औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Sunday, 15 February 2015

डॉ सोनी पाण्डेय की छह कवितायेँ

समर्पित स्त्री की व्यथा

1.
मेरे मौन को
तुम समझते हो
अपनी विजय
सुनो !
सुनायी दे रही है
तूफान की आहट.
मैँ जानती हूँ
तुम नहीँ सुनोगे
क्योँकि,
तुम प्रकृति के प्रकोप के बाद ही
चैतन्य होते हो ।


2.
मुझे याद है
विदा करते हुऐ
माँ ने दिया था
एक पिटारी
जिसमेँ बंद किये थे उसने
अपना साहस, धैर्य, त्याग
बडे जतन से सजाया था
अपने मौन की परिभाषा
कहा था
पिता का दिया खत्म हो जाऐगा
नहीँ खत्म होगी
मेरे संस्कारोँ की थाती ।


3.

मुझे छूकर तो देखो
मैँ पाषाण प्रतिमा नहीँ
पंचतत्व से निर्मित
साकार मूरत हूँ
माँ, बहन, बेटी
पत्नी, प्रेयसी होने से पहले
औरत हूँ ।


4.

झरोखोँ से झांकती हूँ
क्योँकि दरवाजे पर
परम्पराओँ के
संस्कारोँ के
सात पहरे हैँ
जिन्हेँ लांघते ही
समाप्त हो जाऐँगी
सारी वर्जनाऐँ
निकल आऐँगे डेँगे
जिन्हेँ दरो - दीवार से
टकराकर
तोड़ती रही लडकी
हाँ
अब लड़कियाँ उड़ रही हैँ ।


5.
मैँ तटबंधोँ मेँ बंधी
नदी हूँ
हाँ, तुम्हारे लिऐ ही तो
हँसते -हँसते सह गयी
बहती रही
अविरल
पर काश तुम
अति न करते
तो ये तटबंध
कभी नहीँ टूटते ।


6.
आशा की कुछ बूँदे ही
बहुत है
जीने के लिऐ
मैँने सारा समन्दर कब मांगा
टूटते हुऐ तारे से सीखा है
धूल मेँ मिलने का गुर
मैँने सारा आकाश कब मांगा ।


7.
मैँ स्वर्गकामी नहीँ हूँ
इस लिऐ सभी वर्जित अनुष्ठान
पूर्ण करती हूँ
हाँ एक सत्य और है
मैँ मुक्तिपथगामिनी भी नहीँ
इस लिऐ
हँसते हुऐ निभाती हूँ
अपने समस्त कर्तव्योँ को ।


8.
ये घर
ईँट पत्थरोँ का नहीँ
मेरी भावनाओँ का है
जिसे मैँने बडे जतन से बनाया है
तुम सहेजना
आँगन की किलकारियोँ को
डोली की रस्मोँ को
भाँवर की कसमोँ को
भावना . सिन्होरा . सिन्दूर को
और इस बगिया के
बुलबुल को
रखना सहेज कर ।


9.
तुम्हारे साथ
जीऐ हर लमहेँ को
बाँध लेना चाहती हूँ
आँचल के छोर मेँ
गठिया लेना चाहती हूँ
शब्दोँ मेँ डूबे एहसासोँ को
रख देना चाहती हूँ
बचपन के गुल्लक मेँ
जिसे सिराहने रख कर
रात भर सजोती रहूँ
तुम्हारी हँसी की खनक
शायद यह एहसास ही
अकथ प्रेम है ।


10.

परत दर परत
तुम खुलते गये
और मैँ मोम की तरह
पिघलती गयी
किन्तु
तुम्हारे नेह का साँचा
मैँ जानती हूँ
इतना मजबूत नहीँ कि
उसमेँ ढल सके
एक नयी मूर्ति ।


अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ

अब मैँ यकीन कर लेना चाहती हूँ
कि सूरज दहकता है और
उसकी किरणेँ गाती हैँ
सतरंगी क्रान्ति गीत
दहकता है मलय पवन
शोला बन
गंगा की लहरेँ उफनतीँ हैँ
लावे की तरह
चूल्हे की चिन्गारी लिख सकती है
उत्थान पतन
हाँ बस करना होगा यकीँ
कि यहीँ लिखी जाती है
इबारत उन सभ्यताओँ की
जिनके अवशेष बताते हैँ
उस युग के क्रान्ति का आख्यान
और हम लेते हैँ सबक
नव क्रान्ति का
क्रान्ति होती रही है
क्रान्ति होती रहेगी
जब जब टकराऐँगीँ अहंवादी ताकतेँ
जीवन .जमीन .जंगल .
पहाड और पानी से
तब तब सूरज दहकता हुआ लाल रंग उगलेगा
और फिजा मेँ फैलाऐगा
सूर्ख लाल रंग
मेरी हथेलियोँ की मेँहदी
हाथ की चूडियाँ
माँग का सिन्दूर
और रसोँई की दीवार तक
फैलाऐगा लाल रंग
हाँ मुझे यकीन होने लगा है


