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Sunday, 14 December 2014

डॉ गुणशेखर की कहानी 'स्विच ऑफ'


कहानी
स्विच ऑफ़

डॉ. गुणशेखर

पना गाँव है बिलौली खुर्द. यहीं पर मुख्य बाज़ार के बीचोबीच सन पैंसठ की लड़ाई के शहीद राम बिलास पासी का स्मारक है. इन्होंने अकेले अम्बुश लगाकर पाकिस्तान की समूची बटालियन को ऐसा तहस-नहस किया था कि पाक सेना के बड़े-बड़े शूरमाओं के छक्के छूट गए थे. आगे-पीछे चल रही उनकी दो टुकड़ियों का तो इन्होंने बिल्कुल सिरे से ही इतनी सफ़ाई से सफ़ाया कर डाला था कि उसमें से कोई ख़बर देने वाला तक नहीं बचा था.उसी लड़ाई में इनके सीने में पाँच और दाएँ पैर में घुटने के ऊपर जाँघ में एक ही ठौर पर तीन गोलियाँ ऐसी लगी थीं कि जांघ से नीचे की पूरी टांग केवल तीन इंची खाल से जुड़ी थी फिर भी इन्होंने घिसटते-घिसटते भी तिरंगे को हाथ से नहीं छोड़ा था. उसे बराबर ऊपर उठाए रखा था.इसके लिए इन्हें परमवीर चक्र भी मिला था. शहादत के बाद इनके लड़के राम अधार को भी सेना में नौकरी मिल गई थी. उन्होंने भी सन इकहत्तर की लड़ाई लड़ी थी. वे डंडा टेकते हुए यहीं आकर चबूतरे पर बैठते हैं. न जाने क्यों उन्हें शंका है कि उनके पिता के स्मारक को कोई गिरा न दे. उनकी जांबाज़ी के किस्से-कहानियाँ सुनने के लिए बच्चे भी यहाँ इकट्ठे हो जाते हैं. राम अधार को बिल्कुल पसंद नहीं कि उनके शहीद पिता के आगे जाति लिखी जाए क्योंकि किसी भी शहीद की जाति केवल देशभक्ति होती है. उनके अनुसार नाम ही पर्याप्त था. अब पत्थर पर लिखे हुए को वो मिटा तो सकते नहीं पर  पछताते अवश्य हैं. उन्हें यह सब ऊँची जाति वालों की चाल लगती है. जो भी वहां जाता है, वे हर उस व्यक्ति को अपने पिता की शहादत का प्रमाण पत्र ज़रूर दिखाते हैं जिसमें नाम के आगे पासी का तो कहीं दूर-दूर तक उल्लेख नहीं है. नाम की ज़गह बस राम बिलास लिखा है.
          लांसनायक राम अवध की इकलौती बेटी है राधा. उन्होंने उसे बड़े नाज़ों से पाला है. पिछले सावन में जबसे उनकी पत्नी चल बसी हैं, कुछ ज्यादा ही टूट गए हैं. कोई अच्छा घर-वर देखकर उसके हाथ पीले करने में ही उनका सारा ध्यान लगा है. लड़की इंटर है तो लड़का बीए होना ही चाहिए. बूढ़े हैं चल-फिर पाते नहीं तो गाँव आने वाले हर रिश्तेदार के पास बैठकर उससे योग्य वर का पता लगाते हैं. वे और मामलों में तो प्रगतिशील हैं लेकिन रोटी-बेटी के मामले में अपनी जाति से बाहर नाहीना पाते. लड़की के प्रेम विवाह पर वे  भी गाँव के मुखिया की इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि इससे कुल-खानदान की नाक कटती है. अतः ऐसा करने वाले प्रेमी युगल को बदले समाज में भले सरे आम मौत के घाट न उतारा जाए लेकिन गाँव में प्रवेश की अनुमति बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए. अपने पिता के इसी मिलिटरी रुआब और डर के मारे जाति बिरादरी से बाहर जाकर परभू से प्रेम करने वाली राधा उनके सामने धोखे से भी परभू का नाम अपनी जुबान पर आने नहीं देती.         
            चुनाव सर पर हैं.पूरा का पूरा  गाँव तरह-तरह के झंडों-डंडों  से पटा पड़ा है. निर्वाचन सूची पर जगह-जगह चर्चा चल रही है. मौके के प्रधान ने जिला हेडक्वार्टर जाकर पिछले चुनाव वाली सूची के एक चौथाई नाम काट-छाँट के बराबर करवा दिए हैं. इस बार तो लांस नायक राम अवध  का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है. जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीएम साहब के नाम अप्लिकेशन लिखने वालों की चाँदी हो गई है. ब्लाक पर जहाँ नज़र डालो वहीं जगह-जगह कुर्सी-मेज़ डाले मेढकों की तरह मुंशी ही मुंशी खटर-पटर अप्लीकेश्नें टाइप कर रहे थे. हर सड़क चौराहे पर अपने-अपने मौज़ूदा परधानों की माँ-बहनों को संबोधित करते हुए भारत के सुसंस्कृत नागरिक उसी ब्लाक की चहारदीवारी पर जहाँ-तहाँ पान का पीक उड़ेल रहे थे. रामदीन इन पचड़ों से बाहर है. उसने  उस सूची में  अभी तक अपना नाम नहीं देखा-दिखवाया है. होगा तो वोट डाल देंगे नहीं होगा तो गरमी में ऐसी-तैसी कराने कहीं नहीं जाएंगे. 
            रामदीन अपने बेटे के साथ  पिछले दो-तीन चुनावों में जांघिया बनाने के लिए खूब फटे-पुराने बैनर बटोरते आए हैं. उन्हें अपना  बेटा परभू अब भी पांच साल पहले हुए पिछले चुनाव वाला बारह चौदह साल का छोरा लगता है. वह अब ग्रेजुएट होने जा रहा है. गरीबी में पला है तो क्या हुआ ? स्वाभिमान भी तो कोई चीज़ होती है. उसके पहनावे पर अब किसी और का नहीं केवल राधा का कहा चलता है लेकिन वह अपनी माँ को भी नाखुश नहीं करता. अबकी नरगा देवता के मेले से राधा अपनी पसंद के थान से एकदम चमाचम चमकते हुए पैंट-शर्ट कटवा लाई. इन कपड़ों को परभू को सौंपते हुए उसने साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था, "इन कपड़ों के अंदर बैनर वाली जाँघिया मत लटका लेना. अगर कहीं मैंने ऐसा देख लिया तो दोनों फाड़ डालूँगी." राम अवध  जिन्हें वह बड़े आदर से ताऊ कहता है वे भी उसके बाप से इसीलिए नाराज़ रहते हैं कि वह ऐनर-बैनर बटोर कर दलितों की तौहीनी करवाता  है. उनके अनुसार परभू का बाप बेमतलब सवर्णों की खुशिया थामता घूमता है.
