औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Saturday, 9 November 2013

विपरीत चिंतन / रणजीत



मैं कई अजीबो-गरीब मूर्खतापूर्ण काम एक साथ करना चाहता हूँ
मैं जीते-जी अपनी क़ब्र खोदना चाहता हूँ
बीस साल मैंने जनसामान्य को साम्यवादी बनाने की कोशिश की
अगले बीस साल मैं
साम्यवादियों को जनवादी बनाने की कोशिश करना चाहता हूँ ।

मैं सोवियत संघ में गाँधी को जन्म देना चाहता हूँ
और हिन्दुस्तान में लेनिन को
क्रान्ति के साठ साल बाद भी वहाँ का आम आदमी निर्भय नहीं है
गाँधी के बिना यह काम कौन करेगा ?
और आज़ादी के तीस साल बाद भी
यहाँ के दो तिहाई लोग भूखे सोते हैं
क्या लेनिन के अलावा भी इसका कोई इलाज है ?

मैं कास्त्रो को अमेरिका का राष्ट्रपति चुनना चाहता हूँ
और कार्टर को क्यूबा का
मैं सब कुछ उलट-पलट देना चाहता हूँ
मैं अन्तरीपों को खाड़ियों में
और खाड़ियों को अन्तरीपों में बदल देना चाहता हूँ
मैं पहाड़ों को घाटियों में रख कर उन्हें समतल कर देना चाहता हूँ
मैं तीसरी दुनिया के रेगिस्तानों की प्यास
दोनों दुनियाओं की नदियों के पानी से बुझा देना चाहता हूँ

मैं तमाम उल्टे-सीधे काम एक साथ करना चाहता हूँ
मैं पाकिस्तान को हिन्दू राष्ट्र
और नेपाल को इस्लामी गणराज्य घोषित करना चाहता हूँ
अफ्रीका में गोरी सरकारें तो हैं
अब मैं योरप में काली सरकारों की स्थापना करना चाहता हूँ
मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सारे मुसलमान शिक्षकों का तबादला
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में कर देना चाहता हूँ
और बनारस के सारे हिन्दू शिक्षकों का अलीगढ़ में ।

मैं मास्को में लिबर्टी स्टैच्यू लगाना चाहता हूँ
और न्यूयार्क में लाल सितारा ।
मैं ब्रेज्नेव को स्पेनिश कम्यूनिस्ट पार्टी का महासचिव बनाना चाहता हूँ
ताकि केरिल्लो रूस में उनकी जगह ले सकें ।
मैं चेकोस्लोवाकिया स्थित सोवियत राजदूत को
सोवियत संघ का राष्ट्रपति बनाने के लिए
अफगान सेनाओं को मास्को में उतार देना चाहता हूँ ।

मैं चाहता हूँ कि कोई देश अपने घरेलू मामलों में ख़ुद दख़ल न दे
उसे सिर्फ़ दूसरे देशों के घरेलू मामलों में
दख़ल देने का अधिकार हो !
यानी पूरी दुनिया एक परिवार हो
उसकी एक चुनी हुई संसद हो, संघीय सरकार हो
सब राष्ट्रीय सरकारें प्रान्तीय सरकारों में बदल दी जाएँ
जिनके पास न सेनाएँ हों न हथियार हों
एक ऐसी दुनिया बने, जिसमें
न तो कोई भूखा हो, न बेरोज़गार हो
फिर भी हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का
आलोचना का, आन्दोलन का अधिकार हो
अपने जीवन पर, मरण पर
अपनी यति-गति-नियति पर पूरा अख़्तियार हो
हर गाँव, कस्बे, नगर की

अपनी एक चुनी हुई स्वायत्त सरकार हो
लेकिन गाँव से लेकर विश्व तक की सभी सरकारों के पास
कम से कम अधिकार हों
ताकि वे धीर धीरे
बेज़रूरत होकर
झर जाएँ
टूटें
गिरें
और मर जाएँ ।

-डॉ रणजीत