मुझसे मत पूछना पता

सुनोँ !
मुझसे मत पूछना पता
काबे और काशी का
मत कहना जलाने को
दीया आस्था का
क्योँकि मेरी जंग जारी है
अंधेरोँ के खिलाफ
मैँ साक्षी हूँ
इस सत्य का कि
अंधेरोँ की सत्ता कायम
आज भी
सुनो !
तुम्हारे आस्था के केन्द्र पर
मेरी माँ रखती थी
अपने विश्वास का कलश
पूजती थी
गाँव के डीह .ब्रह्म .शीतला को
निकालती थी अंगुवा पुरोहित को
देती थी दान .भूखे .नंगोँ. भिखमंगोँ को
कडकडाती ठंड मेँ नहाती थी कतकी
जलाती थी दीपक
तुलसी के चौरे पर आस्था का
रखती थी विश्वास कि
ये सारे जप. तप. होम. व्रत
की अटल दीवार
उसके परिवार को
बेटियोँ को
रखेगा सहेज कर
होगा चतुर्दिक मंगल
किन्तु नहीँ रोक पायी
शहीद होने से अपनी कोख के प्रथम अंश को
दहेज की बलिबेदी पर
वह आज भी चित्कारती है
पकड कर पेट को
नहीँ रोक पाये तुम्हारे काबे काशी
वेद पुराण
उसके कोख को छिलने से
इस लिऐ मुझसे मत पूछना पता
किसी काबे काशी का
मेरी जंग अंधेरोँ के खिलाफ जारी है ।


मेरी अभिव्यक्ति

1.
मेरी अभिव्यक्ति मेँ .
संवेदना के स्वर तभी उभरते हैँ
जब मैँ अपनी कलम मेँ स्याही की जगह अपना लहू भरती हूँ ।

जब मैँ करती हूँ प्रयास
मुस्कुराने का
उस क्षण भर देती हैँ
कडवाहट कुछ विकृत आकृतियाँ
जो निरन्तर घोल रही हैँ जहर
मेरे आस पास छिटकी मानवता मेँ ।

मेरी अनुभूति अनगिनत आयामोँ
से होकर गुजरती है
मुझे कोठी गाडियाँ और सतरंगी परिधान नहीँ लुभाते
पूरे रास्ते यह देख कर आँखेँ पथरा जाती हैँ
जब भूख से सिकुडी अतडियोँ मेँ हेरते बचपन को समेटे
कुछ अधनंगे बच्चे
अस्पताल के बाहर
कूडे के ढेर से डिस्पोजल सीरिँज
ग्लूकोज की बोतल और अनगिनत ऐसी वस्तुऐँ बीन कर अपनी झोली मेँ भरते हैँ
जिन्हेँ छू कर उनके छिले हुऐ घावोँ के रास्ते करता है प्रवेश उनके जिस्म
मेँ असमय मौत ।

जब सडक पर पलटकर
तेज रफ्तार गाडी का शिकार होता है रामखेलावन का रिक्शा
और अमीरजादे ठेँगा दिखाकर
निकल जाते हैँ चिल्लाते
राम खेलावन की हार उनके जीत का जश्न है
उसके आँखोँ मेँ आँसू नहीँ तब खून रिसता हुआ देखती हूँ
जब वह साहूकार को हरजाने की रकम चुकाने के लिऐ
अपनी जमीन का आखिरी टुकडा भी गिरवी रखता है ।

मेरी अभिव्यक्ति का स्वर उस क्षण और विकृत हो जाता है
जब दाँत निपोर कर चिथडे मेँ लिपटे शीशु को छाती से चिपकाऐ
अधनंगी भिखारन
फैलाती है हाथ गोरोँ के सामने और वह आत्ममुग्ध मुस्कान संग
गर्व से खिँचते है फोटो
दिखाते हैँ सत्य वर्तमान भारत का विश्व को ।

लुप्त हो रही तेजी से मानवीय करुणा
बिखर रहे स्वर संवेदनाओँ के
खादी प्रतीक बन गया है
दंगा लूट बलात्कार चित्कार का
दागदार हो गयी लोकतंत्र की ईमारत

इस दौर मेँ
मेरी कलम ही मेरी अभिव्यक्ति और विरोध का माध्यम है


सुनो युधिष्ठिर


सुनो युधिष्ठिर!
आज मेरे लिए दुनिया का यक्ष सत्य मृत्यु नहीँ
और न-ही तुम्हारा अभिशाप है ।