             इस चुनाव में भी प्रभुदेवा अपने बापू को दिखाने के लिए और लड़कों से ज़्यादा खुश दिखना तो चाहता है पर लाख कोशिशों के बाद भी मन में पिछले चुनाव जैसी उमंग नहीं आ पा  रही है. उसे लगता है कि कहीं राधा न देख रही हो. आते-जाते कहीं ताऊ राम अवध  की नज़र उस पर न पड़ जाए. किशोरावस्था और तरुणाई जितना पियर प्रेशर से चलती हैं उतना माँ-बाप की इच्छा से नहीं. साथी क्या सोचेंगे ? गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड क्या कहेगा ? हर एक किशोर-किशोरी को इसी मकड़जाल में उलझे उलटे लटके हुए देखा जा सकता है. इसी लिए जो भी बैनर लगाने आता है कहने-सुनने पर परभू उसके साथ हो तो लेता है लेकिन ऊंचे-ऊंचे खंभों पर चढ़ने को पिछली बार की तरह आसानी से राज़ी नहीं होता. अबकी पहले इधर-उधर देखता है फिर खूब आदर कराता है तब चढ़ता है और उनके बैनर लगाता है. अबकी बार पहले जैसा नहीं है कि कोई खुश हुआ तो दिन भर बैनर लगवाने के मेहनताने  के रूप में पूड़ी-सब्जी खिला दी और नहीं हुआ तो कोई बात नहीं. बड़ा और समझदार होकर भी परभू अबतक वह बात नहीं भूला है कि पिछले चुनाव में एक नेता ने उसे पूड़ी-सब्जी भी खिलाई थी और शाम को चलते समय दस रुपए भी दिए थे. उस नेता का वह उदार चेहरा आज तक उसे याद है. इन स्वार्थी नेताओं के बीच परभू को वह भगवान लगता था. राधा और उस नेता के दिए दस-दस मिलाकर कुल बीस रुपयों में  उसने पहली बार नई नोटबुक और एक पतला रजिस्टर ख़रीदा था. किसी नई नोटबुक पर लिखना कितना अच्छा लगा था उसे! खैर! राधा तो उसकी अपनी है पर एक गैर नेता ने उसके साथ जो उपकार किया था उसका वह सुखद अहसास अभी तक न भूला है, न भूलेगा. परभू ने उसे हर मेले-ठेले, हाट-बाज़ार कहाँ नहीं खोजा है पर वह नेता आजतक उसे लौट के नहीं मिला. अब इन बैनरों में बिल्कुल रुचि न होते हुए भी वह जांघिए के कपड़े से ज़्यादा उस नेता को उनमें  खोजता रहता है. वह न सही  कहीं उसका फोटो ही दिख जाए. इस बरस प्लास्टिक की माया है. इस माया के चलते इन बैनरों में उसे न तो पिछले चुनाव वाला वह उदार  नेता ही  दिखाई दे रहा है और न ही जाँघिया.
                ब्राह्मण महासभा के पंडित गयादीन, राजपूत सभा के स्वयंभू अध्यक्ष शिव नंदन सिंह राजपूत, जाटव समाज के मुखिया मास्टर रामधारी और मुरारी लाल आर्य, पासवान प्रगति संघ के बनवारी पासवान, शाक्य सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शोभाराम शाक्य और पाल जाति  उत्थान समिति के प्रांतीय महामंत्री दीनानाथ पाल इसी बिलौली खुर्द में अलग-अलग झंडा गाड़े कोई क्षेत्रीय तो कोई राष्ट्रीय पार्टियों के सिपह सालार हैं. सबको अपनी-अपनी पार्टियों से गाँव में उनकी जाति की वोट के अनुपात में अच्छी-खासी रकम मिली है, लेकिन सभी अपने-अपने तर्क देकर पैसे लेने की बात को सिरे से खारिज़ करते हैं. यहाँ लांस नायक राम अवध पासी और रामदीन की राजनीतिक गलियारे में कोई पूछ नहीं है. यद्यपि रामदीन धोबी समाज का प्रमुख है फिर भी नेतागण उससे कन्नी काटते हैं. कपड़े धोने के अलावा उसे किसी और तरीके से किसी से चवन्नी नसीब नहीं हुई है. इसका कारण रामदीन नहीं बल्कि एक तो बिलौली खुर्द में धोबियों की कमी दूसरे रामदीन का नैतिकतावादी होना है. इसी नैतिकता के चलते सब नेताओं के कुरते-पाजामे धोके झक्क-सफ़ेद करने के बावजूद पिछले चुनावों में उसका बेटा परभू और वह खुद मैली कुचैली जांघियों  में सारे गाँव में फिरकी-से नाचते रहे हैं. औरतों में सिर्फ़ जमना दाई ही मर्दों के साथ मैदान में दिखती हैं. लोग बताते हैं कि जमना दाई को भी मोटी रकम मिली है पर वे कसमें खाती हैं कि, "अगर, मैंने किसी का भी एक धेला भी अपने हाथ से छुआ हो तो इसी तरह सात जन्मों तक बिधवा और निपूती रहूं. "जमना दाई की इस बात पर चुटकी लेते हुए हाथी के साथी सकटू, कमल के दीनानाथ मिसिर, साइकिल के सोहन लाल यादव , झाडू के झवेरी लाल और पंजे के प्रज्ञान पांडे आदि सारे के सारे पुरुष एकमत हैं. वे सबके सब अन्य बातों में बिल्कुल अलग मत रखते हुए भी दाई के बारे में एक सुर से कहते हैं, "चोर,छिनार,जुआरी. इनसे गंगउ मैय्या हारी." इन सबकी इस टिप्पणी पर जमनादाई का दो टूक जवाब रहता है कि, "औरत को आगे आते देख इन मर्दों के पेट में मरोड़ उठने लगती है. छिनार होंगी इनकी अम्मा और चोर होंगे इनके बाप. राम कसम, अबकी अगर इन सबन को धूल न चटाई तो मैं जमना दाई नहीं."
