प्यास
उसके मुँह में भी पानी ला देता है
यह दूसरी बात है कि
जितना पीते जाओगे उतनी प्यास बढ़ती जाएगी
जितना खाते जाओगे उतनी भूख

नहीं होगा कुछ और तो
वह
कारीगरों की मेहनत की दुहाई देगा
उनकी नायाब दस्तकारी की प्रशंसा करेगा
जरूरत पड़ेगी तो
उनकी तंगहाली को दिखाएगा

यहाँ तक कि वह आपका माॅडल बनाकर
आपके सामने सजा देगा
और उसे आपको ही मुँहमांगे दाम पर बेच देगा
आपकी कला तो छोड़ो
आपकी भावनाओं को भी स्टीकर बना पेश कर देगा
तीज-त्यौहारों की आत्मा भले मर जाय
लेकिन तीज-त्यौहारों को जिंदा रखेगा
आप लोकसंस्कृति की चिंता करोगे
लोक में बचे या न बचे
वह उसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सजा देगा
पत्थर को बढ़ता हुआ
और मुरदे को चलता हुआ दिखा देगा
चलते-फिरते को मुरदा साबित कर देगा

आप उसके विरोध में भी बोलोगे तो
वह बिल्कुल नाराज नहीं होगा
बस आपकी विरोध की भाषा को विज्ञापन में बदल देगा
आप कहते रहोगे कविता खत्म हो रही है
वह कविता में ही अपनी बात समझाएगा

वह बेचना ही नहीं
खरीदना भी जानता है
एक भव्य मूर्ति गढ़ेगा अपने मनपसंद राजा की
उसके खूनी दाँतों और हाथों को
चम्म चमकाएगा
और आपके वोट को खरीद लेगा
सिर्फ वादे पर
आपको पता भी नहीं चल पाएगा
कि आपने अपने वोट को बेच दिया है

सोचो जरा
उसके  हाथों वोट बिकने के बाद फिर भला
आपके पास क्या रह जाएगा?

यह ग्लोबल युग का बाजीगर है
इसे आपका
बाएं चलना बिल्कुल पसंद नहीं
सीधे-सीधे कुछ नहीं कहेगा
एक आभासी बांयां खड़ा कर
आपको दांए साबित कर देगा

माना
आप उससे अपना हाथ नहीं छुड़ा सकते
पर उसके हाथ की
कठपुतली बनना भी तो ठीक नहीं।


...............

महेश चंद्र पुनेठा
जन्म तिथि - 10 मार्च 1971
जन्म स्थान-उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के सिरालीखेत गाँव में जन्म हुआ लेकिन सेना द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के कारण वहाॅ अधिक रहने का अवसर नहीं मिला। अंततः इसी जनपद के लम्पाटा गाँव में बसे ।
शैक्षिक योग्यता -प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा जनपद में ही ग्रहण करते हुए एम0ए0 (राजनीति शास्त्र) किया।
प्रकाशित पुस्तक-  भय अतल में (कविता संग्रह ) प्रकाशक - आलोक प्रकाशन इलाहाबाद । स्वर एकादश और दूसरा युवा कवि द्वादश में  कविताएं संकलित
अन्य - शिक्षा पर केंद्रित पत्रिका शैक्षिक दखल का संपादन
 Û शैक्षिक सरोकार तथा हिमाल प्रसंग के साहित्यिक अंकों का संपादन ।      
 Ûजनपदीय काव्य प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से काव्यांकुरनाम से एक कविता फोल्डर के संपादन एवं प्रकाशन से संबद्ध।
 Û एस0सी0ई0आर0टी0 उत्तराखंड द्वारा स्कूली शिक्षा हेतु तैयार करवाई जाने वाली पाठ्पुस्तकों का लेखन व संपादन ।
 Û शिक्षा संबंधी अनेक राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय कार्यशालाओं में सक्रिय प्रतिभाग।
 Û बच्चों के लिए रोचक एवं भयमुक्त शिक्षा के वातावरण सृजन एवं वैज्ञानिक चेतना के विकास के उद्देश्य से गठित रचनात्मक शिक्षक मंडल‘ ’शैक्षिक नवाचार मंच दृष्टिकोणआदि शैक्षिक संस्थाआंे की स्थापना हेतु पहलकदमी ।
बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से दीवार पत्रिका के अभियान को अधिक से अधिक स्कूलों में प्रारम्भ करवाने हेतु कटिबद्ध।
संप्रति- रा0इ0 का0 देवलथल -पिथौरागढ़ में अध्यापन।
संपर्क-  शिव कालोनी पियाना पो0 डिग्री कालेज  जिला-पिथौरागढ़ 262501 (उत्तराखंड)।
मो0-9411707470

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