घात - प्रतिघात सहते हुए
मेरे पैरोँ के नाखून ठूठ हो चुके हैँ
अब वह लहूलुहान नहीँ होते
किसी भी चट्टानी ठोकर से
और न - ही एक सरसराता सा दर्द ह्रदय तक पहुँचता है ।

सुनोँ युधिष्ठिर !
पीढी दर पीढी तुम्हारे अनगिनत प्रहारोँ को सहते हुए
द्रौपदी , सीता , अहिल्या को गुनते हुए
मेरी संवेदनाओँ की दीवार अटल हिमालय हो चुकी हैँ
उसे अब तुम्हारी सभ्यता के सूप से उलिचा हुआ
संस्कारोँ का गंगा जल नहीँ चाहिए
नहीँ चाहिए बेमानी वर्जनाओँ के उपले
जिसे जीवन की भट्ठी मेँ झोँक कर
सेती रही तुम्हेँ 

सुनो युधिष्ठिर !
 
आज का यक्ष सत्य अब मैँ जानती हूँ
तुम्हारे अन्तिम प्रहार की सीमा पहचानती हूँ
समझती हूँ तुम्हारे आँखोँ की भूख की भाषा
किसी विषधर सम रेँगते हुए तुम्हारे हाथोँ के स्पन्दन और लोभ का चुम्बन
मुझे कैकट्स की तरह चुभता है
इस लिए मेरे मन का समुद्र डूबो देना चाहता है
तुम्हारे लोभ के जंगल मेँ भटकते हुए काम की पिपासा को ।


सुनो युधिष्ठिर !
जब तुम्हारी आँखेँ केवल मेरे देह के भूगोल मेँ ,
गहराई और ऊँचाई की परिक्रमा करती हुई
मन की दुर्गम हवेली मेँ पहुँचती है
आँखोँ की भाषा ज़बान से होती हुई आदिम बन जाती है
रौँदती है मन भर अनुभूतियोँ के मखमली बिछावन को
इस लिए मैँने नकार दिया है
तुम्हारे यक्ष सत्य को
शाप को ,
गढ लिए हैँ
कुछ नवीन सत्य की परिभाषाऐँ
जहाँ कुछ नन्हीँ गौरया के सुकोमल डेँगेँ
पहनी उडती हुई आँगन और देहरी को उलांघ कर मेरी बेटियोँ का उन्मुक्त नभ है
हाँ युधिष्ठिर !
ये एक नवीन लोक है
जहाँ मैँ तुम्हारे समानान्तर खडी हूँ ।