          इस बार परभू अपने बापू रामदीन से थोड़ा कटा-कटा सा रहता है नहीं तो बाप-पूत दोनों साथ-साथ बैनर के ही जुगाड़ में नाचते मिलते .अपनी ओर से तो रामदीन ने अपने बेटे को अकेले इसी काम पर लगाया हुआ है और खुद भी  बराबर चलता रहता है.इस कार्यालय से उस कार्यालय,उस कार्यालय से इस कार्यालय.ऐसा लगता है कि जैसे उसके पाँव हांड़-मांस के हों ही न.उन  पांवों में लोहे के  पहिए लगे हों.शाम को बाप-बेटे हिसाब भी लगाते हैं कि पूरे चुनाव में किस पार्टी के कितने बैनर लगेंगे.कितने तीन बाई दस के होंगे और कितने दो बाई पांच के या फिर बीस बाई तीस जैसे बड़े .परभू के बहुत जोर डालने पर रामदीन ने नेताओं के सामने पहली बार बैनर लगाने के लिए पैसे की डिमांड रखी थी.इस अप्रत्याशित माँग से पहले तो नेताओं की नाक-भौं सिमटी-सिकुड़ी लेकिन जब परभू अपनी मांग पर अडिग रहा तो कसमसाकर ही सही पर बात माननी पड़ी .अंततः छोटे-बड़े हर बैनर की लगवाई दस रुपए फिक्स हुई.इस तरह से अबकी ये इसलिए विशेष खुश हैं कि बैनर का कपड़ा मिले चाहे न मिले प्रति बैनर के हिसाब से लगवाई तो ले ही  रहे हैं.पर,पुरानी आदत के मुताबिक़ सब जोड़ घटाके बार-बार वे इसी अनुमान  पर अटक जाते हैं कि कितने बैनर कपड़ों के होंगे और कितने प्लास्टिक के  यानि फ्लेक्सी बैनर.प्लास्टिक  की जन्घियाँ  तो बन नहीं सकतीं.इसी से इस बार इन दोनों की आपसी चर्चा में सबसे बड़ा मलाल भी  इसी बात का रहता है कि  ज़्यादातर पार्टियों के बैनर-पोस्टर प्लास्टिक के ही क्यों हैं?
                   बिलौली खुर्द का  पड़ोसी गाँव है साईँ खेड़ा .यहाँ  भी खूब चहल-पहल है.इस बार के चुनाव में पूरे गाँव की छतों पर साइकिलें  ही साइकिलें  लहरा रही हैं. कहते हैं कोई सौ साल पहले यह गोसाईं खेड़ा था.इस गाँव के एक युवक ने किसी मुसलमान लड़की से शादी क्या कर ली गाँव की किस्मत ही पलट गई. पहले तो केवल व्यक्ति का धर्म परिवर्तन होता था. जगत गोसाईं काण्ड से तो गाँव का भी हो गया था.धर्म परिवर्तन के साथ उसका नाम भी  बदल कर गोसाईं खेड़ा से साईँ खेड़ा हो गया था. ये गोसाईं लोग गेरुए वस्त्र पहनते थे.इनमें से कुछ संन्यासी थे तो कुछ गृहस्थ लेकिन वस्त्र सभी गेरुए ही पहनते थे .दल के दल दूर-दूर तक जाते-आते थे.पुरखे लोग बताते हैं, 'ये सब लँगोटी के पक्के होते थे. 'इसी लिए सभी कौमों में आदर-सम्मान की नज़र से देखे जाते थे. अपने गाँव बिलौली खुर्द और साईँ खेड़ा दोनों से कोई बीस कोस दूर नाक की सीध धुर पच्छिम में मोहान रोड पर  एक गाँव है रंगरेज़न पुरवा. उसी गाँव में एक रंगरेजन रहती थी.उसका नाम था नूर बानो. बुजुर्गों के अनुसार जैसा नाम वैसा रूप.क्या नूर था उसके चहरे पर.वह देसी  रंगरेजन क्या बिल्कुल बिलायती अंग्रेज़न थी. गाल कश्मीरी सेब-से एकदम लाल-सुर्ख.देह इतनी नाज़ुक कि कहीं भी दूब भी छुआ दो तो खून छलक आए. वह जैसे सूरत से बला की खूबसूरत थी वैसी ही सीरत की भी.जगत गोसाईं तो अपने साथियों के द्वारा चुटकी लिए जाने पर उनसे उसके बारे में बस इतना ही कह पाते थे, "का सरबरि तेहिं देउ मयंकूचाँद कलंकी वह निकलंकू."
          इलाके भर में नूरबानो  कपड़ों की रँगाई के काम में बहुत मशहूर थी.ये गोसाईं उसी से कपड़े रंगवाते थे.जब ये लोग जाते तो वह मस्तमौला रँगरेज़न इनसे कबीर का वह पद ज़रूर सुनाने के लिए कहती जो जोगियों के लिए बहुत चर्चित था,'मन न रंगायो ,रंगायो जोगी कपड़ा.' इन गोसाइयों में जगत गोसाईं का कंठ सबसे मधुर था.कपड़ा रंगाते-रंगाते जगत उससे अपना मन भी कब रँगा बैठे यह उन्हें होश ही न रहा.एक दिन दोनों लापता हो गए.जगत के  सारे के सारे नादान साथी  गोसाईं उसी गाँव में महीनों गोल-गोल घूमते और यह कहते हुए अपने साथी को ढूँढ़ते रहे कि रंगरेजिन कामरूप की मायावी स्त्री है. उसने उनके साथी को तोता बनाके पिंजड़े में बंद कर लिया है.दिन भर तोता बना के रखती है और रात में उसे इंसान बनाके अपने पास सुलाती है.अपने इसी अंध विश्वास के आधार पर उन्होंने गाँव में धरना तक दे दिया था .उधर रंगरेजिन के गाँव वालों ने जगत गोसाईं पर आरोप लगाया था कि  वे उसे ले उड़े हैं.जगत की यह बात केवल दो गाँवों तक ही सीमित न रही. वह सारे जगत में फैल गई. अब यह बात दो जनों या गाँवों की ही नहीं दो धर्मों की भी हो गई थी.धरने पर बैठे गोसाइयों को भी शंका की नज़रों से देखा जाने लगा था.शुक्रवार की शाम की नमाज़ में रंगरेज़न पुरवा की मस्ज़िद में कुछ ज़्यादा ही भीड़ दिखी.गोसाइयों को डर लगा.उन्होंने हवा का रुख जल्दी ही भांप लिया और उसे  उलटा बहते देख अँधेरे का लाभ उठाते हुए झोरी-झंडी समेटी और चलते बने.मुसलमानों की इस चहलकदमी से हिन्दुओं में भी हरकत बढ़ी.बजरंग दल ,हिन्दू सेना और आर एस एस वालों तक जब यह बात पहुँची तो सुबह की शाखा के बाद बैठक हुई.बैठक में विचार किया गया कि रंग्रेज़न  पुरवा  पूरा का पूरा मुसलामानों का गाँव है.वे तादाद में बिलौली खुर्द और गोसाईं खेड़ा दोनों से ज्यादा भी हैं.अपने पड़ोसी मियाँ पुरवा में उनकी ब्याहाधरी भी है.बीस कोस की दूरी आज के साधनों के ज़माने में कोई दूरी नहीं होती.किसी भी साधनसे वे अपनी लड़की को ढूँढ़ने के बहाने आकर और मियाँ पुरवा को मिलाकर रात-बिरात हिंदुओं पर आक्रमण कर सकते हैं.सुबह शाखा के बहाने लाठियाँ इकट्ठी हुईं.दूसरे कस्बों की शाखाओं से भी लोग आए.कहने के लिए बिलौली खुर्द में कुस्ती और लाठी चालन के कौशलों की प्रतियोगिताएँ हुईं लेकिन  मियाँ पुरवा के मुसलमानों को साफ़ लग रहा था कि यह कोई सामान्य प्रतियोगिता नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन है और यह सिर्फ़ उनके लिए ही किया गया है.
         पहले बात धर्म पर अटकी. दंगे तक की नौबत आ गई. मियाँ पुरवा, गोसाईं खेड़ा और बिलौली खुर्द इन तीनों गावों के सरकारी स्कूलों पर महीनोंपीएसी और आर ए एफ पड़ी रही. बच्चों की  पढ़ाई चौपट हो गई लेकिन मास्टरों की  बन आई.उन्होंने जमकर खेती-किसानी की. सूद खोरी और व्यापार से उठाए लाभ से चाँदी काटी.किसी तरह वह मामला शांत पड़ा तो उसके बाद  बात जाति पर आके टिक गई.जाति-बिरादरी वालों ने कहा कि जितने गोसाईं वहाँ जाते थे सबने उस मुसलमानिन  का छुआ खाया-पिया है.सबका धर्म भ्रष्ट हो गया है.पहले सब खाना दें तब गाँव  में प्रवेश करें.बिलौली खुर्द के मुखिया की ओर से बाज़ार में डुग्गी पिट गई कि अगर जात-बिरादरी को बिना खाना दिए जगत और उनके साथी कानी चिड़िया को भी गोसाईं खेड़ा में दिखे तो पूरे गाँव की लोटिया बंद कर दी  जाएगी.साल-दो साल वे गाँव  में दिखे भी नहीं.लेकिन इस  दौरान यहाँ के  गाँव-गाँव में जगत गोसाईं और रंगरेजिन के  प्यार के किस्से लैला-मजनूँ के किस्सों की तरह जन-जन की जुबान पर चढ़ चुके थे.एक तबके का तो यह मानना था कि ये दोनों राजा भरथरी और उनकी रानी के अवतार हैं.उन्हीं सबके मुखारबिंद  से फूटी किंबदंती के अनुसार महाराज भर्तृहरि जब जोगी बनके घर से निकलने लगे तो रानी उनके पैरों पर पड़ गई और कहने लगी कि, ' महाराज! पहले मैं जानती थी कि पुरुष की तरह स्त्री भी एक से अधिक से प्रेम कर सकती है.लेकिन अभी मेरा भ्रम दूर हो गया है.मुझे माफ़ कर दें राजन!' इस तरह एक युग तक बिना कुछ खाए-पिए वह पैरों में पड़ी रही तब जाके महाराज ने उसे माफ़ी देते हुए कहा था कि ,'कलयुग में एक गाँव ऐसा होगा जहाँ जोगी ही जोगी होंगे वहीं मैं अपने योगियों के साथ अवतार लूँगा और तुम वहाँ से बीस कोस दूर के एक गाँव में रंगरेजिन होगी.तुम्हारा यह प्रेमी वहाँ तुम्हारा पति होगा. यहाँ जैसे तुमने मुझे धोखा दिया है वैसे ही  वहाँ भी अपने इस प्रेमी यानी तबके पति रूपी रंगरेज़  को धोखा दोगी और तब मैं तुम्हें लेकर भाग जाऊँगा.इस तरह मैं अपना संन्यास त्याग दूँगा और  तुम भी  अपने पाप  से मुक्त हो जाओगी. '  यह बात और है कि पड़ोसी गाँव के हिंदुओं का ही इन योगियों  से चिढ़ने वाला एक तबका और था जिसने उस गाँव  को म्लेच्छों का गाँव सिद्ध करके उससे हर प्रकार के रिश्ते काटने के लिए समाज को उकसाना जारी रखा था.उनका लालच यही था कि जब ये लोग तंग आकर गाँव छोड़कर भाग जाएँगे तो उनकी जमीनें  हथिया लेंगे.इनकी युक्ति काम आई.परिणामतःवह गाँव हिदुओं के लिए वर्ज्य-सा  हो गया था.इस तरह उस गाँव ने  न केवल अपने  भीतर के जगत को खोया बल्कि बाहरी जगत से भी खुद को  खो लिया था.इसमें उनकी क्या गलती थी न तो यह किसी और ने उन्हें बताया और न उन्होंने ही उसकी तह में जाकर  पड़ताल की और लंबे अंतराल तक समाज से अपनाए जाने की चाह में अलग-थलग पड़े रहकर भी किसी और धरम की शरण में नहीं गए.