उम्र के चालीसवे पायदान पर

भाग - 1  

उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
खडी मैँ देख रहीँ हूँ पलट कर
जीवन अध्याय ।
जीवन कभी अल्मस्त , अल्हड सी गाँव की गुईयाँ संग खेले गये
गुड्डे और गुडिया की कहानी तो
कभी माँ के गीतोँ मेँ पिरोये
राजा और रानी के जीवन संघर्ष की कहानी लगता है ।
धीरे - धीरे छूटते गये
रेत की तरह फिसलते गये
मुट्ठी मेँ कैद बचपन के स्वप्न
किशोर मन की आकाँक्षा
वो पहले प्रेम - पत्र की गुदगुदाहट
और युवा मन की बेचैन अभिलाषाओँ का अर्न्तद्वन्द
कैद ही रहा चौखट के भीतर
तुलसी के चौरे पर बँधे कलावे की तरह जीवन आँगन और गलियारे के मध्य भटकते हुए
बीत गया संस्कारोँ के बिहड मेँ
जीवन के बीस वर्ष ।
उम्र के चालीसवेँ पायदन पर बैठी निहारती हूँ
जीवन के मध्य का इतिहास
तो पाती हूँ सर्वत्र अपने मैँ का बिखरा हुआ भग्नावशेष
और कण्ठ तक रुका पडा विष
जो अभी तक रुका है ठीक ह्रदय के ऊपर
बैठी हूँ बनकर नीलकण्ठ ।
बीस के बाद मैँ पृथ्वी के रंगमँच पर ,
निभाती रही माँ , बहन , बेटी .बहू .पत्नी का किरदार
पाती रही स्वर्णपदक
मार कर खुद के अस्तित्व को ।
बचपन छूट गया . पीछे . बहुत पीछे
चलता रहा समय चक्र ।
भाग - 2
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर बैठी
मैँ देख रही हूँ . बीते हुए पतझड और बसन्त
वर्षा और धूप
पाती हूँ
मेरी उँगली थाम चलने वाले पौधे , भाग रहे हैँ सरपट
निबटा चुकी हूँ जीवन के साठ प्रतिशत काम
फिरभी कुछ रिक्त है ।
अब थक चुकी हूँ बुहारते हुए आँगन
चढते हुए मन्दिर की सीढियाँ
आस्था - अनास्था का द्वन्द
जारी है
अब नहीँ लगती मुझे देवी की मूर्ति ,सच्ची
वह पुरुष सत्ता की साजिश के तहत
कैद , मन्दिरोँ मेँ
उपयोग की हुई वस्तु लगती है ।
और मैँ निकल पडी हूँ अब
तलाशने , अपना अस्तित्व
हाँ
उम्र के चालीसवेँ पायादन पर
मैँ खुद को पहचाने लगी हूँ
इस लिये माँग लायी हूँ
कुम्हार से चाक
कुछ शब्दोँ की गिली माटी का लोना
और गढ रही हूँ
हाशिये पर बिखरे हर्फ़ से
जीवन का मजबूत गढ
जहाँ चल रही है कोशिश
रचने की . एक नयी कहानी ,
क्योँ कि मैँ जान चुकी हूँ कि
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर , एक बार फिरसे
जन्म लेती है औरत ,और लिखती है
जीवन की कहानी
यहाँ कोयी राजा है न रानी ।
भाग - 3 .
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर
बैठी , देख रही हूँ
कि , अब मैँ जीवन समर मेँ
ठहरी हुयी , स्थिर मैदानी नदी हूँ ।
अब नहीँ आते स्वप्न रंग- बिरंगे
नाचते , गाते , रुठते , मनाते
बचपन के ।
युवा मन की तरंग , जो बहा ले जाना चाहती थी
तमाम बेमानी वर्जनाओँ को ।
अब मैँ शिकायत नहीँ करती पिता से
कि क्योँ ब्याह कर भेज दिया
पराये देश ।
अब मैँ निकल पडी हूँ निश्चिँत
खुद की तलाश मेँ
निभाते हुए डयोढी की शर्त ।
शारीरिक . मानसिक . सामजिक , अनुबन्धोँ को धीरे - धीरे रख रही हूँ
तुलसी के चौरे पर बने ताखे मेँ
और खोज रही हूँ अपने हिस्से का आकाश
लिख रही हूँ " बदनाम औरतोँ " का सच
दर्ज कर रही हूँ " तीसरी बेटी का हलफनामा "
अब देवालयोँ मेँ नहीँ लगाती आस्था के फेरे
ये समय बीतता है अनुभव के पुस्तकालय मेँ
पढती हूँ . रचती हूँ . देखती हूँ .
सुनती हूँ, जीवन समर मेँ
गुनती हूँ , चुनती हूँ समुद्र से कुछ मनके
और सजा देती हूँ टूटती हुई वर्जनाओँ के द्वार पर टाँक कर तोरण मेँ ।
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।
भाग - 4
उम्र के इस पायदान पर
मुक्त हो शारीरिक अनचाही
क्रियाओँ से औरत निश्चिँत एक नया अध्याय लिख रही है
अब गीता , मानस , मन्दिर की परिक्रमा छोड , रच रही है
शब्दोँ की तुलिका से यौवन के गीत ।
हाँ मैँ देख रही हूँ कि ये औरतेँ अपनी दमित इच्छाओँ को फिरसे जगा,
रंग भर रही है सपनोँ के खाली कैनवास पर ।
ये जानती और पहचानती हैँ धरती की गहराई और आकाश के विस्तार को.
इसलिये सधे कदमोँ से भरतीँ हैँ उडान ।
ये तितली के मन की बात सुन सकती हैँ
और भँवरोँ के मधुर गान के धुन पर नाच सकतीँ हैँ
दिखा सकती हैँ अपने सधे कदमोँ का हुनर, जहान को ।
ये औरतेँ जो केवल जीती रहीँ
वर्जनाओँ के दायरे मेँ जीवन
अब निकल रही हैँ ठीक पृथ्वी की नाभी से लेकर अमृत कलश
उम्र के चालीसवेँ पायदान पर ।

 --

-परिचय-
नाम- डा. सोनी पाण्डेय 
पति का नाम - सतीश चन्द्र पाण्डेय
जन्मतिथि- 12-07-1975

शिक्षा - एम.ए. हिन्दी, बी.एड. पी.एच.डी, कथक डांस डिप्लोमा, बाम्बे आर्ट
अभिरुचि - लेखन, चित्रकला, साहित्यिक पुस्तकेँ पढना
सम्प्रति - अध्यापन
संपादन - गाथांतर हिन्दी त्रैमासिक
विभिन्न पत्र पत्रिकाओँ मेँ कविता कहानी, लेख का प्रकाशन
पता - संपादक गाथांतर, श्री रामचन्द्र पाण्डेय, कृष्णा नगर. मऊ रोड, सिधारी आजमगढ
मोबाईल नम्बर- 9415907958

2 comments:

  1. बहुत अच्छी कविताऎ।

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  2. बहुत जानदार ..बेख़ौफ़ कविताएँ ।बधाई ।

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