           धीरे-धीरे गोसाईं खेड़ा गाँव की ऎसी बदनामी  फैली या फैलाई गई कि यहाँ गाय कटती है.यहाँ चोरी-चोरी नमाज़ पढ़ी जाती है आदि ,आदि .इससे उनके शादी-ब्याह रुकने लगे. उनके रिश्तेदारों पर भी सामाजिक बहिष्कार के संकट के बादल गहराने  लगे. आखिर कब तक जवान लड़के-लड़कियाँ कुआँरे बैठाए रखे जा सकते थे.एक दिन तंग आकर जब  पूरे गाँव ने इस्लाम स्वीकार कर लिया तब पूरे देश में हाहाकार मच गया. हिन्दू धर्म के बड़े-बड़े नेता उनके पास आए. सनातन धर्म की खूब दुहाइयाँ दी गईं.किसी को अपना नाम न बताने की शर्त पर इन्हीं गोसाइयों में से कुछ लोग यह भी बताते हैं कि स्वामी अग्निवेश, सिंघल और बाबा राम दास ने आर्य समाजी तरीके से इन्हें सन नब्बे  के आस-पास हिदू बना भी लिया था. गाँव के पूरब पड़ी ग्राम समाज की ज़मीन पर जगत गोसाईँ और रंगरेज़न का मंदिर भी बना. इन दोनों की मूर्तियों की बगल में साईँ बाबा की भी मूर्ति लगी. कुल मिलाकर गोसाईँ और साईँ का ऐसा मिश्रण किया गया गया कि इस मंदिर का न हिंदू विरोध कर पाए न मुसलमान. वे गोसाईं से साईँ फिर साईँ से गोसाईं  बने और मंदिर में पूजा-अर्चना भी करने लगे.आस-पास के गाँवों की लड़कियाँ वर पाने की अभिलाषा में नूर बानो रंगरेजन  और जगत गोसाईं का व्रत रहने लगीं और हर सोमवार नियमित जल चढ़ाने आने लगीं. इनमें पूर्व सैनिक राम अवध की बेटी राधा भी थी. राधा तो मन ही मन परभू को जगत गोसाईं का अवतार ही मानने लगी थी. वह जगत गोसाईं की मूर्ति और परभू की मूरत में मन ही मन साम्य भी बैठाने लगी थी.
       

हिन्दू बनने पर जब कोई मुसलमान यहाँ के गोसाइयों को अपनी  लड़की देने को तैयार नहीं हुआ तो इनकी आँखों के आगे अँधियारी छा गई. तथाकथित कुलीन ब्राह्मणों ने तो जगत गोसाईं के समय से ही अघोषित तौर पर इनके यहाँ अपनी बहिन-बेटी न देने का संकल्प ले ही रखा था अब अकुलीन भी बड़के कुलीन बनने  लगे थे लेकिन जिनके यहाँ कुल नीचा होने के कारण शादी के लिए कोई ब्राह्मण नहीं आता था
, उन्होंने इन पर एक उदारता ज़रूर दिखाई थी कि इन्हें ब्राह्मण माना था और इनकी लड़कियाँ स्वीकारते थे. पर, अंदर-अंदर उन अकुलीन ब्राह्मणों  ने  भी अपने को मान्य बताते हुए किसी भी कीमत पर अपनी बहन-बेटी को उस गाँव में न देने के पक्ष में संकल्प ले रखा था. ब्राह्मणों के अलावा अन्य जाति के हिन्दुओं ने भी जब इन्हें खुलकर नहीं अपनाया तो ये बेचैन हो उठे. आखिरकार तंग आकर 'पुनर्मूषको भव' की तर्ज़ पर फिर से इस्लाम की शरण में चले गए. कुछ दिनों तक तीर-तलवारों के साथ तनातनी चली उसके बाद सब सामान्य हो गया. जब किसी  तरह धर्म से पिंड छूटा तो पार्टियाँ गले पड़ गईं. जबसे दलों के दलदल में इस गाँव के पाँव पड़े हैं तबसे यह अभिशापित साईँ खेड़ा और भी बदहाल हो गया है. गाँव तक पहुँचने के लिए सही रास्ता तक नहीं है. कार तक नहीं जा सकती. चुनाव के वक्त सभी दलों के नेता आते हैं. कोई हाथी पर बैठकर आता है तो कोई साइकिल पर हाल-चाल लेते हैं और चले जाते हैं. यहाँ तक पहुँचते न पहुँचते किसी की साइकिल पंचर हो जाती है तो किसी का कमल-सा खिला चेहरा ही  मुरझा जाता है.बिलौली खुर्द की तरह इस गाँव में भी देशी शराब का ठेका तो खुल गया है लेकिन अस्पताल अब भी नहीं है. कुछ युवाओं ने यहाँ रवीश या अभिज्ञान जैसे पत्रकार को लाने की सोची तो किसी ने तरुण तेजपाल को. कोई अन्ना को लाने की सोचता रहा तो कोई अरविन्द को.साफ़-सुथरे लोग मनाने गए तो भी अन्ना ने राजनीति में आने से साफ़ मना कर दिया. तरुण तेजपाल जेल चले गए और केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए सो समय ही नहीं रहा उनके पास. रहे अभिज्ञान और रवीश वे भी अपने-अपने शो में लग गए. इन सबके अलावा भी मेधापाटकर जैसी कइयों हस्तियों को लाने की योजनाएं तो खूब बनीं लेकिन सब टांय-टांय फिस्स हो गईं.अब तो सड़क के किनारे औंधे पड़े ट्रक के फटे हुए टायर की तरह मुंह बाए पड़े साईँ खेड़ा का  कोई पुरसाहाल पूछने वाला नहीं है. गाँव वाले भी पूरी तरह से भरी  सड़क पर बिखरे पड़े फटे पैकेटों से असहाय झाँकते सामान की तरह  निराश-हताश  हैं.उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे यहाँ के विकास पर किसी ने झाडू ही फेर दी हो. चुनावों के दौरान प्रत्याशी चुनाव सभा क्षेत्र को स्वर्ग बनाने के वादे  करते हैं. बात-बात पर मिलने को दौड़ आते हैं.धोखे से भी नंबर लग जाए तो काटकर अपनी ओर से बात करते हैं और कहते हैं कि, "हमें अच्छा नहीं लगता है कि क्षेत्र की जनता का पैसा टूटे." और,जैसे वोट पड़ जाती है वही नेता कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सबकुछ भूल जाते हैं. यही नहीं चुनाव के बाद तो हारे-जीते हर नेता का फोन स्विच ऑफ़ ही रहता है.

              रामदीन के पुरखे गोसाईं खेड़ा भी कमाते थे.लेकिन जगत गोसाईं के समय पर लगे प्रतिबंध के चलते उनसे एकबार छूटा तो फिर इनके हाथ नहीं आया.अभी चुनाव के दौरान रामदीन और परभू दोनों साईँ खेड़ा फिर से  आने-जाने लगे हैं.नेता तो वहाँ भी सफ़ेद कपड़े ही पहनते हैं.धूल-धक्कड़ में खूब दौड़ते-भागते भी  हैं.इससे वे  खूब गंदे भी होते है.लेकिन वहाँ तो इकबाल मुहम्मद के चलते रामदीन की दाल ही नहीं गलती.रामदीन को लगता है कि कम से कम हिन्दू नेता तो उसे अपने कपड़े धोने को देंगे ही. इसी आशा से वह बार-बार साईँ खेड़े  के चक्कर लगाता है.जिनसे भी वह कपड़े माँगता है वे यही बताते हैं कि उनके कपड़े लखनऊ के अमीनाबाद की मशहूर पेरिस लांड्री से धुलके आते हैं जबकि सच्चाई यह है कि उन सबके कपड़े इकबाल ही धोता है.केवल बहिन जी के छुटभैया नेता उसे एकाध जोड़ी कुर्ता-पायजामा जब-तब दे देते हैं.रामदीन को अच्छी तरह पता है कि उससे इकबाल के वोट ज्यादा हैं.उसके अकेले अपने ही घर के सत्तर वोट हैं.इसलिए सारे नेता चाहे हिदू हों या मुसलमान सके सब  उसी की ओर झुकते हैं. रामदीन को इसी बात से चिढ़ होती है कि  जो नेता हिंदू-मुस्लिम,अगड़े-पिछड़े और ऊँच-नीच के नाम पर जनता को बहला-फुसलाकर बाँटते हैं,वे ही  मौके-मौके पर रंग बदलते रहते हैं.लोगों को लड़ाते हैं  और वोट लेते हैं.जो पहले रामदीन को भैया-भैया करते हैं वही काम निकलने के बाद उसे लात मार कर अवसरवादी बनकर इकबाल को काम देते हैं और अपने पुराने भैया रामदीन को ठेंगा  दिखा देते हैं .यह नहीं कि उनके लिए जैसे इकबाल वैसे रामदीन  मान कर कुछ कपड़े उसकी ओर भी बढ़ा दें.इस सच्चाई को रामदीन भी अच्छी तरह जानता है कि कपड़े धोना और प्रेस करना छोटा-मोटा  काम है.बड़े नेताओं को तो  बस धुले कपड़े चाहिए.उनको इससे कोई लेना-देना नहीं कि उनके कपड़े कौन धोता है .न जाने क्यों फिर भी उसे लगता है कि बड़ों को छोटों का दर्द  समझना चाहिए .
आज जब उनकी गर्ज़ है अगर अब भी उन्हें हमारी जरूरतों का अहसास नहीं होगा तो कल जब वे एसी में बैठकर कब्ज़ के मारे भर्र-भर्र अपानवायु छोड़ते हुए प्राणहारी कानून बनाएंगे तब हमारा होश उन्हें कहाँ से रहेगा. वह हर बार सोचता है कि अमुक गद्दार है, झूठा है, मक्कार है, एक नंबर का स्वार्थी है इसे कत्तई वोट नहीं देंगे  फिर भी न जाने क्यों वोट डालते समय उसकी मति मारी जाती है और जिसको लाख बार न कहता है, अंततः उसी  पर मुहर मार के घर आ जाता है. उसके पड़ोसी अपने वोट बेचते हैं. महीनों दावतों में मुर्ग मुसल्लम उड़ाते हैं. ड्रमों बीयर, विदेशी वाइन और देशी ठर्रा पी  जाते हैं. कभी हज़ार,कभी दो हज़ार लहराते हुए घर लाते हैं. लेकिन रामदीन को कभी लालच नहीं आता. वह कमा के खाना पसंद करता है. हराम का नहीं. वह चाहे तो अन्य दलों से पैसे लेकर भी अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकता है. उसके गाँव के ही बहुत सारे लोग ऐसा करते भी हैं लेकिन वह ऐसा कभी नहीं करता. वह मानता है कि यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपमान है.पढ़ा-लिखा भले ही नहीं है लेकिन बड़ी अच्छी भाषा में वोट बेचने वालों को धिक्कारता है. पता चलने पर ऐसों को सामने से साफ़-साफ़ गरियाता है कि, "लोकतंत्र के दुश्मन ! वोट बेचने से अच्छा है कि जा अपनी अम्मा को किसी कोठे पर बिठा के पैसे कमा ले. "सिर्फ़ वोटर को  ही नहीं एक बार एक बाहुबली प्रत्याशी (मौज़ूदा विधायक) को भी उसने यह कहते हुए फटकारा था कि, " तुम जो पायल हमारी बेटी को पहना रहे हो क्या कभी अपनी बहिन ,बेटी या अम्मा को इतने प्यार से पहनाया है?" लोग बताते हैं कि उस समय उस विधायक का मुँह सूख गया था. उसके चमचे तुरंत पानी लेके आए थे. उसके एक आध चेले तो रामदीन को ठिकाने भी लगाना चाहते थे लेकिन विधायक ने ही यह कह कर  रोक दिया था कि, "होश में रहो होश में. अब बाहुबल का समय लद गया. अब समय है विवेक-बल का. अव्वल तो ऐसा कर नहीं पाओगे और अगर ऐसा करने में सफल भी हो गए तो बड़ी बदनामी हो जाएगी और उसके चलते  दो वोट नहीं मिलेंगे. हम सब जेल में सड़ेंगे ऊपर से."
            इधर कुछ दिनों से अपने नाम को लेकर परभू डरा-डरा -सा रहता है कि कहीं कोई उसका उलटा-सीधा नाम न पुकार दे .वैसे तो विद्यालय में उसका नाम प्रभुदेवा ही लिखा है.वहाँ के दो-एक घमंडी सवर्ण शिक्षकों को छोड़ सभी उसे इसी नाम से बड़े प्यार से बुलाते हैं  लेकिन गाँव-घर वाले उसे परभू ही कहते आ रहे हैं.अगर राधा के आगे कोई उसका नाम न बिगाड़े तो फिर और कहीं का उसे ज़रा भी बुरा नहीं लगता. उसके बापू का नाम बिगाड़ना तो उसे राधा के सामने भी बुरा नहीं लगता.कभी-कभी तो उसका पिता  रामदीन उसे परभुआ-परभुआ करके चिल्लाते हुए सारे  गाँव में  खोजता घूमता  है. जब कहीं ढूँढे नहीं मिलता है तो भाषा भी बदल देता है और भाव भी तथा और भी कठोर होकर कहता है, 'ओ परभुआ! हरामी सारे मरि गए का. अबकी जौ कहूँ ताश ख्यालति मिलि गएउ तउ डंडा डारि कइ उल्टा लटकउब.'  
        रामदीन को लगता है कि परभू अबकी बैनरों में ज़्यादा रुचि नहीं ले रहा है.सही भी है. परभू अब रामदीन से ज़्यादा राम अवध का हो गया है और अपनी अम्मा से भी ज़्यादा राधा का. रामदीन को भी समझना चाहिए कि अब उसका उतना आज्ञाकारी नहीं रह गया है परभू. उसकी राधा को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि उसका सुंदर-मुंदर प्रेमी बंदर-बिलार-सा खंभे-खंभे बिलंगता फिरे. अब से कुछेक महीनों पहले जब वह गाँव में कभी बैनर की जाँघिया पहन के निकलता था  तो राधा की सहेलियाँ जोर-जोर से उसे लल्लू कहके चिढ़ाती थीं .लोगों को लगता था  कि परभू को चिढ़ाया जा रहा है लेकिन राधा जानती थी  कि किसी परभू को  लल्लू कहकर नहीं चिढ़ाया जा रहा है बल्कि  केवल उसी को चिढ़ाया जा रहा है,जिसका मतलब था कि राधा का परभू लल्लू है.यही सत्य भी है.इसीलिए अबकी पहले से ही उसने परभू को  अल्टीमेटम दे दिया है.उसने एक दिन एकांत में परभू को बुलाकर साफ़-साफ़ कह दिया है ,'तुम्हें दो में से एक का चुनाव करना है बैनर की जांघिया या राधा .' बच्चू की जांघिया का नाड़ा उसी दिन से ढीला हुआ पड़ा है.बाप की सुनें तो राधा हाथ से जाए और राधा की मानें तो बाप की लातें खाएँ.इसी बात पर परभू का किशोर मन हिचकोले खाता रहता है.इन दिनों वह बाप से डर के  तो भागा-भागा घूमता ही है ,अपनी प्रिया राधा से भी कम डरा-डरा नहीं रहता.          
            इस चुनाव में भीतरी मन से परभू को  इस बात की बड़ी खुशी है कि किसी भी प्रत्याशी ने अपने बैनरों में कपड़े का इस्तेमाल नहीं किया है.रामदीन  किसी को कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं था कि आप कपड़े का ही इस्तेमाल करें .वह कहता भी तो गरीब की सुनता ही कौन है? गरीब और स्त्री को तो कान-आँख के इस्तेमाल की पूरी छूट है पर मुँह की नहीं.इसीलिए उसने देखा-सुना तो सब पर चुप रहना ही उचित समझा.प्लास्टिक के बैनरों के चलते अबकी रामदीन भले दुखी थे लेकिन परभू  निश्चिन्त था  कि चलो बैनर की जाँघियों से तो पिंड छूटा. इसी ख़ुशी में मगन स्याह निशा के प्रथम प्रहर में ही वह अपनी निशाभिसारिका राधा से अभिसार में रत था कि बापू की कर्कश आवाज़ उसके कानों में पड़ी.रात में बापू के द्वारा चिल्लाते हुए खोजे जाने के कारण वह बहुत डर गया.उसे लगा हो न हो कहीं  कोई कपड़े का बैनर भी लग गया हो.उसे पता है कि जहाँ भी लगा होगा पहले उसका बाप रामदीन उसे वहाँ तक बाँह पकडे-पकड़े ले जाएगा फिर निगरानी करने का निर्देश देगा.इसके बाद वोटिंग पड़ने के अगले दिन उसे भोर में ही उतार लेने की हिदायत के साथ किसी और बैनर की तलाश में दूसरे गाँव निकल जाएगा .रामदीन को यह भी अच्छी तरह पता है कि इन दिनों उसका बेटा इन बैनरों की जाँघियों को अपने घर के अलावा कहीं और पहन के नहीं जाता और न ही उसे अपने पिता (रामदीन) का ही इन बैनरों से बनी जांघिया पहन के कहीं जाना अच्छा लगता है. यह सब पता होने के बावजूद रामदीन बैनरों के पीछे बावला हुआ पड़ा  है. प्लास्टिक के बैनरों की भरमार देखकर लगता है इस बरस उसका बावलापन उतर जाएगा.इसी  से इस साल वह प्लास्टिक के खिलाफ़ आन्दोलन चलाने की सोच रहा है. हर प्रत्याशी से प्लास्टिक की कमियाँ बताता है. वह

प्लास्टिक को कलयुग का भस्मासुर बताकर उनसे उसके प्रयोग को रोकने की अपील भी करता है लेकिन सबके सब यह कहके पल्ला झाड़ लेते हैं कि अगली बार  देखेंगे अबकी तो उनके बैनर  पहले ही छपवाए जा चुके हैं.
            'परभुआ, परभुआ' की बाप की आवाज़ कान में पड़ते ही परभू राधा के घर के पीछे वाली अँधेरी गली में जल्दी-जल्दी में  चूमाचाटी अधबीच छोड़-छाड़ पिछवाड़े की तरफ भाग खड़ा हुआ. जोर लगाकर बाँह छुड़ाते हुए परभू को 'बड़े डरपोक हो 'कहकर राधा खिलखिलाई भी थी लेकिन वह तो बस वहाँ से निकलने की फिराक़ में था. लंबे-लंबे  डग भरके वह जल्दी से घर पहुँच कर पिता को चकमा देने में कामयाब हो गया था. रामदीन क्रोध में भरे  नाग की तरह फनफनाता हुआ घर पहुँचा तो उसे घर पर पाके थोड़ा ठंडा पड़ गया फिर भी पूछा ज़रूर कि,"कहाँ थे ?"परभू को उसके  बापू कहीं मार न बैठें इस डर से माँ फ़ौरन बाहर आ गई. बोलने लगी ,"इसने गलती की है तो डांट-फटकार लो यह सब कुछ तो ठीक है पर आज तीज-त्योहार के दिन हाथ न उठाना. अगर हाथ उठाया तो मुझसे बुरा कोई न होगा, समझे !"
           क्रोध के मारे  रामदीन ने अपने नंगे पाँव ज़मीन पर पटकते हुए कहा ,"तुम तो इसे शुरू से बिगाड़ती आ रही हो. मैं इसे मारने के लिए नहीं ढूँढ़ रहा था.नेताओं से बैनरों का हिसाब करने के लिए खोज रहा था.इससे कहो कि सभी नेताओं को फोन लगाकर कहे कि हमारे भी मुँह-पेट है कि नहीं .हमें भुगतान करें ,बस .हम और कुछ नहीं जानते ." रामदीन के मुँह से फूटे इन्सुरों से माँ और बेटे दोनों ने एक साथ लंबी साँस ली .परभू सब नेताओं को बारी-बारी से फोन लगाने लगा.आँगन  में चारपाई पर बैठे-बैठे फोन लगाता देख रामदीन ने चिल्लाकर कहा , " हुवां से का घंटा लागी ?जब टावरु पकरी तब न.हियाँ आवउ कोनेम पकरी ." परभू ने कोने में आकर लगाना चालू किया तो किसी एक को फोन लग गया .उसने पूछा ,"कौन?''तो इधर से जवाब गया,"प्रभु देवा." उधर से फिर नया सवाल  आया ,"हैलो!कौन,डांसर?" इधर से ,"नहीं."के उत्तर के साथ उधर का फोन स्विच ऑफ़ बताने लगा.उसके बाद उसने जिस भी नेता को फोन लगाया सबके सब यही बक रहे थे कि ,"आप जिस उपभोक्ता को फोन लगा रहे हैं उससे संपर्क नहीं हो पा रहा है.उपभोक्ता का मोबाइल या तो स्विच ऑफ़ है या कवरेज़ एरिया से बाहर है."घंटों वह फोन में ही लगा रहा.कोई परिणाम मिलता न देख थक कर वह चारपाई पर लेट गया.रामदीन भी देहरी पर खड़े-खड़े-कान लगाए सब सुन रहा था.निराश और उद्विग्न हो,"गरज निकल जाने पर सभी के फोन स्विच ऑफ़ हो जाते हैं. ऐसे ही करते रहे तो जल्दी ही  तुम भी स्विच ऑफ़ हो जाओगे मादर..."कहते बड़बड़ाते मतलबी नेताओं को गालियाँ बकते हुए घर से बाहर निकल गया.
            बाहर-भीतर  हर तरफ़ गज़ब की गर्मी की गर्मी थी.कहीं पत्ती तक नहीं हिल रही थी.परभू को पसीना-पसीना  देख माँ ने चारपाई के पास आकर अपने आँचल से उसके माथे का पसीना पोंछा .खुद के बुने पंखे से खूब हवा की.जब उसे नींद आने लगी तो माँ उठकर रोटी सेंकने चली गई.थोड़ी ही देर में परभू को  गहरी नींद आ गई थी .उसने सपना देखा कि वह और राधा किसी दूर शहर में भाग गए हैं .टीवी पर ख़बर आ रही है जिसमें उसकी माँ खूब रो रही है और कह रही है कि," लौट आओ बेटा !मैं और तुम्हारे बापू तुम दोनों को कुछ नहीं कहेंगे .गाँव वालों से छिपाकर तुम्हें अपने करेजे में रख लेंगे.पहले भी नौ महीने रखा नहीं है क्या?"
          थोड़ी देर बाद माँ को सुनाई पड़ा कि उसका बेटा कुछ बड़बड़ा रहा है.जब तक वह दौड़ के पास आई परभू हड़बड़ा के उठ बैठा था .माँ को पाके वह लिपटकर फूट-फूट के रोने लगा था पर कह नहीं पा  रहा था कि उसका वह सपना टूट गया था जिसे माँ-बापू मान भी जाएंगे तो उसका निर्दयी गाँव   कभी सच होने ही नहीं देगा.उसे भी दो में से एक रास्ता चुनना है पहला या तो जगत गोसाईं और नूर बानो की तरह अपना दर यानी गाँव-घर  छोड़े या दूसरा यह कि राधा का  सपना ही छोड़ दे.
          राधा को मिले एक हफ़्ता हो गया है.परभू ने भी उड़ते-उड़ते सुना है कि उसकी शादी तय हो रही है.शायद इसी विषय पर बात करने के लिए वह तीन दिनों से परभू को मिलने के लिए मेसेज पर मेसेज कर रही है.छोटे भाई को भी बराबर उसके पास भेज रही है लेकिन न तो अब तक परभू उसके पास खुद चलकर आया है और न ही उसका कोई संदेश.परभू को यह चुनाव करना कठिन हो रहा है कि माँ के पास रहे या राधा को लेकर शहर निकल  ले. राधा ने छोटे भाई के हाथ में दस रुपए का नोट और एक छोटी-सी पर्ची रखते हुए लाला हरदयाल के यहाँ से कुछ लेकर खा लेने के बाद परभू के पास इस अंतिम सन्देश के साथ जाने को कहा कि," आज के बाद मैं कोई फैसला करने लायक नहीं रहूँगी.आज ही हमारे लिए पक्की की जा चुकी ससुराल से देखने के लिए लोग आ रहे हैं ." राधा का भाई इतने बड़े इनाम से आज बहुत खुश था.इसलिए वह पहले काम को अंजाम देकर ही इनाम लेना चाहता था. फटाफट परभू के पास पहुँच गया.पहुँचते ही वह पर्ची परभू को थमा दी और उसके मुंह की ओर ताकने लगा.पहले तो परभू  राधा के भाई को यह कहकर टालता रहा कि चलो हम अभी पांच मिनट में आते हैं लेकिन बला टलती न देख उसने उसी के सामने यह सन्देश लिखा कि, ''अभी तुम जीवन के ऐसे मोड़ पर हो जहाँ बोल्ड स्टेप लेने की ज़रूरत है. अभी पढ़ो. घरवालों को शादी के लिए साफ़ मना कर दो और उनसे  बोल्डली कह दो कि पहले हम अपने पैरों पर खड़ी होंगी तब शादी की सोचेंगी."
          राधा का भाई घर लौट गया. लौटते हुए उसने आइसक्रीम ली और चटखारे ले-लेकर खाते हुए आकर बहन से मेसेज मिलने की बात भी पक्की की लेकिन उस नादान को राधा के किशोर दिल के उस दर्द का क्या पता जो मेसेज के बाद से वह लगातार परभू से बात करने की नाकाम कोशिश से पा  रही थी. जिसने एक कोमल ह्रदय किशोरी को बोल्ड स्टेप लेने का संदेश भेजा था उसी परभू का मोबाइल लगातार स्विच ऑफ़ बता रहा था.                                              

पता-
प्रोफ़ेसर (हिंदी),
इंडियन स्टडीज़ विभाग,
गुआंगदोंग भाषा विश्वविद्यालय ,
बायून दादाओबेई,गान्ग्ज़ाऊ,चीन

पेंटिंग- विज्ञानव्रत

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